BHRASHT INDIA
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शुक्रवार, 23 जनवरी 2026
बड़े खेल का खुलासा: करोड़ों की पेशगी लेकर लाया गया नगर निगम की जमीन कॉलोनाइजर को देने का प्रस्ताव, PIL दायर करने की तैयारी
वृंदावन में कुछ खास कॉलोनाइजर के लिए लेंड एक्सचेंज का प्रस्ताव यूं ही नहीं लाया गया। इसके लिए षड्यंत्र के तहत बाकायदा एक ''दुरभि संधि'' की गई। चूंकि मामला करोड़ों का नहीं, अरबों रुपए का था इसलिए करोड़ों रुपए तो पेशगी में ही दे दिए गए। हालांकि अब नगर आयुक्त कह रहे हैं कि ये प्रस्ताव दफन किया जा चुका है लिहाजा भविष्य में ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं लाया जाएगा। नगर आयुक्त कुछ भी कहें, लेकिन सवाल तो यह है कि निजी टाउनशिप के लिए पहले तो मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण और फिर मथुरा-वृंदावन नगर निगम, ये प्रस्ताव लेकर आया ही क्यों?
इस 'क्यों' का जवाब देने को कोई तैयार नहीं है इसलिए कुछ जागरूक लोग न्यायालय की शरण में जाने की तैयारी कर चुके हैं। वो इसे उच्च न्यायालय और फिर जरूरत पड़ने पर उच्चतम न्यायालय तक ले जाना चाहते हैं ताकि बेशकीमती सरकारी जमीन को माफिया के कब्जे में जाने से बचाया जा सके।
एनजीटी में ये मामला पहले ही जा चुका है और वहां से सभी संबंधित पक्षों को नोटिस भी जारी किए जा चुके हैं, परंतु अब लोगों को समझ में आ गया है कि डालमिया बाग की तरह इस केस को भी उच्च या उच्चतम न्यायालय ले जाना ही उपयुक्त होगा इसलिए वो इसकी तैयारी कर चुके हैं।
वृंदावन निवासी लक्ष्मीनारायण उर्फ ब्रजबिहारी शर्मा तथा दीपक शर्मा ने कल इसी संदर्भ में जिलाधिकारी मथुरा के नाम एक ज्ञापन सौंपा है और उसकी प्रति लोकायुक्त को भी भेजी है।
शिकायतकर्ताओं ने इस ज्ञापन में लिखा है कि इस ''लेंड एक्सचेंज'' का प्रस्ताव पेश करने से पहले न तो विकास प्राधिकरण ने और ना ही नगर निगम ने पारदर्शिता एवं नियमों का पालन किया जिससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि ऐसा एक निजी कंपनी को अनुचित लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से किया गया।
शिकायतकर्ताओं ने इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराने का अनुरोध किया है जिससे प्रस्ताव लाने के पीछे छिपी मंशा सामने आ सके और इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों को कठघरे में खड़ा किया जा सके।
मथुरा जिला प्रशासन तथा नगर निगम मथुरा-वृंदावन से जुड़े भरोसेमंद सूत्र बताते हैं कि सनसिटी अनंतम एवं अन्य बिल्डर्स के पक्ष में लेंड एक्सचेंज का मात्र प्रस्ताव लाने की पेशगी करीब 5 करोड़ रुपए प्राप्त की गई तथा 'शेष के लिए' पूरी 'साजिश' बनाई गई कि किसको किस तरह और कितना-कितना लाभ पहुंचाना है।
ये सारा काम कितनी गोपनीयता से किया जा रहा था, इसका अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि सनसिटी अनंतम के मालिकों तक का नाम किसी को नहीं बताया जाता।
सूत्र बताते हैं कि सैकड़ों एकड़ की इस टाउनशिप के मालिकों में मुख्य रूप से ZEE TV के मालिक सुभाष चंद्रा के भाई लक्ष्मी गोयल तथा उनके समधी (जो एक्शन शू कंपनी के मालिक) शामिल हैं।
इनके अलावा जिन अन्य के लिए लेंड एक्सचेंज का प्रस्ताव लाया गया, उनमें द्वारिकादास जीवराजका मैमोरियल ट्रस्ट तथा हरिनिवास खेतान मैमोरियल ट्रस्ट द्वारा विकसित की जा रही कॉलोनियों का नाम है।
''लीजेंड न्यूज़'' ने जब इस पूरे प्रकरण में कानूनी विशेषज्ञों की राय ली तो उन्होंने इसे साफ तौर पर पद के दुरुपयोग तथा निजी स्वार्थ की पूर्ति के लिए बदनीयती का मामला बताया, जो आपराधिक कृत्य बनता है।
कानूनी विशेषज्ञों की राय में ये न सिर्फ नियमों को ताक पर रखकर माफिया के एजेंट की तरह काम करने का अपराध है बल्कि इससे साफ-साफ जाहिर होता है कि मथुरा जिले के अधिकारी तो बिक ही चुके हैं, जनप्रतिनिधि भी ऑब्लाइज हैं अन्यथा ये मुद्दा अब तक विधानसभा में भी उठ जाना चाहिए था।
कानून के जानकारों की मानें तो इस पूरे प्रकरण में प्रशासनिक अधिकारियों सहित मेयर की भी भूमिका संदिग्ध प्रतीत होती है और इसलिए यदि इसकी निष्पक्ष जांच हो जाती है तो साफ हो जाएगा कि आखिर क्यों कुछ खास कॉलोनाइजर के पक्ष में लेंड एक्सचेंज के लिए प्रशासन से लेकर निगम तक में बैठे जिम्मेदार लोग इतने उतावले हैं।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
गुरुवार, 15 जनवरी 2026
माफिया पर मेहरबान प्रशासन: कौड़ियों की जमीन के बदले नगर निगम की बेशकीमती जमीन देने की तैयारी
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हर तीसरे दिन, और अपने प्रत्येक जनता दर्शन कार्यक्रम में कहते रहते हैं कि भूमाफिया किसी भी तरह पनपने न पाए। वह राज्य से माफिया को नेस्तनाबूद करने के आदेश और निर्देश अधिकारियों को देते रहते हैं, लेकिन यदि मेढ़ ही खेत को खाने पर आमादा हो तो सीएम योगी कर क्या सकते हैं। ऐसे में एक योगी क्या, योगी जैसे दस मिलकर भी शायद कुछ नहीं कर सकते। दूसरे जनपदों का यहां जिक्र न किया जाए तो कम से कम मथुरा का जिला प्रशासन भली-भांति समझ चुका है कि वह चाहे जितना खुल कर खेले, चाहे जितना भ्रष्टाचार करे किंतु उसका कुछ नहीं बिगड़ने वाला। तभी तो धर्म की नगरी में अधर्म का डंका डटकर बज रहा है और जिसकी जितनी बिसात है, वह उतनी ही माफिया की मदद करने पर आमादा है।
तभी तो पहले डालमिया बाग और अब सनसिटी अनंतम का मामला भी अदालत की चौखट तक पहुंचा, अन्यथा इसकी जरूरत ही क्यों पड़ती।
ताजा मामला एक बार फिर वृंदावन के सनसिटी अनंतम से जुड़ा है जिसे नगर निगम मथुरा-वृंदावन की बेशकीमती जमीन उपलब्ध कराने के लिए जिला प्रशासन के निर्देश पर बोर्ड बैठक में बाकायदा प्रस्ताव लाया गया।
आश्चर्य की बात यह है कि यह प्रस्ताव कौड़ियों की जमीन के बदले नगर निगम की बेशकीमती जमीन देने का है, जिस पर पूर्व में एक जिलाधिकारी आपत्ति भी दर्ज करा चुके हैं। अब यह प्रस्ताव निगम की बैठक में फिर लाया गया है।
क्या है प्रस्ताव?
9 अक्टूबर 2025 को पेश एजेण्डे के अनुसार अपर जिलाधिकारी (प्रशासन) मथुरा ने ग्राम जैत व छटीकरा में सनसिटी हाईटेक प्रोजेक्ट प्रा. लि. द्वारा विकसित की जा रही टाउनशिप के लिए भूमि विनिमय का प्रस्ताव बोर्ड से पास कराकर उपलब्ध कराने के निर्देश पत्रांक-322/सात-बी/भू.व्य./2023 दिनांक 06.09.2023 एवं 173/सात- बी/भू.व्य./2023 दिनांक 23.09.2024 के जरिए दिए हैं।
इस नए प्रस्ताव के मसौदे में बताया गया है कि ग्राम जैत व छटीकरा में सनसिटी हाईटेक प्रोजेक्ट प्रा. लि. द्वारा विकसित की जा रही टाउनशिप के लिए भूमि के विनिमय का जो प्रस्ताव कार्यकारिणी ने पहले रखा था, उसकी त्रुटियों को संशोधित करते हुए यह प्रस्ताव लाया गया है।
यहां यह जान लेना जरूरी है कि सनसिटी हाईटेक ने अपनी प्रस्तावित टाउनशिप में जमीन का प्राथमिक मूल्य लगभग एक लाख रुपए प्रति वर्ग गज रखा है जबकि मथुरा-वृंदावन नगर निगम को उसके विनिमय में जो भूमि मिलनी है उसकी कीमत बमुश्किल 10 हजार रुपए प्रति वर्ग गज है।
देखें नगर निगम मथुरा-वृंदावन की बोर्ड बैठक में पेश एजेण्डे की प्रति-
गौरतलब है कि समूचा मथुरा जनपद और विशेषकर भगवान श्रीकृष्ण की लीलास्थली वृंदावन इन दिनों ''धार्मिक पर्यटन'' के रूप में अपनी वैश्विक पहचान बना चुका है। वृंदावन में जमीनों के दाम आसमान छू रहे हैं इसलिए स्थानीय ही नहीं, बाहरी भूमाफिया भी इसका भरपूर लाभ उठाने में लगे हैं। चूंकि जिला प्रशासन उन्हें इसकी पूरी छूट दे रहा है इसलिए वह कोई मौका हाथ से जाने नहीं देना चाहते।
इन हालातों में यह बताने की तो आवश्यकता ही नहीं रह जाती कि मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण हो या फिर नगर निगम मथुरा-वृंदावन, सब आखिर कथित कॉलोनाइजर्स या यूं कहें कि भूमाफिया पर इतने मेहरबान क्यों हैं, और क्यों जिला प्रशासन विकास की आड़ लेकर भूमाफिया को सीधा लाभ पहुंचाने की जद्दोजहद में लगा है।
दरअसल ये सारा खेल करोड़ों का नहीं, अरबों का है। जाहिर है कि इससे होने वाली हराम की कमाई कितनी भी मामूली क्यों न हो, कुबेर के खजाने से कम नहीं होगी। राधे-राधे की रट लगाकर ब्रजवासियों को मूर्ख बनाने का यह धंधा बेशक बहुत दिनों से चल रहा है लेकिन अदालतें उम्मीद की किरण दिखा रही हैं।
वो आशा जगाती हैं कि कभी न कभी तो पाप का यह घड़ा भरेगा, और किसी न किसी दिन यह फूटेगा भी। तब अकेला माफिया नहीं, नेता और अधिकारी भी नापे जाएंगे। काली कमली वाले की नजर जिस दिन टेढ़ी हो गई, उस दिन ब्रज में यह कहावत चरितार्थ होते दिखाई देगी कि उसके घर में देर भले ही हो लेकिन अंधेर नहीं होता।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
शुक्रवार, 26 दिसंबर 2025
सनसिटी अनंतम: विकास प्राधिकरण के भ्रष्टाचार की अनंत कथा का ज्वलंत उदाहरण
महाभारत नायक योगीराज भगवान श्रीकृष्ण की लीला स्थली में डेवलव हो रही 'सनसिटी अनंतम' को यदि MVDA (मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण) के भ्रष्टाचार की अनंत कथा का एक अध्याय कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। दूसरे शब्दों में कहें तो इस विश्व प्रसिद्ध धार्मिक नगरी की डेवलपमेंट अथॉरिटी के हर प्रोजेक्ट का आदि और अंत भ्रष्टाचार की एक ऐसी अनंतकथा होता है जिसमें पर्त-दर पर्त 'योगीराज' के आदेश-निर्देशों सहित नियम-कानून की धज्जियां उड़ाई जाती हैं। फिर वह चाहे MVDA का अपना प्रोजेक्ट हो या उसके द्वारा अधिकृत किसी का निजी प्रोजेक्ट।
डालमिया बाग के गुरू कृपा तपोवन में डेवलपर को अनुचित लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से की गई अनेक कारस्तानियों के बाद अब मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण ने सनसिटी अनंतम से जुड़े रियल एस्टेट कारोबारियों के हित में वो काम कर दिखाया है जिसकी जांच की जाए तो भ्रष्टाचार की एक ऐसी मिसाल सामने होगी जिसकी सामान्यत: कल्पना करना भी मुश्किल होगा। साधारण शब्दों में कहें तो वृंदावन के इस लग्जरी हाउसिंग प्रोजेक्ट के लिए MVDA के खास जिम्मेदार अधिकारी ने एक रियल एस्टेट के ''दलाल'' की भूमिका अदा की है।
अधिकारियों के ''दलाल'' बन जाने की पुष्टि करता पत्र
सनसिटी अनंतम को डेवलप कराने के अथक प्रयासों में अधिकारियों की दलाल वाली भूमिका का खुलासा उस पत्र द्वारा होता है जो MVDA के तत्कालीन उपाध्यक्ष श्याम बहादुर सिंह के हस्ताक्षर से 28 जून 2025 को जिलाधिकारी मथुरा को लिखा गया है और जिसमें डीएम के समक्ष 5.8236 हेक्टेयर भूमि के अधिग्रहण का प्रस्ताव रखा गया है।
यह पत्र मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण में बेखौफ भष्टाचार का बड़ा सबूत है क्योंकि इसमें नियामक और लाभार्थी के बीच की रेखा को ताक पर रखकर बिल्डर को ही आवेदक बता दिया गया है।
आरटीआई पर खामोशी भी बहुत कुछ कहती है
यहां गौर करने वाली बात यह है कि राज्य की एक महत्वपूर्ण इकाई निजी स्वार्थ में किस कदर अंधी है कि वह सनसिटी अनंतम के हित में खेले जा रहे इस खेल की कोई जानकारी तक देने को तैयार नहीं है और आरटीआई का इस्तेमाल करने वालों को लगातार गुमराह करती रही है। कुछ आरटीआई का जवाब नहीं दिया जाता तो कुछ को शब्दों के जाल में उलझा दिया जाता है जिससे आवेदनकर्ता थक-हार कर घर बैठ जाए।
दरअसल, मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण आरटीआई के मामले में एक लंबे समय से इसी रणनीति को अख्तियार किए हुए है और इससे अपने मकसद में सफल होता रहा है।
चौंकाता है लेन-देन का यह गणित
रियल एस्टेट कारोबार से जुड़े माफिया और डेवलपमेंट अथॉरिटी की कुटिल चालों वाली प्रक्रिया से सामने आने वाला लेन-देन का गणित किसी को भी चौंका सकता है।
अगर बात करें सनसिटी अनंतम की तो यहां का वर्तमान अनुमानित सर्किल रेट 20 करोड़ रुपए प्रति हेक्टेयर है जबकि डेवलपर की ओर से वर्तमान विक्रय मूल्य रखा गया है 1 लाख रुपए वर्ग मीटर। इस हिसाब से यह मूल्य बनता है लगभग 100 करोड़ रुपए (एक अरब) प्रति हेक्टेयर यानी अधिग्रहण के अधिकतम मूल्य से भी पूरा पांच गुना ज्यादा। संभवत: यही कारण है कि आज हर वो व्यक्ति रियल एस्टेट के करोबार में उतरने को आतुर रहता है जिसके पास थोड़ा भी पैसा है।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता और सनसिटी अनंतम के याचिकाकर्ता की ओर से एनजीटी में पैरवी कर रहे नरेन्द्र कुमार गोस्वामी कहते हैं कि भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापना अधिनियम 2013 के तहत निजी कंपनियों के लिए अधिग्रहण हेतु 80% प्रभावित परिवारों की सहमति अनिवार्य है लेकिन इस मामले में सार्वजनिक सुनवाई के अभिलेख सहमति नहीं बल्कि बड़ी आपत्तियाँ और 'असहमति' दर्शाते हैं।
पहले डालमिया बाग और अब सनसिटी अनंतम के लिए मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण की रियल एस्टेट माफिया के साथ साबित होती सांठगांठ यह बताती है कि विकास प्राधिकरण के अधिकारियों को योगी आदित्यनाथ की भ्रष्टाचार को लेकर प्रचारित जीरो टॉलरेंस नीति के सच का पता लग चुका है।
वह जान गए हैं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ ढोल पीटने और उसके खिलाफ पूरी ताकत से खड़े हो जाने में बड़ा फर्क है। यदि ऐसा न होता तो मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के अनेक कारनामे खुल जाने के बावजूद किसी एक जिम्मेदार अधिकारी को कठघरे में खड़ा किया जाता। किसी से तो पूछा जाता कि धर्म की नगरी में खुलेआम खेले जा रहे अधर्म के इस खेल का असल खिलाड़ी कौन है और कौन है जो रियल एस्टेट माफिया को संरक्षण देता है।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
बुधवार, 24 दिसंबर 2025
डालमिया बाग के बाद अब वृंदावन की सनसिटी अनंतम का बड़ा कारनामा: MVDA, वन विभाग सहित 9 को नोटिस
अभी बहुत समय नहीं बीता जब वृंदावन के छटीकरा रोड स्थित डालमिया बाग का मामला NGT से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था। सुप्रीम कोर्ट ने उसमें बेहद सख्त रुख अपनाते हुए न केवल करोड़ों रुपए का जुर्माना ठोका बल्कि अनेक शर्तों के साथ ऐसा आदेश पारित किया, जिसके कारण आज 'गुरू कृपा तपोवन' के नाम से प्रस्तावित पूरा हाउसिंग प्रोजेक्ट खटाई में पड़ चुका है।लेकिन लगता है कि रियल एस्टेट के कारोबार में सक्रिय माफिया न तो किसी आदेश-निर्देश से कोई सीख लेता है और न अदालतों के रुख की परवाह करता है। आखिर बात करोड़ों के नहीं, अरबों के लाभ की जो है।
तभी तो अब वृंदावन के ही छटीकरा रोड पर सुनरख बांगर में सनसिटी अनंतम को डेवलप करने वाले समूह ने ऐसा कारनामा कर दिखाया है जिसकी कल्पना तक कोई आसानी से नहीं कर सकता। ऐसे में एक सवाल यह जरूर उठता है कि कैसे कोई रियल एस्टेट ग्रुप इतना दुस्साहस कर पाता है, और कौन हैं जो किसी समूह को इतना हौसला देते हैं कि वह सुप्रीम कोर्ट के आदेश-निर्देश से पेश नजीर को अहमियत देना आवश्यक नहीं समझता। जवाब साफ है। रियल एस्टेट के कारोबार में सक्रिय माफिया को इस दुस्साहस के लिए सबसे अधिक प्रोत्साहन विकास प्राधिकरण से मिलता है जिसे कृष्ण की नगरी में मथुरा वृंदावन विकास प्राधिकरण यानी MVDA कहते हैं।
इसके बाद नंबर आता है प्रदूषण विभाग और वन विभाग का। हालांकि सनसिटी अनंतम के केस में उत्तर प्रदेश प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड (UPPCB) ने CTE अर्थात Consent to Establish अस्वीकृत करने की सिफारिश की है, बावजूद इसके रियल एस्टेट माफिया गैरकानूनी तौर पर अपना काम कर रहा है।
दिल्ली-आगरा रोड पर नेशनल हाईवे नंबर 19 के किनारे अनुमानित 400 एकड़ से अधिक में बनाई जा रही इस टाउनशिप की भव्यता का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि यहां मात्र 240 वर्गगज में बने एक विला की शुरूआती कीमत 6 करोड़ रुपए से ज्यादा रखी गई है।
बहरहाल, अब NGT की Principal Bench ने इससे संबद्ध मूल आवेदन संख्या 649/2025 की सुनवाई करते हुए सूचीबद्ध किया है और उत्तर प्रदेश सरकार, उत्तर प्रदेश प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड, राज्य पर्यावरण प्रभाव आंकलन प्राधिकरण (SEIAA-UP) पर्यावरण विभाग, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC), केंद्रीय भू जल प्राधिकरण (CGWA), प्रभागीय वन अधिकारी वन विभाग मथुरा, MVDA (मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण, जिलाधिकारी मथुरा तथा एमएस सनसिटी हाईटेक प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड के अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता आशुतोष सिंह को नोटिस देकर जवाब तलब किया है।
दरअसल, ताज ट्रपेजियम जोन (TTZ) के अंतर्गत आने वाले सनसिटी अनंतम प्रोजेक्ट को लेकर दायर याचिका पर NGT में 18 दिसंबर को हुई सुनवाई के बीच याचिकाकर्ता के अधिवक्ता एन के गोस्वामी ने पीठ को अवगत कराया कि अब तक इस प्रोजेक्ट के लिए कोई वैधानिक अनुमति ली ही नहीं गई है। प्रोजेक्ट के लिए न तो Consent to Establish है, न Conset to Operate (CTO) है और न कार्यशील सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) है।
यहां सीवेज को मध्ययुगीन प्रथा की तरह टैंकरों के जरिए आसपास के इलाकों में निस्तारित कराया जा रहा है जो पर्यावरण की दृष्टि से तो अनुचित है ही, स्वास्थ्य के नजरिए से भी हानिकारक है और इसका प्रभाव लोगों पर पड़ रहा है। अधिवक्ता एन के गोस्वामी ने इसे पीठ के समक्ष कानून के शासन को 'कार्डियक अरेस्ट' की संज्ञा देते हुए गंभीर प्रश्न खड़ा किया।
यही नहीं, विद्वान अधिवक्ता ने पीठ के सामने सेटेलाइट इमेज पेश करते हुए यह जानकारी भी दी कि सनसिटी अनंतम के लिए बिना किसी अनुमति के 400 से अधिक दरख्तों को काटा गया है। ये संख्या इससे अधिक भी हो सकती है।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने इस दौरान MVDA को कठघरे में खड़ा करते हुए पीठ को बताया कि जब उत्तर प्रदेश प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड जैसी संस्थाएं इस प्रोजेक्ट के लिए एनओसी को खारिज करने की संस्तुति कर चुकी हैं तब जून 2025 में ही MVDA द्वारा सनसिटी अनंतम के लिए लाइसेंस प्रदान कर दिया गया और निजी प्रतिवादियों को लाभ पहुंचाने के लिए जमीन के अधिग्रहण की प्रक्रिया प्रारंभ कर दी गई, जो अब भी जारी है।
इससे साफ जाहिर है कि राज्य की जिस मशीनरी पर प्रोजेक्ट को कानूनी प्रक्रिया से पूरा कराने की जिम्मदारी है, वही निजी स्वार्थ में गैरकानूनी काम करने वालों को संरक्षण दे रही है। यहां यदि ये कहें कि रियल एस्टेट माफिया और अधिकारियों के बीच गहरी सांठगांठ से ही यह संभव है, तो कुछ गलत नहीं होगा। इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 13 मार्च 2026 की तारीख तय की गई है।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
रविवार, 21 दिसंबर 2025
MVDA की मोटी रिश्वत का जरिया बने वैध कॉलोनियों में चल रहे अवैध निर्माण कार्य और ग्रीन बेल्ट पर कब्जा
उत्तर प्रदेश में जिन सरकारी विभागों को 'भ्रष्टाचार का पर्याय' माना जाता है, उनमें विकास प्राधिकरण का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है। संभवत: इसीलिए आम आदमी की भाषा में इसे 'विनाश प्राधिकरण' कहते हैं। प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली बीजेपी की सरकार बनने के बाद भ्रष्टाचार को लेकर 'जीरो टॉलरेंस' की नीति अख्तियार करने का एलान किया गया। 2017 में पहली बार सीएम की कुर्सी पर काबिज हुए योगी आदित्यनाथ ने 25 मार्च 2022 को दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। अब 2027 की पहली तिमाही में फिर से यूपी के विधानसभा चुनाव होने हैं।
इस दौरान गोरक्ष पीठाधीश्वर महंत अवैद्यनाथ के उत्तराधिकारी योगी आदित्यानाथ ने उत्तर प्रदेश को 'उत्तम प्रदेश' बनाने के प्रयास में कोई कसर नहीं छोड़ी, बावजूद इसके भ्रष्टाचार को लेकर 'जीरो टॉलरेंस' की उनकी नीति विकास प्राधिकरण जैसे विभाग में कतई प्रभावी दिखाई नहीं देती।
रिस्क अधिक तो रिश्वत भी अधिक
सच्चाई तो यह है कि तमाम सरकारी विभागों के अधिकारी और कर्मचारियों ने योगीराज की इस नीति को बड़ी चालाकी से अपने पक्ष में करके रिश्वत के रेट बढ़ा दिए हैं। इन विभागों में साफ-साफ कहा जाता है कि अब रिस्क अधिक है इसलिए काम कराने के पैसे भी अधिक देने होंगे। विकास प्राधिकरण इन विभागों में सबसे ऊपर आता है।
वैसे तो कहीं भी और किसी भी अवैध निर्माण को पहले चुपचाप होते देखना, फिर मौका मिलते ही उसे भुना लेना विकास प्राधिकरण के अधिकारियों की पुरानी फितरत है, लेकिन अब स्थिति यहां तक जा पहुंच चुकी है कि 'वैध कॉलोनियों' में किए जा रहे 'अवैध निर्माण' को भी विभाग ने 'दुधारू गाय' बना लिया है।
भरपूर भ्रष्टाचार के लिए अपनाई गई विकास प्राधिकरण की इस नई नीति का ही नतीजा है कि आज अप्रूव्ड और स्थापित पॉश कॉलोनियों में भी लोग बेखौफ होकर अवैध निर्माण कर रहे हैं, जिससे न सिर्फ इन कॉलोनियों की सुंदरता नष्ट हो रही है बल्कि सड़कें संकरी और पार्क आदि नष्ट-भ्रष्ट हो चुके हैं। अधिकांश ग्रीन बेल्ट पर प्रभावशाली लोगों ने कब्जा कर लिया है। शर्मनाक बात यह है कि अवैध निर्माण करने वालों और ग्रीन बेल्ट कब्जाने वालों में सत्ता से जुड़े लोग, डॉक्टर, इंजीनियर, बड़े-बड़े उद्योगपति, कारोबारी, व्यापारी और यहां तक कि खुद को समाजसेवी कहने वाले भी शामिल हैं।
श्री राधापुरम एस्टेट बना सबसे बड़ा उदाहरण
खबर के साथ दिखाए गए चित्र भगवान श्रीकृष्ण की पावन जन्मस्थली मथुरा में स्थित पॉश कॉलोनी 'श्री राधापुरम एस्टेट' के हैं। नेशनल हाईवे नंबर-19 के किनारे बसी इस कॉलोनी में दो कमरे के एक मकान की कीमत आज ढाई करोड़ रुपए से अधिक है, जिसे खरीद पाना सामान्य जन के लिए आसान नहीं है।
मशहूर रियल स्टेट कारोबारी 'श्री ग्रुप' द्वारा 50 एकड़ से अधिक जमीन पर विकसित की गई यह कॉलोनी शुरूआत में इसलिए चर्चा का विषय थी कि यहां बनाए गए सभी मकान रूप-रंग में समान थे और चारों ओर दर्जनों बेहतरीन पार्कों के अलावा ग्रीन बेल्ट के तौर पर काफी हिस्सा छोड़ा गया था।
करीब 750 मकानों वाली इस कॉलोनी में आज की स्थिति यह है कि 25 प्रतिशत मकान ही अपने मूल स्वरूप में बचे हैं। 75 प्रतिशत मकानों का पूरा नक्शा ही बदल दिया गया है। कुछ मकान तो पूरी तरह ध्वस्त करके दोबारा खड़े किए जा चुके हैं, और यह सिलसिला लगातार जारी है। लेकिन न कोई रोकने वाला है और न टोकने वाला। नक्शा पास कराए बिना अधिकांश मकानों का निर्माण दो और तीन मंजिल तक जा पहुंचा है क्योंकि सबकी मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण यानी MVDA से 'सेटिंग' हो जाती है।
योगी सरकार की भ्रष्टाचार को लेकर जीरो टॉलरेंस की नीति का श्री राधापुरम एस्टेट में किस कदर मजाक उड़ाया जा रहा है, इसका अंदाज बड़े पैमाने पर हुए अवैध निर्माण तथा ग्रीन बेल्ट के बड़े हिस्से पर कब्जे से लगाया जा सकता है। कुछ मकान मालिकों की मनमानी का आलम तो यह है कि उन्होंने बेखौफ होकर ग्रीन बेल्ट में अपने दरवाजे निकाल लिए हैं। किसी ने पूरा प्लेटफॉर्म बना लिया है, तो किसी ने टिन शेड डालकर कब्जा कर लिया है। ये लोग उसे पूरी तरह अपने मकान का हिस्सा मानकर उस पर काबिज हो चुके हैं।
हालांकि कॉलोनी का संचालन करने वाली सोसायटी के नवनिर्वाचित पदाधिकारियों ने पहली बार ऐसे कुछ तत्वों को नोटिस देकर उनसे जवाब-तलब किया है, किंतु लगता नहीं कि उसका कोई बड़ा असर होगा। उसकी वजह यह बताई जाती है कि अवैध निर्माण करने वाले तथा ग्रीन बेल्ट कब्जाने वालों में वो सफेदपोश माफिया भी शामिल हैं, जिनका जिक्र ऊपर किया जा चुका है।
रही-सही कसर तब पूरी हो जाती है जब शिकायत किए जाने पर MVDA नोटिस-नोटिस खेलकर ''बड़ा खेल'' कर देता है और शिकायत की आड़ में सुविधा शुल्कर बढ़ाकर आंखें मूंद कर बैठ जाता है। दरअसल, करोड़ों की जमीन पर काबिज होने की कीमत का लाखों में सौदा करके रिश्वत लेने वाले और देने वाले, दोनों ही खुश रहते हैं।
पूर्व में कॉलोनी का संचालन कर रहे पदाधिकारियों ने इस ओर कभी ध्यान तक देना जरूरी नहीं समझा। फिर चाहे कोई मकान का नक्शा बदल ले, बहुमंजिला निर्माण करा ले, पार्कों पर कब्जा कर ले या उन्हें बर्बाद कर दे, सोसायटी के पदाधिकारियों का इससे कोई लेना-देना नहीं था।
यही कारण रहा कि शहर की सर्वाधिक पॉश कॉलोनियों में शुमार 'श्री राधापुरम एस्टेट' के अधिकांश निवासी अवैध कब्जे को अपना अधिकार समझ बैठे। जिसका नतीजा आज सामने है।
ये बात अलग है कि उनकी इस मनमानी का पूरा लाभ विकास प्राधिकरण लगातार उठा रहा है। नवधनाढ्यों की यह कॉलोनी आज MVDA के अधिकारी एवं कर्मचारियों के लिए मोटी रिश्वत का माध्यम बन चुकी है।
बात चाहे मकान का नक्शा बदलने की हो या फिर उसे रीसेल करने की। हर हाल में विकास प्राधिकरण के अधिकारियों की बन आती है। वो मौका मुआयना करने के बाद खुद ही बता देते हैं कि गैर कानूनी कार्य को किस तरह 'कानूनी जामा' पहनाना है और उसकी कीमत कितनी होगी।
इस पूरी प्रक्रिया में सरकार को लगने वाले चूने का 'लेखा-जोखा' आंक कर सौदेबाजी की जाती है ताकि दोनों पक्ष अपने-अपने हिसाब से खुद को विजेता समझ सकें।
योगी सरकार की भ्रष्टाचार को लेकर अपनाई गई 'जीरो टॉलरेंस' नीति को भुनाने में अपनाई जा रही यह ट्रिक सिर्फ एक कॉलोनी तक सीमित नहीं है। ब्रज की दूसरी दर्जनों कॉलोनियों में भी इसी ट्रिक से अवैध निर्माण कराया जा रहा है और इससे मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के अधिकारी तथा कर्मचारी अपनी तिजोरियां भर रहे हैं। यदि योगी सरकार अब भी इस तरफ ध्यान दे तो एक ओर जहां अच्छी-खासी वेल डेवलप कॉलोनियां बदसूरत होने से बच सकती हैं वहीं दूसरी ओर वैध व व्यवस्थित तरीके से निर्माण कराकर सरकारी खजाना भी भरा जा सकता है। अन्यथा भ्रष्टाचार रोकने के लिए बनी 'जीरो टॉलरेंस' नीति इसी तरह सरकारी अधिकारी और कर्मचारियों के लिए वरदान साबित होती रहेगी, साथ ही विकास की बजाय विनाश का कारण भी बनेगी।
-Legend News
बुधवार, 17 दिसंबर 2025
कई गंभीर सवाल खड़े करता है मथुरा में सैकड़ों वकीलों के चैंबर पर चला प्रशासन का बुलडोजर
कानून-व्यवस्था की सबसे ताकतवर रूप में स्थापित एक इकाई अधिवक्ता ही यदि कानून-व्यवस्था के रखवालों से पीड़ित दिखाई दे तो इससे कई गंभीर सवाल खड़े हो जाना लाजिमी है, क्योंकि सामान्य तौर पर किसी काले कोट वाले के खिलाफ कोई कदम उठाने से पहले पुलिस अथवा प्रशासनिक अधिकारी 36 बार सोचते हैं। और यदि मामला पूरे अधिवक्ता समाज से जुड़ा हो, तो पुलिस प्रशासन के लिए सिरदर्द से कम नहीं होता। बीते शनिवार-रविवार की रात कलक्ट्रेट परिसर मथुरा में एसपी सिटी कार्यालय के पीछे जिला प्रशासन ने वकीलों के करीब 200 चैंबर बुलडोजर से ध्वस्त कर दिए। वकीलों को इसकी जानकारी रविवार सुबह हुई। उम्मीद के मुताबिक वकीलों ने प्रशासन पर एक ओर जहां बिना किसी पूर्व सूचना अथवा नोटिस के ध्वस्तीकरण की कार्रवाई किए जाने का आरोप लगाया वहीं दूसरी ओर आज यानी सोमवार से बार एसोसिएशन ने बेमियादी हड़ताल का भी एलान कर दिया। बार एसोसिएशन मथुरा अब इस लड़ाई को कहां तक लेकर जाएगी और उसके द्वारा घोषित बेमियादी हड़ताल कितने दिन चलेगी, ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा। अलबत्ता इस पूरे प्रकरण पर गौर करें तो कुछ महत्वपूर्ण सवाल स्वत: खड़े हो जाते हैं। ये वो सवाल हैं जिन पर इस सम्मानजनक पेशे से जुड़े लोगों को न केवल गंभीरता पूर्वक विचार करना होगा बल्कि सच कहें तो अपने गिरेबान में भी झांकना होगा।
यहां सबसे पहला सवाल तो यही खड़ा होता है कि क्या कोई प्रशासनिक अधिकारी जिलाधिकारी के संज्ञान में लाए बिना वकीलों के सैकड़ों चैंबर पर रातों-रात बुलडोजर चलाने की हिमाकत कर सकता है?
हालांकि दैनिक जागरण में छपी खबर के मुताबिक जिलाधिकारी कहते हैं कि उन्हें वकीलों के चैंबर ध्वस्त किए जाने की कोई जानकारी नहीं है क्योंकि वह जिला मुख्यालय से बाहर गए हुए हैं।
जिलाधिकारी की बात सही है तो ये जांच का विषय हो सकता है, किंतु दूसरा बड़ा सवाल तब खड़ा होता है जब वकीलों का ही एक वर्ग यह कहता है कि कहीं भी और कभी भी चैंबर बना लेना किसी भी नजरिए से उचित नहीं है।
लीजेंड न्यूज़ ने जब इस पूरे प्रकरण की सच्चाई जानने का प्रयास किया तो बहुत चौंकाने वाली बातें सामने आईं।
दरअसल, बहुत से वकीलों ने स्वीकार किया कि बिना डीएम की जानकारी के यह संभव ही नहीं है कि उनका कोई अधीनस्थ अधिकारी इतना बड़ा कदम उठा सके।
वो तो यहां तक कहते हैं कि रातों-रात वकीलों के चैंबर ध्वस्त कराने में वकीलों के ही उस प्रभावशाली गुट का हाथ है जिसके निजी हित जिला प्रशासन से पूरे होते हैं।
समाज में वकालत के पेशे की साख बनाकर रखने वाले अधिकांश वकील मानते हैं कि अब बहुत से ऐसे तत्व इस पेशे से जुड़ गए हैं जिनके लिए काला कोट और बार एसोसिएशन की सदस्यता सिर्फ एक आड़ का काम करती है। उनका मूल व्यवसाय विवादित जमीनों की खरीद-फरोख्त करना और फिर उसके लिए कानून के चोगे का दुरुपयोग करना है।
चूंकि इन तत्वों के लिए खुद को शो-ऑफ करना बेहद जरूरी होता है इसलिए वो महंगी-महंगी गाड़ियों में बिना किसी जरूरी काम के भी कलक्ट्रेट आते हैं और चैंबर पर इस तरह बैठते हैं जैसे वह बड़े प्रैक्टिशनर वकील हों और हर रोज अदालत में उनकी मौजूदगी अहमियत रखती हो।
बताया जाता है कि मथुरा में अब ऐसे तत्वों की तादाद इतनी ज्यादा हो गई है कि इनका गुट नामचीन प्रैक्टिशनर वकीलों पर भी हावी है और वो इनके सामने पड़ने से भी कतराते हैं। जाहिर है कि ऐसे में हर निर्णय इन तत्वों के प्रभाव में जाता है, जबकि तमाम वकील इनसे इत्तेफाक नहीं रखते।
नामचीन प्रैक्टिशनर वकीलों की मानें तो सैकड़ों चैंबर ध्वस्त कराने और फिर उनके विरोध में खड़े दिखाई देने के पीछे एक कारण जनवरी में प्रस्तावित बार एसोसिएशन मथुरा के चुनाव भी हैं। इन चुनावों में अब आम चुनावों की तरह जाति तथा धर्म का प्रभाव इस कदर हावी हो चुका है कि वकीलों का हित चाहने वालों का चुनकर आना लगभग समाप्त हो गया है।
कहा जा रहा है कि ये सारा खेल प्रशासन को बरगलाकर निजी हित साधने तथा चुनावी दांव-पेंच के लिए खेला गया है ताकि गुटबाजी को और हवा दी जा सके, उसे और सुर्ख किया जा सके।
बहरहाल, यदि यही हाल रहा तो इसका खामियाजा समूचे अधिवक्ता समाज को भुगतना होगा। साथ ही एक सम्मानजनक पेशे की साख भी दिन-प्रतिदिन प्रभावित होगी।
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि यह घटनाक्रम बार एसोसिएशन मथुरा के साथ-साथ प्रैक्टिशनर वकीलों के लिए भी किसी परीक्षा की घड़ी से कम नहीं है। देखना यह होगा कि इस परीक्षा से वो कैसे निपटते हैं और क्या इससे कोई सबक लेकर बड़ी लकीर खींचने का काम करते हैं।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
रविवार, 5 अक्टूबर 2025
वो सरकारी विभाग, जहां दम तोड़ देती है योगी बाबा की भ्रष्टाचार को लेकर बनी जीरो टॉलरेंस नीति
दैनिक जागरण के आगरा एडिशन की संपादकीय में 2 अक्टूबर गांधी जयंती को 'यह कैसी कार्यशैली' शीर्षक से एक महिला का दर्द लिखा है। दरअसल, इस महिला ने लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) से नीलामी में सवा करोड़ रुपए मूल्य का एक भूखंड खरीदकर वहां अपना घर बनवाया। प्राधिकरण से ही नीलाम भूखंड पर बने इस घर को हाल ही में लखनऊ विकास प्राधिकरण ने ध्वस्त कर दिया। शिकायत के बाद जांच होने पर एलडीए ने माना कि लेआउट परिवर्तन के दौरान गलती से यह भूखंड 'मिसिंग' में दर्ज हो गया, जिसके कारण मकान के ध्वस्तीकरण की कार्रवाई हुई। नीलामी में सवा करोड़ का प्लॉट खरीदने के बाद महिला ने उस पर मकान कितनी मुश्किलों से और और कैसे-कैसे पैसे का इंतजाम करके बनवाया होगा, इसका अंदाज कोई भी लगा सकता है। लेकिन भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे सरकारी संरक्षण प्राप्त विकास प्राधिकरण के अधिकारी अब उस महिला को 'फ्लैट' ऑफर कर रहे हैं। जरा सोचिए कि यह हाल तो प्रदेश की राजधानी के उस विकास प्राधिकरण का है जहां स्वयं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपने पूरे मंत्रिमंडल और सभी बड़े अफसरों के साथ बैठते हैं।
यह भी सोचिए कि जब लखनऊ विकास प्राधिकरण का यह आलम है तो प्रदेश के उन शहरों की डेवलपमेंट अथॉर्टीज का क्या हाल होगा, जहां से लखनऊ तक आवाज पहुंचाना भी आसान काम नहीं है।
सीएम योगी अपने पहले कार्यकाल से यह कहते चले आ रहे हैं कि भ्रष्टाचार पर उनकी सरकार कोई कंप्रोमाइज नहीं करेगी और इसे लेकर उनकी नीति हमेशा जीरो टॉलरेंस की रहेगी।
ऐसे में इस तरह के सवाल उठना स्वाभाविक है कि योगी सरकार की इतनी सख्ती और स्वयं योगी आदित्यनाथ की बेदाग छवि के बावजूद विकास प्राधिकरण के भ्रष्ट अधिकारियों एवं कर्मचारियों की पूंछ सीधी क्यों नहीं होती?
क्यों प्रदेशभर के विकास प्राधिकरण भ्रष्टाचार का पर्याय बने हुए हैं और क्यों उनके मन में योगी सरकार अथवा योगी आदित्यनाथ का कोई खौफ नहीं है?
इन प्रश्नों का एक ही उत्तर है कि योगी सरकार ने जिस तरह का अभियान कानून-व्यवस्था पर फोकस करके सामाजिक अपराधियों के खिलाफ चलाया, वैसा कोई अभियान भ्रष्टाचारियों के खिलाफ आज तक कभी नहीं चलाया गया। कभी-कभार किसी अधिकारी पर कोई कार्रवाई हुई भी है तो वह भ्रष्टाचारियों के मन में भय व्याप्त करने के लिए अपर्याप्त रही। और अगर बात करें विशेष तौर पर प्रदेश के सर्वाधिक भ्रष्ट विभाग विकास प्राधिकरण की तो उसका कोई अधिकारी शायद ही कभी कार्रवाई के भी दायरे में आया हो। यही कारण है कि विकास प्राधिकरण के आगे शहरों के नाम भले ही बदल जाते हैं परंतु उसकी भ्रष्ट कार्यशैली कहीं नहीं बदलती। वह हर जगह एक जैसी पायी जाती है।
मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण, अंधेर नगरी-चौपट राजा
देश ही नहीं, दुनिया में अपनी विशिष्ट धार्मिक पहचान रखने वाली योगीराज भगवान श्रीकृष्ण की पावन जन्मस्थली और क्रीड़ास्थली मथुरा-वृंदावन के विकास प्राधिकरण का हाल जानकर तो ऐसा लगता है जैसे यहां अंधेर नगरी-चौपट राजा की कहावत चरितार्थ हो रही हो।
मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण को यदि भ्रष्ट अधिकारियों का पसंदीदा स्थान कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
वृंदावन का डालमिया बाग घोटाला है सबसे बड़ा उदाहरण
पिछले साल इन्हीं दिनों वृंदावन स्थित डालमिया बाग पर गुरुकृपा तपोवन के नाम से एक कॉलानी डेवलप करने के लिए मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण में नक्शा मूव किया गया, लेकिन अप्रूवल से पहले ही भूमाफिया ने जमकर उसका फर्जी प्रचार किया और प्लॉट बुक करने शुरू कर दिए। माफिया ने इस नक्शे के आवेदन की आड़ में अनुमानत: एक हजार करोड़ रुपया एकत्र कर लिया परंतु विकास प्राधिकरण तमाशा देखता रहा।
चूंकि भूमाफिया ने कॉलोनी डेवलेव करने की जल्दी में डालमिया बाग के साढ़े चार सौ से अधिक हरे वृक्ष रातों-रात काट डाले इसलिए यह मामला पहले एनजीटी और फिर सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंचा।
मामला देश की सर्वोच्च अदालत की चौखट पर पहुंचा तो सरकार के कानों पर भी जूं रेंगनी प्रारंभ हुई, नतीजतन तत्कालीन कमिश्नर आगरा मंडल ऋतु माहेश्वरी ने भी मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण (एमवीडीए) की भूमिका का पता लगाने के लिए एक कमेटी का गठन कर जांच रिपोर्ट पेश करने को कहा।
बहरहाल, चोर-चोर मौसेरे भाई की कहावत फिर सच साबित हुई और मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के किसी अधिकारी का कुछ नहीं बिगड़ा। ये बात अलग है कि सुप्रीम कोर्ट के सख्त फैसले ने एक ओर जहां भूमाफिया की पूरी प्लानिंग चौपट कर दी वहीं विकास प्राधिकरण (एमवीडीए) के अधिकारियों की हसरतों पर पानी फेर दिया क्योंकि इस प्रोजेक्ट के डेवलपर, एमवीडीए के अधिकारियों की दुधारू गाय साबित हो रहे थे। यदि सब-कुछ वैसे ही चलता रहता जैसे एमवीडीए के अधिकारी और भूमाफिया चाह रहे थे तो भूमाफिया जहां अरबों कमाते वहीं कई अधिकारी करोड़ों कमा ले गए होते।
जो भी हो, मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के लिए न तो गुरुकृपा तपोवन कोई पहला प्रोजेक्ट था और न अंतिम। दुनिया के आकर्षण का केंद्र मथुरा नगरी में जाने कितने डेवलपर हर रोज विकास प्राधिकरण के चक्कर काटने को मजबूर हैं। कोई अवैध निर्माण के लिए चक्कर काट रहा है तो कोई वैध काम कराने के लिए क्योंकि काम कैसा भी हो, विकास प्राधिकरण की चौखट चूमे बिना कुछ भी संभव नहीं हो सकता।
बड़े-बड़े करोड़पति और अरबपति दो के चार और सात के सोलह इनकी कृपा के बिना नहीं कर सकते। इनकी नजर बनी रहे तो शहर के बीचों-बीच अवैध बहुमंजिला इमारत खड़ी की जा सकती है और ये यदि नजर फेर लें तो वैध इमारत को भी मिट्टी में मिला सकते हैं।
लखनऊ की उस महिला का वैध मकान इसका सबसे बड़ा सबूत है। जमीन चाहे प्राधिकरण से ही क्यों न खरीदी हो, प्राधिकरण के अधिकारियों को चढ़ावा चढ़ाए बिना लेआउट आसानी से परिवर्तन हो सकता है और भूखंड ''मिसिंग'' शो करके मकान पर बुलडोजर भी चल सकता है।
रही बात योगी बाबा के जीरो टॉलरेंस की तो उसकी जद में अब तक विकास प्राधिकरण आता दिखाई नहीं देता। क्या प्रदेश की राजधानी लखनऊ और क्या कृष्ण की जन्मभूमि मथुरा, सबका हाल समान है। नक्कारखाने में तूती की आवाज वैसे भी सुनाई कहां देती है।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी


