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शुक्रवार, 15 अगस्त 2025

सबूत सहित जानिए: क्या वाकई यूपी के बिजली विभाग ने ऊर्जा मंत्री और योगी सरकार की सुपारी ले रखी है?


 क्या वाकई यूपी के बिजली विभाग ने ऊर्जा मंत्री और योगी सरकार की सुपारी ले रखी है? ये सवाल इसलिए क्योंकि बीती 23 जुलाई को ऊर्जा मंत्री अरविंद कुमार शर्मा ने लखनऊ के शक्ति भवन में हुई समीक्षा बैठक के दौरान अधिकारियों को जमकर फटकारा था। इस समीक्षा बैठक में विभाग के चेयरमैन से लेकर अधिशासी अभियंता स्‍तर तक के अधिकारी शामिल थे।  

ऊर्जा मंत्री ने अधिकारियों से कहा कि आप लोग आंख-कान बंद किए बैठे हैं जबकि जनता बिजली न आने से परेशान है। उन्होंने यहां तक बोला कि हमारी सरकार कोई दुकान नहीं चला रही कि जिसमें हमें सिर्फ वसूली की चिंता हो, हमारे लिए यह एक जनसेवा है और हमें उसी के अनुरूप काम करना होगा। ऊर्जा मंत्री ने अधिकारियों को फील्ड में जाने के निर्देश भी दिए। मंत्री महोदय ने कहा कि आपके गलत आचरण का खामियाजा पूरा प्रदेश भुगत रहा है। 

इस समीक्षा बैठक के चार-पांच दिन बाद मंत्री महोदय के एक्स हैंडिल से लिखा गया कि विभाग के कुछ अधिकारी एवं कर्मचारियों ने ऊर्जा मंत्री की ''सुपारी'' ले रखी है। यही नहीं, सोशल साइट पर यह भी लिखा गया कि कुछ अधिकारी और कर्मचारी अराजक तत्वों के साथ मिलकर बिजली विभाग को बदनाम करने में लगे हैं। 

गौरतलब है कि यूपी के ऊर्जा मंत्री खुद गुजरात कैडर के एक नौकरशाह रहे हैं और इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के काफी करीबी तथा भरोसेमंद माने जाते हैं। अब जरा अंदाज लगाइए कि पीएम का नजदीकी कोई पूर्व नौकरशाह जब अपने विभागीय अधिकारियों पर इतने संगीन आरोप लगा रहा हो तो उसके मायने कितने गंभीर हो सकते हैं। गंभीर इसलिए भी कि जो व्‍यक्‍ति स्‍वयं नौकरशाह रहा हो, वह नौकरशाहों की सभी कारगुजारियों से भली-भांति परिचित तो होगा ही।  

मुख्‍यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी बोले 

ऊर्जा मंत्री की समीक्षा बैठक और एक्स हैंडिल पर लिखी गई उनकी पोस्ट के बीच गत 25 जुलाई को सीएम योगी आदित्यनाथ ने ऊर्जा विभाग की उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक के दौरान स्पष्ट शब्दों में कहा कि प्रदेश में बिजली व्यवस्था अब केवल तकनीकी या प्रशासनिक विषय नहीं, बल्कि जनता के भरोसे और शासन की संवेदनशीलता का पैमाना बन चुकी है। 

सीएम योगी ने अफसरों को दो टूक शब्दों में कहा कि ट्रिपिंग, ओवरबिलिंग और अनावश्यक कटौती अब किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं की जाएगी, सुधार करना ही होगा। इसके साथ ही सीएम ने कहा कि लापरवाही अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी। मुख्यमंत्री ने ट्रिपिंग की लगातार आ रही शिकायतों पर गहरी नाराजगी जताई और निर्देश दिया कि प्रत्येक फीडर की तकनीकी जांच हो, कमजोर स्थानों की पहचान कर तुरंत सुधार कराया जाए। 

मुख्यमंत्री ने ऊर्जा विभाग के अधिकारियों से कहा कि संसाधनों की कोई कमी नहीं है। सरकार ने बिजली उत्पादन, पारेषण और वितरण को मजबूत करने के लिए रिकॉर्ड बजट उपलब्ध कराया है। ऐसे में किसी भी स्तर पर लापरवाही अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी। सभी डिस्कॉम के प्रबंध निदेशकों से उनके क्षेत्रों की आपूर्ति की स्थिति जानने के बाद मुख्यमंत्री ने निर्देश दिया कि हर स्तर पर जवाबदेही तय की जाए। 

अचानक नाराज नहीं हुए ऊर्जा मंत्री और मुख्‍यमंत्री

ऊर्जा मंत्री और मुख्‍यमंत्री की बिजली विभाग के अधिकारियों को लेकर यह नाराजगी किसी एक दिन की कुव्यवस्‍था का परिणाम नहीं है। यह लंबे समय से चली आ रही अधिकारियों की लापरवाह कार्यप्रणाली से उपजा आक्रोश है। लेकिन घोर आश्चर्य की बात है कि विभागीय मंत्री तथा मुख्‍मंत्री की इतनी कठोर टिप्‍पणियों के बावजूद अधिकारी हैं कि सुधरने का नाम नहीं ले रहे। 

कृष्‍ण की नगरी मथुरा इसका बड़ा उदाहरण 

उदाहरण के तौर पर यूपी के अत्यंत महत्वपूर्ण जनपदों में शुमार मथुरा के बिजली अधिकारियों की कार्यशैली देखी जा सकती है। 

उल्लेखनीय है कि मथुरा न केवल भाजपा के लिए राजनीतिक दृष्‍टि से एक अहम जिला है बल्कि धार्मिक नजरिए से भी विश्व पटल पर विशिष्ट स्थान रखता है। यहां प्रतिदिन लाखों श्रद्धालु विभिन्न स्‍थानों का भ्रमण करने तथा अपने आराध्य के दर्शन करने आते हैं। 

योगी सरकार के सबसे पहले कार्यकाल में मथुरा-वृंदावन क्षेत्र के विधायक पंडित श्रीकांत शर्मा को ही प्रदेश के ऊर्जा मंत्रालय का जिम्मा सौंपा गया था, और तब उन्‍होंने पूरे पांच साल बहुत अच्छे तरीके से बिजली की व्यवस्था को संभालने का काम किया था। प्रदेश की जनता आज उनके कार्यकाल को याद करती है। लेकिन अब अचानक ऐसा क्या हो गया कि उसी व्‍यवस्था पर ऊर्जा मंत्री अरविंद शर्मा से लेकर मुख्‍यमंत्री योगी तक नाराजगी जता रहे हैं।  

कहने के लिए तो मथुरा में बिजली विभाग के सुपरिटेंडिंग इंजीनियर से लेकर चीफ इंजीनियर तक तैनात हैं किंतु उनके पास जनता तो छोड़िए, पत्रकारों तथा विधायकों की भी बात न तो सुनने का समय है और न उनके किसी मैसेज का जवाब देने का। सबूत के साथ बानगी देखिए-  

ये वो मैसेज हैं जो Legend News की ओर से चीफ इंजीनियर (CE) तथा सुपरिंटेंडेट इंजीनियर (SE) को समय-समय पर भेजे गए। इन वाट्सऐप मैसेज में समय का काफी अंतर होने के बाद भी अधिकारियों की कार्यप्रणाली में कोई अंतर नजर नहीं आता। 
मैसेज डिलीवर होने पर भी किसी प्रकार की कोई प्रतिक्रिया न देना इस बात को साबित करता है कि इन अधिकारियों को किसी का कोई खौफ नहीं है। इन्‍हें योगी सरकार के उन आदेश-निर्देशों की भी परवाह नहीं है जिसके तहत बार-बार कहा जाता है कि हर फोन तथा मैसेज का जवाब देना जरूरी है और तत्काल जवाब न दे पाने की स्‍थिति में समय मिलने पर संपर्क साधना आवश्यक है। 
जाहिर है कि ये और इन जैसे प्रदेश के तमाम अधिकारी आश्‍वस्‍त हैं कि उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। यहां तक कि मंत्री और मुख्‍यमंत्री भी। यदि ऐसा नहीं होता तो नौकरशाहों की इतनी हिमाकत नहीं होती, और न ये इतने बेलगाम होते कि मंत्री तथा मुख्‍यमंत्री की नाराजगी से भी इनके कानों पर जूं नहीं रेंगती। 
यहां यह जान लेना भी जरूरी है कि मथुरा में तैनात इन अधिकारियों सहित प्रदेशभर के बहुत से अधिकारियों का ऐसा दुस्‍साहस तभी संभव है जब वो जानते हों कि मंत्री और मुख्‍यमंत्री कहीं न कहीं इतने मजबूर हैं कि वो घुड़की तो दे सकते हैं, एक्शन नहीं ले सकते। वर्ना यदि एक-दो ऐसे अफसरों पर भी समुचित एक्शन हुआ होता तो ऐसी नौबत नहीं आती। 
एक्शन हुआ होता तो न ऊर्जा मंत्री इतने असहाय दिखाई देते और न मुख्‍यमंत्री को नाराजगी जाहिर करनी पड़ती। 2027 के विधानसभा चुनाव बहुत दूर नहीं हैं। समय रहते यदि योगी सरकार नहीं चेती, तो इसका भाजपा को बड़ा नुकसान भी उठाना पड़ सकता है। 
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी  

रविवार, 21 जुलाई 2024

यूपी में बड़ी राजनीतिक उथल-पुथल के बीच सीएम योगी को खुला खत: मूल समस्या के कारण और निवारण...


 लोकसभा चुनाव 2024 में अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पाने के बाद से यूपी की राजनीति एक गंभीर उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है। कोई इसके लिए गोरखनाथ पीठ के महंत और प्रदेश के मुख्‍यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कार्यशैली पर उंगली उठा रहा है तो कोई भाजपा के अंदरूनी कलह को इसके लिए जिम्मेदार ठहरा रहा है। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि पार्टी ने उम्मीदवारों के चयन में चूक कर दी। 

लखनऊ से लेकर दिल्‍ली तक चुनाव परिणामों की समीक्षा बैठकों के साथ कयासों का दौर भी जारी है। फिलहाल, पार्टी का फोकस उपचुनावों पर है और ऐसा माना जा रहा है कि इन चुनावों के नतीजे स्‍थिति को कहीं ज्यादा स्‍पष्ट कर देंगे लिहाजा अनुमान है कि उसके उपरांत हाईकमान कोई बड़ा तथा ठोस निर्णय ले। 
बहरहाल, राजनीति की उलटबांसियां अपनी जगह किंतु जन आकांक्षाएं और जनभावनाएं अपनी जगह। राजनेताओं के लिए जनता ही अंतत: जनार्दन साबित होती है क्योंकि उसी के मत से सरकारें बनती और बिगड़ती हैं। नेता चाहे जितनी चालें चल लें परंतु वोट की चोट उसे अहसास करा ही देती है कि तुरुप का इक्का किसके हाथ है। 
ऐसे में जनअपेक्षाओं तथा जनभावनाओं का जानना बहुत जरूरी होता है। जो पार्टी या नेता इससे अनभिज्ञ रहता है, उसके लिए अपेक्षित परिणाम मिलना मुश्‍किल होता है। यूपी की जनता भी कुछ यही इशारे कर रही है। समय रहते समझ में आ जाएं तो ठीक अन्यथा 2027 बहुत दूर नहीं है। 
2024 के लोकसभा चुनाव परिणामों को लेकर यूपी के लोगों की भावनाएं और उनकी अपेक्षाएं क्या हैं, उसे लेकर पेश है सीएम योगी के सामने एक खुला खत- 
माननीय मुख्‍यमंत्री उत्तर प्रदेश सरकार योगी आदित्यनाथ जी! आपकी निष्‍ठा, कर्तव्‍यपरायणता, ईमानदारी, नैतिकता, मेहनत तथा लगन को लेकर शायद ही किसी को कोई शक हो किंतु इसमें भी दोराय नहीं है कि भ्रष्‍टाचार के बाबत जिस जीरो टॉलरेंस की नीति का ढिंढोरा आपकी सरकार द्वारा 2017 में पीटा गया वह आज सात साल की सत्ता के बावजूद निरर्थक साबित हो रहा है। 
माननीय मुख्‍यमंत्री जी, क्या आपको ज्ञात है कि आपकी भ्रष्‍टाचार को लेकर अपनाई गई जीरो टॉलरेंस की नीति प्रदेश के अधिकारी एवं कर्मचारियों के लिए बेहद मुफीद साबित हुई है क्योंकि उसे नौकरशाही ने अपना सबसे बड़ा हथियार बना लिया है। 
आज स्‍थिति यह है कि उसी जीरो टॉलरेंस नीति के बहाने अधिकारी एवं कर्मचारी पहले से अधिक रिश्‍वत यह कहकर वसूल करते हैं कि सरकार सख्‍त है इसलिए रिस्क भी अधिक है। 
योगी जी! क्या आपको पता है कि रिश्‍वत के लिए सर्वाधिक बदनाम पुलिस महकमे की बात छोड़ भी दें तो आवास-विकास, विकास प्राधिकरण, बिजली विभाग, उद्योग, लोक निर्माण विभाग से लेकर परिवहन, तहसील, सिंचाई और शिक्षा तक में भ्रष्‍टाचार का बोलबाला है। 
बेशक ये विभाग सदा से भ्रष्‍ट थे, और पूर्ववर्ती सरकारों में इनके अधिकारी एवं कर्मचारियों का आमजन के प्रति रवैया खासा खराब था परंतु कड़वा सच यह है कि आज भी स्‍थित जस की तस है। इसमें कोई अंतर कहीं दिखाई नहीं देता। दिखाई देता है तो केवल इतना कि नौकरशाह अब 'जीरो टॉलरेंस' की आड़ में जमकर टॉर्चर कर रहे हैं। यकीन न हो तो किसी भी एक विभाग को आप स्‍वयं चुन लीजिए, और उसकी सच्‍चाई जानिए। शर्त यह है कि किसी भी तरह आपके अभियान की भनक न लगे। गोपनीयता इसके लिए बेहद जरूरी है। 
प्रदेश भर के सभी सरकारी विभागों में चल रहे भ्रष्‍टाचार के बड़े खेल का सिलसिलेवार ब्‍यौरा बाद में लेकिन उससे पहले वो सवाल जो जनता के मन में बैठे हैं और जिन्हें लेकर जनता आपसे बहुत उम्मीद लगाए बैठी थी परंतु नतीजा आज तक शून्य नजर आता है। 
सबसे पहले बात लखनऊ के गोमती रिवर फ्रंट घोटाले की 
माननीय मुख्‍यमंत्री जी! सर्वविदित है कि समाजवादी पार्टी के शासनकाल में अखिलेश यादव के मुख्‍यमंत्री रहते हजारों करोड़ रुपए का गोमती रिवर फ्रंट घोटाला हुआ। आपने अपनी पहली पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनने के साथ ये ऐलान किया था कि गोमती रिवर फ्रंट घोटाले का कोई अपराधी बच नहीं सकेगा और जल्‍द से जल्‍द सारे घोटालेबाज जेल के अंदर होंगे। 
सीबीआई ने इस मामले में कुल 189 लोगों को आरोपी बनाया लेकिन आज तक सतही कार्रवाई के अलावा कुछ नहीं हुआ। अगर पकड़े भी गए तो वो लोग जिन्‍हें गुर्गे कहा जा सकता है। कोई भी सरगना या मास्‍टर माइंड आज तक गिरफ्त में नहीं आया। सच कहें तो आज वही आप पर और आपकी सरकार पर हमलावर हैं, लेकिन आप कुछ नहीं कर पा रहे। जनता जानना चाहती है कि ऐसा क्यों। 
हजारों करोड़ रुपए का घोटाले करने वाले अब तक सरकार की पकड़ से दूर क्यों हैं और सरकार इसमें क्या कर रही है। 
माननीय योगी जी! आप भली भांति जानते हैं कि कोई भी बड़ा घोटाला सत्ता का संरक्षण पाए बिना संभव ही नहीं है। सत्ता का संरक्षण किसी भी घोटाले को तब मिलता है जब सरकार पर काबिज लोगों के निजी स्‍वार्थ उससे पूरे होते हों, तो फिर आज तक गोमती रिवर फ्रंट घोटाले के संरक्षणदाताओं का क्यों कुछ नहीं बिगड़ा। 
मायावती के कार्यकाल का नोएडा पार्क घोटाला 
अखिलेश यादव के कार्यकाल से पहले मायावती के शासनकाल में नोएडा का पार्क घोटाला सामने आया। हजारों करोड़ रुपए के इस घोटाले में भी बड़े-बड़े लोगों की संलिप्‍तता सामने आई। इस पार्क में लगाए गए पत्थरों के हाथी और बहनजी की मूर्तियों पर किसी आम आदमी की सोच से भी परे जाकर पैसा खर्च किया गया। पहले अखिलेश यादव ने कहा कि इस घोटाले का कोई आरोपी बच नहीं सकेगा। फिर आपकी सरकार ने उम्मीद जगाई किंतु राजनीति के बियाबान में इस घोटाले की सच्‍चाई कहां खो गई, कुछ पता नहीं लगा। 
आज बहिन जी राजनीतिक हैसियत भले ही पहले जितनी न रह गई हो लेकिन उनके ठाठ-बाट और शानो-शौकत में कोई कमी नहीं है। पत्थरों के बने बुत बोल पाते तो बताते कि घोटालेबाज आज भी मौज कर रहे हैं। सत्ता का संरक्षण उन्‍हें भी प्राप्‍त था, और क्यों प्राप्‍त था इसे अब दोहराने की दरकार नहीं रह गई। 
आय से अधिक संपत्ति के मामले भी ठंडे बस्‍ते में 
माननीय मुख्‍यमंत्री जी! इसी प्रकार कुछ कद्दावर नेताओं पर आय से अधिक संपत्ति के मामले दर्ज हुए थे। ये मामले कोर्ट-कचहरी तक भी पहुंचे किंतु नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा। आपकी सरकार कह सकती है कि कुछ को न्‍यायालय से राहत मिल गई और कुछ लंबित हैं, लेकिन सवाल यह भी है कि न्‍यायालय से राहत कैसे मिल गई। मामले अब तक लंबित क्यों है। इन मामलों में पर्याप्‍त पैरोकारी क्यों नहीं की जा रही, और की जा रही है तो उसकी स्‍थिति क्या है। 
योगी जी! आप ही बताइए कि क्या ये सब जानने का जनता को कोई अधिकार नहीं है। क्या जनता को आपसे जो अपेक्षाएं थीं, वो गलत थीं। यदि वो सही थीं तो हजारों-हजार करोड़ रुपया डकार जाने वाले आज तक बेनकाब क्यों नहीं हुए। उल्‍टा क्यों आज तक वो आपको, आपकी नीतियों को, आपके काम को तथा आपकी पार्टी को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। 
शायद इसलिए कि उन्‍हें इसके लिए भरपूर मौका मिल रहा है। अब विचारणीय प्रश्‍न यह है कि ये मौका कौन दे रहा है और क्यों दे रहा है। 
पहले पत्र में इतना ही। बाकी ये सिलसिला जारी रहेगा ताकि सनद रहे और वक्त जरूरत काम आए क्‍योंकि यूपी को 2027 के लिए भी आपसे बहुत उम्‍मीदें हैं। दरअसल, सवाल चुनावों में जीत-हार का नहीं उस भरोसे का है जो आपने दिया है और जो अभी टूटा नहीं है। 
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी 

बुधवार, 22 मई 2024

यूपी की वो समस्‍या जिसका पहले कार्यकाल से लेकर अब तक समाधान नहीं निकाल सके योगी जी जैसे सीएम


 शुक्रवार 20 नवंबर 2020 को लखनऊ में की गई एक समीक्षा बैठक के दौरान मुख्‍यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जिलाधिकारियों और पुलिस कप्तानों सहित सभी उच्च अधिकारियों को स्पष्‍ट आदेश एवं निर्देश दिए कि उन्‍हें अपने सरकारी मोबाइल (सीयूजी) नम्बर पर आने वाली हर कॉल खुद रिसीव करनी होगी। साथ ही सीयूजी नंबरों के जरिए सामने आने वाली जनसमस्‍याओं को गंभीरता से लेना होगा और उनका समाधान करना होगा। 

मुख्‍यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने साफ-साफ कहा कि डीएम और पुलिस कप्तान सहित अन्य सभी अधिकारी अपने सीयूजी नम्बर पर आने वाली हर फोन कॉल का जवाब भी जरूर दें। यह आदेश तत्काल प्रभाव से अमल में लाया जाए। इसे जांचने के लिए अगले एक सप्ताह में मुख्यमंत्री कार्यालय से औचक फोन कर अधिकारियों की कार्यशैली परखी जाएगी ताकि आदेश की अवहेलना करने वाले अधिकारियों के खिलाफ आवश्‍यक एक्शन लिया जा सके। सीएम योगी ने गैर जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ सख्‍त कार्रवाई करने के लिए उच्चाधिकारियों को भी निर्देशित किया। 
जनहित में दिए गए इन आदेश-निर्देशों के अनुपालन की सत्यता परखने के लिए योगी सरकार ने लगभग चार महीने बाद 15 मार्च 2021 को तमाम बड़े अधिकारियों से उनके सीयूजी नंबरों पर संपर्क साधने का प्रयास किया किंतु इनमें से 25 जिलाधिकारियों तथा 4 कमिश्नरों ने अपने सीयूजी नंबर रिसीव करने की जहमत नहीं उठाई। अधिकारियों की इस हरकत के लिए प्रदेश के नियुक्ति एवं कार्मिक विभाग ने वाराणसी, प्रयागराज, अयोध्‍या तथा बरेली के मंडलायुक्तों से जवाब तलब भी किया। 
इनके अतिरिक्त गौतमबुद्ध नगर (नोएडा), गाजियाबाद, बदायूं, अलीगढ़, कन्नौज, संत कबीरनगर, सिद्धार्थनगर, गोरखपुर, फिरोजाबाद, हापुड़, अमरोहा, पीलीभीत, बलरामपुर, गोंडा, जालौन, कुशीनगर, औरैया, कानपुर देहात, झांसी, मऊ तथा आजमगढ़ के जिलधिकारियों को भी कारण बताओ नोटिस जारी किए गए किंतु इसके तीन साल बाद भी स्‍थिति जस की तस है। 
2017 में पूर्ण बहुमत के साथ यूपी के सीएम बने योगी आदित्यनाथ ने 2022 में एकबार फिर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। अब उस सरकार को बने भी दो साल से अधिक का समय बीत चुका है किंतु अधिकारियों के रवैये में कोई परिवर्तन नजर नहीं आ रहा। 
अधिकांश अधिकारी आज भी न तो अपने सीयूजी नंबर रिसीव करते हैं और न किसी को कोई जवाब देते हैं। ऐसे अधिकारियों की भी कमी नहीं हैं जिनके सीयूजी नंबर उनके अधीनस्थ उठाते हैं और फोन करने वाले का 'स्टेटस' देखकर जवाब देते हैं। 
जनसामान्‍य की तो किसी भी समस्या को शायद ही कोई अधिकारी गंभीरता से लेता हो अन्यथा ज्‍यादातर अधिकारी और उनके अधीनस्‍थ अनजान नंबर से आए कॉल को रिसीव करना तक जरूरी नहीं समझते। 
इसके अलावा हर सरकारी अधिकारी के सीयूजी नंबर पर WhatsApp चालू होना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है उसे 'सीन' करना यानी देखना तथा देखकर आवश्‍यकता अनुसार उसका जवाब देना और समस्‍या का यथासंभव समाधान करना। लेकिन तमाम अधिकारी ऐसा नहीं करते। 
उन्‍होंने अपने WhatsApp पर इस तरह की सेटिंग की हुई है कि प्रथम तो वो उन तक संदेश पहुंचते ही नहीं हैं, और यदि पहुंच भी जाएं तो भेजने वाले को पता नहीं लगता कि उसका मैसेज देखा भी है या नहीं क्योंकि उस सेटिंग के बाद वहां 'ब्‍लू टिक' शो नहीं करता। सिर्फ मैसेज पहुंचने के दो टिक शो होते हैं।    
अगर बात करें राजनीतिक एवं धार्मिक दृष्‍टि से महत्वपूर्ण मथुरा जैसे जिले की तो उसका हाल भी दूसरे जिले से कुछ अलग नहीं है। मथुरा में तैनात अधिकांश अधिकारी यही रवैया अनपाए हुए हैं जबकि योगी सरकार कहती है कि अयोध्‍या के बाद उसका सारा फोकस मथुरा के विकास तथा यहां के लोगों की समस्याओं के समाधान पर टिका है। 
आज इस बाबत 'लीजेण्‍ड न्यूज़' ने मथुरा में सत्ताधारी दल के जिलाध्‍यक्ष निर्भय पांडे से फोन पर बात की और पूछा कि क्या यह बड़ी समस्‍या उनके संज्ञान में है? 
इस पर उनका कहना था कि फिलहाल चुनाव संबंधी कार्य के लिए मैं आजमगढ़ में हूं, और समय मिलते ही इसे चेक करके उच्‍च अधिकारियों से बात करूंगा। 
मथुरा बीजेपी के महानगर अध्‍यक्ष घनश्‍याम लोधी ने बताया कि वह भी चुनाव प्रचार के लिए श्रावस्ती गए हुए हैं, और लौटकर जिलाधिकारी से इस संबंध में बात करेंगे। 
मथुरा में कांग्रेस के जिलाध्‍यक्ष भगवान सिंह वर्मा को जब इस समस्या से अवगत कराया गया तो उन्होंने भी चुनाव प्रचार में व्‍यस्तता का हवाला देते हुए कहा कि समय मिलते ही वो इस मुद्दे को जिलाधिकारी के सामने रखेंगे। 
उनका कहना था कि वह पड़ोसी राज्य हरियाणा के गुरूग्राम से लोकसभा चुनाव लड़ रहे अभिनेता राजबब्बर के चुनाव प्रचार में लगे हैं। और वहां से फ्री होने पर यह मुद्दा जरूर उठाएंगे। 
बहरहाल, 1 जून को लोकसभा के चुनाव संपन्न होने जा रहे हैं और 4 जून को उनका नतीजा भी निकल आएगा। बस देखना यह होगा कि सत्ता पक्ष और विपक्ष के नेतागण इसके बाद इस अत्यंत जरूरी मुद्दे पर कितने गंभीर होते हैं और इसका निराकरण कैसे करते हैं। फिलहाल तो समाधान के लिए दिए गए सीयूजी नंबर अपने आप में एक समस्या बनकर रह गए हैं जिसका हल शायद योगी जी जैसे सीएम को भी नहीं सूझ रहा। 
यदि ऐसा न होता तो अपने पहले कार्यकाल में उठाई गई इस समस्‍या का कोई तो समाधान योगी जी दूसरे कार्यकाल तक जरूर ढूंढ चुके होते। 
अधिकारी भी भली-भांति जानते हैं कि ऊपर से आए आदेश-निर्देशों का कितना और किस तरह पालन करना है। इसीलिए सरकारें बदलती हैं लेकिन सरकारी अफसरों की कार्यप्रणाली जस की तस रहती है। उसमें कहीं कोई बदलाव नहीं आता।  
इतना जरूर है कि जिला अध्‍यक्ष और महानगर अध्‍यक्ष के रूप में बैठे सत्ताधारी दल के पदाधिकारी अगर इस ओर ध्‍यान दें और खुद मॉनिटरिंग करके सरकार तक जमीनी हकीकत पहुंचाएं तो काफी हद तक अधिकारियों की मनमानी पर शिकंजा कसा जा सकता है। वरना ढर्रे पर तो सब चल ही रहा है क्‍योंकि लखनऊ में बैठे अधिकारी रोज-रोज फैक्ट चेक नहीं कर सकते। करते भी हैं तो नोटिस देकर खाना-पूरी कर लेते हैं, जैसा 15 मार्च 2021 को किया तो गया लेकिन किसी अधिकारी के खिलाफ कोई एक्शन हुआ हो, इसकी कोई सूचना कहीं से नहीं मिली। नतीजा सामने है। 
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

शुक्रवार, 16 दिसंबर 2022

नगर निकाय चुनाव यूपी: कोर्ट के रुख से बहुत से भाजपाई खुश, लेकिन पार्टी के व्यवहार से क्षुब्ध


 यूपी में नगर निकाय चुनावों के लिए आरक्षण की अधिसूचना पर इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा फिलहाल रोक लगाए जाने से एक ओर जहां तमाम वो भाजपाई खुश हैं जो सामान्य सीट होने की स्‍थिति में चुनाव लड़ने की योग्‍यता रखते हैं वहीं दूसरी ओर पार्टी पदाधिकारियों के रवैये से कार्यकर्ताओं का एक बड़ा वर्ग नाखुश दिखाई दे रहा है।

दरअसल, नगर निकाय चुनावों के लिए आरक्षित सीटों की घोषणा होने से पहले भाजपा का एक बड़ा वर्ग अपने लिए पार्षद और मेयर के पदों पर चुनाव लड़ने की संभावना तलाश रहा था, किंतु आरक्षण की घोषणा ने उसकी उम्‍मीदों पर पानी फेर दिया। विशेषकर उन जिलों में जहां 2017 के चुनावों में भी मेयर पद आरक्षित था।

ऐसे जिलों में कृष्‍ण की नगरी मथुरा का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है। दरअसल, 2017 के निकाय चुनावों में ही स्‍थानीय लोगों के भारी विरोध को दरकिनार कर मथुरा एवं वृंदावन नगर पालिकाओं को मिलाकर ''मथुरा-वृंदावन नगर निगम'' बना दिया गया। फिर यहां का मेयर पद भी दलित के लिए आरक्षित कर दिया।

अब पार्टीजन ये मानकर चल रहे थे कि 2022 में इस धार्मिक नगरी का मेयर पद सामान्य घोषित कर दिया जाएगा किंतु इस बार इसे ओबीसी (महिला) के लिए आरक्षित कर दिया।

बहरहाल, ओबीसी आरक्षण के खिलाफ दायर एक याचिका पर इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंड पीठ द्वारा फिलहाल 20 दिसंबर तक रोक लगाकर सुनवाई की जा रही है जिससे उम्‍मीद बंधी है कि शायद सरकार की घोषणा लागू न हो सके और ओबीसी के लिए पिछले दिनों घोषित सीटों पर भी बिना आरक्षण चुनाव कराने पड़ें। लेकिन इस सबके बीच बीजेपी कार्यकर्ताओं का एक बड़ा वर्ग पार्टी पदाधिकारियों के उपेक्षित रवैये से नाराज है।

उसका कहना है कि सालों-साल मेहनत तो करता है सामान्‍य कार्यकर्ता, किंतु जब बात आती है टिकटों के बंटवारे की तो उसे कोई तरजीह नहीं दी जाती। यहां तक कि उसी के इलाके की उम्‍मीदावारी पर भी उसकी राय लेना जरूरी नहीं समझा जाता और पार्टी पदाधिकारी 'अंधे बांटें रेवड़ी' की कहावत को चरितार्थ करने लगते हैं।

इन कार्यकर्ताओं की मानें तो पार्टी पदाधिकारी अपमान की हद तक उनके साथ रूखा व्‍यवहार करते हैं और अपने-अपने लोगों के नाम आगे बढ़ाने में लगे रहते हैं, जो समर्पित कार्यकताओं के साथ सरासर अन्याय है।

यही नहीं, पार्षद के पद पर चुनाव लड़ने के इच्‍छुक कार्यकर्ताओं द्वारा दावेदारी जताये जाने की स्‍थिति में उन्‍हें उनकी हैसियत का अहसास कराया जाता है ताकि वह चुनाव लड़ने का विचार ही त्याग दें।

उदाहरण के तौर पर यदि बात करें मथुरा की तो इसका प्रमाण तब देखने को मिला जब दो दिन पहले सीएम योगी आदित्यनाथ यहां आए।

पार्टी सूत्रों के अनुसार योगी की सभा में भीड़ जुटाने की जिम्‍मेदारी पार्षद का चुनाव लड़ने के इच्‍छुक कार्यकर्ताओं पर थोप दी गई। एक-एक दावेदार से सौ-सौ लोगों को सभा स्‍थल तक पहुंचाने को कहा गया। साथ ही उनसे दो-दो बड़े होर्डिंग लगवाए गए।

चूंकि एक-एक वार्ड से टिकट मांगने वाले कार्यकताओं की संख्‍या दर्जनों तक पहुंच रही है इसलिए भीड़ तो एकत्र हो गई लेकिन उसे जुटाने तथा होर्डिंग लगवाने का खर्चा बहुतों को अखर गया।

ऐसे में जाहिर है कि अनेक ऐसे कार्यकर्ता तो पार्षद का भी चुनाव लड़ने की बात नहीं सोच सकते जिनकी आर्थिक स्‍थिति लाखों रुपए खर्च करने की इजाजत नहीं देती।

यदि वो किसी पदाधिकारी के सामने अपनी इच्‍छा व्‍यक्त करते हैं तो उन्‍हें इसका अहसास करा दिया जाता है कि चुनाव लड़ना उनके बस की बात नहीं।

बेशक आज निकाय चुनाव लड़ना आसान नहीं रहा और इसमें भी दूसरे चुनावों की तरह प्रत्याशी को पैसा पानी की तरह बहाना पड़ता है लेकिन समर्पित कार्यकर्ता तो चुनावों का बेसब्री से इंतजार करते ही हैं क्योंकि उनका अपना राजनीतिक भविष्‍य अंतत: चुनावों पर ही टिका होता है।

ऊपर से अगर पार्टी पदाधिकारी उनके साथ सौतेला व्‍यवहार करते हैं और उन्‍हीं का नाम आगे बढ़ाते हैं जो या तो उनकी गणेश परिक्रमा करने में माहिर होते हैं या फिर पैसा खर्च करने में समर्थ, तो आम कार्यकर्ताओं को ठेस लगना स्‍वाभाविक है।

भारतीय जनता पार्टी को आज जो मुकाम हासिल है, उसके पीछे आम कार्यकर्ता की मेहनत, लगन, निष्‍ठा और समर्पण का भी बहुत बड़ा हाथ है इसलिए उसे किसी षड्यंत्र या सोची-समझी रणनीति के तहत चुनाव लड़ने के उसके अधिकार से वंचित करना तथा टिकट मांगने पर हतोत्‍साहित करना, आज नहीं तो कल पार्टी को भारी पड़ सकता है।

ये बात इसलिए और अहमियत रखती है कि पिछले दिनों जब पार्टी ने मथुरा-वृंदावन का मेयर पद ओबीसी (महिला) के लिए आरक्षित कर दिया था तब भी अधिकांश वही लोग हावी होने की कोशिश कर रहे थे जिन्‍हें सीधे तौर पर टिकट का हकदार नहीं माना जा सकता। इन लोगों में वो लोग प्रमुख थे जिनके पुत्रों ने इस श्रेणी की महिला से शादी की है या जिनकी अपनी पत्नी इस इस वर्ग के आरक्षण की श्रेणी में आती हैं।

नगर निगम बनने के बाद दलित के लिए आरक्षित योगीराज भगवान श्रीकृष्‍ण की पावन भूमि का पहला मेयर तो भाजपा के मुकेश आर्यबंधु को चुना गया लेकिन उनका कार्यकाल ऐसा नहीं रहा जिसमें कोई उल्‍लेखनीय उपलब्‍धि हासिल की गई हो और जनता उनके काम से संतुष्‍ट हो।

माना कि इस दौर में भाजपा के सभी प्रत्याशी मोदी और योगी पर चुनकर आते हैं किंतु फिर भी पब्‍लिक की अपने जनप्रतिनिधि से कुछ तो अपेक्षाएं होती ही हैं। इन अपेक्षाओं पर खरा उतरने के लिए योग्य प्रत्‍याशियों का चयन जरूरी है।

पद चाहे मेयर का हो या पार्षद का, न तो आम जनता यह चाहती है कि उसके लिए प्रत्याशी उसके ऊपर थोप दिया जाए और न पार्टी कार्यकर्ता ऐसे प्रत्याशी को पसंद करते हैं। विकल्‍प के अभाव में जनता, तथा अनुशासन की डोर में बंधे होने के कारण कार्यकर्ता बुझे मन से भले ही टिकट पाने वाले प्रत्‍याशी का साथ देते नजर आएं लेकिन कहीं न कहीं उन्‍हें ये बात अखरती जरूर है।

हाल ही में सपन्‍न हुए हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनावों के नतीजे इस बात का प्रमाण है कि असंतुष्‍ट एवं बागी भाजपा प्रत्‍याशियों ने किस तरह पार्टी के जबड़े से जीत छीन ली और वोट प्रतिशत में बहुत मामूली अंतर रहने के बावजूद भाजपा इतिहास बनाने से चूक गई।  

पार्टी के सूत्रों की मानें तो मथुरा-वृंदावन मात्र उदाहरण है अन्‍यथा पूरे प्रदेश में कमोबेश हालात एक जैसे हैं। सामान्य कार्यकर्ता तरसता रह जाता है और प्रभावशाली लोग अपने मोहरे फिट करने में सफल हो जाते हैं।

'मथुरा' के भाजपाइयों को तो इस मामले में यूं भी काफी कटु अनुभव है क्‍योंकि पिछले तीन लोकसभा चुनावों से यहां पार्टी किसी स्‍थानीय को न लड़ाकर, बाहरी प्रत्‍याशी को लड़ा रही है। 2009 में गठबंधन के चलते रालोद के जयंत चौधरी को टिकट दे दिया गया और 2014 तथा 2019 में हेमा मालिनी बाजी मार ले गईं। 2024 के लिए भी कोई स्‍थानीय चेहरा नहीं चमक रहा।

जो भी हो, समय रहते यदि पार्टी ने गंभीर होती इस समस्‍या पर ध्‍यान नहीं दिया और समर्पित भाजपा कार्यकर्ताओं की इसी तरह उपेक्षा की जाती रही तो निश्‍चित ही इसके परिणाम भविष्‍य में अच्‍छे नहीं निकलेंगे।

बेहतर होगा कि नगर निकाय के इन चुनावों में भी प्रत्‍याशियों का चयन योग्‍यता के आधार पर किया जाए, न कि चापलूसी या संबंधों के अधार पर। सीट आरक्षित हो या सामान्‍य, लेकिन जनसामान्‍य के दिलों में जगह बनाने वाले जनप्रतिनिधि ही बड़ी लकीर खींचने में सफल होंगे। वही पार्टी के लिए मुफीद होंगे और वही जनता के लिए। भाजपा के निर्णायक नेता इस पर कम से कम एकबार विचार करके जरूर देखें।

- लीजेण्‍ड न्‍यूज़  

सोमवार, 14 मार्च 2022

मथुरा के एक सरकारी विभाग में “भ्रष्‍टाचार” का ठेका, पढ़कर झटका लग सकता है लेकिन हकीकत यही है

 “भ्रष्‍टाचार” का ठेका… वो भी एक सरकारी विभाग में। पढ़कर आपको झटका लग सकता है लेकिन हकीकत यही है।

इससे भी बड़ी हकीकत यह है कि “भ्रष्‍टाचार” का ये ठेका ऐसे उच्‍च प्रशासनिक अधिकारियों की नाक के नीचे उठाया जाता है जिन पर जिलेभर की जिम्‍मेदारी है और ठेका उठाने वाले अधिकारी उनके अधीनस्‍थ हैं।
अब आप खबर के ऊपर लगी तस्‍वीरों को देखिए। ये तस्‍वीरें हैं मथुरा (यूपी) के कलक्ट्रेट स्‍थित रजिस्‍ट्री कार्यालय की, जहां कार्यालय के अलग-अलग पटल पर बैठे हैं ये चेहरे। इन चेहरों में से कोई ऐसा नहीं है जो सरकारी मुलाजिम हो किंतु रजिस्‍ट्री कार्यालय का काम इनके बिना करा पाना संभव नहीं है।
मथुरा जनपद में कुल पांच रजिस्‍ट्री कार्यालय हैं जिनमें से मुख्‍य है सदर तहसील का कलक्ट्रेट स्‍थित कार्यालय, जहां दो सब रजिस्‍ट्रार हैं। यहां सब रजिस्‍ट्रार प्रथम के पद पर एके त्रिपाठी और सब रजिस्‍ट्रार द्वितीय के पद पर विजय कुमार पांडे फिलहाल नियुक्‍त हैं।
इनके अतिरिक्‍त मांट, छाता और महावन तहसीलों के रजिस्‍ट्री कार्यालयों में एक-एक सब रजिस्‍ट्रार की तैनाती रहती है।
सदर तहसील के सब रजिस्‍ट्रार प्रथम एके त्रिपाठी के स्‍टाफ में नवल, देव, आरिफ, अतुल, राजू, रवि, शंकर और रजा कार्यरत हैं जबकि सब रजिस्‍ट्रार द्वितीय के अधीन हैं हेमवीर, केके, नेत्रपाल, यामीन, राहुल तथा विजय।
घोर आश्‍चर्य की बात यह है कि एक दर्जन से अधिक इन नामों में से कोई ऐसा नहीं है जो सरकारी मुलाजिम हो, या जिसे उत्तर प्रदेश सरकार ने स्थायी अथवा अस्‍थायी तौर पर नियुक्‍ति दी हो लेकिन ये रजिस्‍ट्री कार्यालय में इस शान के साथ कुर्सी पर काबिज मिलेंगे जैसे सरकारी दामाद हों।
कार्यालय के अलग-अलग पटल पर बैठे ये अवैध मुलाजिम एक ओर जहां बड़ी बेशर्मी के साथ हर जायज काम के लिए भी खुलेआम रिश्‍वत मांगते हैं वहीं तमाम नाजायज काम करके सरकार को प्रति माह करोड़ों रुपए के राजस्‍व की हानि पहुंचाते हैं।
रिश्‍वत मांगने या कहें कि पैसा झपटने में ये अवैध कर्मचारी इतने माहिर हैं कि काम कैसा भी और किसी का भी हो, इनको भेंट दिए बिना न तो कोई काम करा सकता है और न इनकी नजरों से बच के आ सकता है।
सामान्‍य तौर पर किसी तृतीय या चतुर्थ श्रेणी के सरकारी कर्मचारी को जितना वेतन महीने में एकबार मिलता है, उतना तो रजिस्‍ट्री कार्यालय का एक-एक अवैध कर्मचारी हर रोज अपनी जेबों में भरकर ले जाता है।
जाहिर है कि भ्रष्‍टाचार से होने वाली ये वो कमाई है जो ऊपर तक हिस्‍सा पहुंचाने के बाद बचती है और जिस पर सिर्फ और सिर्फ अवैध कर्मचारी का हक होता है। ऐसे में इनके अधिकारियों की अकूत कमाई का अंदाज लगाना कोई मुश्‍किल काम नहीं।
योगीराज भगवान श्रीकृष्‍ण की पावन जन्‍मस्‍थली का मुख्‍य रजिस्‍ट्री कार्यालय तो एक उदाहरण है अन्‍यथा बात करें जनपद की बाकी तीन तहसीलों के रजिस्‍ट्री कार्यालयों की या फिर प्रदेश भर के रजिस्‍ट्री कार्यालयों की, तो सब जगह कमोबेश स्‍थितियां यही मिलेंगी। यानी हर जगह भ्रष्‍टाचार के ठेके बेखौफ और बेझिझक चलते मिलेंगे, वो भी उस योगीराज में जिसने भ्रष्‍टाचार को लेकर जीरो टॉलरेंस की नीति अख्‍तियार की हुई है और जिसे सख्‍ती से लागू करने की बात कहकर 2022 में भी वापसी की है।
मथुरा या प्रदेश के किसी भी रजिस्‍ट्री कार्यालय में अवैध कमाई के कितने रास्‍ते होते हैं और किसकी कितनी कीमत तय है, इसका विस्‍तृत विवरण अगली बार…
कौन उठाता है भ्रष्‍टाचार का ये ठेका, और कौन करता है अवैध नियुक्‍तियां
रजिस्‍ट्री कार्यालय के ही सूत्र बताते हैं कि यहां अवैध तौर पर कार्यरत कर्मचारियों की जानकारी यूं तो सभी उच्‍च अधिकारियों को है किंतु इनकी नियुक्‍तियों में प्रमुख भूमिका सहायक स्‍टांप आयुक्‍त की होती है जो विकास प्राधिकरण में बैठते हैं।
जाहिर है कि सब रजिस्‍ट्रारों की सहमति के बिना या उनकी जानकारी के बगैर ये नियुक्‍तियां संभव नहीं हैं लिहाजा वो दूध के धुले नहीं हो सकते।
सूत्र बताते हैं कि किसी भी उच्‍च प्रशासनिक अधिकारी का कभी रजिस्‍ट्री कार्यालय में आकस्‍मिक निरीक्षण के लिए न आना और न अवैध नियुक्‍तियों को लेकर कभी किसी जिम्‍मेदार अधिकारी से कोई जवाब तलब करना, यह समझने के लिए काफी है कि स्‍थितियां किस हद तक बिगड़ी हुई हैं।
इसे यूं भी समझा जा सकता है सर्वाधिक कमाई वाले सरकारी विभागों में शुमार रजिस्‍ट्री कार्यालय के अवैध कर्मचारी ही अधिकारियों की वो दुधारू गाय हैं जो हर रोज उनके साथ-साथ विकास प्राधिकरण को भी मोटी कमाई करने तथा कमाई के नए-नए ‘ठिकाने’ तलाश कर देते हैं।
किसी भी जिले में कलक्‍ट्रेट वो जगह होती है जहां पुलिस व प्रशासन के आला अफसर बैठते हैं। यहीं से आमजन को न्‍याय मिलता है, किंतु जब पूरे कुएं में भी भांग घुली हो तो किससे शिकायत और कैसी शिकायत।
कहते हैं मथुरा तीन लोक से न्‍यारी है। शायद इसीलिए कभी एक ‘रामवृक्ष यादव’ नाम का दुबला-पतला शख्‍स अपने गुर्गों के साथ यहां आया था और सरकारी जवाहर बाग की सैंकड़ों एकड़ बेशकीमती जमीन पर वर्षों काबिज रहा।
इसी कलक्‍ट्रेट पर ऐसे ही बड़े-बड़े अधिकारियों की नाक के नीचे उसने जवाहर बाग में नंगा नाच किया, और जब उच्‍च न्‍यायालय की सख्‍ती के बाद अधिकारी उसे अवैध कब्‍जे से बेदखल करने पर मजबूर हुए तो दो पुलिस अफसरों को जान गंवानी पड़ी।
आज बेशक कोई सरकारी जमीन किसी के अवैध कब्‍जे में न सही किंतु वैध को अवैध तथा अवैध को वैध बताकर लोगों को खुलेआम लूटने और सरकारी खजाने को चूना लगाने का खेल बदस्‍तूर जारी है।
साथ ही जारी है एक ऐसे प्रदेश में अवैध नियुक्‍तियों के जरिए भ्रष्‍टाचार को ठेके पर उठाने का कारनामा, जहां नौकरी के लिए लाखों युवा दर-दर की ठोकरें खाते देखे जा सकते हैं।
यह सब इसलिए हो पा रहा है क्‍योंकि शिकवा-शिकायत के बावजूद भ्रष्‍टाचार के इन ठेकेदारों का कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाता। बिगड़ना तो दूर, कोई यह तक पूछने वाला नहीं कि भ्रष्‍टाचार को ठेके पर देने की कारस्‍तानी किसकी शह पर तथा किसकी कलम से हो रही है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

शनिवार, 13 नवंबर 2021

मिशन यूपी: एक-तिहाई मौजूदा विधायकों के टिकट काट सकती है BJP


 यूपी विधानसभा चुनाव को लेकर BJP की ठोस रणनीति तैयार करने के लिए अब केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह खुद एक्टिव होने जा रहे हैं। वह 29 अक्टूबर को लखनऊ पहुंचेंगे और मिशन यूपी को अंजाम देने के लिए पार्टी के दिग्गजों सहित संगठन के दूसरे नेताओं से भी मीटिंग करेंगे। अमित शाह के इस दौरे से यूपी बीजेपी में खलबली मच गई है। दरअसल, इस खलबली की बड़ी वजह यह है कि आगामी विधानसभा चुनाव में बीजेपी अपने एक-तिहाई मौजूदा विधायकों के टिकट काट सकती है। बताया जाता है कि इस बारे में पार्टी ने अपना मन पूरी तरह बना लिया है।

किन नेताओं पर गिरेगी गाज?
जाहिर है कि ऐसे में यह चर्चा शुरू हो गई है कि टिकट गंवाने वालों की लिस्ट में कौन-कौन से नेता का नाम हो सकता है। इन नेताओं की तादाद 100 तक जा सकती है। वैसे बीजेपी सूत्रों का कहना है कि इनमें प्रमुख रूप से वो बीजेपी विधायक शामिल हैं जो 2017 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले दूसरे दलों से बीजेपी में आए थे, लेकिन फिर आलाकमान की उम्मीदों पर खरे नहीं उतर सके। इनमें कुछ ऐसा पार्टी नेता भी शामिल हो सकते हैं जिनका कामकाज संतोषजनक नहीं रहा और वे सीएम योगी आदित्यनाथ और पीएम नरेंद्र मोदी की छवि को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
​इस फैसले से बीजेपी को कितना नुकसान?
वैसे बीजेपी के अंदर इसकी चर्चा भी हो रही है कि कहीं इतनी तादाद में विधायकों के टिकट काटने से चुनाव में पार्टी को नुकसान ना हो। इसका उल्टा असर भी हो सकता है। हालांकि जो लोग मोदी-शाह की चुनावी शैली को जानते हैं, उनका कहना है कि ऐसे खतरे लेने से दोनों दिग्गज बिल्कुल नहीं हिचकते हैं।
​बीजेपी की कुछ ऐसी रणनीति
2017 के चुनाव में बीजेपी की झोली में 312 सीटें आई थीं और 39.67 फीसदी वोट मिले थे। एक बार फिर से बीजेपी उससे बढ़कर जबर्दस्त प्रदर्शन की उम्मीद कर रही है। इसी को ध्यान में रखते हुए बीजेपी ने 1.5 करोड़ नए मेंबर्स जोड़ने का लक्ष्य रखा है। अभी बीजेपी के पास 2.3 करोड़ मेंबर्स हैं और इसकी संख्या बढ़ाने पर पार्टी का पूरा फोकस है।
संभावित नुकसान के लिए यह प्लान
2014 लोकसभा चुनाव में शाह को खुद पीएम मोदी ने ‘मैन ऑफ द सीरीज’ घोषित किया था और शाह ने इसे साबित भी किया था। सवर्ण और गैर यादव-ओबीसी वोटों को एकजुट कर बीजेपी ने करिश्माई प्रदर्शन किया था और यूपी में बीजेपी को नई जिंदगी मिली थी। एक बार फिर से शाह कुछ ऐसी ही रणनीति बनाने में जुटे हैं। बीजेपी मेंबर्स की संख्या बढ़ाना बीजेपी की प्रमुख रणनीतियों में एक है।
​इन नेताओं का टिकट क्यों काट रही बीजेपी?
पार्टी सूत्रों का कहना है कि सीनियर नेता मौजूदा विधायकों के कामकाज का भी आंकलन कर रहे हैं। इसमें विधानसभा क्षेत्र में विधायक की छवि, कामकाज और आम लोगों की राय भी ली जा रही है। इसी आधार पर इन नेताओं के टिकट बरकरार या काटने पर फैसले लिए जाएंगे। यूपी बीजेपी का कहना है कि अभी जो इसको लेकर भी अड़चन या संशय है, शाह के आने से वह दूर हो जाएगी।
-Legend News

बुधवार, 2 अक्टूबर 2019

मंदी के इस दौर में भी खूब फल-फूल रहा है यूपी का तबादला उद्योग

UP's transfer industry is flourishing even in this phase of recessionविश्‍वव्‍यापी आर्थिक मंदी के इस दौर में जब देश के बड़े-बड़े उद्योग धंधों की दम निकली पड़ी है और उन्‍हें खड़ा रखने के लिए केंद्र सरकार को लगातार प्राणवायु मुहैया करानी पड़ रही है, तब भी यूपी का तबादला उद्योग न सिर्फ पूरे दम-खम के साथ खड़ा दिखाई दे रहा है बल्‍कि अच्‍छा-खासा फल-फूल भी रहा है।
वैसे तो तबादलों को उद्योग का दर्जा दिलाने में काफी पहले ही हमारे राजनेता सफल हो गए थे लिहाजा सरकारें बेशक बदलती रहीं किंतु तबादला उद्योग कभी बंद नहीं हुआ। वर्ष 2017 में यूपी पर योगी आदित्‍यनाथ के नेतृत्‍व वाली सरकार काबिज होने के बाद लोगों को कुछ ऐसी उम्‍मीद बंधी कि शायद अब भ्रष्‍टाचार की बुनियाद माना जाने वाला तबादला उद्योग जरूर प्रभावित होगा।
योगी सरकार ने अपने शुरूआती कुछ महीनों तक इसके संकेत भी दिए कि वह अधिकारियों को ताश के पत्तों की तरह फेंटने की बजाय यथास्‍थिति बनाए रखेंगे और जो जहां है, उससे वहीं बेहतर काम लेंगे क्‍योंकि ब्‍यूरोक्रेसी हवा के रुख को पहचान कर नतीजे देती है।
किंतु जल्‍दी ही पहले तुरुप के इक्‍कों में फेर-बदल किया गया, और फिर बादशाह-बेगम व गुलामों की हैसियत वाले भी इधर से उधर किये जाने लगे।
आज जबकि योगी आदित्‍यनाथ की सरकार को यूपी की कमान संभाले हुए ढाई वर्ष अर्थात आधा कार्यकाल बीत चुका है तब पता लग रहा है कि योगीराज में भी तबादलों का खेल उसी प्रकार खेला जा रहा है, जिस प्रकार सूबे की पूर्ववर्ती सरकारें खेलती रही थीं।
योगी सरकार में शीघ्र ही तबादला उद्योग ढर्रे पर आ जाने के पीछे भी वही कारण बताए जा रहे हैं जो अखिलेश या मायाराज में बताए जाते थे। यानी…
कलयुग नहीं ये करयुग है, यहाँ दिन को दे और रात ले।
क्या खूब सौदा नकद है, इस हाथ दे उस हाथ ले।।
अब स्‍थिति यह है कि शायद ही किसी जिले में कोई अधिकारी टिक पाता हो। तबादला उद्योग के गतिमान रहने से अधिकारियों के स्‍थायित्‍व की समयाविधि ”महीनों में” सिमट कर रह गई है।
ये आदान-प्रदान किस स्‍तर पर हो रहा है और कौन कर रहा है, इसे जानना भी कोई रॉकेट साइंस नहीं है परंतु इसमें कोई दो राय नहीं कि सबके सब ‘अनभिज्ञ’ बने रहते हैं।
सरकार से ही जुड़े सूत्रों का स्‍पष्‍ट कहना है कि भ्रष्‍टाचार पर ‘जीरो टॉलरेंस’ की बात करने वाले योगी आदित्‍यनाथ की सरकार में आज प्रदेश, मंडल व जिलों में तैनाती का रेट फिक्‍स है।
हो सकता है ट्रांसफर-पोस्‍टिंग के लिए निर्धारित दामों की लिस्‍ट योगी आदित्‍यनाथ की नजरों के सामने न आ पायी हो परंतु भ्रष्‍ट और भ्रष्‍टतम अधिकारियों की अच्‍छे-अच्‍छे पदों पर तैनाती यह समझने के लिए काफी है कि तबादला उद्योग पूरी रफ्तार से चल रहा है।
यदि इतने से भी किसी कारणवश बात समझ में नहीं आ रही हो तो बहुत जल्‍दी-जल्‍दी तबादले स्‍पष्‍ट बता देते हैं कि दाल में कुछ काला नहीं है, पूरी की पूरी दाल काली है।
दरअसल, तबादला उद्योग एक ऐसा उद्योग है जो ऊपर से चलता है तो बहुत जल्‍दी नीचे तक अपनी जड़ें जमा लेता है।
बात चाहे पुलिस की हो अथवा प्रशासन की, आला अधिकारी अपनी भरपाई करने के लिए वही रास्‍ता अपने मातहतों के लिए खोल देते हैं जिस रास्‍ते पर चलकर वह वहां तक पहुंचते हैं।
यदि किसी जिले में डीएम और एसएसपी अथवा एसपी कुछ महीनों के मेहमान होते हैं तो उस जिले में उनके अधीनस्‍थ भी महीनों के हिसाब से ‘चार्ज’ पाते हैं।
चूंकि जिले के प्रभार का रेट वहां मौजूद आमदनी के अतिरिक्‍त स्‍त्रोतों और उसकी भोगौलिक एवं आर्थिक स्‍थिति के अनुरूप निर्धारित रहता है इसलिए हर जिले में सर्किल, थाने-कोतवाली सहित प्रशासनिक हलकों के दाम भी उसी के हिसाब से तय होते हैं।
कहने के लिए पिछले दिनों बुलंदशहर के SSP एन कोलांची को थानेदारों की तैनाती में अनियमितता बररतने पर निलंबित कर दिया गया।
फिर प्रयागराज (इलाहाबाद) के एसएसपी अतुल शर्मा को निलंबित कर दिया।
अपर मुख्य सचिव गृह अवनीश अवस्थी के अनुसार बुलंदशहर में दो थाने ऐसे थे जहां एसएसपी एन. कोलांची ने सात दिन से भी कम समय के लिए उपनिरीक्षकों को चार्ज दिया। एक थाना ऐसा था जहां का चार्ज मात्र 33 दिन में छीन लिया गया।
इतना ही नहीं, कोलांची ने दो ऐसे उप निरीक्षकों को चार्ज दे दिया जिन्‍हें पूर्व में Condemned entry (परनिंदा प्रविष्टि) दी जा चुकी थी।
अपर मुख्य सचिव गृह अवनीश अवस्‍थी की बात सच मानी जाए तो फिर प्रदेश के तमाम उन अन्‍य जिलों का क्‍या, जहां अयोग्‍य उपनिरीक्षकों-निरीक्षकों तथा उपाधीक्षकों को लगातार चार्ज पर रखा जा रहा है।
इसी प्रकार प्रयागराज (इलाहाबाद) के एसएसपी अतुल शर्मा को प्रदेश के डीजीपी ओपी सिंह ने अपनी रिपोर्ट में बाकायदा ‘निकम्‍मा’ अधिकारी घोषित किया है।
ऐसे में यह सवाल स्‍वाभाविक है कि एक निकम्‍मा अधिकारी प्रयागराज जैसे बड़े व महत्‍वपूर्ण जिले का चार्ज कैसे पा गया ?
आगरा के एसएसपी बनाए गए जोगेन्‍द्र सिंह को बमुश्‍किल कुछ हफ्ते में हटा दिया गया, फिलहाल वह आगरा में ही जीआरपी के एसपी हैं।
जल्‍द ही अगर उन्‍हें फिर किसी महत्‍वपूर्ण जिले का चार्ज दे दिया जाए तो कोई आश्‍चर्य नहीं।
मतलब तबादला उद्योग के चलते उच्‍च अधिकारियों से लेकर जिलों में बांटे जाने वाले ‘चार्ज’ की योग्‍यता कुछ महीनों, कुछ दिनों और यहां तक कि कुछ घंटों में तय की जा सकती है। बशर्ते कि मनमाफिक चार्ज चाहने वाला मनमुताबिक रकम अदा करने को तैयार हो।
यही कारण है कि एक ओर जहां हर स्‍तर पर ऐसे अकर्मण्‍य और निकम्‍मे लोग चार्ज पर मिल जाएंगे जिनकी आम शौहरत जगजाहिर है, वहीं दूसरी ओर काबिल-जिम्‍मेदार व कर्तव्‍यनिष्‍ठ लोग सम्‍मानजनक पोस्‍टिंग के लिए दर-दर भटकते मिलेंगे।
कहीं-कहीं तो नौबत यहां तक आ जाती है कि मजबूरन कोई अनुशासन को ताक पर रखकर शिकवा-शिकायत करने लगता है तो कोई न्‍यायपालिका की शरण में जा पहुंचता है क्‍योंकि निजी स्‍वार्थों की पूर्ति में लिप्‍त अधिकारी उनके भविष्‍य को अंधकारमय बनाने से भी परहेज नहीं करते।
फिलहाल पूरे प्रदेश में ऐसे एक-दो नहीं, अनेक उदाहरण सामने हैं जहां नाकाबिल लोग तबादला उद्योग से लाभान्‍वित होकर मलाईदार पदों पर जमे हुए हैं जबकि अच्‍छी कार्यशैली वाले अधिकारी एवं कर्मचारियों को कोई मौका नहीं दिया जा रहा।
यदि प्रदेश के मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ खुद इस तबादला उद्योग की बारीक समीक्षा करें और जिलों के अंदर आए दिन की जाने वाली उठा-पटक का पता लगाएं तो चौंकाने वाली सच्‍चाई सामने आ सकती है।
आश्‍चर्य तो इस बात पर है कि बुलंदशहर के एसएसपी रहे कोलांची और प्रयागराज के एसएसपी रहे अतुल शर्मा का उदाहरण सामने होने के बावजूद सीएम योगी समूची हांडी के पकने का इंतजार क्‍यों कर रहे हैं।
योगी जी को यह भी समझना होगा कि हर बार चुनाव परिणाम मोदी मैजिक से नहीं मिलने वाले। 2022 में जब यूपी विधानसभा के चुनाव होंगे तब बाकी उपलब्‍धियों के साथ-साथ तबादला उद्योग और उससे प्रभावित हो रही कानून-व्‍यवस्‍था का भी आंकलन जरूर होगा।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

रविवार, 21 जुलाई 2019

योगी सरकार ईमानदार तो “बेईमान और भ्रष्‍ट” अफसरों को कमान कैसे?

19 मार्च 2017 को गोरक्षनाथ पीठ (गोरखनाथ मंदिर) के महंत योगी आदित्‍यनाथ ने मुख्‍यमंत्री पद की शपथ ली थी। इसके बाद योगी आदित्‍यनाथ देश में सबसे बड़े प्रदेश के 21वें मुख्‍यमंत्री बने। योगी सरकार अब पांच साल के अपने कुल कार्यकाल में से दो साल और चार महीनों का कार्यकाल पूरा कर चुकी है।
उत्तर प्रदेश में अपनी पूर्ण बहुमत वाली सरकार का कामकाज संभालने के साथ ही योगी आदित्‍यनाथ ने कहा था कि वह अखिलेश सरकार में पूरी तरह पटरी से उतर चुकी कानून-व्‍यवस्‍था को तो पटरी पर लाएंगे ही, साथ ही भ्रष्‍टाचार के मामले में भी जीरो टॉलरेंस की नीति अख्तियार करेंगे।
आज लगभग ढाई साल बाद भी यूपी की कानून-व्‍यवस्‍था को आइना दिखाने के लिए कल सोनभद्र और संभल में हुई हत्‍याएं काफी हैं। हालांकि हर सरकार की तरह योगी सरकार और उसके अफसरान आंकड़ों को अपने पक्ष में बताते हुए कानून-व्‍यवस्‍था दुरुस्‍त होने का दावा कर रहे हैं।
अपराधों के ग्राफ को आंकड़ों की बाजीगरी से पेश करना प्रत्‍येक सरकार और हर अफसर की फितरत रही है इसलिए इस पर जाने की बजाय यह पूछा जाना ज्‍यादा मुनासिब होगा कि ईमानदार योगी सरकार में बेईमान व भ्रष्‍ट अफसरों को जिले व मंडलों की कमान कैसे सौंपी जा रही है?
कैसे पिछले 28 महीनों से लेकर आज तक वो आईएएस और आईपीएस अफसर लगातार अच्‍छी-अच्‍छी तैनाती पाते आ रहे हैं जिनके आचरण की जानकारी न सिर्फ समूची ब्‍यूरोक्रेसी को है बल्‍कि आम जनता के बीच भी उनका भ्रष्‍टाचार चर्चित है।
ज्‍यादा दूर न जाया जाए तो मथुरा में ही तैनात रहे कई ऐसे आईएएस और आईपीएस अफसर जो अपने जबर्दस्‍त भ्रष्‍टाचार के लिए शोहरत प्राप्‍त थे, कंटिन्‍यू चार्ज पर हैं जबकि ईमानदार अधिकारियों को साइड लाइन कर दिया गया है।
इन अधिकारियों की तैनाती से ऐसे सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर किसी अधिकारी की योग्‍यता का आंकलन सरकारें किस आधार पर करती हैं क्‍योंकि इनमें से कई अधिकारी तो वो हैं जो मायावती सरकार की गुडबुक में भी थे और अखिलेश सरकार की भी।
तब विपक्ष की राजनीति करने वाली भाजपा के नेता कहते थे कि एसएसपी तथा डीएम से लेकर थानों व तहसीलों के चार्ज बाकायदा बोली लगाकर बिकते हैं और उसके बाद भी हर महीने अवैध कमाई का हिस्‍सा लखनऊ तक पहुंचाया जाता है।
मथुरा में डीएम रहे एक ऐसे ही अधिकारी का कारनामा तब काफी सुर्खियों में रहा था जब उन्‍होंने आबकारी अधिकारी को लखनऊ जाते वक्‍त बीच रास्‍ते से वापस बुलाकर उसकी सरकारी गाड़ी में रखे नोटों से भरे ब्रीफकेस को यह कहते हुए छीन लिया कि जब मैं हर महीने हिसाब करने जाता हूं तो तुम अलग से यह कैसे कर सकते हो। 
आश्‍चर्य की बात यह है कि वही अधिकारी योगी सरकार में भी एक महानगर का डीएम बना बैठा है।
इसी प्रकार मथुरा में तैनाती के दौरान कमाए हुए करोड़ों रुपयों से यहीं बेनामी संपत्ति खरीदने वाले आईपीएस अधिकारी भी एक बड़े पर्यटक स्‍थल के एसएसपी बने हुए हैं। 
ये तो चंद उदाहरण हैं अन्‍यथा जिस जवाहर बाग कांड में पुलिस ने अपने एक जिम्‍मेदार पीपीएस अफसर और एक थानेदार को खो दिया, उसकी भी पटकथा कुछ भ्रष्‍ट उच्‍च अधिकारियों ने ही लिखी थी। उन्‍होंने ही तत्‍कालीन सरकार की नाक के बाल रामवृक्ष यादव को पूरे करीब ढाई साल संरक्षण दिया।
मथुरा की जिला जेल में कुख्‍यात अपराधियों के बीच हुई गोलीबारी को शायद ही कोई भूला होगा क्‍योंकि इस गोलीबारी में एक बदमाश की हत्‍या के बाद का घटनाक्रम चौंकाने वाला था।
पश्‍चिमी उत्तर प्रदेश के कुख्‍यात अपराधी ब्रजेश मावी की हत्‍या के आरोपी राजेश टोंटा और मावी गुट के बीच हुई इस गैंगवार में राजेश टोंटा भी घायल हुआ था लेकिन राजेश टोंटा को अगले दिन (18 जनवरी 2015) तब स्‍वचालित हथियारों द्वारा गोलियों से भून डाला जब उसे पुलिस अभिरक्षा में एंबुलेंस से इलाज के लिए आगरा ले जाया जा रहा था।
मावी की हत्‍या के आरोपी हाथरस निवासी राजेश टोंटा की नेशनल हाईवे पर हुई हत्‍या ने इसलिए तमाम सवाल खड़े किए क्‍यों कि राजेश टोंटा को आगरा ले जाने वाली पुलिस की टीम का नेतृत्‍व तत्‍कालीन एसएसपी खुद कर रही थीं।
संभवत: इसीलिए राजेश टोंटा की पत्‍नी कनक शर्मा ने अपने पति की हत्‍या का आरोप मथुरा की तत्‍कालीन महिला एसएसपी पर लगाया। कनक शर्मा ने इस मामले में बाकायदा मथुरा के थाना फरह को इस आशय की तहरीर दी। तहरीर के मुताबिक राजेश टोंटा की हत्‍या का सौदा एसएसपी ने 3 करोड़ की मोटी रकम लेकर किया था। यही अधिकारी योगी सरकार में लंबे समय तक मेरठ की एसएसपी रहीं और तभी हटाई गईं जब निजी कारणों से उन्‍होंने चार्ज छोड़ने की इच्‍छा जताई। 
कृष्‍ण की जन्‍मस्‍थली में काले तेल के खेल को अपनी तैनाती के दौरान संरक्षण देने वाले पुलिस व प्रशासनिक अधिकारी तो योगीराज में भी चार्ज पर हैं परंतु जिन्‍होंने तेल माफिया के खिलाफ हरसंभव सख्‍त कदम उठाया, वो अपनी ईमानदारी का बोझ ढोते फिर रहे हैं।
ब्‍यूरोक्रेट्स की तैनाती में राजनीतिक हस्‍तक्षेप अब कोई ऐसी बात नहीं रह गई जिसे जानना बाकी हो। सब जानते हैं कि सत्ता के गलियारों से निकटता ही अधिकांशत: ट्रांसफर-पोस्‍टिंग का आधार होता है।
लोग यह भी जानते हैं कि क्‍यों हर पार्टी अपने शासनकाल की कानून-व्‍यवस्‍था को पूर्ववर्ती सरकारों से बेहतर बताती है।
जिस तरह आज योगी आदित्‍यनाथ की सरकार प्रदेश की कानून-व्‍यवस्‍था को पहले से बेहतर होने का दावा कर रही है, ऐसा ही दावा मायावती और अखिलेश भी अपने-अपने समय में करते रहे थे किंतु सच्‍चाई यह है कि स्‍थिति जस की तस है।
स्‍थिति सुधरेगी भी कैसे, जब किसी एक पार्टी कार्यकर्ता से विवाद के कारण या किसी पदाधिकारी अथवा मंत्री के इशारों पर न चल पाने के कारण अच्‍छे अधिकारी को हटा दिया जाता है और भ्रष्‍ट अधिकारी इसलिए चार्ज पर बने रहते हैं क्‍योंकि उन्‍हें लखनऊ का वरदहस्‍त प्राप्‍त होता है।
माना कि योगी आदित्‍यनाथ सरकार के मुखिया हैं…पूरी की पूरी सरकार नहीं, परंतु इससे उनकी जिम्‍मेदारी कम नहीं हो जाती।
प्रदेश की कानून-व्‍यवस्‍था में यदि वाकई योगी सरकार आमूल-चूल परिवर्तन लाना चाहती है तो उसे न सिर्फ अधिकारियों की तैनाती में राजनीतिक हस्‍तक्षेप पूरी तरह समाप्‍त करना होगा बल्‍कि जिस प्रकार अक्षम अधिकारी एवं कर्मचारियों को शॉर्टलिस्‍ट करके उन्‍हें सेवामुक्‍त किया जा रहा है, उसी प्रकार भ्रष्‍ट अधिकारियों को भी चिन्‍हित कर उन्‍हें ब्‍लैक लिस्‍ट करना होगा अन्‍यथा आंकड़ों के बल पर भले ही बेहतर कानून-व्‍यवस्‍था का ढिंढोरा पीट लिया जाए किंतु जमीनी हकीकत नहीं बदलने वाली।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
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