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सोमवार, 23 फ़रवरी 2026
MVDA के भ्रष्टाचार की बुनियाद पर तेजी से खड़ा हो रहा है 5 सितारा प्रोजेक्ट, शिकायतें डस्टबिन में
वृंदावन हो या गोवर्धन, कोसी हो या बरसाना, या फिर मथुरा शहर ही क्यों न हो। MVDA (मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण) के क्षेत्र में कहीं भी हो रहा निर्माण कार्य उसके भ्रष्टाचार की दास्तान चीख-चीख कर सुना रहा है किंतु न कोई सुनने वाला है और न एक्शन लेने वाला क्योंकि इस हमाम में सब नंगे जो हैं। कॉलोनी, होटल, दुकान, मकान, मॉल, आश्रम, धर्मशाला, हॉस्पिटल, गेस्ट हाउस, यहां तक कि कारों के शोरूम भी इस धर्म नगरी में अधर्म के रास्ते पर चलकर खड़े कर दिए गए और लगातार खड़े किए जा रहे हैं किंतु कहीं किसी पर कोई लगाम भी लगती नजर नहीं आ रही।
ऐसा नहीं है कि लोग शिकायत नहीं करते। शिकायतें भी हो रही हैं, परंतु नतीजा शून्य निकल रहा है क्योंकि शिकायतों का निस्तारण ही शब्दों के जाल में इस कदर उलझाकर किया जाता है कि शिकायतकर्ता अपना माथा पीटने पर मजबूर हो जाता है। आखिर में उसके पास एक ही ऑप्शन बचता है, और बचता है न्यायालय की शरण में जाने का।
हालांकि वहां से भी अब तक अवैध निर्माण करने वालों के खिलाफ तो फैसले आए है परंतु कराने वाले जिम्मेदार अधिकारी साफ बच निकलते हैं इसलिए उनका भ्रष्टाचार बदस्तूर जारी रहता है। कानून की किताब में बेशक रिश्वत लेने वाला और देने वाला दोनों को दोषी माना जाता हो, किंतु अधिकांशत: नुकसान देने वाले को ही उठाना पड़ता है।
MVDA के भ्रष्टाचार की बुनियाद पर कोसी में तेजी से खड़ा हो रहा है पांच सितारा होटल Country Inn
दिल्ली-मथुरा-आगरा नेशनल हाईवे पर लगभग 14 एकड़ में फैला होटल Country Inn मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के भ्रष्टाचार का एक और ज्वलंत उदाहरण है।
इस पांच सितारा प्रोजेक्ट के लिए बेखौफ किए जा रहे अवैध निर्माण कार्य और सरकारी जमीन कब्जाने की शिकायत जब हुई तो प्राधिकरण की ओर से 30 अक्टूबर 2025 को इस आशय का जवाब दिया गया कि स्थल का निरीक्षण किया गया। मानचित्र स्वीकृत कराए बिना निर्माण कार्य कराए जाने पर उत्तर प्रदेश नगर योजना एवं विकास अधिनियम की धारा 1973 के तहत सुसंगत धाराओं के अंतर्गत वाद संख्या MTDA/Z2/ANI/2025/00000680 योजित किया गया है।
तत्पश्चात् आवेदक/निर्माणकर्ता द्वारा शमन मानचित्र प्रस्तुत किए गए हैं। स्थलीय एवं अभिलेखीय सत्यापन कर जांच आख्या उपलब्ध कराने के लिए तहसीलदार छाता को पत्र दिनांक 06.10.2025 प्रेषित किया गया है।
तहसीलदार छाता की जांच आख्या क्या कहती है?
तहसीलदार छाता ने इस प्रकरण में 13 फरवरी 2026 को अपनी जांच आख्या प्रस्तुत करते हुए लिखा- लेखपाल कोसी द्वारा मौके का निरीक्षण किया गया। राजस्व निरीक्षक की आख्या के अनुसार यह प्रकरण नगर पालिका कोसी कलां की आबादी का है। कुल मिलाकर सरकारी जमीन को कब्जामुक्त कराने का जिम्मा अब नगर पालिका कोसीकलां के पाले में डाल दिया गया।
रही बात बिना नक्शा पास कराए एक प्राइम लोकेशन पर पांच सितारा होटल खड़ा किए जाने की तो उसके लिए मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के अधिकारी होटल मालिकों को बीच का रास्ता निकालने की सलाह उसी प्रकार दे रहे हैं, जिस प्रकार वह दूसरे अवैध निर्माण कार्यों के मामले में अब तक देते रहे हैं।
जाहिर है ये दूसरा रास्ता भी जल्द ही तब खुल जाएगा जब प्रोजेक्ट की लागत, बिना नक्शा पास कराए किए गए निर्माण कार्य तथा अन्य सभी अनियमितताओं से होने वाले लाभ-हानि को देखकर लेन-देन की रकम तय हो जाएगी और उसकी पहली किस्त अधिकारियों तक पहुंचा दी जाएगी।
विकास प्राधिकरण के ही सूत्र बताते हैं होटल Country Inn के मालिकों से विकास प्राधिकरण के अफसरों की बैठकों का सिलसिला जारी है, और उम्मीद है कि शीघ्र ही 'सुविधा शुल्क' के लेन-देन की प्रक्रिया पूरी हो जाएगी। फिर प्रक्रिया पूरी होते ही योजित वाद संख्या MTDA/Z2/ANI/2025/00000680 को समायोजित कर लिया जाएगा।
वाद समायोजित होने के साथ ही सब-कुछ उसी तरह आयोजित होगा जिस तरह अब तक होता रहा है। ये बात अलग है कि शिकायतकर्ता एकबार फिर इसलिए अपना सिर पीट लेगा कि आखिर उसने शिकायत की ही क्यों थी, और शिकायत का नतीजा क्या निकला।
-Legend News
गुरुवार, 3 नवंबर 2022
ये आग कब बुझेगी: 'लेवाना' के बाद अब मथुरा के होटल 'वृंदावन गार्डन' में लगी आग, 2 कर्मचारियों की मौत और 3 गंभीर रूप से झुलसे
अभी दो महीने ही बीते हैं जब प्रदेश की राजधानी लखनऊ के हजरतगंज स्थित 30 कमरों वाले होटल 'लेवाना' में आग लगने से 4 लोगों की मौत हो गई थी जबकि कई घायल हुए थे। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और लखनऊ से सांसद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस अग्निकांड को गंभीरता से लिया था जिस कारण न केवल 15 अधिकारी तत्काल निलंबित कर दिए गए बल्कि 19 अधिकारियों के ख़िलाफ़ सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए जिनमें कुछ रिटायर अधिकारी भी शामिल हैं।
सीएम योगी ने लखनऊ मंडल के पुलिस आयुक्त से जांच कराई। इस जांच रिपोर्ट में फायर ब्रिगेड, ऊर्जा विभाग, नियुक्ति विभाग, आवास और शहरी विकास विभाग सहित आबकारी विभाग के कई अधिकारियों की अनियमितता व लापरवाही पाई गई।
इसके अलावा जांच में पाया गया कि होटल 'लेवाना' को अवैध रूप से बनाया गया था। जिसके लिए लखनऊ विकास प्राधिकरण द्वारा 22 इंजीनियरों और जोनल अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की संस्तुति की गई।
एलडीए ने हजरतगंज थाने में बंसल कंस्ट्रक्शन के मुकेश जसनानी और उनके सहयोगियों के खिलाफ आवासीय भूखंड पर होटल चलाने के लिए एफआईआर भी दर्ज कराई। पुलिस ने भी इस मामले में अपनी तरफ से एक मुकद्दमा दर्ज किया।
इतना सब-कुछ किए जाने के बावजूद सारा सिस्टम किस तरह उसी ढर्रे पर चल रहा है, इसका उदाहरण आज तब देखने को मिला जब कृष्ण की लीला स्थली वृंदावन (मथुरा) के होटल वृंदावन गार्डन में सुबह के समय आग लगने से दो कर्मचारियों उमेश तथा बीरी सिंह की मौत हो गई और तीन झुलस गए जिनमें से एक 45 वर्षीय बिजेन्द्र की हालत गंभीर बताई जाती है लिहाजा उसे आगरा रैफर किया गया है।
क्या अवैध है होटल 'वृंदावन गार्डन'?
जिस तरह लखनऊ के होटल 'लेवाना' में अग्निकांड के बाद पता लगा कि उसका निर्माण ही अवैध था, उसी तरह अब पता लग रहा है कि मथुरा का यह होटल भी अवैध रूप से बना है और मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण से इसका नक्शा एक मैरिज होम के तौर पर पास है। हालांकि हमेशा की तरह फिलहाल इसकी पुष्टि करने वाला कोई नहीं है क्योंकि होटल मालिक रामकिशन अग्रवाल काफी प्रभावशाली व्यक्ति है और इसके अलावा भी वह कई होटलों का मालिक है जो बसेरा ग्रुप के तहत संचालित हैं।
अग्निशमन विभाग ने दे रखा है नोटिस विकास प्राधिकरण की चुप्पी के बीच इतनी जानकारी जरूर सामने आई है कि अग्निशमन विभाग कोसीकलां के प्रभारी जसराम सिंह ने ''होटल वृंदावन गार्डन'' वृंदावन का 8 सितंबर 2022 को सुरक्षा की दृष्टि से निरीक्षण किया था और इस दौरान उन्होंने होटल में तमाम खामियां पाईं।
उन्होंने इसी दिन होटल के स्वामी/प्रबंधक को एक नोटिस जारी कर उत्तर प्रदेश फायर सर्विस अधिनियम 1944 की धारा 1 व 2 के अंतर्गत जनहित में सभी कमियां 30 दिन के अंदर दूर कराने को कहा था लेकिन होटल स्वामी/प्रबंधक के कानों पर जूं नहीं रेंगी, जिसके परिणाम स्वरूप दो कर्मचारियों को जान से हाथ धोना पड़ा और तीन अपनी जिंदगी के लिए लड़ रहे हैं।
अग्निशमन विभाग कोसीकलां के प्रभारी द्वारा जारी नोटिस से स्पष्ट है कि होटल वृंदावन गार्डन में अग्निसुरक्षा के नाम पर कुछ नहीं था, बावजूद इसके वो नोटिस देने के अतिरिक्त कुछ और कर भी नहीं सकते थे।
अग्निशमन विभाग की मानें तो उसके पास इससे अधिक कोई अधिकार हैं ही नहीं। वो नोटिस-नोटिस खेलने के बाद ज्यादा से ज्यादा 'कोर्ट' मूव कर सकते हैं किंतु सीधे कोई कार्रवाई नहीं कर सकते।
सड़क पर कराई जाती है 'पार्किंग'
मथुरा-वृंदावन रोड पर स्वामी रामकृष्ण मिशन हॉस्पिटल के सामने बने होटल वृंदावन गार्डन द्वारा भी मथुरा जनपद के अन्य अनेक होटलों की तरह पार्किंग के लिए सड़क को इस्तेमाल किया जाता है जबकि होटल में 5-7 नहीं करीब 25 कमरे हैं और प्रदेश ही नहीं, देश का प्रमुख धार्मिक स्थल होने के कारण यहां के सभी कमरे शायद ही कभी खाली रहते हों।
आश्चर्य की बात यह है कि सीएम योगी समेत प्रदेश के अन्य बहुत से मंत्री तथा उच्च अधिकारियों का वृंदावन आना-जाना अक्सर लगा रहता है और उनकी यहां के विकास पर भी निगाहें केंद्रित हैं, बावजूद इसके सरकारी मशीनरी है कि सुधरने का नाम नहीं लेती।
ऑब्लाइज रहते हैं अधिकांश अधिकारी
होटल, मैरिज होम, गेस्ट हाउस, हॉस्पिटल, नर्सिंग होम तथा शॉपिंग कॉम्प्लेक्स आदि के अवैध निर्माण का एक बड़ा कारण अधिकांश अधिकारियों का इनके मालिकों से ऑब्लाइज रहना भी बताया जाता है। कहीं ये ऑब्लिगेशन 'कैश' के रूप में होता है तो कहीं 'काइंड' के रूप में।
कुछ होटल और गेस्ट हाउस मालिकों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि उन्हें कई कमरे तो हमेशा अधिकारियों की 'बेगार' के लिए खाली रखने पड़ते हैं जिससे अधिकारी खुद या उनके मेहमान जब चाहें आकर रुक सकें। ऐसा न करने पर प्रताड़ित किया जाता है।
इसी प्रकार हॉस्पिटल और नर्सिंग होम संचालकों का भी अधिकारी भरपूर 'दुर-उपयोग' करते देखे जा सकते हैं। राष्ट्रीय राजमार्ग पर बने हॉस्पिटल और नर्सिंग होम इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं जहां खुलेआम सर्विस रोड को घेरकर 'पार्किंग' बना दिया गया है और यहां तक कि अपने स्तर पर उसका निजी ठेका भी उठा दिया गया है लेकिन न कोई बोलने वाला है और न सुनने वाला। यही हाल शहर के शॉपिंग कॉम्प्लेक्स का है।
बहरहाल, कृष्ण की नगरी कितनी ही महत्वपूर्ण क्यों न हो लेकिन यह प्रदेश की राजधानी लखनऊ नहीं है इसलिए यहां के होटल में अग्निकांड के जिम्मेदार लोगों पर तत्काल प्रभाव से किसी एक्शन की उम्मीद करना बेमानी है। होटल के दो कर्मचारी मर चुके हैं तथा तीन जिंदगी के लिए जूझ रहे हैं किंतु सरकारी सिस्टम कुछ दिनों बाद इसे भी ठीक वैसे ही भूल जाएगा जैसे लखनऊ के होटल लेवाना के हादसे को भूल गया। कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि सिस्टम की लगाई इस आग में कभी लखनऊ झुलसेगा तो कभी मथुरा, किंतु सिस्टम शायद ही कभी झुलस पाएगा। उसके हाथ में हमेशा तुरुप का पत्ता रहेगा क्योंकि जांच भी उसी को करनी है और रिपोर्ट भी उसी को सौंपनी है।
होटल वृंदावन गार्डन में आग कैसे लगी, अभी तो यही पता नहीं लगा। फिर यह पता कैसे लगेगा कि इस 'आग' की भेंट चढ़े लोगों की मौत का जिम्मेदार कौन-कौन है। लखनऊ के लेवाना होटल की आग ठंडी पड़ चुकी है। वृंदावन गार्डन की भी आग जल्द ठंडी पड़ जाएगी, लेकिन सिस्टम का खेल बदस्तूर जारी रहेगा।
-Legend News
गुरुवार, 17 जून 2021
एक नजर देखिए: केंद्र और राज्य के “अभियान” की किस तरह हवा निकाल रहा है “विकास प्राधिकरण”
लकड़ी से थनों को छूकर अपने क्षेत्र की दुधारू गाएं दुहने में माहिर उत्तर प्रदेश के विकास प्राधिकरण शासन के आदेश-निर्देशों और अभियानों की हवा निकालने में भी कितने दक्ष हैं, इसका एक ताजा उदाहरण तब देखने को मिला जब मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण की ओर से आज एक पेंपलेट अखबारों में रखकर लोगों के घर पहुंचाया गया।बिना किसी प्रोजेक्ट के निठल्ला चिंतन करने में व्यस्त इस धार्मिक जनपद के विकास प्राधिकरण की यूं तो अनगिनित कारगुजारियां चर्चा में हैं लेकिन फिलहाल बात केवल ‘वर्षा जल संचयन’ की।
प्रधानमंत्री ने मानसून तक जल संरक्षण के प्रयासों को आगे बढ़ाने का आह्वान किया और सरपंचों से लेकर जिलाधिकारियों तथा उपायुक्तों से जोर देते हुए कहा कि जल शपथ’ जो पूरे देश में आयोजित की जा रही है, हर किसी की प्रतिज्ञा के साथ-साथ अब स्वभाव बननी चाहिए। उन्होंने कहा कि जब पानी को लेकर हमारा स्वभाव बदलेगा, तो प्रकृति भी हमारा साथ देगी।
30 नवंबर 2021 तक प्री-मानसून और मानसून अवधि के दौरान देशभर में चलने वाले इस जल संरक्षण अभियान को जमीनी स्तर पर लाने के लिए प्रधानमंत्री ने इसे बाकायदा एक आंदोलन के रूप में लॉन्च करने की बात कही है।
प्रधानमंत्री के आह्वान पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यानाथ ने भी वर्षा जल संचयन के लिए विशेष अभियान चलाने का फैसला किया।
इसके लिए उन्होंने 10 एकड़ से अधिक क्षेत्रफल वाली टाउनशिप के एक फीसदी क्षेत्र में जलाशय का निर्माण कराना अनिवार्य कर दिया।
इस संदर्भ में प्रमुख सचिव आवास दीपक कुमार ने एक शासनादेश जारी करते हुए कहा कि 10 एकड़ से अधिक क्षेत्रफल की योजनाओं के ले-आउट प्लान्स में पार्क और खुले क्षेत्र के लिए प्रस्तावित भूमि के अंतर्गत जलाशय या जलाशयों का निर्माण अनिवार्य रूप से किया जाएगा।
जलाशय निर्माण से पूर्व संबंधित योजना के अंतर्गत वर्षा जल के प्राकृतिक कैचमेंट एरिया को चिह्नित करते हुए पानी के ठहराव की व्यवस्था की जाएगी।
पार्क व खुले क्षेत्र के अंतर्गत निर्धारित मानकों के अनुसार एक कोने में रिचार्ज पिट, रिचार्ज शैफ्ट बनाए जाएंगे। ऐसे में रिचार्ज पिट, रिचार्ज शैफ्ट और जलाशय का निर्माण मानक के अनुसार किया जाएगा।
पार्कों में पक्का निर्माण पांच प्रतिशत से अधिक नहीं किया जाएगा। फुटपाथ व ट्रैक्स यथासंभव परमीएबिल या सेमी परिमीएबिल ब्लॉक्स के प्रयोग से ही बनाए जाएंगे। वर्षा जल के अधिकतम भूमिगत रिसाव को पार्क एवं खुले क्षेत्रों में प्रोत्साहित किया जाएगा। सड़कों, पार्कों और खुले स्थान में ऐसे पेड़-पौधों का वृक्षारोपण किया जाएगा, जिनको जल की न्यूनतम जरूरत होगी। शासकीय भवनों, निजी सोसायटियों, सहकारी आवास समितियों द्वारा प्रस्तावित नई योजनाओं के ले-आउट प्लान में दुर्बल व अल्प आय वर्ग को छोड़कर अवस्थापना सुविधाओं जैसे जलापूर्ति, ड्रेनेज व सीवरेज के नेटवर्क के साथ-साथ रूफ टॉप रेन वाटर हार्वेस्टिंग के माध्यम से भू-जल सामूहिक रिचार्जिंग के लिए अन्य नेटवर्क का प्रावधान किया जाएगा।
इसके अलावा 300 वर्ग मीटर या उससे अधिक क्षेत्रफल के भूखंडों में यदि सामूहिक रिचार्ज नेटवर्क नहीं है तो भवन स्वामी को स्वयं ही वर्षा जल संचयन के लिए व्यवस्था करनी होगी।
विकास प्राधिकरण वर्षा जल संचयन के संबंध में की गई कार्यवाही की रिपोर्ट हर माह की 15 तारीख को आवास बंधु के निदेशक को उपलब्ध कराएंगे।
अब देखिए मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण की उपलब्धि
एक ऐसे गंभीर संकट पर जिसे लेकर केंद्र ही नहीं राज्य सरकार भी चिंता जता रही है और तमाम आदेश-निर्देश जारी कर चुकी है, उसके लिए मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के जिम्मेदार अधिकारियों ने आज अखबारों में पेंपलेट डलवाने से पहले शायद ही कुछ किया हो।
इसके उलट हो ये रहा है कि प्राधिकरण से अप्रूव्ड पचासों एकड़ में फैली उन पॉश कॉलोनियों के अंदर भी मकान मालिक बिना किसी अनुमति के बेखौफ होकर अनावश्यक रूप से सबमर्सिबल लगवा रहे हैं, जबकि इन कॉलोनियों में नियमित सुबह-शाम कई-कई घंटे पेयजल की सप्लाई की जाती है।
ये सब हो इसलिए रहा है कि नक्शा पास करने की औपचारिकता पूरी करने के बाद विकास प्राधिकरण का कोई जिम्मेदार अधिकारी कभी पलटकर इन कॉलोनियों की ओर झांकने भी नहीं जाता।
बात बिजली-पानी या सड़क की हो अथवा पार्कों के रख-रखाव एवं अवैध निर्माण की, विकास प्राधिकरण के अधिकारियों को किसी बात से कोई मतलब नहीं जबकि ये सब देखना उनकी जिम्मेदारी है।
जाहिर है कि इस मानसिकता के चलते वो न तो किसी कॉलोनी में रेजिडेंट वेलफेयर सोसायटी यानी RWA के सहयोग से जल संचयन का कोई कार्य करवा सकेंगे और ना ही 300 वर्गमीटर से अधिक क्षेत्रफल वाले भूखंडों में रूफटॉप रेनवाटर हार्वेस्टिंग का प्रावधान सुनिश्चित करवा पाएंगे।
विकास प्राधिकरण के अधिकारियों की ऐसी मानसिकता किसी एक जिले तक सीमित नहीं है। सच तो यह है कि समूचे प्रदेश में अधिकांश अधिकारियों का यही हाल है इसलिए ज्यादातर विकास प्राधिकरण एक ढर्रे पर चलते दिखाई देते हैं।
हो सकता है कि ‘जल शक्ति अभियान: वर्षा जल संचयन (कैच द रेन)’ जैसा अभियान भी इन अधिकारियों के लिए ‘आपदा में अवसर’ साबित हो और समस्त सरकारी आदेश-निर्देश इसी तरह पेंपलेट बांटकर निपटा लिए जाएं क्योंकि उत्तर प्रदेश नगर योजना एवं विकास अधिनियम-1973 इन्हें किसी के भी खिलाफ ‘सुसंगत’ धाराओं में कार्यवाही करने का अधिकार जो देता है।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
रविवार, 5 जनवरी 2020
उत्तर प्रदेश में भ्रष्टाचार की कहानी, खुद योगी आदित्यनाथ की जुबानी
UPPCL का PF घोटाला हो या पुलिस में ट्रांसफर-पोस्टिंग के नाम पर आ रही पैसे के लेन-देन की खबरें, नगर पालिकाओं एवं नगर निगमों में चल रहा खेल हो अथवा विकास प्राधिकरणों की भ्रष्टाचार को पालने-पोषने वाली नीति, इन सभी ने योगी जी को यह समझने में मदद की है कि भ्रष्टाचारियों के कॉकश को तोड़ पाना उतना आसान नहीं है जितना वो समझे बैठे थे।
संभवत: इसीलिए गत शुक्रवार को लखनऊ के लोकभवन में आवास एवं शहरी नियोजन विभाग की प्रस्तावित शमन योजना को देखकर सीएम योगी आदित्नाथ ने अधिकारियों से कहा कि वह अलग-अलग टीमें बनाकर अवैध निर्माण को चिन्हित कर शमन शुल्क वसूलें। इसके लिए एक पारदर्शी व्यवस्था बनाई जाए ताकि इसकी आड़ में अवैध कमाई न की जा सके।
सीएम योगी ने यह भी कहा कि जिन अधिकारियों के कार्यकाल में अवैध कॉलोनियों बसाई गई हैं और बेखौफ अवैध निर्माण हुए हैं, उनकी जवाबदेही तय की जाए क्योंकि ये निर्माण विवाद के बड़े कारण बने हुए हैं।
योगी आदित्नाथ का यह कथन स्पष्ट करता है कि उन्हें आवास एवं शहरी नियोजन विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार की जानकारी तो है ही, वह इतना भी जानते हैं कि इससे जुड़े लोगों के संरक्षण से ही अवैध कॉलोनियां तथा अवैध निर्माण होते हैं।
वैसे देखा जाए तो भ्रष्टाचार को लेकर जीरो टॉलरेंस की नीति पर चलने वाली योगी आदित्यनाथ सरकार ने आवास एवं शहरी नियोजन विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार को महसूस करने में जरूरत से ज्यादा वक्त लगा दिया अन्यथा ‘पब्लिक डोमेन’ में विकास प्राधिकरण का नाम बहुत पहले से ‘विनाश प्राधिकरण’ प्रचलित है और नगर पालिकाओं को ‘नरक पालिका’ कहा जाता है।
उत्तर प्रदेश इस देश का सबसे बड़ा सूबा है इसलिए इसके एक-एक शहर और कस्बे की कुंडली निकालना थोड़ा जटिल है, लेकिन उन प्रमुख शहरों से प्रदेश की स्थिति को भलीभांति समझा जा सकता है जिन पर योगी सरकार का पूरा ‘फोकस’ बना हुआ है।
ऐसे ही शहरों में शुमार है योगीराज भगवान श्रीकृष्ण की पावन जन्मस्थली का गौरव प्राप्त विश्व विख्यात धार्मिक नगरी मथुरा।
एक ओर हरियाणा तथा दूसरी ओर राजस्थान की सीमा से लगा एवं राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के करीब और यमुना नदी के किनारे बसा यह तीर्थस्थल चूंकि पर्यटन की दृष्टि से भी अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त है लिहाजा वर्षभर यहां लोगों का आगमन बना रहता है।
इसके अलावा यह जनपद निवेशकों को भी आकर्षित करता रहा है इसलिए यहां जमीनी कारोबार पिछले कुछ वर्षों के अंदर काफी फला-फूला है।
किसी भी प्रदेश के विकास में वहां की डेवलपमेंट अथॉरिटी का बड़ा हाथ होता है इसलिए मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण का भी दायरा बढ़ाते हुए योगी सरकार ने एक ऐसे अधिकारी को उसका उपाध्यक्ष नियुक्त किया जो ब्रज तीर्थ विकास परिषद उत्तर प्रदेश का मुख्य कार्यपालक अधिकारी यानी CEO भी है।
यही नहीं, प्रदेश सरकार ने ब्रज तीर्थ विकास परिषद उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष पद पर अवकाश प्राप्त आईपीएस अधिकारी शैलजाकांत मिश्र को तैनात किया।
यहां यह जान लेना जरूरी है कि ये दोनों अधिकारी मथुरा के मिजाज से भलीभांति परिचित हैं।
पीपीएस अधिकारी नागेन्द्र प्रताप की अब तक की नौकरी का एक बड़ा हिस्सा मथुरा-आगरा में ही कटा है और शैलजाकांत मिश्र भी पूर्व में मथुरा पुलिस के मुखिया रहे हैं।
शैलजाकांत मिश्र का ‘देवरहा बाबा’ और उनके आश्रम से भी गहरा नाता रहा इसलिए मथुरा से जाने के बावजूद उनका इस तीर्थस्थल तथा ब्रजवासियों से संबंध कभी टूटा नहीं।
‘योगीराज’ में इन दोनों अधिकारियों को पर्याप्त अधिकार मिले हुए हैं, साथ ही मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण और ब्रज तीर्थ विकास परिषद एक-दूसरे के पूरक हैं। बावजूद इसके जनपद का कितना व कैसा विकास हुआ है, इसके बारे में कुछ बताने की जरूरत नहीं रह जाती।
ब्रज तीर्थ विकास परिषद के दोनों आला अधिकारियों ने मथुरा-वृंदावन-गोवर्धन या बरसाना का कोई उल्लेखनीय विकास भले ही न किया हो परंतु आरोप-प्रत्यारोप में बराबर जरूर उलझे हुए हैं।
जहां तक सवाल विकास प्राधिकरण का है तो सैकड़ों अवैध कॉलोनियों का जाल इस धर्मनगरी में फैला हुआ है। अधिकृत पॉश कॉलोनियों में भी मनमाना निर्माण कार्य कराने के लिए बिल्डर और मकान मालिक स्वतंत्र हैं।
यदि किसी बिल्डर को तीन मल्टी स्टोरी इमारत खड़ी करने की इजाजत मिली है तो उसने विकास प्राधिकरण की मिलीभगत से छ: मल्टी स्टोरी इमारतें खड़ी कर ली हैं लिहाजा उन्हें लेकर वैसे ही विवाद लंबित हैं जिनका जिक्र सीएम योगी आदित्यनाथ ने अपनी मीटिंग में अधिकारियों से किया।
होटल, गेस्ट हाउस, मैरिज होम्स, अत्याधुनिक आश्रम, व्यावसायिक शोरूम आदि का निर्माण धड़ल्ले से वाहन पार्किंग की जगह छोड़े बिना हो रहा है।
नया बस अड्डा क्षेत्र, पुराने बस अड्डे का इलाका, मसानी-हाईवे लिंक रोड, वृंदावन का रमणरेती रोड, गोवर्धन-मथुरा मार्ग तथा आन्यौर परक्रिमा मार्ग सहित शहर का व्यस्ततम इलाका और नेशनल हाईवे व शहर दोनों से सटा हुआ कृष्णा नगर का मार्केट इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।
समूचा शहर और यहां तक कि मथुरा की सीमा के अंदर वाला नेशनल हाईवे भी इसी कारण पूरे-पूरे दिन जाम से जूझता रहता है।
सर्वविदित है कि जेब भारी हो तो मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण से कैसा भी नक्शा पास कराना कोई मुश्किल काम नहीं है।
रिहायशी इलाके में टू व्हीलर, थ्रीव्हीलर, फोर व्हीलर और यहां तक कि ट्रैक्टर्स तक के शोरूम बने खड़े हैं क्योंकि विकास प्राधिकरण के अधिकारी सिर्फ और सिर्फ अपना विकास करने में मस्त हैं।
इन शोरूम्स में परमीशन के बिना अपनी जरूरत के हिसाब से परिवर्तन होते भी हर कोई देख सकता है सिवाय विकास प्राधिकरण के। मॉल, इंस्टीट्यूट एवं शिक्षण संस्थाएं हों या व्यावसायिक इमारतें, किसी के लिए एनओसी लिए बिना विकास प्राधिकरण से परमीशन लेना आसान है।
तकरीबन यही स्थिति नगर पालिकाओं एवं नगर निगमों की है। प्रदेशभर में इनकी कार्यप्रणाली बदनाम है क्योंकि यहां की ईंट-ईंट पैसा मांगती है।
मथुरा-वृंदावन जैसे विश्व प्रसिद्ध धार्मिक स्थल का विकास प्राधिकरण, हड़िया के चावल की तरह उदाहरण मात्र है वरना पूरे प्रदेश की स्थिति इससे कुछ अलग नहीं है। यूपी के “राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र” (एनसीआर) से लेकर प्रदेश की राजधानी लखनऊ तक के हालात कमोबेश एक जैसे हैं और इसीलिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शहरी नियोजन विभाग की बैठक में अधिकारियों को स्पष्ट आदेश दिए कि अवैध निर्माण ध्वस्त करने या शमन शुल्क वसूलने की आड़ में अनैतिक कमाई का धंधा और जोर-शोर से शुरू न हो।
सीएम योगी आदित्यनाथ ने भले ही अधिकारियों को कितने ही सख्त आदेश-निर्देश क्यों न दिए हों, परंतु जमीनी हकीकत इससे बदलने वाली नहीं हैं।
शिकायत और जांच से शुरू होने वाला सिलसिला जब तक किसी नतीजे पर पहुंचता है तब तक तो सरकारें बदल जाती हैं।
नोएडा के बुद्धा सर्किट में लगी मूर्तियों के भ्रष्टाचार की जांच हो या फिर गोमती रिवर फ्रंट के निर्माण में हुए घोटाले की, नतीजा सबके सामने है।
सरकार बनने पर मायावती को जेल भेजने का ऐलान करने वाले सपा के तत्कालीन मुखिया मुलायम सिंह आज किसी लायक नहीं रहे तथा पिता की कृपा से अपरिपक्व उम्र में मुख्यमंत्री बनने वाले अखिलेश यादव पिछले विधानसभा चुनाव में मायावती की उंगली पकड़ कर सत्ता पाने का ख्वाब पालते दिखे।
इससे पहले पूर्ण बहुमत के साथ यूपी की बागडोर संभालने वाली बसपा प्रमुख मायावती ने कल्पना भी नहीं की थी कि पूर्ण बहुमत के साथ ही कभी सपा भी सरकार बना सकती है।
इनमें से किसी ने शायद ही यह सोचा हो कि सपा-बसपा के नायाब गठबंधन को धता बताकर जनता भाजपा का पूरे सम्मान के साथ राजतिलक कर देगी।
और शायद ही किसी के दिमाग में यह बात भी आई हो कि गेरुआ वस्त्र पहननने वाला गोरखनाथ मंदिर का एक महंत देश के सबसे बड़े प्रदेश की सत्ता संभालेगा।
राजनीति में उलटबांसियों का यह खेल ही उसे जितना रोचक बनाता है, उतना ही चौंकाता भी है।
ढाईसाल से अधिक का ”योगीराज” बीत चुका है। इसे आधा गिलास भरा और आधा गिलास खाली जैसी स्थिति भी कह सकते हैं। आधे से अधिक का समय बीत जाने पर भी यदि भ्रष्टाचार के मामले में जीरो टॉलरेंस की नीति परवान नहीं चढ़ पाई तो इतना तय है कि आगे आने वाले ढाई साल बहुत आसान नहीं होंगे।
योगी आदित्यनाथ को यदि वाकई भ्रष्टाचारियों पर प्रभावी अंकुश लगाना है तो उन्हें ‘सत्ता के मठ’ से स्वयं बाहर आना होगा। हड़िया के पूरे चावल न सही, किंतु कुछ चावलों को देखकर पता करना होगा कि अधिकारी उनके आदेश-निर्देशों की तपिश महसूस कर भी रहे हैं या नहीं।
कहीं ऐसा तो नहीं तो भ्रष्टाचार की जीरो टॉलरेंस वाली उनकी नीति को ही हथियार बनाकर अधिकारी व कर्मचारी दोनों हाथों से लूट करने में लगे हों। सख्ती का असर कई मर्तबा इस रूप में भी सामने आता है, यह कोई रहस्योद्घाटन नहीं है।
योगी सरकार को समय रहते यह भी समझना होगा रेत की तरह समय हाथ से फिसलता जा रहा है जबकि अभी बहुत सी चुनौतियों शेष हैं।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी



