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शनिवार, 14 फ़रवरी 2026
योगी जी! यहां तो 'सरकार' ही करा रहे हैं 'सरकारी जमीन' पर माफिया का कब्जा, अब आप क्या करेंगे?
उत्तर प्रदेश फार्मा कॉन्क्लेव 1.0 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का दिया गया एक बयान इन दिनों बहुत वायरल हो रहा है। इस बयान में वह प्रदेश के 'लैंड बैंक' का जिक्र करते हुए बताते हैं कि हमने सत्ता संभालने के बाद 'भूमाफिया टास्क फोर्स' गठित कर भूमाफिया को इस आशय की कड़ी चेतावनी दी कि वह या तो 24 घंटों के अंदर सरकारी जमीन खाली कर दे अन्यथा जमीन तो कब्जा मुक्त करवाई ही जाएगी, साथ ही उससे जो लाभ अर्जित किया गया है उसकी भी वसूली ब्याज सहित की जाएगी। सीएम योगी का बयान सर-माथे, लेकिन उन्हें ये कौन बताए कि जब स्वयं को संपूर्ण सरकार मानकर काम करने वाले जिला स्तरीय अधिकारी ही माफिया से मिलीभगत कर सरकारी जमीन पर कब्जा करा रहे हों, तो उनसे निपटने के लिए कौन सी टास्क फोर्स सामने आएगी और उनके द्वारा अर्जित किए गए लाभ की ब्याज सहित वसूली कैसे होगी।
मामला योगीराज श्रीकृष्ण की पावन क्रीड़ास्थली वृंदावन से जुड़ा है। जहां भूमाफिया की शक्ल में सक्रिय कॉलोनाइजर को नगर निगम की बेशकीमती जमीन देने की आतुरता में बार-बार बोर्ड बैठक के दौरान प्रस्ताव रखा जाता है और मीडिया द्वारा सारे खेल का खुलासा करने पर जिम्मेदार अधिकारी बाकायदा जांच कराकर लिखत-पढ़त में यह स्वीकार करते हैं कि लैंड एक्सचेंज का प्रस्ताव पास होने से पहले ही निगम की जमीन पर माफिया काबिज है और उसने वहां अवैध निर्माण करा लिया है।
यही नहीं, नगर निगम द्वारा अपनी जमीन पर किए गए अवैध निर्माण को ध्वस्त कराने के लिए 31 जनवरी 2026 के दिन डेवलपमेंट अथॉरिटी के नाम एक चिट्ठी भी लिखी जाती है परंतु न डेवलपमेंट अथॉरिटी के कान पर जूं रेंगती है और न उस सरकारी विभाग के, जिसकी जमीन को माफिया ने कब्जा लिया है।
मतलब नगर निगम ने मात्र चिट्ठी लिखकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली जबकि डेवलपमेंट अथॉरिटी कहती है कि नगर निगम तो अपनी जमीन स्वयं कब्जामुक्त कराने का अधिकार रखता है।
सच्चाई जो भी हो, फिलहाल तो जहां अधिकारियों का यह खेल जारी है वहीं माफिया इस प्रयास में लगा है कि किसी भी तरह सरकारी पत्राचार को यहीं विराम देकर अपना काम आगे बढ़ाया जाए।
बहरहाल, 'जिले की सरकार' ये खेल क्यों खेल रही है और माफिया को इतना मौका कैसे मिल रहा है... यह समझना 'रॉकेट सांइस' जितना जटिल नहीं है।
तब तो कतई नहीं जब मीडिया द्वारा इस बावत प्रश्न पूछने पर अधिकारी, मीडिया को ही देख लेने की धमकी देने लगें और नगर निगम में दोबारा घुसने का साहस करने पर सबक सिखाने की चेतावनी देकर सुरक्षागार्डों से बाहर का रास्ता दिखवा दें।
जाहिर है कि वृंदावन में डेवलप की जा रही सनसिटी अनंतम के मालिकों से पर्दे के पीछे कोई तो ऐसा 'छद्म एमओयू' साइन हुआ है जिसका मसौदा सामने आने पर हमाम के सारे चेहरे सामने आ सकते हैं।
यदि ऐसा नहीं हैं तो यह कैसे संभव है कि सीएम योगी के सारे आदेश-निर्देश ताक पर रखकर किसी जिले की सरकार अपनी बेशकीमती सरकारी जमीन का किसी निजी टाउनशिप के लिए विनिमय करने पर 'आमादा' है और ऊपर से नीचे तक के सारे अधिकारी एक-दूसरे के कंधे पर बंदूक रखकर काम पूरा करना चाहते हैं।
मीडिया के सामने आकर जवाब देने की बजाय क्यों ये अधिकारी चिट्ठी-चिट्ठी खेलते हुए निजी टाउनशिप के लिए भी लैंड एक्सचेंज की पॉलिसी को जायज ठहराने के प्रयास में लगे हैं।
क्यों वो अपने ही पत्राचार में एक ओर तो स्वीकार करते हैं कि सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा और अवैध निर्माण कर लिया गया है और दूसरी ओर उसी माफिया के पक्ष में लाए गए लैंड एक्सचेंज के प्रस्ताव को नियम-कानून सम्मत ठहराने की कोशिश कर रहे हैं।
इसमें दो राय नहीं कि सीएम योगी के प्रयास से प्रदेश में सक्रिय माफिया हतोत्साहित हुआ है, लेकिन सच यह भी है जो सामने है और सबको दिखाई दे रहा है। अगर कोई आंखें मूंदे बैठा है तो वो तबका जो हर जिले में अपनी एक समानांतर सरकार चलाता है और जिसके प्रोत्साहन से माफिया 'जीरो टॉलरेंस' को भी 'जीरो' बनाकर छोड़ देता है।
बेहतर होगा सीएम योगी एकबार मथुरा जनपद के उस लैंड बैंक का भी मौका मुआयना कर लें और जान लें कि कैसे उस बेशकीमती लैंड बैंक में माफिया और अधिकारियों का कॉकस पूरी शिद्दत से सेंध लगा रहा है।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
बुधवार, 4 फ़रवरी 2026
सनसिटी अनंतम मामला: अपने ही बुने जाल में फंसा नगर निगम, एक पत्र से हुआ काले कारनामों का खुलासा
वृंदावन में सनसिटी अनंतम के नाम से डेवलप की जा रही टाउनशिप को नगर निगम मथुरा-वृंदावन द्वारा लेंड एक्सचेंज की आड़ लेकर बेशकीमती जमीन देने की कोशिश का मामला अब निगम के ही गले की फांस बनता दिखाई दे रहा है।
अरबों रुपए के रियल एस्टेट प्रोजेक्ट के लिए भूमाफिया को जमीन देने का प्रयास भले ही फिलहाल बोर्ड की बैठकों में प्रस्ताव पेश करने से आगे न बढ़ा हो, किंतु नगर निगम के एक नए पत्र से इस बात का खुलासा जरूर हो गया है कि सारी कवायद उस करोड़ों रुपए की रिश्वत को पचाने की खातिर की जा रही है जो शासन में जनप्रतिनिधि और प्रशासन में अधिकारियों की शक्ल लेकर बैठे लोग ले चुके हैं।देखें नगर निगम द्वारा बीती 31 जनवरी को जिलाधिकारी मथुरा के नाम लिखा गया पत्र
जनसुनवाई शिकायत दिनांक 17 जनवरी 2026 के निस्तारण का हवाला देकर लिखे गए इस पत्र के अनुसार दीपक शर्मा पुत्र लक्ष्मीनारायण शर्मा उर्फ ब्रज बिहारीशर्मा निवासी वृंदावन बांगर, तहसील व जिला मथुरा ने मुख्यमंत्री पोर्टल पर एक शिकायत की है।
शिकायत के मुताबिक नगर निगम मथुरा-वृंदावन द्वारा सनसिटी अनंतम को टाउनशिप डेवलप करने के लिए काफी कम कीमत में अपनी जमीन विनिमय की जा रही है।
दीपक शर्मा की इसी शिकायत का जनसुनवाई के माध्यम से निस्तारण करते हुए नगर निगम ने जिलाधिकारी मथुरा को जो पत्र लिखा है, वह बताता है कि नगर निगम द्वारा इस संदर्भ में एक जांच कराई गई। जांच में पाया गया कि विनिमय में भूमि की बिक्री नहीं की जाती, अलबत्ता भूमि के मूल्य का आंकलन करके विनिमय किया जाता है।
नियमानुसार भूमि के विनिमय में सिर्फ 5 प्रतिशत अंतर मान्य है और नगर निगम द्वारा सनसिटी अनंतम को जितनी भूमि देने का प्रस्ताव लाया गया था, उससे अधिक क्षेत्रफल की भूमि नगर निगम को प्राप्त हो रही है। हालांकि प्रश्नगत भूमि का विनिमय अभी स्वीकृत नहीं हुआ है।
अपर नगर आयुक्त के हस्ताक्षर से जिलाधिकारी को भेजा गया यह पत्र ही न सिर्फ कई गंभीर सवाल खड़े करता है बल्कि यह भी जाहिर कराता है कि किसी न किसी स्तर पर सनसिटी अनंतम के प्रमोटर्स की कोई दुरभि संधि हुई है, जिसका उल्लेख सूत्रों के हवाले से लीजेण्ड न्यूज़ अपनी इससे पहली रिपोर्ट में कर चुका है।
जानिए कैसे?
वो इस तरह कि शिकायत का निस्तारण करते हुए नगर निगम ने लिखा है- विनिमय के लिए भूमि के मूल्य में सिर्फ 5 प्रतिशत का अंतर मान्य है।
अब यहीं एक पहला गंभीर सवाल तो यह खड़ा होता है कि ये 5 प्रतिशत का अंतर सनसिटी अनंतम के पक्ष में लाभकारी है या नगर निगम के पक्ष में?
दूसरा सवाल यह कि करोड़ों रुपए मूल्य की सरकारी जमीन के विनिमय में क्या 5 प्रतिशत का अंतर कोई अहमियत नहीं रखता, और यदि रखता तो नगर निगम ने अब तक साफ क्यों नहीं किया कि उसे सनसिटी के लिए लेंड एक्सचेंज करने में लाभ हो रहा है अथवा हानि?
तीसरा स्वाभाविक सवाल यह है कि एक सरकारी जमीन के निजी कंपनी के पक्ष में विनिमय की पहल किसने तथा किस स्तर से की?
चौथा सवाल कि अगर सनसिटी अनंतम की भूमि नगर निगम की भूमि से ज्यादा मूल्यवान है तो वो उसे एक्सचेंज करना क्यों चाहते हैं, और यदि नगर निगम की भूमि अधिक कीमती है तो नगर निगम किस स्वार्थ में सनसिटी अनंतम को अपनी जमीन देने का प्रस्ताव लेकर क्यों आया?
पांचवां प्रश्न यह है कि क्या शासन की स्वीकृति के बिना जिला प्रशासन की कोई इकाई इस तरह किसी प्राइवेट प्रोजेक्ट के लिए लेंड एक्सचेंज का प्रस्ताव ला सकती है?
और अंतिम प्रश्न कि जब इस भूमि के विनिमय का प्रस्ताव पास ही नहीं हुआ तो सनसिटी अनंतम कैसे इस भूमि पर काबिज हो गया, क्यों व किसके प्रोत्साहन से इस भूमि पर उसने अवैध निर्माण कार्य शुरू करा दिया। जिसकी पुष्टि खुद नगर निगम ने अपनी जांच के उपरांत की है तथा जिसे ध्वस्त कराने के लिए नगर निगम ने 22 जनवरी 2026 को ही मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के नाम भी एक पत्र लिखा है।
इन सब प्रश्नों के अतिरिक्त एक बड़ा अहम प्रश्न यह भी है कि क्या नगर निगम को अपनी ही जमीन को कब्जामुक्त कराने तथा उस पर किए जा रहे अवैध निर्माण को रोकने तथा ध्वस्त कराने के लिए मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण की जरूरत है, क्या नगर निगम के पास अपने ऐसे अधिकार नहीं हैं कि वह अपनी जमीन को भूमाफिया के चंगुल से छुड़ाकर उस पर काबिज हो सके?
आपसी सहमति से खेला जा रहा सारा खेल
दरअसल, हकीकत यह है कि लेंड एक्सचेंज का यह खेल अब तक बाकायदा एक षड्यंत्र के तहत आपसी सहमति से खेला जा रहा था, किंतु जब पहले तो एनजीटी में इसके खिलाफ याचिका दायर हुई और फिर मीडिया में आने के बाद शासन स्तर पर शिकायतें होने लगीं तो नगर निगम अपनी गर्दन बचाने की कवायद करने लगा।
जरा सोचिए कि जो जमीन सनसिटी अनंतम को देने के लिए नगर निगम बार-बार बोर्ड बैठक में प्रस्ताव लेकर आ रहा था, उस जमीन पर अवैध कब्जा तथा अवैध निर्माण की जानकारी नगर निगम को अब तक क्यों नहीं हुई। और जब हुई है तब भी उसे कब्जामुक्त कराने तथा अवैध निर्माण ध्वस्त कराने के लिए वह चिट्ठी-चिट्ठी क्यों खेल रहा है। वो इसलिए कि बहुत जल्द सारा प्रकरण सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर दस्तक देने जा रहा है।
हां! एक बात और कि इस काले कारनामे में मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण भी हर स्तर पर सहभागी है, लिहाजा जब बात निकलेगी तो बहुत दूर तलक जाएगी ही। विकास प्राधिकरण के अधिकारी भी आखिर कब तक खैर मनाने में कामयाब होंगे। आगे-आगे देखिए... होता है क्या?
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
दरअसल, हकीकत यह है कि लेंड एक्सचेंज का यह खेल अब तक बाकायदा एक षड्यंत्र के तहत आपसी सहमति से खेला जा रहा था, किंतु जब पहले तो एनजीटी में इसके खिलाफ याचिका दायर हुई और फिर मीडिया में आने के बाद शासन स्तर पर शिकायतें होने लगीं तो नगर निगम अपनी गर्दन बचाने की कवायद करने लगा।
जरा सोचिए कि जो जमीन सनसिटी अनंतम को देने के लिए नगर निगम बार-बार बोर्ड बैठक में प्रस्ताव लेकर आ रहा था, उस जमीन पर अवैध कब्जा तथा अवैध निर्माण की जानकारी नगर निगम को अब तक क्यों नहीं हुई। और जब हुई है तब भी उसे कब्जामुक्त कराने तथा अवैध निर्माण ध्वस्त कराने के लिए वह चिट्ठी-चिट्ठी क्यों खेल रहा है। वो इसलिए कि बहुत जल्द सारा प्रकरण सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर दस्तक देने जा रहा है।
हां! एक बात और कि इस काले कारनामे में मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण भी हर स्तर पर सहभागी है, लिहाजा जब बात निकलेगी तो बहुत दूर तलक जाएगी ही। विकास प्राधिकरण के अधिकारी भी आखिर कब तक खैर मनाने में कामयाब होंगे। आगे-आगे देखिए... होता है क्या?
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
गुरुवार, 15 जनवरी 2026
माफिया पर मेहरबान प्रशासन: कौड़ियों की जमीन के बदले नगर निगम की बेशकीमती जमीन देने की तैयारी
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हर तीसरे दिन, और अपने प्रत्येक जनता दर्शन कार्यक्रम में कहते रहते हैं कि भूमाफिया किसी भी तरह पनपने न पाए। वह राज्य से माफिया को नेस्तनाबूद करने के आदेश और निर्देश अधिकारियों को देते रहते हैं, लेकिन यदि मेढ़ ही खेत को खाने पर आमादा हो तो सीएम योगी कर क्या सकते हैं। ऐसे में एक योगी क्या, योगी जैसे दस मिलकर भी शायद कुछ नहीं कर सकते। दूसरे जनपदों का यहां जिक्र न किया जाए तो कम से कम मथुरा का जिला प्रशासन भली-भांति समझ चुका है कि वह चाहे जितना खुल कर खेले, चाहे जितना भ्रष्टाचार करे किंतु उसका कुछ नहीं बिगड़ने वाला। तभी तो धर्म की नगरी में अधर्म का डंका डटकर बज रहा है और जिसकी जितनी बिसात है, वह उतनी ही माफिया की मदद करने पर आमादा है।
तभी तो पहले डालमिया बाग और अब सनसिटी अनंतम का मामला भी अदालत की चौखट तक पहुंचा, अन्यथा इसकी जरूरत ही क्यों पड़ती।
ताजा मामला एक बार फिर वृंदावन के सनसिटी अनंतम से जुड़ा है जिसे नगर निगम मथुरा-वृंदावन की बेशकीमती जमीन उपलब्ध कराने के लिए जिला प्रशासन के निर्देश पर बोर्ड बैठक में बाकायदा प्रस्ताव लाया गया।
आश्चर्य की बात यह है कि यह प्रस्ताव कौड़ियों की जमीन के बदले नगर निगम की बेशकीमती जमीन देने का है, जिस पर पूर्व में एक जिलाधिकारी आपत्ति भी दर्ज करा चुके हैं। अब यह प्रस्ताव निगम की बैठक में फिर लाया गया है।
क्या है प्रस्ताव?
9 अक्टूबर 2025 को पेश एजेण्डे के अनुसार अपर जिलाधिकारी (प्रशासन) मथुरा ने ग्राम जैत व छटीकरा में सनसिटी हाईटेक प्रोजेक्ट प्रा. लि. द्वारा विकसित की जा रही टाउनशिप के लिए भूमि विनिमय का प्रस्ताव बोर्ड से पास कराकर उपलब्ध कराने के निर्देश पत्रांक-322/सात-बी/भू.व्य./2023 दिनांक 06.09.2023 एवं 173/सात- बी/भू.व्य./2023 दिनांक 23.09.2024 के जरिए दिए हैं।
इस नए प्रस्ताव के मसौदे में बताया गया है कि ग्राम जैत व छटीकरा में सनसिटी हाईटेक प्रोजेक्ट प्रा. लि. द्वारा विकसित की जा रही टाउनशिप के लिए भूमि के विनिमय का जो प्रस्ताव कार्यकारिणी ने पहले रखा था, उसकी त्रुटियों को संशोधित करते हुए यह प्रस्ताव लाया गया है।
यहां यह जान लेना जरूरी है कि सनसिटी हाईटेक ने अपनी प्रस्तावित टाउनशिप में जमीन का प्राथमिक मूल्य लगभग एक लाख रुपए प्रति वर्ग गज रखा है जबकि मथुरा-वृंदावन नगर निगम को उसके विनिमय में जो भूमि मिलनी है उसकी कीमत बमुश्किल 10 हजार रुपए प्रति वर्ग गज है।
देखें नगर निगम मथुरा-वृंदावन की बोर्ड बैठक में पेश एजेण्डे की प्रति-
गौरतलब है कि समूचा मथुरा जनपद और विशेषकर भगवान श्रीकृष्ण की लीलास्थली वृंदावन इन दिनों ''धार्मिक पर्यटन'' के रूप में अपनी वैश्विक पहचान बना चुका है। वृंदावन में जमीनों के दाम आसमान छू रहे हैं इसलिए स्थानीय ही नहीं, बाहरी भूमाफिया भी इसका भरपूर लाभ उठाने में लगे हैं। चूंकि जिला प्रशासन उन्हें इसकी पूरी छूट दे रहा है इसलिए वह कोई मौका हाथ से जाने नहीं देना चाहते।
इन हालातों में यह बताने की तो आवश्यकता ही नहीं रह जाती कि मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण हो या फिर नगर निगम मथुरा-वृंदावन, सब आखिर कथित कॉलोनाइजर्स या यूं कहें कि भूमाफिया पर इतने मेहरबान क्यों हैं, और क्यों जिला प्रशासन विकास की आड़ लेकर भूमाफिया को सीधा लाभ पहुंचाने की जद्दोजहद में लगा है।
दरअसल ये सारा खेल करोड़ों का नहीं, अरबों का है। जाहिर है कि इससे होने वाली हराम की कमाई कितनी भी मामूली क्यों न हो, कुबेर के खजाने से कम नहीं होगी। राधे-राधे की रट लगाकर ब्रजवासियों को मूर्ख बनाने का यह धंधा बेशक बहुत दिनों से चल रहा है लेकिन अदालतें उम्मीद की किरण दिखा रही हैं।
वो आशा जगाती हैं कि कभी न कभी तो पाप का यह घड़ा भरेगा, और किसी न किसी दिन यह फूटेगा भी। तब अकेला माफिया नहीं, नेता और अधिकारी भी नापे जाएंगे। काली कमली वाले की नजर जिस दिन टेढ़ी हो गई, उस दिन ब्रज में यह कहावत चरितार्थ होते दिखाई देगी कि उसके घर में देर भले ही हो लेकिन अंधेर नहीं होता।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
रविवार, 27 जुलाई 2025
सावधान! डालमिया बाग पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आने के बावजूद साजिश रच रहे हैं भूमाफिया
वृंदावन के डालिमया बाग का सिर्फ एमओयू साइन करके हजारों करोड़ रुपए हड़प चुके भूमाफिया अब एक तीर से कई निशाने साधने की कोशिश में लगे हैं। इसके लिए वह नित नई साजिशें रच रहे हैं, और इन साजिशों के तहत इस तरह की अफवाहें फैला रहे हैं जिससे एक ओर इनके जाल में फंसे बैठे लोगों की उम्मीद न टूटे और दूसरी ओर नए निवेशकों को टोपी पहनाई जा सके। गौरतलब है कि योगीराज श्रीकृष्ण की क्रीड़ास्थली के बेशकीमती इलाके छटीकरा रोड पर स्थित डालमिया बाग से भूमाफिया द्वारा रातों-रात 454 हरे दरख्त काटे जाने का मामला जब नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के बाद सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचा तो सुप्रीम कोर्ट ने इस पर बेहद सख्त रुख अपनाते हुए आरोपियों पर न केवल भारी जुर्माना लगाया बल्कि किसी भी किस्म के निर्माण पर रोक के साथ-साथ पर्यावरण की भरपाई के लिए हजारों नए पेड़ लगाने का भी आदेश दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में 9 बिंदुओं के जरिए यह स्पष्ट किया...
1. 454 पेड़ों की प्रतिपूर्ति उसी भूमि पर वृक्षारोपण करके की जाएगी।
2. 9080 वृक्षों का रोपण आसपास के उपयुक्त स्थलों पर किया जाएगा, जिनमें 4540 पौधे मूल वृक्षों के स्थान पर प्रतिपूरक वृक्षारोपण के रूप में तथा 4540 पौधे दंड स्वरूप लगाए जाएंगे।
3. प्रत्येक वृक्ष हेतु ₹1,00,000/- के हिसाब से ₹4,54,00,000/- (4 करोड़ 54 लाख रुपये मात्र) का न्यूनतम दंड भूमि स्वामी पर अधिरोपित किया गया है, जिसे वन विभाग के माध्यम से वृक्षारोपण में व्यय किया जाएगा।
4. उ. प्र. वृक्ष संरक्षण अधिनियम 1976 तथा भारतीय वन अधिनियम 1927 के प्रावधानों के तहत अवैध वृक्ष कटान हेतु दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।
5. संरक्षित वन क्षेत्र में बिना पूर्व अनुमति मार्ग निर्माण हेतु वन संरक्षण अधिनियम 1980 के अंतर्गत अभियोजन चलेगा।
6. वन विभाग द्वारा समस्त अवैध लकड़ी की जब्ती एवं निस्तारण का कार्य किया जाएगा।
7. TTZ प्राधिकरण द्वारा न्यायालय के समस्त आदेशों के अनुपालन की त्रैमासिक रिपोर्ट पेश की जाएगी।
8. निर्माण पर प्रतिबंध रहेगा
9. अवमानना के लिए पृथक दंड पर भी विचार किया जाएगा।
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9080 पेड़ भी उसी जगह लगाये जाएँगे और वन विभाग के एक्सपर्ट अधिकारियों के अनुसार 9080 पेड़ों को लगाने के लिए लगभग 36 बीघा ज़मीन चाहिए जो 454 पेड़ों के आसपास ही हो। यानी इसी डालमिया बाग में ये पेड़ लगाए जाने हैं।
अगर CEC मैनेज होती है तो वृंदावन के लोग इसमें CONTEMPT फाइल करेंगे। जजमेंट को तोड़ मरोड़ कर पेश करना ख़ुद एक ऑफेंस है।
टिम्बर कलेक्शन वन निगम एटा द्वारा किया जा रहा है जहाँ उनकी नीलामी होगी,
ये बिल्डर द्वारा नहीं किया जा रहा।
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फिर NGT ने भी सुप्रीम कोर्ट के आदेश की रोशनी में अपने यहां लंबित याचिकाओं का निस्तारण करते हुए कहा, चूंकि डालिमया बाग से सैकड़ों हरे पेड़ काटे जाने पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेश याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत सभी बिंदु कवर करता है इसलिए अब NGT के समक्ष इस विषय में कोई स्वतंत्र विवाद शेष नहीं रह जाता।
NGT ने अपने आदेश में स्वयं सुप्रीम कोर्ट के आदेश (रिपोर्ट संख्या 35/2024 के अनुच्छेद 14) को शब्दशः उद्धृत करते हुए कहा कि हम रिपोर्ट संख्या 35/2024 के अनुच्छेद 14 में दी गई सिफारिशों को स्वीकार करते हैं।
सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार सुप्रीम कोर्ट से सख्त निर्णय आने के बाद अब जबकि डालिमया बाग पर हाउसिंग प्रोजेक्ट खड़ा करने का सपना कभी पूरा होता दिखाई नहीं दे रहा और उसके नाम पर हड़पी गई हजारों करोड़ रुपए की रकम भी खुर्द-बुर्द होती नजर आ रही है तो निवेशकों को गुमराह करने के लिए माफिया तरह-तरह के हथकंडे अपना रहा है।
NGT ने अपने आदेश में स्वयं सुप्रीम कोर्ट के आदेश (रिपोर्ट संख्या 35/2024 के अनुच्छेद 14) को शब्दशः उद्धृत करते हुए कहा कि हम रिपोर्ट संख्या 35/2024 के अनुच्छेद 14 में दी गई सिफारिशों को स्वीकार करते हैं।
सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार सुप्रीम कोर्ट से सख्त निर्णय आने के बाद अब जबकि डालिमया बाग पर हाउसिंग प्रोजेक्ट खड़ा करने का सपना कभी पूरा होता दिखाई नहीं दे रहा और उसके नाम पर हड़पी गई हजारों करोड़ रुपए की रकम भी खुर्द-बुर्द होती नजर आ रही है तो निवेशकों को गुमराह करने के लिए माफिया तरह-तरह के हथकंडे अपना रहा है।
नई जानकारी के अनुसार माफिया के गुर्गे न केवल इस तरह की अफवाह फैला रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट से वह जल्द बड़ी राहत पा लेंगे इसलिए हाउसिंग प्रोजेक्ट का काम भी शीघ्र शुरू हो जाएगा, बल्कि वह नए निवेशकों को भी लालच दे रहे हैं कि वह पुराने रेट में सौदा करने का सुनहरा मौका न चूकें।
दरअसल, इससे माफिया दोतरफा लाभ हासिल करने के प्रयास में है। प्रथम तो जिनका पैसा उसने हड़प रखा है वो पैसे के वापसी के लिए दबाव न बनाएं, और दूसरे नए निवेशकों को टोपी पहनाने में सफल होने पर बाजार में अपनी बर्बाद हो चुकी साख बचाने का काम हो जाए।
दरअसल, इससे माफिया दोतरफा लाभ हासिल करने के प्रयास में है। प्रथम तो जिनका पैसा उसने हड़प रखा है वो पैसे के वापसी के लिए दबाव न बनाएं, और दूसरे नए निवेशकों को टोपी पहनाने में सफल होने पर बाजार में अपनी बर्बाद हो चुकी साख बचाने का काम हो जाए।
माफिया के गुर्गों ने इसके लिए बाकायदा यह प्रचारित करना प्रारंभ कर दिया है कि गुरू कृपा हाउसिंग प्रोजेक्ट पर जल्द काम शुरू होने वाला है क्योंकि अधिकांश कानूनी बाध्यताओं को पूरा किया जा चुका है।
माफिया द्वारा फैलाई जा रही अफवाहों का आलम यह है कि उसके गुर्गे अपनी आंखों से काम शुरू होते देखकर आने का दावा करते हैं जिससे शक की कोई गुंजाइश न रहे जबकि हकीकत इसके ठीक उलट है।
हकीकत तो यह है कि डालमिया बाग में अब भी दूर-दूर तक दरख्तों के अवशेष पड़े देखे जा सकते हैं। वन विभाग का बोर्ड यथावत लगा है और उसके पीछे सन्नाटा पसरा है।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
रविवार, 22 सितंबर 2024
योगी जी, एकबार देखिये तो सही कि भूमाफिया और अधिकारियों का गिरोह धार्मिक नगरी में आपके आदेश-निर्देशों की कैसे धज्जियां उड़ा रहा है...
अभी दो दिन पहले फायरब्रांड मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने गोरखपुर प्रवास के दौरान अधिकारियों को निर्देशित किया था कि यूपी में भूमाफिया और दबंग बख्शे न जाएं। उनके खिलाफ कठोर से कठोर कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। गोरखनाथ मंदिर में जनसमस्याओं को सुनते हुए सीएम योगी ने अधिकारियों को दो टूक यह हिदायत दी कि भूमाफियाओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई करना सरकार का संकल्प है इसलिए पेशेवर भूमाफियाओं को चिन्हित करके ऐसी कार्रवाई करें कि वो एक नजीर बन जाए।
उधर योगी अपने मठ से प्रदेश की ब्यूरोक्रेसी को अपनी सरकार का संकल्प एवं अधिकारियों को उनका कर्तव्य याद दिला रहे थे और इधर गोरखुपर से करीब पौने सात सौ किलोमीटर दूर कृष्ण की क्रीड़ा स्थली वृंदावन में भूमाफिया एवं ब्यूरोक्रेसी का संगठित गिरोह उनके आदेश-निर्देशों की खुलेआम धज्जियां उड़ा रहा था।
इस गिरोह ने सुनियोजित तरीके से वृंदावन की बेशकीमती जमीन पर खड़े लगभग 300 हरे पेड़ों को रातों-रात काट डाला और इसके मार्ग में बाधक विकास प्राधिकरण की रेलिंग भी उखाड़ दी।
हालांकि इन दोनों ही मामलों में एक ओर वन विभाग तो दूसरी ओर मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण ने अपनी-अपनी तरफ से शिकायत दर्ज कराने की औपचारिकता पूरी कर दी है किंतु इसमें भी यह ध्यान रखा गया है उनके कॉकस का कोई साथी न फंसने पाए।
बहरहाल, ये तो मात्र वो सतही जानकारी है जिसे स्थानीय मीडिया सामने लाने पर मजबूर हो गया अन्यथा सच्चाई इससे कहीं बहुत अधिक कड़वी है।
जनसामान्य के होश उड़ा देने वाली है सच्चाई
दरअसल, जनसामान्य के होश उड़ा देने वाली इस सच्ची कहानी का प्रारंभ वहां से होता है जहां से एक बड़े भूमाफिया की नजर इस बेशकीमती भूखंड पर पड़ती है। सैकड़ों एकड़ का यह भूखंड राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से मथुरा और आगरा को जोड़ने वाले नेशनल हाईवे के किनारे वृंदावन में छटीकरा रोड पर स्थित है।
डालमिया फॉर्म अथवा डालमिया बगीचे के नाम से मशहूर यह भूखंड चूंकि अपनी लोकेशन और वृंदावन जैसे पावन धाम में होने के कारण बहुत कीमती है इसलिए जिस भूमाफिया की नजर सबसे पहले इस पर पड़ी, उसने अपने दूसरे साथियों से इसका जिक्र किया।
बताया जाता है कि पूरी तरह मन बना लेने तथा पर्याप्त पैसों का इंतजाम करने के बाद इन माफियाओं ने डालमिया परिवार से संपर्क साधा और करीब 300 करोड़ रुपए में समूचे भूखंड का सौदा कर डालमिया परिवार को टोकन के रूप में अच्छी-खासी रकम भी दे दी।
सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार वृंदावन की सर्वाधिक प्राइम लोकेशन पर स्थित डालमिया के बगीचे का सौदा तय हो जाने की भनक लगते ही दूसरे माफिया भी सक्रिय हो गए और उन्होंने इसमें अपनी घुसपैठ बनाने के प्रयास शुरू कर दिए।
भूमाफियाओं से ही जुड़े लोगों की मानें तो अंतत: लगभग आठ लोग इस सौदे का हिस्सा बनकर डालमिया के बगीचे पर एक आलीशान रियल एस्टेट प्रोजेक्ट खड़ा करने के लिए सहमत हो गए।
इसके लिए सबसे पहले बाकी लोगों से उनके हिस्से की रकम एकत्र कर डालमिया परिवार को सौंपी गई जिससे बगीचे पर आधिपत्य स्थापित किया जा सके। और हुआ भी ऐसा ही।
अब बात शुरू हुई ब्यूरोक्रेट्स से सेटिंग और वृंदावन मानइर को कब्जाने की
बगीचे पर काबिज होने के बाद स्थानीय प्रशासन की मदद जरूरी थी इसलिए उस पर फोकस किया गया। बहुत कम लोगों की जानकारी में है कि डालमिया फॉर्म से सटी हुई एक वृंदावन माइनर हुआ करती थी। एक अनुमान के अनुसार 20 फुट चौड़ी इस माइनर को माफिया ने सर्वप्रथम समाप्त किया।
आज की तारीख में माइनर की जगह बमुश्किल दो फुट की पट्टी देखी जा सकती है। जमीन का कारोबार करने वाले और स्थानीय लोग समझ सकते हैं कि वृंदावन माइनर पर कब्जा कर लेने के क्या मायने हैं और उससे किसी प्रोजेक्ट की कीमत में कितना इजाफा हो सकता है।
सफेदपोश भूमाफियाओं ने इसकी आड़ में जुटाए सैकड़ों करोड़ रुपए
इतना सब-कुछ कर लेने के बाद असली खेल शुरू हुआ, यानी डालमिया फॉर्म पर प्रोजेक्ट खड़ा करने की रूपरेखा तैयार की गई जिसके लिए प्रशासन अर्थात संबंधित विभागों के उच्च अधिकारियों का सहयोग चाहिए था।
मथुरा जनपद ही नहीं, इसके बाहर भी लोग जानते हैं कि डालमिया के बगीचे को रियल एस्टेट प्रोजेक्ट के तौर पर डेवलप करने की कोशिश में लगे सफेदपोश भूमाफिया कोई मामूली आदमी नहीं हैं। इनमें से सबकी अपनी विशिष्ट पहचान तो है ही, साथ ही सबका अपना बड़ा रसूख है।
कोई सत्ता के शीर्ष तक पहुंच रखने का दावा करता है तो कोई संघ में अपनी तगड़ी पैठ बताता है। इसमें शाायद ही किसी को शक हो कि इस रियल एस्टेट प्रोजेक्ट में शामिल दूसरे कथित उद्योगपति एवं व्यापारी, ब्यूरोक्रेसी के अच्छे लाइजनर हैं और सचिवालय तक से काम कराकर लाने की क्षमता रखते हैं। कुछ तो न्यायपालिका तक में दखल रखने का दम भरते हैं।
मथुरा के एक चर्चित हत्याकांड से भी जुड़ती है कड़ी
बताते हैं कि पिछले साल मथुरा की एक पॉश कॉलोनी में हुए चर्चित हत्याकांड की कड़ियां भी कहीं न कहीं इस भूखंड के सौदे से जुड़ती हैं, बस जरूरत है तो उसकी तह तक पहुंचने की जो शायद ही संभव हो क्योंकि उसका बड़े तरीके से पटाक्षेप करके लीपापोती की जा चुकी है। यूं भी न तो अब किसी को पूरा सच जानने में रुचि है और न हिम्मत, चाहे सवाल बीसियों करोड़ का ही हो। यहां तो सैकड़ों करोड़ का खेल चल रहा है, फिर दस-बीस करोड़ की क्या अहमियत।
वन विभाग के साथ-साथ विकास प्राधिकरण और बिजली विभाग की भूमिका भी संदिग्ध
अगर गौर करें कि एक रात में 300 से अधिक हरे पेड़ कट कैसे गए तो तमाम सवाल खड़े होते हैं। इन सवालों के दायरे में वन विभाग के अलावा विकास प्राधिकरण तथा बिजली विभाग की भूमिका पूरी तरह संदिग्ध दिखाई देती है।
सूत्र बताते हैं कि जिस रात डालिमया फॉर्म हाउस के सैकड़ों पेड़ काटे गए, उस रात दर्जनों उपकरणों को विकास प्राधिकरण की रेलिंग तोड़कर अंदर ले जाया गया। क्षेत्रीय लोगों का कहना है कि इस दौरान बिजली भी कई घंटे बाधित रही जिस कारण पेड़ों का कटान आसान हो गया।
डेवलेपमेंट अथॉरिटी और रियल एस्टेट कारोबारियों के बीच का रिश्ता कितना प्रगाड़ होता है, यह किसी को बताने की शायद जरूरत भी नहीं है। और मथुरा के वन विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार की गूंज आगरा मंडल ही नहीं, लखनऊ तक सुनी जा सकती है किंतु योगी सरकार इस मामले में आज भी कुछ नहीं कर पा रही।
शेष रहा बिजली विभाग तो उसके कर्मचारी चंद हरे नोटों में पेड़ों का कटान होने तक बत्ती गुल करने को तैयार हो गए होंगे। उन्हें करना ही क्या था, बस किसी बहाने शट डाउन लेना था।
जब वन विभाग आंखों देखी मक्खी निगल सकता है, मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण ''एक पेड़ मां के नाम'' जैसे अभियान को पलीता लगाकर सैकड़ों हरे पेड़ एक रात में कटवा सकता है तो बिजली विभाग क्या कुछ घंटों के लिए बत्ती गुल नहीं कर सकता।
भ्रष्टाचार को लेकर योगी जी चलते रहें जीरो टॉलरेंस की नीति पर, मोदी जी चलाते रहें एक पेड़ मां के नाम का अभियान लेकिन सफेदपोश भूमाफिया और सरकारी अधिकारी एवं कर्मचारियों का गिरोह आज भी अपनी मनमानी से रत्तीभर नहीं चूक रहा। उसके मन में न योगी का कौई खौफ है न मोदी का।
2027 में 2022 जैसी परफॉरमेंस दोहराने की चिंता योगी जी को हो तो हो, मोदी जी उससे प्रभावित हों तो हों, लेकिन इस माफिया और अफसरों के गठजोड़ को इससे कोई लेना-देना नहीं है। सारे आदेश-निर्देश ताक पर, क्योंकि इतना कुछ हो जाने के बावजूद मथुरा-वृंदावन के लोग यही कहते सुने जा सकते हैं कि इस गठजोड़ का कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा।
अब देखना केवल यह है कि इस बार भी किसी के कानों पर जूं रेंगती है या फिर जनता के मन में घर कर चुकी धारणा फिर सच साबित होती है।
-Legend News
रविवार, 1 अप्रैल 2018
अपनी ही सरकार से पूर्व विधायक की गुहार: अरबों रुपए मूल्य की सरकारी जमीन पर काबिज हैं सफेदपोश भूमाफिया, कुछ कीजिए
मथुरा। भाजपा की टिकट पर दो बार विधायक रहे अजय कुमार पोइया अब अपनी ही सरकार से गुहार लगा रहे हैं कि सफेदपोश भूमाफियाओं ने भगवान श्रीकृष्ण की नगरी में अरबों रुपए मूल्य की सरकारी जमीन पर कब्जा कर रखा है, कुछ कीजिए।भूमाफियाओं ने ग्राम सभा सराय आजमाबाद, तहसील व जिला मथुरा की बेशकीमती जमीन फर्जी पट्टों के जरिए बेच खाई है। सफेदपोश भूमाफियाओं ने वनखण्ड और चारागाह तक को नहीं छोड़ा और राजस्व विभाग की मिलीभगत से उनके भी बैनामे तथा रजिस्ट्री करा दीं।
लगभग 15 साल से एकतरफा कानूनी लड़ाई लड़ रहे पूर्व विधायक अजय कुमार पोइया को वर्ष 2009 में तब उम्मीद की किरण दिखाई दी थी जब राजस्व परिषद उत्तर प्रदेश के तत्कालीन आयुक्त व सचिव संजीव दुबे ने तत्कालीन प्रमुख सचिव उत्तर प्रदेश शैलेश कृष्ण को बाकायदा पत्र लिखकर यह जमीन सफेदपोश भूमाफियाओं के चंगुल से निकालने और अनियमित आवंटन में शामिल दोषी अधिकारियों व कर्मचारियों सहित लाभान्वित व्यक्तियों के खिलाफ वैधानिक कार्यवाही करने की संस्तुति की थी, किंतु नजीता कुछ नहीं निकला।
पूर्व विधायक अजय कुमार पोइया द्वारा इसी महीने में 11 मार्च 2018 को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए प्रेषित पत्र के अनुसार शासन के निर्देश पर गठित राजस्व परिषद के अधिकारियों की एक टीम ने उनकी शिकायत पर मथुरा में अरबों रुपए मूल्य की सरकारी जमीन का बंदरबांट करने की जांच की थी।
जांच कमेटी ने अपनी विस्तृत आख्या में इस बात की पुष्टि की कि बहुमूल्य सरकारी जमीन को सफेदपोश भूमाफियाओं ने औने-पौने दाम में बेच दिया है अत: सभी दोषी और लाभान्वित व्यक्तियों को चिन्हित कराकर उनके विरुद्ध कानूनी कार्यवाही की जानी चाहिए।
पूर्व विधायक अजय कुमार पोइया ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखकर अवगत कराया है कि करीब 15 वर्ष पूर्व उन्होंने नेशनल हाईवे नंबर 2 पर स्थित गोकुल रेस्टोरेंट से लेकर मसानी क्षेत्र तक की इस सरकारी जमीन को मुक्त कराने के लिए संघर्ष शुरू किया था किंतु शासन स्तर से गठित जांच कमेटी की संस्तुति एवं सरकारी निर्देशों के बावजूद जिला प्रशासन ने आज तक कोई कार्यवाही नहीं की है लिहाजा मजबूरीवश उन्होंने एक ओर जहां धारा 133 के तहत कार्यवाही प्रारंभ की है वहीं दूसरी ओर इलाहाबाद उच्च न्यायालय की शरण भी ली है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय में जनहित याचिका संख्या 11824/2010 के रूप में यह लंबित है।
पूर्व विधायक ने मुख्यमंत्री को अवगत कराया है कि आपकी सरकार द्वारा भी राजस्व विभाग की इस जमीन को मुक्त कराने के लिए सूचीबद्ध किया गया है किंतु सफेदपोश भूमाफियाओं के प्रभाव में जिला प्रशासन चुप्पी साधे बैठा है।
भाजपा नेता और पूर्व विधायक पोइया के अनुसार पहले नगर पालिका और अब नगर निगम क्षेत्र की इस अति मूल्यवान जमीन के फर्जी पट्टे बनाकर श्याम पुत्र बदले निवासी सराय आजमाबाद ने स्वयं अपने परिजनों तथा दूसरे लोगों के नाम बैनामे करा दिए तथा वनखण्ड, चारागाह एवं वृक्षारोपण की जमीन पर भूमाफियाओं का कब्जा करा दिया, जो एक राष्ट्रद्रोही कृत्य है।
इस पूरे प्रकरण का एक आश्चर्यजनक पहलू यह है कि भाजपा नेता और पूर्व विधायक अजय कुमार पोइया ने अरबों रुपए मूल्य की सरकारी जमीन को अवैध रूप से खुर्द-बुर्द करने का मास्टर माइंड जिस श्याम पुत्र बदले को बताया है, वह भी भाजपा नेता और पूर्व विधायक श्याम अहेरिया हैं। हालांकि श्याम अहेरिया पूर्व में समाजवादी पार्टी ज्वाइन करके अपने पुत्र को दर्जा प्राप्त मंत्री का सुख दिलवा चुके हैं।
अजय पोइया की शिकायत और राजस्व विभाग की जांच कमेटी के अनुसार विभागीय अधिकारियों एवं कर्मचारियों की मिलीभगत से कौड़ियों के दाम बेची गई इस बहुमूल्य सरकारी जमीन पर फिलहाल होटल ड्यूक पैलेस, होटल विंग्सटन के साथ-साथ डॉ. शीला शर्मा मैमोरियल चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा संचालित कैंसर हॉस्पीटल खड़ा है।
इनके अलावा एक टाट फैक्ट्री, मकान, दुकानें, प्लॉट्स, अन्य फैक्ट्रियां, मैरिज होम्स, गैस्ट हाउसेज तथा दूसरे कई ऐसे प्रमुख होटल भी इन जमीनों पर बन चुके हैं जिनकी रजिस्ट्रियां विभिन्न नामों से कराई गई थीं।
भूमाफियाओं ने स्थानीय सरकारी कर्मचारियों को अपने कारनामे में शामिल करने के लिए मथुरा कलेक्ट्रेट कर्मचारी सहकारी गृह निर्माण समिति बनाकर उसके नाम से भी जमीन आवंटित कर दी जबकि इस नाम की कोई समिति लिखा-पढ़ी में है ही नहीं।
यूं भी इस सरकारी जमीन के कई हिस्से तो कई-कई बार बिक चुके हैं और उन पर अब मूल खरीदारों की जगह दूसरे लोग काबिज हैं तथा उनके द्वारा स्थापित उद्योग व व्यापार चल रहे हैं।
अजय कुमार पोइया ने मुख्यमंत्री को प्रेषित पत्र के तहत लिखा है कि ऐसे में जबकि प्रदेश एवं केंद्र सरकार की तमाम योजनाओं के लिए भूमि की अत्यधिक आवश्यकता है और भूमि उपलब्ध न होने के कारण इन योजनाओं का क्रियान्वयन नहीं हो पा रहा, तब शासन अपनी जमीन को सफेदपोश भूमाफियाओं के कब्जे से मुक्त कराकर जनहितकारी योजनाएं प्रारंभ कर सकता है अन्यथा की स्थिति में न्यायालय का निर्णय ही अंतिम विकल्प रह जाएगा किंतु तब इसका श्रेय सरकार नहीं ले सकेगी।
गौरतलब है कि गोकुल रेस्टोरेंट से मसानी तक की यह जमीन आज शहर के पॉश इलाकों में शुमार है क्योंकि इस क्षेत्र में न केवल कई अच्छे होटल, गेटबंद कॉलोनियां, उद्योग व व्यापारिक प्रतिष्ठान, मैरिज होम्स, हॉस्पीटल्स, गेस्ट हाउस बन चुके हैं।
आज यहां जमीन का सर्किल रेट भी इतना अधिक है कि जनसामान्य तो खरीदने का स्वप्न भी नहीं देख सकता।
मजे की बात यह है कि ग्राम सभा सराय आजमाबाद की अवैध रूप से आवंटित अरबों रुपए मूल्य की जमीन पर दुकानों से लेकर मकान और होटलों व अस्पतालों से लेकर फैक्ट्रियों एवं मैरिज होम्स तथा कॉलोनियों तक के निर्माण का नक्शा मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के अधिकारी आंखें बंद करके पास करते रहे जबकि राजस्व विभाग की टीम वर्ष 2008 में ही अपनी जांच आख्या प्रस्तुत कर दोषियों एवं लाभार्थियों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही कर जमीन को अवैध कब्जे से मुक्त कराने की संस्तुति कर चुकी थी।
अब देखना यह है कि भूमाफियाओं के खिलाफ सख्त कदम उठाने का ढिंढोरा पीटने वाली योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार अपनी ही पार्टी के नेता व पूर्व विधायक अजय पोइया की शिकायत के आधार पर और शासन द्वारा गठित जांच कमेटी की संस्तुति के मद्देनजर अपनी ही पार्टी के आरोपी नेता व पूर्व विधायक श्याम अहेरिया द्वारा किए गए कारनामे को लेकर क्या कदम उठाती है ?
देखना यह भी होगा कि ताकतवर से ताकतवर माफियाओं पर कानून सम्मत कार्यवाही करने की बात करने वाली योगी सरकार क्या उन लाभार्थियों के खिलाफ कार्यवाही कर अरबों रुपए मूल्य की सरकारी जमीन को मुक्त करा पाती है जो किसी न किसी स्तर पर हर सरकार की नाक के बाल बने रहते हैं और जिनके खिलाफ कार्यवाही करने की हिमाकत करने वाले अधिकारियों को या तो तबादला झेलना पड़ता है या अपनी जान गंवाकर ”जवाहरबाग कांड” का हिस्सा बनना पड़ता है।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
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