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गुरुवार, 6 जून 2019

सरकारी रंगदारी: पहले एकमुश्‍त रोड TAX, फिर कदम-कदम पर टोल TAX, वो भी बदहाली-बदइंतजामी और बदतमीजी के साथ

रंगदारी TAX केवल सड़क छाप गुंडे-बदमाश और बाहुबली का खिताब प्राप्‍त कुख्‍यात माफिया डॉन ही नहीं वसूलते, सरकार भी वसूलती है।
फर्क सिर्फ इतना है कि गुंडे-बदमाश और माफिया डॉन के रंगदारी TAX की वसूली के खिलाफ किसी न किसी स्‍तर पर शिकायत की जा सकती है परंतु सरकार का रंगदारी TAX मुंह से एक शब्‍द निकाले बिना देना पड़ता है क्‍योंकि उसके खिलाफ बोलना तो दूर, उसे लेकर सवाल करना भी भारी पड़ सकता है।
जी हां, आप चाहे लाखों की गाड़ी के मालिक हों या करोड़-दो करोड़ की लग्‍जरी गाड़ी के, सरकारी रंगदारी वसूलने वालों की नजर में आपकी इज्‍जत दो कौड़ी के बराबर नहीं है।
यकीन न हो तो अपने निजी वाहन से कहीं बाहर निकलकर देख लीजिए, पता चल जाएगा।
सरकार के इस रंगदारी TAX का नाम है टोल TAX, जो न सिर्फ हर निजी वाहन पर भी एकमुश्‍त रोड TAX वसूल किए जाने के बावजूद लिया जाता है बल्‍कि बदहाली व बदइंतजामी के बीच बदतमीजी के साथ जेब से निकलवा लिया जाता है।
देश में जैसे-जैसे सड़कों का जाल और वाहनों की संख्‍या बढ़ती जा रही है, वैसे-वैसे सरकार का रंगदारी टैक्‍स भी बढ़ रहा है।
लोकतांत्रिक अधिकारों की दुहाई दें तो हर व्‍यक्‍ति को यह जानने का कानूनन अधिकार है कि जब प्रत्‍येक वाहन पर आरटीओ कार्यालय रजिस्‍ट्रेशन के साथ ही भारी-भरकम एकमुश्‍त रोड TAX ले लेता है तो फिर कदम-कदम पर टोल TAX की आड़ में रंगदारी TAX क्‍यों?
लेकिन यह अधिकार सिर्फ आपको आत्‍मसंतुष्‍टि दे सकता है, जवाब नहीं दिलवा सकता क्‍योंकि जवाबदेही के लिए देश में कोई नियम-कानून नहीं है।
यूं कहने के लिए आप जब अपने वाहन का रजिस्‍ट्रेशन कराते हैं और उसके साथ एकमुश्‍त रोड TAX देते हैं तो सरकार आपको 15 साल तक उस प्रदेश की सड़कों पर गाड़ी दौड़ाने की छूट देती है जहां से आपने वाहन का रजिस्‍ट्रेशन कराया है।
इसके अलावा देश के दूसरे राज्‍यों की सड़कों का भी 24 घंटे तक इस्‍तेमाल करने की इजाजत देती है।
इसे इस तरह भी समझ सकते हैं कि यदि आप अपने वाहन से दूसरे राज्‍यों की सड़क का इस्‍तेमाल करते हुए गंतव्‍य तक पहुंचते हैं तो भी आपको कोई अतिरिक्‍त कर नहीं देना होता परंतु हो ये रहा है कि लोग अपने जिले में ही डंडे के बल पर टोल TAX देने को बाध्‍य हैं।
उदाहरण के लिए मथुरा निवासी किसी व्‍यक्‍ति को जिले की सीमा के अंदर फरह कस्‍बे तक जाना है तो भी उसे इससे पहले पड़ने वाले महुअन टोल प्‍लाजा पर टैक्‍स देना होगा। न देने पर लेने के देने पड़ जाएंगे क्‍योंकि टोल टैक्‍स वसूलने का सरकारी लाइसेंस प्राप्‍त करने वालों को अघोषित गुंडागर्दी का भी लाइसेंस स्‍वत: मिल जाता है।
किसी भी टोल प्‍लाजा पर आप जरा कोई सवाल-जवाब करके तो देखिए, पलक झपकते ही दर्जनों टोलकर्मी आपको आपकी गाड़ी सहित घेर लेंगे और यदि फिर भी आप मौके की नजाकत भांपने में असफल रहे तो इज्‍जत तार-तार होते देर नहीं लगेगी। फिर आप चाहें अपने परिवार के साथ हों या रिश्‍तेदारों के साथ।
बच्‍चे भी यदि आपके साथ सफर कर रहे हों तब भी टोलकर्मी आप पर रहम नहीं करने वाले क्‍योंकि उन्‍हें टोल टैक्‍स को लेकर सवाल पूछना कतई गवारा नहीं।
यही कारण है कि टोल प्‍लाजा अब आए दिन होने वाले झगड़ों की वजह से भी पहचाने जाने लगे हैं।
अगर बात करें बदहाली-बदइंतजामी और बदतमीजी के साथ देशभर की सड़कों पर बैरियर लगाकर वसूले जा रहे इस रंगदारी टैक्‍स से आमदनी की तो पिछले करीब एक साल में ही इससे सरकार की आमदनी करीब चार गुना बढ़ चुकी है।
मनमोहन सिंह के अंतिम कार्यकाल में वर्ष 13-14 के दौरान सरकार ने टोल टैक्‍स के जरिए करीब 5300 करोड़ रुपए की कमाई की थी। नरेन्‍द्र मोदी के कार्यकाल में वर्ष 14-15 के दौरान टोल टैक्‍स से सरकार की कमाई बढ़कर 6 हजार करोड़ हो गई।
टोल टैक्‍स की कमाई ने पिछले वित्तीय वर्ष यानि 2017-18 में बेहिसाब छलांग लगाई और इस दौरान इससे सरकार को 22830 करोड़ रुपए की कमाई हुई।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में फिलहाल लगभग 390 टोल प्‍लाजा ऐसे हैं जिन पर अलग-अलग हिसाब से टैक्‍स की वसूली की जाती है।
कई रास्‍तों पर तो गाड़ी में फूंके जाने वाले तेल से अधिक टोल टैक्‍स देना पड़ जाता है वो भी टोल रोड पर दी जाने वाली सुविधाओं को धता बताकर खुलेआम रंगदारी व गुंडागर्दी के साथ।
आलम यह है कि सावधानी हटी और दुर्घटना घटी का स्‍लोगन कब किस टोल प्‍लाजा पर सटीक बैठ जाए, कहना मुश्‍किल है क्‍योंकि टोलकर्मियों को सरकार व सरकारी नुमाइंदों का पूर्ण आशीर्वाद प्राप्‍त रहता है।
क्‍या हैं नियम 
नियमों की बात करें तो किसी भी टोल प्‍लाजा के लिए सबसे पहला और महत्वपूर्ण नियम यह है कि वहां से टैक्‍स की पर्ची अधिकतम तीन मिनट के अंदर कट जानी चाहिए। यदि इससे अधिक समय टोल प्‍लाजा पर लगाया जाता है तो आप बिना टोल टैक्‍स चुकाए बैरियर से निकल जाने के अधिकारी हैं परंतु इस नियम का पालन कराएगा कौन, और कौन यह निर्धारित करेगा कि आपका टोल प्‍लाजा पर समय किस कारण जाया हुआ है।
सच तो यह है कि आज शायद ही कोई टोल प्‍लाजा देश में ऐसा हो जहां वाहन जाम में फंसे बिना आसानी के साथ निकल जाए जबकि टोल रोड बनाने का मकसद ही जाम से मुक्‍ति दिलाना था। संभवत: इसीलिए किसी टोल से गुजरने का अधिकतम समय तीन मिनट निर्धारित किया गया होगा लेकिन अब वह बेमानी हो चुका है।
इसी प्रकार टोल रोड व उसके रख-रखाव व निर्माण को लेकर भी तमाम कायदे-कानून हैं परंतु टोल का ठेका लेने वाली कंपनी टैक्‍स वसूलने के अतिरिक्‍त किसी कायदे-कानून का पालन नहीं करती और सिर्फ टैक्‍स वसूलने में ही लगी रहती है क्‍योंकि उसे इस काम में भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) के अधिकारियों का पूरा साथ मिलता है।
एनएचएआई और किसी नियम से बंधा हो या न हो किंतु पूरी निष्ठा से ठेकेदार को फायदा पहुंचाने के अपने नियम से जरूर बंधा है।
एनएचएआई और टोल ठेकेदारों के बीच चल रहा यह पूरा खेल भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट से उजागर हुआ।
रिपोर्ट में कहा गया कि अगर ठेकेदार कंपनी छह लेन का ठेका मिलने के बाद समय सीमा के भीतर काम नहीं निपटाती तो इस देरी के दौरान उसके द्वारा वसूला गया टोल टैक्स एक ‘लंबित राशि’ खाते में जमा करा लेना चाहिए। यह पैसा तब तक ठेकेदार को नहीं मिलना चाहिए, जब तक वह पहला माइल स्टोन पूरा नहीं कर लेता और अगला माइल स्टोन सही समय पर पूरा नहीं हो जाता। जितने समय तक यह रकम खाते में रहेगी उसका ब्याज भी एनएचएआई को दिए जाने का प्रावधान है।
इस सबके बावजूद दिल्‍ली से आगरा को जोड़ने वाले नेशनल हाईवे नंबर 2 को सिक्स लेन करने का काम पिछले कई वर्षों से प्रगति पर है।
इस रोड को सिक्स लेन करने का ठेका रिलायंस इन्फ्रास्ट्रक्चर की सहयोगी कंपनी डीए टोल रोड प्राइवेट लिमिटेड को मई 2010 में ही दे दिया गया था। मई में ठेका लेने के बाद 16 अक्तूबर 2012 से यहां सिक्स लेन के अनुसार टोल वसूली शुरू भी हो गई लेकिन सीएजी की रिपोर्ट के मुताबिक 27 जून 2013 तक इसके कार्य में कोई प्रगति नहीं हुई।
इस अंधेरगर्दी के चलते कंपनी ने अगस्त 2013 तक ही 120 करोड़ रु. टोल वसूल लिया और इस पैसे को सिक्स लेन रोड बनाने की बजाए दूसरे कामों में लगा दिया।
यही नहीं, जब लोग चौड़े रोड की आस में बेमन से टोल चुकाते निकल रहे थे उस समय कंपनी ने टोल से मिले 78 करोड़ रु. रिलायंस लिक्विड फंड्स में निवेश कर दिए। यानि टोल के नाम पर आम आदमी बेहतर रास्ते का ख्वाब ही देखता रहा गया और ठेकेदार ने पैसे से पैसा बनाना शुरू कर दिया।
2010 के मई माह में मिला इस रोड को फोर लेन से सिक्‍स लेन करने का काम 2019 का मई महीना बीत जाने के बाद तक अधूरा पड़ा है परंतु न कोई देखने वाला है और न सुनने वाला।
राहगीरों को लूटने वाला टोल का यह खेल कब तक?
इस बारे में देश के भूतल परिवहन मंत्री नितिन गडकरी का कहना है कि ”पूरी टोल नीति की समीक्षा की जा रही है, सरकार जल्द ही कई सकारात्मक बदलावों के साथ सामने आएगी।
”ट्रांसपोर्ट विभाग की ई बुक लॉन्चिग के कार्यक्रम में उन्होंने कहा, ”अपनी लागत निकाल चुके 75 में से 55 छोटे टोल बैरियर्स को खत्म कर दिया गया है और हाइवे के किनारे की जनसुविधाओं को लेकर सरकार तेजी से काम कर रही है।
”सीएजी की रिपोर्ट और लोगों से टोल रोड पर हो रही मनमानी के सवाल पर मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं, ”ठेका मिलते ही सिक्स लेन का टोल वसूलने का नियम बहुत ज्यादा विवादित है। इसकी भी समीक्षा की जा रही है लेकिन इसे तत्काल समाप्त नहीं किया जा सकता क्योंकि इस पर एनएचएआई और ठेकेदार, दोनों की सहमति है।
”अधिकारी ने बताया कि मंत्रालय संसद के अगले सत्र में नया सड़क परिवहन और सुरक्षा विधेयक लेकर आएगी। इसमें हाइवे और टोल बैरियर्स को लेकर कई बुनियादी बदलाव किए जाएंगे। खुले में शंका निवारण की समस्या से निपटले के लिए 2,000 स्थानों पर जन सुविधा केन्‍द्र बनाए जाएंगे।
अधिकारी स्पष्ट करते हैं कि जन सुविधाओं का अर्थ सिर्फ शौचालय नहीं हैं। इसमें सड़क किनारे रेस्त्रां, पेट्रोल पंप, वाहनों के लिए सर्विस स्टेशन और ट्रकर्स क्लब जैसी सुविधाएं भी शामिल होंगी।
दूसरी ओर इंस्टीट्यूट फॉर ट्रांसपोर्ट रिसर्च ऐंड ट्रेनिंग (आइएफटीआरटी) के सीनियर फेलो एस पी सिंह सवाल करते हैं, ”नियम बनाने से ज्यादा बड़ी चुनौती ठेका कंपनी, एनएचएआई और नेताओं के नेक्सस को तोड़ने की है।
टोल से की जा रही अतिरिक्त कमाई में बहुत से भ्रष्ट लोगों की हिस्सेदारी है। क्‍या केंद्र सरकार और भूतल परिवहन मंत्रालय इसे तोड़ पाएगा।”
अदालतों का भी ध्‍यान 
पिछले कुछ समय से विभिन्‍न अदालतों ने इसे गंभीर समस्‍या माना है और इस पर ध्‍यान देना शुरू किया है। जयपुर-दिल्ली हाइवे के मामले में बीते साल 10 सितंबर को राजस्थान हाइकोर्ट के जस्टिस एम. एन. भंडारी की पीठ ने टोल टैक्स बढ़ाने के फैसले को खारिज कर दिया। अदालत ने पूछा कि जब रोड की हालत ही खस्ता है तो टोल किस बात का बढ़ाया जा रहा है।
इसी तरह चेन्नै-बंगलुरू हाइवे के चेन्नै से वेल्लूर तक के टुकड़े पर वसूले जा रहे टोल को मद्रास हाइकोर्ट में चुनौती मिली। यहां भी यही आरोप था कि ब्रिज और अन्य बुनियादी ढांचा अभी बन ही रहा है लेकिन एनएचएआई ने टोल वसूलना शुरू कर दिया है। हाइकोर्ट ने इंडियन रोड कांग्रेस से सड़क का निरीक्षण करने के बाद अपनी रिपोर्ट देने के लिए कहा।
इन हालातों में परिवहन मंत्री को न सिर्फ एक बेहतर टोल नीति पेश करनी होगी, बल्कि यह भी तय करना होगा कि भारतीय सड़कों पर हर साल होने वाली पांच लाख दुर्घटनाएं और उसमें करीब एक लाख लोगों के जान गंवान को किस तरह रोका जाए।
इस सबके अलावा टोल कर्मियों का भी कोई ऐसा मुकम्‍मल इंतजाम करना होगा जिससे वो सड़कों की बदइंतजामी व बदहाली के बाद भी लोगों के साथ बदतमीजी करने से पहले चार बार साचें क्‍योंकि अंतत: टैक्‍स वही अदा करते हैं और उन्‍हीं के टैक्‍स से सड़कों का रख-रखाव संभव है।
और हां, इस सवाल का भी जवाब किसी न किसी को आज नहीं तो कल देना ही होगा कि जब वाहन के साथ रोड टैक्‍स लिया जाता है तो टोल टैक्‍स किसलिए ?
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

शुक्रवार, 31 अगस्त 2018

MY Lord, जनसामान्‍य के लिए भी बनवा दीजिए कोई ‘लेन’, उसकी भी सुन लीजिए हुजूर

बीते बुधवार को मद्रास हाई कोर्ट ने NHAI (नेशनल हाइवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया) को सख्‍त आदेश देते हुए कहा कि वह अपने सभी टोल प्लाजा पर वीआईपी और मौजूदा जजों के लिए एक अलग से एक्सक्लूसिव लेन बनाए या Contempt of court की कार्यवाही के लिए तैयार रहे।
जस्टिस हुलुवाडी जी रमेश और जस्टिस एमवी मुरलीधरन की डिवीजन बेंच ने कहा, ये वीआईपी और जजों के लिए बहुत शर्म की बात है कि वे टोल प्लाजा पर इंतजार करें और अपने आइडेंटिटी कार्ड दिखाएं। बेंच ने केंद्र सरकार और एनएचएआई से कहा कि वे इस मामले में प्रत्‍येक टोल प्‍लाजा के लिए सर्कुलर जारी करें।
कोर्ट ने यह भी कहा: टोल कलेक्टर की जिम्मेदारी होगी कि वह उस लेन से वीआईपी और जज के अलावा किसी और को गुजरने न दे, और जो भी इस नियम का उल्लंघन करे, टोल कलेक्टर उसके खिलाफ सख्त कार्यवाही करे।
कोर्ट ने कहा, ‘अलग लेन न होने से हर टोल प्लाजा पर सिटिंग जज और वीआईपी लोगों को ‘अनावश्यक शर्मिंदगी’ का सामना करना पड़ता है। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। टोल प्लाजा पर सिटिंग जज को 10 से 15 मिनट तक इंतजार करना पड़ता है।
MY Lord, आपका आदेश तो सिर माथे, लेकिन उन लोगों का क्‍या जो पूरा पैसा देकर भी हर टोल पर इंतजार करने को मजबूर हैं। हुजूर, क्‍या उनका समय कोई मायने नहीं रखता।
लगे हाथ उनके लिए भी कोई आदेश-निर्देश NHAI को दे दिया होता। वो तो कई बार घंटों-घंटों फंसे रहते हैं।
वहां से जैसे-तैसे निकल भी आएं तो आपकी अदालतें रहम नहीं करतीं क्‍योंकि आम आदमी के लिए वहां भी कोई लेन नहीं है।
कोई वादी अथवा प्रतिवादी, और यहां तक कि वकील साहिब भी यदि टोल प्‍लाजा पर अटक जाने के कारण अदालत में समय से उपस्‍थित नहीं होते तो उन्‍हें ‘अदम मौजूदगी’ या ‘अदम पैरवी’ का कितना बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ जाता है, इसे कौन नहीं जानता जबकि आपकी देरी पर कहां कौन सवाल खड़ा कर सकता है।
आप अदालत में बैठें या न बैठें, मालिक का मालिक कौन।
Your Honor, आपने अपने इस आदेश में अपने साथ-साथ ‘वीआईपी’ का जिक्र क्‍यों किया यह तो आप जानें, अलबत्ता आम आदमी यह जरूर जानता है कि वीआईपी किसी टोल पर कहां रुकते हैं। वो तो यूं भी लाल-नीली बत्तियों वाली गाड़ियों के बीच बिना टोल दिए ‘हूटर’ बजाते तेजी के साथ निकल लेते हैं। उनके काफिले को किसी टोल पर कोई रोकने या टोकने की हिमाकत कर बैठे तो वहीं के वहीं फैसला करके जाते हैं वो। न तहरीर, न तारीख…सीधे फैसला।
क्‍या आप इस कड़वे सच से वाकई परिचित नहीं हैं MY Lord, अथवा आपने सहारे के लिए वीआईपी को जोड़ दिया अपने आदेश में।
एक विधायिका है MY Lord जो अपने वेतन-भत्ते खुद तय कर लेती है और उसमें कहीं कोई पक्ष-विपक्ष आड़े नहीं आता क्‍योंकि तब सवाल समूची नेता बिरादरी के ‘लाभ’ का होता है। दूसरी न्‍यायपालिका है जो आज तक तो अपनी नियुक्‍ति ही खुद करती रही है लेकिन अब वह अपने लिए ‘टोल नाकों’ पर अलग से लेन बनाने का आदेश भी दे रही है।
लोकतंत्र के तीन प्रमुख स्‍तंभों में से शेष रह जाती है कार्यपालिका, तो उसे टोल नाकों पर किसी के आदेश-निर्देशों की दरकार नहीं है। टोल वालों का उनसे और उनका टोल वालों से रोज वास्‍ता पड़ता है। वो उनकी अहमियत बिना आदेश-निर्देश के समझते हैं इसलिए दूर से ही उनके लिए बैरियर खड़ा कर देते हैं। एक सिपाही भी टोल कर्मियों के लिए कितना विशिष्‍ट है, इसे किसी भी टोल पर देखा जा सकता है।
वैसे लोकतंत्र का एक ‘तथाकथित’ चौथा स्‍तंभ भी है जिसे इस दौर में ‘मीडिया’ कहा जाने लगा है, लेकिन उसकी यहां चर्चा करने का कोई अर्थ नहीं क्‍योंकि उसकी अब कोई अहमियत नहीं रह गई।
टोल प्‍लाजा पर तो मीडियाकर्मियों को कोई दो कौड़ी का नहीं पूछता क्‍योंकि उसे अपने लिए आदेश-निर्देश देने का हक प्राप्‍त नहीं है।
और हां हुजूर, वीआईपी से याद आया कि वीआईपी तो हर जगह वीआईपी ही होते हैं। उनके लिए देश की सर्वोच्‍च अदालत भी आधी रात को खुल जाती है और सुबह होते-होते फैसला सुना देती है किंतु आम आदमी अपनी जिंदगी का आधा हिस्‍सा जाया करके भी फैसला सुनने को तरसता रहता है।
जब यमराज सामने खड़े होते हैं तब उसे याद आता है कि उसने अपने हिस्‍से की काफी उम्र तरह-तरह के टोल नाकों पर लाइन में लगकर गुजार दी।
अब देखिए हुजूर, दो दिन पहले की ही बात है। भीमा-कोरेगांव हिंसा मामले में देश के तथाकथित पांच बुद्धिजीवियों को पुलिस ने क्‍या पकड़ा, कोहराम मच गया। सड़क से लेकर संसद तक और मानवाधिकार आयोग से लेकर अदालत तक सब खड़े हो गए।
अगली सुबह तो आदेश हो गया कि जिन्‍हें पकड़ा है, उन्‍हें उनके घर पर नजरबंद रखें। पुलिस कस्‍टडी में उन्‍हें नहीं रखा जा सकता, तकलीफ होती है। बाकी 06 सितंबर को देखेंगे कि करना क्‍या है।
MY Lord, आम आदमी की मंशा आपके आदेश-निर्देश पर सवालिया निशान लगाने की नहीं है। वह तो सिर्फ इतना जानना चाहता है कि जनसामान्‍य के लिए अदालतें इसी प्रकार सक्रिय क्‍यों नहीं होतीं। क्‍यों उनके प्रति कोई संवेदनशील नहीं होता। मानवाधिकार आयोग उनकी गिरफ्तारी पर संज्ञान क्‍यों नहीं लेता। कोई बुद्धिजीवी गैंग उसकी खातिर सड़क पर उतरकर क्‍यों हंगामा नहीं काटता।
वो पुलिस के डंडे खाता है, अधिकारियों के यहां दुत्‍कारा जाता है, न्‍यायालयों में फटकारा जाता है लेकिन तब कोई नहीं कहता कि लोकतंत्र खतरे में है, या यह कैसा लोकतंत्र है।
हां, अगर एक आतंकवादी पूरी प्रक्रिया के बाद फांसी पर चढ़ाया जाता है अथवा किसी राज्‍य सरकार के गठन में गतिरोध उत्‍पन्‍न होता है और यहां तक कि सवा सौ करोड़ की आबादी में से पांच खास लोग गिरफ्तार कर लिए जाते हैं तो लोकतंत्र खतरे में पड़ जाता है। आपातकाल से भी बदतर हालात बताए जाते हैं।
तब तमाम लिस्‍टेड मुकद्दमों को दरकिनार कर उनकी गिरफ्तारी पर सुनवाई होती है और उसी दिन राहत भी दे दी जाती है, ऐसा क्‍यों है हुजूर।
दूसरी ओर जनसामान्‍य के लिए टोल प्‍लाजा का बैरियर और Court का Hammer दोनों बराबर हैं। दोनों उसका रास्‍ता तय करते हैं। दोनों के उठे बिना, उसका निकल पाना मुश्‍किल ही नहीं, नामुमकिन है। लेकिन फिर भी वह लगा है ‘कॉमन लेन’ में, भीड़ के बीच इस उम्‍मीद के साथ कि कभी तो वह भी निकल पाएगा।
हुजूर, नहीं पता कि मॉब लिंचिंग गायों के कारण हो रही है या सांप्रदायिकता के कारण। असहिष्‍णुता इसके पीछे की वजह है अथवा राजनीतिक विद्वेष। लेकिन एक बात पता है, और वह यह कि मॉब लिंचिंग करने वालों में किसी न किसी स्‍तर पर अपने अंदर विशिष्‍टता का भाव अवश्‍य भरा होता है। वह कानून हाथ में लेने की हिमाकत ही तब कर पाते हैं जब वह यह समझने लगते हैं कि पुलिस भी वहीं हैं और अदालत भी वही।
इसलिए हुजूर ये विशिष्‍टता का भाव बहुत खतरनाक है। इसी भाव ने स्‍वतंत्रता के सात दशक बीत जाने के बाद भी ‘लोक’ से ‘तंत्र’ को काट रखा है। अगर यह ‘तंत्र’ ही ‘लोक’ के लिए नहीं है तो कैसा लोकतंत्र। यह तो राजतंत्र हुआ न हुजूर। वही राजे-रजवाड़ों वाला या शासक और शोषित वाला।
बा-अदब…बा-मुलाहिजा…होशियार! महाराज की सवारी पधार रही है।
आखिर में हुजूर याद दिलाना चाहूंगा सर्वोच्‍च न्‍यायालय की ताजा टिप्‍पणी जिसमें कहा गया है कि असहमति जताना लोकतंत्र के लिए ‘सेफ़्टी वॉल्व’ है। अगर आप इस सेफ़्टी वॉल्व को नहीं रहने देंगे तो प्रेशर कुकर फट जाएग।.’
यकीन मानिए MY Lord, आम आदमी भी विशिष्‍ट लोगों द्वारा विशिष्‍ट लोगों के लिए दिए जाने वाले आदेश-निर्देशों से पूरी तरह असहमत है। उसका सेफ़्टी वॉल्व काफी हद तक चोक हो चुका है। यदि वह फट गया तो सच में लोकतंत्र खतरे में पड़ जाएगा। लोकतंत्र को बचा लीजिए हुजूर। ये विशिष्‍टता का भाव त्‍याग दीजिए। आम बने रहिए ताकि जनता आपको खास समझती रहे।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
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