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सोमवार, 5 दिसंबर 2016

बलात्‍कार के आरोपी से Chief justice का मिलना बन सकता है बड़े विवाद का कारण

इलाहाबाद हाई कोर्ट के Chief justice दिलीप बाबा साहब भोसले की मथुरा यात्रा के दौरान बलात्‍कार के एक आरोपी से मुलाकात बड़े विवाद का कारण बन सकती है। दरअसल, जिस व्‍यक्‍ति के साथ चीफ जस्‍टिस भोसले को हाथ मिलाते हुए फोटो सोशल साइट पर डाले गए हैं, उसी व्‍यक्‍ति के खिलाफ बलात्‍कार जैसे संगीन अपराध का यह मामला चीफ जस्‍टिस भोसले की ही अदालत में लंबित है।
सोशल साइट पर चीफ जस्‍टिस भोसले से अपनी मुलाकात के फोटो बलात्‍कार के इसी आरोपी द्वारा शेयर किए गए हैं जिनसे साफ जाहिर होता है कि उसका चीफ जस्‍टिस से मुलाकात करने का उद्देश्‍य क्‍या था। हालांकि, यह संभव है कि चीफ जस्‍टिस भोसले को इस मुलाकाती की असलियत और अपने यहां उसके खिलाफ लंबित बलात्‍कार के मामले की जानकारी न हो किंतु विधि विशेषज्ञों के अनुसार चीफ जस्‍टिस भोसले का इस तरह मुलाकात करना न सिर्फ प्रोटोकॉल के खिलाफ है बल्‍कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस संबंध में जारी गाइड लाइंस की अवहेलना भी है।
cjbhosle-kkउल्‍लेखनीय है कि इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय के चीफ जस्‍टिस डीबी भोसले गत शनिवार को अपनी पत्‍नी सहित मथुरा आए थे। इस दौरान वह मथुरा में भगवान द्वारिकाधीश तथा वृंदावन में ठाकुर बांके बिहारी के दर्शन करने भी गए।
इसी दौरान चीफ जस्‍टिस से एनयूजेआई के कार्यकारिणी सदस्य, उपजा के प्रदेश उपाध्यक्ष व ब्रज प्रेस क्लब के अध्यक्ष कमलकांत उपमन्यु एडवोकेट ने भी एक कथित प्रतिनिधमंडल के साथ शिष्‍टचार मुलाकात की। एडवोकेट के लिबास काले कोट व कॉलर बैंड में की गई इस मुलाकात के दौरान चीफ जस्‍टिस भोसले, कमलकांत उपमन्‍यु से बड़ी गर्मजोशी के साथ हाथ मिलते हुए दिखाई दिए जबकि बाकी पत्रकारगण हाथ बांधे खड़े नजर आए।
कमलकांत उपमन्‍यु ने उसी दिन शाम को चीफ जस्‍टिस भोसले से अपनी इस मुलाकात के फोटो पूरी न्‍यूज़ सहित अपनी दोनों फेसबुक आईडी पर शेयर भी किए। कमलकांत उपमन्‍यु की एक फेसबुक आईडी कमलकांत उपमन्‍यु के नाम से है जबकि दूसरी कमलकांत उपमन्‍यु II के नाम पर है।
क्‍या है पूरा मामला:
मथुरा में पंजाब केसरी के रिपोर्टर कमलकांत उपमन्‍यु के खिलाफ एक लड़की द्वारा अपने साथ दुराचार तथा यौन उत्‍पीड़न सहित अपने परिचितों को जान से मारने की धमकी देने जैसे संगीन आरोप वर्ष 2014 के दिसंबर माह में लगाये गए। तब मथुरा की एसएसपी मंजिल सैनी हुआ करती थीं। मंजिल सैनी फिलहाल लखनऊ की एसएसपी हैं।
cj-1-kkमंजिल सैनी से अति घनिष्‍ठता के चलते कमलकांत उपमन्‍यु के खिलाफ पहले तो बलात्‍कार का अपराध पंजीकृत ही नहीं किया गया और पीड़िता द्वारा तहरीर दिए जाने के बावजूद उस पर जांच के आदेश कर दिए गए। शहर में इस मामले को लेकर काफी आक्रोश पैदा होने के उपरांत बमुश्‍किल 06 दिसंबर 2014 को थाना हाईवे में आईपीसी की धारा 376 व 506 मुकद्दमा अपराध संख्‍या 944/ 2014 के तहत एफआई आर दर्ज की गई किंतु आरोपी की गिरफ्तारी फिर भी नहीं हुई।
हां, इतना जरूर हुआ कि पब्‍लिक के दबाव में एसएसपी को पीड़िता का मैडिकल कराना पड़ा और उसके बाद 161 तथा 164 के बयान भी दर्ज कराने पड़े। इस आधार पर आरोपी पत्रकार के खिलाफ 82 की कार्यवाही हुई तथा अदालत से वारंट भी जारी किए गए लेकिन इस सब के बावजूद मथुरा पुलिस कमलकांत उपमन्‍यु की गिरफ्तारी सुनिश्‍चित नहीं कर सकी।
मंजिल सैनी ने तो पीड़िता के परिवार को दबाव में लेने के लिए उसके सगे भाई पर ही एक मुकद्दमा दर्ज करा दिया जो बाद में झूठा साबित हुआ।
बताया जाता है कि एसएसपी मंजिल सैनी आरोपी कमलकांत उपमन्‍यु से अपनी निकटता के चलते उन्‍हें अपने बचाव तथा मामले को रफा-दफा करने का पूरा मौका दे रही थीं।
हुआ भी यही। कमलकांत उपमन्‍यु ने मथुरा पुलिस से मिले इस मौके का लाभ उठाकर तत्‍कालीन डीजीपी आनंद लाल बनर्जी से किसी तरह सेटिंग कर ली और अपने सगे भाई त्रिभुवन उपमन्‍यु के प्रार्थना पत्र पर अपने खिलाफ जांच को फिरोजाबाद ट्रांसफर करा लिया। चूंकि सारा मामला सेटिंग से हुआ था इसलिए फिरोजाबाद पुलिस ने इस मामले में फाइनल रिपोर्ट दाखिल कर दी।
इस बीच मथुरा बार एसोसिएशन के तत्‍कालीन अध्‍यक्ष एडवोकेट विजयपाल तोमर ने जांच ट्रांसफर किए जाने के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की जिसकी सुनवाई तत्‍कालीन चीफ जस्‍टिस डी वाई चंद्रचूढ़ के यहां हुई।
चीफ जस्‍टिस डी वाई चंद्रचूढ़ ने प्रथम दृष्‍ट्या इस मामले की गंभीरता के मद्देनजर बहुत सख्‍त आदेश-निर्देश जारी किए।
डी वाई चंद्रचूढ़ का प्रमोशन हो जाने के बाद यह मामला जस्‍टिस अरुण टंडन तथा जस्‍टिस सुनीता अग्रवाल की डिवीजन बैंच में स्‍थानांतरित हो गया। माननीय टंडन तथा सुनीता अग्रवाल ने इस मामले की सुनवाई करते हुए 12 जुलाई 2016 के अपने आदेश में मुख्‍यमंत्री उत्‍तर प्रदेश अखिलेश यादव के स्‍पेशल ऑफीसर इंचार्ज जगजीवन प्रसाद, डीजीपी उत्‍तर प्रदेश तथा एसएसपी मथुरा को 25 जुलाई तक अपने-अपने शपथपत्र दाखिल करने को कहा। कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी पूछा कि जिस तरह से बलात्‍कार पीड़िता के कोर्ट में बयान होने के बावजूद जांच ट्रांसफर कर दी गई, उसे देखते हुए क्‍यों न यह मामला सीबीआई के सुपुर्द कर दिया जाए।
हाईकोर्ट के आदेश का पालन करते हुए तत्‍कालीन डीजीपी आनंद लाल बनर्जी व तत्‍कलीन एसएसपी मथुरा मंजिल सैनी ने तो अपने-अपने जवाब सहित शपथ पत्र दाखिल कर दिए किंतु सीएम के स्‍पेशल ऑफीसर इंचार्ज जगजीवन प्रसाद ने अपना जवाब दाखिल नहीं किया।
शासन के अनुरोध पर हाईकोर्ट ने जगजीवन प्रसाद को जवाब दाखिल करने के लिए कुछ समय और देते हुए अगली तारीख 08 अगस्‍त मुकर्रर कर दी।
इसके बाद चीफ जस्‍टिस के पद पर दिलीप बाबा साहब भोसले की नियुक्‍ति हो जाने के कारण यह मामला स्‍वाभाविक रूप से उनकी अदालत में आ गया, और काफी दिनों तक अनलिस्‍टेड रहा ताकि इसकी सुनवाई प्राथमिकता के आधार पर की जा सके किंतु विभिन्‍न कारणों से इसकी सुनवाई प्राथमिकता के आधार पर नहीं की जा सकी।
प्राप्‍त जानकारी के अनुसार गत माह इसे मार्च 2017 के लिए लिस्‍टेड किया गया है लेकिन पेंडिंग मुकद्दमों की तादाद तथा अदालती प्रक्रिया को देखते हुए इस बात की संभावना काफी कम है कि मार्च 2017 में भी इस मामले की सुनवाई हो पाएगी।
इसी सबके चलते अब आरोपी कमलकांत उपमन्‍यु का मथुरा में चीफ जस्‍टिस से मिलना और चीफ जस्‍टिस का उससे बड़ी गर्मजोशी के साथ हाथ मिलाते हुए फोटो सार्वजनिक होना बड़े विवाद का विषय बन सकता है क्‍योंकि चीफ जस्‍टिस की ऐसी कोई मुलाकात किसी के साथ होना उनके कार्यक्रम का हिस्‍सा नहीं था। आरोपी कमलकांत उपमन्‍यु चूंकि खुद को पत्रकार के साथ-साथ वकील भी मानता है इसलिए वह चीफ जस्‍टिस से मुलाकात के वक्‍त वकालत का चोगा भी धारण किए था किंतु चीफ जस्‍टिस की न तो पत्रकारों से कोई वार्ता पूर्व निर्धारित थी और ना ही वकीलों से। संभवत: इसीलिए मथुरा बार एसोसिएशन का कोई पदाधिकारी अथवा प्रेक्‍टिशनर वकील चीफ जस्‍टिस से मिलने नहीं पहुंचा, अलबत्‍ता नॉन प्रेक्‍टिश्‍नर वकील होते हुए आरोपी पत्रकार कमलकांत उपमन्‍यु वकालत के चोगे में उनसे मिला।
ऐसी स्‍थिति में यह सवाल उठना स्‍वाभाविक है कि कमलकांत उपमन्‍यु की चीफ जस्‍टिस से मुलाकत कराने में किसी न किसी ने मध्‍यस्‍थ की भूमिका जरूर अदा की होगी और निश्‍चित तौर पर वह व्‍यक्‍ति न्‍यायपालिका का ही हिस्‍सा होगा क्‍योंकि हाई कोर्ट के चीफ जस्‍टिस जैसी हस्‍ती से बिना किसी तय कार्यक्रम के इस तरह मुलाकात होना संभव नहीं होता।
प्रोटोकॉल को ताक पर रखकर की गई इस मुलाकात और इसके पीछे छिपे उद्देश्‍य की जांच यूं भी जरूरी है कि इससे कानून का भरोसा जुड़ा हुआ है। चीफ जस्‍टिस भोसले की आदलत में ही आगे कमलकांत उपमन्‍यु के खिलाफ सुनवाई होनी है।
आरोपी कमलकांत उपमन्‍यु ने जिस तरह चीफ जस्‍टिस भोसले से हुई अपनी मुलाकात को एक ओर जहां अपनी फेसबुक प्रोफाइल से प्रचारित व प्रसारित किया है और दूसरी ओर प्रमुख समाचार पत्रों में प्रकाशित कराया है, उससे उसकी मंशा तो साफ जाहिर होती ही है।
इन हालातों में चीफ जस्‍टिस भोसले द्वारा बलात्‍कार के आरोपी पत्रकार कमलकांत उपमन्‍यु से हाथ मिलाते हुए फोटो प्रकाशित होने पर सवाल खड़े होंगे ही।
उधर इलाहाबाद हाई कोर्ट में इस मामले को ले जाने वाले याची अधिवक्‍ता विजयपाल तोमर का कहना है कि वह चीफ जस्‍टिस व आरोपी की मुलाकात का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट तक ले जाएंगे जिससे इसके पीछे छिपे उद्देश्‍य और मुलाकात तय कराने वाले तत्‍वों का पर्दाफाश हो सके।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

शुक्रवार, 27 मई 2016

जब यमुना में यमुना जल ही नहीं, तो प्रदूषण मुक्‍ति की कवायद किसलिए ?

यमुना नदी को प्रदूषण मुक्‍त कराने के लिए 17 वर्ष पूर्व इलाहाबाद हाईकोर्ट में मथुरा के प्रसिद्ध हिंदूवादी नेता गोपेश्‍वरनाथ चतुर्वेदी ने जो जनहित याचिका दायर की थी और जिसे काफी गंभीरता से लेते हुए हाईकोर्ट ने तमाम दिशा-निर्देश जारी किए थे, क्‍या आज वो याचिका तथा उसके आधार पर दिए गए सारे दिशा-निर्देश कोई मायने रखते हैं ?
क्‍या इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा सन् 1998 में दिए गए ये आदेश-निर्देश ही आज विभिन्‍न सरकारी व गैर सरकारी इकाइयों तथा राज्‍य व केंद्र सरकारों के मुलाजिमों के लिए हर साल करोड़ों रुपए हड़प जाने का जरिया बने हुए हैं ?
क्‍या यमुना को प्रदूषण मुक्‍त करने व कराने के नाम पर ऊपर से नीचे तक जो खेल खेला जा रहा है, वह सिर्फ और सिर्फ आम जनता की आंखों में धूल झोंकते हुए धार्मिक भावनाओं को कैश करने का माध्‍यम है ?
क्‍या यमुना को प्रदूषण मुक्‍त रखने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट के बाद अब नेशनल ग्रीन ट्रिब्‍यूनल (एनजीटी) में दायर की गई याचिका का कोई औचित्‍य है ?
ये चार सवाल हैं, जो यमुना की वर्तमान दशा और उसके लिए किए जा रहे प्रयासों की दिशा तय करते हैं। इन सवालों में ही यमुना की प्रदूषण मुक्‍ति का सच छिपा है।
सबसे पहले बात करते हैं सवाल नंबर एक की, जो यमुना को प्रदूषण मुक्‍त कराने के लिए 17 वर्ष पूर्व दायर की गई याचिका तथा उसके आधार पर शासन-प्रशासन को दिए गए दिशा-निर्देशों से जुड़ा है।
वर्ष 1998 में जब इलाहाबाद हाईकोर्ट के अंदर यमुना को प्रदूषण मुक्‍त कराने के लिए याचिका दायर की गई थी, तब यमुना नदी का इतना बुरा हाल नहीं था। तब यमुना में जितना पानी दिखाई देता था, उसमें काफी मात्रा यमुना के वास्‍तविक जल की भी रहा करती थी और इसलिए उसमें जलचरों को स्‍वछंद विचरण करते देखा जाता था। धार्मिक आस्‍था रखने वाले लोग भी तब बेखौफ होकर यमुना जल में न केवल स्‍नान किया करते थे बल्‍कि नियमित रूप से उसका पान (आचमन) भी करते थे।
यही कारण था कि इलाहाबाद हाइकोर्ट ने तब यमुना को प्रदूषण मुक्‍त रखने के लिए जो आदेश-निर्देश दिए उनमें प्रमुख रूप से मथुरा की पशु वधशाला को पूरी तरह बंद करने तथा यमुना में गिरने वाले नालों को टेप करने की बात थी। इस कार्य के लिए कोर्ट ने मथुरा के एक एडीएम को नोडल अधिकारी नियुक्‍त करते हुए उन्‍हें न्‍यायिक अधिकारों तक से सुसज्‍जित किया।
शुरूआती दिनों में ऐसा लगा भी कि कोर्ट के आदेश-निर्देशों की गंभीरता के मद्देनजर प्रशासन सख्‍त रुख अपनायेगा और यमुना को प्रदूषण मुक्‍त कराने का सिलसिला शुरू होगा किंतु जैसे-जैसे समय बीतता गया, वैसे-वैसे सच्‍चाई सामने आने लगी।
मथुरा में दरेसी रोड पर चलने वाली पशु वधशाला बंद तो हुई, किंतु सिर्फ कागजों पर। हकीकत में यह हुआ कि जिस पशु वधशाला में पहले नगर पालिका की इजाजत से एक निर्धारित संख्‍या में पशुओं का कटान किया जाता था, वहां अब बेहिसाब पशु काटे जाने लगे क्‍योंकि अब पशु कटान करने वालों को किसी से इजाजत लेने की जरूरत नहीं रह गई थी।
इसी प्रकार पहले जहां बाकायदा एक जगह पर पशु वधशाला हुआ करती थी और केवल उसी जगह पशुओं का कटान होता था, वहीं अब इस कार्य को करने वालों ने गली-गली, मौहल्‍ला-मौहल्‍ला और यहां तक कि घर-घर में पशु काटना शुरू कर दिया।
दूसरी ओर यमुना एक्‍शन प्‍लान के तहत आने वाले करोड़ों रुपए का बंदरबांट होने लगा और यमुना में गिरने वाले नाले-नालियों की टेपिंग का कार्य भी फाइलों तक सीमित होकर रह गया।
इन 17 वर्षों में जनसंख्‍या कहां से कहां जा पहुंची और उसी अनुपात में यमुना का प्रदूषण भी नित नए रिकॉर्ड कायम करता रहा। एक स्‍थिति ऐसी आ गई कि यमुना में दिखाई देने वाला जल, यमुना जल न होकर मात्र रासायनिक कचरा तथा मानव निर्मित गंदगी के अलावा कुछ नहीं था।
17 साल बाद अब जबकि एक बार फिर यमुना को प्रदूषण मुक्‍त रखने के लिए एनजीटी में याचिका दायर की गई है और एक बार आदेश-निर्देशों की श्रृंखला शुरू होती नजर आ रही है, तब बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि जिस यमुना में यमुना का जल ही नहीं है। जो दिखाई दे रहा है, वह मात्र नाले-नालियों व औद्योगिक इकाइयों की गंदगी भर है तो आखिर किसे प्रदूषण मुक्‍त कराने की कवायद की जा रही है ?
तब इलाहाबाद हाईकोर्ट से लेकर आज एनजीटी तक में याचिका दायर करने वाले गोपेश्‍वरनाथ चतुर्वेदी भी यह स्‍वीकार करते हैं कि हथिनी कुंड (हरियाणा) के बाद यमुना में जल के नाम पर अब जो कुछ दिखाई दे रहा है, उसमें एक बूंद भी यमुना जल नहीं है। जो कुछ है वह सिर्फ गंदगी है।
लेकिन गोपेश्‍वर नाथ चतुर्वेदी का कहना यह है कि यमुना को प्रदूषण मुक्‍त करने की आड़ में एसटीपी तथा एसपीएस संचालन के लिए जो ठेका हर साल उठाया जा रहा है और जिसकी अब तक मात्र खानापूर्ति करके करोड़ों रुपए का बंदरबांट किया जाता रहा है, वह कम से कम संचालित तो किए जाएंगे।
उनकी मानें तो एनजीटी के डर से ही प्रशासन सक्रिय हो रहा है और पालिका प्रशासन जवाब देने पर मजबूर है, लेकिन गोपेश्‍वरनाथ चतुर्वेदी यह नहीं बता पाते कि अब जबकि यमुना में यमुना के जल का अंश ही नहीं है तो एसटीपी तथा एसपीएस संचालन का क्‍या लाभ।
यमुना में यमुना का जल प्रवाहित न हो पाने तक क्‍यों नहीं एसटीपी तथा एसपीएस संचालन जैसी प्रक्रिया ही समाप्‍त कर देनी चाहिए जिससे हर साल भ्रष्‍टाचार की भेंट चढ़ रहे करोड़ों रुपए तो बचाए जा सकें।
इसके अलावा लोगों को यह भी समझ में आना चाहिए कि 17 वर्ष पूर्व इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यमुना को प्रदूषण मुक्‍त रखने के लिए जो आदेश-निर्देश दिए थे, वो अब अपनी सार्थकता खो चुके हैं क्‍योंकि यमुना में यमुना जल ही शेष नहीं रहा।
अब बात सवाल नंबर दो की, जिसके तहत यमुना प्रदूषण मुक्‍ति के काम से जुड़े लगभग सभी सरकारी व गैर सरकारी संगठन कई चरणों का पैसा डकार चुके हैं और पैसा खाने का यह खेल अब भी जारी है।
आश्‍चर्य की बात तो यह है कि ”जे नर्म” के नाम से पहचानी जाने वाली जवाहर लाल नेहरू नेशनल अरबन रिन्‍यूअल मिशन नामक केंद्र सरकार की योजना में भी इन तत्‍वों ने यमुना को प्रदूषण मुक्‍त करने के लिए 104 करोड़ रुपया स्‍वीकृत करा लिया किंतु उसका क्‍या हश्र हुआ, यह तो सबके सामने है लेकिन पैसा कहां गया, यह किसी को पता नहीं।
सवाल नंबर तीन के जवाब में यह साफ है कि यमुना को प्रदूषण मुक्‍त करने व कराने के नाम पर ऊपर से नीचे तक खेला जा रहा खेल केवल जनभावनाओं का दोहन तथा धार्मिक भावनाओं को कैश करने का उपक्रम है क्‍योंकि इसी से वोट की राजनीति भी जुड़ी है और इसी से अनेक लोगों के निजी हित सध रहे हैं।
तमाम संगठन और उनके पदाधिकारी आज यमुना प्रदूषण के मुद्दे पर अपनी दुकान जमा चुके हैं और उनके लिए यह अच्‍छे-खासे व्‍यवसाय का रूप ले चुका है। यमुना प्रदूषण को लेकर उठ खड़े हुए संगठनों की संख्‍या और सबके द्वारा अपनी-अपनी ढपली से अपना-अपना अलग राग अलापना, खुद-ब-खुद इसकी पुष्‍टि करता है अन्‍यथा यदि सबका मकसद एक है तो सबके राग-द्वेष अलग-अलग क्‍यों हैं।
अब चौथे और अंतिम सवाल पर आते हैं क्‍योंकि यह एनजीटी में दायर की गई उस नई याचिका से ताल्‍लुक रखता है जिसने फिर से लोगों में यमुना प्रदूषण मुद्दे को लेकर उम्‍मीद की नई किरण पैदा कर दी है।
इस सवाल का एक ही जवाब हो सकता है। और जवाब यह है कि जब इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश पिछले 17 सालों से धूल फांक रहे हैं, तो क्‍या एनजीटी के आदेश कुछ कर पाएंगे।
गौरतलब है कि एनजीटी में दायर की गई याचिका का मुद्दा फिलहाल एसटीपी तथा एसपीएस के संचालन से जुड़ा है, न कि इससे कि यमुना में यमुना का जल शेष है भी या नहीं। अर्थात एनजीटी के आदेश-निर्देश अधिकतम यमुना में गिरने वाली गंदगी को साफ करा सकते हैं। उस गंदगी को साफ करके यमुना के नदी होने का भ्रम पैदा करा सकते हैं लेकिन यमुना जल नहीं दिला सकते।
कुल मिलाकर यमुना को प्रदूषण मुक्‍त कराने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट से शुरू की गई कवायद एनजीटी तक आते-आते आज गंदे पानी को साफ करके ही यमुना नदी का भ्रम पैदा करा देने के संतोष पर आकर खड़ी हो गई है।
जहां तक सवाल यमुना को प्रदूषण मुक्‍त करने व कराने का है तो याचिकाकर्ता गोपेश्‍वरनाथ चतुर्वेदी और उनके सहायक व कृष्‍ण जन्‍मस्‍थान सेवा संस्‍थान के जनसंपर्क अधिकारी विजय बहादुर सिंह दोनों मानते हैं कि यमुना के मामले में केंद्रीय जल संसाधन मंत्री साध्‍वी उमा भारती भी गाल बजाने के अतिरिक्‍त कुछ नहीं कर रहीं।
बेहतर होगा कि जहर से जहर को मारने वाली चिर-परिचित चिकित्‍सा पद्धति पर अमल करते हुए दलगत राजनीति से इतर जनता भी 2017 के चुनाव में यमुना को मुद्दा बनाकर उसी पार्टी के लिए वोट करे जो पार्टी चुनावों से पूर्व यमुना में अविरल यमुना जल को प्रवाहित करने तथा फिर उसे निर्मल बनाए रखने की दिशा में ठोस कदम उठाती दिखाई दे।
खालिस वोट की राजनीति के इस दौर में वोट को ही हथियार बनाकर जब तक जनता यमुना प्रदूषण को चुनावी मुद्दा नहीं बनायेगी, तब तक हर आदेश-निर्देश का इसी प्रकार मजाक उड़ाया जाता रहेगा और इसी प्रकार पतित पावनी यमुना पतितों के पाप ढोती रहेगी।
आज उसका अस्‍तित्‍व हरियाणा से आगे समाप्‍त हुआ है, कल हरियााणा से ऊपर भी समाप्‍त हो सकता है। तब पहाड़ों के रास्‍ते दिखाकर लोग संभवत: यह बताने लगें कि कभी यहां से होकर यमुना नदी गुजरा करती थी।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

शनिवार, 23 अप्रैल 2016

हाईकोर्ट का एतिहासिक निर्णय: 15 जजों को जबरन Retirement देकर घर भेजा

-मथुरा में ADJ रहे ए. के. गणेश भी इन जजों में शामिल
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खण्‍डपीठ के इतिहास में यह पहला अवसर है जब गंभीर आरोपों के चलते न्‍यायिक सेवा के 15 अधिकारियों को एकसाथ कंपलसरी Retirement देकर घर बैठा दिया गया।
संदिग्‍ध आचरण के आरोपों पर जबरन सेवानिवृत्‍त किए गए ये सभी अधिकारी एडीजे और एसीजेएम स्‍तर के हैं।
इन अधिकारियों को जबरन सेवा निवृत्‍त करने का निर्णय इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बैंच ने एक फुल कोर्ट मीटिंग के बाद इसी महीने की 14 तारीख को लिया।
उच्‍च न्‍यायालय के चीफ जस्‍टिस डी वाई चंद्रचूण द्वारा लिए गए निर्णय से उत्‍तर प्रदेश सरकार को अवगत कराते हुए इन सभी 15 अधिकारियों के अधिकार छीन लिए गए और अधिकारी के रूप में इनकी सभी गतिविधियों पर तत्‍काल प्रभाव से रोक लगा दी गई।
इस बात की जानकारी इलाहाबाद हाईकोर्ट के रजिस्‍ट्रार जनरल शिवेन्‍द्र कुमार सिंह ने दी।
जिन अधिकारियों को जबरन सेवा निवृत्‍त करने का इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एतिहासिक निर्णय लिया है, उनमें एडीजे सिद्धार्थनगर शैलेश्‍वर नाथ सिंह, एडीजे इटावा बंसराज, एडीजे आजमगढ़ राममूर्ति यादव, एडीजे (एंटी करप्‍शन) लखनऊ ध्रुव राज, एडीजे मुरादाबाद जगदीश द्वितीय, एडीजे सोनभद्र नरेश, एडीजे सोनभद्र विमल प्रकाश काण्‍डपाल, फैमिली कोर्ट जज कुशीनगर ए. के. गणेश, एडीजे गाजीपुर अरविंद कुमार प्रथम, एडीजे मेरठ अविनाश चंद्र त्रिपाठी, एडीजे मुरादाबाद अविनाश कुमार द्विवेदी, एडीजे फर्रुखाबाद मोहम्‍मद मतीन खान, एडीजे कांशीराम नगर किशोर कुमार द्वितीय, एसीजेएम पीलीभीत श्‍याम शंकर सिंह द्वितीय तथा एसीजेएम हरदोई श्‍याम शंकर द्वितीय शामिल हैं।
इनमें से ए. के. गणेश करीब 5 साल पहले मथुरा में एडीजे थर्ड के पद पर काबिज हुए थे। मूल रूप से दक्षिण भारत के रहने वाले न्‍यायिक सेवा के इस अधिकारी ने धर्म की नगरी मथुरा में रहकर न केवल अपने अधिकारों का भरपूर दुरुपयोग किया बल्‍कि कानून के साथ यथासंभव खिलवाड़ किया।
ए. के. गणेश ने मथुरा में तैनाती के दौरान मुख्‍य रूप से अपना हथियार सीआरपीसी की धारा 319 को बनाया। धारा 319 के लिए जज को यह विशेष अधिकार प्राप्‍त है कि वह किसी आपराधिक मुकद्दमे में किसी भी ऐसे व्‍यक्‍ति को इस धारा का इस्‍तेमाल करके तलब कर सकता है जिसका नाम पुलिस एफआईआर में न हो अथवा जिसका नाम पुलिस ने तफ्तीश के बाद यह मानते हुए एफआईआर से निकाल दिया हो कि उसकी उक्‍त घटना में संलिप्‍तता नहीं थी।
ए. के. गणेश ने इस धारा को हथियार बनाकर एक ओर जहां वादी पक्ष से इस बात का पैसा लिया कि वह उसके बताए किसी भी व्‍यक्‍ति को 319 का नोटिस भेजकर आरोपी बना देगा, वहीं आरोपी बनाए गए निर्दोष व्‍यक्‍तियों से उन्‍हें जमानत देने के नाम पर भरपूर लूट की।
ए. के. गणेश ने यह सब तब किया जबकि सुप्रीम कोर्ट ने धारा 319 के मामले में इस आशय के स्‍पष्‍ट आदेश व निर्देश दे रखे हैं कि 319 के तहत किसी व्‍यक्‍ति को तभी तलब किया जाए जब उसके खिलाफ संबंधित आपराधिक घटना में लिप्‍त होने के पर्याप्‍त सबूत हों और वो सबूत उसे सजा दिलाने के लिए पर्याप्‍त हों।
सुप्रीम कोर्ट ने सीआरपीसी की धारा 319 का अधिकारियों द्वारा दुरुपयोग रोकने के लिए ऐसे निर्देश भी दे रखे हैं कि 319 के तहत जारी किए गए तलबी आदेश पर खुद जज के हस्‍ताक्षर होने चाहिए न कि उनके बिहाफ पर किसी अधीनस्‍थ के हस्‍ताक्षर से नोटिस जारी कर दिया जाए।
ए. के. गणेश ने मथुरा में एडीजे के पद पर रहते हुए सुप्रीम कोर्ट के इन आदेश-निर्देशों की जमकर धज्‍जियां उड़ाईं और अपने कुछ खास दलालों के माध्‍यम से लाखों रुपए वसूले।
ए. के. गणेश की मथुरा में मनमानी का आलम यह था कि उसके मुंह से रिश्‍वत की जो रकम एकबार निकल जाती थी, वह उससे पीछे नहीं हटता था और तब तक लोगों को प्रताड़ित करता था जब तक रकम की पूरी वसूली नहीं कर लेता था।
ऐसा नहीं है कि ए. के. गणेश अपने अधिकारों का दुरुपयोग करने वाला अकेला अधिकारी था या दूसरे न्‍यायिक अधिकारी उसकी इस कार्यप्रणाली से वाकिफ नहीं थे किंतु बोलता कोई कुछ नहीं था क्‍योंकि अधिकांश अधिकारियों की कार्यप्रणाली उससे मेल खाती थी और वो उसी कार्यप्रणाली के कायल थे।
अब जबकि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ए. के. गणेश जैसे 15 न्‍यायिक अधिकारियों को एतिहासिक निर्णय देकर सबक सिखाया है तो उम्‍मीद की जानी चाहिए कि समूचे न्‍यायिक अधिकारियों में एक भय व्‍याप्‍त होगा और वह अपने विशेष अधिकारों का दुरुपयोग करने तथा पैसा वसूलने के लिए किसी निर्दोष को फंसाने से पहले एक बार सोचेंगे जरूर।
-लीजेंड न्‍यूज़

बुधवार, 22 जुलाई 2015

यूपी: पीसीएस से एसडीएम बनने वाले 86 में 56 यादव कैसे, याचिका दायर

लखनऊ। उत्तर प्रदेश पीसीएस की परीक्षा में पीसीएस से एसडीएम बनने वाले 86 में 56 यादव कैसे, यह जानने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की गई है।
याचिका दायर असफल होने वाले कुछ छात्रों ने की है और यूपीपीसीएस द्वारा आयोजित पिछली तीन परीक्षाओं में अनियमितता और धोखाधड़ी के आरोप लगाए हैं।
छात्रों का आरोप है कि पिछली तीन परीक्षाओं के बाद एसडीएम बनने वाले छात्रों में से आधे एक ही जाति के हैं।
इलाहाबाद हाई कोर्ट में दायर याचिका में दावा किया गया कि एसडीएम बनने वाले 86 लोगों में से 56 एक ही जाति के हैं। साथ ही, पिछले तीन वर्षों में यूपीपीएससी की परीक्षाओं में उत्तीर्ण होने वालों में भी 50 फीसदी इसी एक जाति के हैं।
याचिकाकर्ताओं ने यूपीपीएससी के चेयरपर्सन डॉ. अनिल यादव पर अपनी ही जाति के छात्रों को फायदा पहुंचाने का आरोप लगाते हुए इस मामले की सीबीआई जांच कराने की मांग की है।
याचिका के मुताबिक 2011 में सिलेक्ट हुए 389 पीसीएस ऑफिसर्स में से 72 उनकी ही जाति के हैं। ओबीसी कोटे में पास होने वाले 111 छात्रों में से 45 इसी जाति के हैं। याचिका के मुताबिक यूपीपीएससी की परीक्षाओं में इस तरह की अनियमितता डॉ. अनिल यादव के चेयरपर्सन बनने के बाद ही शुरू हुई। उनके कार्यकाल में 2011, 12 और 13 में परीक्षाएं कराई गईं।
पहुंचाया गया फायदा: याचिकाकर्ताओं में से एक अवधेश पांडेय ने कहा, ‘सामान्यत: पीसीएस परीक्षाएं दो-तीन वर्षों के अंतराल पर आयोजित कराई जाती थीं, लेकिन अपनी जाति के लोगों को लाभ पहुंचाने के लिए डॉ. यादव इन्हें हर साल आयोजित करवाने लगे। हमने हाई कोर्ट में यूपीपीएससी द्वारा आयोजित एक दर्जन से ज्यादा परीक्षाओं के परिणाम सबूत के तौर पर पेश किए, जो एक जाति विशेष को लाभ पहुंचाने की ओर इशारा करते हैं। यह मामला मध्य प्रदेश के व्यापम घोटाले से भी बड़ा हो सकता है और इसकी सीबीआई जांच कराई जानी चाहिए।’
रिपोर्ट के मुताबिक याचिकाकर्ताओं का दावा है कि अपनी जाति के अभ्यर्थियों को लाभ पहुंचाने के लिए यूपीपीएससी के नियम भी बदले गए। अब लिखित परीक्षा में कुछ विषयों में शून्य अंक लाने वाले छात्रों को भी आगे बढ़ा दिया जाता है। अब मेरिट की लिस्ट लिखित परीक्षा और इंटरव्यू के नंबरों को मिलाकर तैयार की जाती है। ऐसे में लिखित परीक्षा में बहुत कम अंक हासिल करने वालों को इंटरव्यू में ज्यादा नंबर दे दिए जाते हैं लेकिन लिखित में ज्यादा नंबर लाने वाले छात्रों को इंटरव्यू में ज्यादा नंबर नहीं मिल पाते।
बदले गए नियम और फैसले: एक याचिकाकर्ता विशाल कुमार ने यूपीपीएससी की उस प्रक्रिया पर भी सवाल उठाया, जिसके तहत एग्जाम की आंसर शीट सार्वजनिक किया जाना बंद कर दिया गया। ऐसे में छात्रों को पता ही नहीं चलता था कि वे कहां गलत थे। हाई कोर्ट में मामला पहुंचने पर इसका भी तोड़ निकाल लिया गया। यूपीपीएससी की परीक्षा में कई ऐसे सवाल मिले, जिनके एक से ज्यादा सही जवाब थे लेकिन पेपर जांचने वाले अपने मन से किसी भी एक जवाब को सही मान लेते थे। यह मामला अभी लंबित है।
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