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सोमवार, 18 मई 2026
बांके बिहारी के लाइव-स्ट्रीमिंग कॉन्ट्रैक्ट विवाद में सुप्रीम कोर्ट से नोटिस जारी, कमेटी से जवाब तलब
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को (आज) W.P.(C) No. 1228/2025 ठाकुर श्री बांके बिहारी जी महाराज मंदिर प्रबंध समिति बनाम श्री बांके बिहारी जी मंदिर हाई पॉवर्ड प्रबंधन समिति एवं अन्य के मामले में दाखिल IA No. 6809/2026 अर्थात हस्तक्षेप/पक्षकार बनाए जाने के आवेदन पर नोटिस जारी किया है। यह मामला 18 मई 2026 को चीफ जस्टिस की कोर्ट के समक्ष आइटम नंबर 48.1 के रूप में सूचीबद्ध था।यह विवाद वृंदावन स्थित ठाकुर श्री बांके बिहारी जी महाराज मंदिर की लाइव-स्ट्रीमिंग का कॉन्ट्रैक्ट कथित रूप से सुयोग्य मीडिया को अपारदर्शी और अनियमित तरीके से दिए जाने से संबंधित है।
आवेदक अनिल गुप्ता की ओर से उपस्थित अधिवक्ता नरेंद्र कुमार गोस्वामी ने चीफ जस्टिस सूर्यकान्त की अध्यक्षता वाली बेंच के समक्ष प्रस्तुत किया कि कोर्ट-निगरानी में कार्यरत हाई पावर्ड मैनेजमेंट कमेटी द्वारा यह कॉन्ट्रैक्ट कथित रूप से “बैकडोर और पैराशूट एंट्री” के माध्यम से ऐसी संस्था को दिया गया, जिसने न तो कॉन्ट्रैक्ट के लिए आवेदन किया था और न ही पूर्व प्रक्रिया या बैठकों में भाग लिया था।
अधिवक्ता गोस्वामी ने आगे कहा कि आवेदक की आपत्तियों, शिकायतों और आरटीआई आवेदनों का कोई उत्तर नहीं दिया गया जिससे कोर्ट-निगरानी वाली कमेटी की पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं। उन्होंने तर्क दिया कि यह मामला मात्र टेंडर अनियमितता का नहीं, बल्कि न्यायालय-निगरानी में कार्यरत संस्था की संस्थागत पवित्रता और विश्वसनीयता से जुड़ा है।
एक महत्वपूर्ण दलील में अधिवक्ता गोस्वामी ने कहा कि जिस प्रकार से कॉन्ट्रैक्ट प्रदान किया गया, वह कथित रूप से न्यायालय की अपनी प्रक्रिया के साथ धोखाधड़ी के समान है।
आरोपों को गंभीर मानते हुए चीफ जस्टिस सूर्यकान्त ने टिप्पणी की कि “ये आरोप अत्यंत गंभीर प्रकृति के हैं” और राज्य पक्ष की ओर से उपस्थित learned AAG/ASG से इन आरोपों पर जवाब देने को कहा।
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी करते हुए संबंधित प्रतिवादियों/कमेटी से जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। बेंच ने IA No. 6809/2026 पर एक सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने को कहा।
मामले की अगली सुनवाई अगले सप्ताह होने की संभावना है, जहाँ सुप्रीम कोर्ट लाइव-स्ट्रीमिंग कॉन्ट्रैक्ट से जुड़े आरोपों पर स्पष्ट हलफनामे के माध्यम से स्पष्टीकरण प्राप्त करेगा।
ज्ञात रहे कि यह विवाद अब केवल एक साधारण कॉन्ट्रैक्ट विवाद नहीं रह गया है। सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मूल प्रश्न यह है कि क्या न्यायिक निगरानी में गठित कोई संस्था मंदिर से जुड़े कॉन्ट्रैक्ट को बिना पारदर्शी प्रक्रिया तथा आपत्तियों पर विचार किए बिना और सार्वजनिक जवाबदेही के बगैर इस तरह किसीको भी कॉन्ट्रैक्ट दे सकती है।
रविवार, 27 जुलाई 2025
सावधान! डालमिया बाग पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आने के बावजूद साजिश रच रहे हैं भूमाफिया
वृंदावन के डालिमया बाग का सिर्फ एमओयू साइन करके हजारों करोड़ रुपए हड़प चुके भूमाफिया अब एक तीर से कई निशाने साधने की कोशिश में लगे हैं। इसके लिए वह नित नई साजिशें रच रहे हैं, और इन साजिशों के तहत इस तरह की अफवाहें फैला रहे हैं जिससे एक ओर इनके जाल में फंसे बैठे लोगों की उम्मीद न टूटे और दूसरी ओर नए निवेशकों को टोपी पहनाई जा सके। गौरतलब है कि योगीराज श्रीकृष्ण की क्रीड़ास्थली के बेशकीमती इलाके छटीकरा रोड पर स्थित डालमिया बाग से भूमाफिया द्वारा रातों-रात 454 हरे दरख्त काटे जाने का मामला जब नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के बाद सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचा तो सुप्रीम कोर्ट ने इस पर बेहद सख्त रुख अपनाते हुए आरोपियों पर न केवल भारी जुर्माना लगाया बल्कि किसी भी किस्म के निर्माण पर रोक के साथ-साथ पर्यावरण की भरपाई के लिए हजारों नए पेड़ लगाने का भी आदेश दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में 9 बिंदुओं के जरिए यह स्पष्ट किया...
1. 454 पेड़ों की प्रतिपूर्ति उसी भूमि पर वृक्षारोपण करके की जाएगी।
2. 9080 वृक्षों का रोपण आसपास के उपयुक्त स्थलों पर किया जाएगा, जिनमें 4540 पौधे मूल वृक्षों के स्थान पर प्रतिपूरक वृक्षारोपण के रूप में तथा 4540 पौधे दंड स्वरूप लगाए जाएंगे।
3. प्रत्येक वृक्ष हेतु ₹1,00,000/- के हिसाब से ₹4,54,00,000/- (4 करोड़ 54 लाख रुपये मात्र) का न्यूनतम दंड भूमि स्वामी पर अधिरोपित किया गया है, जिसे वन विभाग के माध्यम से वृक्षारोपण में व्यय किया जाएगा।
4. उ. प्र. वृक्ष संरक्षण अधिनियम 1976 तथा भारतीय वन अधिनियम 1927 के प्रावधानों के तहत अवैध वृक्ष कटान हेतु दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।
5. संरक्षित वन क्षेत्र में बिना पूर्व अनुमति मार्ग निर्माण हेतु वन संरक्षण अधिनियम 1980 के अंतर्गत अभियोजन चलेगा।
6. वन विभाग द्वारा समस्त अवैध लकड़ी की जब्ती एवं निस्तारण का कार्य किया जाएगा।
7. TTZ प्राधिकरण द्वारा न्यायालय के समस्त आदेशों के अनुपालन की त्रैमासिक रिपोर्ट पेश की जाएगी।
8. निर्माण पर प्रतिबंध रहेगा
9. अवमानना के लिए पृथक दंड पर भी विचार किया जाएगा।
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9080 पेड़ भी उसी जगह लगाये जाएँगे और वन विभाग के एक्सपर्ट अधिकारियों के अनुसार 9080 पेड़ों को लगाने के लिए लगभग 36 बीघा ज़मीन चाहिए जो 454 पेड़ों के आसपास ही हो। यानी इसी डालमिया बाग में ये पेड़ लगाए जाने हैं।
अगर CEC मैनेज होती है तो वृंदावन के लोग इसमें CONTEMPT फाइल करेंगे। जजमेंट को तोड़ मरोड़ कर पेश करना ख़ुद एक ऑफेंस है।
टिम्बर कलेक्शन वन निगम एटा द्वारा किया जा रहा है जहाँ उनकी नीलामी होगी,
ये बिल्डर द्वारा नहीं किया जा रहा।
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फिर NGT ने भी सुप्रीम कोर्ट के आदेश की रोशनी में अपने यहां लंबित याचिकाओं का निस्तारण करते हुए कहा, चूंकि डालिमया बाग से सैकड़ों हरे पेड़ काटे जाने पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेश याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत सभी बिंदु कवर करता है इसलिए अब NGT के समक्ष इस विषय में कोई स्वतंत्र विवाद शेष नहीं रह जाता।
NGT ने अपने आदेश में स्वयं सुप्रीम कोर्ट के आदेश (रिपोर्ट संख्या 35/2024 के अनुच्छेद 14) को शब्दशः उद्धृत करते हुए कहा कि हम रिपोर्ट संख्या 35/2024 के अनुच्छेद 14 में दी गई सिफारिशों को स्वीकार करते हैं।
सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार सुप्रीम कोर्ट से सख्त निर्णय आने के बाद अब जबकि डालिमया बाग पर हाउसिंग प्रोजेक्ट खड़ा करने का सपना कभी पूरा होता दिखाई नहीं दे रहा और उसके नाम पर हड़पी गई हजारों करोड़ रुपए की रकम भी खुर्द-बुर्द होती नजर आ रही है तो निवेशकों को गुमराह करने के लिए माफिया तरह-तरह के हथकंडे अपना रहा है।
NGT ने अपने आदेश में स्वयं सुप्रीम कोर्ट के आदेश (रिपोर्ट संख्या 35/2024 के अनुच्छेद 14) को शब्दशः उद्धृत करते हुए कहा कि हम रिपोर्ट संख्या 35/2024 के अनुच्छेद 14 में दी गई सिफारिशों को स्वीकार करते हैं।
सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार सुप्रीम कोर्ट से सख्त निर्णय आने के बाद अब जबकि डालिमया बाग पर हाउसिंग प्रोजेक्ट खड़ा करने का सपना कभी पूरा होता दिखाई नहीं दे रहा और उसके नाम पर हड़पी गई हजारों करोड़ रुपए की रकम भी खुर्द-बुर्द होती नजर आ रही है तो निवेशकों को गुमराह करने के लिए माफिया तरह-तरह के हथकंडे अपना रहा है।
नई जानकारी के अनुसार माफिया के गुर्गे न केवल इस तरह की अफवाह फैला रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट से वह जल्द बड़ी राहत पा लेंगे इसलिए हाउसिंग प्रोजेक्ट का काम भी शीघ्र शुरू हो जाएगा, बल्कि वह नए निवेशकों को भी लालच दे रहे हैं कि वह पुराने रेट में सौदा करने का सुनहरा मौका न चूकें।
दरअसल, इससे माफिया दोतरफा लाभ हासिल करने के प्रयास में है। प्रथम तो जिनका पैसा उसने हड़प रखा है वो पैसे के वापसी के लिए दबाव न बनाएं, और दूसरे नए निवेशकों को टोपी पहनाने में सफल होने पर बाजार में अपनी बर्बाद हो चुकी साख बचाने का काम हो जाए।
दरअसल, इससे माफिया दोतरफा लाभ हासिल करने के प्रयास में है। प्रथम तो जिनका पैसा उसने हड़प रखा है वो पैसे के वापसी के लिए दबाव न बनाएं, और दूसरे नए निवेशकों को टोपी पहनाने में सफल होने पर बाजार में अपनी बर्बाद हो चुकी साख बचाने का काम हो जाए।
माफिया के गुर्गों ने इसके लिए बाकायदा यह प्रचारित करना प्रारंभ कर दिया है कि गुरू कृपा हाउसिंग प्रोजेक्ट पर जल्द काम शुरू होने वाला है क्योंकि अधिकांश कानूनी बाध्यताओं को पूरा किया जा चुका है।
माफिया द्वारा फैलाई जा रही अफवाहों का आलम यह है कि उसके गुर्गे अपनी आंखों से काम शुरू होते देखकर आने का दावा करते हैं जिससे शक की कोई गुंजाइश न रहे जबकि हकीकत इसके ठीक उलट है।
हकीकत तो यह है कि डालमिया बाग में अब भी दूर-दूर तक दरख्तों के अवशेष पड़े देखे जा सकते हैं। वन विभाग का बोर्ड यथावत लगा है और उसके पीछे सन्नाटा पसरा है।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
रविवार, 21 जुलाई 2019
न्यायमूर्ति रंगनाथ पांडेय ने हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में व्याप्त परिवारवाद, वंशवाद एवं जातिवाद पर उठाए गंभीर सवाल, पीएम को लिखा 3 पन्नों का पत्र
उच्च न्यायालय इलाहाबाद की लखनऊ खंडपीठ के न्यायमूर्ति रंगनाथ पांडेय ने प्रधानमंत्री को बाकायदा पत्र लिखकर उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में व्याप्त विसंगतियों तथा कॉलेजियम समिति की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
कल 01 जुलाई 2019 को ही प्रेषित अपने पत्र में न्यायमूर्ति रंगनाथ पांडेय ने उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय को भी राजनीति की ही भांति जातिवाद एवं वंशवाद से बुरी तरह ग्रसित बताते हुए लिखा है कि यहां न्यायाधीशों के परिवार का सदस्य होना ही अगला न्यायाधीश होना सुनिश्चित करता है।
न्यायमूर्ति रंगनाथ पांडेय ने प्रधानमंत्री को लिखा है कि प्रत्येक प्रशासनिक अधिकारी को सेवा में आने के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की कसौटी पर खरा उतरना होता है और अधीनस्थ न्यायालयों के न्यायाधीशों को भी अपने चयन से पहले प्रतियोगी परीक्षाओं में योग्यता सिद्ध करनी होती है किंतु उच्च न्यायालयों एवं सर्वोच्च न्यायालय में नियुक्ति के लिए कोई निश्चित मापदंड नहीं है। यहां नियुक्ति पाने की एकमात्र प्रचलित कसौटी है परिवारवाद तथा जातिवाद।
न्यायमूर्ति रंगनाथ पांडेय ने अपने पत्र से प्रधानमंत्री को अवगत कराया है कि उन्होंने 34 वर्षों के सेवाकाल में कई ऐसे न्यायाधीश देखें हैं जिनके पास सामान्य विधिक ज्ञान का भी अभाव था और उनका अपने क्षेत्र में कोई अध्ययन तक नहीं था।
जस्टिस रंगनाथ पांडेय ने पीएम को लिखा है कि जिन्हें न्यायप्रक्रिया की सामान्य सी जानकारी भी नहीं होती परंतु वो यदि कॉलेजियम समिति के ‘निकट’ होते हैं तो उन्हें उनकी ‘मात्र इसी योग्यता’ के आधार पर न्यायाधीश नियुक्त करा दिया जाता है।
जस्टिस रंगनाथ ने पत्र में गंभीर सवाल उठाते हुए कहा है कि न्यायाधीश की कुर्सी पर अयोग्य लोगों के रहते कार्य का निष्पादन निष्पक्ष तरीके से कैसे होता होगा, यह स्वयं में विचारणीय है।
न्यायमूर्ति रंगनाथ पांडेय ने देश को हिला देने वाली जानकारी देते हुए प्रधानमंत्री को लिखा है कि उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की चयन प्रक्रिया बंद कमरों में चाय की दावत पर वरिष्ठ न्यायाधीशों की पैरवी तथा पसंद के आधार पर की जाती है, न कि किसी योग्यता के आधार पर। यहां गोपनीयता की आड़ में पारदर्शिता को ताक पर रख दिया जाता है और नियुक्ति प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही नाम सार्वजनिक किए जाते हैं।
न्यायमूर्ति रंगनाथ पांडेय ने लिखा है कि न्यायिक चयन आयोग की स्थापना के प्रस्ताव से पूरे देश को न्यायपालिकाओं में पारदर्शिता के साथ नियुक्तियों की आशा जगी थी किंतु सर्वोच्च न्यायालय ने इसे अपने अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप बताकर असंवैधानिक घोषित कर दिया।
दरअसल, न्यायिक चयन आयोग की स्थापना से न्यायाधीशों को अपने पारिवारिक सदस्यों की नियुक्ति में बाधा आती और इसीलिए उन्होंने केंद्र सरकार के इस प्रस्ताव को खारिज करने में अति सक्रियता बरती।
जस्टिस रंगनाथ पांडेय ने पीएम को लिखा है कि चाहे सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों का विवाद मीडिया के सामने आने का प्रकरण हो अथवा हितों के टकराव का मुद्दा और सुनने के बजाय चुनने के अधिकार का विवाद, इस सबसे अंतत: न्यायपालिका की गुणवत्ता अथवा अक्षुण्णता लगातार संकट में पड़ रही है।
जस्टिस रंगनाथ पांडेय ने प्रधानमंत्री से अनुरोध किया है कि न्यायसंगत लेकिन कठोर निर्णय लेकर वह न्यायपालिका की गरिमा बचाने का प्रयास करें जिससे भविष्य में साधारण पृष्ठभूमि से आया हुआ कोई व्यक्ति भी अपनी योग्यता, परिश्रम एवं निष्ठा के बल पर भारत का चीफ जस्टिस बन सके।
न्यायमूर्ति रंगनाथ पांडेय द्वारा प्रधानमंत्री को लिखा गया यह पत्र यूं तो हर उस व्यक्ति की पीड़ा को प्रकट करता है जो सिस्टम के सामने किसी न किसी स्तर पर आकर हार जाता है परंतु इसके निहितार्थ बहुत गहरे हैं।
जस्टिस रंगनाथ पांडेय तो इसी 04 जुलाई को रिटायर होने जा रहे हैं परंतु उनके सवाल देश की चरमराती न्याय व्यवस्था का तब तक पीछा करेंगे जब तक योग्यता के आधार पर नियुक्तियों का मुकम्मल इंतजाम नहीं कर लिया जाता।
कौन नहीं जानता कि आज सर्वोच्च न्यायालय से लेकर उच्च न्यायालयों और जिला अदालतों में भी भ्रष्टाचार का बोलबाला है। न्यायपालिकाओं की चौखट पर न्याय की उम्मीद खत्म हो जाने के अनेक उदाहरण सामने आ रहे हैं।
शायद यही कारण है कि कोर्ट की अवमानना का भय समाप्त होता जा रहा है और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को भी अपनी बात रखने के लिए मीडिया का सहारा लेना पड़ रहा है।
न्यायपालिका तक पहुंचने से पहले मीडिया ट्रायल की परंपरा संभवत: न्याय से उठ चुकी उम्मीद का ही परिणाम है और मुख्य न्यायाधीश द्वारा न्यायपालिका में शीर्ष स्तर पर करप्शन को रोकने के लिए भ्रष्ट अधिकारियों को निकाल बाहर करने का पीएम से आग्रह करना इसी की परिणति।
मुख्य न्यायाधीश भी लिख चुके हैं प्रधानमंत्री को पत्र
गत दिनों चीफ जस्टिस रंजन गागेई ने भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पत्र लिखकर आग्रह किया था कि न्यायपालिका में शीर्ष स्तर पर करप्शन रोकने के लिए भ्रष्ट लोगों को निकाल बाहर करना जरूरी है।
CJI ने अपने पत्र में इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज एस. एन. शुक्ला को पद से हटाने के लिए संसद में प्रस्ताव लाने की मांग भी की है। जस्टिस शुक्ला को पद से हटाने के लिए 18 महीने पहले प्रस्ताव लाने की सिफारिश की गई थी। इन-हाउस पैनल ने अपनी जांच में जस्टिस शुक्ला को गंभीर न्यायिक अनियमितताओं का जिम्मेदार माना था।
CJI ने अपने खत में पीएम मोदी को लिखा, ‘आपसे आग्रह है कि इस मामले में आप आगे कार्यवाही करें।’
इससे पहले CJI ने शुक्ला की ओर से न्यायिक कार्यों के आवंटन की मांग को खारिज कर दिया था। पैनल की रिपोर्ट के बाद शुक्ला से 22 जनवरी 2018 को न्यायिक कार्य वापस ले लिया गया था।
CJI ने पीएम मोदी को पत्र में लिखा, ‘जस्टिस शुक्ला का एक पत्र मुझे 23 मई 2019 को मिला। यह पत्र इलाहाबाद हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस की ओर से फॉरवर्ड किया गया था। इस पत्र में शुक्ला ने खुद को न्यायिक कार्य करने देने की अनुमति मांगी थी।
CJI के अनुसार जस्टिस शुक्ला पर जो आरोप पाए गए हैं, वह गंभीर प्रकृति के हैं और इसलिए उन्हें न्यायिक कार्य की अनुमति नहीं दी जा सकती है। ऐसी परिस्थितियों में आप आगे की कार्यवाही के लिए फैसला लें।’
बता दें कि 2017 में यूपी के एडवोकेट जनरल राघवेंद्र सिंह ने जस्टिस शुक्ला पर अनियमितता के आरोप लगाए थे। इस पर तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने मद्रास हाई कोर्ट की तत्कालीन चीफ इंदिरा बनर्जी, सिक्किम के चीफ जस्टिस एस. के. अग्निहोत्री और मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के जस्टिस पी के जायसवाल के नेतृत्व में पैनल का गठन किया था। इस पैनल ने शुक्ला को एक मामले में मेडिकल कॉलेजों का कथित तौर पर पक्ष लेने के लिए जिम्मेदार माना था।
ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया तथा इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति भी प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर सिस्टम में गंभीर खामियां दूर करने का आग्रह कर रहे हैं और न्याय व्यवस्था में ऊपर से लेकर नीचे तक भ्रष्टाचार, वंशवाद, परिवारवाद एवं जातिवाद का जहर घुल जाने की बात कह रहे हैं तो न्याय मिलेगा कैसे, न्यायपालिकाओं में व्याप्त विसंगतियां दूर कैसे होंगी?
न्याय देने वालों को ही यदि न्याय की दरकार होगी तो जनसामान्य किससे और कैसे न्याय की उम्मीद रखेगा?
पहले तो चीफ जस्टिस का प्रधानमंत्री को पत्र लिखना और फिर अवकाश प्राप्त करने से मात्र 3 दिन पहले इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति का पूरे सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े करना यह बताने के लिए काफी है कि यदि समय रहते इन खामियों को दूर नहीं किया गया तो देश का संवैधानिक ढांचा न सिर्फ पूरी तरह चरमरा जाएगा बल्कि अराजकता की स्थिति उत्पन्न होने का खतरा भी बढ़ जाएगा।
-Legend News
कल 01 जुलाई 2019 को ही प्रेषित अपने पत्र में न्यायमूर्ति रंगनाथ पांडेय ने उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय को भी राजनीति की ही भांति जातिवाद एवं वंशवाद से बुरी तरह ग्रसित बताते हुए लिखा है कि यहां न्यायाधीशों के परिवार का सदस्य होना ही अगला न्यायाधीश होना सुनिश्चित करता है।
न्यायमूर्ति रंगनाथ पांडेय ने प्रधानमंत्री को लिखा है कि प्रत्येक प्रशासनिक अधिकारी को सेवा में आने के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की कसौटी पर खरा उतरना होता है और अधीनस्थ न्यायालयों के न्यायाधीशों को भी अपने चयन से पहले प्रतियोगी परीक्षाओं में योग्यता सिद्ध करनी होती है किंतु उच्च न्यायालयों एवं सर्वोच्च न्यायालय में नियुक्ति के लिए कोई निश्चित मापदंड नहीं है। यहां नियुक्ति पाने की एकमात्र प्रचलित कसौटी है परिवारवाद तथा जातिवाद।
न्यायमूर्ति रंगनाथ पांडेय ने अपने पत्र से प्रधानमंत्री को अवगत कराया है कि उन्होंने 34 वर्षों के सेवाकाल में कई ऐसे न्यायाधीश देखें हैं जिनके पास सामान्य विधिक ज्ञान का भी अभाव था और उनका अपने क्षेत्र में कोई अध्ययन तक नहीं था।
जस्टिस रंगनाथ पांडेय ने पीएम को लिखा है कि जिन्हें न्यायप्रक्रिया की सामान्य सी जानकारी भी नहीं होती परंतु वो यदि कॉलेजियम समिति के ‘निकट’ होते हैं तो उन्हें उनकी ‘मात्र इसी योग्यता’ के आधार पर न्यायाधीश नियुक्त करा दिया जाता है।
जस्टिस रंगनाथ ने पत्र में गंभीर सवाल उठाते हुए कहा है कि न्यायाधीश की कुर्सी पर अयोग्य लोगों के रहते कार्य का निष्पादन निष्पक्ष तरीके से कैसे होता होगा, यह स्वयं में विचारणीय है।
न्यायमूर्ति रंगनाथ पांडेय ने देश को हिला देने वाली जानकारी देते हुए प्रधानमंत्री को लिखा है कि उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की चयन प्रक्रिया बंद कमरों में चाय की दावत पर वरिष्ठ न्यायाधीशों की पैरवी तथा पसंद के आधार पर की जाती है, न कि किसी योग्यता के आधार पर। यहां गोपनीयता की आड़ में पारदर्शिता को ताक पर रख दिया जाता है और नियुक्ति प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही नाम सार्वजनिक किए जाते हैं।
न्यायमूर्ति रंगनाथ पांडेय ने लिखा है कि न्यायिक चयन आयोग की स्थापना के प्रस्ताव से पूरे देश को न्यायपालिकाओं में पारदर्शिता के साथ नियुक्तियों की आशा जगी थी किंतु सर्वोच्च न्यायालय ने इसे अपने अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप बताकर असंवैधानिक घोषित कर दिया।
दरअसल, न्यायिक चयन आयोग की स्थापना से न्यायाधीशों को अपने पारिवारिक सदस्यों की नियुक्ति में बाधा आती और इसीलिए उन्होंने केंद्र सरकार के इस प्रस्ताव को खारिज करने में अति सक्रियता बरती।
जस्टिस रंगनाथ पांडेय ने पीएम को लिखा है कि चाहे सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों का विवाद मीडिया के सामने आने का प्रकरण हो अथवा हितों के टकराव का मुद्दा और सुनने के बजाय चुनने के अधिकार का विवाद, इस सबसे अंतत: न्यायपालिका की गुणवत्ता अथवा अक्षुण्णता लगातार संकट में पड़ रही है।
जस्टिस रंगनाथ पांडेय ने प्रधानमंत्री से अनुरोध किया है कि न्यायसंगत लेकिन कठोर निर्णय लेकर वह न्यायपालिका की गरिमा बचाने का प्रयास करें जिससे भविष्य में साधारण पृष्ठभूमि से आया हुआ कोई व्यक्ति भी अपनी योग्यता, परिश्रम एवं निष्ठा के बल पर भारत का चीफ जस्टिस बन सके।
न्यायमूर्ति रंगनाथ पांडेय द्वारा प्रधानमंत्री को लिखा गया यह पत्र यूं तो हर उस व्यक्ति की पीड़ा को प्रकट करता है जो सिस्टम के सामने किसी न किसी स्तर पर आकर हार जाता है परंतु इसके निहितार्थ बहुत गहरे हैं।
जस्टिस रंगनाथ पांडेय तो इसी 04 जुलाई को रिटायर होने जा रहे हैं परंतु उनके सवाल देश की चरमराती न्याय व्यवस्था का तब तक पीछा करेंगे जब तक योग्यता के आधार पर नियुक्तियों का मुकम्मल इंतजाम नहीं कर लिया जाता।
कौन नहीं जानता कि आज सर्वोच्च न्यायालय से लेकर उच्च न्यायालयों और जिला अदालतों में भी भ्रष्टाचार का बोलबाला है। न्यायपालिकाओं की चौखट पर न्याय की उम्मीद खत्म हो जाने के अनेक उदाहरण सामने आ रहे हैं।
शायद यही कारण है कि कोर्ट की अवमानना का भय समाप्त होता जा रहा है और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को भी अपनी बात रखने के लिए मीडिया का सहारा लेना पड़ रहा है।
न्यायपालिका तक पहुंचने से पहले मीडिया ट्रायल की परंपरा संभवत: न्याय से उठ चुकी उम्मीद का ही परिणाम है और मुख्य न्यायाधीश द्वारा न्यायपालिका में शीर्ष स्तर पर करप्शन को रोकने के लिए भ्रष्ट अधिकारियों को निकाल बाहर करने का पीएम से आग्रह करना इसी की परिणति।
मुख्य न्यायाधीश भी लिख चुके हैं प्रधानमंत्री को पत्र
गत दिनों चीफ जस्टिस रंजन गागेई ने भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पत्र लिखकर आग्रह किया था कि न्यायपालिका में शीर्ष स्तर पर करप्शन रोकने के लिए भ्रष्ट लोगों को निकाल बाहर करना जरूरी है।
CJI ने अपने पत्र में इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज एस. एन. शुक्ला को पद से हटाने के लिए संसद में प्रस्ताव लाने की मांग भी की है। जस्टिस शुक्ला को पद से हटाने के लिए 18 महीने पहले प्रस्ताव लाने की सिफारिश की गई थी। इन-हाउस पैनल ने अपनी जांच में जस्टिस शुक्ला को गंभीर न्यायिक अनियमितताओं का जिम्मेदार माना था।
CJI ने अपने खत में पीएम मोदी को लिखा, ‘आपसे आग्रह है कि इस मामले में आप आगे कार्यवाही करें।’
इससे पहले CJI ने शुक्ला की ओर से न्यायिक कार्यों के आवंटन की मांग को खारिज कर दिया था। पैनल की रिपोर्ट के बाद शुक्ला से 22 जनवरी 2018 को न्यायिक कार्य वापस ले लिया गया था।
CJI ने पीएम मोदी को पत्र में लिखा, ‘जस्टिस शुक्ला का एक पत्र मुझे 23 मई 2019 को मिला। यह पत्र इलाहाबाद हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस की ओर से फॉरवर्ड किया गया था। इस पत्र में शुक्ला ने खुद को न्यायिक कार्य करने देने की अनुमति मांगी थी।
CJI के अनुसार जस्टिस शुक्ला पर जो आरोप पाए गए हैं, वह गंभीर प्रकृति के हैं और इसलिए उन्हें न्यायिक कार्य की अनुमति नहीं दी जा सकती है। ऐसी परिस्थितियों में आप आगे की कार्यवाही के लिए फैसला लें।’
बता दें कि 2017 में यूपी के एडवोकेट जनरल राघवेंद्र सिंह ने जस्टिस शुक्ला पर अनियमितता के आरोप लगाए थे। इस पर तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने मद्रास हाई कोर्ट की तत्कालीन चीफ इंदिरा बनर्जी, सिक्किम के चीफ जस्टिस एस. के. अग्निहोत्री और मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के जस्टिस पी के जायसवाल के नेतृत्व में पैनल का गठन किया था। इस पैनल ने शुक्ला को एक मामले में मेडिकल कॉलेजों का कथित तौर पर पक्ष लेने के लिए जिम्मेदार माना था।
ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया तथा इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति भी प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर सिस्टम में गंभीर खामियां दूर करने का आग्रह कर रहे हैं और न्याय व्यवस्था में ऊपर से लेकर नीचे तक भ्रष्टाचार, वंशवाद, परिवारवाद एवं जातिवाद का जहर घुल जाने की बात कह रहे हैं तो न्याय मिलेगा कैसे, न्यायपालिकाओं में व्याप्त विसंगतियां दूर कैसे होंगी?
न्याय देने वालों को ही यदि न्याय की दरकार होगी तो जनसामान्य किससे और कैसे न्याय की उम्मीद रखेगा?
पहले तो चीफ जस्टिस का प्रधानमंत्री को पत्र लिखना और फिर अवकाश प्राप्त करने से मात्र 3 दिन पहले इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति का पूरे सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े करना यह बताने के लिए काफी है कि यदि समय रहते इन खामियों को दूर नहीं किया गया तो देश का संवैधानिक ढांचा न सिर्फ पूरी तरह चरमरा जाएगा बल्कि अराजकता की स्थिति उत्पन्न होने का खतरा भी बढ़ जाएगा।
-Legend News
शुक्रवार, 25 नवंबर 2016
माय लॉर्ड, अंतहीन लाइनें तो अदालतों के बाहर भी लगी हैं
”HELLO सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया, अदालतों के सामने अंतहीन लाइनें लगी हुई
हैं। 2 करोड़ 70 लाख मामले लंबित हैं, और अब तक कहीं भी कोई दंगा नहीं हुआ
है।”
यह ट्वीट जाने-माने स्तंभकार तुफैल अहमद का है, जो उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की उस टिप्पणी को लेकर किया है जिसमें उसने कहा था कि नोटबंदी के बाद लोग सड़कों पर हैं और जल्दी ही इस स्थिति को नहीं संभाला गया तो दंगे भी हो सकते हैं।
दूसरी ओर ट्वीट के जरिए ही आज कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए पूछा है कि क्या अब मोदी सरकार कोर्ट को भी राष्ट्रविरोधी कहेगी ?
राहुल ने अपने ट्वीट के साथ एक अंग्रेजी अखबार की खबर भी टैग की है। इस खबर के अनुसार कलकत्ता हाईकोर्ट ने सरकार से कहा है कि उसने कदम उठाने से पहले पूर्व तैयारी नहीं की जबकि सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इससे आगे संकट की स्थिति पैदा हो सकती है।
पहले बात करते हैं तुफैल अहमद के ट्वीट की। तुफैल अहमद ने सुप्रीम कोर्ट के सामने जो सवाल उठाया है, क्या उसका कोई जवाब कोर्ट के पास है ?
क्या सुप्रीम कोर्ट के पास इस सवाल का भी कोई जवाब है कि विभिन्न न्यायालयों में लंबित मुकद्दमों की यह संख्या आज अचानक पैदा हो गई अथवा इसमें पूर्ववर्ती सरकारों तथा न्यायपालिकाओं की कार्यप्रणाली ने भी कोई भूमिका निभाई है?
जहां तक सवाल नोटबंदी के बाद बैंकों के सामने लगने वाली लंबी-लंबी लाइनों और लोगों को हो रही परेशानी का है तो इसका अंदेशा खुद प्रधानमंत्री ने 8 नवंबर की रात राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में भी जताया था। साथ ही प्रधानमंत्री ने कहा था कि देशहित में उठाए जा रहे इस कड़े कदम से थोड़ी परेशानी के बाद बहुत सी समस्याओं से मुक्ति मिल जाएगी।
सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री के कथन पर गौर न करके और सिर्फ याचिकाओं को आधार बनाकर जो कुछ कहा, उसकी अपेक्षा तो देश की सबसे बड़ी अदालत से नहीं थी क्योंकि सर्वोच्च अदालत का कथन लोगों के बीच भय का वातावरण बनाने में सहायक हो सकता है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने काले धन और नकली नोटों के खात्मे की दिशा में जो कदम उठाया है, वह निश्चित ही किसी बड़ी सर्जिकल स्ट्राइक से कम नहीं कहा जा सकता लिहाजा उसका असर तो होना ही था।
फिजीकली, मैंटली अथवा सोशली…कोई भी ऑपरेशन बिना थोड़ी-बहुत तकलीफ के पूरा नहीं होता। फिर यह तो एक ऐसा ऑपरेशन था जिसकी जरूरत कई दशकों से महसूस की जा रही थी।
बेशक मोदी जी द्वारा दिखाया गया 500 और 1000 के नोटों को प्रचलन से बाहर करने का दुस्साहस भी काले धन के समूल नाश में मात्र एक पहल ही है, परंतु किसी भी मुकाम तक पहुंचने के लिए किसी न किसी स्तर से पहल तो करनी ही पड़ती है।
अगर बात करें नोट बंदी से बैंकों के सामने उपजी लंबी-लंबी लाइनों तथा आम लोगों के समक्ष खड़ी हो रहीं परेशानियों की, तो सवा सौ करोड़ की आबादी वाले इस देश में कहां लाइन नहीं लगी हैं। रेल और बस की टिकट लेने से लेकर सिनेमा की टिकट लेने तक, हर जगह लाइन में लगना पड़ता है। सड़क पर दो पहिया और चार पहिया वाहन सवार भी बिना कतार में लगे मंजिल तक नहीं पहुंच पाते। श्मशान घाट भी अब तो लाइन लगने से नहीं बचे।
नोट बंदी से उपजी भीड़ के मद्देनजर दंगे-फसाद हो जाने की आशंका जाहिर करने वाले माननीय न्यायाधीश क्या देश को यह बताएंगे कि उन्हीं के किसी साथी ने कभी देर से मिलने वाले न्याय को अन्याय की जो संज्ञा दी थी, उस पर कोर्ट कब विचार करेगा?
जिस विवादित कोलेजियम सिस्टम को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर माननीय उच्च न्यायालय लंबित होते मुकद्दमों की संख्या बढ़ने का हवाला दे रहा है, क्या वह हमेशा से वजूद में था, और क्या वही मुकद्दमों के बढ़ते बोझ का एकमात्र कारण है ?
कौन नहीं जानता कि आज देश की न्यायिक व्यवस्था को भी उसी प्रकार घुन लग चुका है जिस प्रकार दूसरी व्यवस्थाओं विधायिका व कार्यपालिका को लगा हुआ है। किसे पता नहीं है कि जिला अदालतों से लेकर उच्च और उच्चतम न्यायालय तक में भ्रष्टाचार का बोलबाला है। नि:संदेह यहां भी हर पायदान पर ईमानदार अधिकारी एवं कर्मचारी भी हैं किंतु उनकी स्थिति बेहद दयनीय है। वह खुद को 32 दांतों के बीच में ”जीभ” के होने जैसा महसूस करते हैं।
यहां पूर्व कानून मंत्री शांतिभूषण द्वारा की गई वह टिप्पणी भी काबिले गौर है जिसके तहत उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के अधिकांश मुख्य न्यायाधीशों की ईमानदारी पर बड़ा सवाल खड़ा किया था। प्रसिद्ध वकील शांतिभूषण की उस टिप्पणी ने तब न्यायपालिका तथा माननीय विद्वान न्यायाधीशों को हिला कर रख दिया था लिहाजा एकबार तो ऐसा लगने लगा था जैसे शांतिभूषण किसी भी वक्त अदालत की अवमानना के आरोप में अदालतों के चक्कर काटते दिखाई देंगे लेकिन उनके खिलाफ कार्यवाही करने की हिम्मत न सर्वोच्च न्यायालय ने दिखाई और न किसी न्यायाधीश ने।
लिखने को तो बहुत कुछ है लेकिन यह बहुत कुछ लिखा नहीं जा सकता। अगर कोई लिखने बैठ जाए तो उसका भी अंत शायद कभी नहीं होगा क्योंकि सुप्रीम कोर्ट से लेकर सुप्रीम पॉवर तक सब अपने आप को जायज ठहराने की जिद पाले बैठे हैं।
प्रधानमंत्री मोदी ने तो कम से कम इतना साहस दिखाया कि पहले दिन ही अपने निर्णय से परेशानियां उत्पन्न होने की आशंका जताई और फिर यह भी कहा कि 50 दिनों बाद मेरा निर्णय गलत लगे तो जो सजा चाहो मुझे दे देना, लेकिन विपक्षी पार्टियां दो-तीन दिन बाद सन्निपात से उभरते ही कुतर्कों के सहारे प्रधानमंत्री को मुजरिम साबित करने पर आमादा हैं।
कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट और कलकत्ता हाईकोर्ट की टीका-टिप्पणियों को आधार बनाकर मोदी सरकार को निशाना बना रहे हैं, उससे साफ जाहिर है कि उनके अपने पास कोई विजन है ही नहीं। उनकी बुद्धि को लेकर अक्सर उठाए जाने वाले सवालों के पीछे संभवत: उनके द्वारा की जाती रही ऐसी ही ओछी राजनीति है। दुर्भाग्य की बात यह है कि कांग्रेस की चापलूसी वाली संस्कृति उन्हें आइना दिखाने का माद्दा नहीं रखती लिहाजा वह मौके-बेमौके भोंडा प्रदर्शन करते रहते हैं।
चार हजार रुपयों के लिए अपनी भारी-भरकम सुरक्षा-व्यवस्था के साथ बैंक जाकर तमाशा खड़ा करने से बेहतर होता कि वह लोकसभा में यह बताते कि नोट बंदी से उपजी समस्या के समाधान का उनके पास भी कोई उपाय है और उससे आमजनता को राहत मिल सकती है।
राहुल गांधी ही क्यों…सपा, बसपा, माकपा और ममता की टीएमसी सहित मोदी सरकार में शामिल शिवसेना तक मोदी सरकार के फैसले को लेकर हायतौबा मचा रही है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तो जैसे प्रधानमंत्री से निजी दुश्मनी पालकर बैठे हैं। ऐसे में वह नोट बंदी पर चुप कैसे रह सकते थे।
प्रधानमंत्री को टारगेट करने वाली इन पार्टियों और इनके स्वयंभू मुखियाओं की हकीकत से वह जनता अच्छी तरह वाकिफ है जिसके कंधे पर बंदूक रखकर यह अपना-अपना हित साधना चाहती हैं।
आज सड़क चलता कोई राहगीर भी बता देगा कि प्रधानमंत्री के नोटबंदी वाले निर्णय ने इन पार्टियों के आकाओं की हजारों करोड़ की गड्डियों को रद्दी में तब्दील करके रख दिया। अब इन्हें समझ में नहीं आ रहा कि आखिर करें तो करें क्या ?
कैसे मोदी के इस मास्टर स्ट्रोक से मुक्ति पाएं और कैसे आगामी विधानसभा चुनावों के लिए काले धन का इंतजाम करें।
अचानक की गई इस सर्जिकल स्ट्राइक ने कांग्रेस सहित लगभग सभी राजनीतिक पार्टियों और उनके नेताओं की बुद्धि को लकवाग्रस्त कर दिया है। इनमें से कोई यह तक बताने को तैयार नहीं है कि यदि पीएम का निर्णय इतना ही जनविरोधी है तो उन्होंने खुद अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने का काम किया है। उसके लिए विपक्ष इतना चिंतित क्यों है। आगामी चुनावों में विपक्ष के मन की मुराद बिना कुछ किए पूरी होने वाली है।
मोदी का कदम आत्मघाती है तो विपक्ष चुपचाप तमाशा देखे और आगामी चुनावों के लिए हसीन सपने पालते हुए मोदी और उनकी पार्टी को मुंह चिढ़ाए।
कल की ही रिपोर्ट है कि शिवसेना को विडियोकॉन कंपनी ने एक वर्ष में 85 करोड़ रुपए का चंदा दिया है जबकि इस दौरान उसे मिली कुल चंदे की रकम 87 करोड़ है। कहने का तात्पर्य यह है कि कुल 87 करोड़ के चंदे में 85 करोड़ अकेले विडियोकॉन ने दिए हैं। इससे आप अंदाज लगा सकते हैं कि सरकार में शामिल होते हुए शिवसेना, मोदी जी के निर्णय पर क्यों लालपीली हो रही है और क्यों ममता, मुलायम, मायावती व अरविंद केजरीवाल के साथ खड़ी है। नोट बंदी ने इन सबके पैरों की बिवाइयां को इतनी बुरी तरह चटका दिया है कि उनसे खून टपकने लगा है लेकिन वह उन्हें किसी को दिखा तक नहीं सकते।
कांग्रेस का तो जैसे समूचा बेड़ा गर्क हो गया। राहुल गांधी की खाट यात्रा और ”27 साल यूपी बदहाल” की टैग लाइन को मोदी के एक निर्णय ने किनारे लगा दिया। खाट यात्रा की खाटों का तो पता नहीं क्या हुआ, अलबत्ता कांग्रेस की खाट फिलहाल ऐसी खड़ी हुई है कि उसके रणनीतिकारों की भी बुद्धि का दिवाला निकल गया है।
कांग्रेस और अन्य कई पार्टियों के सामने सबसे बड़ी समस्या उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में चुनाव लड़ने की खड़ी हो गई है। कांग्रेस के लिए यह स्थिति जहां मरे पर मार वाली कहावत को चरितार्थ कर रही है वहीं मुलायम तथा मायावती अकेले में सिर पकड़ कर सोचने पर मजबूर हो गए हैं।
आश्चर्य की बात है कि मीडिया द्वारा कराए गए सर्वे में मोदी के इस कदम को जनसमर्थन मिलने की बातें सामने आ रही हैं। परेशानियों के बावजूद लोग यह मानने को तैयार नहीं कि मोदी का कदम गलत है।
यह वही मीडिया है जिसके अपने घर भी शीशे के हैं। जो बैंकों के सामने लगने वाली लाइनों को दिखाकर भय का वातावरण उत्पन्न करने में रत्तीभर पीछे नहीं रहना चाहता क्योंकि मोदी के मास्टर स्ट्रोक ने आखिर इनके हित भी तो प्रभावित किए हैं। चार चूहे मरने से लेकर एक आदमी की मौत को भी चीख-चीख कर ब्रेकिंग न्यूज़ बताने वाला मीडिया आज खामोशी के साथ खून के आंसू पीने को बाध्य है।
हर कोई जानता है कि लगभग सारे बड़े मीडिया हाउस काले धन के बल पर अपना अस्तित्व बचाए हुए थे। मोदी की सर्जिकल स्ट्राइक ने उन्हें खुद एक ऐसी ब्रेकिंग न्यूज़ बना दिया जिसका खामोश क्रंदन सुनाई भले ही न दे रहा हो लेकिन कोने में बैठकर रुला जरूर रहा है। मीडिया में व्याप्त जिस काले धन ने एक-एक एंकर को सैकड़ों करोड़ का मालिक बना दिया और जिसने कल के कई एंकर्स को न्यूज़ चैनल्स का मालिक बनवा दिया, वह भले ही प्रधानमंत्री के निर्णय पर सार्वजनिक रूप से बुक्का फाड़कर रो नहीं सकते लेकिन उनके निर्णय को देश की बर्बादी वाला साबित करने की कोशिश तो कर ही सकते हैं।
मीडिया के पास इस सवाल का भी कोई जवाब नहीं है कि चुनाव लड़ने में जो परेशानियां विपक्षी पार्टियों के सामने खड़ी होने वाली हैं, क्या भाजपा उनसे अछूती रह जाएगी…और रह जाएगी तो कैसे ?
यदि चंदे से हुए धंधे पर चोट पड़ी है तो वह चोट भाजपा को भी पड़ी होगी, फिर रोना किस बात का।
हां, विधान सभा चुनावों के टिकट बेचने से हुई आमदनी को कागज के टुकड़ों में तब्दील होते देखने का कुछ खास पार्टियों का दुख जरूर समझ में आता है क्यों कि इसके परिणाम टिकट वितरण सहित चुनावों की तिथि घोषित होने पर ज्यादा बड़ी परेशानी का कारण बन सकते हैं।
सबका अपना-अपना दुख है। सुप्रीम कोर्ट का अपना और पार्टी सुप्रीमोज का अपना। दुख भी ऐसा कि जिसे सार्वजनिक तौर पर बयां करना संभव नहीं।
ऐसे में जनता के कांधे का ही सहारा है। 125 करोड़ की आबादी कुछ पार्टियों और चंद नेताओं के दुख का पहाड़ तो ढो ही सकती है, इसलिए ढो रही है। यह जानते व समझते हुए भी उनके आंसू घड़ियाली हैं और उनकी सहानुभूति निजी शोक संवेदना से उपजी ऐसी अनुभूति है जिसका सहानुभूति से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं। वास्ता है तो नोट व वोट की उस राजनीति से जिस पर फिलहाल तो पाला पड़ ही गया है। आगे की राम जाने।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
यह ट्वीट जाने-माने स्तंभकार तुफैल अहमद का है, जो उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की उस टिप्पणी को लेकर किया है जिसमें उसने कहा था कि नोटबंदी के बाद लोग सड़कों पर हैं और जल्दी ही इस स्थिति को नहीं संभाला गया तो दंगे भी हो सकते हैं।
दूसरी ओर ट्वीट के जरिए ही आज कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए पूछा है कि क्या अब मोदी सरकार कोर्ट को भी राष्ट्रविरोधी कहेगी ?
राहुल ने अपने ट्वीट के साथ एक अंग्रेजी अखबार की खबर भी टैग की है। इस खबर के अनुसार कलकत्ता हाईकोर्ट ने सरकार से कहा है कि उसने कदम उठाने से पहले पूर्व तैयारी नहीं की जबकि सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इससे आगे संकट की स्थिति पैदा हो सकती है।
पहले बात करते हैं तुफैल अहमद के ट्वीट की। तुफैल अहमद ने सुप्रीम कोर्ट के सामने जो सवाल उठाया है, क्या उसका कोई जवाब कोर्ट के पास है ?
क्या सुप्रीम कोर्ट के पास इस सवाल का भी कोई जवाब है कि विभिन्न न्यायालयों में लंबित मुकद्दमों की यह संख्या आज अचानक पैदा हो गई अथवा इसमें पूर्ववर्ती सरकारों तथा न्यायपालिकाओं की कार्यप्रणाली ने भी कोई भूमिका निभाई है?
जहां तक सवाल नोटबंदी के बाद बैंकों के सामने लगने वाली लंबी-लंबी लाइनों और लोगों को हो रही परेशानी का है तो इसका अंदेशा खुद प्रधानमंत्री ने 8 नवंबर की रात राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में भी जताया था। साथ ही प्रधानमंत्री ने कहा था कि देशहित में उठाए जा रहे इस कड़े कदम से थोड़ी परेशानी के बाद बहुत सी समस्याओं से मुक्ति मिल जाएगी।
सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री के कथन पर गौर न करके और सिर्फ याचिकाओं को आधार बनाकर जो कुछ कहा, उसकी अपेक्षा तो देश की सबसे बड़ी अदालत से नहीं थी क्योंकि सर्वोच्च अदालत का कथन लोगों के बीच भय का वातावरण बनाने में सहायक हो सकता है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने काले धन और नकली नोटों के खात्मे की दिशा में जो कदम उठाया है, वह निश्चित ही किसी बड़ी सर्जिकल स्ट्राइक से कम नहीं कहा जा सकता लिहाजा उसका असर तो होना ही था।
फिजीकली, मैंटली अथवा सोशली…कोई भी ऑपरेशन बिना थोड़ी-बहुत तकलीफ के पूरा नहीं होता। फिर यह तो एक ऐसा ऑपरेशन था जिसकी जरूरत कई दशकों से महसूस की जा रही थी।
बेशक मोदी जी द्वारा दिखाया गया 500 और 1000 के नोटों को प्रचलन से बाहर करने का दुस्साहस भी काले धन के समूल नाश में मात्र एक पहल ही है, परंतु किसी भी मुकाम तक पहुंचने के लिए किसी न किसी स्तर से पहल तो करनी ही पड़ती है।
अगर बात करें नोट बंदी से बैंकों के सामने उपजी लंबी-लंबी लाइनों तथा आम लोगों के समक्ष खड़ी हो रहीं परेशानियों की, तो सवा सौ करोड़ की आबादी वाले इस देश में कहां लाइन नहीं लगी हैं। रेल और बस की टिकट लेने से लेकर सिनेमा की टिकट लेने तक, हर जगह लाइन में लगना पड़ता है। सड़क पर दो पहिया और चार पहिया वाहन सवार भी बिना कतार में लगे मंजिल तक नहीं पहुंच पाते। श्मशान घाट भी अब तो लाइन लगने से नहीं बचे।
नोट बंदी से उपजी भीड़ के मद्देनजर दंगे-फसाद हो जाने की आशंका जाहिर करने वाले माननीय न्यायाधीश क्या देश को यह बताएंगे कि उन्हीं के किसी साथी ने कभी देर से मिलने वाले न्याय को अन्याय की जो संज्ञा दी थी, उस पर कोर्ट कब विचार करेगा?
जिस विवादित कोलेजियम सिस्टम को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर माननीय उच्च न्यायालय लंबित होते मुकद्दमों की संख्या बढ़ने का हवाला दे रहा है, क्या वह हमेशा से वजूद में था, और क्या वही मुकद्दमों के बढ़ते बोझ का एकमात्र कारण है ?
कौन नहीं जानता कि आज देश की न्यायिक व्यवस्था को भी उसी प्रकार घुन लग चुका है जिस प्रकार दूसरी व्यवस्थाओं विधायिका व कार्यपालिका को लगा हुआ है। किसे पता नहीं है कि जिला अदालतों से लेकर उच्च और उच्चतम न्यायालय तक में भ्रष्टाचार का बोलबाला है। नि:संदेह यहां भी हर पायदान पर ईमानदार अधिकारी एवं कर्मचारी भी हैं किंतु उनकी स्थिति बेहद दयनीय है। वह खुद को 32 दांतों के बीच में ”जीभ” के होने जैसा महसूस करते हैं।
यहां पूर्व कानून मंत्री शांतिभूषण द्वारा की गई वह टिप्पणी भी काबिले गौर है जिसके तहत उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के अधिकांश मुख्य न्यायाधीशों की ईमानदारी पर बड़ा सवाल खड़ा किया था। प्रसिद्ध वकील शांतिभूषण की उस टिप्पणी ने तब न्यायपालिका तथा माननीय विद्वान न्यायाधीशों को हिला कर रख दिया था लिहाजा एकबार तो ऐसा लगने लगा था जैसे शांतिभूषण किसी भी वक्त अदालत की अवमानना के आरोप में अदालतों के चक्कर काटते दिखाई देंगे लेकिन उनके खिलाफ कार्यवाही करने की हिम्मत न सर्वोच्च न्यायालय ने दिखाई और न किसी न्यायाधीश ने।
लिखने को तो बहुत कुछ है लेकिन यह बहुत कुछ लिखा नहीं जा सकता। अगर कोई लिखने बैठ जाए तो उसका भी अंत शायद कभी नहीं होगा क्योंकि सुप्रीम कोर्ट से लेकर सुप्रीम पॉवर तक सब अपने आप को जायज ठहराने की जिद पाले बैठे हैं।
प्रधानमंत्री मोदी ने तो कम से कम इतना साहस दिखाया कि पहले दिन ही अपने निर्णय से परेशानियां उत्पन्न होने की आशंका जताई और फिर यह भी कहा कि 50 दिनों बाद मेरा निर्णय गलत लगे तो जो सजा चाहो मुझे दे देना, लेकिन विपक्षी पार्टियां दो-तीन दिन बाद सन्निपात से उभरते ही कुतर्कों के सहारे प्रधानमंत्री को मुजरिम साबित करने पर आमादा हैं।
कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट और कलकत्ता हाईकोर्ट की टीका-टिप्पणियों को आधार बनाकर मोदी सरकार को निशाना बना रहे हैं, उससे साफ जाहिर है कि उनके अपने पास कोई विजन है ही नहीं। उनकी बुद्धि को लेकर अक्सर उठाए जाने वाले सवालों के पीछे संभवत: उनके द्वारा की जाती रही ऐसी ही ओछी राजनीति है। दुर्भाग्य की बात यह है कि कांग्रेस की चापलूसी वाली संस्कृति उन्हें आइना दिखाने का माद्दा नहीं रखती लिहाजा वह मौके-बेमौके भोंडा प्रदर्शन करते रहते हैं।
चार हजार रुपयों के लिए अपनी भारी-भरकम सुरक्षा-व्यवस्था के साथ बैंक जाकर तमाशा खड़ा करने से बेहतर होता कि वह लोकसभा में यह बताते कि नोट बंदी से उपजी समस्या के समाधान का उनके पास भी कोई उपाय है और उससे आमजनता को राहत मिल सकती है।
राहुल गांधी ही क्यों…सपा, बसपा, माकपा और ममता की टीएमसी सहित मोदी सरकार में शामिल शिवसेना तक मोदी सरकार के फैसले को लेकर हायतौबा मचा रही है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तो जैसे प्रधानमंत्री से निजी दुश्मनी पालकर बैठे हैं। ऐसे में वह नोट बंदी पर चुप कैसे रह सकते थे।
प्रधानमंत्री को टारगेट करने वाली इन पार्टियों और इनके स्वयंभू मुखियाओं की हकीकत से वह जनता अच्छी तरह वाकिफ है जिसके कंधे पर बंदूक रखकर यह अपना-अपना हित साधना चाहती हैं।
आज सड़क चलता कोई राहगीर भी बता देगा कि प्रधानमंत्री के नोटबंदी वाले निर्णय ने इन पार्टियों के आकाओं की हजारों करोड़ की गड्डियों को रद्दी में तब्दील करके रख दिया। अब इन्हें समझ में नहीं आ रहा कि आखिर करें तो करें क्या ?
कैसे मोदी के इस मास्टर स्ट्रोक से मुक्ति पाएं और कैसे आगामी विधानसभा चुनावों के लिए काले धन का इंतजाम करें।
अचानक की गई इस सर्जिकल स्ट्राइक ने कांग्रेस सहित लगभग सभी राजनीतिक पार्टियों और उनके नेताओं की बुद्धि को लकवाग्रस्त कर दिया है। इनमें से कोई यह तक बताने को तैयार नहीं है कि यदि पीएम का निर्णय इतना ही जनविरोधी है तो उन्होंने खुद अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने का काम किया है। उसके लिए विपक्ष इतना चिंतित क्यों है। आगामी चुनावों में विपक्ष के मन की मुराद बिना कुछ किए पूरी होने वाली है।
मोदी का कदम आत्मघाती है तो विपक्ष चुपचाप तमाशा देखे और आगामी चुनावों के लिए हसीन सपने पालते हुए मोदी और उनकी पार्टी को मुंह चिढ़ाए।
कल की ही रिपोर्ट है कि शिवसेना को विडियोकॉन कंपनी ने एक वर्ष में 85 करोड़ रुपए का चंदा दिया है जबकि इस दौरान उसे मिली कुल चंदे की रकम 87 करोड़ है। कहने का तात्पर्य यह है कि कुल 87 करोड़ के चंदे में 85 करोड़ अकेले विडियोकॉन ने दिए हैं। इससे आप अंदाज लगा सकते हैं कि सरकार में शामिल होते हुए शिवसेना, मोदी जी के निर्णय पर क्यों लालपीली हो रही है और क्यों ममता, मुलायम, मायावती व अरविंद केजरीवाल के साथ खड़ी है। नोट बंदी ने इन सबके पैरों की बिवाइयां को इतनी बुरी तरह चटका दिया है कि उनसे खून टपकने लगा है लेकिन वह उन्हें किसी को दिखा तक नहीं सकते।
कांग्रेस का तो जैसे समूचा बेड़ा गर्क हो गया। राहुल गांधी की खाट यात्रा और ”27 साल यूपी बदहाल” की टैग लाइन को मोदी के एक निर्णय ने किनारे लगा दिया। खाट यात्रा की खाटों का तो पता नहीं क्या हुआ, अलबत्ता कांग्रेस की खाट फिलहाल ऐसी खड़ी हुई है कि उसके रणनीतिकारों की भी बुद्धि का दिवाला निकल गया है।
कांग्रेस और अन्य कई पार्टियों के सामने सबसे बड़ी समस्या उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में चुनाव लड़ने की खड़ी हो गई है। कांग्रेस के लिए यह स्थिति जहां मरे पर मार वाली कहावत को चरितार्थ कर रही है वहीं मुलायम तथा मायावती अकेले में सिर पकड़ कर सोचने पर मजबूर हो गए हैं।
आश्चर्य की बात है कि मीडिया द्वारा कराए गए सर्वे में मोदी के इस कदम को जनसमर्थन मिलने की बातें सामने आ रही हैं। परेशानियों के बावजूद लोग यह मानने को तैयार नहीं कि मोदी का कदम गलत है।
यह वही मीडिया है जिसके अपने घर भी शीशे के हैं। जो बैंकों के सामने लगने वाली लाइनों को दिखाकर भय का वातावरण उत्पन्न करने में रत्तीभर पीछे नहीं रहना चाहता क्योंकि मोदी के मास्टर स्ट्रोक ने आखिर इनके हित भी तो प्रभावित किए हैं। चार चूहे मरने से लेकर एक आदमी की मौत को भी चीख-चीख कर ब्रेकिंग न्यूज़ बताने वाला मीडिया आज खामोशी के साथ खून के आंसू पीने को बाध्य है।
हर कोई जानता है कि लगभग सारे बड़े मीडिया हाउस काले धन के बल पर अपना अस्तित्व बचाए हुए थे। मोदी की सर्जिकल स्ट्राइक ने उन्हें खुद एक ऐसी ब्रेकिंग न्यूज़ बना दिया जिसका खामोश क्रंदन सुनाई भले ही न दे रहा हो लेकिन कोने में बैठकर रुला जरूर रहा है। मीडिया में व्याप्त जिस काले धन ने एक-एक एंकर को सैकड़ों करोड़ का मालिक बना दिया और जिसने कल के कई एंकर्स को न्यूज़ चैनल्स का मालिक बनवा दिया, वह भले ही प्रधानमंत्री के निर्णय पर सार्वजनिक रूप से बुक्का फाड़कर रो नहीं सकते लेकिन उनके निर्णय को देश की बर्बादी वाला साबित करने की कोशिश तो कर ही सकते हैं।
मीडिया के पास इस सवाल का भी कोई जवाब नहीं है कि चुनाव लड़ने में जो परेशानियां विपक्षी पार्टियों के सामने खड़ी होने वाली हैं, क्या भाजपा उनसे अछूती रह जाएगी…और रह जाएगी तो कैसे ?
यदि चंदे से हुए धंधे पर चोट पड़ी है तो वह चोट भाजपा को भी पड़ी होगी, फिर रोना किस बात का।
हां, विधान सभा चुनावों के टिकट बेचने से हुई आमदनी को कागज के टुकड़ों में तब्दील होते देखने का कुछ खास पार्टियों का दुख जरूर समझ में आता है क्यों कि इसके परिणाम टिकट वितरण सहित चुनावों की तिथि घोषित होने पर ज्यादा बड़ी परेशानी का कारण बन सकते हैं।
सबका अपना-अपना दुख है। सुप्रीम कोर्ट का अपना और पार्टी सुप्रीमोज का अपना। दुख भी ऐसा कि जिसे सार्वजनिक तौर पर बयां करना संभव नहीं।
ऐसे में जनता के कांधे का ही सहारा है। 125 करोड़ की आबादी कुछ पार्टियों और चंद नेताओं के दुख का पहाड़ तो ढो ही सकती है, इसलिए ढो रही है। यह जानते व समझते हुए भी उनके आंसू घड़ियाली हैं और उनकी सहानुभूति निजी शोक संवेदना से उपजी ऐसी अनुभूति है जिसका सहानुभूति से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं। वास्ता है तो नोट व वोट की उस राजनीति से जिस पर फिलहाल तो पाला पड़ ही गया है। आगे की राम जाने।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
शनिवार, 4 फ़रवरी 2012
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