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बुधवार, 7 सितंबर 2022

बहुत कन्फ्यूजन है भाई: कौन सा भारत जोड़ने निकले हैं राहुल बाबा, अंबानी-अडानी वाला या अपने वाला?


कथित तौर पर पार्टी को तोड़ने के जिम्मेदार कांग्रेस के 'चिर कुंवर' राहुल बाबा अब 'भारत जोड़ने' निकल पड़े हैं। अपने जीवन के करीब 150 बहुमूल्‍य दिन वह भारत जोड़ने में जाया करने वाले हैं। हालांकि उन्‍होंने फिलहाल यह नहीं बताया कि वह किस भारत को जोड़ने पर आमादा हैं। 

राहुल बाबा वर्षों से लोगों को बता रहे हैं कि भारत एक नहीं, दो हैं। एक अमीरों का भारत जिसे वो अडानी-अंबानी का भारत बताते हैं और दूसरा गरीबों का भारत जिसे वो अपना मानकर चलते हैं। जाहिर है कि वो अपने वाले भारत को ही जोड़ने निकले होंगे क्योंकि अंबानी-अडानी वाला भारत मोदी जी का भारत है। उसे वो क्यों जोड़ने लगे। 

बहरहाल, मुंह में चांदी की चम्मच लेकर पैदा हुए अरबपति परिवार के उत्तराधिकारी राहुल बाबा को लगता है कि भारत एक खिलौना है जो उनके हाथ से छीन लिया गया है, और जिन्‍होंने छीना है वो इस खिलौने से खेलने लायक नहीं हैं। वह इसे खंडित कर रहे हैं। 

राहुल की सोच वाला एक और तबका है, और वो भी भारत जोड़ने निकला हुआ है। यह तबका है विपक्ष। इस तबके में शामिल लोगों के अनुसार विपक्ष ही असल भारत है, लिहाजा विपक्ष एकजुट हो गया तो समझो भारत जुड़ गया। लेकिन परेशानी यह है कि इस तबके के लोग सिर्फ 'दल' जोड़ने  की बात कर रहे हैं, 'दिल' जोड़ने की नहीं। उनके दिलों के बीच 'पीएम पद' आड़े आ रहा है।  

जिस प्रकार उच्‍चकोटि के मनुष्‍य जीवन पर्यन्‍त मात्र मोक्ष की कामना में लगे रहते हैं, उसी प्रकार हर नेता की कामना होती है कि येन-केन-प्रकारेण वह एकबार पीएम पद प्राप्‍त कर ले तो 'इहिलोक' के साथ-साथ शायद 'परलोक' भी सुधर जाएगा। 'पूर्व प्रधानमंत्री' के तमगे वाली कुर्सी वहां भी साथ ले जा सकेंगे। 'चित्रगुप्त' फिर जनसामान्य की तरह व्‍यवहार नहीं कर पाएंगे। विशिष्‍टता साथ चिपकी होगी।  

यही कारण है कि विपक्ष के भारत जोड़ो अभियान की सफलता में 'नायकों' की संख्‍या आड़े आ रही है। प्रधानमंत्री का पद एक है किंतु उस पर दावा करने वाले विपक्षी अनेक हैं। 

ओलम का पहला अक्षर होने के नाते 'अरविंद' (केजरीवाल) से शुरू करें तो अखिलेश यादव कहते हैं कि मेरा नाम भी 'अ' से प्रारंभ होता है। केसीआर की मानें तो हिंदी वर्णमाला के व्‍यंजन जहां से शुरू होते हैं वो उनके नाम का पहला अक्षर है। इसलिए वही उचित होगा। ममता बनर्जी कहती हैं कि उनके नाम में पहले आदरणीय आता है, उसके बाद बनर्जी, और फिर अंत में ममता। 'अल्फाबेट' के अनुसार उनका नाम में A के साथ B जुड़ा है इसलिए वही पीएम पद की मौलिक हकदार हैं। उनके सामने न तो 'अरविंद' का 'केजरीवाल' टिकता है और न कल्वाकुंतला चंद्रशेखर राव यानी केसीआर के हिज्‍जे K C R कहीं मुकाबला कर सकते हैं। 

सुशासन बाबू का 'सु' त्‍यागकर शासन पर काबिज रहने वाले नीतीश कुमार कह तो ये रहे हैं कि उनके मन में पीएम पद की कोई अभिलाषा नहीं है किंतु उनकी यह बात कोई मान नहीं रहा। लोग कह रहे हैं कि पलटी मारने में उनका कोई सानी नहीं है, यह वो बार-बार सिद्ध कर चुके हैं इसलिए जो वो कह रहे हैं, उसका 'पलट' अभी से मानकर चलने में ही भलाई है। 

यूं भी राबड़ी पुत्र पहले दिन से माला फेर रहे हैं कि 'चचा नीतेशे बाबू' की नजर दूर की कुर्सी पर अटकी रहे तो वो पास की कुर्सी खिसका लें और देश-दुनिया को बता दें कि 'पलटूराम' के खिताब पर किसी एक का अधिकार नहीं ना है। 

कन्याकुमारी से भारत जोड़ने निकले राहुल बाबा का दावा है कि पीएम पद के एकमात्र स्‍वाभाविक एवं योग्य प्रत्‍याशी सिर्फ और सिर्फ वही हैं। नेहरू से चलकर गांधी तक के सरनेम देखेंगे तो सबकुछ साफ हो जाएगा। वाड्रा को बाद में देख लीजिएगा। 

नेहरू-गांधी ने 3 पीएम देश को दिए हैं। राहुल बाबा पहले भी कई बार पूछ चुके हैं कि मेरे पास तीन-तीन पीएम की विरासत है, तुम्‍हारे पास क्या है....हैं ?     

जो भी हो... कुल मिलाकर पीएम की कुर्सी को खंड-खंड करने में व्‍यस्‍त भारत को अखंड कैसे करेंगे, इसका तो पता नहीं किंतु इतना जरूर पता है कि भारत हो या पीएम की कुर्सी, उसका विभाजन जिन्‍होंने किया है वही अब उसे जोड़ने निकले हैं। 

यहां 1947 वाले 'विभाजन' की बात नहीं की जा रही, अमीर-गरीब वाले भारत की बात की जा रही है। वैसे कोई कुछ भी समझने को स्‍वतंत्र है। परतंत्र हैं तो बस हम और आप जैसे लोग जिन्‍हें यही नहीं पता कि भारत को तोड़ने और जोड़ने की परिभाषा अलग-अलग क्यों है, और हर दिन लोकतंत्र की हत्या होने के बावजूद वह दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कैसे बना हुआ है। 

-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी 

 

गुरुवार, 10 अक्टूबर 2019

केतु काल में कांग्रेस: जरूरत है महामृत्‍युंजय के जाप की, लेकिन कांग्रेसी हैं कि तुलसी-गंगाजल हाथ में लेकर खड़े हैं

ज्योतिष के अनुसार सूक्ष्‍म में समझें तो किसी की कुंडली पर केतु का प्रभाव अथवा केतु काल या अशुभ केतु होने से उसके सामने जीवन-मरण का संकट उत्‍पन्‍न हो जाता है। उसे बड़ी सर्जरी की जरूरत होती है अन्‍यथा उसके जीवन पर बन आती है।
वैसे कुंडली का अशुभ ‘केतु’ पितृ दोष का सूचक भी होता है, जिसके बहुत गहरे प्रभाव पड़ते हैं। इन प्रभावों का अध्‍ययन और उपचार खुद कांग्रेस ही कर सकती है।
कांग्रेस की दिशा एवं दशा पर गौर करें तो साफ पता लगता है कि उसका केतु काल मनमोहन सरकार के दूसरे टर्म में ही प्रारंभ हो गया था, और 2019 आते-आते उसके प्रभाव स्‍पष्‍ट दिखाई देने लगे थे।
केत छुड़ावै खेत
कहते हैं जब कुंडली में केतु का अंतर आता है तब बड़े परिवर्तन की दरकार होती है। जो इस बात को समझते हुए परिस्‍थितियों के अनुरूप खुद को ढालकर आगे का मार्ग पकड़ लेते हैं वो सफल हो जाते हैं परंतु जो परिवर्तन के लिए तैयार नहीं होते वो उसके दुष्‍परिणाम भोगने को अभिशप्त होते हैं।
2019 के चुनाव परिणाम बताते हैं कि कांग्रेस ने केतु काल के दोष निवारण का कोई प्रबंध नहीं किया। उसने परिस्‍थितिजन्‍य परिवर्तन की बजाय लकीर पीटते रहने का मार्ग चुना, नतीजतन वह आज उस मुकाम पर आकर खड़ी हो गई है जहां महामृत्‍युंजय जैसे मंत्र की आवश्‍यकता है।
राहुल गांधी पलायन के रास्‍ते पर हैं और कांग्रेसी राह भटक रहे हैं, बावजूद इसके कांग्रेस पार्टी है कि समझने को तैयार ही नहीं।
आत्‍मघाती कदम
केतु काल के शुरूआती दौर की बात न भी की जाए तो पिछले दिनों सबसे सीनियर कांग्रेसी नेता जयराम रमेश ने कहा कि केंद्र सरकार के हर कदम को गलत ठहराना आत्‍मघाती साबित हो रहा है। अच्‍छे कार्यों का सकारात्‍मक संदेश देने में कोई हर्ज नहीं है।
उसी समय शशि थरूर ने भी यही कहा कि सरकार के प्रत्‍येक क्रिया-कलाप की सिर्फ और सिर्फ निंदा करना उचित नहीं। जनभावना के अनुरूप कल्‍याणकारी कार्यों के लिए सरकार को प्रोत्‍साहित करना भी विपक्ष की भूमिका का हिस्‍सा है।
कांग्रेस ने अपने इन दोनों नेताओं की सलाह को मानना तो दूर, उन्‍हें परोक्ष और अपरोक्ष रूप से यह बता दिया कि पार्टी के प्रति आपकी निष्‍ठा संदिग्‍ध प्रतीत हो रही है।
दो दिन पहले सलमान खुर्शीद ने एक अंग्रेजी अखबार को दिए अपने इंटरव्‍यू में कहा कि देश का मिज़ाज बदल गया है। देश के सोचने का तरीका बदल चुका है और इस बदले मिज़ाज का पता लगाकर ही समस्या का समाधान निकाला जा सकता है।
सलमान खुर्शीद ने कहा कि देश में और देश की सोच में ऐसे क्या परिवर्तन आए कि हम सिकुड़ कर इतने छोटे हो गए, यह हमें समझना होगा। हमें समझना होगा कि इतने शानदार नेताओं की इतनी शानदार पार्टी का यह हाल क्यों हो गया।
सलमान खुर्शीद के राहुल गांधी पर दिए बयान से कांग्रेस नेता राशिद अल्वी इतने खफा हो गए कि उन्होंने इशारों-इशारों में खुर्शीद को घर (कांग्रेस पार्टी) में आग लगाने वाला और पार्टी का दुश्मन तक बता दिया। बावजूद इसके सलमान खुर्शीद ने राहुल गांधी के अध्यक्ष पद से इस्तीफे पर दिए गए अपने बयान को दोहराते हुए कहा कि ऐसे वक्त में जब देश का मिज़ाज बदल गया है, राहुल का ‘छोड़ जाना’ कांग्रेस के लिए बड़ी मुसीबत है।
सलमान खुर्शीद के सुर में सुर मिलाते हुए पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव ज्योतिरादित्य सिंधिया ने दोहराया कि कांग्रेस को आत्म-अवलोकन की जरूरत है। वर्तमान में कांग्रेस की जो स्थिति है, उसमें आत्‍मचिंतन ही एकमात्र उपचार है। उन्होंने स्‍पष्‍ट कहा कि कांग्रेस फिलहाल महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव में जीत दर्ज नहीं करा पाएगी।
यही बात कांग्रेस के महाराष्‍ट्र में कद्दावर नेता संजय निरुपम ने भी कही। हालांकि उनकी नाराजगी के अन्‍य कारण भी थे।
संजय निरुपम ने तो पार्टी छोड़ने की धमकी देते हुए यहां तक कह दिया कि कांग्रेस में राहुल गांधी के वफादारों को इरादतन निशाना बनाया जा रहा है ताकि उनका राजनीतिक भविष्‍य चौपट किया जा सके।
संजय निरुपम से पहले हरियाणा कांग्रेस के प्रदेश अध्‍यक्ष अशोक तंवर ने अपने पद से इस्‍तीफा देते हुए यही आरोप लगाए थे। उन्‍होंने सीधे सीधे पार्टी हाईकमान यानी सोनिया गांधी पर निशाना साधते हुए कहा कि धीरे-धीरे उन सभी का सफाया करने की साजिश रची जा रही है जो राहुल गांधी की टीम में थे।
अशोक तंवर के अनुसार अभी बहुत सी राजनीतिक हत्याएं होना बाकी है। मैं अकेला नहीं हूं, बहुत लंबी लाइन है।
राशिद अल्‍वी ने संजय निरुपम और अशोक तंवर दोनों पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि कोई महाराष्ट्र से बोल रहा है तो हरियाणा से बोल रहा है। ऐसा लग रहा है कि हमें बाहर के दुश्मनों की जरूरत ही नहीं रह गई है। घर को आग लग गई, घर के ही चिराग से।
राहुल बनाम प्रियंका
कांग्रेस के तमाम नेताओं की बयानबाजी यह इशारा करती है कि कहीं न कहीं पार्टी के अंदर राहुल बनाम प्रियंका चल रहा है।
याद कीजिए कि 2019 के लोकसभा चुनावों से ठीक पहले जब प्रियंका गांधी को अचानक कांग्रेस में बड़ा पद देते हुए बड़ी जिम्‍मेदारी भी सौंपी गई थी तब इसे गेम चेंजर बताया गया था। कोई प्रियंका गांधी वाड्रा में इंदिरा गांधी की छवि देख रहा था तो कोई उन्‍हें कांग्रेस के लिए तारनहार घोषित करने पर आमादा था।
इस सबसे परे पार्टी के कुछ बड़े नेता दीवार पर लिखी उस इबारत को पढ़ पाने में सफल रहे थे, जो राहुल-प्रियंका की कथित जुगलबंदी के पीछे से नजर आ रही थी। ये नेता बहन-भाई के दर्शनीय प्रेम पर संदेह के बादल महसूस कर रहे थे परंतु नतीजों के इंतजार में थे।
नतीजे आए तो बहुत कुछ अपने आप सामने आ गया। अटकलों के दौर व किंतु-परंतु के बीच राहुल गांधी ने अंतत: पलायन का मार्ग चुना जिससे एकबार फिर पार्टी की कमान सोनिया गांधी के हाथों में आ गई।
इधर भाई राहुल गांधी के पलायन से ठीक विपरीत प्रियंका की सक्रियता में इजाफा हो गया। उन्‍होंने न तो राहुल की तरह अपने पद से इस्‍तीफा देने की पेशकश की और न हार के लिए जिम्‍मेदारी ओढ़ी। सोनिया गांधी ने भी एक समय बाद राहुल गांधी को लेकर प्रतिक्रिया देना बंद कर दिया।
जाहिर है कि इतना सबकुछ केवल इत्तिफाकन नहीं हुआ होगा। इसके पीछे कोई योजना जरूर काम कर रही थी। शायद इसी योजना की ओर इशारा करते हुए जहां संजय निरुपम और अशोक तंवर जैसे नेता खुलकर बोल रहे हैं वहीं सलमान खुर्शीद तथा ज्‍योतिरादित्‍य सिधिंया पॉलिश्ड तरीके से बता रहे हैं।
सलमान खुर्शीद और ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया का यह कहना कहां गलत है कि हमें देश का मिज़ाज समझना होगा। हमें आत्‍मचिंतन और आत्‍मावलोकन करना होगा।
सलमान खुर्शीद को संभवत: यह भान भी था कि उनके कहे पर हंगामा होगा और उनकी पार्टी के प्रति निष्‍ठा को लेकर सवाल उठाए जाएंगे, इसीलिए उन्‍होंने लगेहाथ यह कह दिया कि वो कांग्रेस छोड़कर कहीं जाने वाले नहीं हैं। वह कांग्रेसी हैं और कांग्रेसी ही रहेंगे।
किसी के भी दुर्दिनों की एक विशेषता यह होती है कि वह अपने हितैषियों को पहचान नहीं पाता। वह अपने और पराये के भेद को समझने में सक्षम नहीं रहता। इस स्‍थिति‍ को कोई मतिभ्रष्‍ट होना कहता है तो कोई ग्रहों का प्रभाव बताता है।
कांग्रेस के संदर्भ में लक्षण देखकर निष्‍कर्ष निकाला जाए तो दोनों बातें सही प्रतीत होती हैं।
तभी तो यह हाल है कि इस स्‍थिति‍ में जब पार्टी के लिए मृत-संजीवनी कहे जाने वाले महामृत्‍युंजय मंत्र का जाप करने की जरूरत है तब पार्टी के कुछ बड़े नेता तुलसी-गंगाजल हाथ में लेकर खड़े हैं।
उन्‍हें इंतजार है उस आखिरी हिचकी का जिसके बाद तुलसी-गंगाजल डालकर अपना धर्म व कर्म पूरा करते हुए शेष सांसें भी थम जाने की दुहाई दे सकें। बता सकें कि मृत देह से चिपके रहने का कोई औचित्‍य नहीं।
जो भी हो, लेकिन कांग्रेस का यह हाल देश और देशवासी दोनों के लिए नुकसानदेह है।
उस लोकतंत्र के लिए नुकसानदेह है जिसे अब तक कायम रखने के लिए कई बलिदान दिए गए। लोकतंत्र के लिए एक परिपक्‍व व मजबूत विपक्ष का होना अत्‍यन्‍त आवश्‍यक है। परिपक्‍व व मजबूत विपक्ष नहीं रहेगा तो लोकतंत्र पर खतरा मंडराने लगेगा।
कांग्रेस की समस्‍या यह है कि वह विपक्ष की भूमिका स्‍वीकार नहीं कर पा रही। निजी स्‍वार्थों से उठकर वह यह भी नहीं सोच पा रही कि विपक्ष की भूमिका निभाना भी देशहित में उतना ही महत्‍वपूर्ण है जितना सत्ता में रहकर सरकार चलाना।
यदि वह अपनी इस जिम्‍मेदारी का निर्वहन नहीं करती तो देश व देशवासियों की गुनाहगार कही जाएगी। उसका गौरवशाली अतीत इतिहास में दफन हो जाएगा और आने वाली पीढ़ी उसके स्‍वर्णिम काल को भुला बैठेगी।
खतरा यह भी है कि आगे आने वाले समय में उसका उल्‍लेख एक ऐसे गुनाहगार के तौर पर किया जाने लगे जिसने विपक्षी दल का अपना धर्म न निभाकर निजी स्‍वार्थों को तरजीह दी और उसके नेता उन्‍हीं स्‍वार्थों की पूर्ति के लिए परस्‍पर लड़ते रहे।
यदि ऐसा हुआ तो तय जानिए कि ये देश कभी नेहरू-गांधी के इन वारिसों को माफ नहीं करेगा।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

गुरुवार, 21 फ़रवरी 2019

No doubt चौकीदार चोर है, पर…

‘चोर’ के यहां भी ‘चोरी’ हो जाए तो वह सबसे पहले ‘चौकीदार’ की ओर इशारा करता है, यह एक सार्वभौमिक सत्‍य है क्‍योंकि ‘चौकीदार’ पर ‘चोरी’ का ‘इल्‍जाम’ लगाने के अनेक लाभ हैं। सबसे बड़ा लाभ तो यही है कि लोगों के साथ-साथ पुलिस का भी ध्‍यान भटक जाता है।
बहरहाल, बात करें देश के चौकीदार की तो No doubt चौकीदार चोर है।
अरे, जिसने 08 नवंबर 2016 की देर शाम अचानक टीवी पर प्रकट होकर कह दिया कि आज रात 12 बजे से वर्तमान में जारी 1000 और 500 के नोट मात्र एक कागज के टुकड़े बनकर रह जाएंगे, वो चोर नहीं तो और क्‍या है। ये बात अलग है कि उसने वो चोरी इतने कलात्‍मक अंदाज में की कि ‘पेशेवर चोर’ भी हक्‍के-बक्‍के रह गए।
चोर ही क्‍यों, लुटेरे और डकैत तक समझ नहीं पाए कि जिन तिजोरियों को सुबह-शाम धूप-दीप दिखाकर पूजा करते थे और उसमें रखी हजार-पांच सौ की गड्डियों को साक्षात लक्ष्‍मी मानते थे, वो अचानक एक अदद ‘चौकीदार’ के कहने से रद्दी का ढेर कैसे बन सकती हैं।
अब तक किस्‍से-कहानियों में सुना था कि लक्ष्‍मी और सरस्‍वती का बैर होता है, लेकिन यह नहीं सुना था कि सरस्‍वती से प्राप्‍त बुद्धि के बल पर लक्ष्‍मी को रातों-रात किसी ने इतना दीन-हीन बना डाला हो।
चौकीदार न किसी के घर में घुसा, न किसी के यहां छापामारी कराई, न तिजोरियों में भरे नोटों की ओर ताक-झांक की…लेकिन तिजोरी खाली कर दी।
सुना है राजा-महाराजाओं के किसी जमाने में ‘चोरी’ को एक किस्‍म की ‘कला’ का दर्जा हासिल था और चोरों के मुखिया को बाकायदा ‘चौर सम्राट’ कहकर संबोधित किया जाता था।
इस ‘चौकीदार चोर’ ने बिना हाथ लगाए जिस तरह चोरों के बड़े-बड़े गिरोहों को सड़क पर ला खड़ा किया, उसने साबित कर दिया कि चोरी कोई मामूली हुनर नहीं, वाकई एक बड़ी आर्ट है।
परिवार को ही पार्टी समझकर वर्षों से कुनबेभर की तिजोरियां भरने में लगे लोग समझ ही नहीं पाए कि जिससे चौकीदारी कराने के लिए पूर्व की भांति कुछ दिनों के लिए कुर्सी की अदला-बदली की थी, उसकी इतनी हिमाकत कैसे हो गई कि समूचे खजाने में सेंध लगा दी। आंखों से काजल निकाल ले गया और किसी को पता तक नहीं लगा।
माना कि इस दौरान गेहूं के साथ कुछ घुन भी पिस गए, और शायद इसीलिए बुजुर्ग बहुत पहले ही यह कह भी गए थे कि गेहूं के साथ घुनों का पिसना लाजिमी है।
कहावतें बनती ही इसलिए हैं ताकि सनद रहें और वक्‍त जरूरत अपनी सार्थकता सिद्ध करने के काम आएं।
तिजोरियों में रखी करेंसी के रद्दी हो जाने का गम भूल भी जाते यदि चौकीदार वहीं थम जाता। चौकीदार ने तो हद कर दी। वह रुकने का नाम नहीं ले रहा। बिना लगाम के घोड़े की तरह व्‍यवहार कर रहा है। पुराने पापों का हिसाब मांग रहा है।
घूम-घूम कर कह रहा है कि गांधी बाबा के सपनों का भारत बनाकर रहूंगा। देश को अलीबाबा और उसके 40 (बचे-खुचे) चोरों से मुक्‍ति दिलाऊंगा। न खाऊंगा न खाने दूंगा।
गांठिया-पापड़ खाकर गुजारा करने और खिचड़ी को ही छप्‍पनभोग मानने वाला चौकीदार, चोर-लुटेरों की भूख को चुनौती दे रहा है। बड़ी समस्‍या यह और है कि डरता भी नहीं है।
संविधान के खतरे में पड़ने की दुहाई दे ली, असहिष्‍णुता का जहर फैला लिया, सेना पर अटैक कर लिया, ईवीएम और चुनाव आयोग से लेकर सुप्रीम कोर्ट के माननीयों तक को निशाना बना लिया। यहां तक कि ‘सर्जीकल स्‍ट्राइक’ को ‘फर्जीकल स्‍ट्राइक’ बता डाला लेकिन झुकने का नाम नहीं लेता।
राफेल जैसे अत्‍याधुनिक फाइटर प्‍लेन को उड़ाते-उड़ाते हाथ थक गए, उसमें भ्रष्‍टाचार का ढोल पीटते-पीटते मुंह सूख गया किंतु चौकीदार है कि मानता ही नहीं।
संसद में सैकड़ों सांसदों के सामने जादू की झप्‍पी दे दी, उससे भी बात नहीं बनी तो पांच मिनट आंख में आंख डालकर जवाब देने का चैलेंज दे दिया लेकिन चौकीदार कहता है कि गांधी जी का असली चेला हूं। न बुरा देखूंगा, न बुरा सुनूंगा।
किसी ने पूछा इसका क्‍या मतलब हुआ, तो कहने लगा- जाने दीजिए जी…मुंह भी नहीं खोलूंगा अन्‍यथा अनर्थ हो जाएगा।
सिर्फ इतना पूछूंगा कि ”झपकती आंख” की आंख में आंख डाली जा सकती है क्‍या। जो आंख संसद से लेकर सड़क तक मौके-बेमौके झपकती और फड़कती हो, उससे कोई आंख मिला भी कैसे सकता है। आंख मिलाना तो दूर, उससे तो कोई आंख लड़ा भी नहीं सकता।
समाजिक मान्‍यता है आंख मारने और उसका बेमकसद व बेमतलब इस्‍तेमाल करने वाले छिछोरे होते हैं।
आंख मारने का सही वक्‍त पर और सही जगह इस्‍तेमाल किया होता तो साढ़े चार साल में एक राष्‍ट्रीय पार्टी के कम से कम चार अंतर्राष्‍ट्रीय नेता देश के अंदर खेल रहे होते, साथ ही भविष्‍य के अध्‍यक्षों की चिंता भी नहीं रहती। राग दरबारी गाने वालों की न अब कमी है और न तब होती।
किसी से किसी की शक्‍ल और गुण मिलाने की भी जरूरत नहीं पड़ती। चौकीदार के भय ने भविष्‍य के भय का एक भूत और लाकर सिर पर खड़ा करा दिया।
भय के भूत अपने हों या पराए, वो दिमाग पर अटैक तो करते हैं। यह मानना पड़ेगा। दिमाग के चलायमान होने का इससे बड़ा सबूत दूसरा क्‍या होगा है कि चोर बता रहे हैं चौकीदार की नींद उड़ गई है।
किस गधे ने दी थी चौकीदार के गुण-धर्म की जानकारी।
भइया, वो चौकीदार ही क्‍या जिसे नींद आ जाए। चौकीदार का तो काम ही है जागते रहना और जगाते रहना। तभी तो चौकीदार दिन-रात चीख रहा है जागते रहो…। चोरों का बाजार गर्म है। वह न खुद सो रहा है और न जनता को सोने दे रहा है। उसे मालूम है कि सावधानी हटी और दुर्घटना घटी।
चौकीदार की सख्‍त पहरेदारी का ही परिणाम है कि चोरों की नींद हराम है। वह दिन-रात जागकर, झुंड में एकत्र होकर नजरें गड़ाए हुए हैं कि ये चौकीदार सोता क्‍यों नहीं। आखिर कब सोएगा यह चौकीदार। न सोए तो कम से कम झपकी ही ले ले।
वैसे भी जिसकी खुद की नींद हराम होगी, वही तो बता सकेगा कि कौन क्‍या कर रहा है। देखा जाए तो चोरों ने यह बताकर कि चौकीदार की नींद हराम है, यह साबित कर दिया कि जो भी हो लेकिन इतना जरूर है कि चौकीदार सो नहीं रहा। चौकीदार ने अपनी नींद हराम करके चोरों की नींद उड़ा दी है। बिना ऐसा किए हुए चोरों की नींद उड़ाई भी नहीं जा सकती।
इसीलिए कहता हूं कि No doubt चौकीदार चोर है। उसने पहले तिजोरियों के अंदर पड़े हजार-पांच सौ के बंडल चुराए, फिर चैन चुराया, चैन चोरी हुआ तो दिमाग पर ग्रहण लगा, और अब दिल की बारी है। कार्डियक अरेस्ट का नाम तो सुना ही होगा। पता नहीं, कब किसको गिरफ्त में ले ले। चौकीदार झपकती आंख का काजल चोरी कर ले जाए और रोने को आंसू भी न छोड़े तो दिल को चोट लगना स्‍वाभाविक है। जिसका सबकुछ छिन जाए और रह जाए सिर्फ झपकने को एक आंख, उसका दुख वही जानता है लेकिन चौकीदार कह रहा है- अभी तो 2019 की कहानी बाकी है मेरे दोस्‍त।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
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