bahujan samaj party लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
bahujan samaj party लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 30 जून 2016

BSP के सतीश मिश्रा की संपत्‍ति में 698 प्रतिशत का इजाफा

नई दिल्‍ली। Rajya Sabha के लिए चुने गए 57 नए सदस्यों में से यूं तो लगभग सभी करोड़पतियों की श्रेणी में हैं लेकिन BSP के सतीश मिश्रा की संपत्‍ति में 698 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। इनमें प्रफुल्ल पटेल, कपिल सिब्बल और सतीश चंद्र मिश्रा सबसे ऊपर हैं। इनमें से करीब 55 सदस्य यानि 96 प्रतिशत करोड़पति हैं। इनमें से 13 सदस्यों के खिलाफ आपराधिक केस चल रहे हैं।
इन सांसदों के पास सबसे ज्यादा संपत्ति
ये सर्वेक्षण एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म की ओर से किया गया। इसके अनुसार प्रफुल्ल पटेल के पास करीब 252 करोड़ रुपए की संपत्ति है, वहीं कपिल सिब्बल के पास 212 करोड़ और बीएसपी के सतीश चंद्र मिश्रा के पास 193 करोड़ रुपए की संपत्ति आंकी गई है। राज्यसभा के नवनिर्वाचित सभी सदस्यों के पास औसतन 35.84 करोड़ रुपए की संपत्ति है।
इनकी संपत्ति में सबसे ज्यादा हुई बढ़ोत्‍तरी
बीजेपी के अनिल दवे की आय सबसे ज्यादा बढ़ी है। इनकी संपत्ति करीब 2,111 प्रतिशत बढ़ी है। 2.75 लाख से ये 60.97 लाख हो गई है। शिवसेना के संजय राउत की संपत्ति में 841 प्रतिशत की बढ़ोत्‍तरी हुई है। ये 1.51 करोड़ से बढ़कर 14.22 करोड़ हो गई है। मिश्रा की संपत्ति करीब 698 प्रतिशत बढ़ी है। मिश्रा की संपत्ति पहले 24.18 करोड़ थी जो अब 193 करोड़ रुपए हो गई है।
13 सदस्यों के खिलाफ आपराधिक केस दर्ज
इस सर्वेक्षण में सामने आया कि राज्यसभा के 13 सदस्यों के खिलाफ आपराधिक केस दर्ज हैं। इनमें से सात लोगों के खिलाफ गंभीर अपराध जैसे मर्डर, धोखाधड़ी, प्रॉपर्टी से जुड़ी बेईमानी और चोरी जैसे केस दर्ज हैं। भाजपा के 3, सपा के 2, कांग्रेस, बीजेडी, बसपा, आरजेडी, डीएमके, शिवसेना और वाईएसआरसीपी के एक सदस्यों के खिलाफ आपराधिक केस दर्ज हैं।
यूपी के 11 राज्यसभा सदस्यों में 4 के खिलाफ केस दर्ज है, बिहार के 5 सदस्यों में से 2, महाराष्ट्र के 6 सदस्यों में से 1, तमिलनाडु के 6 सदस्यों में से एक, कनार्टक के 4 सदस्यों में 1, आंध्रप्रदेश के 4 सदस्यों में 1, मध्यप्रदेश के 3 सदस्यों में से 1, उड़ीसा के3 सदस्यों में से 1 और हरियाणा के 2 सदस्यों में से 1 के खिलाप केस दर्ज है। सबसे कम संपत्ति बीजेपी के अनिल माधव दवे के पास 60 लाख दर्ज हुई है।

रविवार, 29 मई 2016

UP elections: इस बार ”मुन्‍ना भाइयों” पर निर्भर होंगे अधिकांश उम्‍मीदवार

राजनीतिक दृष्‍टिकोण से देश के सबसे बड़े राज्‍य उत्‍तर प्रदेश में अगले साल चुनाव होने हैं। राजनीति के पंडितों का तो यहां तक कहना है कि साल 2016 के जाते-जाते भी यूपी में चुनाव हो सकते हैं।
चुनाव जब भी हों…समय पर हों या समय से पहले हों…यह तो चुनाव आयोग को तय करना है लेकिन एक बात जो तय है, वह यह कि इस बार चुनावी मैदान में उतरने वाले विभिन्‍न राजनीतिक दलों के उम्‍मीदवारों की परीक्षा पिछले सभी चुनावों से कुछ भिन्‍न होगी।
यह परीक्षा इसलिए भिन्‍न होगी क्‍योंकि सूबे के अधिकांश उम्‍मीदवार इस परीक्षा में पास होने के लिए अपने-अपने ”मुन्‍ना भाइयों” पर निर्भर होंगे। यानि परीक्षा के लिए फॉर्म (नामांकन) तो उम्‍मीदवार ही भरेंगे किंतु परदे के पीछे से परीक्षा कोई और दे रहा होगा।
सर्वविदित है कि पिछले सभी चुनावों की तुलना में आगामी चुनावों के दौरान सोशल मीडिया एक बड़ी भूमिका निभाएगा लिहाजा प्रत्‍येक राजनीतिक दल सर्वाधिक जोर सोशल मीडिया पर सक्रियता को लेकर दे रहा है।
भारतीय जनता पार्टी ने तो बाकायदा घोषणा कर दी है कि पार्टी से टिकिट पाने का ख्‍वाब देखने वालों को सोशल साइट्स पर कम से कम 25 हजार फॉलोअर्स जुटाने होंगे।
दूसरे राजनीतिक दल भी अपने-अपने संभावित उम्‍मीदवारों से कुछ ऐसी ही अपेक्षा कर रहे हैं।
संभावित उम्‍मीदवार भी इस सच्‍चाई से वाकिफ हो चुके हैं इसलिए वो फेसबुक, टि्वटर, लिंक्‍डइन तथा गूगल प्‍लस जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर सक्रिय दिखाई देते हैं लेकिन अधिकांश संभावित उम्‍मीदवारों के साथ समस्‍या यह है कि वह स्‍वयं सोशल मीडिया को ऑपरेट करना नहीं जानते।
अर्थात परीक्षा फॉर्म (नामांकन) भले ही उम्‍मीदवार भरेंगे लेकिन असल परीक्षा होगी उन ”मुन्‍ना भाइयों” की जिन्‍हें उम्‍मीदवारों द्वारा सोशल मीडिया को हेंडिल करने के लिए हायर किया जाएगा।
दरअसल, इन चुनावों में जीत का सेहरा उसी के सिर बंधेगा जिसकी ओर युवा वोटर का झुकाव हो जाएगा। वही युवा वोटर जिसके लिए सोशल मीडिया अब माई-बाप बन चुका है। जो एकबार को पारिवारिक सदस्‍यों से दूर रह सकता है किंतु सोशल मीडिया से दूर रहने की कल्‍पना भी नहीं कर सकता। सोशल मीडिया से ही उसके दिन की शुरूआत होती है और सोशल मीडिया से ही वह गुड नाइट करके स्‍वीट ड्रीम देखने बिस्‍तर पर पहुंचता है। इस वोटर की न तो टीवी पर समाचार देखने में कोई रुचि है और न वो अखबार पढ़ता है। उसके लिए देश-दुनिया की जानकारी से अपडेट रहने का एकमात्र माध्‍यम सोशल मीडिया बन चुका है।
शायद इसीलिए प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी अपनी लगभग हर स्‍पीच में बताते हैं कि हमारा देश, दुनिया का सबसे युवा देश है। देश की आबादी में 65 प्रतिशत हिस्‍सा उन युवकों का है जो एवरेज 35 वर्ष की उम्र के हैं।
गौरतलब है कि यह वही वर्ग है जो अपटेड रहने के लिए ही नहीं, हर सामाजिक व राजनीतिक गतिविधि की जानकारी के लिए सोशल मीडिया पर निर्भर है।
वह लाइक और कमेंट्स भी सोशल मीडिया पर चल रहे ट्रेंड के मुताबिक देता है। उसकी हवा का रुख उसी से तय होता है क्‍योंकि उसके लिए अब दुनिया वहीं तक सिमट चुकी है।
उम्‍मीदवारों के सामने चुनौती भी यही होगी कि कौन कितनी अधिक संख्‍या में इस वर्ग को प्रभावित करता है क्‍योंकि अधिकांश उम्‍मीदवार सोशल मीडिया पर सक्रियता के लिए ”मुन्‍ना भाइयों” पर निर्भर होंगे।
बेशक, इसका एक बड़ा कारण राजनीतिक लोगों की व्‍यस्‍तता होती है लेकिन कड़वा सच यह भी है कि सभी राजनीतिक दलों के अधिकांश उम्‍मीदवार उस आयु वर्ग से आते हैं जिसमें उनके लिए सोशल मीडिया तो दूर कंम्‍यूटर, लैपटॉप अथवा स्‍मार्ट फोन को हैंडिल करना किसी सिरदर्द से कम नहीं। यही कारण है कि शासन से प्राप्‍त लैपटॉप भी जनप्रतिनिधियों के नहीं, उनकी दूसरी या तीसरी पीढ़ी के काम आ रहे हैं।
इस विषय पर हांडी में पक रहे चावलों का हाल एक दाने से जान लेने की तरह यदि सूबे के राजनीतिक जगत का हाल जानने के लिए विश्‍व प्रसिद्ध जनपद मथुरा को ही देख लें तो तस्‍वीर काफी हद तक साफ हो जाती है।
मथुरा में कुल पांच विधानसभा क्षेत्र हैं। फिलहाल यहां की शहरी सीट पर कांग्रेस पार्टी से विधायक प्रदीप माथुर काबिज हैं जो फर्राटेदार अंग्रेजी तो बोलते हैं लेकिन कंम्‍यूटर ऑपरेट करने में उतने दक्ष नहीं हैं। इसके लिए उन्‍होंने स्‍टाफ रखा हुआ है और वही उनके सोशल मीडिया अकाउंट को हैंडिल करता है।
गोवर्धन क्षेत्र से बसपा के विधायक राजकुमार रावत के लिए कंम्‍यूटर ऑपरेट करना टेढ़ी खीर है। समय की मांग के अनुरूप वह फेसबुक आदि पर दिखाई तो देते हैं किंतु अपना अकाउंट खुद हैंडिल नहीं कर सकते।
छाता क्षेत्र से राष्‍ट्रीय लोकदल के टिकट पर चुनाव जीतने के बाद पिछले दिनों बसपा ज्‍वाइन कर लेने वाले ठाकुर तेजपाल कहने को तो अध्‍यापक हैं लेकिन कंम्‍यूटर ऑपरेट करना कभी उनके वश की बात नहीं रही। यदि वह इस बार चुनाव मैदान में उतरते हैं तो जाहिर है कि सोशल मीडिया को हैंडिल करना उनके लिए मुश्‍किल पेश करेगा। ये काम या तो उनके पुत्र करेंगे, या फिर स्‍टाफ से काम चलाना होगा। हालांकि कहा ये जा रहा है कि इस बार वह छाता क्षेत्र की अपनी विरासत अपने पुत्र को सौंपने जा रहे हैं।
गोकुल क्षेत्र से रालोद विधायक पूरन प्रकाश कहने को तो खासे शिक्षित हैं किंतु सोशल मीडिया के मामले में वह भी अपने पुत्रों पर निर्भर हैं। अब चुनावों के दौरान उनके पुत्र इसके लिए कितना समय निकाल पाते हैं, यह देखने वाली बात होगी अन्‍यथा उन्‍हें भी अंतत: ”मुन्‍ना भाइयों” पर निर्भर होना पड़ेगा।
इसी प्रकार मांट विधानसभा क्षेत्र से विधायक श्‍यामसुंदर शर्मा भी कम पढ़े-लिखे नहीं हैं लेकिन कंप्‍यूटर ऑपरेट करना उनके लिए भी किसी सिरदर्द से कम नहीं। हो सकता है कि दंत चिकित्‍सक की डिग्रीधारी उनके पुत्र उनके लिए सोशल मीडिया हैंडिल करते हों किंतु चुनावों में उन्‍हें भी यह काम किसी पेशेवर के हवाले करना होगा। यानि होंगे वह भी किसी न किसी ”मुन्‍ना भाई” पर ही निर्भर।
इन वर्तमान विधायकों के अलावा समाजवादी पार्टी से शहरी सीट पर प्रमुख दावेदार अशोक अग्रवाल कहने को तो बालरोग विशेषज्ञ हैं किंतु कंप्‍यूटर से वह उतने ही दूर भागते हैं जितनी दूर कोई पत्रकार, डॉक्‍टरी से भागता है।
शहरी सीट पर बसपा के अब तक घोषित उम्‍मीदवार योगेश द्विवेदी का कंप्‍यूटर से जानकारी भर का वास्‍ता है। यह बात अलग है कि वह स्‍टाफ के माध्‍यम से सोशल साइट्स विशेषत: फेसबुक पर सक्रिय नजर आते हैं।
भाजपा ने यूं तो अभी अपने उम्‍मीदवारों की कोई संभावित लिस्‍ट जारी नहीं की है लेकिन बात करें पिछले प्रत्‍याशी डॉ. देवेन्‍द्र शर्मा की तो पीएचडी होने के बावजूद कंप्‍यूटर ऑपरेट करना तथा सोशल मीडिया को खुद हैंडिल करना उनके लिए भी बड़ी समस्‍या है।
भाजपा के नवनियुक्‍त जिला अध्‍यक्ष और तीन मर्तबा मथुरा के सांसद रहे चौधरी तेजवीर सिंह के लिए कंप्‍यूटर ऑपरेट करना, काला अक्षर भैंस बराबर सरीखा है। पढ़े-लिखे वह भी हैं लेकिन कंप्‍यूटर से वह कभी तालमेल नहीं बैठा पाए। मोबाइल फोन का इस्‍तेमाल उनके लिए कॉल सुनने अथवा करने भर तक सीमित है। इससे आगे उनका उससे भी वास्‍ता नहीं।
इन चंद उदाहरणों के अतिरिक्‍त लगभग सभी पार्टियों के जिला व शहर अध्‍यक्ष ही नहीं प्रदेश व राष्‍ट्र स्‍तर के पदाधिकारियों का भी कंप्‍यूटर ज्ञान या तो नाममात्र का है या फिर उनके लिए भी वह हौवा बना हुआ है।
इन हालातों में यूपी के आगामी चुनाव उम्‍मीदवारों के साथ-साथ पार्टियों की भी दोहरी परीक्षा लेने वाले हैं क्‍योंकि जो तबका उनकी जीत में अहम भूमिका निभाने जा रहा है, उसकी दुनिया सोशल मीडिया तक सिमट चुकी है और जो चुनाव मैदान में उतरने वाले हैं, उनके लिए सोशल मीडिया किसी काले जादू से कम नहीं। हारकर ”मुन्‍ना भाइयों” को हायर करना ही एकमात्र रास्‍ता बचता है।
अब देखना यह होगा कि यह ”मुन्‍ना भाई” किसकी लुटिया डुबोते हैं और किसकी नैया पार लगाते हैं क्‍योंकि गुजारा तो इनके बगैर होने से रहा।
-Legend News

रविवार, 8 दिसंबर 2013

बहिनजी का बर्थ-डे: MP देंगे 5, MLA देंगे 2 लाख

बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) की मुखिया मायावती अगले महीने 15 जनवरी को अपना जन्मदिन बड़े ही धूमधाम से मनाएंगी. इसके लिए पार्टी ने अभी से तैयारियां शुरू कर दी हैं. बीएसपी ने अपने सभी एमपी, लोकसभा प्रभारियों, एमएलए और विधानसभा प्रभारियों से इस अवसर पर पार्टी को आर्थिक मदद देने के लिए भी कहा है. इसके मुताबिक राज्यसभा और लोकसभा में पार्टी के सभी एमपी, लोकसभा चुनाव के संभावित प्रत्याशी 5-5 लाख रुपये और विधानसभा, विधान परिषद् में पार्टी के सभी एमएलए और विधानसभा प्रभारी 2-2 लाख रुपये देंगे. पार्टी के इस फैसले की जानकारी यूपी विधान परिषद् में नेता प्रतिपक्ष नसीमुद्दीन सिद्दीकी, विधानसभा में नेता विरोधी दल स्वामी प्रसाद मौर्य और प्रदेश अध्यक्ष रामअचल राजभर ने 6 दिसंबर को प्रदेश पार्टी मुख्यालय पर आयोजित पार्टी की मासिक समीक्षा बैठक में दी.
असल में पार्टी बीएसपी संस्थापक कांशीराम के समय से ही मायावती का जन्मदिन आर्थिक सहयोग दिवस के रूप में मनाती रही है.

शनिवार, 30 नवंबर 2013

मथुरा से कटेंगे चंदनसिंह और योगेश के टिकट!

(लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष)
राष्‍ट्रीय राजधानी दिल्‍ली सहित पांच राज्‍यों के चुनाव नतीजे सामने आते ही सभी प्रमुख राजनीतिक दलों का पूरा ध्‍यान लोकसभा चुनावों पर केंद्रित हो जायेगा। लोकसभा चुनावों के लिए उत्‍तर प्रदेश में हालांकि कुछ क्षेत्रीय दलों ने काफी समय पूर्व अपने उम्‍मीदवारों की घोषणा कर दी थी लेकिन अब वह उन नामों की फिर से समीक्षा करने में लगे हैं।
चूंकि 2014 के लोकसभा चुनावों में किंग नहीं तो किंगमेकर बनने के लिए दोनों प्रमुख क्षेत्रीय दल सपा और बसपा एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं इसलिए उम्‍मीदवारों के चयन पर पुनर्विचार करना उनकी लगभग मजबूरी बन गई है।
हालांकि समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव किंगमेकर बनने की जगह किंग बनने की जी तोड़ कोशिश कर रहे हैं और इसीलिए एक ओर जहां तीसरे मोर्चे के गठन करने में लगे हैं वहीं दूसरी ओर उत्‍तर प्रदेश से बड़ी सफलता का ख्‍वाब पाले हुए हैं।
यही कारण है कि वह उत्‍तर प्रदेश में पूर्व घोषित अपने उम्‍मीदवारों की फिर से समीक्षा कर रहे हैं और कई उम्‍मीदवारों को बदल भी चुके हैं।
इसी प्रकार बहुजन समाज पार्टी भी काफी गोपनीय तरीके से अब तक घोषित अपने उम्‍मीदवारों की जमीनी हकीकत का आंकलन करवा रही है और पांच राज्‍यों के नतीजे आने के बाद वह अपना पूरा ध्‍यान उम्‍मीदवारों के चयन पर केंद्रित कर देगी।
बहरहाल, लोकसभा चुनावों में देश के अंदर जितनी बड़ी भूमिका उत्‍तर प्रदेश निभाता है, लगभग उतनी ही उत्‍तर प्रदेश में ब्रज क्षेत्र की रहती है।
यूं तो ब्रजक्षेत्र काफी बड़ा है लेकिन यदि हम बात करें केवल उन सीटों की जो मथुरा, आगरा, हाथरस, अलीगढ़, एटा, मैनपुरी, फतेहपुर सीकरी की तो यहां की आठ सीटें न केवल निर्णायक रहती हैं बल्‍कि यहां से मिली हार-जीत समूचे उत्‍तर प्रदेश में राजनीति की दशा व दिशा तय करती है।
संभवत: इसीलिए हर राजनीतिक दल चाहे वह राष्‍ट्रीय हो या क्षेत्रीय, लोकसभा चुनावों में ब्रज क्षेत्र की इन सीटों पर अपना पूरा ध्‍यान केंद्रित रखता है।
भगवान श्रीकृष्‍ण की जन्‍मस्‍थली का गौरव प्राप्‍त मथुरा जनपद की सीट पर जीत-हार के मायने इसलिए और महत्‍वपूर्ण हो जाते हैं क्‍योंकि राजनीतिक नज़रिए से भी इसकी महत्‍ता कम नहीं है।
सभी प्रमुख राजनीतिक दल इस बात को समझते हैं और इसीलिए चाहते हैं कि यहां की सीट उनके खाते में ही जाए।
उल्‍लेखनीय है कि विश्‍वविख्‍यात इस धार्मिक जनपद के लिए अब तक जिन पार्टियों ने अपने उम्‍मीदवार घोषित किए हैं, उनमें समाजवादी पार्टी के ठाकुर चंदन सिंह हैं जबकि बहुजन समाज पार्टी की ओर से वृंदावन की पूर्व पालिकाध्‍यक्ष पुष्‍पा शर्मा के पुत्र योगेश द्विवेदी हैं।
इनके अलावा तीसरा नाम राष्‍ट्रीय लोकदल के युवराज जयंत चौधरी का है जो निवर्तमान सांसद होंगे। जयंत चौधरी के यहां से फिर चुनाव लड़ने को लेकर भी समय-समय पर अटकलों का बाजार गर्म रहता है परंतु वह पुरजोर तरीके से हमेशा यही कहते रहे हैं कि वह चुनाव मथुरा से ही लड़ेंगे।
मुज़फ्फ़रनगर में हुई सांप्रदायिक हिंसा के बाद उपजे राजनीतिक हालात भी यही बताते हैं कि जयंत चौधरी कम से कम 2014 के लोकसभा चुनावों में क्षेत्र बदलने का जोखिम नहीं उठायेंगे।
इधर दोनों राष्‍ट्रीय दल ही ऐसे हैं जिन्‍होंने अपने पत्‍ते पूरी तरह छिपा रखे हैं। कांग्रेस का तो अभी यह तक नहीं पता कि 2014 के लोकसभा चुनावों में वह रालोद को साथ रखेगी या नहीं। रालोद को साथ लेकर चलने की स्‍थिति में मथुरा से उसका कोई प्रत्‍याशी नहीं होगा। शेष रह गई भाजपा जो किसी कीमत पर इस बार यहां से हार का मुंह नहीं देखना चाहती और इसी कवायद में लगी है कि प्रत्‍याशी ऐसा हो जो पार्टी को निश्‍चिंत कर सके।
लगभग यही स्‍थिति सपा और बसपा की है। समाजवादी पार्टी के मुखिया तो यूपी के दम पर खुद इस मर्तबा प्रधानमंत्री बनने की अपनी दिली ख्‍वाहिश का इज़हार हर जगह करते ही हैं लेकिन बसपा भी चाहती है कि वह किंग न सही लेकिन किंगमेकर जरूर बने।
ज़ाहिर है कि ऐसे हालात पैदा करने के लिए एक-एक सीट पर चुनाव पूर्व नजर गढ़ाकर रखना और उससे भी पहले जिताऊ प्रत्‍याशी सामने लाना बहुत जरूरी होगा।
पहले बात करें यदि समाजवादी पार्टी के वर्तमान घोषित प्रत्‍याशी ठाकुर चंदन सिंह की तो पार्टी के उच्‍च पदस्‍थ सूत्र उनकी अब तक की प्रोग्रेस से कतई संतुष्‍ट नहीं हैं। पार्टी हाईकमान का मानना है कि पर्याप्‍त समय दिए जाने के बावजूद वह जनपद में वो जगह नहीं बना पाए जिस पर भरोसा करके दांव लगाया जा सके।
इसके अलावा उन्‍हें लेकर पार्टी की जिला इकाई में मौजूद मतभेद तथा कुछ ज़मीनी विवादों में उनका नाम सामने आना भी उन्‍हें चुनाव लड़ाने में बाधा बनकर खड़ा हो रहा है।
गत दिनों समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता प्रोफेसर रामगोपाल यादव के गोवर्धन आगमन पर उनके सामने ही ठाकुर चंदन सिंह का एक जमीनी विवाद को लेकर कुछ लोगों ने घेराव किया था जिससे प्रोफेसर रामगोपाल भी काफी असहज हो गए। उस समय तो जैसे-तैसे बात संभाल ली गई लेकिन प्रोफेसर रामगोपाल यादव ने इसे काफी गंभीरता से लिया। यूं भी पार्टी के सूत्रों की मानें तो ठाकुर चंदन सिंह के पक्ष में जिलाध्‍यक्ष गुरुदेव शर्मा के अलावा कोई दूसरा मजबूती से खड़ा दिखाई नहीं देता। गुरुदेव शर्मा भी चंदन सिंह की कुछ बातों को लेकर सशंकित रहते हैं।
समाजवादी पार्टी के लिए 2014 का लोकसभा चुनाव इसलिए भी अत्‍यंत महत्‍पूर्ण है क्‍योंकि यदि वह इन चुनावों में मथुरा से सीट निकाल ले जाती है, तो यहां उसका खाता खुल जायेगा। आज तक सपा मथुरा से कोई चुनाव नहीं जीत पाई है। ज़ा हिर है कि वह अब इस चुनाव को हारने के लिए तैयार नहीं है और इसलिए ऐसा प्रत्‍याशी चाहती है जो जीत की गारंटी दिला सके। जो निर्विवाद व बेदाग हो तथा जिसके लिए समूची जिला इकाई एकजुट होकर मन से काम कर सके।
अब बात आती है दूसरे सबसे बड़े क्षेत्रीय दल बहुजन समाज पार्टी के उम्‍मीदवार योगेश द्विवेदी की। योगेश द्विवेदी से पहले बसपा ने वृंदावन के ही निवासी उदयन शर्मा का नाम घोषित किया था। उदयन शर्मा को हटाकर फिर योगेश द्विवेदी के नाम की घोषणा की गई।
बहुजन समाज पार्टी के उच्‍च पदस्‍थ सूत्रों की मानें तो तेजी से बदल रहे राजनीतिक समीकरणों में योगेश द्विवेदी उनकी पार्टी के लिए फिट नहीं बैठ रहे और इसलिए वह पांच राज्‍यों के चुनाव नतीजे आने के साथ ही किसी कद्दावर व्‍यक्‍ति को उम्‍मीदवार बनाकर पेश करने जा रही है। योगेश द्विवेदी का ब्राह्मण होना भी बसपा के फ्रेम में मथुरा के लिए फिट नहीं बैठ रहा। मथुरा का लोकसभा प्रत्‍याशी का निर्णय जाट-ठाकुरों के मत करते हैं। इसके अलावा योगेश द्विवेदी में पार्टी को उतना माद्दा दिखाई नहीं दे रहा कि वह ब्राह्मण मतदाताओं को पूरी तरह अपने पक्ष में लामबंद कर सकें।
ऐसे में बहुजन समाज पार्टी किसी ऐसे चेहरे को सामने लाना चाहती है जो सपा ही नहीं, भाजपा व रालोद की भी काट बन सके और पार्टी को यहां से पहली लोकसभा सीट दिलवा सके।
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि अब तक लोकसभा चुनावों के लिए जो चेहरे जनता के सामने रहे हैं, उनमें से सिर्फ जयंत चौधरी ही अपनी गारंटी खुद दे सकते हैं।
समाजवादी पार्टी के ठाकुर चंदन सिंह और बहुजन समाज पार्टी के योगेश द्विवेदी की मेहनत ऐन वक्‍त पर भी जाया हो सकती है।
यूं भी राजनीति का ऊंट कब किस करवट बैठ जाए, कोई नहीं कह सकता। फिर पूर्व घोषित उम्‍मीदवार तो हमेशा ही राजनीतिक दलों के लिए ताश के पत्‍ते अथवा शतरंज के प्‍यादों से अधिक नहीं रहे। जिन्‍हें बाजी जीतने के लिए फेंटना और उलट देना हाईकमानों का शगल रहा है। उनके लिए न कोई चंदन सिंह अहमियत रखता है और ना योगेश द्विवेदी।
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...