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शुक्रवार, 23 अगस्त 2019

योगी कभी मोदी नहीं हो सकते, जानिए क्‍यों…

जब से गोरखनाथ पीठ के महंत योगी आदित्‍यनाथ उत्तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री बने हैं, लगभग तभी से अक्‍सर उनकी तुलना प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी से की जाती रही है। मोदी-योगी का नाम लोग कुछ इस अंदाज में लेते हैं जैसे किन्‍हीं सफल संगीतकारों की जोड़ी का नाम साथ-साथ लिया जाता है।
ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्‍या योगी कभी मोदी के स्‍वाभाविक उत्तराधिकारी हो सकते हैं, क्‍या योगी कभी मोदी हो सकते हैं ?
यूपी में महंत योगी आदित्‍यनाथ की सरकार अगले महीने अपने कार्यकाल का आधा समय बिता लेगी।
नि:संदेह व्‍यक्‍तिगत रूप से योगी जी की कार्य के प्रति निष्‍ठा, समर्पण और ईमानदारी पर कोई प्रश्‍नचिन्‍ह नहीं लगा सकता परंतु उनकी कैबिनेट के कई मंत्रियों की न सिर्फ सत्‍यनिष्‍ठा संदेह के घेरे में है बल्‍कि उनकी ईमानदारी पर भी सवालिया निशान लग चुके हैं।
योगी कैबिनेट के विस्‍तार से ठीक पहले कई मंत्रियों का इस्‍तीफा इस ओर इशारा भी करता है, हालांकि वजहें दूसरी भी बताई जा रही हैं।
बहरहाल, वजह चाहे जो हों परंतु इसमें कोई दोराय नहीं कि लाख प्रयासों के बावजूद योगी सरकार प्रदेश की कानून-व्‍यवस्‍था में ऐसा कोई उल्‍लेखनीय सुधार नहीं ला पाई जिससे लोग बेखौफ हुए हों।
दावे-प्रतिदावों की बात न की जाए तो संभवत: योगी आदित्‍यनाथ भी इस सच्‍चाई से अवगत हैं कि प्रदेश की कानून-व्‍यवस्‍था पूरी तरह पटरी पर नहीं आ सकी है। सीएम योगी द्वारा नौकरशाहों को बार-बार चेतावनी देने और पूर्ववर्ती सरकारों की तरह लगातार ट्रांसफर-पोस्‍टिंग किए जाने से स्‍थिति स्‍पष्‍ट हो जाती है।
तो क्‍या योगी आदित्‍यनाथ भी उसी रटे-रटाए ढर्रे पर चल पड़े हैं, जिन पर चलकर मुलायम, माया एवं अखिलेश की सरकारें चला करती थीं और सुशासन कायम करने में नाकाम रहने के कारण सिर्फ तबादलों से तब्‍दीली का अहसास कराने की कोशिश करती रहती थीं।
गौर से देखें तो हाल ही में किए गए तबादले कुछ इसी तरह के संकेत दे रहे हैं।
03 अगस्‍त की रात योगी सरकार ने बुलंदशहर के SSP एन कोलांची को थानेदारों की तैनाती में अनियमितता बररतने पर निलंबित कर दिया। अपर मुख्य सचिव गृह अवनीश अवस्थी ने बताया कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा कानून-व्यवस्था की समीक्षा के दौरान थानेदारों की तैनाती में अनियमितता की बात सामने आई थी।
गोपनीय जांच के दौरान पाया गया कि बुलंदशहर में दो थाने ऐसे थे जहां एसएसपी एन. कोलांची ने थानेदारों को सात दिन से भी कम समय के लिए तैनाती दी। एक थाना ऐसा था जिस पर मात्र 33 दिन में थानेदार को बदल दिया गया। यह डीजीपी की निर्धारित प्रक्रिया के विपरीत था।
इतना ही नहीं, कोलांची ने दो ऐसे थानेदारों को बतौर प्रभारी तैनात कर दिया जिनको पूर्व में परिनिंदा प्रविष्टि दी जा चुकी थी।
अपर मुख्‍य सचिव ने अपनी बात चाहे जितनी चाशनी में लपेट कर रखी हो परंतु इसका निष्‍कर्ष यही निकलता है कि एन. कोलांची रिश्‍वत लेकर थानों का चार्ज बांट रहे थे।
आईपीएस अधिकारी एन. कोलांची की ऐसी कार्यप्रणाली इससे पहले क्‍या योगी सरकार के संज्ञान में नहीं रही होगी, और यदि नहीं रही तो क्‍यों नहीं रही?
यह बड़ा सवाल है, क्‍योंकि कोई अधिकारी रातों-रात भ्रष्‍ट नहीं हो जाता। भ्रष्‍टाचार के बीज उसके अंदर बहुत पहले अंकुरित हो जाते हैं, बाद में शासन-सत्ता के सहयोग का खाद-पानी ही उन्‍हें इस मुकाम तक पहुंचाता है।
मात्र 10-12 घंटों में 6 हत्‍याएं हो जाने पर 19 अगस्‍त को प्रयागराज (इलाहाबाद) के एसएसपी अतुल शर्मा निलंबित कर दिए गए। अतुल शर्मा की कार्यप्रणाली से स्‍वयं योगी आदित्‍यनाथ असंतुष्‍ट थे और पूर्व में उन्‍हें चेतावनी भी दे चुके थे।
आईपीएस अधिकारी अतुल शर्मा को प्रदेश के डीजीपी ओपी सिंह ने अपनी रिपोर्ट में बाकायदा ‘निकम्‍मा’ अधिकारी घोषित किया है। जाहिर है कि अतुल शर्मा भी एकाएक निकम्‍मे नहीं हो गए होंगे, बावजूद इसके उन्‍हें प्रयागराज जैसे बड़े और महत्‍वपूर्ण जिले का प्रभार कैसे सौंप दिया गया।
अब 2010 बैच के आईपीएस अफसर सत्यार्थ अनिरुद्ध पंकज को प्रयागराज का नया एसएसपी बनाया गया है। बिहार के मूल निवासी सत्यार्थ अनिरुद्ध पंकज की कार्यप्रणाली कैसी है, वो कितने काबिल अफसर हैं, इसकी जानकारी किसी भी उस जनपद से ली जा सकती है जहां वो पूर्व में तैनात रहे हैं। शायद ही वो कभी कहीं अपनी विशेष छाप छोड़ पाए हों, तो फिर अब उन्‍हें प्रयागराज क्‍यों भेज दिया गया।
इससे पहले वह धर्मनगरी मथुरा के एसएसपी थे किंतु मात्र 5 महीनों में उन्‍हें मथुरा से एसटीएफ में भेज दिया गया। उनके स्‍थान पर पीएसी से शलभ माथुर को भेजा गया ।
20 अगस्‍त को यानी कल फिर 14 आईपीएस अफसरों का तबादला किया गया है।
03 अगस्‍त से लेकर 20 अगस्‍त तक किए गए ये आईपीएस अधिकारियों के तबादले तो मात्र उदाहरण हैं अन्‍यथा योगीराज आने के बाद कमोबेश यही स्‍थिति न केवल आईपीएस के बल्‍कि आईएएस अधिकारियों के तबादलों में भी रही है।
तो क्‍या मात्र तबादलों से किसी अधिकारी की कार्यक्षमता, योग्‍यता और नेकनीयत बदल जाती है, यदि नहीं तो आखिर सिर्फ तबादले ही क्‍यों ?
यदि कोई अधिकारी काबिल एवं नेकनीयत है तो वह हर जगह अपनी योग्‍यता साबित करेगा, और यदि वह अकर्मण्‍य या भ्रष्‍ट है तो हर जगह विभाग का सिर नीचा करेगा व वर्दी तथा सरकार पर दाग लगवाएगा।
इन हालातों में पूछा जा सकता है कि किसी अधिकारी को योग्‍यता के पैमाने पर खरा उतरने के बाद भी बार-बार तबादले किसलिए झेलने पड़ते हैं और कुछ अधिकारी सार्वजनिक रूप से भ्रष्‍टाचारी एवं नाकाबिल साबित होने के बावजूद लगातार चार्ज पर क्‍यों बने रहते हैं।
अगर कोई अधिकारी काबिल, ईमानदार, कर्तव्‍यनिष्‍ठ एवं सक्षम है तो उसे हटाया क्‍यों जाता है और नाकाबिल, भ्रष्‍ट तथा निकम्‍मे अधिकारी अच्‍छी तैनाती कैसे पा जाते हैं।
यहां यह कहना कतई अप्रासांगिक होगा कि अधिकारियों की शौहरत से कोई निजाम अपरिचित रह सकता है क्‍योंकि यदि ऐसा है तो इसका सीधा मतलब है कि वह स्‍वयं उस पद के योग्‍य नहीं है।
सर्वविदित है कि पुलिस और प्रशासन के ही नहीं, न्‍याय व्‍यवस्‍था के भी अधिकारियों की शौहरत उनके तैनाती स्‍थल पर उनके चार्ज लेने से पहले पहुंच जाती है। यही कारण है कि अधीनस्‍थ अधिकारी तत्‍काल खुद को उनके अनुरूप ढाल लेते हैं और उसी मोड में काम करने लगते हैं।
योगी आदित्‍यनाथ उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश बनाने का भरसक प्रयास क्‍यों न कर रहे हों परंतु नतीजे बहुत अधिक उम्‍मीद नहीं जगाते। आंकड़ों की बाजीगरी को उठाकर एक ओर रख दिया जाए तो बिना दूरबीन के देखा जा सकता है कि ब्‍यूरोक्रेसी पर योगी कभी मजबूत पकड़ बना ही नहीं पाए।
इसी प्रकार उनकी कैबिनेट में आज भी कुछ लोग ऐसे हैं जो भ्रष्‍ट, निकम्‍मे और अयोग्‍य अधिकारियों को संरक्षण दिए हुए हैं। ये अधिकारी उनके संरक्षण में आम जनता तो क्‍या, सभ्रांत लोगों के साथ भी अशिष्‍ट व्‍यवहार करने से नहीं चूकते।
मायाराज से लेकर योगीराज तक में इनकी अच्‍छे-अच्‍छे पदों पर तैनाती यह साबित करने के लिए काफी है कि शासन-सत्ता के अंदर इनकी कितनी गहरी पैठ है।
योगीराज की तुलना में यदि मोदीराज को देखें तो नजारा ठीक उलटा दिखाई देगा। मोदी जी ने अपने चारों ओर ऐसे अधिकारियों का सर्किल बना रखा है जो अपनी ड्यूटी के प्रति किसी भी हद तक जाने को तत्‍पर नजर आते हैं।
सरकार का निर्णय कितना ही जोखिमभरा क्‍यों न हो, वह मोदी जी के कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहते हैं और कठिन से कठिन जिम्‍मेदारी का निर्वाह करने में नहीं हिचकते।
कश्‍मीर से अनुच्‍छेद 370 हटाने के बाद की स्‍थितियों में इन अधिकारियों की कर्मठता इसका ज्‍वलंत उदाहरण है।
बेशक योगी आदित्‍यनाथ की मंशा उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश बनाने की रही होगी परंतु धरातल पर देखें तो अभी उसके आसार दूर-दूर तक दिखाई नहीं दे रहे।
योगी जी के पास अब सिर्फ ढाई साल का समय शेष है। इसी दौरान उन्‍हें कोई इतनी बड़ी लकीर खींचनी होगी जिससे आमूल-चूल परिवर्तन की राह नजर आती हो। अन्‍यथा मोदी की तरह योगीराज दोहरा पाना असंभव न सही परंतु कठिन जरूर हो जाएगा।
और हां, तुकबंदी के लिए पार्टीजन योगी-मोदी की तुलना भले ही कर लें परंतु तुलनात्‍मक अध्‍ययन करने बैठेंगे तो पता लगेगा कि योगी का मोदी बनना मुमकिन नहीं है क्‍योंकि योगी जी अब तक जनता को वो फील नहीं करा सके हैं।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

रविवार, 9 अप्रैल 2017

आखिर कितनी तर्कसंगत हैं योगी आदित्‍यनाथ को लेकर विपक्ष और मीडिया की आशंकाएं ?

महंत योगी आदित्‍यनाथ द्वारा उत्तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री पद की शपथ लेने के साथ ही न केवल विपक्ष बल्‍कि मीडिया भी तरह-तरह की आशंकाएं व्‍यक्‍त कर रहा है। विपक्ष जहां योगी आदित्‍यनाथ की ताजपोशी को आरएसएस का एजेंडा बता रहा है वहीं मीडिया कुछ ऐसा प्रचार-प्रसार कर रहा है जैसे कोई अनहोनी हो गई हो।
योगी आदित्‍यनाथ पर यूं तो बहुत पहले से मीडिया काफी कठोर रहा है और उनके हर बयान को सिर्फ और सिर्फ सांप्रदायिक चश्‍मे से देखता रहा है, लेकिन अब वह उन्‍हें कतई समय देने के लिए तैयार नहीं है।
योगी आदित्‍यनाथ ने उत्तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री पद की शपथ भले ही कल दोपहर सवा दो बजे ली हो किंतु मीडिया ने उन्‍हें 18 मार्च की शाम तभी से टारगेट करना शुरू कर दिया था जब मुख्‍यमंत्री पद के लिए उनके नाम की घोषणा की गई।
जहां तक सवाल विपक्ष द्वारा योगी को उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्‍य के मुख्‍यमंत्री बतौर न पचा पाने का है, तो यह बात समझ में आती है क्‍योंकि पहले तो भाजपा की अप्रत्‍याशित जीत ने विपक्ष को कहीं का नहीं छोड़ा और फिर योगी की ताजपोशी ने उनके जले पर नमक छिड़कने का काम किया परंतु यदि बात करें मीडिया की तो ऐसा लगता है कि जैसे मीडिया भी एक प्रतिपक्ष बनकर रह गया है। उसने भाजपा और मोदी के अंधे विरोध में अपने सोचने व समझने की शक्‍ति खो दी है।
तभी तो राजनीति के ककहरे की जो छोटी सी सीख योगी आदित्‍यनाथ के क्षेत्र से ताल्‍लुक रखने वाले मुस्‍लिम संप्रदाय के लोगों को है, उसे भी मीडिया समझने को तैयार नहीं है।
योगी आदित्‍यनाथ के इलाके से संबंध रखने वाले मुस्‍लिमों का साफ-साफ कहना है कि योगी अपने बयानों में जो कुछ अब तक कहते रहे हैं, वो वोट बैंक की और चुनावी राजनीति का हिस्‍सा है न कि वह उनके व्‍यक्‍तित्‍व का परिचय देता है।
इन मुस्‍लिमों ने हर मीडिया पर्सन से यही कहा है कि योगी के दरबार में बिना किसी भेदभाव के लोगों की समस्‍याओं का समाधान किया जाता रहा है और उनके पास समस्‍या लेकर जाने वालों में मुस्‍लिम समुदाय के लोगों की बड़ी संख्‍या रहती है।
यही नहीं, योगी के स्‍थाई निवास गोरखनाथ मंदिर प्रांगण में जो दुकानें आवंटित हैं, उनमें से 60 प्रतिशत दुकानें मुस्‍लिमों को दी हुई हैं। गोरखनाथ मंदिर भी मुस्‍लिम बाहुल्‍य क्षेत्र में स्‍थित है किंतु योगी के आचार-व्‍यवहार को लेकर कभी उस क्षेत्र के मुस्‍लिमों को कोई आपत्ति नहीं हुई। योगी का लगातार पांच बार सांसद निर्वाचित होना और हर निर्वाचन में जीत का अंतर बढ़ते जाना इस बात की पुष्‍टि करता है कि योगी को लेकर विपक्ष या मीडिया चाहे जितना भ्रमित हो किंतु उनके अपने क्षेत्र में किसी को कोई भ्रम नहीं है।
गोरखनाथ मंदिर पर हर साल मकर संक्रांति के दौरान आयोजित होने वाले ‘खिचड़ी मेले’ में लाखों लोग आते हैं ओर पूरे एक महीने तक रहते भी हैं.
इस मेले में हर जाति, धर्म और संप्रदाय के लोगों की भारी तादाद में उपस्‍थिति मठ की कट्टर हिंदूवादी छवि को तोड़ती है जबकि मुस्लिम शासन काल में हिन्दुओं और बौद्धों के अन्य सांस्कृतिक केन्द्रों की भांति इस पीठ को भी कई बार भीषण कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
इसकी व्यापक प्रसिद्धि के कारण विक्रमी चौदहवीं सदी में भारत के मुस्लिम सम्राट अलाउद्दीन खिलजी ने अपने शासन काल में इस मठ को नष्ट किया और साधक व योगी बलपूर्वक मठ से निष्कासित कर दिए।
सत्रहवीं और अठारहवीं सदी में अपनी धार्मिक कट्टरता के कारण मुग़ल शासक औरंगजेब ने इसे दो बार नष्ट किया। क़रीब 52 एकड़ के सुविस्तृत क्षेत्र में स्थित इस मंदिर का रूप व आकार-प्रकार परिस्थितियों के अनुसार समय-समय पर बदलता रहा है। वर्तमान में गोरक्षनाथ मंदिर की भव्यता और पवित्र रमणीयता अत्यन्त कीमती आध्यात्मिक सम्पत्ति है। प्रतिदिन मंदिर में स्‍थानीय लोगों के अतिरिक्‍त भारत के सुदूर प्रांतों से भी असंख्य लोगों की भीड़ पर्यटकों व यात्रियों के रूप में आती है।
अब यदि बात करें इन विधानसभा चुनावों में भाजपा द्वारा वोटों की खातिर ध्रुवीकरण की राजनीति पर, तो कौन सा ऐसा राजनीतिक दल है जो ध्रुवीकरण की राजनीति नहीं करता। कांग्रेस ने देश और विभिन्‍न प्रदेशों में इतने लंबे समय तक शासन वोटों का ध्रुवीकरण करके ही किया। क्षेत्रीय पार्टियां भी यही करती रही हैं।
उत्तर प्रदेश की दोनों प्रमुख क्षेत्रीय पार्टियों बसपा व सपा की पूरी राजनीति वोटों के ध्रुवीकरण पर टिकी रही है। बसपा ने तो इन चुनावों में सुप्रीम कोर्ट के आदेश की खुली अवहेलना करके मुस्‍लिमों के ध्रुवीकरण की पूरी कोशिश की और बड़ी मात्रा में मुस्‍लिम प्रत्‍याशियों को खड़ा किया। मायावती ने अपने चुनावी मंचों से बेझिझक मुस्‍लिमों का आह्वान किया और दलितों के एक वर्ग को भी डराया।
उत्तर प्रदेश के अलावा बिहार, पश्‍चिम बंगाल, दिल्‍ली, पंजाब आदि कौन सा ऐसा राज्‍य है जहां के शासक ध्रुवीकरण की राजनीति न करते रहे हों।
इस सब के इतर देखा जाए तो भाजपा पहली ऐसी पार्टी है जिसने तीन तलाक की मुखालफत और नोटबंदी व समान नागरिक संहिता की वकालत करने का दुस्‍साहस दिखाया। ये बात अलग है कि विपक्ष के भारी दुष्‍प्रचार के बाद भी यह सारे मुद्दे भाजपा के लिए मुफीद साबित हुए और अब कहा जा रहा है कि मुस्‍लिम महिलाओं ने भी इन चुनावों में भाजपा के लिए मतदान किया है।
उत्तर प्रदेश एक ऐसा राज्‍य है जिसके इर्द-गिर्द सारे देश की राजनीति घूमती है। ऐसे में भाजपा ने योगी आदित्‍यनाथ को उत्तर प्रदेश की कमान सौंपने से पहले राजनीति के सारे गुणा-भाग जरूर लगाए होंगे क्‍योंकि भाजपा नहीं चाहेगी कि वर्षों बाद समाप्‍त हुआ उसका वनवास, उपहास बनकर रह जाए।
योगी आदित्‍यनाथ जो कल तक मुंह से आग उगलने के लिए पहचाने जाते थे, उन्‍होंने मुख्‍यमंत्री का पद संभालने के साथ सबसे पहले अपनी कैबिनेट को हिदायत दी है कि मीडिया को वह नहीं, इसके लिए अधिकृत मंत्री ब्रीफ करेंगे। योगी ने बाकायदा दो मंत्रियों श्रीकांत शर्मा और सिद्धार्थनाथ सिंह को इसकी जिम्मेदारी सौंप दी है। श्रीकांत शर्मा व सिद्धार्थनाथ सिंह पहले से राष्‍ट्रीय प्रवक्‍ता की जिम्‍मेदारी संभालते चले आ रहे हैं।
योगी का अपनी कैबीनेट को दिया गया यह संदेश स्‍पष्‍ट करता है कि वह पद की गरिमा को बखूबी समझ रहे हैं और उसकी जिम्‍मेदारी का अहसास भी कर रहे हैं।
संभवत: इसीलिए उन्‍होंने मुख्‍यमंत्री पद की शपथ लेने से पूर्व ही प्रदेश पुलिस के मुखिया को इस आशय का आदेश दे दिया था कि जीत के जश्‍न में निरंकुश होने वालों से सख्‍ती के साथ निपटें। कानून-व्‍यवस्‍था से खिलवाड़ करने की इजाजत किसी को नहीं मिलनी चाहिए।
योगी ने यह आदेश कुछ स्‍थानों से आ रहीं उन खबरों के आधार पर दिया था जहां जीत के जश्‍न में वर्ग विशेष के खिलाफ नारेबाजी की बात बताई गई थी।
योगी का इतनी जल्‍दी एक्‍शन में आना यह बताता है कि उन्‍हें अपनी प्रचारित की गई कथित कट्टरवादी छवि का भी अच्‍छी तरह इल्‍म है और वह इसके लिए विपक्ष और मीडिया को कोई मौका नहीं देना चाहते।
सबका साथ, सबका विकास पर चलते हुए भाजपा के संकल्‍प पत्र पर पूरी तरह अमल करने की बात उन्‍होंने अपनी पहली प्रेस कांफ्रेंस में भी कही।
इन सब बातों पर गौर करें तो साफ लगता है कि जिस तरह केंद्र में नरेन्‍द्र मोदी के नेतृत्‍व वाली सरकार का गठन होने के साथ विपक्ष ने मुस्‍लिमों के अंदर भय का वातावरण उत्पन्‍न करने की कोशिश की थी, उसी तरह की कोशिश वह अब योगी की ताजपोशी के बाद कर रहा है क्‍योंकि उसके तो नीचे से लगभग पूरी जमीन ही खिसक चुकी है। प्रमुख विपक्षी पार्टियां जहां से चली थीं, आज फिर वह वहीं आकर खड़ी हो गई हैं। योगी यदि पार्टी की उम्‍मीदों पर खरे साबित हुए और जनभावनाओं के अनुरूप शासन की कमान संभालने में सफल रहे तो सपा व बसपा जैसी पार्टियों का वजूद तक खतरे में पढ़ जाएगा। कांग्रेस की दुर्गति का अंदाज लगाने को तो इतना ही काफी है कि उसे अपना दल से भी कम सीटें मिली हैं, और वो भी तब जबकि उसने बड़े ढोल-नगाड़े पीटकर समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन किया था। यह साथ यूपी की जनता को कितना पसंद आया, इसका अब जिक्र करने की भी जरूरत नहीं रह गई।
बेहतर होगा कि विपक्ष और मीडिया अब योगी-राज को बेवजह शंका की दृष्‍टि से देखने की बजाय उनके काम को देखे और नकारात्‍मक प्रचार-प्रसार व बयानबाजी की प्रवृत्ति से बाहर निकल कर धरातल पर होने वाले कामों की समीक्षा करे ताकि एक स्‍वस्‍थ परंपरा कायम हो सके और उत्तर प्रदेश की जनता भी उस परंपरा का लाभ उठाकर भ्रम की स्‍थिति से बच सके।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
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