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गुरुवार, 15 जनवरी 2026

माफिया पर मेहरबान प्रशासन: कौड़ियों की जमीन के बदले नगर निगम की बेशकीमती जमीन देने की तैयारी


 उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हर तीसरे दिन, और अपने प्रत्येक जनता दर्शन कार्यक्रम में कहते रहते हैं कि भूमाफिया किसी भी तरह पनपने न पाए। वह राज्य से माफिया को नेस्तनाबूद करने के आदेश और निर्देश अधिकारियों को देते रहते हैं, लेकिन यदि मेढ़ ही खेत को खाने पर आमादा हो तो सीएम योगी कर क्या सकते हैं। ऐसे में एक योगी क्या, योगी जैसे दस मिलकर भी शायद कुछ नहीं कर सकते। 

दूसरे जनपदों का यहां जिक्र न किया जाए तो कम से कम मथुरा का जिला प्रशासन भली-भांति समझ चुका है कि वह चाहे जितना खुल कर खेले, चाहे जितना भ्रष्टाचार करे किंतु उसका कुछ नहीं बिगड़ने वाला। तभी तो धर्म की नगरी में अधर्म का डंका डटकर बज रहा है और जिसकी जितनी बिसात है, वह उतनी ही माफिया की मदद करने पर आमादा है। 
तभी तो पहले डालमिया बाग और अब सनसिटी अनंतम का मामला भी अदालत की चौखट तक पहुंचा, अन्यथा इसकी जरूरत ही क्यों पड़ती। 
ताजा मामला एक बार फिर वृंदावन के सनसिटी अनंतम से जुड़ा है जिसे नगर निगम मथुरा-वृंदावन की बेशकीमती जमीन उपलब्ध कराने के लिए जिला प्रशासन के निर्देश पर बोर्ड बैठक में बाकायदा प्रस्ताव लाया गया। 
आश्चर्य की बात यह है कि यह प्रस्ताव कौड़ियों की जमीन के बदले नगर निगम की बेशकीमती जमीन देने का है, जिस पर पूर्व में एक जिलाधिकारी आपत्ति भी दर्ज करा चुके हैं। अब यह प्रस्ताव निगम की बैठक में फिर लाया गया है। 
क्या है प्रस्ताव? 
9 अक्टूबर 2025 को पेश एजेण्‍डे के अनुसार अपर जिलाधिकारी (प्रशासन) मथुरा ने ग्राम जैत व छटीकरा में सनसिटी हाईटेक प्रोजेक्ट प्रा. लि. द्वारा विकसित की जा रही टाउनशिप के लिए भूमि विनिमय का प्रस्ताव बोर्ड से पास कराकर उपलब्ध कराने के निर्देश पत्रांक-322/सात-बी/भू.व्‍य./2023 दिनांक 06.09.2023 एवं 173/सात- बी/भू.व्‍य./2023 दिनांक 23.09.2024 के जरिए दिए हैं। 
इस नए प्रस्ताव के मसौदे में बताया गया है कि ग्राम जैत व छटीकरा में सनसिटी हाईटेक प्रोजेक्ट प्रा. लि. द्वारा विकसित की जा रही टाउनशिप के लिए भूमि के विनिमय का जो प्रस्ताव कार्यकारिणी ने पहले रखा था, उसकी त्रुटियों को संशोधित करते हुए यह प्रस्ताव लाया गया है। 
यहां यह जान लेना जरूरी है कि सनसिटी हाईटेक ने अपनी प्रस्तावित टाउनशिप में जमीन का प्राथमिक मूल्य लगभग एक लाख रुपए प्रति वर्ग गज रखा है जबकि मथुरा-वृंदावन नगर निगम को उसके विनिमय में जो भूमि मिलनी है उसकी कीमत बमुश्किल 10 हजार रुपए प्रति वर्ग गज है। 
देखें नगर निगम मथुरा-वृंदावन की बोर्ड बैठक में पेश एजेण्‍डे की प्रति-
नगर-निगम की बोर्ड बैठक का एजेण्‍डा बताता है कि सनसिटी हाईटेक प्रोजेक्ट के अलावा भी दूसरे कथित कॉलोनाइजर्स के लिए इसी प्रकार भूमि विनिमय का संशोधित प्रस्ताव रखा गया है जिससे साफ है कि कितने बड़े स्तर पर ''ये खेल'' खेला जा रहा है। 
गौरतलब है कि समूचा मथुरा जनपद और विशेषकर भगवान श्रीकृष्‍ण की लीलास्थली वृंदावन इन दिनों ''धार्मिक पर्यटन'' के रूप में अपनी वैश्विक पहचान बना चुका है। वृंदावन में जमीनों के दाम आसमान छू रहे हैं इसलिए स्‍थानीय ही नहीं, बाहरी भूमाफिया भी इसका भरपूर लाभ उठाने में लगे हैं। चूंकि जिला प्रशासन उन्हें इसकी पूरी छूट दे रहा है इसलिए वह कोई मौका हाथ से जाने नहीं देना चाहते। 
इन हालातों में यह बताने की तो आवश्यकता ही नहीं रह जाती कि मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण हो या फिर नगर निगम मथुरा-वृंदावन, सब आखिर कथित कॉलोनाइजर्स या यूं कहें कि भूमाफिया पर इतने मेहरबान क्यों हैं, और क्यों जिला प्रशासन विकास की आड़ लेकर भूमाफिया को सीधा लाभ पहुंचाने की जद्दोजहद में लगा है। 
दरअसल ये सारा खेल करोड़ों का नहीं, अरबों का है। जाहिर है कि इससे होने वाली हराम की कमाई कितनी भी मामूली क्यों न हो, कुबेर के खजाने से कम नहीं होगी। राधे-राधे की रट लगाकर ब्रजवासियों को मूर्ख बनाने का यह धंधा बेशक बहुत दिनों से चल रहा है लेकिन अदालतें उम्मीद की किरण दिखा रही हैं। 
वो आशा जगाती हैं कि कभी न कभी तो पाप का यह घड़ा भरेगा, और किसी न किसी दिन यह फूटेगा भी। तब अकेला माफिया नहीं, नेता और अधिकारी भी नापे जाएंगे। काली कमली वाले की नजर जिस दिन टेढ़ी हो गई, उस दिन ब्रज में यह कहावत चरितार्थ होते दिखाई देगी कि उसके घर में देर भले ही हो लेकिन अंधेर नहीं होता। 
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

बुधवार, 24 दिसंबर 2025

डालमिया बाग के बाद अब वृंदावन की सनसिटी अनंतम का बड़ा कारनामा: MVDA, वन विभाग सहित 9 को नोटिस


 अभी बहुत समय नहीं बीता जब वृंदावन के छटीकरा रोड स्‍थित डालमिया बाग का मामला NGT से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था। सुप्रीम कोर्ट ने उसमें बेहद सख्‍त रुख अपनाते हुए न केवल करोड़ों रुपए का जुर्माना ठोका बल्कि अनेक शर्तों के साथ ऐसा आदेश पारित किया, जिसके कारण आज 'गुरू कृपा तपोवन' के नाम से प्रस्तावित पूरा हाउसिंग प्रोजेक्ट खटाई में पड़ चुका है।

लेकिन लगता है कि रियल एस्टेट के कारोबार में सक्रिय माफिया न तो किसी आदेश-निर्देश से कोई सीख लेता है और न अदालतों के रुख की परवाह करता है। आखिर बात करोड़ों के नहीं, अरबों के लाभ की जो है। 
तभी तो अब वृंदावन के ही छटीकरा रोड पर सुनरख बांगर में सनसिटी अनंतम को डेवलप करने वाले समूह ने ऐसा कारनामा कर दिखाया है जिसकी कल्पना तक कोई आसानी से नहीं कर सकता। ऐसे में एक सवाल यह जरूर उठता है कि कैसे कोई रियल एस्टेट ग्रुप इतना दुस्साहस कर पाता है, और कौन हैं जो किसी समूह को इतना हौसला देते हैं कि वह सुप्रीम कोर्ट के आदेश-निर्देश से पेश नजीर को अहमियत देना आवश्यक नहीं समझता। जवाब साफ है। रियल एस्टेट के कारोबार में सक्रिय माफिया को इस दुस्‍साहस के लिए सबसे अधिक प्रोत्साहन विकास प्राधिकरण से मिलता है जिसे कृष्‍ण की नगरी में मथुरा वृंदावन विकास प्राधिकरण यानी MVDA कहते हैं। 
इसके बाद नंबर आता है प्रदूषण विभाग और वन विभाग का। हालांकि सनसिटी अनंतम के केस में उत्तर प्रदेश प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड (UPPCB) ने CTE अर्थात Consent to Establish अस्वीकृत करने की सिफारिश की है, बावजूद इसके रियल एस्टेट माफिया गैरकानूनी तौर पर अपना काम कर रहा है।       
दिल्ली-आगरा रोड पर नेशनल हाईवे नंबर 19 के किनारे अनुमानित 400 एकड़ से अधिक में बनाई जा रही इस टाउनशिप की भव्यता का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि यहां मात्र 240 वर्गगज में बने एक विला की शुरूआती कीमत 6 करोड़ रुपए से ज्यादा रखी गई है। 
बहरहाल, अब NGT की Principal Bench ने इससे संबद्ध मूल आवेदन संख्‍या 649/2025 की सुनवाई करते हुए सूचीबद्ध किया है और उत्तर प्रदेश सरकार, उत्तर प्रदेश प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड, राज्य पर्यावरण प्रभाव आंकलन प्राधिकरण (SEIAA-UP) पर्यावरण विभाग, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC), केंद्रीय भू जल प्राधिकरण (CGWA), प्रभागीय वन अधिकारी वन विभाग मथुरा, MVDA (मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण, जिलाधिकारी मथुरा तथा एमएस सनसिटी हाईटेक प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड के अधिकृत हस्‍ताक्षरकर्ता आशुतोष सिंह को नोटिस देकर जवाब तलब किया है। 
दरअसल, ताज ट्रपेजियम जोन (TTZ) के अंतर्गत आने वाले सनसिटी अनंतम प्रोजेक्ट को लेकर दायर याचिका पर NGT में 18 दिसंबर को हुई सुनवाई के बीच याचिकाकर्ता के अधिवक्ता एन के गोस्‍वामी ने पीठ को अवगत कराया कि अब तक इस प्रोजेक्‍ट के लिए कोई वैधानिक अनुमति ली ही नहीं गई है। प्रोजेक्ट के लिए न तो Consent to Establish है, न Conset to Operate (CTO) है और न कार्यशील सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) है। 
यहां सीवेज को मध्ययुगीन प्रथा की तरह टैंकरों के जरिए आसपास के इलाकों में निस्तारित कराया जा रहा है जो पर्यावरण की दृष्‍टि से तो अनुचित है ही, स्‍वास्थ्‍य के नजरिए से भी हानिकारक है और इसका प्रभाव लोगों पर पड़ रहा है। अधिवक्ता एन के गोस्‍वामी ने इसे पीठ के समक्ष कानून के शासन को 'कार्डियक अरेस्‍ट' की संज्ञा देते हुए गंभीर प्रश्न खड़ा किया। 
यही नहीं, विद्वान अधिवक्ता ने पीठ के सामने सेटेलाइट इमेज पेश करते हुए यह जानकारी भी दी कि सनसिटी अनंतम के लिए बिना किसी अनुमति के 400 से अधिक दरख्‍तों को काटा गया है। ये संख्‍या इससे अधिक भी हो सकती है। 
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने इस दौरान MVDA को कठघरे में खड़ा करते हुए पीठ को बताया कि जब उत्तर प्रदेश प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड जैसी संस्थाएं इस प्रोजेक्ट के लिए एनओसी को खारिज करने की संस्‍तुति कर चुकी हैं तब  जून 2025 में ही MVDA द्वारा सनसिटी अनंतम के लिए लाइसेंस प्रदान कर दिया गया और निजी प्रतिवादियों को लाभ पहुंचाने के लिए जमीन के अधिग्रहण की प्रक्रिया प्रारंभ कर दी गई, जो अब भी जारी है। 
इससे साफ जाहिर है कि राज्य की जिस मशीनरी पर प्रोजेक्ट को कानूनी प्रक्रिया से पूरा कराने की जिम्मदारी है, वही निजी स्‍वार्थ में गैरकानूनी काम करने वालों को संरक्षण दे रही है। यहां यदि ये कहें कि रियल एस्टेट माफिया और अधिकारियों के बीच गहरी सांठगांठ से ही यह संभव है, तो कुछ गलत नहीं होगा। इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 13 मार्च 2026 की तारीख तय की गई है। 
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी 

रविवार, 5 अक्टूबर 2025

वो सरकारी विभाग, जहां दम तोड़ देती है योगी बाबा की भ्रष्टाचार को लेकर बनी जीरो टॉलरेंस नीति


 दैनिक जागरण के आगरा एडिशन की संपादकीय में 2 अक्टूबर गांधी जयंती को 'यह कैसी कार्यशैली' शीर्षक से एक महिला का दर्द लिखा है। दरअसल, इस महिला ने लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) से नीलामी में सवा करोड़ रुपए मूल्य का एक भूखंड खरीदकर वहां अपना घर बनवाया। प्राधिकरण से ही नीलाम भूखंड पर बने इस घर को हाल ही में लखनऊ विकास प्राधिकरण ने ध्वस्त कर दिया। शिकायत के बाद जांच होने पर एलडीए ने माना कि लेआउट परिवर्तन के दौरान गलती से यह भूखंड 'मिसिंग' में दर्ज हो गया, जिसके कारण मकान के ध्वस्तीकरण की कार्रवाई हुई। नीलामी में सवा करोड़ का प्लॉट खरीदने के बाद महिला ने उस पर मकान कितनी मुश्किलों से और और कैसे-कैसे पैसे का इंतजाम करके बनवाया होगा, इसका अंदाज कोई भी लगा सकता है। लेकिन भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे सरकारी संरक्षण प्राप्त विकास प्राधिकरण के अधिकारी अब उस महिला को 'फ्लैट' ऑफर कर रहे हैं। 

जरा सोचिए कि यह हाल तो प्रदेश की राजधानी के उस विकास प्राधिकरण का है जहां स्‍वयं मुख्‍यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपने पूरे मंत्रिमंडल और सभी बड़े अफसरों के साथ बैठते हैं। 
यह भी सोचिए कि जब लखनऊ विकास प्राधिकरण का यह आलम है तो प्रदेश के उन शहरों की डेवलपमेंट अथॉर्टीज का क्या हाल होगा, जहां से लखनऊ तक आवाज पहुंचाना भी आसान काम नहीं है। 
सीएम योगी अपने पहले कार्यकाल से यह कहते चले आ रहे हैं कि भ्रष्टाचार पर उनकी सरकार कोई कंप्रोमाइज नहीं करेगी और इसे लेकर उनकी नीति हमेशा जीरो टॉलरेंस की रहेगी। 
ऐसे में इस तरह के सवाल उठना स्‍वाभाविक है कि योगी सरकार की इतनी सख्ती और स्‍वयं योगी आदित्यनाथ की बेदाग छवि के बावजूद विकास प्राधिकरण के भ्रष्‍ट अधिकारियों एवं कर्मचारियों की पूंछ सीधी क्यों नहीं होती?  
क्यों प्रदेशभर के विकास प्राधिकरण भ्रष्टाचार का पर्याय बने हुए हैं और क्यों उनके मन में योगी सरकार अथवा योगी आदित्यनाथ का कोई खौफ नहीं है? 
इन प्रश्नों का एक ही उत्तर है कि योगी सरकार ने जिस तरह का अभियान कानून-व्यवस्था पर फोकस करके सामाजिक अपराधियों के खिलाफ चलाया, वैसा कोई अभियान भ्रष्टाचारियों के खिलाफ आज तक कभी नहीं चलाया गया। कभी-कभार किसी अधिकारी पर कोई कार्रवाई हुई भी है तो वह भ्रष्टाचारियों के मन में भय व्याप्त करने के लिए अपर्याप्त रही। और अगर बात करें विशेष तौर पर प्रदेश के सर्वाधिक भ्रष्‍ट विभाग विकास प्राधिकरण की तो उसका कोई अधिकारी शायद ही कभी कार्रवाई के भी दायरे में आया हो। यही कारण है कि विकास प्राधिकरण के आगे शहरों के नाम भले ही बदल जाते हैं परंतु उसकी भ्रष्‍ट कार्यशैली कहीं नहीं बदलती। वह हर जगह एक जैसी पायी जाती है।  
मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण, अंधेर नगरी-चौपट राजा 
देश ही नहीं, दुनिया में अपनी विशिष्ट धार्मिक पहचान रखने वाली योगीराज भगवान श्रीकृष्‍ण की पावन जन्मस्थली और क्रीड़ास्‍थली मथुरा-वृंदावन के विकास प्राधिकरण का हाल जानकर तो ऐसा लगता है जैसे यहां अंधेर नगरी-चौपट राजा की कहावत चरितार्थ हो रही हो। 
मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण को यदि भ्रष्‍ट अधिकारियों का पसंदीदा स्थान कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। 
वृंदावन का डालमिया बाग घोटाला है सबसे बड़ा उदाहरण 
पिछले साल इन्हीं दिनों वृंदावन स्‍थित डालमिया बाग पर गुरुकृपा तपोवन के नाम से एक कॉलानी डेवलप करने के लिए मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण में नक्शा मूव किया गया, लेकिन अप्रूवल से पहले ही भूमाफिया ने जमकर उसका फर्जी प्रचार किया और प्‍लॉट बुक करने शुरू कर दिए। माफिया ने इस नक्शे के आवेदन की आड़ में अनुमानत: एक हजार करोड़ रुपया एकत्र कर लिया परंतु विकास प्राधिकरण तमाशा देखता रहा। 
चूंकि भूमाफिया ने कॉलोनी डेवलेव करने की जल्दी में डालमिया बाग के साढ़े चार सौ से अधिक हरे वृक्ष रातों-रात काट डाले इसलिए यह मामला पहले एनजीटी और फिर सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंचा। 
मामला देश की सर्वोच्‍च अदालत की चौखट पर पहुंचा तो सरकार के कानों पर भी जूं रेंगनी प्रारंभ हुई, नतीजतन तत्कालीन कमिश्नर आगरा मंडल ऋतु माहेश्‍वरी ने भी मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण (एमवीडीए) की भूमिका का पता लगाने के लिए एक कमेटी का गठन कर जांच रिपोर्ट पेश करने को कहा। 
बहरहाल, चोर-चोर मौसेरे भाई की कहावत फिर सच साबित हुई और मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के किसी अधिकारी का कुछ नहीं बिगड़ा। ये बात अलग है कि सुप्रीम कोर्ट के सख्‍त फैसले ने एक ओर जहां भूमाफिया की पूरी प्‍लानिंग चौपट कर दी वहीं विकास प्राधिकरण (एमवीडीए) के अधिकारियों की हसरतों पर पानी फेर दिया क्योंकि इस प्रोजेक्ट के डेवलपर, एमवीडीए के अधिकारियों की दुधारू गाय साबित हो रहे थे। यदि सब-कुछ वैसे ही चलता रहता जैसे एमवीडीए के अधिकारी और भूमाफिया चाह रहे थे तो भूमाफिया जहां अरबों कमाते वहीं कई अधिकारी करोड़ों कमा ले गए होते। 
जो भी हो, मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के लिए न तो गुरुकृपा तपोवन कोई पहला प्रोजेक्ट था और न अंतिम। दुनिया के आकर्षण का केंद्र मथुरा नगरी में जाने कितने डेवलपर हर रोज विकास प्राधिकरण के चक्कर काटने को मजबूर हैं। कोई अवैध निर्माण के लिए चक्कर काट रहा है तो कोई वैध काम कराने के लिए क्‍योंकि काम कैसा भी हो, विकास प्राधिकरण की चौखट चूमे बिना कुछ भी संभव नहीं हो सकता। 
बड़े-बड़े करोड़पति और अरबपति दो के चार और सात के सोलह इनकी कृपा के बिना नहीं कर सकते। इनकी नजर बनी रहे तो शहर के बीचों-बीच अवैध बहुमंजिला इमारत खड़ी की जा सकती है और ये यदि नजर फेर लें तो वैध इमारत को भी मिट्टी में मिला सकते हैं। 
लखनऊ की उस महिला का वैध मकान इसका सबसे बड़ा सबूत है। जमीन चाहे प्राधिकरण से ही क्यों न खरीदी हो, प्राधिकरण के अधिकारियों को चढ़ावा चढ़ाए बिना लेआउट आसानी से परिवर्तन हो सकता है और भूखंड ''मिसिंग'' शो करके मकान पर बुलडोजर भी चल सकता है। 
रही बात योगी बाबा के जीरो टॉलरेंस की तो उसकी जद में अब तक विकास प्राधिकरण आता दिखाई नहीं देता। क्या प्रदेश की राजधानी लखनऊ और क्या कृष्‍ण की जन्‍मभूमि मथुरा, सबका हाल समान है। नक्कारखाने में तूती की आवाज वैसे भी सुनाई कहां देती है। 
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी  

रविवार, 27 जुलाई 2025

सावधान! डालमिया बाग पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आने के बावजूद साजिश रच रहे हैं भूमाफिया


 वृंदावन के डालिमया बाग का सिर्फ एमओयू साइन करके हजारों करोड़ रुपए हड़प चुके भूमाफिया अब एक तीर से कई निशाने साधने की कोशिश में लगे हैं। इसके लिए वह नित नई साजिशें रच रहे हैं, और इन साजिशों के तहत इस तरह की अफवाहें फैला रहे हैं जिससे एक ओर इनके जाल में फंसे बैठे लोगों की उम्मीद न टूटे और दूसरी ओर नए निवेशकों को टोपी पहनाई जा सके। 

गौरतलब है कि योगीराज श्रीकृष्‍ण की क्रीड़ास्थली के बेशकीमती इलाके छटीकरा रोड पर स्‍थित डालमिया बाग से भूमाफिया द्वारा रातों-रात 454 हरे दरख्त काटे जाने का मामला जब नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के बाद सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचा तो सुप्रीम कोर्ट ने इस पर बेहद सख्‍त रुख अपनाते हुए आरोपियों पर न केवल भारी जुर्माना लगाया बल्कि किसी भी किस्म के निर्माण पर रोक के साथ-साथ पर्यावरण की भरपाई के लिए हजारों नए पेड़ लगाने का भी आदेश दिया। 
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में 9 बिंदुओं के जरिए यह स्पष्ट किया...  
1. 454 पेड़ों की प्रतिपूर्ति उसी भूमि पर वृक्षारोपण करके की जाएगी।
2. 9080 वृक्षों का रोपण आसपास के उपयुक्त स्थलों पर किया जाएगा, जिनमें 4540 पौधे मूल वृक्षों के स्थान पर प्रतिपूरक वृक्षारोपण के रूप में तथा 4540 पौधे दंड स्वरूप लगाए जाएंगे।
3. प्रत्येक वृक्ष हेतु ₹1,00,000/- के हिसाब से ₹4,54,00,000/- (4 करोड़ 54 लाख रुपये मात्र) का न्यूनतम दंड भूमि स्वामी पर अधिरोपित किया गया है, जिसे वन विभाग के माध्यम से वृक्षारोपण में व्यय किया जाएगा।
4. उ. प्र. वृक्ष संरक्षण अधिनियम 1976 तथा भारतीय वन अधिनियम 1927 के प्रावधानों के तहत अवैध वृक्ष कटान हेतु दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।
5. संरक्षित वन क्षेत्र में बिना पूर्व अनुमति मार्ग निर्माण हेतु वन संरक्षण अधिनियम 1980 के अंतर्गत अभियोजन चलेगा।
6. वन विभाग द्वारा समस्त अवैध लकड़ी की जब्ती एवं निस्तारण का कार्य किया जाएगा।
7. TTZ प्राधिकरण द्वारा न्यायालय के समस्त आदेशों के अनुपालन की त्रैमासिक रिपोर्ट पेश की जाएगी।
8. निर्माण पर प्रतिबंध रहेगा
9. अवमानना के लिए पृथक दंड पर भी विचार किया जाएगा। 
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9080 पेड़ भी उसी जगह लगाये जाएँगे और वन विभाग के एक्सपर्ट अधिकारियों के अनुसार 9080 पेड़ों को लगाने के लिए लगभग 36 बीघा ज़मीन चाहिए जो 454 पेड़ों के आसपास ही हो। यानी इसी डालमिया बाग में ये पेड़ लगाए जाने हैं।

अगर CEC मैनेज होती है तो वृंदावन के लोग इसमें CONTEMPT फाइल करेंगे। जजमेंट को तोड़ मरोड़ कर पेश करना ख़ुद एक ऑफेंस है।

टिम्बर कलेक्शन वन निगम एटा द्वारा किया जा रहा है जहाँ उनकी नीलामी होगी, 
ये बिल्डर द्वारा नहीं किया जा रहा।
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फिर NGT ने भी सुप्रीम कोर्ट के आदेश की रोशनी में अपने यहां लंबित याचिकाओं का निस्‍तारण करते हुए कहा, चूंकि डालिमया बाग से सैकड़ों हरे पेड़ काटे जाने पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेश याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत सभी बिंदु कवर करता है इसलिए अब NGT के समक्ष इस विषय में कोई स्वतंत्र विवाद शेष नहीं रह जाता। 
NGT ने अपने आदेश में स्वयं सुप्रीम कोर्ट के आदेश (रिपोर्ट संख्या 35/2024 के अनुच्छेद 14) को शब्दशः उद्धृत करते हुए कहा कि हम रिपोर्ट संख्या 35/2024 के अनुच्छेद 14 में दी गई सिफारिशों को स्वीकार करते हैं। 
सूत्रों से प्राप्‍त जानकारी के अनुसार सुप्रीम कोर्ट से सख्त निर्णय आने के बाद अब जबकि डालिमया बाग पर हाउसिंग प्रोजेक्ट खड़ा करने का सपना कभी पूरा होता दिखाई नहीं दे रहा और उसके नाम पर हड़पी गई हजारों करोड़ रुपए की रकम भी खुर्द-बुर्द होती नजर आ रही है तो निवेशकों को गुमराह करने के लिए माफिया तरह-तरह के हथकंडे अपना रहा है। 

नई जानकारी के अनुसार माफिया के गुर्गे न केवल इस तरह की अफवाह फैला रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट से वह जल्द बड़ी राहत पा लेंगे इसलिए हाउसिंग प्रोजेक्ट का काम भी शीघ्र शुरू हो जाएगा, बल्कि वह नए निवेशकों को भी लालच दे रहे हैं कि वह पुराने रेट में सौदा करने का सुनहरा मौका न चूकें। 
दरअसल, इससे माफिया दोतरफा लाभ हासिल करने के प्रयास में है। प्रथम तो जिनका पैसा उसने हड़प रखा है वो पैसे के वापसी के लिए दबाव न बनाएं, और दूसरे नए निवेशकों को टोपी पहनाने में सफल होने पर बाजार में अपनी बर्बाद हो चुकी साख बचाने का काम हो जाए। 

माफिया के गुर्गों ने इसके लिए बाकायदा यह प्रचारित करना प्रारंभ कर दिया है कि गुरू कृपा हाउसिंग प्रोजेक्ट पर जल्द काम शुरू होने वाला है क्योंकि अधिकांश कानूनी बाध्यताओं को पूरा किया जा चुका है। 

माफिया द्वारा फैलाई जा रही अफवाहों का आलम यह है कि उसके गुर्गे अपनी आंखों से काम शुरू होते देखकर आने का दावा करते हैं जिससे शक की कोई गुंजाइश न रहे जबकि हकीकत इसके ठीक उलट है। 

हकीकत तो यह है कि डालमिया बाग में अब भी दूर-दूर तक दरख्तों के अवशेष पड़े देखे जा सकते हैं। वन विभाग का बोर्ड यथावत लगा है और उसके पीछे सन्नाटा पसरा है। 
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

 

शुक्रवार, 28 मार्च 2025

अब कभी पूरा नहीं होगा डालमिया बाग में हाउसिंग प्रोजेक्ट खड़ा करने का ख्‍वाब, लेकिन भ्रम फैलाकर फिर फ्रॉड करने की तैयारी कर रही है शंकर सेठ एंड कंपनी


 वृंदावन के छटीकरा रोड पर स्‍थित डालमिया बाग में हाउसिंग प्रोजेक्ट खड़ा करने का ख्‍वाब अब कभी पूरा नहीं हो सकता, लेकिन शंकर सेठ एंड कंपनी सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लेकर भ्रम फैला रही है। ऐसा करने के पीछे भूमाफिया की टोली का एक मकसद तो यह है कि हाउसिंग प्रोजेक्ट 'गुरू कृपा तपोवन' के नाम पर पूर्व में हड़पे गए हजारों करोड़ रुपए को जायज ठहराया जा सके, और दूसरा इसकी आड़ में फिर फ्रॉड करने का रास्ता साफ हो जाए। 

सच तो यह है कि डालमिया बाग से 454 हरे दरख्त काटने के बाद जब शंकर सेठ पर कानूनी शिकंजा कसा गया तो उसने नित-नई कहानियां गढ़नी शुरू कर दीं। पहले कहा कि मेरा तो इस प्रोजेक्ट से कोई लेना-देना ही नहीं है। फिर वह और उसकी टोली कहने लगी कि जिला प्रशासन से सारी 'सेटिंग' हो गई है और मामला इसी स्तर पर समाप्त हो जाएगा। लेकिन जब बात एनजीटी, इलाहाबाद हाईकोर्ट तथा सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंची और एनजीटी ने बाकायदा एक जांच कमेटी गठित कर दी तो इन्होंने जांच कमेटी से सब रफा-दफा करा लेने का 'शिगूफा' छोड़ दिया। 
अब जबकि उसी जांच कमेटी की सिफारिश पर सुप्रीम कोर्ट ने एक ओर जहां प्रति पेड़ एक लाख रुपए का जुर्माना ठोक दिया और नौ हजार से अधिक नए पेड़ लगाने का आदेश दे दिया तो अब शंकर सेठ एंड कंपनी नया भ्रम फैलाने में जुट गई है। 
सुप्रीम कोर्ट का आदेश कहता है कि ये नौ हजार से अधिक पेड़ डालमिया बाग के निकट एक किलोमीटर के दायरे में नई जमीन खरीद कर लगाने होंगे। यही नहीं, आदेश का अनुपालन होने तक हाउसिंग प्रोजेक्ट पर रोक रहेगी। यदि नक्शा पास करा भी लिया गया तो उसे सर्वोच्च न्यायालय में प्रस्तुत करना होगा। 
यहां यह समझना जरूरी है कि अब तक किसी के नाम डालमिया बाग की कोई रजिस्‍ट्री ही नहीं हुई है। जो हुआ है, वो मात्र एमओयू था जिसके आधार पर न तो नक्शा पास कराया जा सकता है और न निर्माण संबंधी कोई गतिविधि शुरू की जा सकती है। 
जहां तक सवाल नौ हजार से अधिक नए पेड़ लगाने के आदेश का है तो उसका अनुपालन करने के लिए शंकर सेठ एंड कंपनी को 20 एकड़ से अधिक जमीन खरीदनी होगी। 
वन विभाग से प्राप्‍त जानकारी के अनुसार ताज ट्रैपेजियम जोन यानी TTZ क्षेत्र में एक हेक्‍टेयर जमीन पर एक हजार पेड़ लगाने का नियम है। एक हेक्‍टेयर जमीन में 2.47 एकड़ जमीन होती है। इस हिसाब से करीब 9 हेक्टेयर जमीन की दरकार होगी। डालमिया बाग से एक किलोमीटर के दायरे में ये जमीन किस मूल्य पर मिलेगी, इसके बारे में सोचकर ही शंकर सेठ एंड कंपनी को पसीना आ गया होगा।    
गौरतलब है कि एनजीटी की जांच कमेटी ने डालमिया बाग को ग्रीन बेल्ट घोषित करने की भी सिफारिश की है, जिस पर निर्णय आना अभी बाकी है। संभावना यही है कि जब सुप्रीम कोर्ट ने जांच कमेटी की सभी सिफारिशें पूरी तरह मान ली हैं तो आगे ग्रीन बेल्ट घोषित करने की मांग भी मान ली जाएगी।
इसके अलावा बाग में 'गुरूकृपा तपोवन' नामक हाउसिंग प्रोजेक्ट बनाने की आड़ में कच्‍ची पर्चियों पर हड़पे गए हजारों करोड़ रुपए को लेकर भी एक वो याचिका भी सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है, जिसमें शंकर सेठ आदि के खिलाफ सीबीआई और ईडी से जांच कराने की मांग की गई है। 
अब क्या भ्रम फैला रही है शंकर सेठ एंड कंपनी? 
यूं तो शंकर सेठ एंड कंपनी सुप्रीम कोर्ट के आदेश की सच्‍चाई और उसके अनुपालन में आने वाली कठिनाइयों से भली-भांति परिचित होगी। और अगर उसे समझने में कोई दिक्कत पेश आ रही होगी तो पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी जैसे विद्वान समझा ही देंगे जिन्‍हें इन्‍होंने मोटी फीस देकर अपने पक्ष में दलीलें पेश करने को खड़ा किया था, बावजूद इसके यह टोली भरपूर भ्रम फैला रही है। 
माफिया की टोली और इसके गुर्गे निवेशकों से कह रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट से फैसला हमारे मन मुताबिक आया है। कोर्ट ने नक्शा पास कराने पर कोई रोक नहीं लगाई है। जल्द ही हम नक्शा पास कराकर काम शुरू कर देंगे जबकि सच्‍चाई यह है कि जिस जमीन की रजिस्‍ट्री ही नहीं हुई, उसका नक्शा पास कैसे हो सकता है। 
भ्रम फैलाने के पीछे माफिया की टोली का मकसद क्या है? 
सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लेकर भ्रम फैलाने के पीछे माफिया की टोली का बड़ा मकसद यह है कि जिन लोगों की आंखों में धूल झोंक कर ये हजारों करोड़ रुपया ठग चुकी है, उन्‍हें गुमराह किया जा सके। साथ ही जिन लोगों की पूरी रकम नहीं आई है, उनसे बाकी रकम वसूली जा सके। 
चूंकि शंकर सेठ और डालिमया बाग कांड में संलिप्‍त अन्य लोगों से निवेशकों का भरोसा इस दौरान पूरी तरह उठ चुका है, इसलिए भ्रम फैलाने के पीछे एक मकसद यह भी है कि फिर से यह भरोसा पैदा हो जाए जिससे इनके दूसरे रियल एस्टेट प्रोजेक्‍ट पर अब उसका दुष्‍प्रभाव बाकी न रहे। 
ऐसा न होता तो जो शंकर सेठ शुरू में यह कह रहा था कि उसका डालमिया बाग कांड में कोई हाथ नहीं है, उसने फिर अचानक पेड़ काटने की सारी जिम्‍मेदारी अपने ऊपर कैसे ले ली। ये जानते व समझते हुए कि सुप्रीम कोर्ट में अपराध स्‍वीकार कर लेने के बाद वन विभाग के लिए उसे अब स्‍थानीय अदालत में दोषी साबित करना बहुत आसान होगा। यानी जो सजा उस अपराध के लिए मुकर्रर है, वह तो होगी ही। 
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है शंकर सेठ एंड कंपनी अपनी फितरत से बाज नहीं आ रही। अब इसे उसकी मजबूरी कहें या आदतन अपराध की प्रवृत्ति, लेकिन इतना तय है कि डालमिया बाग पर गुरू कृपा तपोवन बनाने का सपना अब कभी पूरा नहीं होगा। 
देखना बस यह है कि निवेशकों से किया गया इनका वायदा कब और किस सूरत में पूरा होता है, अथवा पूरा होता है भी या नहीं। उनसे हड़पी गई रकम उन्‍हें वापस मिलती है या इसी प्रकार भ्रम फैलाकर और गुमराह करके लगातार मूर्ख बनाया जाता है। 
देखना यह भी है अब तक शंकर सेठ एंड कंपनी पर आंख बंद करके भरोसा करने वाले क्या इनके नए हथकंडे पर भरोसा करेंगे, और करेंगे तो कब तक? और जूतों में दाल बंटने की जो नौबत अभी अंदर ही अंदर पनप रही है, वह कब और कैसे सामने आएगी। 
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी 

शुक्रवार, 25 अक्टूबर 2024

वृंदावन के डालमिया बाग मामले में MVDA की भूमिका को लेकर VC एसबी सिंह से कुछ सीधे सवाल...


 वृंदावन के डालमिया बाग मामले में मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण (MVDA) की भूमिका को लेकर VC एसबी सिंह से कुछ सीधे सवाल पूछना अब बहुत जरूरी हो गया है। इन सवालों का संबंध गुरुकृपा तपोवन नामक उस कथित रियल एस्टेट प्रोजेक्ट से है जो डालमिया बाग पर प्रस्‍तावित है तथा जिसकी गूंज प्रदेश की राजधानी लखनऊ के साथ-साथ देश की राजधानी दिल्ली तक सुनाई दे रही है क्योंकि इसमें निवेशकों का करीब एक हजार करोड़ रुपया फंस गया है। यही नहीं, राष्‍ट्रीय हरित प्राधिकरण (NGT) जहां इस पर जांच कमेटी गठित कर चुका है वहीं शासन के निर्देश से मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण की भूमिका को लेकर कमिश्‍नर आगरा मंडल द्वारा भी जांच बैठा दी गई है। इसके अतिरिक्त बाग का मालिक डालमिया परिवार इलाहाबाद हाईकोर्ट जा पहुंचा है। दरअसल, इन्‍हीं सब स्‍थिति-परिस्‍थितियों के मद्देनजर Legend News ने बुधवार की सुबह 9 बजकर 39 मिनट पर MVDA के VC एसबी सिंह को ये WhatsApp मैसेज भेजा- 


VC महोदय ने Legend News को तो इस मैसेज का कोई जवाब देना जरूरी नहीं समझा अलबत्ता कुछ सिलेक्टेड मीडिया कर्मियों के माध्‍यम से MVDA की भूमिका पर लग रहे दागों को धोने की नाकाम कोशिश अवश्य की। 
VC महोदय को ऐसा शायद इसलिए उपयुक्त लगा होगा क्योंकि सिलेक्टेड मीडियाकर्मी सवाल नहीं उठाते, कोई Cross question नहीं करते। 
बहरहाल, VC एसबी सिंह के हवाले से गुरुवार सुबह छपी खबरों के मुताबिक 'तपोवन' के नाम से एक लेआउट 15 अगस्त 2024 को स्वीकृति के लिए पोर्टल पर अपलोड किया गया है। पेड़ों का कटान 18/19 सितंबर की रात किया गया था, जिस कारण अब 'तपोवन' के मानचित्र पर उनके द्वारा NGT में निस्‍तारण न होने तक रोक लगा दी गई है। 
VC महोदय का कथन है कि 'तपोवन' का नक्शा फिलहाल लखनऊ स्‍तर पर स्‍क्रूटनी सेल में विचाराधीन है तथा MVDA को प्राप्त नहीं हुआ है लिहाजा न तो वह MVDA में विचाराधीन है और न ही स्वीकृत किया गया है। 
VC महोदय के अनुसार पोर्टल पर दर्ज अभिलेखों में भूमि के मालिक का नाम नारायण प्रसाद डालमिया अंकित है। 
बहरहाल, डालमिया बाग पर प्रस्तावित आवासीय प्रोजेक्ट को लेकिर VC महोदय का यह एक जवाब ही तमाम नए सवाल खड़े कर रहा है और MVDA की भूमिका पर संदेह तथा नक्शे पर भ्रम की स्‍थिति बढ़ा रहा है। ऐसा लग रहा है जैसे बड़ी शिद्दत से उस पूरे अमले को बचाने की कोशिश की जा रही है जिसने कृष्‍ण की जन्मस्‍थली पर कलंक लगाने का काम किया है। 
फोन रिसीव न करने, कॉल बैक न करने, मैसेज का उत्तर न देने तथा आरटीआई का भी संतोषजनक जवाब न देने के लिए 'कुख्‍यात' MVDA को इस बार खड़े हो रहे सवालों के जवाब किसी न किसी स्‍तर पर तो देने ही होंगे क्‍योंकि अब समय रहते ये उत्तर नहीं दिए गए तो अंतत: न्‍यापालिका सारे उत्तर मांगेगी। 
जो भी हो, VC महोदय का जवाब जो कुछ महत्वपूर्ण सवाल खड़े करता है उनमें सबसे पहला सवाल तो यह है कि पोर्टल पर अपलोड किए जाने वाले नक्शों की सूचना संबंधित प्राधिकरण तक कैसे पहुंचती है और इस सूचना को पहुंचने में कितना समय लगता है? 
2- क्या किसी नक्शे को स्‍वीकृति देने की कोई समय-सीमा शासन स्‍तर से निर्धारित है या प्राधिकरण अपनी सुविधानुसार समय तय करता है? 
3- गुरुकृपा तपोवन का नक्शा स्‍वीकृति के लिए पोर्टल पर अपलोड करने की जानकारी MVDA को कब लगी, वृक्षों के अवैध कटान से पहले या बाद में? 
4- वृक्षों का अवैध कटान हुए एक महीने से ऊपर का समय बीत चुका है और NGT में दायर याचिकाओं पर जांच बैठाए भी 25 दिन हो गए हैं, लेकिन MVDA अब जाकर क्यों बता रहा है कि उसने गुरुकृपा तपोवन के नक्शे पर रोक लगा दी है। 
5- क्या NGT ने MVDA को इस आशय के कोई आदेश-निर्देश दिए हैं या उसने स्‍वत: संज्ञान लिया है? 
6- यदि MVDA ने स्‍वत: संज्ञान लिया है तो यह तब क्यों नहीं लिया गया जब पेड़ कटने के बाद हंगामा मचना शुरू हुआ और यह बात जानकारी में आई कि न तो गुरुकृपा तपोवन का अभी कोई नक्शा पास हुआ है और न उस भूमि की रजिस्‍ट्री हुई है जिस पर यह प्रोजेक्ट प्रस्‍तावित बताया गया? 
7- डालमिया परिवार द्वारा इलाहाबाद हाईकोर्ट को दी गई सूचना बताती है कि उसने अपनी भूमि का कोई नक्शा स्‍वीकृति के लिए नहीं भेजा। न वो गुरुकृपा तपोवन से और न शंकर सेठ नामक किसी व्‍यक्ति से परिचित है। डालमिया परिवार का तो यहां तक कहना है कि उनके यहां शंकर सेठ नाम का कोई नौकर भी नहीं है। तो फिर नारायण प्रसाद डालमिया के नाम से गुरुकृपा तपोवन का नक्शा स्‍वीकृति के लिए किसने पोर्टल पर अपलोड कर दिया और नक्शा अपलोड करने वाले का उद्देश्‍य क्या था? 
8- मथुरा-वृंदावन में प्रस्‍तावित प्रोजेक्ट्स की पूरी जानकारी स्‍क्रूटनी सेल को देने का जिम्मा किसका है? 
9- स्‍क्रूटनी का मतलब ही होता है किसी चीज़ के बारे में पूरी जानकारी प्राप्त करने के लिए उसकी सावधानीपूर्वक और विस्तृत जांच करना, तो क्या स्‍क्रूटनी सेल दो महीने बाद भी यह पता लगाने में असमर्थ है कि नारायण दास डालमिया तथा गुरूकृपा बिल्डर्स के बीच कोई व्‍यावसायिक संबंध है भी या नहीं? 
10- क्या MVDA आज भी यह स्‍पष्‍ट कर सकता है कि डालमिया बाग पर प्रोजेक्ट की स्‍वीकृति के लिए गुरुकृपा तपोवन ने अपने मालिकाना हक साबित करने के पक्ष में तथा नक्शा पास कराने के लिए जरूरी अन्य दस्‍तावेजों में कौन-कौन से पेपर्स सबमिट किए हैं? 
11- VC महोदय के अनुसार जो नक्शा स्‍वीकृति के लिए अपलोड किया है, वो मात्र 'तपोवन' के नाम से है जबकि नक्शे में प्रोजेक्ट का नाम साफ-साफ गुरुकृपा तपोवन लिखा है जो शंकर सेठ की फर्म का नाम है। तो क्या पूरा नाम न बताने के पीछे भी कोई कारण है?
 
प्रश्‍न और भी बहुत हैं किंतु फिलहाल इनके ही जवाब मिल जाएं तो काफी हद तक भ्रम दूर हो सकता है अन्यथा MVDA की भूमिका पर संदेह कम होने की बजाय बढ़ेगा ही क्योंकि MVDA की कार्यप्रणाली पहले ही हमेशा से संदेह के घेरे में रहती है। 
VC महोदय चूंकि पहले भी कृष्‍ण की इस नगरी में अपनी सेवाएं दे चुके हैं तो वह भलीभांति इस सच्‍चाई से वाकिफ होंगे। फिर अब तो मामला एक इतने बड़े घपले से जुड़ा है जिसे सिर्फ एक नक्शे से अंजाम दे दिया गया। ऐसे में जांच होगी तो दूर तक जाएगी ही। NGT इस पर अपना क्या निर्णय देता है, इसका MVDA से दूर-दूर तक कोई वास्‍ता फिलहाल नजर नहीं आता। 
बेहतर होगा कि मूल प्रश्‍नों को भटकाने की जगह मुद्दे की बात की जाए, और मुद्दा यही है कि 15 अगस्‍त को गुरुकृपा तपोवन का जो नक्शा अपलोड करके या उससे भी पहले हजार करोड़ से अधिक का फ्रॉड किया गया उसमें प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से किस-किस ने भूमिका अदा की है तथा उस भूमिका के एवज में क्या-क्या हासिल किया है? 
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

बुधवार, 23 अक्टूबर 2024

...तो डालमिया बाग मामले में 120B के आरोपी बनाए जाएंगे MVDA के कई अधिकारी और कर्मचारी

 


 वैसे तो समूचे उत्तर प्रदेश के विकास प्राधिकरण अपनी भ्रष्ट कार्यप्रणाली को लेकर अच्छे-खासे बदनाम हैं, लेकिन अगर बात करें मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण (MVDA) की तो यहां तैनात उसके अधिकारी एवं कर्मचारी बाकायदा अपराधियों के किसी संगठित गिरोह की तरह काम करते हैं। इसमें सबकी अपनी भूमिका और उसके अनुसार सबकी हिस्‍सेदारी भी तय है। कोई किसी के काम में दखल नहीं देता, इसलिए सबकुछ बहुत सहजता के साथ चलता रहता है। 

ताजा मामला वृंदावन के डालमिया बाग का है जिस पर एक रियल एस्‍टेट प्रोजेक्ट खड़ा करने के लिए गुरुकृपा तपोवन के नाम से MVDA में नक्शा मूव किया गया और नक्शा पास हुए बिना ही प्‍लॉट बुक करने शुरू कर दिए। यही नहीं, माफिया ने मात्र एक नक्शे की आड़ में अनुमानत: एक हजार करोड़ रुपया एकत्र कर लिया। चूंकि माफिया ने निवेशकों से एक बड़ी रकम हथिया ली थी इसलिए उसे एक ओर जहां डालमिया बाग पर अपना कब्जा दिखाना था वहीं दूसरी ओर ये भी जाहिर करना था कि उसका काम पूरी प्रगति पर है लिहाजा उसने बाग के साढ़े चार सौ से अधिक हरे वृक्षों को रातों-रात कटवा डाला। हरे वृक्षों के इस अवैध कटान ने माफिया की  बदनीयति सामने लाकर रख दी। 
MVDA की भूमिका पहले दिन से संदिग्ध 
मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण ने हालांकि पेड़ कटने के बाद अपना मुंह साफ रखने की कोशिश में प्राधिकरण की रेलिंग काटने का एक केस भी दर्ज कराया किंतु उसका मुंह साफ हो नहीं पा रहा, जिसके कुछ ठोस कारण हैं। 
सबसे पहला और बड़ा कारण तो यह है कि MVDA के जो अधिकारी एवं कर्मचारी अपने क्षेत्र में छोटे से छोटे अवैध निर्माण को सूंघते फिरते हैं और उसके खिलाफ कार्रवाई का भय दिखाकर मनमानी वसूली करने जा धमकते हैं, वो एक ऐसे रियल एस्टेट प्रोजेक्ट की आड़ में की जा रही अवैध बुकिंग पर क्यों मौन साधे रहे जिसका नक्शा उसके यहां विचाराधीन था लेकिन पास नहीं किया गया था। नियमानुसार MVDA को नक्शा पेश किए जाने की सूचना सार्वजनिक करनी चाहिए थी, जो उसने नहीं की। 
ताज्जुब इस बात का भी है कि MVDA आज तक गुरुकृपा तपोवन के नक्शे की असलियत पर चुप्‍पी साधे बैठा है जबकि निवेशक अपनी रकम डूब जाने के भय से माफिया के यहां चक्कर काट रहा है। विकास प्राधिकरण की यही चुप्पी उसकी माफिया से मिलीभगत का दूसरा संकेत है। 
नक्शा पास कराने के लिए पेश सपोर्टिंग पेपर्स की स्थिति तक स्पष्ट नहीं 
यहां गौर करने वाली बात यह है कि किसी भी प्रोजेक्ट, यहां तक कि घर-दुकान या मकान का नक्शा पास कराने के लिए नक्शे के साथ कुछ सपोर्टिंग पेपर्स भी सबमिट करने होते हैं जिनमें सबसे जरूरी होता है मालिकाना हक साबित करना। इसके बाद नंबर आता है विभिन्न विभागों के नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (NOC) लगाने का जो आवश्‍यकता अनुसार लगाने होते हैं। 
ऐसे में एक महत्वपूर्ण सवाल खुद-ब-खुद सामने खड़ा हो जाता है कि गुरुकृपा तपोवन का नक्शा पास कराने के लिए मालिकाना हक साबित करने वाले पेपर्स पेश किए गए हैं या नहीं, और किए गए हैं तो मालिकाना हक किसके पास बताया गया है। 
यह मान भी लिया जाए कि MVDA को न तो डालिमया बाग में सैकड़ों हरे वृक्ष खड़े होने की कोई जानकारी थी और न रजिस्ट्री होने-न होने का कुछ पता था तब भी उसे यह स्‍पष्‍ट करना चाहिए कि गुरुकृपा तपोवन का नक्शा पास कराने किसने भेजा तथा किस आधार पर भेजा। 
डालमिया बाग पर उपजे विवाद को अब एक महीने से ऊपर का समय बीत चुका है। जाहिर है कि अब तक तो MVDA को काफी कुछ पता लग चुका होगा, किंतु आज भी MVDA का कोई अधिकारी या कर्मचारी इस मुद्दे पर अपना मुंह खोलने को तैयार नहीं। आखिर क्यों?  
आज भी 'लीजेण्‍ड न्‍यूज़' ने MVDA के उपाध्‍यक्ष श्‍याम बहादुर सिंह को whatsapp मैसेज भेजकर गुरुकृपा तपोवन के नक्शे पर विभाग की स्‍थिति सामने रखने का अनुरोध किया लेकिन मैसेज भेजे हुए कई घंटे बीत जाने के बावजूद कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली।     
हजार करोड़ की ठगी में किस-किस की हिस्सेदारी 
मात्र एक फर्जी नक्शा पेश करके पब्‍लिक से करीब हजार करोड़ रुपए ठग लिए गए लेकिन विकास प्राधिकरण मुंह सिल कर बैठ जाए तो इसका क्या अर्थ निकालता है, इसे समझना कोई मुश्‍किल काम नहीं। 
गुरुकृपा तपोवन के नाम पर जो आपराधिक कृत्य किया गया वह सीधे-सीधे IPC की धारा 420, 467, 468 और 471 के अलावा 120B का गंभीर अपराध है क्योंकि एक ऐसे प्रोजेक्ट का सब्‍जबाग दिखाकर हजार करोड़ रुपया ठग लिया गया जिसका मालिकाना हक तो दूर नक्शा तक पास नहीं हुआ। जिसे लेकर कोई एग्रीमेंट नहीं हुआ। जो हुआ, वो सिर्फ और सिर्फ एक Memorandum of understanding (MOU) है यानी कोई सौदा करने के लिए दो पक्षों के बीच अंडरस्‍टेंडिंग। 
चूंकि विकास प्राधिकरण इतना सब हो जाने पर भी अपनी स्‍थिति स्‍पष्‍ट करने को तैयार नहीं है इसलिए इससे यही संदेश जाता है कि उसकी माफिया से मिलीभगत है।  ऐसा न होता तो जनहित में ही सही, वह कम से कम सच्‍चाई तो सामने ला ही सकता है ताकि अपने प्‍लॉट बुकिंग की कच्‍ची पर्ची हाथ में लेकर घूम रहे लोगों को तो पता लग सके कि वास्‍तविकता क्या है। 
यदि वह ऐसा नहीं करता तो साफ है कि उसके भी कई अधिकारी एवं कर्मचारी न केवल हजार करोड़ की ठगी करने वाले गिरोह से मिले हुए हैं बल्‍कि वह उसका हिस्‍सा भी हैं जो उनको IPC की धारा 120B का आरोपी बनाने के लिए पर्याप्त है। 
सबकुछ कमिश्नर द्वारा गठित जांच कमेटी की रिपोर्ट पर निर्भर 
अब जबकि मंडलायुक्त ऋतु माहेश्वरी ने शासन के निर्देश पर इस मामले में मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण की भूमिका का पता लगाने को 3 सदस्‍यीय जांच कमेटी का गठन कर दिया है तो सबकुछ उस रिपोर्ट पर निर्भर करता है, लेकिन इतना तय है कि MVDA के अधिकारियों के लिए तमाम प्रश्‍नों के उत्तर देना बहुत मुश्‍किल होगा। 
संभवत: यह पहली बार होगा जब माफिया और अधिकारियों का गठजोड़ बेनकाब होगा और आमजन भी यह जान सकेगा कि कैसे योगी सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद प्रदेश में भ्रष्टाचार एवं भ्रष्‍टाचारी फल-फूल रहे हैं क्योंकि एक ओर कमिश्नर आगरा ऋतु माहेश्‍वरी बहुत सख्त मिजाज अधिकारी हैं तो दूसरी ओर जांच कमेटी में शामिल तीनों उच्‍च अधिकारी भी ईमानदार बताए जाते हैं। बस इंतजार है तो निर्धारित 15 दिन पूरे होने का। 
-Legend News   

गुरुवार, 10 अक्टूबर 2024

डालमिया मामले में विस्फोटक खुलासा: वृंदावन के बाग का कोई एग्रीमेंट हुआ ही नहीं, पोंजी स्कीम की तरह माफिया ने किया हजारों करोड़ का फ्रॉड


 मथुरा। वृंदावन के डालमिया बाग का मामला कोई सामान्य सौदा न होकर पूरी साजिश से किया गया हजारों करोड़ रुपए का ऐसा फ्रॉड है जिसे पहले तो माफिया ने पोंजी स्‍कीम की तरह अंजाम तक पहुंचाया और फिर निवेशकों को उसके जाल में फंसाकर मोटी रकम हड़पी गई। 

धर्म की नगरी में अधर्म के सहारे खेले गए इस खेल की कोई सामान्य कारोबारी तो कल्पना तक नहीं कर सकता। 
डालमिया परिवार के साथ वृंदावन के बाग का नहीं हुआ कोई एग्रीमेंट 
किसी को भी यह जानकार घोर आश्चर्य हो सकता है कि डालमिया परिवार ने वृंदावन के अपने बाग का कोई एग्रीमेंट नहीं किया। जिसे एग्रीमेंट बता कर निवेशकों को गुमराह किया गया, वह वास्‍तव में मात्र एक Memorandum of understanding (MOU) है, न कि एग्रीमेंट। सामान्य भाषा में कहें तो एमओयू और एग्रीमेंट के बीच मुख्य अंतर है उनकी कानूनी प्रवर्तनीयता (Enforceability)। एग्रीमेंट कानूनी रूप से बाध्यकारी एक दस्तावेज है जबकि एमओयू नहीं। 
कोलकाता के डालमिया परिवार ने वृंदावन निवासी गिर्राज अग्रवाल तथा मथुरा निवासी आशीष कौशिक की पार्टनरशिप फर्म राधामाधव डेवलेपर्स के साथ वर्ष 2023 में एक एमओयू साइन किया है जिसकी कोई कानूनी अहमियत नहीं है। उसे बाग के सौदे का कोई दस्तावेज नहीं माना जा सकता। यदि बाग के सौदे का कोई एग्रीमेंट हुआ होता तो अनुबंध की शर्तों का उल्लंघन करने वाले को अदालत में घसीटा जा सकता था लेकिन एमओयू साइन करने भर से ऐसा नहीं किया जा सकता। 
इसका सीधा-सीधा अर्थ यह होता है कि डालमिया परिवार द्वारा सौदा कैंसिल किए जाने की चर्चा निराधार नहीं है। वह जब चाहे एमओयू को खारिज कर सकता है। 
कोलकाता में तो एग्रीमेंट कराया ही नहीं जा सकता था 
यहां यह भी समझना बहुत जरूरी हो जाता है कि डालिमया परिवार किसी भी तरह कोलकाता में बैठकर बाग का एग्रीमेंट नहीं कर सकता और यह बात दोनों पक्ष भली प्रकार जानते होंगे। कानूनन किसी जमीन का एग्रीमेंट उसी तहसील क्षेत्र में रजिस्‍टर्ड हो सकता है जहां वह जमीन है, न कि किसी दूसरे शहर में। 
इसके अलावा रजिस्‍टर्ड एग्रीमेंट के लिए यह आवश्यक है कि विक्रेता द्वारा क्रेता से ली जा रही रकम पर निर्धारित स्‍टांप ड्यूटी देय होगी। यदि ऐसा नहीं किया जाता तो यह कृत्य कर की चोरी के दायरे में आता है जिससे बड़ी मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। 
जाहिर है कि ऐसे में डालमिया बाग के सौदे को लेकर अब तक प्रचारित की गईं सभी बातें न सिर्फ भ्रामक हैं बल्‍कि किसी खास उद्देश्‍य की पूर्ति के लिए फैलाया गया सोचा-समझा झूठ है। 
डालमिया परिवार और राधामाधव डेवलेपर्स के दो साझेदारों गिर्राज अग्रवाल तथा आशीष कौशिक द्वारा साइन किए गए एमओयू से पूरी तरह साबित होता है कि सैकड़ों करोड़ के इस सौदे की शुरूआत ही नेकनीयत से नहीं की गई। 
बेशक यह जांच का विषय हो सकता है कि ऐसा करने के पीछे मूल रूप से बदनीयती किसकी है, परंतु इस बात में कोई शक नहीं रह जाता कि निवेशकों को गुमराह किया गया और उनसे एग्रीमेंट को लेकर झूठ बोला गया। 
डालमिया परिवार द्वारा सौदे का इनकम टैक्स जमा कराने वाली बात भी नितांत झूठ 
बाग के सौदे को लेकर लगातार बोले जा रहे झूठ का एक हिस्‍सा वह भी है जिसमें कहा गया कि डालमिया परिवार ने तो ली गई रकम पर बनने वाला इनकम टैक्स भी जमा करा दिया है जबकि मात्र एमओयू साइन करने की स्‍थिति में कोई टैक्स बनता ही नहीं। 
एग्रीमेंट कराया होता तो नंबर एक में लिए गए पेमेंट का पूरा ब्‍यौरा देना पड़ता किंतु एमओयू साइन करने के लिए उसकी दरकार नहीं होती। डालमिया परिवार ने इसीलिए एमओयू में प्राप्त रकम तथा बकाया रकम का जिक्र तो जरूर किया है परंतु इसका उल्लेख कहीं नहीं किया कि वो रकम उसे किस माध्‍यम से प्राप्त हुई।  
मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण भी साजिश में शामिल 
इस पूरे प्रकरण को गौर से देखें तो मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण भी पूरी साजिश का हिस्‍सा मालूम पड़ता है क्योंकि उसके जिम्मेदार अधिकारी अब तक मौन साधे बैठे हैं। 
बिना नक्शा पास कराए मामूली निर्माण की सूचना पाकर किसी के भी यहां जा धमकने वाले और नोटिस पर नोटिस जारी करने वाले विकास प्राधिकरण के अधिकारियों ने डालमिया बाग मामले में कोई संज्ञान नहीं लिया। 
सब जानते हैं कि डालमिया बाग में रियल एस्टेट प्रोजेक्ट डेवलेप करने के लिए गुरूकृपा तपोवन के नाम से एक नक्शा पेश किया गया है। यह नक्शा मीडिया में भी प्रकाशित व प्रचारित हो चुका है। इसी नक्शे को आधार बनाकर निवेशकों को आकर्षित किया गया और उनसे अच्‍छी-खासी रकम ऐंठी गई। 
डालमिया बाग से रातों-रात सैकड़ों हरे पेड़ काटे जाने के बाद जब यह मामला चर्चा में आया और वनविभाग ने डालमिया परिवार के साथ गुरुकृपा तपोवन के मालिक का नाम भी एफआईआर में दर्ज कराया तो गुरुकृपा तपोवन के मालिक ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि उसका इस मामले से कोई लेना-देना नहीं है। 
चूंकि डालमिया परिवार और राधामाधव डेवलेपर्स के बीच साइन हुए एमओयू में भी गुरुकृपा तपोवन के मालिक का नाम नहीं है तो सवाल यह पैदा होता है कि मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण में गुरूकृपा तपोवन के नाम से नक्शा किसने पेश कर दिया? 
इससे भी बड़ी बात यह है कि मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण की ओर से गुरूकृपा तपोवन का नक्शा न तो आज तक खारिज किया है और न फर्जी नक्शा पेश करने वाले के खिलाफ कोई कानूनी कार्यवाही अमल में लाई गई है। 
आश्‍चर्यजनक रूप से गुरुकृपा तपोवन के मालिक ने भी नक्शा पेश करने वाले के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करना जरूरी नहीं समझा जिससे मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण की भूमिका पर संदेह होना स्‍वाभाविक है। 
पोंजी स्कीम की तरह माफिया ने किया हजारों करोड़ का फ्रॉड 
एक अनुमान के अनुसार कथित रियल एस्‍टेट प्रोजेक्ट गुरुकृपा तपोवन के नाम पर अब तक एक हजार करोड़ रुपए से अधिक की रकम बतौर एडवांस ली जा चुकी है जबकि ऐसा कोई प्रोजेक्ट फिलहाल धरातल पर है ही नहीं। डालमिया बाग का एग्रीमेंट होना तो दूर, उसके अंजाम तक पहुंचने की संभावना दिखाई नहीं दे रही। 
जो एमओयू साइन किया गया है, उसकी कोई कानूनी अहमियत नहीं है। बावजूद इसके निवेशकों को लगातार गुमराह किया जा रहा है। कहा जा रहा है कि सब ठीक कर देंगे। पैसे में बड़ी ताकत है। 
अभी और खुलेंगे बहुत से राज 
ऐसे में तय है कि अभी बहुत से राज खुलने बाकी हैं। जैसे कि राधामाधव डेवलेपर्स में गिर्राज अग्रवाल तथा आशीष कौशिक के अतिरिक्त भी क्या और पार्टनर है, यदि हैं तो वो कौन-कौन हैं। उनकी भूमिका अब तक क्या रही है। निवेशकों से पैसा किस-किस ने लिया और किस आधार पर लिया। 
ईडी ने ली इनकम टैक्स विभाग से जानकारी 
सूत्रों से प्राप्‍त जानकारी के अनुसार इस मामले में ईडी ने इनकम टैक्स विभाग से भी जानकारी मांगी है ताकि राधामाधव डेवलेपर्स के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष हिस्‍सेदारों का पता लगाया जा सके, साथ ही इस फर्म का वास्तविक स्‍टेटस जाना जा सके। 
ईडी को पूरा भरोसा है कि कृष्‍ण की पावन जन्मभूमि पर जमीन की आड़ में खेले गए इस सबसे बड़े खेल का पर्दाफाश होगा तो बहुत से चौंकाने वाले चेहरे बेनकाब होंगे। 
बस देखना यह है कि उसके शिकंजे में कौन-कौन फंसता है और कब तक फंसता है क्योंकि सरकारी मशीनरी की कछुआ चाल से फिलहाल तो माफिया के बुलंद हौसले सबको चुनौती देते दिखाई दे रहे हैं। हालांकि यह मानने वालों की भी कमी नहीं जो कहते हैं कि इन्‍होंने सैकड़ों हरे पेड़ों को काटकर जो पाप किया है, वही एक दिन इन्‍हें कहीं का नहीं छोड़ेगा। 
बहरहाल, इस सबसे इतर यह जानकर निश्‍चित ही निवेशकों पर पहाड़ टूट पड़ेगा जब उन्‍हें पता लगेगा कि डालमिया परिवार से बाग का सौदा और एग्रीमेंट किए जाने जैसी बातें पूरी तरह बेबुनियाद हैं, लिहाजा उनका पैसा पूरी तरह खटाई में पड़ चुका है। 
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

मंगलवार, 8 अक्टूबर 2024

ED की सक्रियता से डालमिया बाग के खरीदारों में खलबली, भूमिगत होने या विदेश भाग जाने की आशंका


 मथुरा। वृंदावन के डालमिया बाग मामले में अब ED की सक्रियता बढ़ जाने से खरीदारों में भारी खलबली देखी जा रही है। आशंका है कि उनमें से कुछ लोग या तो भूमिगत हो सकते हैं, या फिर देश छोड़कर भी भाग सकते हैं। हालांकि ED को भी इस बात का अंदाज है लिहाजा उसने ऐसे लोगों की हर गतिविधि पर अपनी पैनी नजर गड़ा रखी है। 

दरअसल, इस खरीद-फरोख्‍त में बढ़ती प्रवर्तन निदेशालय यानी ED की सक्रियता का बड़ा कारण इसके धन शोधन (मनी लॉन्ड्रिंग) अर्थात ब्‍लैक मनी को सफेद बनाने तथा विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (FEMA) के तहत आने की प्रबल संभावना दिखाई देना है। यही वजह है कि ED ने इस पर तेजी से काम करना शुरू कर दिया है। 
ED से जुड़े अत्यंत भरोसेमंद सूत्रों के अनुसार केंद्र सरकार की इस स्‍वतंत्र जांच एजेंसी ने प्राथमिक जानकारी जुटाने के लिए अपने कुछ बिंदु भी तय कर लिए हैं। ये ऐसे बिंदु हैं जिनसे एजेंसी न केवल इस पूरे मामले की तह तक जा सकती है बल्‍कि इसमें शामिल सफेदपोश अपराधियों के चेहरे भी सामने ला सकती है। 
ED क्या-क्या जानना चाहती है 
ED इस मामले में सबसे पहले तो यह जानकारी चाहती है कि वृंदावन की जिस रियल एस्‍टेट फर्म का नाम अब तक इस सौदे में सामने आया है, उसका स्टेटस क्या है? 
वह एक पार्टनरशिप फर्म है या किसी व्यक्ति विशेष के हक वाली प्रोपराइटरशिप में रजिस्‍टर्ड है? 
यदि वह एक पार्टनरशिप फर्म है तो उसके पार्टनर कितने हैं और उनकी हिस्‍सेदारी कितनी-कितनी है? 
डालमिया बाग का सौदा करते वक्त इस फर्म में कितने हिस्‍सेदार थे और क्या सौदा हो जाने के बाद अन्य लोग हिस्‍सेदार बनाए गए? 
अगर सौदा हो जाने के बाद और हिस्‍सेदार बनाए गए तो उनकी संख्‍या तथा उनका हिस्‍सा कितना-कितना रखा गया? 
जैसा अब तक प्रचारित किया गया है कि डालमिया परिवार ने अपने बाग का पूरा सौदा नंबर एक में किया है और खरीदारों से पैसा भी नंबर एक में लिया है तो पूरी पैसा मिल जाने के बावजूद उसने बाग की रजिस्ट्री क्यों नहीं की, रजिस्‍ट्री करने के लिए डालिमया परिवार किस बात का इंतजार कर रहा था? 
इस सबके अलावा ED यह भी जानना चाहती है कि बिना रजिस्‍ट्री किए ही डालमिया परिवार ने खरीदारों को जमीन पर काबिज होने की क्या कोई लिखित अथवा मौखिक सहमति दी थी? 
अगर डालमिया परिवार ने ऐसी कोई सहमति दी थी तो वो किसे दी थी और कब दी थी?
 
कॉलोनी डेवलव करने के लिए नक्शा किसने पेश किया
ED के सामने एक यक्ष प्रश्‍न यह है कि वो कौन से तत्व हैं जिन्होंने बाग की रजिस्‍ट्री कराने से पहले ही मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण में गुरूकृपा तपोवन के नाम से कॉलोनी डेवलव करने के लिए नक्शा पेश कर दिया क्योंकि इस पूरे प्रकरण में अब तक सिर्फ एक नाम सर्वाधिक चर्चित रहा है, और वह नाम है किसी शंकर सेठ का जो गुरूकृपा बिल्डर्स का मालिक बताया जाता है तथा जिसने इस नाम से पहले भी दूसरे प्रोजेक्ट खड़े किए हैं। 
आश्‍चर्यजनक बात यह है गुरूकृपा तपोवन के नाम से विकास प्राधिकरण में नक्शा पेश किए जाने की अब तक न तो किसी ने जिम्मेदारी ली है और न ही खंडन किया है जबकि उसी नक्शे के आधार पर निवेशकों से बड़ी रकम ली गई तथा उसी नक्शे के हिसाब से कॉलोनी की प्‍लॉटिंग की गई।  
बताया जाता है कि शंकर सेठ वृंदावन में ही छटीकरा रोड पर गुरूकृपा के नाम से एक अन्य प्रोजेक्ट बना रहा है और उसका नक्शा उसने विकास प्राधिकरण से पास भी कराया है। ये बात अलग है कि उस नक्शे को पास कराने में भी हेराफेरी किए जाने की शिकायतें अब मिली हैं, जिनकी जांच शुरू हो चुकी है। 
बहरहाल, ED को इस पूरे खेल में किसी बड़ी आपराधिक साजिश की बू आ रही है इसलिए वह यह भी पता लगाने में जुटी है कि गुरूकृपा तपोवन कॉलोनी के नाम पर निवेशकों से एडवांस में मोटी रकम लेने वाले कौन-कौन लोग हैं और उन्होंने किस हैसियत से यह रकम ली थी? 
ED यह मानकर चल रही है कि डालमिया बाग का प्रकरण भले ही सैकड़ों हरे पेड़ काटने के बाद मीडिया की नजर में आया हो किंतु इसके तार ऐसे गहरे आपराधिक षडयंत्र से जुड़ रहे हैं जिसमें मनी लॉन्ड्रिंग से लेकर फेमा तक और आम निवेशकों एवं आम जनता से हजारों करोड़ रुपए ठगने तक का सुनियोजित अपराध बनता है।
 
ED का शक निराधार इसलिए नहीं है कि रातों-रात सैकड़ों पेड़ काट डालने वालों में से एक भी व्यक्ति अब सामने आकर कुछ बोलने को तैयार नहीं है। वो भी तब जबकि निवेशक परेशान हैं अपने पैसों को लेकर, और वृंदावनवासी दुखी हैं उनके दुस्‍साहस तथा जिला प्रशासन की अकर्मण्‍यता एवं भ्रष्‍टाचार को लेकर। 
ED को तो यह भी शक है डालमिया बाग का सौदा करके व उस पर काबिज होकर हजारों करोड़ रुपया जुटाने के लिए पेशेवर आर्थिक अपराधियों की तरह ऐसे-ऐसे हथकंड़े अपनाए गए हैं जो आरोप सिद्ध हो जाने की स्‍थिति में अंतत: वर्षों कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटने के बाद आजन्म कैद जैसी सजा तक ले जाते हैं। 
इन आर्थिक अपराधियों को भी संभवत: इस बात का इल्म हो चुका है इसलिए वो आरोपों का सामना करने के बजाय नित नई कहानी गढ़ने तथा मीडिया को मैनेज करने में लगे हैं ताकि ED के शिकंजे में फंसने से पहले समय रहते या तो भूमिगत हो जाएं या फिर विदेश भाग निकलें, क्योंकि अब न तो डालमिया बाग पर प्रोजेक्ट खड़ा करना आसान होगा और न निवेशकों का भरोसा बहाल हो सकेगा।
 
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

 

डालमिया बाग का एंग्रीमेंट कैंसिल करने की खबर से परेशान माफिया अब मीडिया को मैनेज करने में जुटा


 मथुरा। वृंदावन के डालमिया बाग का एग्रीमेंट कैंसिल करने की खबर से परेशान माफिया अब मीडिया को मैनेज करने में जुट गया है, क्योंकि एग्रीमेंट कैंसिल होने की खबर के बाद निवेशकों ने उस पर पैसा लौटाने के लिए अच्‍छा-खासा दबाव बनाना शुरू कर दिया है। 

सैकड़ों हरे पेड़ों को काटने की जिम्मेदारी लेने से भी भाग रहे माफिया ने आज तक न तो अपने ''कथित नंबर एक'' में हुए सौदे की सच्‍चाई सामने रखी है और न ये बताया है कि आखिर डालमिया परिवार से उसके बगीचे का एग्रीमेंट किस-किसने किया तथा किन शर्तों पर किया। 
ऐसे में अब इस पूरे सौदे पर उठ रहे कुछ ऐसे सवाल ''माफिया'' से लेकर ''मीडिया'' तक को सवालों के घेरे में ले रहे हैं जिनका जवाब देना उनके लिए जरूरी हो जाता है, और यदि वो उसके जवाब नहीं देते तो उनकी नीयत स्‍वत: संदिग्ध साबित हो जाती है। 
कहा जा रहा है कि डालमिया परिवार ने अपने बाग का सौदा आठ समझौता पत्रों (एग्रीमेंट) के जरिए किया तथा हर एग्रीमेंट के साथ एक निर्धारित रकम ली गई और डालिमया परिवार ने एग्रीमेंट में मिली इस रकम का आयकर तक जमा कर दिया। एग्रीमेंट करने वालों ने शंकर सेठ से सौदा बाद में किया।   
बस यहीं से माफिया के साथ-साथ मीडिया की भी नीयत में खोट नजर आने लगता है और ये खोट बहुत महत्वपूर्ण सवाल खड़े करता है। 
सवाल नंबर एक: यदि डालमिया परिवार से आठ समझौता पत्रों के जरिए पूरी नेक नीयत से सौदा किया गया है तो दोनों ही पक्षों को यानी विक्रेता और क्रेता को उसे सार्वजनिक करने में हर्ज क्या है? 
सवाल नंबर दो: किसी भी सौदे का एग्रीमेंट कर लेने भर से वह इनकम टैक्स तो क्या किसी भी टैक्‍स के दायरे में नहीं आ जाता, यह बात छोटे से छोटा व्‍यापारी भी जानता है। तो फिर डालमिया परिवार ने डील फाइनल हुए बिना मात्र एडवांस पर इनकम टैक्स कैसे जमा कर दिया जबकि यह तो ''जीएसटी तथा कैपिटल गेन'' का भी मामला नहीं बनता। इस बात की पुष्‍टि किसी भी चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) से की जा सकती है।   
सवाल नंबर तीन: कहीं ऐसा तो नहीं कि यह सारा खेल मीडिया को मैनेज करके निवेशकों को गुमराह करने के लिए खेला जा रहा हो जिससे किसी भी तरह अपने ऊपर पड़ रहे दबाव को कम किया जा सके। 
सवाल नंबर चार: जब डालमिया परिवार से सौदा बाकायदा एग्रीमेंट करके किया गया है और हर एग्रीमेंट के साथ एक निर्धारित रकम उसे दी गई है तो शंकर सेठ ने भी अपना सौदा स्‍थानीय खरीदारों से किसी न किसी एग्रीमेंट के साथ किया होगा। शंकर सेठ ने भी अपनी रकम सुरक्षित करने के लिए कोई न कोई लिखा-पढ़ी कराई होगी। तो फिर पेड़ कटने के बाद से लेकर अब तक शंकर सेठ क्यों कह रहा है कि उसका इस सौदे से कोई वास्ता नहीं है और पेड़ों को काटने में उसकी किसी भूमिका का प्रश्‍न ही पैदा नहीं होता। जमानत के लिए कोर्ट में भी उसके वकीलों द्वारा यही दलील क्यों दी गई। 
सवाल नंबर पांच: यदि डालमिया परिवार से लेकर एग्रीमेंट कराने वालों तक और उनसे लेकर शंकर सेठ तक सब के सब पाक साफ हैं, सौदा भी पूरी ईमानदारी से नंबर एक में हुआ है तो सब मिलकर क्यों एक प्रेस कॉन्‍फ्रेंस नहीं कर देते। क्यों नहीं बता देते कि एक रियल एस्टेट प्रोजेक्ट खड़ा करने के लिए यह सौदा किया गया है और सौदे में कोई बदनीयत नहीं है। 
इस प्रेस कॉन्फ्रेस में सब अपनी-अपनी भूमिका भी साफ कर सकते हैं। उसके बाद मुद्दा रह जाएगा केवल सैकड़ों हरे वृक्षों को रातों-रात काट डालने का, तो उसकी जांच चलती रहेगी। एनजीटी में दायर याचिकाओं का भी समय पर निपटारा हो ही जाएगा। 
और आखिरी सवाल यह कि शंकर सेठ की रियल एस्टेट फर्म गुरूकृपा तपोवन के नाम से जो नक्शा मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के पास भेजा गया है, वो किसने और किस अधिकार से दाखिल किया है? 
सच तो यह है कि इनमें से किसी भी सवाल का जवाब देना आसान नहीं है इसलिए सारे सफेदपोश अपना मुंह छिपाए घूम रहे हैं और अब तक किसी ने सीना ठोक कर नहीं कहा कि सौदा उसने किया है। 
बेशक जमीन का सौदा करना गुनाह नहीं, लेकिन वह तब गुनाह बन जाता है जब उसके लिए कानून को ताक पर रखकर नियम विरुद्ध ऐसे-ऐसे काम किए जाएं जो एक ओर अपराध की परिधि में आते हों तथा दूसरी ओर उनसे एक बड़े वर्ग की भावनाएं भी आहत होती हों।  
मीडिया को भी अब एक बात और साफ कर देनी चाहिए कि कब तक वह अतार्किक बातें छापता रहेगा और कब तक सफेदपोशों को बचाने के लिए अपने जमीर का सौदा करता रहेगा। 
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
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