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शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026
2027 के चुनावों में मोदी-योगी और भाजपा की लुटिया डुबो देंगे ये 'गिरोहबद्ध' प्रशासनिक अधिकारी...
नाथ संप्रदाय से जुड़ी गोरखनाथ पीठ (गोरक्षपीठ) के महंत योगी आदित्यनाथ ने 25 मार्च 2022 को दूसरी बार देश के सबसे बड़े प्रदेश की कमान संभाली थी। इस हिसाब से अगले साल की पहली तिमाही में यूपी विधानसभा के चुनाव तय हैं। इस बार के चुनाव मुख्यमंत्री योगी और प्रधानमंत्री मोदी सहित भारतीय जनता पार्टी के लिए भी किसी चुनौती से कम नहीं हैं क्योंकि 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा और पीएम मोदी को सबसे बड़ा झटका यूपी ने ही दिया था। इस झटके ने एक ओर जहां 'अबकी आर 400 पार' के नारे की हवा निकाल दी थी, वहीं दूसरी ओर भाजपा को अपने दम पर बहुमत से काफी दूर कर दिया था।
अब यूपी के चुनावों में लोकसभा चुनावों जैसा कोई झटका न लग जाए इसलिए भाजपा तो चुनावी मोड में आ ही चुकी है, विपक्षी दलों ने भी अपनी राजनीतिक सरगर्मियां बढ़ा दी हैं।
राजनीति की आंच पर रखी जा चुकी चुनावी हड़िया के पकने में भले ही अभी विलंब हो किंतु उसके तापमान का अंदाज लगाना बहुत मुश्किल भी नहीं है, क्योंकि ये तपिश बहुत दूर से महसूस की जा सकती है। लेकिन तब, जबकि पिछली सफलताओं से पाल ली गई गफलत हकीकत का सामना करने में आड़े न आ जाए।
मथुरा से लगाया जा सकता है इस तपिश का अंदाज
चार सैकड़ा से अधिक विधानसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश में कृष्ण की पावन जन्मस्थली मथुरा की भागीदारी कहने को तो मात्र 5 सीटों की ही है, किंतु यहां से मिलने वाली हार-जीत का संदेश बहुत बड़ा जाता है। ठीक उसी तरह जिस तरह अयोध्या लोकसभा सीट के नतीजे से गया था। उसकी गूंज प्रदेश ही नहीं, देशभर में सुनाई दी थी, और आज भी उसकी प्रतिध्वनि सुनाई देती है।
हड़िया का एक चावल मान सकते हैं मथुरा को
हड़िया के एक चावल से पूरी हड़िया के चावलों की स्थिति का पता लगाने वाली लोकोक्ति का अनुसरण करें तो धार्मिक नगरी मथुरा इसके लिए सर्वाधिक उपयुक्त मानी जा सकती है क्योंकि फिलहाल यहां सभी पांचों सीटों पर भाजपा काबिज है।
यही नहीं, यहां से प्रसिद्ध अभिनेत्री हेमा मालिनी 2024 में भाजपा की टिकट पर तीसरी बार सांसद चुनी गई हैं। यहां की जिला पंचायत से लेकर नगर निगम और कोसी नगर पालिका पर भी भाजपा काबिज है। इस लिहाज से मथुरा को भाजपा का गढ़ कहा जा सकता है परंतु आज यहां की जमीनी हकीकत कुछ और बयां करती है। कुछ ऐसा जो भाजपा को शायद ही हजम हो।
सत्ताधारी पार्टी के स्थानीय अकर्मण्य नेताओं की फौज
कहने को तो हर जिले की तरह मथुरा में भी कागजों पर भाजपा नेताओं की पूरी फौज दिखाई देती है, लेकिन विभिन्न पदनामों से सुसज्जित ये फौज इतनी अकर्मण्य और नकारा है कि इससे जनहित का कोई काम नहीं किया जाता। निजी स्वार्थ पूरे करने में लिप्त इस फौज के पदलोलुप नेता खुलेआम अधिकारियों की जी हुजूरी करते हैं, और यहां तक कि तलवे चाटते देखे जा सकते हैं। कभी 'पार्टी विद् डिफरेंस' का नारा देने वाली भारतीय जनता पार्टी के अधिकांश स्थानीय नेता और जनप्रतिनिधि इस कदर निकम्मे हैं कि उन्हें जनभावनाओं तक की कोई फिक्र नहीं। सत्तासुख भोगने में व्यस्त इन नेताओं को अब जनसमस्याओं से कोई सरोकार नहीं रह गया। महत्वपूर्ण पद प्राप्त कई भाजपा नेताओं को यदि 'भूमाफिया' भी कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। अफसरों से इनकी सांठगांठ का ही परिणाम है कि मथुरा जनपद की कोई सरकारी जमीन आज सुरक्षित नहीं है।
बहुत सी जमीन को इनके 'संरक्षण' और 'परोक्ष हिस्सेदारी' के चलते भूमाफिया हड़प चुके हैं। और जो शेष हैं, उन्हें भी किसी न किसी बहाने हड़पने की तैयारी है। इसे यूं भी कहा जा सकता है सत्ताधारी दल के नेता और भ्रष्ट अधिकारियों की जुगलबंदी ने मथुरा की हर समस्या को सुरसा के मुंह की तरह विकराल बना दिया है क्योंकि उनके पास इन समस्याओं को देखने की फुर्सत ही नहीं है।
यही कारण है कि वर्षों बीत जाने के बावजूद न तो यहां यातायात व्यवस्था दुरुस्त हो पा रही है और न भीड़ को नियंत्रित करने का कोई रास्ता निकाला गया है। यमुना कब तक प्रदूषण मुक्त हो पाएगी, इस सवाल को यदि छोड़ भी दिया जाए तो बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया है कि 'अधिकारियों की बेशर्मी' से बढ़ रहे 'कालिंदी के कलुष' को कैसे रोका जाए?
यमुना को प्रदूषण से मुक्त रखने के लिए उपलब्ध साधन और संसाधन भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुके हैं। इस संबध में हाई कोर्ट से लेकर एनजीटी तथा सुप्रीम कोर्ट से लेकर शासन स्तर से दिए गए सभी आदेश-निर्देश फाइलों की धूल फांक रहे हैं।
कहने को तो मथुरा में उस 'तीर्थ विकास परिषद' के उपाध्यक्ष भी अपने आलीशान ऑफिस में बैठते हैं जिसके अध्यक्ष स्वयं सीएम योगी हैं, किंतु मोक्षदायिनी की संज्ञा प्राप्त सप्तपुरियों में शामिल तीर्थ नगरी मथुरा का 'तीर्थ विकास परिषद' ने कितना विकास किया है, इससे कोई अनभिज्ञ नहीं है।
गिरोहबद्ध अधिकारी और उनका भ्रष्टाचार मथुरा के विकास में सबसे बड़ी बाधा
कड़वा सच तो यह है कि मथुरा में पिछले कई वर्षों से प्रशासनिक अधिकारियों का एक ऐसा गिरोह तैनात है जिसने भ्रष्टाचार की सारी हदें पार कर रखी हैं। चूंकि भ्रष्ट अधिकारियों के लिए मथुरा के भाजपा नेताओं की 'नीयत और नीति' खाद-पानी का काम करती है और वह इस जिले को उनके लिए सबसे मुफीद बनाती है इसलिए वो बार-बार यहीं लौट कर आ जाते हैं।
समय के साथ उनका पद नाम भले ही बदल जाए किंतु मथुरा में तैनाती पाने की उनकी मंशा कभी नहीं बदलती। आज जिला स्तर पर ही नहीं, आगरा मंडल स्तर पर भी ऐसे अधिकारी तैनात हैं जिनकी अफसरशाही का एक बड़ा दौर इस धर्म नगरी में बीत गया। आज वो चाहे अवकाश पाने के निकट हों किंतु मथुरा से अधिकतम लूट कर ले जाने की उनकी ख्वाहिश बराबर बनी हुई है।
मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण, मथुरा-वृंदावन नगर निगम, लोकनिर्माण विभाग, बिजली विभाग, जल निगम, सरकारी अस्पताल, सब रजिस्ट्रार कार्यालय तथा एआरटीओ सहित दर्जनों सरकारी विभाग ऐसे हैं जिन्होंने पुलिस में व्याप्त भ्रष्टाचार को भी बहुत पीछे छोड़ दिया है।
इन विभागों की यह स्थिति कमोबेश पूरे प्रदेश में एक जैसी है। मथुरा उसका एक बड़ा उदाहरण भले ही है, लेकिन बहुत ज्यादा अंतर दूसरे जिलों में भी नहीं है।
इसमें कोई दो राय नहीं कि मुलायम सिंह और अखिलेश यादव की सरकारों में सपा कार्यकर्ताओं को लूट का लाइसेंस मिला हुआ था और अधिकारी भी बेलगाम थे, परंतु भाजपा की सीएम योगी के नेतृत्व वाली सरकार भी यदि भ्रष्टाचार के मामले में जीरो टॉलरेंस का मात्र ढिंढोरा पीटने तक सीमित रह जाए और 'जीरो टॉलरेंस' को आड़ बनाकर अधिकारी एवं नेता अपनी अवैध कमाई के खजाने में 'जीरो' बढ़ाते चले जाएं तो दोनों में कोई बहुत अंतर नहीं रह जाता।
शेष समय में सख्ती नहीं बरती तो नतीजे 2024 के लोकसभा चुनावों जैसे
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि अब जबकि यूपी के विधानसभा चुनावों में कुछ महीने ही शेष हैं, योगी सरकार ने भ्रष्ट अफसरों एवं पार्टीजनों को चिन्हित कर उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं की तो परिणाम चौंकाने वाले हो सकते हैं। यदि ये भी मान लिया जाए कि योगी-मोदी का मैजिक अभी कायम है तो भी भ्रष्टाचार से आजिज जनता स्पष्ट बहुमत से दूर तो ले ही जा सकती है।
यूपी विधानसभा चुनावों का हश्र भी 2024 के लोकसभा चुनावों जैसा न हो, इसके लिए जरूरी है कि योगी सरकार मथुरा से ऐसे भ्रष्ट अधिकारियों एवं नेताओं के खिलाफ कार्रवाई की शुरूआत करे जो 'कुंडली' मारे बैठे हैं और जनता के बीच पार्टी की छवि को दिन-प्रतिदिन धूमिल कर रहे हैं।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
शनिवार, 11 अप्रैल 2026
एक सवाल योगी जी से: वृंदावन में कल 10 जानें जाने का जिम्मेदार कौन, क्या होगा किसी पर कोई एक्शन?
योगीराज भगवान कृष्ण की क्रीड़ास्थली वृंदावन में कल 10 जानें अकाल मृत्यु का शिकार हो गईं। पलक झपकते ही पंजाब के 10 तीर्थयात्री काल के गाल में समा गए, लेकिन घटना के 24 घंटे बाद तक जिला प्रशासन यही बताने की स्थिति में नहीं है कि आखिर इस हृदय विदारक मोटर बोट हादसे का जिम्मेदार है कौन, किसके नकारापन ने एक साथ 10 लोगों की जिंदगियां छीन लीं।
चूंकि वृंदावन सहित समूचे मथुरा जनपद में प्रतिदिन लाखों तीर्थयात्री आते हैं इसलिए लोगों का यह जान लेना जरूरी है कि यदि आप यहां आ रहे हैं तो आपकी सुरक्षा की जिम्मेदारी भी आपकी ही है।
कहने को इस विश्व प्रसिद्ध धार्मिक स्थल पर यात्रियों की सुख-सुविधा के लिए अनेक सरकारी इंतजामात का ढिंढोरा पीटा जाता है, हर आयोजन-प्रायोजन तथा तीज-त्यौहार एवं विशेष पर्वों पर अधिकारियों का लाव-लश्कर भी नजर आता है किंतु चलता सब रामभरोसे ही है क्योंकि धर्म की आड़ में अधर्म का जैसा नंगा नाच मथुरा में होता है, वैसा शायद ही कहीं और देखने को मिले।
See The video link here:
https://www.youtube.com/shorts/UrYhV5TSIWM
दुख और अफसोस की बात यह है कि इस धार्मिक जनपद में पर्यटन के लिए आने वाले उच्च अधिकारी भी किसी प्रश्न का जवाब देने को तैयार नहीं हैं। यहां तैनात अधिकारी शायद इसलिए बेलगाम हैं क्यों कि दर्जनों बार मथुरा के विभिन्न स्थानों का अलग-अलग मौकों पर दौरा कर चुके सीएम योगी आदित्यनाथ ने एक बार भी न तो मीडिया से मुलाकात करना जरूरी समझा और न किसी अन्य सूत्रों से यह जानने की कोशिश की कि यहां तैनात अधिकारियों को लेकर आमजन क्या विचार रखता है।
इसीलिए अब सीधा सवाल सूबे के सीएम योगी से क्योंकि एक झटके में 10 जिंदगियां जाने के बावजूद मथुरा में तैनात अधिकारी, लापरवाही का ठीकरा एक-दूसरे के सिर फोड़ने में व्यस्त हैं।
इन फैक्ट, वो यमुना में सैकड़ों मोटर बोट... चप्पू नाव तथा स्टीमर के अवैध संचालन तक की जिम्मेदारी शासन की कार्यप्रणाली पर डाल रहे हैं जबकि यमुना में इनका अवैध संचालन उनकी तिजोरियां भर रहा है।
कल जब इस बारे में मीडिया ने नगर निगम के अधिकारियों से बात की तो उनकी बेशर्मी का आलम यह था कि वो इनके अवैध संचालन को स्वीकार करते हुए भी ढाई महीने पहले प्रयागराज भेजे गए उस गजट का हवाला दे रहे थे जो नावों के संचालन हेतु लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया का हिस्सा है।
क्या सीएम योगी यह बताएंगे कि बिना लाइसेंस यमुना में चल रही सैकड़ों नावों के खिलाफ जिम्मेदार अधिकारियों ने कभी कोई एक्शन क्यों नहीं लिया?
विभिन्न मौकों पर अधिकारी इन्हीं अवैध मोटर बोटों में खुद कैसे भ्रमण करते रहे हैं, और क्यों किसी आमजन के लिए लाइफ जैकेट जरूरी नहीं की गई, क्या उसके लिए भी किसी गजट की दरकार है या आम आदमी की जिंदगी का अधिकारियों की दृष्टि में कोई मोल है ही नहीं?
किसी को भी यह जानकार आश्चर्य हो सकता है कि मथुरा-वृंदावन में अवैध रुप से चल रही इन नावों पर उनके संचालकों ने लोगों को आकर्षित करने के लिए बाकायदा सेल्फी प्वाइंट तक बना रखे हैं और उनका उपयोग ऊट-पटांग हरकतों के साथ बिना लाइफ जैकेट पहने बेखौफ किया जाता है क्योंकि न कोई रोकने वाला है और न टोकने वाला।
कृष्ण की नगरी में आने वाले अधिकांश अधिकारी कहने को अपनी तैनाती के पहले दिन से तो धार्मिक चोला ओढ़ लेते हैं, किंतु उनकी गिद्ध दृष्टि हर समय अधिक से अधिक अतिरिक्त कमाई के स्त्रोत ढूंढने में लगी रहती है। अवैध रुप से संचालित नावें भी उनमें से एक हैं।
यह भी मान सकते हैं उत्तर प्रदेश में मथुरा जनपद की तैनाती किसी भी अधिकारी के लिए उसकी सर्विस का स्वर्णिम काल साबित होता है। यही कारण है कि कार्यकाल के दौरान ही नहीं, रिटायरमेंट के बाद भी कोई अधिकारी मथुरा को छोड़ना नहीं चाहता। वह किसी न किसी रूप में यहीं बने रहना चाहता है। आज भी कई अधिकारी उसका प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। चाहे बांके बिहारी मंदिर की भीड़ में कोई दबकर मरे, या नाव दुर्घटना में किसी का पूरा परिवार समाप्त हो जाए, अधिकारियों को फर्क नहीं पड़ता। फर्क पड़ता तो इतनी दर्दनाक दुर्घटना के जवाब ऐसे बेदर्द नहीं होते।
योगी जी, मथुरा बेशक एक विश्व प्रसिद्ध धार्मिक नगरी है लेकिन किसी भी अधर्म के लिए धर्म एक बड़ी आड़ का काम करता है इसलिए कृपया करके यहां हो रहे अधर्म तथा उसे संरक्षण देने वाले अधिकारियों की करतूतों पर भी गौर कीजिए ताकि फिर किसी की नाव इस तरह न डूबे और इस तरह इतने लोग अकाल मृत्यु का शिकार न बनें।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी