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शुक्रवार, 31 अगस्त 2018

बिना विद्योत्तमा के कोई “कालिदास” कभी “महाकवि” बना है क्‍या, फिर आप कैसे ?

ऐसी तमाम औरतें मिल जाएंगी जिनकी तरक्‍की में किसी भी पुरुष का हाथ नहीं रहा, किंतु कोई पुरुष शायद ही ऐसा मिले जिसने औरत के सहयोग बिना तरक्‍की हासिल की हो। शायद इसीलिए कहा जाता है कि हर पुरुष की तरक्‍की में किसी न किसी महिला का अपरोक्ष या परोक्ष हाथ जरूर होता है।
दुनियाभर को छोड़कर यदि सिर्फ भारतीय महिलाओं की बात करें तो माया, ममता, जया (जयललिता) जैसी देवियां इसकी उदाहरण हैं। पुरुषों में अटल बिहारी वाजपेयी (अब स्‍वर्गीय) का नाम अपवाद स्‍वरूप लिया जा सकता है। हालांंकि उनके खुद के शब्‍दों में वो अविवाहित जरूर थे किंतु कुंवारे नहीं। इसका सीधा-सीधा अर्थ यही निकलता है कि उनकी जिंदगी में भी कोई न कोई औरत रही जरूर थी। मोदी जी ने अपने पिछले नामांकन पत्र से स्‍पष्‍ट कर ही दिया था कि वह विवाहित हैं।
कहने का तात्‍पर्य यह है कि आदिकाल से किसी महिला को कभी कालिदास की आवश्‍यकता महसूस नहीं हुई परंतु हर युग में कालिदासों को विद्योत्तमा की सख्‍त जरूरत रही है। एक भी उदाहरण ऐसा देखने या सुनने में नहीं मिलता कि कोई कालिदास किसी विद्योत्तमा के हड़काए बिना ‘महाकवि कालिदास’ बना हो।
यह अलग बात है कि कोई कालिदास विवाहित जीवन के प्रथम चरण में विद्योत्तमा से ज्ञान प्राप्‍त कर बुद्धिमानों की जमात का हिस्‍सा बन जाता है और किसी-किसी के ज्ञान चक्षु अंतिम चरण में जाकर खुलते हैं। जैसे हमारे मोदी जी ने प्रथम चरण में ज्ञान प्राप्‍त कर लिया लिहाजा आज कितनों के कलेजे पर मूंग दल रहे हैं।
खैर, मुझे तो चिंता हो रही है अपने राहुल ‘बाबा’ की। मेरी समझ में नहीं आ रहा कि आधी सदी बीत गई जीवन की, लेकिन उनके नाम से चिपका हुआ ”बाबा” उनका पीछा नहीं छोड़ रहा।
अभी पिछले दिनों संसद में उन्‍होंने सार्वजनिक रूप से स्‍वीकार किया कि लोग उन्‍हें प्‍यार से ”पप्‍पू” भी कहते हैं। अब ”पप्‍पू” का शाब्‍दिक अर्थ क्‍या है, इसकी जानकारी या तो कहने वालों को होगी या सुनने वालों को। राहुल बाबा भी इस नाम में छिपे रहस्‍य से अवश्‍य वाकिफ होंगे अन्‍यथा इतने गर्व के साथ एक्‍सेप्‍ट नहीं करते। इतने गर्व से तो वह खुद को हिंदू तक नहीं कहते, फिर पप्‍पू क्‍यों कहने लगे। जाहिर है कि वह हिंदू और पप्‍पू दोनों का गूढ़ार्थ समझते हैं। हिंदू होना भी वह यदा-कदा इसी तरह स्‍वीकार कर लेते हैं जैसे पप्‍पू होना।
कुल मिलाकर बात इतनी सी है कि हमारे राहुल बाबा की जिंदगी में अब तक कोई महिला नहीं आई है। दस्‍तावेज तो यही बताते हैं, वैसे राहुल बाबा अपने लिए किसी विद्योत्तमा की तलाश करने को कब के अधिकृत हो चुके हैं। राहुल बाबा की जिंदगी में किसी महिला की कमी अक्‍सर तब खटकती है जब वो सार्वजनिक भाषण देते हैं।
अब देखिए…जर्मनी के हैम्बर्ग में वह कह बैठे कि भारत में मॉब लिंचिंग होने की वजह नोटबंदी, GST तथा बेरोजगारी है, और अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर आईएसआईएस जैसे कुख्‍यात आतंकवादी गिरोह का उदय भी बेरोजगारी के कारण हुआ था।
लोगों का दावा है कि यदि राहुल बाबा के जीवन में लिखा-पढ़ी के तहत कोई विद्योत्तमा होती तो वो ऐसा कतई नहीं बोलते।
उन्‍होंने इस दौरान पुरुषों को भी यह कहकर अच्‍छा-खासा लैक्‍चर पिलाया कि भारतीय पुरुष महिलाओं को लेकर समानता व सम्‍मान का भाव नहीं रखते। पता नहीं राहुल बाबा को यह ज्ञान कहां से प्राप्‍त हुआ।
जहां तक उनकी परवरिश का सवाल है तो उनके यहां महिलाओं को बराबर से ऊपर का दर्जा भी मिला और सम्‍मान भी भरपूर प्राप्‍त हुआ। उनकी दादी इसका प्रमाण हैं। फिर मम्‍मी सोनिया जी सामने हैं। यह बात अलग है कि बहन प्रियंका को वो सम्‍मान अब तक नहीं मिला जिसकी वो हकदार बताई जाती हैं। पता नहीं राहुल बाबा, मम्‍मी जी से बहन प्रियंका के बारे में कब बात करेंगे।
देश के अधिकांश जिम्‍मेदार नागरिकों को ऐसा महसूस होता है कि राहुल बाबा को एक अदद विद्योत्तमा की अत्‍यंत आवश्‍यकता है और यह आवश्‍यकता उन्‍हें 2019 के चुनाव का बिगुल बजने से पहले पूरी कर लेनी चाहिए।
कालिदास के जीवन में जो कुछ घटा, वह बताता है कि बुद्धि की कमी उनमें कभी नहीं रही होगी। होती तो वह किसी भी सूरत में कालिदास से महाकवि कालिदास नहीं बन सकते थे। बुद्धि उनमें भरपूर थी परंतु उसका उदय तब हुआ जब विद्योत्तमा ने उनके जीवन में पदार्पण किया।
गुजरे जमाने में जगद्गुरू शंकराचार्य को भी ऐसी मुसीबत झेलनी पड़ी थी। गए थे मंडन मिश्र नामक विद्वान से शास्त्रार्थ करने, उन्‍हें आसानी से हरा भी दिया लेकिन उनकी पत्‍नी गले पड़ गईं। कहने लगीं कि मैं इनकी आर्धांगनी हूं इसलिए मुझे हराए बिना इनकी हार मुकम्‍मल नहीं मानी जा सकती। बेचारे शंकराचार्य थे अविवाहित। गृहस्‍थाश्रम के ज्ञान से शून्‍य। चुनौती मिली तो लौटना पड़ा उल्‍टे पांव। बाद में किसी जतन से गृहस्‍थाश्रम में प्रवेश किया और मंडन मिश्र की पत्‍नी के सवालों का जवाब खोज पाए। कहने का मतलब यह है कि शंकराचार्य जैसे धर्मधुरंधर को भी मंडन मिश्र की विद्योत्तमा ने दौड़ा लिया।
यूं भी देखा जाए तो किसी भी भाषण का स्‍क्रिप्‍ट राइटर घर का होने के कई फायदे हैं। बात दबी रहती है। पता नहीं चलता कि घर-घर में कालिदास बैठे हैं। हिंदुस्‍तान तो कालिदासों से भरा पड़ा है। बात घर की चारदीवारी से निकली नहीं कि पोल खुल जाती है। फिर जर्मनी तो बहुत दूर है। स्‍क्रिप्‍ट राइटर कहां-कहां साथ जा सकता है। सामने से कब कौन सवाल उछाल दे।
आपको पता होगा कि जर्मनी जैसे ही एक हिंदुस्‍तानी कार्यक्रम में राहुल बाबा पर किसी लड़की ने एनसीसी के बावत सवाल दे मारा। बेचारे बमुश्‍किल यह कहकर पीछा छुड़ा पाए कि मुझे एनसीसी का कोई ज्ञान नहीं है।
राहुल बाबा को समझना चाहिए कि हर जगह पीछा छुड़ाना आसान नहीं होता क्‍योंकि हर जगह एनसीसी से जुड़े सवाल नहीं पूछे जाते।
भारत वापसी पर कोई यह भी पूछ सकता है कि अपने निष्‍कर्ष से आप देश में आईएसआईएस को न्‍योता दे रहे हैं या ये बता रहे हैं कि बेरोजगारी के चलते भारत में आईएसआईएस के लिए बहुत स्‍कोप है।
जो भी हो राहुल बाबा, 2019 का चुनाव सामने हैं। आपके पास तो वैसे ही मणिशंकर जैसी मणि, दिग्‍विजय जैसे दिग्‍गज और संजय निरुपम जैसे निराले व्‍यक्‍तित्‍वों की भरमार है। बेहतर होगा कि आप उनसे खुद को अलग बनाए रखें।
ऐसा न हो सके तो एक अदद विद्योत्तमा समय रहते तलाश लें वरना लेने के देने पड़ जाएंगे। चुनाव बेशक कुंभ का मेला न सही, लेकिन चुनाव तो है। पांच साल बाद मौका मिलता है। और हां, बोल चाहे जहां लें। दुनिया के किसी कोने में भाषण दे आएं परंतु आपके लिए चुनाव भारत में होने हैं।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

गुरुवार, 11 जून 2015

आरटीआई ने खोली जमीन अधिग्रहण बिल के विरोध पर कांग्रेस की पोल

नई दिल्‍ली। कांग्रेस तकरीबन एक साल से जमीन अधिग्रहण संशोधन बिल का सख्त विरोध कर रही है, लेकिन आरटीआई के तहत हासिल दस्तावेजों ने कांग्रेस के इस विरोध की पोल खोल दी है।
ये दस्तावेज वही कह रहे हैं जो नरेंद्र मोदी कह रहे हैं यानी कांग्रेस शासित राज्यों ने भी सहमति वाले क्लॉज और कई अन्य विवादास्पद संशोधनों का समर्थन किया था।
इन दस्तावेजों के मुताबिक ग्रामीण विकास मंत्रालय ने संशोधनों पर राज्यों का मूड जानने के लिए 26 जून 2014 को बैठक बुलाई थी। इसमें कांग्रेस शासित राज्यों केरल, कर्नाटक, मणिपुर और महाराष्ट्र ने सहमति वाले क्लॉज और सोशल इंपेक्ट असेसमेंट की जरूरत से जुड़े संशोधनों का समर्थन किया था। पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) प्रॉजेक्ट्स के लिए जमीन अधिग्रहण से प्रभावित 80 फीसदी परिवारों की सहमति वाले क्लॉज में बदलाव के बीजेपी सरकार के प्रस्ताव का छत्तीसगढ़, केरल, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, गुजरात और हरियाणा (उस वक्त यहां भी कांग्रेस की सरकार थी) की सरकारों ने समर्थन किया था।
आरटीआई कार्यकर्ता वेंकटेश नायक की तरफ से हासिल किये गये इन दस्तावेजों में यह भी कहा गया कि जून 2014 की बैठक में केरल, महाराष्ट्र और हरियाणा ने भी उपयोग नहीं की गई जमीन की वापसी के मामले में बीजेपी सरकार के प्रस्ताव का समर्थन किया था। कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार के जमीन अधिग्रहण ऐक्ट 2013 में कहा गया है कि अगर सरकार की तरफ से ली गई जमीन का पांच साल तक कोई उपयोग नहीं होता है तो इसे इसके मूल मालिकों को लौटाने की जरूरत होगी। हालांकि, संशोधन बिल में बीजेपी सरकार ने यह फैसला राज्यों पर छोड़ दिया है कि किस पीरियड के बाद इस्तेमाल नहीं की गई जमीन को लौटाने की जरूरत होगी। यूपीए सरकार के बिल में सरकारी ऑफिसर की तरफ से गड़बड़ी के मामले में सजा का प्रावधान रखा गया था। बीजेपी के संशोधन बिल में इसे खत्म कर दिया गया है और इसका समर्थन केरल ने भी किया था।
कांग्रेस शासित 9 राज्यों ने मुख्यमंत्रियों ने मंगलवार को प्रस्ताव पास जमीन अधिग्रहण बिल के संशोधनों को खारिज किया था। इस बैठक में पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी मौजूद थे। इस प्रस्ताव के मद्देनजर यह खुलासा किया गया है। हालांकि, कांग्रेस इस खुलासे पर ज्यादा परेशान नजर नहीं आई। पार्टी के सीनियर नेता और पूर्व ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने लॉर्ड कीन्स को कोट करते हुए कहा, ‘जब तथ्य बदलते हैं तो मैं अपनी राय बदल लेता हूं।’ हालांकि, उन्होंने इस बात की पुष्टि की कि जब यूपीए सरकार ने लैंड बिल पर सलाह-मशवरा शुरू किया था तो केरल, हरियाणा और महाराष्ट्र जैसे कई राज्यों ने सहमति वाले क्लॉज पर आपत्ति जताई थी। उन्होंने कहा, ‘जब हमने राज्यों से बात की थी तो पृथ्वीराज (महाराष्ट्र के तत्कालीन सीएम), हुड्डा (हरियाणा के तत्कालीन सीएम) और केरल के सीएम को आपत्ति थी।’

मंगलवार, 21 अप्रैल 2015

…न ब्रूयात सत्यम् अप्रियं, बट…बोलना पड़ता है

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्‍टिस और भारतीय प्रेस परिषद के पूर्व अध्‍यक्ष मार्कण्‍डेय काटजू कितना सत्‍य बोलते हैं, इसका तो कोई पैमाना मेरे पास नहीं है किंतु इतना जरूर है कि वो सार्वजनिक रूप से जो कुछ बोलते हैं, वह समाज के एक बड़े तबके को ‘प्रिय’ नहीं लगता। अलबत्‍ता उनके अपने ब्‍लॉग का नाम ‘सत्‍यम् ब्रूयात’ है। और संस्‍कृत के जिस श्‍लोक का यह हिस्‍सा है, उसकी पहली पंक्‍ति के पूरे शब्‍द हैं-  सत्यम् ब्रूयात प्रियं ब्रूयात, न ब्रूयात सत्यम् अप्रियं।
बहरहाल, जस्‍टिस काटजू की अपने देशवासियों को लेकर की गई इस आशय की टिप्‍पणी कि ”अधिकांश भारतीय मूर्ख हैं”, कभी-कभी उचित प्रतीत होती है। हालांकि उनके अतिशयोक्‍ति पूर्ण बयानों से हर वक्‍त सहमत नहीं हुआ जा सकता।
फिलहाल बात करें दो-तीन दिनों से चल रहे उस राजनीतिक घटनाक्रम की जिसके तहत एक ओर सत्‍तापक्ष तथा दूसरी ओर विपक्ष की चकल्‍लस सड़क से लेकर संसद तक जारी है, तो साफ-साफ महसूस होता है कि मुठ्ठीभर लोग किस तरह पूरे देश को मूर्ख बना रहे हैं और देशवासी मूर्ख बन भी रहे हैं। देशवासियों की छोड़िये, वह मीडिया भी उस बहस का हिस्‍सा बना हुआ है जो पूरी तरह निरर्थक साबित हो रहा है और जिसका एकमात्र मकसद वो खेल खेलना है जिसमें न कभी उसकी हार होती है न जीत। जिसमें हारती है तो सिर्फ और सिर्फ जनता क्‍योंकि वह स्‍वतंत्रता प्राप्‍त होने से लेकर आज तक लगातार हारती रहने की आदी हो चुकी है।
हम बात कर रहे हैं उस भूमि अधिग्रहण बिल की जिसे लाई तो थी मनमोहन सिंह के नेतृत्‍व वाली यूपीए सरकार किंतु जिसे कुछ संशोधनों के साथ पास कराना चाहती है नरेंद्र मोदी के नेतृत्‍व वाली एनडीए सरकार।
अब तमाशा देखिये…कांग्रेस कहती है कि बिल में किये गये संशोधन किसान विरोधी और उद्यमियों के हित में हैं जबकि मोदी सरकार कहती है कि किसानों के हित में इससे बेहतर बिल दूसरा कोई हो ही नहीं सकता।
संसद का पहला सत्र इसी बहस की भेंट चढ़ गया और वर्तमान सत्र से ठीक पहले कांग्रेस ने करीब दो महीने की छुट्टियां बिताकर लौटे राहुल गांधी को एक मर्तबा फिर किसान रैली की आड़ लेकर आकर्षक पैक के साथ लांच किया।
अपनी इस री-लांचिंग में राहुल खूब बोले, और जमकर बोले। करीब-करीब उसी अंदाज में जिस अंदाज में वह कांग्रेस के अघोषित नेता माने जाने से लेकर बोलते रहे हैं। मोदी सरकार को निशाने पर रखा तथा यूपीए सरकार का गुणगान किया।
यह बात अलग है कि कुछ मीडिया तत्‍वों को उनमें विपश्‍यना करके लौटने से उपजा तथाकथित बदलाव नजर आया और उनकी बॉडी लैंग्‍वेज पहले के मुकाबले अधिक प्रभावशाली दिखाई दी। सोनिया और मनमोहन ने भी एक अर्से बाद अपने मुंह का अवकाश समाप्‍त किया और मोदी सरकार पर यथासंभव तीर चलाए किंतु किसी ने यह बताकर नहीं दिया कि यूपीए सरकार द्वारा तैयार किये गये भूमि अधिग्रहण बिल में मोदी सरकार ने ऐसे कौन से बदलाव कर दिये कि पूरा बिल किसानों के लिए अचानक अमृत से जहर बन गया।
इधर उनसे भी पहले मोदी जी ने अपने सांसदों की क्‍लास में भूमि अधिग्रहण बिल पर कोई समझौता न करने तथा उसकी खूबियां जनता की बीच जाकर बताने का पाठ पढ़ाया किंतु वह कौन सी खूबियां हैं जिन्‍हें सांसदों को जनता के बीच जाकर बताना है, यह नहीं बताया। अब या तो मोदी जी की कक्षा के छात्र (सांसद) सर्वज्ञ होते हुए मौनव्रत धारण किये हुए हैं अथवा मोदी जी की बात उन्‍हें मनमोहन, सोनिया तथा राहुल की तरह समझ में नहीं आ रही।
मोदी जी स्‍वयं और उनके मंत्री लगातार यह कह जरूर रहे हैं कि वह जनता के बीच जाकर नये भूमि अधिग्रहण बिल की खूबियां बतायेंगे किंतु बता कोई नहीं रहा। पता नहीं इसके लिए वह किस मुहूर्त का इंतजार कर रहे हैं।
कुल मिलाकर सत्‍ता पक्ष और विपक्ष राजनीति की बिसात पर किसान-किसान खेल रहा है किंतु कोई यह बताने को तैयार नहीं कि भूमि अधिग्रहण बिल की खूबियां हैं तो क्‍या हैं…और खामियां हैं तो कौन-कौन सी हैं। इस बिल को लेकर कोई किताब ऐसी बाजार में मिल नहीं रही, जिसे पढ़कर किसान या आम जनता यह समझ सके कि सच कौन बोल रहा है और झूठ कौन।
किसान अगर कर रहा है तो केवल इतना कि या तो तथाकथित रूप से आत्‍महत्‍या कर रहा है या फिर तथाकथित सदमे में मर रहा है। इस सबके अलावा वह कुछ कर रहा है तो कांग्रेस की किसान रैली में जाकर हरियाणा कांग्रेस की गुटबाजी का हिस्‍सा बन रहा है। कुछ किसान गुलाबी पगड़ी बांधकर हरियाणा कांग्रेस के प्रदेश अध्‍यक्ष अशोक तंवर के खिलाफ हूटिंग करने गये थे तो कुछ सतरंगी पगड़ी के साथ हरियाणा के पूर्व मुख्‍यमंत्री भूपेन्‍द्र सिंह हुड्डा की ताकत का अहसास कराने पहुंचे थे। अब इन ”पेड किसानों” का किस तरह भूमि अधिग्रहण बिल के अच्‍छे या बुरे होने से कोई ताल्‍लुक हो सकता है, यह बात शायद ही किसी को समझ में आ पाये।
यूं भी किसी राजनीतिक दल की रैली में शिरकत करने वाले लोग उसी पार्टी के अंधभक्‍त होते हैं, यह अब कोई छिपी हुई बात नहीं रह गई। दूसरे कुछ लोग अगर होते हैं तो वो जो दिहाड़ी डायटिंग तथा फ्री ट्रेवलिंग कराकर लाये ले जाये जाते हैं। ऐसे लोगों को किसान कहना, किसानों की तौहीन है। हां…इन्‍हें राजनीतिक पार्टियों के ”किसान मोहरे” कहा जा सकता है जो ”माउथ प्रचार” के जरिये अपनी पार्टी या अपने नेता का स्‍तुतिगान करते हैं। लगभग उसी अंदाज में जिस अंदाज में कभी ”भांड़” अपने राजा-महाराजाओं की विरुदावली गाया करते थे। ऐसे भांड़ों का 21 वीं सदी वाला संसदीय संस्‍करण आज भी हर राजनीतिक पार्टी के पास मौजूद है और बखूबी अपने काम को अंजाम दे रहा है। फिर चाहे वह कोई राष्‍ट्रीय पार्टी हो या क्षेत्रीय। माया, मुलायम, ममता और जयललिता से लेकर अरविंद केजरीवाल तथा अखिलेश यादव तक के पास अपने-अपने निजी भांड़ हैं।
यूं भी जिस देश में हर कोई किसी न किसी राजनीतिक दल से जुड़ा है और कमोबेश देश की पूरी आबादी दलगत राजनीति की शिकार है, उस देश में निजी सोच रखने वालों को पूछता ही कौन है। उनकी तादाद इतनी अधिक कम है कि उन्‍हें देश की आबादी का हिस्‍सा या देश का नागरिक तक मानने को कोई आसानी से तैयार नहीं होता लिहाजा उनकी आवाज़ नक्‍कारखाने की तूती बन कर रह गई है।
दलगत राजनीति के चंगुल में लोग इस कदर फंस चुके हैं कि उन्‍हें अपने परिवार के सदस्‍यों का जन्‍मदिन याद हो या न हो लेकिन पार्टी के नेता का जन्‍मदिन कभी नहीं भूलते। अपने पिता को कोई गाली देकर चला जाए, कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन नेताजी की शान में किसी ने गुस्‍ताख़ी कर दी तो जान देने और लेने पर आमादा हो जाते हैं।
कांग्रेस को केंद्र की सत्‍ता पर रहते किसानों के लिए कुछ अच्‍छा स्‍थाई काम करने के लिए पूरे दस साल कम पड़ गये थे और मोदी सरकार के लिए दस महीने बहुत ज्‍यादा हो गये। इस बात का जवाब क्‍या किसी के पास है?
यदि यह मान भी लिया जाए कि मोदी सरकार का भूमि अधिग्रहण बिल किसान विरोधी तथा उद्यमियों के हित में है, तो उसे सामने आने दीजिए। ठीक उसी तरह जैसे समय के साथ कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स, टूजी स्‍पेक्‍ट्रम तथा कोलगेट घोटाले का सच सामने आ ही गया जबकि यूपीए सरकार ने इन सब को पूरी तरह झुठलाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी थी।
चुनाव कोई कुंभ के मेले की तरह तो हैं नहीं, अगले पांच साल बाद फिर होने हैं। तब मोदी जी की सरकार का जनता खुद-ब-खुद वही हाल कर देगी जो आज कांग्रेस का कर रखा है। पांच साल के लिए उन्‍हें स्‍पष्‍ट जनादेश मिला है तो उससे पहले आप उन्‍हें सत्‍ता से च्‍युत कर नहीं सकते। फिर इतनी निम्‍न स्‍तरीय राजनीति का मतलब क्‍या है।
मतलब साफ है, कांग्रेस हो या भाजपा…सपा हो या बसपा…राजद हो या बीजद…सबके नेता जानते हैं कि मार्कण्‍डेय काटजू का कथन ही अंतिम सत्‍य है। वह उनके कथन पर राजनीति बेशक कर लें किंतु सच्‍चाई पर उन्‍हें भी तनिक शक नहीं है। वह जानते हैं कि जो जनता आज भी आसाराम बापू, नारायण साईं, स्‍वामी नित्‍यानंद तथा शिवानंद तिवारी जैसे दुराचारियों को संत मान रही है और जो लोग आज भी सहाराश्री की चिटफंड कंपनी में पैसा जमा कर रहे हैं, जिनके लिए देश में हुए खरबों के घोटाले कोई मायने नहीं रखते, जिनकी अंधभक्‍ति किसी तर्क अथवा तथ्‍य को मानने के लिए तैयार नहीं होती, उन्‍हें भेड़ की तरह हांकना कोई मुश्‍किल काम नहीं।
कोई भी राजनीतिक दल, चाहे वह क्षेत्रीय हो या राष्‍ट्रीय…सत्‍ता से बेदखल होते ही इस कवायद में लग जाता है कि अपने अंधभक्‍तों की आंखों पर चढ़े चश्‍मे का रंग हर हाल में बरकरार रखा जाए। चाहे किसी भूमि अधिग्रहण बिल के जरिये और चाहे किसान रैली के जरिए। चाहे संसद के अंदर से, चाहे संसद के बाहर बैठकर…अंधभक्‍तों का अपने पक्ष में ”ब्रेनवॉश” करते रहना जरूरी है क्‍योंकि सत्‍ता की कुंजी वही लोग हैं। इसीलिए तो भाजपा ने सत्‍ता पर काबिज होने के साथ अपने अंधभक्‍तों की संख्‍या का विश्‍व रिकॉर्ड बनाने जैसे महत्‍वपूर्ण कार्य को अंजाम तक पहुंचाया। भाजपा हो या कांग्रेस…या कोई भी अन्‍य पार्टी…सभी के नेता जानते हैं कि उनका वोटर ही उन्‍हें सत्‍ता तक पहुंचाता है, विपक्षी अंधभक्‍तों के मत उन्‍हें कभी नहीं मिलने वाले। शिखर तक पहुंचाने में दिमाग से दिवालिया दलगत राजनीति के शिकार ही निर्णायक साबित होते हैं, विचारवान बुद्धिजीवी नहीं। वह उनकी दृष्‍टि में किसी खेत की मूली नहीं हैं।
यही कारण है कि स्‍वतंत्र भारत में सत्‍ता का स्‍वाद बारी-बारी से चखा जाता रहा है। यह बात अलग है कि किसी को समय ज्‍यादा मिला और किसी को कम। किंतु सत्‍ता हमेशा ऐसे तत्‍वों के हाथ में रही जिन्‍हें फिरंगियों की कार्बन कॉपी कह सकते हैं। इतना कहने में आपत्‍ति हो तो यह जरूर कह सकते हैं कि पिछले 67 सालों में किसी सत्‍ता ने कभी ऐसा कुछ महसूस नहीं कराया जिसके आधार पर यह कहा जा सके कि वाकई यह देश स्‍वतंत्र हो चुका है और लोकतंत्र को सही-सही परिभाषित करने वाली सरकार काम कर रही है। यानि जनता के द्वारा चुनी गई, जनता के लिए, जनता की सरकार।
आज तक जितनी भी सरकारें रहीं हैं, फिर चाहे वह केंद की हों या राज्‍यों की, गठबंधन की रही हों, या स्‍पष्‍ट बहुमत वाली…एक दल की रही हों या अनेक दलों की…सबका आचरण समय के साथ रंग बदलता रहता है। विपक्ष में रहते उनके रंग-ढंग कुछ और रहते हैं तथा सत्‍ता हासिल होते ही कुछ और हो जाते हैं। गिरगिट भी फिर इनके आचरण के सामने कुछ नहीं रह जाता।
जाहिर है कि न तो कांग्रेस कुछ अजूबा कर रही है और न भाजपा या उसके साथ सत्‍ता का स्‍वाद चख रहे उसके सहयोगी दल। सब वही कर रहे हैं जो स्‍वतंत्र भारत की राजनीति अब तक करती रही है।
मार्कण्‍डेय काटजू को हम सनकी कह सकते हैं, आत्‍ममुग्‍ध कह सकते हैं, बड़बोला या अभिमानी बता सकते हैं…यह भी आरोप लगा सकते हैं कि वह मीडिया की सुर्खियों में रहने के लिए ऊट-पटांग बयान देने तथा अनर्गल बोलते रहने के आदी हैं किंतु इन सारी बातों को स्‍वीकार कर लेने के बावजूद कहीं न कहीं उनका यह कथन एकबार सोचने पर बाध्‍य अवश्‍य कर देता है कि क्‍या वाकई देश की अधिकांश जनता मूर्ख है।
खासतौर पर ऐसे समय जरूर उनका कथन विचार करने पर मजबूर कर देता है जब कोई नेता अपनी बेतुकी बातों, कुतर्कों, निरर्थक आरोप एवं प्रत्‍यारोपों, अभद्र भाषा-शैली वाले भाषणों तथा बेहूदी बयानबाजी के बावजूद तालियां बटोर लेता है तथा शत-प्रतिशत निजी स्‍वार्थों की पूर्ति यानि सत्‍ता हथियाने अथवा सत्‍ता बरकरार रखने के लिए चिलचिलाती धूप, तेज बारिश, आंधी-तूफान या कड़कड़ाती ठंड में लाखों लोगों को एकत्र कर पाता है। वो भी मात्र इसलिए कि उसे आपको मूर्ख बनाना है। यह जानते हुए कि वह आपके लिए कुछ नहीं कर सकता।
यह भी जानते हुए कि उसके पास अकूत दौलत है, बेहिसाब ताकत है, दुनिया भर में शौहरत है।
यह जानते व समझते हुए कि सड़क से संसद तक कुत्‍ते-बिल्‍लियों की भांति जन्‍मजात दुश्‍मन दिखाई देने वाले तथा एक दूसरे पर गुर्राते नजर आने वाले कैमरा ऑफ होते ही एक दूसरे की कुशलक्षेम किसी सहोदर की तरह पूछते हैं। ऑन रिकार्ड इनकी सूरत व सीरत कुछ और होती है तथा ऑफ रिकॉर्ड कुछ और।
हो सकता है कि मार्कण्‍डेय काटजू के कथन में मूर्खों की जमात का प्रतिशत आंशिक रूप से कुछ ऊपर-नीचे हो, किंतु बहुत ज्‍यादा नहीं है।
स्‍वतंत्र भारत से लेकर आज तक की राजनीति और राजनेताओं की सफलता का प्रतिशत तो यही बताता है।
यदि कभी इस बिंदु पर विचार न किया हो तो अब करके देखें, हो सकता है कि खुद आपको भी अहसास हो कि आप अब तक उसी जमात का हिस्‍सा बने हुए हैं।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

गुरुवार, 7 अगस्त 2014

मोतीलाल वोरा ने लुटियंस में कब्‍जा रखे हैं 9 सरकारी बंगले

नई दिल्ली। 
कांग्रेस के दिग्गज नेता और कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा के नाम पर नई दिल्‍ली के लुटियंस इलाके में नौ सरकारी मकान अलॉटेड हैं। राज्यसभा सदस्य के नाते उन्हें 33 लोधी एस्टेट बंगला आवंटित किया गया है। आरटीआई से मिली जानकारी के मुताबिक, राज्यसभा सचिवालय ने पुष्टि की है कि इसके अलावा भी वोरा को छह बंगले और दो फ्लैट दिए गए हैं।
खबर के मुताबिक लोधी एस्टेट के बंगले के अलावा वोरा के पास वीवीआईपी इलाके नॉर्थ एवेन्यू में 49, 63, 78 और 112 नंबर बंगला, साउथ एवेन्यू में 49 और 139 नंबर बंगला, वीपी हाउस में 124 और 507 नंबर फ्लैट हैं। इनमें से ज्यादातर घरों में लंबे समय से वोरा के 'अतिथि' रहते हैं।
पूर्व सांसद केसी लेंका और द्विजेंदर नाथ शर्मा वीपी हाउस वाले फ्लैटों में रहते हैं। नॉर्थ एवेन्यू वाले एक बंगले में महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ से आए कांग्रेसी कार्यकर्ता रहते हैं। वोरा के सबसे नए अतिथि पूर्व सांसद राज बब्बर हैं, जो साउथ एवेन्यू वाले बंगले में शिफ्ट होने वाले हैं। इस बंगले में फिलहाल साफ-सफाई का काम चल रहा है। यह घर 2006 से ही वोरा के कब्जे में है और राज बब्बर इसमें उनके तीसरे गेस्ट होंगे।
अब सवाल उठता है कि क्या कोई सांसद अपने अतिथि के लिए सरकारी घर ले सकता है?
सांसद अपने संसदीय क्षेत्र के गणमान्य नागरिकों के लिए मामूली किराये पर कुछ समय के लिए घर ले सकते हैं। हालांकि, वोरा के मामले में ज्यादातर गेस्ट पार्टी के वे पूर्व सांसद हैं, जिन्हें चुनाव हारने के चलते मकान खाली करना पड़ता है। इस मामले में गौर करने वाली बात यह है कि नॉर्थ और साउथ एवेन्यू जैसे पॉश इलाकों में किराये पर रहने के लिए लाखों रुपये प्रति महीना देना पड़ता है जबकि तथाकथित गेस्ट के लिए ये बंगले 19000 रुपये के किराये पर ही उपलब्ध हैं।
साफ है कि कांग्रेस नेता वोरा को घर देने के मामले में नियमों की जमकर धज्जियां उड़ाई गईं। सांसद को नियम के तहत गेस्ट को ठहराने के लिए घर तीन महीने के लिए दिया जाता है। हाउस कमेटी की गाइड लाइंस के मुताबिक, समीक्षा करके इसकी अवधि अधिकतम छह महीने की जा सकती है। इस समय लुटियंस इलाके में सांसदों ने 46 मकान अपने अतिथियों के लिए अलॉट कराए हैं। इनमें सबसे ज्यादा 8 मोतीलाल वोरा के पास ही हैं। बड़े नेताओं में जनार्दन द्विवेदी, आनंद शर्मा, अरुण जेटली और नजम्मा हेपतुल्ला के नाम पर एक-एक घर अलॉट है।
राज्यसभा सचिवालय ने वोरा को इन घरों को खाली करने का नोटिस जारी कर दिया है। इसके बावजूद इनमें उनके गेस्ट ही रह रहे हैं। वोरा ने इस बारे में सफाई देते हुए कहा कि उन्होंने आठ मकान अलॉट नहीं कराए हैं। उनका कहना है कि उनके पास सिर्फ 78 नॉर्थ एवेन्यू और 139 साउथ एवेन्यू वाला बंगला है, बाकी के बारे में उन्हें जानकारी नहीं है।
-एजेंसी

बुधवार, 16 अप्रैल 2014

फर्जी ब्रेथ टेस्ट रिपोर्ट बनवाकर उड़ान

डायरेक्टर जनरल ऑफ सिविल एविएशन ने गांधी परिवार के सदस्यों को लेकर उड़ान भरने वाली कंपनी को पायलटों की फर्जी ब्रेथ टेस्ट रिपोर्ट बनाने पर कारण बताओ नोटिस जारी किया है। डीजीसीए ने पाया कि उड़ान भरने से पहले होने वाले पायलट्स के ब्रेथ ऐनलाइजर (BA) टेस्ट की रिपोर्ट फर्जी भरी जा रही थी। जिन लोगों को SPG सुरक्षा मिली होती है, उन्हें लेकर उड़ान भरने से पहले हर बार यह टेस्ट कराना जरूरी होता है। इस टेस्ट के जरिए पता चलता है कि कहीं पायलट ने शराब तो नहीं पी है। इस तरह से देखा जाए तो गांधी परिवार के सदस्यों की जान खतरे में हो सकती थी।
ताजा वाकया सोमवार 14 अप्रैल का है, जब राहुल गांधी ने जीएमआर के लग्जरी फैल्कन 2000-Lx में दिल्ली से भुवनेश्वर के लिए उड़ान भरी थी। लापरवाही बरतने पर रेग्युलेटर ने 3 महीने के लिए जीएमआर एविएशन के 11 पायलट्स के फ्लाइंग लाइसेंस सस्पेंड कर दिए हैं और 6 कैबिन क्रू मेंबर्स को बर्खास्त कर दिया है। जिन पायलट्स ने अक्सर सोनिया और राहुल गांधी को लेकर उड़ान भरी थी, उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए पूछा गया है कि उनके लाइसेंस क्यों न 5 साल के लिए सस्पेंड कर दिए जाएं।
डीजीसीए ने कंपनी के डॉक्टर के खिलाफ भी एफआईआर करवाई है। डॉक्टर पर आरोप है कि उन्होंने BA टेस्ट्स के फर्जी रेकॉर्ड बनाए जबकि टेस्ट की मशीन ही खराब थी। एक सीनियर डीजीसीए ऑफिसर ने बताया, 'हम दिल्ली मेडिकल काउंसिल को उनका लाइसेंस रद्द करने के लिए लिख रहे हैं।' कर्मशल फ्लाइट्स के लिए कभी-कभार उड़ान से पहले BA टेस्ट कराया जाता है लेकिन जिन लोगों को SPG सुरक्षा मिली होती है, उन्हें लेकर उड़ने से पहले पायलट्स को हर बार टेस्ट करवाना पड़ता है।
अधिकारी ने बताया, 'हमने जीएमआर एविएशन के मार्च 12 से अप्रैल 14 तक के फ्लाइंग रेकॉर्ड्स की जांच की तो पाया कि उड़ान भरने से पहले किए गए मेडिकल जांच में BA टेस्ट फर्जी थे। इस दौरान BA टेस्ट करने वाले मशीन खराब थी।'
डीजीसीए ने यह भी पाया कि कांग्रेस नेता कमल नाथ की कंपनी स्पैन एविएशन और पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के परिवार की कंपनी ऑरबिट एविएशन भी लगातार प्री-फ्लाइट BA टेस्ट नहीं करवा रही है। उनके डॉक्टर भी 3 महीनों के लिए सस्पेंड कर दिए गए हैं।
-एजेंसी

शनिवार, 12 अप्रैल 2014

जीजाजी से अदानी के रिश्‍ते जाहिर, बैकफुट पर आई कांग्रेस

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा एक बार फिरचर्चा में हैं। ऐसी तस्वीरें सामने आई हैं, जिनमें कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा अडाणी ग्रुप के चेयरमैन गौतम अडाणी के साथ नजर आ रहे हैं। ये तस्वीरें तब की हैं, जब रॉबर्ट वाड्रा अडाणी ग्रुप के एयरक्राफ्ट पर सवार होकर अडानी के प्रॉजेक्ट देखने गुजरात के कच्छ गए थे। गौरतलब है कि पिछले दिनों कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने बीजेपी के पीएम कैंडिडेट नरेंद्र मोदी को अडाणी ग्रुप से रिश्तों को लेकर निशाने पर लिया था।
इस तस्वीर के सामने आने के बाद कांग्रेस बैकफुट पर आती दिख रही है। रॉबर्ट वाड्रा और गौतम अडाणी की यह तस्वीर साल 2009 की है। उस वक्त वाड्रा तब गुजरात के मूंदड़ा में अडाणी पोर्ट और अडाणी पावर प्लांट को देखने आए थे। वाड्रा और गौतम अडाणी एकसाथ अडाणी के प्राइवेट एयरक्राफ्ट में ही वहां पहुंचे थे। इससे पहले कांग्रेस भी कई मौकों पर नरेंद्र मोदी पर आरोप लगा चुकी है कि वह अडाणी ग्रुप के प्लेन से यात्रा करते हैं।
पिछले दिनों उदयपुर में हुई रैली में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी नरेंद्र मोदी को घेरते हुए कहा था, 'बीजेपी में आडवाणी बाहर और अदाणी अंदर।' राहुल गांधी ने मोदी और अडाणी ग्रुप की करीबियों का जिक्र करते हुए कहा था कि एक शख्स को गुजरात सरकार ने करोड़ों एकड़ जमीन मुफ्त में दे दी। अब जो तस्वीरें सामने आई है, उसमें रॉबर्ड वाड्रा और गौतम अडाणी एक साथ दिख रहे हैं। एक तस्वीर में दोनों बैठकर कुछ बात कर रहे हैं और दूसरी तस्वीर में वॉक करते दिख रहे हैं।
सबसे पहले अरविंद केजरीवाल ने साल 2012 में नरेंद्र मोदी और अडाणी ग्रुप के रिश्ते पर सवाल उठाए थे। उसके बाद से मोदी को घेरने के लिए वह लगातार इस मुद्दे को उठाते रहे हैं लेकिन पिछले दिनों कांग्रेस ने भी इस बात को लेकर मोदी पर निशाना साधना शुरू किया था मगर इस तस्वीर के सामने आने के बाद वह बैकफुट पर आती नजर आ रही है।
-एजेंसी

गुरुवार, 20 फ़रवरी 2014

दरअसल, कहानी तो अब शुरू हो रही है

( लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष)
2014 के लिए दुंदुभि बज चुकी है, शंखनाद होने को है। राजनीति के बयानवीरों ने शब्‍दों के इतने तीक्ष्‍ण विषवाण छोड़ना शुरू कर दिया है जिन्‍हें सुनकर लगता है कि वह सारी जंग अपने मुंह से ही जीत लेंगे। एक-दूसरे को मर्यादा का पाठ पढ़ाने वाले खुद किसी मर्यादा में रहने को तैयार नहीं हैं। वह कब मर्यादा लांघ जाते हैं, इसका शायद उन्‍हें अहसास तक नहीं होता।
नेताओं ने 'राजनीति' से 'नीति' को कब काटकर अलग कर दिया और कब चुनावी प्रक्रिया को केवल 'राज' पाने का हथियार बना डाला, इसका अंदाज आमजन को लगा ही नहीं। वह तो इस भुलावे में रहा कि 'राजनीति' का नीति व नैतिकता से अब भी कोई वास्‍ता जरूर होगा।
बहरहाल, सवा अरब की आबादी वाले इस मुल्‍क की जनता को हमेशा की तरह यह उम्‍मीद है कि 2014 में कुछ नया होगा। कुछ ऐसा होगा जो आशा की किरण जगायेगा और देश की दशा सुधारने में सहायक होगा।
दरअसल, आम आदमी पार्टी के अचानक हुए उदय ने 2014 के लोकसभा चुनावों को खास बना दिया है। बेशक वह अभी अपने शैशवकाल में है और इसलिए उसके भविष्‍य पर टिप्‍पणी करना बेमानी है परंतु एक काम उसने जो किया है वह यह कि गंदगी से पटे पड़े राजनीति के तालाब में जैसे कंकड़ फेंक दिया हो। गंदगी के बीच बचे हुए थोड़े-बहुत पानी में इस कंकड़ से तरंगें उठने लगीं हैं। आमजन के मन में भी कहीं उम्‍मीद की कोई किरण पैदा हुई है कि हो न हो, बदलाव की शुरूआत यहीं से हो जाए। संभव है आज जो चिंगारी पैदा हुई है, कल वही शोला बनकर भारत के आम नागरिक को स्‍वतंत्रता का सच्‍चा अहसास करा पाए।
इस बीच तेलंगाना को लेकर जिस तरह लोकसभा और राज्‍यसभा में माननीयों ने अपने आचरण का प्रदर्शन किया, उससे एक बात पूरी तरह साफ हो गई कि जनता उनके बावत चाहे जो सोचती रहे लेकिन वह किसी तरह सुधरने को तैयार नहीं हैं। तब भी नहीं, जब आमजन यह मानने लगा हो कि माननीय का तमगा प्राप्‍त यह वर्ग ही हकीकत में देश के माथे पर कलंक बन चुका है और इसका इलाज करना अब जरूरी हो गया है।
इधर सुप्रीम कोर्ट ने जैसे ही राजीव गांधी की हत्‍या के दोषियों की फांसी को उम्रकैद की सजा में तब्‍दील किया, वैसे ही तमिलनाडु की मुख्‍यमंत्री जे. जयलिलता ने 2014 के लिए सबसे बड़ा चुनावी हथियार आजमा डाला। जयललिता ने तीसरे मोर्चे को सीढ़ी बनाकर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर काबिज होने की अपनी इच्‍छा तो पहले ही जाहिर कर दी है, अब उसके लिए हर प्रकार का हथकंडा अपनाने की मंशा से भी अवगत करा दिया है।
जयललिता की इस नई चुनावी बिसात पर कांग्रेस का आगबबूला होना स्‍वाभाविक था और इसीलिए खुद राहुल गांधी तक ने कह डाला कि अगर देश के पूर्व प्रधानमंत्री को न्‍याय नहीं मिल सकता तो आम आदमी न्‍याय की उम्‍मीद कैसे कर सकता है।
राहुल गांधी का दुख तो समझ में आता है लेकिन यह बात उन्‍हें भी समझनी होगी कि जयललिता जो कुछ कर रही हैं, यह उसी घिनौने राजनीतिक खेल का हिस्‍सा है जिसकी शुरूआत कांग्रेस ने खुद की थी।
कांग्रेस का हर निर्णय कुछ इसी तरह की घिनौनी राजनीति के इर्द-गिर्द रहता है। याद कीजिए प्रियंका और सोनिया का नलिनी को लेकर उठाया गया कदम जिससे साफ होता है कि वह भी राजीव के सभी हत्‍यारों को फांसी से बचाना चाहती थीं।
अगर वह वाकई यही चाहती थीं तो आज जयललिता के निर्णय पर इतनी हायतौबा किसलिए। क्‍या इसलिए कि राजीव के हत्‍यारों को माफी दिलवाकर जो श्रेय सोनिया एंड कंपनी खुद लेना चाहती थी, उस पर जयललिता ने एक झटके में न सिर्फ पानी फेर दिया बल्‍कि चुनावी गणित फिट करके उसका पूरा लाभ उठाने की भी रणनीति बना डाली।
अब जयललिता के दोनों हाथ में लड्डू हैं। केन्‍द्र यदि राजीव के हत्‍यारों को रिहा करने की इजाजत देता है तो उसका चुनावी लाभ अम्‍मा को इसलिए मिलेगा कि उसकी पहल उन्‍होंने की और यदि नहीं देता है तो भी उन्‍हें इसलिए लाभ मिलेगा कि उन्‍होंने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की। इसके ठीक उलट कांग्रेस दोनों स्‍थितियों में खाली हाथ रहेगी और यही माना जायेगा कि उसने जो कुछ किया, सिर्फ मजबूरी में किया।
कांग्रेस के पास इस बात का भी कोई जवाब नहीं है कि यदि वह राजीव के हत्‍यारों को माफी देने के पक्ष में नहीं थी तो दस सालों से क्‍या कर रही थी। केंद्र में अपनी सरकार के होते क्‍यों नहीं वह राष्‍ट्रपति से उस पर कोई फैसला करा पाई। दया याचिकाओं पर निर्णय लेने के राष्‍ट्रपति के अधिकार को किसी समय-सीमा में बांधने की बात यदि फिलहाल छोड़ भी दी जाए तो भी क्‍या कांग्रेस को सुप्रीम कोर्ट के रुख से स्‍पष्‍ट नहीं हो रहा था कि वह राजीव गांधी की हत्‍या के दोषियों को राहत दे सकता है।
कांग्रेस अगर चाहती तो सुप्रीम कोर्ट के रुख को भांपकर राष्‍ट्रपति से तत्‍काल कोई फैसला करने का अनुरोध कर सकती थी लेकिन उसने ऐसा कुछ नहीं किया और केवल तमाशबीन बनी रही।
जाहिर है कि उसकी अपनी नीयत भी पूरे मामले को राजनीतिक हानि-लाभ के तराजू में तौलने की थी लेकिन अब बाजी हाथ से निकलती देख हवा का रुख बदलने की कोशिश की जा रही है।
सच तो यह है कि सत्‍ता पर काबिज रहने और काबिज होने के पूरे खेल का न कोई नियम रह गया है, न कोई नीति। जो कुछ है सब अनीति ही अनीति है।
अनीति के इस खेल का अब वो दौर आ गया है जब खिलाड़ी खुद मोहरा बनने लगे हैं। शह और मात के लिए नियमों को ताक पर रखने का ही परिणाम है कि प्‍यादा भी वजीर को चुनौती दे रहा है।
चुनौती तो आमजन के सामने भी है लेकिन वह इस बात से खुश है कि अब तक आग लगाकर दूर से तमाशा देखने वाले, खुद तमाशा बन रहे हैं। जो अब तक मचान पर बैठकर शिकार करते रहे, वह अपनी ही नीतियों का शिकार हो रहे हैं। बकरी को बांधकर शेर को ललचाने की परंपरा घातक होती जा रही है।
बेहतर होगा कि समय रहते राजनीति और चुनावी खेल के नियमों में परिवर्तन कर लिया जाए वर्ना वो दिन दूर नहीं जब शिकारी, शिकार का निवाला बन जायेगा और उसके सारे हथियार धोखा दे जायेंगे।
2014 भले ही पूरी व्‍यवस्‍था को परिवर्तित न कर पाए लेकिन उसके लिए रास्‍ता बनाने का ज़रिया जरूर बनेगा क्‍योंकि 66 सालों की तथाकथित स्‍वतंत्रता से लोगों का भरोसा उठने लगा है और वो समझने लगे हैं कि 15 अगस्‍त 1947 को जो परिवर्तन हुआ था, वह भी एक छलावा था।
उधार के संविधान और उसके आधार पर बने कानून ने सिर्फ सूरतों में रद्दोबदल किया, सीरतों में नहीं लिहाजा आज के शासकों तथा बीते हुए कल के शासकों में कोई फर्क दिखाई नहीं देता।
चूंकि 66 साल एक आदमी की औसत उम्र भी है इसलिए मान लेना चाहिए कि 1947 में फिरंगियों से मिली स्‍वतंत्रता और उनसे विरासत में मिले संविधान प्रदत्‍त अधिकार एवं कर्तव्‍यों की भी मियाद पूरी हो चुकी है।
अब उस नई सोच के हिसाब से संविधान गढ़ना होगा जो स्‍वतंत्रता के साथ-साथ अपने अधिकार एवं कर्तव्‍यों को पहले से कहीं अच्‍छी तरह समझने लगा है और जो राजनीति, राजनेताओं, चुनावी खेल तथा सत्‍ता हथियानों के लिए अपनाये जाने वाले हथकंडों से वाकिफ हो चुका है।
आउटडेटेड हो चुकी स्‍वतंत्रता और बेमानी हो चुकी राजनीति को राजनीतिक दल समय रहते समझ लें तो ठीक अन्‍यथा समय तो सब समझा ही देगा। इंतजार कीजिए.....कहानी अभी खत्‍म नहीं हुई। सच तो यह है कि कहानी यहां से शुरू हो रही है।

सोमवार, 27 जनवरी 2014

...तो भाई द्वारा बहन को दिया गया तोहफा है विवादित जमीन

नई दिल्‍ली। 
कांग्रेस उपाध्यक्ष और अगला पीएम बनने की रेस में शामिल राहुल गांधी ने हरियाणा में अपनी वह जमीन बहन प्रियंका गांधी को तोहफे में दे दी थी, जो उनके जीजा रॉबर्ट वॉड्रा के प्लॉट के ठीक बराबर में है। यह मामला करीब छह साल पुराना है। राहुल ने हरियाणा में पलवल जिले के हसनपुर गांव में 3 मार्च 2008 को छह एकड़ जमीन खरीदी थी, जिसके लिए 26.47 लाख रुपए अदा किए गए।
इसी दिन रॉबर्ट वॉड्रा ने हसनपुर में खेती की जमीन खरीदी थी। यह करीब नौ एकड़ थी और इसके लिए उन्होंने 36.90 लाख रुपए चुकाए। 2012 में राहुल ने यह प्रियंका को तोहफे में दे दी।
तोहफे की इस बात का खुलासा ऐसे वक्‍त हुआ है, जब इसी साल हरियाणा में खरीदी गई वॉड्रा की प्रॉपर्टी विवादों में घिर गई थी। यह विवाद रियल एस्टेट की दिग्गज कंपनी डीएलएफ के साथ एक डील को लेकर खड़ा हुआ था।
राहुल गांधी ने 26 जुलाई 2012 को यह जमीन अपनी बहन को तोहफे में दी थी और तीन महीने बाद अक्टूबर में हरियाणा के आईएएस अधिकारी अशोक खेमका ने वॉड्रा के कुछ अन्य प्लॉट का म्यूटेशन रद्द कर दिया।
हुड्डा की अगुवाई वाली हरियाणा की कांग्रेस सरकार ने वॉड्रा और डीएलएफ के बीच हुई डील को 'निजी ट्रांजेक्‍शन' करार दिया था।
यह दिलचस्प है कि हसनपुर की जमीन के लिए एक ही पावर ऑफ अटॉर्नी धारक महेश सिंह नागर के जरिए राहुल गांधी और रॉबर्ट वॉड्रा के लिए दो अलग-अलग सेल डीड तैयार की गई थीं।
12 अगस्‍त 2012 में लोकसभा सचिवालय को सौंपे एक दस्तावेज में राहुल गांधी ने कहा, "मैंने 51 कनाल की खेती की जमीन अपनी बहन ‌प्रियंका गांधी वॉड्रा को दी और इसके लिए पैसे का कोई लेन-देन नहीं हुआ।"
इसमें आगे लिखा है, "क्योंकि यह भाई की तरफ से एक बहन को दिया गया तोहफा है इसलिए कृषि जमीन के ट्रांसफर को लेकर किसी तरह की रकम पर कोई गौर नहीं किया गया।"
सचिवालय में 2013 में दिए गए एक और डिक्‍लेरेशन के मुताबिक राहुल ने गुड़गांव की सिग्नेचर टावर्स-2 में दो कमर्शियल प्रॉपर्टी खरीदीं। अक्टूबर 2010 में 1.44 करोड़ रुपए और 5.36 करोड़ रुपए में इनकी बुकिंग की गई थी।
उन्होंने कुल अब तक दो किस्त जमा कराई हैं। हालांकि, इसमें प्रॉपर्टी का साइज नहीं बताया है। राहुल ने गुड़गांव की प्रॉपर्टी खरीदने से पहले दिल्ली के साकेत स्थित मेट्रोपोलेटिन मॉल अपनी दो दुकान 5.28 करोड़ रुपए में बेच दी। उन्होंने 2006 में ये दुकान खरीदी थीं।
राहुल लोकसभा के उन 20 सांसदों में शामिल हैं, जिन्होंने 15वीं लोकसभा के दौरान इस तरह का हलफनामा देने के बाद अपनी संपत्ति और देनदारी को अपडेट किया। पहले शपथपत्र में उन्होंने हसनपुर की जमीन की जानकारी दी थी।
-एजेंसी

मंगलवार, 24 दिसंबर 2013

10 लाख करोड़ की फाइलों पर कुंडली मारे बैठी थीं जयंती

नई दिल्ली। 
पूर्व केन्द्रीय पर्यावरण और वन मंत्री जयंती नटराजन पर आरोप है कि उन्होंने दस लाख करोड़ रुपये की परियोजनाएं रोक रखी थीं जबकि इन्हें सभी तरह की मंजूरी मिल चुकी थी और उनके डेडलाइन भी तय कर दिए गए थे. वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों के मुताबिक जयंती नटराजन ने बड़ी-बड़ी परियोजनाओं को उनके विभाग के ही पैनलों से तमाम तरह की मंजूरी मिलने के बाद भी रोके रखा. समझा जाता है कि इसी कारण उन्हें अपने पद से हाथ धोना पड़ा. राहुल गांधी ने शनिवार को फिक्की में कॉर्पोरेट्स की बैठक में इस बात का भरोसा दिलाया था कि परियोजनाओं में अब विलंब नहीं होगा.
लेकिन इसके पहले जयंती नटराजन को इस्तीफा देना पड़ा. ऐसा समझा जाता है कि एक ओर तो राहुल गांधी और उनकी पार्टी की सरकार देश में बड़ी-बड़ी परियोजनाओं को जल्द-से-जल्द मंजूरी दिलाने का प्रयास कर रही थी तो दूसरी ओर जयंती नटराजन फाइलों पर बैठी थीं. इसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा.
काफी समय से पर्यावरण मंत्रालय पर इस बात के लिए उंगलियां उठती रहीं कि वहां फाइलों को लटकाया जाता है. दिसंबर के पहले हफ्ते में एक सरकारी आंतरिक आंकलन में पाया गया था कि 14 लाख करोड़ रुपये की परियोजनाओं में से 5 लाख करोड़ रुपये की परियोजनाएं ऐसी थीं कि जिनमें विलंब के लिए पर्यावरण मंत्रालय जिम्मेदार है. ये ऐसी परियोजनाएं थीं जिन्हें कैबिनेट कमेटी ऑफ इन्वेस्टमेंट तक की मंजूरी मिल चुकी थीं. इनके अलावा 4 लाख करोड़ रुपये की वैसी परियोजनाएं लटका दी गई थीं जिनके लिए डेडलाइन तय कर दी गई थी ताकि उनसे जुड़े मुद्दे सुलझा लिये जाएं. इसके अलावा और एक लाख करोड़ रुपये की परियोजनाएं पर्यावरण मंत्रालय ने रोक ली थीं. इनके बारे में गुजरात सरकार ने भी नाराजगी जताई थी.
सूत्रों ने बताया कि प्रधान मंत्री ने फरवरी महीने में ही कोयले की खदानों से संबिधित परियोजनाओं को जल्द-से-जल्द मंजूरी देने की बात कही थी, लेकिन इस पर भी कोई कार्यवाही नहीं हुई और फाइलें लटकी रह गईं. कोयले की कमी से थर्मल पॉवर स्टेशनों में काम ठप सा हो गया है.
लेकिन जयंती नटराजन ने कहा कि उनके काम की प्रधानमंत्री ने भी सराहना की है और उनके कार्यकाल में कोई भी परियोजना नहीं लटकी रही. मैंने पार्टी के काम काज के लिए मंत्री पद छोड़ा है. इसके अलावा कोई और कारण नहीं है.
-एजेंसी

रविवार, 27 अक्टूबर 2013

2014 के राजनीतिक विदूषक

(लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष)
मेरी मां ने मुझसे हाल ही में एक रात को कहा कि राजनीति किसी तेज घातक जहर की तरह है।
मेरी मां की जब संसद में अचानक तबियत खराब हो गई और उन्‍हें हॉस्‍पीटल ले जाया जा रहा था तो उनकी आंखों में आंसू थे। उन्‍होंने मुझसे कहा कि जिस खाद्य सुरक्षा कानून के लिए मैं इतने दिनों से लड़ रही थी, आज उसी के बिल को पास कराने के लिए मैं वोटिंग नहीं कर पा रही। मैं हॉस्‍पीटल जाने से पहले वोटिंग करना चाहती हूं।

मेरी मां ने मुझसे कहा कि मेरी दादी को मार दिया गया, मेरे पापा को मार दिया गया और इसी तरह कुछ लोग मेरी हत्‍या करना चाहते हैं।
तीन अलग-अलग मौकों पर लेकिन एक ही उद्देश्‍य से राहुल गांधी द्वारा दिए गये बयानों के हिस्‍से हैं ये।
इसमें कोई दो राय नहीं कि राजनीति का मकसद ही सत्‍ता पर काबिज होना होता है और उसके लिए आमजन का भावनात्‍मक दोहन भी सारे राजनीतिक दल अपने-अपने तरीकों से करते हैं लेकिन 2014 के लोकसभा चुनावों से पूर्व राजनीति का जो रूप सामने आ रहा है, वह किसी ऐसे विदूषक का है जो हंसाता कम है और डराता ज्‍यादा है।
राहुल गांधी की इन दिनों जो बॉडी लेंग्‍वेज है और जिस तरह वह एग्रेसिव होकर बोलते हैं, जरा कल्‍पना करके देखिए कि क्‍या देश को कोई ऐसा पीएम रास आयेगा।

शनिवार, 27 जुलाई 2013

मूर्ख हैं अमर्त्‍य सेन (मेरे निजी विचार)

मोदी कितने सांप्रदायिक हैं और कांग्रेस कितनी सेक्‍युलर, इस नतीजे पर पहुंचने की जगह बेहतर होता कि बतौर अर्थशास्‍त्री अमर्त्‍य सेन, देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तथा वित्‍तमंत्री पी. चिदंबरम को बताते कि खस्‍ताहाल अर्थव्‍यवस्‍था को कैसे सुधारें व रुपये के चवन्‍नी से भी दुहन्‍नी हो जाने को कैसे रोकें।
राजनीति में पड़ने की जगह ऐसा कुछ कहते जिससे महंगाई के कारण त्राहिमाम-त्राहिमाम कर रही जनता को कुछ राहत मिलती और अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर हर रोज गिर रही भारत की साख को कहीं स्‍थिर किया जा सकता।

(लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष)

बुधवार, 12 जून 2013

अमरीकी कं. से 1.1 मिलियन डॉलर ठग लिए टाइटलर ने

नई दिल्ली । कांग्रेसी नेता जगदीश टाइटलर अब नई मुश्किल में घिर गए हैं। अमरीका की एक दूरसंचार कंपनी ने एफबीआई से शिकायत की है कि टाइटलर ने उससे 1.1 मिलियन डॉलर ठग लिए। यह ठगी कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और राहुल गांधी का नाम लेकर की गई।
एक समाचार पत्र के मुताबिक इसी सोमवार को की गई शिकायत में टीसीएम मोबाइल एलएलसी ने कहा कि उसकी सहायक कंपनी कोरविप ने संयुक्त उपक्रम में प्रवेश किया था। टाइटलर के बेटे सिद्धार्थ और हथियारों के दलाल अभिषेक वर्मा ग्रामीण भारत के लिए सेल्युलर सर्विस शुरू करना चाहते थे। इसके लिए दोनों संयुक्त उपक्रम को प्रमोट कर रहे थे।

गुरुवार, 12 जुलाई 2012

सवाल अनेक पर जवाब किसी का नहीं

मैं नहीं समझ पा रहा हूं कि भारत तब अधिक गौरवशाली था जब गरीबी के बावजूद उसकी सांस्‍कृतिक समृद्धि का सारी दुनिया लोहा मानती थी या आज अधिक गौरवशाली है जब उसकी गिनती विश्‍व के भ्रष्‍टतम देशों में की जाती है ?
कुछ समय पहले तक भारत को सपेरों और साधु-सन्‍यासियों का देश कहा जाता था । गरीब देश कहा जाता था । नेता कहते हैं कि भारत ने बहुत तरक्‍की की है । अब दुनिया का कोई देश भारत को सपेरों का देश नहीं कहता ।

गुरुवार, 28 जून 2012

नेहरू की विरासत को समर्पित ....''जब जनता की सहनशक्‍ित जवाब दे....

आज कुछ लिखने से पहले मैं आपको यह बता देना चाहता हूं कि ना तो मैं निराशावादी हूं और ना ही किसी राजनीतिक दल या उसके किसी नेता विशेष से मेरा लगाव है।
मैं खालिस पत्रकार हूं और उस नाते हर वक्‍त देश, समाज और आम नागरिक की तकलीफों के बावत सोचता रहता हूं।
बेशक आज पत्रकारिता भी ऐसे रास्‍ते पर चल पड़ी है, जहां आम लोगों का भरोसा उसके ऊपर से उठने लगा है लेकिन उम्‍मीद अभी बाकी है।
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