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मंगलवार, 8 अक्टूबर 2024
डालमिया बाग का एंग्रीमेंट कैंसिल करने की खबर से परेशान माफिया अब मीडिया को मैनेज करने में जुटा
मथुरा। वृंदावन के डालमिया बाग का एग्रीमेंट कैंसिल करने की खबर से परेशान माफिया अब मीडिया को मैनेज करने में जुट गया है, क्योंकि एग्रीमेंट कैंसिल होने की खबर के बाद निवेशकों ने उस पर पैसा लौटाने के लिए अच्छा-खासा दबाव बनाना शुरू कर दिया है। सैकड़ों हरे पेड़ों को काटने की जिम्मेदारी लेने से भी भाग रहे माफिया ने आज तक न तो अपने ''कथित नंबर एक'' में हुए सौदे की सच्चाई सामने रखी है और न ये बताया है कि आखिर डालमिया परिवार से उसके बगीचे का एग्रीमेंट किस-किसने किया तथा किन शर्तों पर किया।
ऐसे में अब इस पूरे सौदे पर उठ रहे कुछ ऐसे सवाल ''माफिया'' से लेकर ''मीडिया'' तक को सवालों के घेरे में ले रहे हैं जिनका जवाब देना उनके लिए जरूरी हो जाता है, और यदि वो उसके जवाब नहीं देते तो उनकी नीयत स्वत: संदिग्ध साबित हो जाती है।
कहा जा रहा है कि डालमिया परिवार ने अपने बाग का सौदा आठ समझौता पत्रों (एग्रीमेंट) के जरिए किया तथा हर एग्रीमेंट के साथ एक निर्धारित रकम ली गई और डालिमया परिवार ने एग्रीमेंट में मिली इस रकम का आयकर तक जमा कर दिया। एग्रीमेंट करने वालों ने शंकर सेठ से सौदा बाद में किया।
बस यहीं से माफिया के साथ-साथ मीडिया की भी नीयत में खोट नजर आने लगता है और ये खोट बहुत महत्वपूर्ण सवाल खड़े करता है।
सवाल नंबर एक: यदि डालमिया परिवार से आठ समझौता पत्रों के जरिए पूरी नेक नीयत से सौदा किया गया है तो दोनों ही पक्षों को यानी विक्रेता और क्रेता को उसे सार्वजनिक करने में हर्ज क्या है?
सवाल नंबर दो: किसी भी सौदे का एग्रीमेंट कर लेने भर से वह इनकम टैक्स तो क्या किसी भी टैक्स के दायरे में नहीं आ जाता, यह बात छोटे से छोटा व्यापारी भी जानता है। तो फिर डालमिया परिवार ने डील फाइनल हुए बिना मात्र एडवांस पर इनकम टैक्स कैसे जमा कर दिया जबकि यह तो ''जीएसटी तथा कैपिटल गेन'' का भी मामला नहीं बनता। इस बात की पुष्टि किसी भी चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) से की जा सकती है।
सवाल नंबर तीन: कहीं ऐसा तो नहीं कि यह सारा खेल मीडिया को मैनेज करके निवेशकों को गुमराह करने के लिए खेला जा रहा हो जिससे किसी भी तरह अपने ऊपर पड़ रहे दबाव को कम किया जा सके।
सवाल नंबर चार: जब डालमिया परिवार से सौदा बाकायदा एग्रीमेंट करके किया गया है और हर एग्रीमेंट के साथ एक निर्धारित रकम उसे दी गई है तो शंकर सेठ ने भी अपना सौदा स्थानीय खरीदारों से किसी न किसी एग्रीमेंट के साथ किया होगा। शंकर सेठ ने भी अपनी रकम सुरक्षित करने के लिए कोई न कोई लिखा-पढ़ी कराई होगी। तो फिर पेड़ कटने के बाद से लेकर अब तक शंकर सेठ क्यों कह रहा है कि उसका इस सौदे से कोई वास्ता नहीं है और पेड़ों को काटने में उसकी किसी भूमिका का प्रश्न ही पैदा नहीं होता। जमानत के लिए कोर्ट में भी उसके वकीलों द्वारा यही दलील क्यों दी गई।
सवाल नंबर पांच: यदि डालमिया परिवार से लेकर एग्रीमेंट कराने वालों तक और उनसे लेकर शंकर सेठ तक सब के सब पाक साफ हैं, सौदा भी पूरी ईमानदारी से नंबर एक में हुआ है तो सब मिलकर क्यों एक प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं कर देते। क्यों नहीं बता देते कि एक रियल एस्टेट प्रोजेक्ट खड़ा करने के लिए यह सौदा किया गया है और सौदे में कोई बदनीयत नहीं है।
इस प्रेस कॉन्फ्रेस में सब अपनी-अपनी भूमिका भी साफ कर सकते हैं। उसके बाद मुद्दा रह जाएगा केवल सैकड़ों हरे वृक्षों को रातों-रात काट डालने का, तो उसकी जांच चलती रहेगी। एनजीटी में दायर याचिकाओं का भी समय पर निपटारा हो ही जाएगा।
और आखिरी सवाल यह कि शंकर सेठ की रियल एस्टेट फर्म गुरूकृपा तपोवन के नाम से जो नक्शा मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के पास भेजा गया है, वो किसने और किस अधिकार से दाखिल किया है?
सच तो यह है कि इनमें से किसी भी सवाल का जवाब देना आसान नहीं है इसलिए सारे सफेदपोश अपना मुंह छिपाए घूम रहे हैं और अब तक किसी ने सीना ठोक कर नहीं कहा कि सौदा उसने किया है।
बेशक जमीन का सौदा करना गुनाह नहीं, लेकिन वह तब गुनाह बन जाता है जब उसके लिए कानून को ताक पर रखकर नियम विरुद्ध ऐसे-ऐसे काम किए जाएं जो एक ओर अपराध की परिधि में आते हों तथा दूसरी ओर उनसे एक बड़े वर्ग की भावनाएं भी आहत होती हों।
मीडिया को भी अब एक बात और साफ कर देनी चाहिए कि कब तक वह अतार्किक बातें छापता रहेगा और कब तक सफेदपोशों को बचाने के लिए अपने जमीर का सौदा करता रहेगा।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
रविवार, 25 अक्टूबर 2020
पत्रकारों को विशेष संदेश देता है “विजय दशमी” का पर्व, बशर्ते ध्यान दें
विजय दशमी…असत्य पर सत्य और अत्याचार पर सदाचार की विजय का प्रतीक पर्व… आज के दौर की पत्रकारिता तथा पत्रकारों को विशेष संदेश देता है।
मर्यादा पुरुषोत्तम का संदेश बहुत स्पष्ट है कि मर्यादा में रहकर भी असत्य और अत्याचार पर विजय हासिल की जा सकती है किंतु शक्ति की उपासना के साथ।शक्ति और सामर्थ्य का अहसास कराए बिना विजय हासिल कर पाना संभव नहीं है।
“प्रेस” से “मीडिया” और “मीडिया” से “मीडिएटर” में तब्दील हो चुके इस एक “शब्द” का निहितार्थ समझना और समय की मांग को देखते हुए अपने ‘शब्दों’ की ताकत को पुनर्स्थापित करना जरूरी हो गया है अन्यथा भावी अनर्थ को रोक पाना असंभव हो जाएगा।
चाटुकारिता कभी पत्रकारिता का पर्याय नहीं होती और मर्यादा कभी शक्तिहीन व श्रीहीन नहीं बनाती। यदि ऐसा होता तमाम आसुरी शक्तियों का वध करने वाले श्रीराम… ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ नहीं कहलाते।
वो मर्यादा पुरुषोत्तम इसीलिए हैं क्योंकि उन्होंने शक्ति और सामर्थ्य का इस्तेमाल वहां किया, जहां करना जरूरी था। न खुद उसे किसी पर जाया किया न अपने सहयोगियों को जाया करने दिया।
और जब लंका विजय में बाधा बनकर खड़े समुद्र ने अनेक अनुनय-विनय को अनसुना किया तो लक्ष्मण को ये बताने से भी नहीं चूके कि-
विनय न मानत जलधि जड़, गये तीन दिन बीत।
बोले राम सकोप तब, भय बिन होय न प्रीति।।
माना कि आज की पत्रकारिता कोई मिशन ने रहकर व्यवसाय बन चुकी है, बावजूद इसके उसका धर्म नहीं बदला।
व्यावसायिकता के इस दौर में भी यह समझना होगा कि कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए और अधिकारों का अतिक्रमण किए बिना किस प्रकार इस धर्म का पालन किया जा सकता है।
“दुम हिलाने वालों के सामने टुकड़ा तो उछाला जाता है किंतु उन्हें सम्मान नहीं दिया जाता। सम्मान के साथ हक हासिल करने के लिए धर्म और कर्म को समझना समय की सबसे बड़ी मांग है।”
कर्तव्य के पथ पर भी वहीं निरंतर अग्रसर हो सकता है जो धर्म और कर्म के मर्म को समझे, अन्यथा पत्रकारिता की जो गति आज बन चुकी है उसकी दुर्गति कहीं अधिक भयावह हो सकती है।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
शनिवार, 5 मई 2018
टीआरपी के लिए हमारा इतना नीचे गिरना तो बनता है
यदि आपने कभी कतई सड़क छाप लोगों को आपस में लड़ते-भिड़ते और गाली-गलौज करते नहीं देखा-सुना तो यह खबर आपके लिए नहीं है।
यदि आपने कभी किसी को नमक से नमक खाते हुए नहीं देखा, तो भी यह खबर आपके मतलब की नहीं है।
और अगर कभी आपने किसी आदतन अपराधी को कोर्ट में यह दलील देते हुए नहीं पाया कि तमाम लोग अपराध करते हैं इसलिए मैं भी अपराध करता हूं, तो फिर यह खबर आपके किसी काम की नहीं क्योंकि यह खबर ऐसे ही लोगों के बारे में है।
उन लोगों के बारे में जो टीवी पर बैठकर सड़क छाप लोगों से भी गई-गुजरी भाषा का इस्तेमाल करते हैं। उन्हीं लोगों की तरह हर वक्त अशिष्टता करने पर आमादा रहते हैं।
जो नमक से नमक खाने की कोशिश को जायज ठहराने के साथ-साथ ऐसा करने की लगातार कोशिश भी करते हैं।
जो हर सवाल का हमेशा एक ही जवाब देते हैं कि दूसरों ने ऐसा किया इसलिए हम भी कर रहे हैं, अथवा हमने जो किया वही दूसरे भी कर रहे हैं तो फिर गलत क्या किया।
दरअसल, इन दिनों ऐसे तत्वों को विभिन्न टीवी चैनल पैनल डिस्कशन के नाम पर अपना मंच प्रदान करा रहे हैं। जिन्ना की तस्वीर टांगने जैसा कोई घटिया सा मुद्दा हो या फिर संवैधानिक संस्थाओं पर उंगली उठाने जैसा गंभीर मामला ही क्यों न हो। घटिया से घटिया और गंभीर से गंभीर मुद्दे पर बहस के लिए टीवी चैनल्स के पास कुछ रटे-रटाए चेहरे हैं। यही चेहरे आप हर रोज चीखते-चिल्लाते और अपनी असलियत बताते देख सकते हैं। बहस का विषय बेशक हर दिन बदलता हो परंतु बहस में शामिल होने वाले चेहरे कभी नहीं बदलते।
टीवी चैनल्स पर कराई जाने वाली बहसों का स्तर ऐसा हो गया है कि बहुत से लोग तो टीवी से नफरत करने लगे हैं। जहां तक इनकी पत्रकारिता का सवाल है, तो शायद ही अब कोई ऐसा व्यक्ति मिले जो इन्हें देखते ही समूची पत्रकार बिरादरी को कोसने न लगता हो।
सोशल साइट्स गवाह हैं इस सच्चाई की कि लिपे-पुते चेहरे वाले मेल व फीमेल टीवी एंकर्स जो पत्रकार होने का मुगालता भी पाले रहते हैं, उनकी आम छवि कैसी बन चुकी है।
आश्चर्य तो यह है कि इनमें से कुछ टीवी एंकर्स खुद को सेलेब्रिटी समझने लगे हैं। उनकी मानें तो लोग उन्हें इसलिए ट्रोल करते हैं, पीछा करते हैं, फोटो खींचते हैं और गरियाते भी हैं क्योंकि वह बहुत प्रसिद्ध हैं।
इन टीवी एंकर्स की नजर में कुख्यात और प्रख्यात शायद एक ही शब्द है, न कि विरोधाभाषी।
बहरहाल, आप किसी भी मुद्दे पर किसी भी टीवी चैनल की बहस का स्तर देख लीजिए। आपको आत्मसंतुष्टि होगी कि जिस प्रकार नेताओं की कोई जाति नहीं होती या यूं कह लीजिए कि हर नेता की एक ही जाति होती है, उसी प्रकार हर टीवी चैनल की बहस का स्तर भी समान होता है।
बहस की बदबू दूर-दूर तक मारक हो इसलिए अब तमाम टीवी चैनल अपने कथित पैनल डिस्कशन में पाकिस्तानियों तथा कश्मीर के अलगाववादियों को भी शामिल करने लगे हैं।
भारतीय टीवी चैनल्स की कृपा से पाकिस्तानी और उनके सरपरस्त चंद कश्मीरी सफेदपोश न सिर्फ अपना एजेंडा पूरे विश्व को बता जाते हैं बल्कि यह भी देख लेते हैं कि हमारे नेता भाषा के स्तर पर किस कदर कुत्तों के भोंकने से भी नीचे जा पहुंचे हैं।
टीवी चैनल्स की मानें तो वह पाकिस्तानियों एवं सफेदपोश आतंकवादियों को बहस का हिस्सा इसलिए बनाते हैं ताकि देश व देशवासियों को उनकी सोच का पता लग सके और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भी आंच न आए।
हो सकता है कि बहुत जल्द टीवी चैनल्स अपने इसी एजेंडे को आगे ले जाने के लिए उन सभी कुख्यात आतंकवादियों को भी बहस का हिस्सा बनाने लगें जो एक लंबे अरसे से भारत को तोड़ने की कोशिश में लगे हैं क्योंकि टीवी चैनल्स की नीति के अनुसार उनको भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उतना ही हक है जितना कि सैनिकों पर पत्थर बरसाने वाले कश्मीरियों का।
आगे आने वाले समय में अभिव्यक्ति की स्वछंदता के पक्षधर टीवी चैनल्स बलात्कारियों को भी बहस का हिस्सा बनाने लगें तो कोई आश्चर्य नहीं क्योंकि बलात्कारी भी तो दिखता इंसानों की तरह ही है। वह अंदर से भेड़िया हो तो हो।
किसी भी टीवी चैनल की बहस में शामिल पैनल को देख लीजिए। एक पार्टी का नेता कहेगा कि हमारे शासनकाल में इतने बलात्कार नहीं होते थे। आंकड़े गवाह हैं कि हमारे पिछले दस साल के कार्यकाल में बलात्कारों की संख्या इस शासनकाल में हो रहे बलात्कारों से काफी कम थी। इनके चार साला कार्यकाल में हुए बलात्कारों की संख्या से हमारे साठ साल के शासनकाल में हुए बलात्कारों की संख्या से तुलना करके देख लीजिए कि इनके बलात्कार कितने ऊपर जाएंगे और हमारे बलात्कार कितने नीचे थे। मुद्दा कोई भी हो, तुलनात्मक अध्ययन शुरू हो जाता है और फिर बहस, बहस न होकर तू-तू-मैं-मैं से होती हुई तू कुत्ता और तेरा बाप कुत्ता तक जा पहुंच जाती है।
कुल मिलाकर टीवी चैनल्स के सहयोग से सभी पार्टियां और उनके नेता देश की आंखों में धूल झोंक रहे हैं। टीवी चैनल्स से हटते ही ये कभी किसी रेस्तरां में तो कभी संसद अथवा विधानसभाओं के गलियारों में एक-दूसरे की पीठ खुजाते देखे जा सकते हैं। इसके लिए बहुत प्रयास नहीं करने पड़ते।
कोई टीवी चैनल हर दिन ताल ठोक रहा है तो कोई दंगल करा रहा है। कोई चक्रव्यूह में फंसा रहा है तो कोई मास्टर स्ट्रोक लगा रहा है। सबके अपने धंधे हैं और सबके अपने फंदे। देश तथा देशवासी जाएं भाड़ में। हम तो अपने धंधे और फंदे के लिए पाकिस्तानियों को भी मंच देंगे और उन कश्मीरियों को भी जो खाते यहां की हैं लेकिन बजाते पाकिस्तानियों की हैं।
हजारों बलात्कारियों में से सजा किसी एक आसाराम और एक राम रहीम को ही तो होती है, बाकी तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मजा लूट रहे हैं। टीआरपी के खेल में देश के साथ बलात्कार होता हो तो हो, हम तो सबको मंच देंगे क्योंकि हम मीडिया हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पहला हक हमारा है।
हम जानते हैं कि बलात्कार सिर्फ एक शरीर पर ही नहीं होता, आत्मा पर भी होता है। बलात किया गया हर कार्य बलात्कार की परिभाषा का हिस्सा है लेकिन यह ज्ञान दूसरों को बांटने के लिए है, खुद के लिए नहीं।
तीतर-बटेर लड़ाना हमारा पेशा है। ठीक उसी तरह जिस तरह वैश्यावृत्ति या देह व्यापार। शब्दों का फेर हो सकता है परंतु मूल में तो धंधा ही निहित है इसलिए कोई कुछ कहे, हम अपना धंधा जारी रखेंगे।
प्रेस से मीडिया और मीडिया से मीडिएटर का सफर ऐसे ही पूरा नहीं किया। उसके लिए बड़े पापड़ बेले हैं।
अब यदि हमारे प्लेटफार्म का उपयोग कोई लड़ने-भिड़ने, गाली-गलौज करने, अपने-अपने कुकर्मों का तुलनात्मक अध्ययन करने और नमक से नमक खाकर दिखाने की कलाकारी के लिए करता है तो हमें क्या।
तीतर-बटेर लड़ाकर, कुत्ते-बिल्लियों को भिड़ाकर और गुण्डे-मवालियों को बरगलाकर यदि अपना काम चलता है तो बुरा क्या है। आत्मा सुखी तो परमात्मा सुखी। चैनल की टीआरपी के लिए हमारा भी इतना नीचे गिरना तो बनता है।
-Legend News
यदि आपने कभी किसी को नमक से नमक खाते हुए नहीं देखा, तो भी यह खबर आपके मतलब की नहीं है।
और अगर कभी आपने किसी आदतन अपराधी को कोर्ट में यह दलील देते हुए नहीं पाया कि तमाम लोग अपराध करते हैं इसलिए मैं भी अपराध करता हूं, तो फिर यह खबर आपके किसी काम की नहीं क्योंकि यह खबर ऐसे ही लोगों के बारे में है।
उन लोगों के बारे में जो टीवी पर बैठकर सड़क छाप लोगों से भी गई-गुजरी भाषा का इस्तेमाल करते हैं। उन्हीं लोगों की तरह हर वक्त अशिष्टता करने पर आमादा रहते हैं।
जो नमक से नमक खाने की कोशिश को जायज ठहराने के साथ-साथ ऐसा करने की लगातार कोशिश भी करते हैं।
जो हर सवाल का हमेशा एक ही जवाब देते हैं कि दूसरों ने ऐसा किया इसलिए हम भी कर रहे हैं, अथवा हमने जो किया वही दूसरे भी कर रहे हैं तो फिर गलत क्या किया।
दरअसल, इन दिनों ऐसे तत्वों को विभिन्न टीवी चैनल पैनल डिस्कशन के नाम पर अपना मंच प्रदान करा रहे हैं। जिन्ना की तस्वीर टांगने जैसा कोई घटिया सा मुद्दा हो या फिर संवैधानिक संस्थाओं पर उंगली उठाने जैसा गंभीर मामला ही क्यों न हो। घटिया से घटिया और गंभीर से गंभीर मुद्दे पर बहस के लिए टीवी चैनल्स के पास कुछ रटे-रटाए चेहरे हैं। यही चेहरे आप हर रोज चीखते-चिल्लाते और अपनी असलियत बताते देख सकते हैं। बहस का विषय बेशक हर दिन बदलता हो परंतु बहस में शामिल होने वाले चेहरे कभी नहीं बदलते।
टीवी चैनल्स पर कराई जाने वाली बहसों का स्तर ऐसा हो गया है कि बहुत से लोग तो टीवी से नफरत करने लगे हैं। जहां तक इनकी पत्रकारिता का सवाल है, तो शायद ही अब कोई ऐसा व्यक्ति मिले जो इन्हें देखते ही समूची पत्रकार बिरादरी को कोसने न लगता हो।
सोशल साइट्स गवाह हैं इस सच्चाई की कि लिपे-पुते चेहरे वाले मेल व फीमेल टीवी एंकर्स जो पत्रकार होने का मुगालता भी पाले रहते हैं, उनकी आम छवि कैसी बन चुकी है।
आश्चर्य तो यह है कि इनमें से कुछ टीवी एंकर्स खुद को सेलेब्रिटी समझने लगे हैं। उनकी मानें तो लोग उन्हें इसलिए ट्रोल करते हैं, पीछा करते हैं, फोटो खींचते हैं और गरियाते भी हैं क्योंकि वह बहुत प्रसिद्ध हैं।
इन टीवी एंकर्स की नजर में कुख्यात और प्रख्यात शायद एक ही शब्द है, न कि विरोधाभाषी।
बहरहाल, आप किसी भी मुद्दे पर किसी भी टीवी चैनल की बहस का स्तर देख लीजिए। आपको आत्मसंतुष्टि होगी कि जिस प्रकार नेताओं की कोई जाति नहीं होती या यूं कह लीजिए कि हर नेता की एक ही जाति होती है, उसी प्रकार हर टीवी चैनल की बहस का स्तर भी समान होता है।
बहस की बदबू दूर-दूर तक मारक हो इसलिए अब तमाम टीवी चैनल अपने कथित पैनल डिस्कशन में पाकिस्तानियों तथा कश्मीर के अलगाववादियों को भी शामिल करने लगे हैं।
भारतीय टीवी चैनल्स की कृपा से पाकिस्तानी और उनके सरपरस्त चंद कश्मीरी सफेदपोश न सिर्फ अपना एजेंडा पूरे विश्व को बता जाते हैं बल्कि यह भी देख लेते हैं कि हमारे नेता भाषा के स्तर पर किस कदर कुत्तों के भोंकने से भी नीचे जा पहुंचे हैं।
टीवी चैनल्स की मानें तो वह पाकिस्तानियों एवं सफेदपोश आतंकवादियों को बहस का हिस्सा इसलिए बनाते हैं ताकि देश व देशवासियों को उनकी सोच का पता लग सके और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भी आंच न आए।
हो सकता है कि बहुत जल्द टीवी चैनल्स अपने इसी एजेंडे को आगे ले जाने के लिए उन सभी कुख्यात आतंकवादियों को भी बहस का हिस्सा बनाने लगें जो एक लंबे अरसे से भारत को तोड़ने की कोशिश में लगे हैं क्योंकि टीवी चैनल्स की नीति के अनुसार उनको भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उतना ही हक है जितना कि सैनिकों पर पत्थर बरसाने वाले कश्मीरियों का।
आगे आने वाले समय में अभिव्यक्ति की स्वछंदता के पक्षधर टीवी चैनल्स बलात्कारियों को भी बहस का हिस्सा बनाने लगें तो कोई आश्चर्य नहीं क्योंकि बलात्कारी भी तो दिखता इंसानों की तरह ही है। वह अंदर से भेड़िया हो तो हो।
किसी भी टीवी चैनल की बहस में शामिल पैनल को देख लीजिए। एक पार्टी का नेता कहेगा कि हमारे शासनकाल में इतने बलात्कार नहीं होते थे। आंकड़े गवाह हैं कि हमारे पिछले दस साल के कार्यकाल में बलात्कारों की संख्या इस शासनकाल में हो रहे बलात्कारों से काफी कम थी। इनके चार साला कार्यकाल में हुए बलात्कारों की संख्या से हमारे साठ साल के शासनकाल में हुए बलात्कारों की संख्या से तुलना करके देख लीजिए कि इनके बलात्कार कितने ऊपर जाएंगे और हमारे बलात्कार कितने नीचे थे। मुद्दा कोई भी हो, तुलनात्मक अध्ययन शुरू हो जाता है और फिर बहस, बहस न होकर तू-तू-मैं-मैं से होती हुई तू कुत्ता और तेरा बाप कुत्ता तक जा पहुंच जाती है।
कुल मिलाकर टीवी चैनल्स के सहयोग से सभी पार्टियां और उनके नेता देश की आंखों में धूल झोंक रहे हैं। टीवी चैनल्स से हटते ही ये कभी किसी रेस्तरां में तो कभी संसद अथवा विधानसभाओं के गलियारों में एक-दूसरे की पीठ खुजाते देखे जा सकते हैं। इसके लिए बहुत प्रयास नहीं करने पड़ते।
कोई टीवी चैनल हर दिन ताल ठोक रहा है तो कोई दंगल करा रहा है। कोई चक्रव्यूह में फंसा रहा है तो कोई मास्टर स्ट्रोक लगा रहा है। सबके अपने धंधे हैं और सबके अपने फंदे। देश तथा देशवासी जाएं भाड़ में। हम तो अपने धंधे और फंदे के लिए पाकिस्तानियों को भी मंच देंगे और उन कश्मीरियों को भी जो खाते यहां की हैं लेकिन बजाते पाकिस्तानियों की हैं।
हजारों बलात्कारियों में से सजा किसी एक आसाराम और एक राम रहीम को ही तो होती है, बाकी तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मजा लूट रहे हैं। टीआरपी के खेल में देश के साथ बलात्कार होता हो तो हो, हम तो सबको मंच देंगे क्योंकि हम मीडिया हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पहला हक हमारा है।
हम जानते हैं कि बलात्कार सिर्फ एक शरीर पर ही नहीं होता, आत्मा पर भी होता है। बलात किया गया हर कार्य बलात्कार की परिभाषा का हिस्सा है लेकिन यह ज्ञान दूसरों को बांटने के लिए है, खुद के लिए नहीं।
तीतर-बटेर लड़ाना हमारा पेशा है। ठीक उसी तरह जिस तरह वैश्यावृत्ति या देह व्यापार। शब्दों का फेर हो सकता है परंतु मूल में तो धंधा ही निहित है इसलिए कोई कुछ कहे, हम अपना धंधा जारी रखेंगे।
प्रेस से मीडिया और मीडिया से मीडिएटर का सफर ऐसे ही पूरा नहीं किया। उसके लिए बड़े पापड़ बेले हैं।
अब यदि हमारे प्लेटफार्म का उपयोग कोई लड़ने-भिड़ने, गाली-गलौज करने, अपने-अपने कुकर्मों का तुलनात्मक अध्ययन करने और नमक से नमक खाकर दिखाने की कलाकारी के लिए करता है तो हमें क्या।
तीतर-बटेर लड़ाकर, कुत्ते-बिल्लियों को भिड़ाकर और गुण्डे-मवालियों को बरगलाकर यदि अपना काम चलता है तो बुरा क्या है। आत्मा सुखी तो परमात्मा सुखी। चैनल की टीआरपी के लिए हमारा भी इतना नीचे गिरना तो बनता है।
-Legend News
शनिवार, 16 सितंबर 2017
धर्म के धंधे में मीडिया भी है पूरी तरह सहभागी
धर्म के धंधे में नेताओं के साथ-साथ मीडिया भी पूरी तरह सहभागी था, सहभागी
है और आगे भी पता नहीं कब तक सहभागी रहेगा क्योंकि मीडिया ने अपने गिरेबान
में झांकने की जरूरत अब भी महसूस नहीं की है। हालांकि हरियाणा के बवाल में
मीडिया डेरा समर्थकों के निशाने पर रहा लेकिन लगता नहीं कि उससे मीडिया ने
कोई सबक सीखा हो।
डेरा सच्चा सौदा प्रमुख बाबा गुरमीत राम रहीम सिंह इंसा को दो साध्वियों के साथ दुराचार के मामले में 20 साल की सजा हो गई। दुराचार के ही मामले में आसाराम बापू सलाखों के पीछे है। हरियाणा का ही एक अन्य कथित संत रामपाल भी जेल में बंद है। नित्यानंद तथा भीमानंद जैसे दुष्कर्मियों के केस फिलहाल अदालतों में लंबित हैं।
दुराचार के आरोपी रहे कृपालु महाराज अब इस दुनिया में नहीं हैं। देश ही नहीं, देश के बाहर तक महिला यौन उत्पीड़न के आरोपी रहे कृपालु महाराज की त्रिनिदाद एण्ड टोबेगो में गिरफ्तारी भी हुई थी।
कृपालु महाराज के शिष्य प्रकाशानंद को यौन उत्पीड़न के केसों में दोषी ठहराए जाने के बाद अमरीकी पुलिस आज तक तलाश रही है।
”कृपालु महाराज” का यह शिष्य दरअसल दो युवा लड़कियों का यौन उत्पीड़न करने के मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद अमरीकी अदालत को चकमा देकर भाग खड़ा हुआ। प्रकाशानंद को टेक्सास की हेज काउन्टी ज्यूरी द्वारा 14 वर्ष के कारावास की सजा सुनाई गई थी।
इस्लामिक उपदेशक जाकिर नाइक धर्म की आड़ में किस तरह लोगों को आतंकवाद के लिए प्रेरित करता था और किस तरह उसने धर्म को धंधा बनाकर बेहिसाब संपत्ति अर्जित कर ली, इसका भी खुलासा हो चुका है और अब वह कानून की गिरफ्त में है।
इस्लामिक रिसर्च फांउडेशन की आड़ में वह क्या रिसर्च कर रहा था, इसकी पोल तब खुली जब बांग्लादेश में पकड़े गए आतंकियों ने बताया कि वह जाकिर नाइक के उपदेशों से प्रेरित थे।
ईसाई धर्म में भी अंधश्रद्धा और पाखंड की भरमार है। विभिन्न ईसाई धर्मगुरुओं पर उनके क्रिया-कलापों को लेकर उंगलियां उठती रही हैं। भारत को अपना कार्यक्षेत्र बनाने वाली नन मदर टेरेसा भी पूरी तरह निर्विवाद नहीं रहीं।
स्वर्ण मंदिर पर हुए ऑपरेशन ब्ल्यू स्टार में मारा गया आतंकवादी जरनैल सिंह भिंडरावाला भी खुद को ताजिंदगी बतौर सिख धर्मगुरू पेश करता रहा। मंदिर को वह अपना अड्डा भी सिख धर्म की आड़ लेकर बना पाया।
दिव्य पाठ और अपने बीज मंत्रों से लोगों की असाध्य बीमारियों को ठीक करने तथा जीवन के हर क्षेत्र में असफल रहने वाले लोगों को सफलता दिलाने का दावा करने वाला ”कुमार स्वामी” भी भले ही अभी कानून की पकड़ से दूर हो लेकिन गतिविधियां उसकी भी पूरी तरह संदिग्ध हैं।
बाबा जयगुरुदेव भी धर्मगुरुओं की ऐसी ही फेहरिस्त का हिस्सा था जिसने अपने अंधभक्तों को सतयुग आने का सपना दिखाकर अरबों की संपत्ति इकठ्ठी की। यह बात अलग है कि न सिर्फ बाबा जयगुरुदेव की संदिग्ध मौत हुई बल्कि उसके अनुयाई आज उसकी विरासत के लिए एक-दूसरे की जान के दुश्मन बने हुए हैं।
बाबा जयगुरुदेव द्वारा हड़पी गई सरकारी और गैर सरकारी जमीन से बाबा के अनुयायियों को बेदखल करने के लिए अब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़े आदेश जारी किए हैं।
280 एकड़ में फैले सरकारी उद्यान विभाग को हड़पने की कोशिश में जयगुरुदेव के ही कथित शिष्य रामवृक्ष यादव ने किस तरह यहां खूनी खेल खेला और किस तरह दो पुलिस अधिकारियों की निर्मम हत्या कर दी, यह सर्वविदित है।
ये पुलिस अधिकारी भी कोर्ट के आदेश पर उद्यान विभाग से रामवृक्ष और उसके गुर्गों को बेदखल करने पहुंचे थे।
ऐसे सभी मामलों में इस बात की पुष्टि कदम-कदम पर हुई कि इनके सरगनाओं को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त था और राजनीतिक संरक्षण के चलते प्रशासन इनके सामने हाथ बांधे खड़ा रहा। वोट बैंक की राजनीति ने नेताओं को इनके सामने नतमस्तक रखने पर मजबूर किया।
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि राजनीति के संरक्षण से धर्म को धंधा बनाने वालों का एक लंबा इतिहास है और हर दौर में धर्म के धंधेबाज सक्रिय रहे हैं। इनके तौर-तरीके अलग-अलग हो सकते हैं किंतु मकसद सबका अधिक से अधिक दौलत एवं शौहरत बटोरना रहा।
लेकिन ऐसे सभी मामलों में एक सवाल हमेशा अनुत्तरित रह जाता है, और वह सवाल यह है कि धर्म के धंधेबाजों की हवस को परवान चढ़ाने में क्या मीडिया की कोई भूमिका नहीं है ?
क्या मीडिया उतना ही निष्पक्ष है जितना कि वह खुद को तब दिखाने की कोशिश करता है जब किसी कथित धार्मिक गुरू का काला चिठ्ठा सार्वजनिक होता है अथवा वो कानून के शिकंजे में फंसकर सलाखों के पीछे जाता है ?
सच तो यह है कि मीडिया सिर्फ सुर्खियां बटोरता है, अन्यथा वह धर्म के हर धंधेबाज को बुलंदियों तक पहुंचाने में पूरा सहयोग करता रहा है और अब भी कर रहा है।
इस दौर के मीडिया पर पूरी तरह बिकाऊ होने का ठप्पा आमजन यूं ही नहीं लगाने लगा। उसके पीछे ठोस वजह है।
किसी भी किस्म के मीडिया को देख लें। विज्ञापन के जरिए पैसा उगाहने की खातिर मीडिया जगत हर स्तर तक गिरने को बेताब रहता है। एक ओर वह सबकुछ जानते व समझते हुए भी विभिन्न उत्पादों के फर्जी दावों वाले विज्ञापन प्रकाशित व प्रसारित करता है तो वहीं दूसरी ओर धर्म को ”धंधे की तरह” ग्लैमराइज करके परोसने से भी कोई परहेज नहीं करता। मीडिया भली-भांति जानता है कि अंडरगारमेंट्स से लेकर परफ्यूम तक और तेल व साबुन से लेकर मिर्च-मसालों तक के विज्ञापनों में उनके दावों का सच्चाई से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है परंतु वह फिर भी दिन-रात उनका प्रसारण कर रहा है क्योंकि उसे विज्ञापनों के भ्रमजाल से नहीं, अपनी कमाई से मतलब है। यही कारण है कि जिस किसी उत्पाद को जब कभी परखा गया है, तब उसके बारे में किया गया हर दावा फर्जी साबित हुआ है।
रियल एस्टेट के कारोबार में आज बड़ी-बड़ी नामचीन कंपनियों का सामने आ रहा फर्जीवाड़ा क्या मीडिया की सहभागिता के बिना हो गया। मीडिया ने बिना किसी छानबीन के उनके विज्ञापन प्रकाशित व प्रसारित नहीं किए होते तो निश्चित ही इतनी बड़ी संख्या में लोग रियल एस्टेट कंपनियों के फ्रॉड का शिकार नहीं बनते। आज जिन बातों को लेकर कोर्ट उनके खिलाफ आदेश-निर्देश दे रहा है, यदि उनकी असलियत विज्ञापन निकालने से पहले पता कर ली होती तो अनेक लोग धोखाधड़ी का शिकार होने से बच सकते थे।
बात चाहे तंत्र-मंत्र के माध्यम से किसी महिला का प्यार दिलाने के दावेदार सड़क छाप बाबा बंगाली के विज्ञापन की हो अथवा मसाज पॉर्लर से हजारों रुपए रोज की कमाई कराने वाले विज्ञापन की, मोबाइल टावर लगवाने जैसी धोखाधड़ी के लिए विज्ञापन कराने की हो या फिर रंगीन मिजाज लोगों के लिए अश्लील बातें कराने के प्रचार-प्रसार की, मीडिया को किसी से गुरेज नहीं है। उसे गुरेज है तो इस बात से कि उसका धंधा न छिन जाए। बाकी तो पैसा देकर कोई कुछ भी प्रकाशित व प्रसारित कराने के लिए स्वतंत्र है।
कुमार स्वामी के शत-प्रतिशत झूठे दावों को लाखों रुपए लेकर जैकेट पेज विज्ञावन के रूप में प्रकाशित करने का काम भी मीडिया करता है और निर्मल बाबा द्वारा समौसे व चटनी से कैसी भी समस्या का समाधान कराने जैसे सोकॉल्ड सत्संगों को टीवी पर मीडिया ही दिखाता है।
आसाराम बापू की सारी सच्चाई सामने आ जाने के बावजूद उसके प्रवचनों को विज्ञापन बनाकर अब भी मीडिया लाखों रुपए की कमाई कर रहा है और विभिन्न तरीकों से तंत्र-मंत्र की दुकानें भी टीवी पर मीडिया ही चलवा रहा है।
शायद ही ऐसा कोई ‘फ्रॉड’ हो जिसमें विज्ञापन के माध्यम से मीडिया सहभागी न रहता हो लेकिन जब बात आती है उसे जिम्मेदार ठहराने की तो कहीं किसी कॉर्नर में एक छोटा सा डिस्क्लेमर देकर वह अपनी जिम्मेदारी पूरी कर लेता है।
पंचकूला की विशेष सीबीआई कोर्ट से गुरमीत राम-रहीम के खिलाफ आए निर्णय को मीडिया भले ही आज सुर्खियां बना रहा है और बोर करने की हद तक दिन-रात परोस रहा है किंतु कल यदि उसके कथित चमत्कारों का विज्ञापन मिलने लगेगा तो यही मीडिया उसे दिखाने में कोई परहेज, कोई शर्मिंदगी महसूस नहीं करेगा। कहीं किसी कोने में ”विज्ञापन” लिखकर वह डेरा सच्चा सौदा से लाखों रुपए कमाता रहेगा और अपनी दुकान उसी तरह पूरी बेशर्मी के साथ चलाऐगा जैसे कि कल तक राम-रहीम या आसाराम चलाता था। जिस तरह कृपालु की संस्था आज भी चला रही है और जिस तरह कुमार स्वामी भी अब तक चला रहा है।
सच पूछें तो कोई फर्क नहीं है ऐसे धर्म गुरुओं, व्यापारियों, कारोबारियों, नेताओं या मीडिया घरानों में। सबकी दुकानें एक-दूसरे के सहयोग से चलती हैं और शायद आगे भी चलती रहेंगी। कभी किसी कोर्ट का आदेश ज्वार-भाटा की तरह मीडिया की टीआरपी बढ़ाने के काम जरूर आ जाता है लेकिन जैसे ही उसका गुबार ठंडा होता है सब अपने-अपने धंधे में लग जाते हैं।
चार दिन ठहर जाइए, गुरमीत राम-रहीम की खबरें भी सिकुड़ कर सिर्फ सिंगल कॉलम और टिकर व फुटर पर चलने वाली पट्टियों तक सीमित रह जाएंगी।
ये बात अलग है कि निर्मल बाबा के समौसे, आसाराम के प्रवचन, कृपालु की कथाएं तथा राधे मां का ग्लैमरस धर्म, विज्ञापन के रूप में हमेशा मीडिया का हिस्सा बना रहेगा क्योंकि यहां भी सवाल धंधे का जो है। फिर धंधा चाहे धर्म का हो या अधर्म का, धंधा तो धंधा है। कीचड़ में पूरी तरह लिप्त रहकर कमल खिलाने की कला सिर्फ राजनीतिक पार्टियां ही नहीं जानतीं, मीडिया भी जानता है, और वह उसी कला का बखूबी इस्तेमाल कर रहा है।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
डेरा सच्चा सौदा प्रमुख बाबा गुरमीत राम रहीम सिंह इंसा को दो साध्वियों के साथ दुराचार के मामले में 20 साल की सजा हो गई। दुराचार के ही मामले में आसाराम बापू सलाखों के पीछे है। हरियाणा का ही एक अन्य कथित संत रामपाल भी जेल में बंद है। नित्यानंद तथा भीमानंद जैसे दुष्कर्मियों के केस फिलहाल अदालतों में लंबित हैं।
दुराचार के आरोपी रहे कृपालु महाराज अब इस दुनिया में नहीं हैं। देश ही नहीं, देश के बाहर तक महिला यौन उत्पीड़न के आरोपी रहे कृपालु महाराज की त्रिनिदाद एण्ड टोबेगो में गिरफ्तारी भी हुई थी।
कृपालु महाराज के शिष्य प्रकाशानंद को यौन उत्पीड़न के केसों में दोषी ठहराए जाने के बाद अमरीकी पुलिस आज तक तलाश रही है।
”कृपालु महाराज” का यह शिष्य दरअसल दो युवा लड़कियों का यौन उत्पीड़न करने के मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद अमरीकी अदालत को चकमा देकर भाग खड़ा हुआ। प्रकाशानंद को टेक्सास की हेज काउन्टी ज्यूरी द्वारा 14 वर्ष के कारावास की सजा सुनाई गई थी।
इस्लामिक उपदेशक जाकिर नाइक धर्म की आड़ में किस तरह लोगों को आतंकवाद के लिए प्रेरित करता था और किस तरह उसने धर्म को धंधा बनाकर बेहिसाब संपत्ति अर्जित कर ली, इसका भी खुलासा हो चुका है और अब वह कानून की गिरफ्त में है।
इस्लामिक रिसर्च फांउडेशन की आड़ में वह क्या रिसर्च कर रहा था, इसकी पोल तब खुली जब बांग्लादेश में पकड़े गए आतंकियों ने बताया कि वह जाकिर नाइक के उपदेशों से प्रेरित थे।
ईसाई धर्म में भी अंधश्रद्धा और पाखंड की भरमार है। विभिन्न ईसाई धर्मगुरुओं पर उनके क्रिया-कलापों को लेकर उंगलियां उठती रही हैं। भारत को अपना कार्यक्षेत्र बनाने वाली नन मदर टेरेसा भी पूरी तरह निर्विवाद नहीं रहीं।
स्वर्ण मंदिर पर हुए ऑपरेशन ब्ल्यू स्टार में मारा गया आतंकवादी जरनैल सिंह भिंडरावाला भी खुद को ताजिंदगी बतौर सिख धर्मगुरू पेश करता रहा। मंदिर को वह अपना अड्डा भी सिख धर्म की आड़ लेकर बना पाया।
दिव्य पाठ और अपने बीज मंत्रों से लोगों की असाध्य बीमारियों को ठीक करने तथा जीवन के हर क्षेत्र में असफल रहने वाले लोगों को सफलता दिलाने का दावा करने वाला ”कुमार स्वामी” भी भले ही अभी कानून की पकड़ से दूर हो लेकिन गतिविधियां उसकी भी पूरी तरह संदिग्ध हैं।
बाबा जयगुरुदेव भी धर्मगुरुओं की ऐसी ही फेहरिस्त का हिस्सा था जिसने अपने अंधभक्तों को सतयुग आने का सपना दिखाकर अरबों की संपत्ति इकठ्ठी की। यह बात अलग है कि न सिर्फ बाबा जयगुरुदेव की संदिग्ध मौत हुई बल्कि उसके अनुयाई आज उसकी विरासत के लिए एक-दूसरे की जान के दुश्मन बने हुए हैं।
बाबा जयगुरुदेव द्वारा हड़पी गई सरकारी और गैर सरकारी जमीन से बाबा के अनुयायियों को बेदखल करने के लिए अब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़े आदेश जारी किए हैं।
280 एकड़ में फैले सरकारी उद्यान विभाग को हड़पने की कोशिश में जयगुरुदेव के ही कथित शिष्य रामवृक्ष यादव ने किस तरह यहां खूनी खेल खेला और किस तरह दो पुलिस अधिकारियों की निर्मम हत्या कर दी, यह सर्वविदित है।
ये पुलिस अधिकारी भी कोर्ट के आदेश पर उद्यान विभाग से रामवृक्ष और उसके गुर्गों को बेदखल करने पहुंचे थे।
ऐसे सभी मामलों में इस बात की पुष्टि कदम-कदम पर हुई कि इनके सरगनाओं को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त था और राजनीतिक संरक्षण के चलते प्रशासन इनके सामने हाथ बांधे खड़ा रहा। वोट बैंक की राजनीति ने नेताओं को इनके सामने नतमस्तक रखने पर मजबूर किया।
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि राजनीति के संरक्षण से धर्म को धंधा बनाने वालों का एक लंबा इतिहास है और हर दौर में धर्म के धंधेबाज सक्रिय रहे हैं। इनके तौर-तरीके अलग-अलग हो सकते हैं किंतु मकसद सबका अधिक से अधिक दौलत एवं शौहरत बटोरना रहा।
लेकिन ऐसे सभी मामलों में एक सवाल हमेशा अनुत्तरित रह जाता है, और वह सवाल यह है कि धर्म के धंधेबाजों की हवस को परवान चढ़ाने में क्या मीडिया की कोई भूमिका नहीं है ?
क्या मीडिया उतना ही निष्पक्ष है जितना कि वह खुद को तब दिखाने की कोशिश करता है जब किसी कथित धार्मिक गुरू का काला चिठ्ठा सार्वजनिक होता है अथवा वो कानून के शिकंजे में फंसकर सलाखों के पीछे जाता है ?
सच तो यह है कि मीडिया सिर्फ सुर्खियां बटोरता है, अन्यथा वह धर्म के हर धंधेबाज को बुलंदियों तक पहुंचाने में पूरा सहयोग करता रहा है और अब भी कर रहा है।
इस दौर के मीडिया पर पूरी तरह बिकाऊ होने का ठप्पा आमजन यूं ही नहीं लगाने लगा। उसके पीछे ठोस वजह है।
किसी भी किस्म के मीडिया को देख लें। विज्ञापन के जरिए पैसा उगाहने की खातिर मीडिया जगत हर स्तर तक गिरने को बेताब रहता है। एक ओर वह सबकुछ जानते व समझते हुए भी विभिन्न उत्पादों के फर्जी दावों वाले विज्ञापन प्रकाशित व प्रसारित करता है तो वहीं दूसरी ओर धर्म को ”धंधे की तरह” ग्लैमराइज करके परोसने से भी कोई परहेज नहीं करता। मीडिया भली-भांति जानता है कि अंडरगारमेंट्स से लेकर परफ्यूम तक और तेल व साबुन से लेकर मिर्च-मसालों तक के विज्ञापनों में उनके दावों का सच्चाई से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है परंतु वह फिर भी दिन-रात उनका प्रसारण कर रहा है क्योंकि उसे विज्ञापनों के भ्रमजाल से नहीं, अपनी कमाई से मतलब है। यही कारण है कि जिस किसी उत्पाद को जब कभी परखा गया है, तब उसके बारे में किया गया हर दावा फर्जी साबित हुआ है।
रियल एस्टेट के कारोबार में आज बड़ी-बड़ी नामचीन कंपनियों का सामने आ रहा फर्जीवाड़ा क्या मीडिया की सहभागिता के बिना हो गया। मीडिया ने बिना किसी छानबीन के उनके विज्ञापन प्रकाशित व प्रसारित नहीं किए होते तो निश्चित ही इतनी बड़ी संख्या में लोग रियल एस्टेट कंपनियों के फ्रॉड का शिकार नहीं बनते। आज जिन बातों को लेकर कोर्ट उनके खिलाफ आदेश-निर्देश दे रहा है, यदि उनकी असलियत विज्ञापन निकालने से पहले पता कर ली होती तो अनेक लोग धोखाधड़ी का शिकार होने से बच सकते थे।
बात चाहे तंत्र-मंत्र के माध्यम से किसी महिला का प्यार दिलाने के दावेदार सड़क छाप बाबा बंगाली के विज्ञापन की हो अथवा मसाज पॉर्लर से हजारों रुपए रोज की कमाई कराने वाले विज्ञापन की, मोबाइल टावर लगवाने जैसी धोखाधड़ी के लिए विज्ञापन कराने की हो या फिर रंगीन मिजाज लोगों के लिए अश्लील बातें कराने के प्रचार-प्रसार की, मीडिया को किसी से गुरेज नहीं है। उसे गुरेज है तो इस बात से कि उसका धंधा न छिन जाए। बाकी तो पैसा देकर कोई कुछ भी प्रकाशित व प्रसारित कराने के लिए स्वतंत्र है।
कुमार स्वामी के शत-प्रतिशत झूठे दावों को लाखों रुपए लेकर जैकेट पेज विज्ञावन के रूप में प्रकाशित करने का काम भी मीडिया करता है और निर्मल बाबा द्वारा समौसे व चटनी से कैसी भी समस्या का समाधान कराने जैसे सोकॉल्ड सत्संगों को टीवी पर मीडिया ही दिखाता है।
आसाराम बापू की सारी सच्चाई सामने आ जाने के बावजूद उसके प्रवचनों को विज्ञापन बनाकर अब भी मीडिया लाखों रुपए की कमाई कर रहा है और विभिन्न तरीकों से तंत्र-मंत्र की दुकानें भी टीवी पर मीडिया ही चलवा रहा है।
शायद ही ऐसा कोई ‘फ्रॉड’ हो जिसमें विज्ञापन के माध्यम से मीडिया सहभागी न रहता हो लेकिन जब बात आती है उसे जिम्मेदार ठहराने की तो कहीं किसी कॉर्नर में एक छोटा सा डिस्क्लेमर देकर वह अपनी जिम्मेदारी पूरी कर लेता है।
पंचकूला की विशेष सीबीआई कोर्ट से गुरमीत राम-रहीम के खिलाफ आए निर्णय को मीडिया भले ही आज सुर्खियां बना रहा है और बोर करने की हद तक दिन-रात परोस रहा है किंतु कल यदि उसके कथित चमत्कारों का विज्ञापन मिलने लगेगा तो यही मीडिया उसे दिखाने में कोई परहेज, कोई शर्मिंदगी महसूस नहीं करेगा। कहीं किसी कोने में ”विज्ञापन” लिखकर वह डेरा सच्चा सौदा से लाखों रुपए कमाता रहेगा और अपनी दुकान उसी तरह पूरी बेशर्मी के साथ चलाऐगा जैसे कि कल तक राम-रहीम या आसाराम चलाता था। जिस तरह कृपालु की संस्था आज भी चला रही है और जिस तरह कुमार स्वामी भी अब तक चला रहा है।
सच पूछें तो कोई फर्क नहीं है ऐसे धर्म गुरुओं, व्यापारियों, कारोबारियों, नेताओं या मीडिया घरानों में। सबकी दुकानें एक-दूसरे के सहयोग से चलती हैं और शायद आगे भी चलती रहेंगी। कभी किसी कोर्ट का आदेश ज्वार-भाटा की तरह मीडिया की टीआरपी बढ़ाने के काम जरूर आ जाता है लेकिन जैसे ही उसका गुबार ठंडा होता है सब अपने-अपने धंधे में लग जाते हैं।
चार दिन ठहर जाइए, गुरमीत राम-रहीम की खबरें भी सिकुड़ कर सिर्फ सिंगल कॉलम और टिकर व फुटर पर चलने वाली पट्टियों तक सीमित रह जाएंगी।
ये बात अलग है कि निर्मल बाबा के समौसे, आसाराम के प्रवचन, कृपालु की कथाएं तथा राधे मां का ग्लैमरस धर्म, विज्ञापन के रूप में हमेशा मीडिया का हिस्सा बना रहेगा क्योंकि यहां भी सवाल धंधे का जो है। फिर धंधा चाहे धर्म का हो या अधर्म का, धंधा तो धंधा है। कीचड़ में पूरी तरह लिप्त रहकर कमल खिलाने की कला सिर्फ राजनीतिक पार्टियां ही नहीं जानतीं, मीडिया भी जानता है, और वह उसी कला का बखूबी इस्तेमाल कर रहा है।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
सोमवार, 20 दिसंबर 2010
कामशास्त्र बनते प्रिंट और वेब अखबार
''मुन्नी के बदनाम होने'' या ''शीला के जवान होने'' की चिंता तो बहुतों को सता रही है लेकिन मीडिया जगत के कामशास्त्र बनते जाने की फिक्र किसी को नहीं।
भारत की सुंदर देसी लड़कियों से गरमा-गरम दोस्ती और मजेदार बातें करने के लिए फोन करें- 0096097***** , 004179977****. ( 24 घण्टे ) फ्री मैम्बरशिप। Sobana फ्रेंडशिप नेटवर्क ( रजि.) स्थानीय हाई सोसायटी स्मार्ट यंग स्त्री/पुरुष संग मनचाही मित्रता पाएं केवल 30 मिनट में (ऑल इण्िडया सर्विस)। लाइव चैट 24 घण्टे कॉल नॉउ ******************सच एण्ड सच नम्बर्स। चुलबुली बातें लाइव चैट 24 घण्टे कॉल नॉउ ******************सच एण्ड सच नम्बर्स।
ये उन क्लासीफाइड विज्ञापनों का मजमून है जो देश के अधिकांश मशहूर दैनिक अखबारों में आये दिन छपता रहता है।
रिफ्रेश होगी सेक्स लाइफ, कामसूत्र का पाठ, तस्वीरों में: वाइल्ड सेक्स के तरीके, तस्वीरों में टॉप 10 सेक्स गेम्स, तस्वीरों में सेक्स के 10 फायदे, महिलाओं को कैसे करें आकर्षित, बनायें सेक्स को रोचक और आनंदमय, 20, 30 और 40 की उम्र का सेक्स, यौन शक्ित कैसे बढ़ायें, पुरुषों को नापसंद हैं सात बातें यौन विस्तर में, नये रिश्ते में सेक्स सम्बन्ध के लिए सही समय।
ये कुछ प्रमुख नेट अखबारों के आर्टीकल्स की हेडिंग्स हैं। इनमें वो अखबार भी शामिल हैं जिनकी हार्ड कॉपीज यानी अखबार भी बड़े पैमाने पर छपते हैं। खुद को देश के शीर्ष अखबारों में शुमार करने वाले इन अखबारों के मालिकान व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा के चलते तथा अभिव्यक्ित की स्वतंत्रता के नाम पर अभी और कितना नीचे गिरेंगे, यह बता पाना तो फिलहाल मुश्िकल है लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है समाचार पत्रों को इन्होंने जैसे ''कामशास्त्र'' बनाकर रख दिया है।
भारत की सुंदर देसी लड़कियों से गरमा-गरम दोस्ती और मजेदार बातें करने के लिए फोन करें- 0096097***** , 004179977****. ( 24 घण्टे ) फ्री मैम्बरशिप। Sobana फ्रेंडशिप नेटवर्क ( रजि.) स्थानीय हाई सोसायटी स्मार्ट यंग स्त्री/पुरुष संग मनचाही मित्रता पाएं केवल 30 मिनट में (ऑल इण्िडया सर्विस)। लाइव चैट 24 घण्टे कॉल नॉउ ******************सच एण्ड सच नम्बर्स। चुलबुली बातें लाइव चैट 24 घण्टे कॉल नॉउ ******************सच एण्ड सच नम्बर्स।
ये उन क्लासीफाइड विज्ञापनों का मजमून है जो देश के अधिकांश मशहूर दैनिक अखबारों में आये दिन छपता रहता है।
रिफ्रेश होगी सेक्स लाइफ, कामसूत्र का पाठ, तस्वीरों में: वाइल्ड सेक्स के तरीके, तस्वीरों में टॉप 10 सेक्स गेम्स, तस्वीरों में सेक्स के 10 फायदे, महिलाओं को कैसे करें आकर्षित, बनायें सेक्स को रोचक और आनंदमय, 20, 30 और 40 की उम्र का सेक्स, यौन शक्ित कैसे बढ़ायें, पुरुषों को नापसंद हैं सात बातें यौन विस्तर में, नये रिश्ते में सेक्स सम्बन्ध के लिए सही समय।
ये कुछ प्रमुख नेट अखबारों के आर्टीकल्स की हेडिंग्स हैं। इनमें वो अखबार भी शामिल हैं जिनकी हार्ड कॉपीज यानी अखबार भी बड़े पैमाने पर छपते हैं। खुद को देश के शीर्ष अखबारों में शुमार करने वाले इन अखबारों के मालिकान व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा के चलते तथा अभिव्यक्ित की स्वतंत्रता के नाम पर अभी और कितना नीचे गिरेंगे, यह बता पाना तो फिलहाल मुश्िकल है लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है समाचार पत्रों को इन्होंने जैसे ''कामशास्त्र'' बनाकर रख दिया है।
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