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रविवार, 17 अक्टूबर 2021

मथुरा-वृंदावन सीट पर इस बार वैश्‍य समाज भी करेगा बड़ी दावेदारी, कई लोग लाइन में


 उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनावों की विधिवत घोषणा भले ही अभी नहीं हुई है किंतु राजनीति की बिसात पर मोहरे बिछाने का खेल पूरी तरह शुरू हो चुका है।

महाभारत नायक योगीराज भगवान श्रीकृष्‍ण की जन्‍मस्‍थली होने के कारण धार्मिक दृष्‍टि से मथुरा जिले का विश्‍वभर में अपना एक विशिष्‍ट स्‍थान तो है ही, लेकिन राजनीति के क्षेत्र में भी यह जिला कम महत्‍व नहीं रखता।
यही कारण है कि 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने सिने अभिनेत्री हेमा मालिनी को मथुरा से चुनाव लड़वाया क्‍योंकि किसी भी कीमत पर वह इस सीट को खोना नहीं चाहती थी।
इसी प्रकार 2017 में अखिलेश यादव को यूपी की सत्ता से बेदखल करने के लिए भाजपा ने बहुत सोच-समझकर उम्‍मीदवारों का चयन किया।
अगर बात करें मथुरा जनपद की तो यहां की सर्वाधिक प्रतिष्‍ठित और भाजपा को पिछले कई चुनावों से लगातार हार का मुंह दिखाने वाली मथुरा-वृंदावन विधानसभा सीट पर पार्टी प्रवक्‍ता श्रीकांत शर्मा को उतारा गया।
भाजपा का यह दांव सफल भी रहा और अपराजेय समझे जाने वाले कांग्रेस प्रत्‍याशी प्रदीप माथुर पहली बार चुनाव हार गए, जबकि प्रदीप माथुर ने कांग्रेस के बुरे दिनों में भी इस सीट पर जीत का परचम लहराया था।
श्रीकांत शर्मा शहरी सीट पर चुनाव जीते तो उन्‍हें उनके कद के मुताबिक योगी सरकार ने ऊर्जा जैसे अहम विभाग का मंत्री बनाया। ऊर्जा मंत्री के तौर पर श्रीकांत शर्मा ने अपने क्षेत्र की जनता को बेशक निराश नहीं किया और बिजली की बदहाल व्‍यवस्‍था को न सिर्फ पटरी पर लाए बल्‍कि भविष्‍य के लिए भी कई योजनाओं की नींव रखी।
इस सब के बावजूद श्रीकांत शर्मा एक ओर जहां मथुरा-वृंदावन की जनता से सामंजस्‍य बैठाने में असफल रहे वहीं दूसरी ओर पार्टीजनों के बीच भी अपनी छवि बरकरार नहीं रख सके लिहाजा धीरे-धीरे पार्टी कार्यकर्ता उनसे दूर होते गए।
स्‍थिति‍ यहां तक जा पहुंची कि इसी साल जनवरी माह में 4 दिवसीय प्रवास पर वृंदावन आए संघ प्रमुख मोहन भागवत को मथुरा की 3 सीटों पर प्रत्‍याशी बदलने की सलाह देनी पड़ी।
बताया जाता है कि इन 3 सीटों में मथुरा-वृंदावन विधानसभा क्षेत्र की सीट भी शामिल है क्‍योंकि संघ प्रमुख को अपने सूत्रों से ऐसा ही फीडबैक मिला था। संघ को मिले फीडबैक के मुताबिक पार्टी को स्‍थानीय स्‍तर पर कई-कई गुटों में बांट देने का काम भी श्रीकांत शर्मा ने बखूबी पूरा किया है। ऐसे में यदि इन्‍हें एक मौका और दिया गया तो कोई आश्‍चर्य नहीं कि भाजपा की मथुरा इकाई 2022 के चुनाव में हाथ झटक कर खड़ी हो जाए।
संघ प्रमुख की सलाह और स्‍थिति‍-परिस्‍थ‍ित‍ियों के मद्देनजर 2022 के लिए मथुरा-वृंदावन विधानसभा सीट पर वैश्‍य समाज बड़ी दावेदारी जताने का मन बना चुका है।
पार्टी के ही सूत्र बताते हैं कि इस समाज के कई प्रभावशाली लोगों ने इसके लिए अपनी-अपनी बिसात बिछानी शुरू कर दी है और उन लोगों तक बात पहुंचाई जाने लगी है जिनकी टिकट वितरण में बड़ी भूमिका होगी।
सूत्रों की मानें तो वैश्‍य समुदाय के लोगों ने पार्टी हाईकमान तक इस आशय का भी संदेश भेजा है कि मथुरा जिले की 5 विधानसभा सीटों में से अनारक्षित 4 सीटों पर किसी वैश्‍य प्रत्‍याशी की दावेदारी नहीं है, किंतु इस समुदाय का उम्‍मीदवार मथुरा-वृंदावन सीट निकालने का माद्दा रखता है इसलिए इसे लेकर विचार किया जाए।
इसके अलावा यह भी माना जा रहा है कि मथुरा-वृंदावन सीट पर एकबार फिर डॉ. अशोक अग्रवाल अपना भाग्‍य आजमाने जा रहे हैं इसलिए उनकी काट के लिए किसी वैश्‍य को मैदान में उतारना मुफीद होगा।
गौरतलब है कि 2022 के चुनावों में चूंकि समाजवादी पार्टी और राष्‍ट्रीय लोकदल मिलकर चुनाव लड़ने जा रहे हैं इसलिए डॉ. अशोक अग्रवाल इस गठबंधन के संयुक्‍त प्रत्‍याशी हो सकते हैं।
वैश्‍य समुदाय के सूत्र बताते हैं कि मथुरा-वृंदावन सीट पर टिकट की दावेदारी के लिए समाज की ओर से चार लोग प्रयासरत हैं और उनमें से दो लोग आरएसएस के माध्‍यम से अपना नाम आगे बढ़ा रहे हैं।
अब देखना यह होगा कि क्या भाजपा हाईकमान इस सीट को लेकर मिली संघ की सलाह को अहमियत देगा, और क्या वाकई श्रीकांत शर्मा के प्रति नाराजगी का फीडबैक काम करेगा, क्‍योंकि भाजपा भी अब अपने पत्ते फेंटने में इतनी माहिर हो चुकी है कि आसानी से उसे ऐसी हर बात हजम नहीं होती।
जो भी हो, लेकिन इतना तय है कि श्रीकांत शर्मा को 2022 का चुनाव लड़ने से पहले पार्टी के अंदर ही उन लोगों से लड़ना होगा जो उनकी स्‍वाभाविक दावेदारी को खुली चुनौती देने की पूरी तैयारी कर चुके हैं और इसके लिए तुरुप का इक्‍का इस्‍तेमाल करने से चूकना नहीं चाहते।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी 

बुधवार, 30 जून 2021

UP चुनाव: खुद पैरों पर कुल्‍हाड़ी मार रहे हैं श्रीकांत शर्मा, या बिजली अधिकारियों ने ले ली है उन्‍हें हराने की ‘सुपारी



 

उत्तर प्रदेश के कद्दावर भाजपा नेताओं में शुमार और ऊर्जा जैसे महत्‍वपूर्ण विभाग के मंत्री तथा मथुरा की शहरी सीट के विधायक श्रीकांत शर्मा खुद अपने पैरों पर कुल्‍हाड़ी मार रहे हैं या फिर बिजली अधिकारियों ने उन्‍हें चुनाव हराने की ‘सुपारी’ ले रखी है?

अब जबकि UP के विधानसभा चुनाव होने में चंद महीने ही बचे हैं, तो ये सवाल इसलिए प्रासांगिक हो जाता है क्‍योंकि कुछ समय से न सिर्फ ऊर्जा मंत्री का समूचा गृह जनपद बल्‍कि उनका चुनाव क्षेत्र मथुरा-वृंदावन भी बिजली की भारी मार से त्रस्‍त है।
मथुरा को पूरी तरह विद्युत कटौती से मुक्‍त रखे जाने का दावा करने वाले ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा के विभागीय अधिकारियों का बचकाना बयान कहता है कि कोरोना के कारण लाइनें दुरुस्‍त करने का काम देरी से शुरू हुआ इसलिए ये समस्‍या आ रही है। वो ये भी कहते हैं कि शहरी क्षेत्र की विद्युत आपूर्ति में कोई समस्‍या नहीं है क्‍योंकि शहर के अधिकांश इलाकों को अंडरग्राउंड केबिल से जोड़ा जा चुका है। जो थोड़ी-बहुत परेशानी है, वो ग्रामीण क्षेत्रों में हो सकती है। यानी उन्‍हें मालूम ही नहीं है कि परेशानी है या नहीं।
अधीक्षण अभियंता प्रभाकर पांडे तो यहां तक बताते हैं कि अधिकांश लाइनें ठीक हैं, कुछ को ठीक करने का काम चल रहा है इसलिए जल्‍द समूची व्‍यवस्‍था में सुधार हो जाएगा।
अब जानिए ऊर्जा मंत्री के चुनाव क्षेत्र मथुरा-वृंदावन का हाल
पिछले करीब 15 दिनों में कल पांचवीं बार वृंदावन से आने वाली लाइन में फॉल्‍ट के कारण शहर का एक बड़ा हिस्‍सा बिजली से महरूम रहा। रात दस बजे बंद हुई लाइट आधी रात के बाद दो बजे सुचारू हो सकी। इससे पहले एक दिन 8 घंटे, एक दिन 6 घंटे तो दो दिन 5-5 घंटे के लिए लाइट बंद रही।
पूर्व में घंटों लाइट जाने का कारण जहां आंधी या बारिश बताया गया वहीं कल ऐसा बिना वजह तार टूट जाने से हुआ।
ग्राउंड पर काम करने वाले कर्मचारियों से पूछने पर पता लगता है कि राधापुरम, राधापुरम एस्‍टेट सहित छोटी-बड़ी एक दर्जन कॉलोनियों का लोड वृंदावन से आने वाली जिस लाइन पर डाल रखा है वह जर्जर अवस्‍था को प्राप्‍त है।
इस लाइन में जगह-जगह जोड़ हैं इसलिए मामूली सी हवा चलने अथवा आकाश से दो बूदें बरस जाने पर ही वो दिक्‍कत देने लगती है।
चूंकि विभागीय कर्मचारियों को यही पता नहीं होता कि वृंदावन से मथुरा तक दसियों किलोमीटर के बीच फॉल्‍ट कहां आया है इसलिए वो पहले तो घंटों पेट्रोलिंग करके फॉल्‍ट का पता लगाते हैं। उसके बाद कहीं जाकर काम किया जाता है, लेकिन तब तक सब स्‍टेशन पर बैठे लोगों की जान सूखती रहती है।
दरअसल, पेट्रोलिंग करने वाले कर्मचारी फॉल्‍ट न मिल जाने तक कुछ बताने की स्‍थिति में नहीं होते इसलिए वो संबंधित सब स्‍टेशन को ऐसी कोई जानकारी देने में असमर्थ होते हैं कि आपूर्ति सुनिश्‍चित होने में कितना वक्‍त लगेगा।
उधर सब स्‍टेशन पर बैठे एसएसओ से हर उपभोक्‍ता यह जानना चाहता है कि लाइट कब तक आएगी। ऐसे में वह अपने बुद्धि विवेक से जो बता सकता है वो बता तो देता है, किंतु सच्‍चाई नहीं बता पाता इसलिए समय के साथ उपभोक्‍ताओं का आक्रोश बढ़ना स्‍वभाविक है।
भीषण गर्मी के इस दौर में सब स्‍टेशन से ये तक जानकारी न मिल पाना कि बिजली क्‍यों गई है और कब तब आ पाएगी, आग में घी डालने की कहावत को कब सही साबित कर दे कहना मुश्‍किल है। लेकिन आला अधिकारियों का शायद इससे कोई वास्‍ता नहीं है। उन्‍हें वास्‍ता है तो अपनी ऐशो-आराम की नौकरी से, जिसे कैसे बजाना है वो भली प्रकार जानते हैं।
अगर कभी इन कारणों से झगड़ा होता भी है तो वो छोटे कर्मचारियों और उपभोक्‍ताओं को मोहरा बनाकर साफ बच निकलने की कला में माहिर हैं इसलिए उनका कभी कुछ बिगड़ने से रहा।
इसका एक उदाहरण गत 24 जून को तब मिला जब घंटों परेशान होने के बाद एक उपभोक्‍ता ने अधीक्षण अभियंता शहरी के सरकारी मोबाइल नंबर पर कॉल करके बिजली की स्‍थिति के बारे में जानकारी चाही। जाहिर है कि फोन उठा नहीं। फिर उपभोक्‍ता ने उन्‍हें वाट्सएप पर मैसेज भेजा, एसई महोदय ने मैसेज पढ़ भी लिया किंतु जवाब देना जरूरी नहीं समझा।


कड़वा सच यही है कि संबंधित जेई से लेकर एसई तक कोई किसी उपभोक्‍ता के फोन अथवा मैसेज का जवाब नहीं देता क्‍योंकि वो उनके लिए अहमियत रखते ही नहीं।
जिन दर्जनभर पॉश कॉलोनियों को वृंदावन से बिजली की आपूर्ति की जा रही है उन्‍हें विभाग ग्रामीण क्षेत्र मानता है या शहरी, इसका भी पता नहीं जबकि ये सर्वाधिक और समय से रेवेन्‍यू देने वाली कॉलोनियां हैं और यहां शत-प्रतिशत घरों में स्‍मार्ट मीटर लगाए जा चुके हैं इसलिए इन मीटरों की कमांड भी इलाके के एसडीओ संभालते हैं।
किसकी लाइट कब और कितना बिल बकाया होने पर गोल करनी है, ये वही तय करते हैं। इसके लिए अब विभाग के किसी कर्मचारी को उपभोक्‍ता के दरवाजे पर जाने या उसकी केबिल उतारने की जरूरत नहीं रह गई।
अधिकारियों द्वारा उपभोक्‍ताओं को कोई अहमियत न देने और सब स्‍टेशन पर बैठे कर्मचारियों को उनसे जूझने के लिए छोड़ देने का संभवत: एक बड़ा कारण ये भी हो सकता है, हालांकि ये एकमात्र कारण नहीं है।
स्‍थानीय जनप्रतिनिधि के तौर पर ऊर्जा मंत्री कितने जिम्‍मेदार
अगर बात करें स्‍थानीय जनप्रतिनिधि या ऊर्जा मंत्री के तौर पर श्रीकांत शर्मा द्वारा जिम्‍मेदारी निभाने की तो वो अपने किसी मतदाता अथवा आम उपभोक्‍ता के लिए कभी उपलब्‍ध नहीं होते। उनकी जगह ये जिम्‍मेदारी उनके बड़े भाई सूर्यकांत शर्मा पहले दिन से निभा रहे हैं।
अब उनकी बात अधिकारी कितनी सुनते हैं और कितनी मानते हैं, इसका अंदाज लगाने को बिजली की वह व्‍यवस्‍था ही काफी है जिसका जिक्र ऊपर किया गया है। बताया जाता है सूर्यकांत शर्मा ने व्‍यवस्‍था सुधारने के अपने स्‍तर से भरसक प्रयत्‍न किए परंतु फिलहाल नतीजा कुछ नहीं निकला।
अलबत्ता बताते हैं कि ऊर्जा मंत्री अपने कुछ खास लोगों से बंद कमरों में समय-समय पर जरूर मिलते हैं लेकिन उनसे क्‍या गुफ्तगू होती है, वो भी बाहर नहीं आ पाती।
भाजपा में भी ऊर्जा मंत्री के कार्य और व्‍यवहार की चर्चा
शायद यही कारण है कि जैसे-जैसे चुनावों की चर्चा शुरू हो रही है वैसे-वैसे आम लोगों के साथ-साथ भाजपा से जुड़े लोगों में भी श्रीकांत शर्मा के कार्य तथा व्‍यवहार की चर्चा होने लगी है।
उत्तर प्रदेश में योगी आदित्‍यनाथ के नेतृत्‍व वाली सरकार सत्ता पर दोबारा काबिज होने का ही नहीं, 350 सीटें जीतने का भी लक्ष्‍य लेकर चल रही है।
चार दिन पहले 25 जून को बांके बिहारी मंदिर के दर्शनार्थ वृंदावन आए प्रदेश के कबीना मंत्री सतीश महाना ने कहा था कि जिन मुद्दों पर हम चुनाव में जनता के बीच दोबारा जाएंगे उनमें चौबीसों घंटे बिजली की आपूर्ति भी अहम मुद्दा है। सतीश महाना शायद नहीं जानते कि यहां तो दीया तले अंधेरा है।
ऊर्जा मंत्री का गृह जनपद ही नहीं, उनका चुनाव क्षेत्र भी जब आए दिन चार-चार से लेकर आठ-आठ घंटों तक बिजली के लिए तरसने को अभिशप्‍त है तो फिर प्रदेश में बेहतर बिजली व्‍यवस्‍था के नाम पर चुनाव में उतरना क्‍या गुल खिलाएगा, इसका अंदाज लगाना बहुत मुश्‍किल काम नहीं होगा।
प्रदेश की बात छोड़ भी दें तो प्रश्‍न यह है कि अपना पहला विधानसभा चुनाव बड़े अंतर से जीतने वाले श्रीकांत शर्मा इन हालातों में क्‍या इस बार जीत दर्ज करा सकेंगे।
कहीं ऐसा तो नहीं कि स्‍थानीय बिजली अधिकारियों के खोखले दावों पर भरोसा करके वो खुद अपने पैरों पर कुल्‍हाड़ी चला रहे हैं या फिर अधिकारियों ने ही उन्‍हें गुमराह करके चुनाव हराने की ‘सुपारी’ ले रखी है?
अभी भी वक्‍त है कि श्रीकांत शर्मा और उनके शुभचिंतक यह तय कर लें कि उन्‍हें बिजली की अव्‍यवस्‍था से त्रस्‍त जनता के कथन पर भरोसा करना है अथवा उन अधिकारियों के झूठे दावों पर जो उन्‍हें चुनाव हराने का मुकम्‍मल बंदोबस्‍त कर चुके हैं क्‍योंकि अभी तो गर्मी भी शेष हैं और बारिश भी।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

रविवार, 24 जनवरी 2021

उत्तर प्रदेश में अधिकारियों के लिए अगर कहीं स्‍वर्ग है तो वह यहीं है… यहीं है… यहीं है

 प्रशासनिक आधार पर 18 मंडलों वाले उत्तर प्रदेश में यूं तो 75 जिले हैं किंतु ऐसे जिलों की संख्‍या बहुत कम है, जो अधिकारियों को मुफीद बैठते हैं।

ऐसे जिलों में कृष्‍ण की जन्‍मस्‍थली का गौरव प्राप्‍त ‘मथुरा’ का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है।

वैकुण्‍ठ से भी श्रेष्‍ठ और तीन लोक से न्‍यारी नगरी की उपमा प्राप्‍त मथुरा को उन सप्‍तपुरियों में भी शुमार किया जाता है जिन्‍हें मोक्षदायिनी माना गया है।
एक ओर हरियाणा तथा दूसरी ओर राजस्‍थान की सीमा से सटे इस विश्‍व प्रसिद्ध धार्मिक स्‍थल की एक विशेषता यहां से राष्‍ट्रीय राजधानी दिल्‍ली का अत्‍यधिक नजदीक होना भी है।
कभी लखनऊ के लिए किसी सीधे रास्‍ते को तरसने वाले इस जनपद से आज प्रदेश की राजधानी तक मात्र पांच घंटों के अंदर पहुंचा जा सकता है।
अधिकारियों के लिए सर्वाधिक मुफीद क्‍यों?
इन सब सुविधाओं के बावजूद मथुरा में ऐसा कुछ अतिरिक्‍त भी है जो पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को इतना अधिक प्रिय है कि वो न सिर्फ यहां लंबी से लंबी पोस्‍टिंग चाहते हैं बल्‍कि बार-बार यहीं पोस्‍टिंग कराना चाहते हैं।
क्‍या है ऐसा?
इस सवाल पर थोड़ी गंभीरता से गौर किया जाए तो स्‍थिति आसानी से स्‍पष्‍ट हो जाती है।
उदाहरण के लिए मथुरा का आम नागरिक शांतिप्रिय है और चैन से जिंदगी गुजारने में यकीन रखता है। टकराव का रास्‍ता चुनना उसे पसंद नहीं है और उसकी यह आदतें अधिकारियों का काम काफी आसान बना देती हैं।
आम मथुरावासी की इन आदतों के कारण ‘सुविधा शुल्‍क’ सर्वसुलभ है क्‍योंकि अमन पसंद स्‍थानीय नागरिक अधिकारियों को दाम देकर काम कराने में अधिक रुचि लेता है अपेक्षाकृत अन्‍य तरीकों के।
अधिकारियों के काम में दखल ‘ना’ के बराबर
शासन में मथुरा का प्रतिनिधित्व हमेशा बने रहने तथा सत्ता के गलियारों से बराबर आमदरफ्त होते हुए भी यह एक ऐसा जिला है जिसके बाबत यह कहा जा सकता है कि यहां कोई नेता ही नहीं है। नेताओं के नाम पर कुछ है तो चापलूसों की फौज, दलालों का जमघट और बिना रीढ़ वाले वो जंतु जिन्‍हें साष्‍टांग करने में महारत हासिल है।
सरकार चाहे सपा की रही हो या बसपा की, गठबंधन से चल रही हो अथवा पूर्ण बहुमत से लेकिन मथुरा को हमेशा तरजीह दी गई।
मथुरा के लोगों ने वो दौर भी देखा है जब यहां के कुल जमा पांच में से चार विधायक मंत्री हुआ करते थे किंतु तब भी इस जिले में तूती बोलती थी तो सिर्फ अधिकारियों की। मंत्री रहते हुए अधिकारियों के सामने मिमियाने वाले नेता यहां हर दौर में पाये जाते रहे हैं।
इसका ज्वलंत उदाहरण है हाल ही में घटी वो घटना जब प्रदेश के कद्दावर मंत्री, सरकार के प्रवक्‍ता और मथुरा-वृंदावन सीट से विधायक श्रीकांत शर्मा को स्‍थानीय अधिकारियों के खिलाफ सीधे मुख्‍यमंत्री के नाम इसलिए पत्र लिखना पड़ा क्‍योंकि प्रस्‍तावित कुंभ मेले के इंतजामों को वो उनके कहने से तरजीह नहीं दे रहे थे।
हुआ भी वही, मुख्‍यमंत्री तक शिकायत पहुंचने के बाद ही कुंभ मेले से जुड़े अधिकारियों ने सक्रियता दिखाई अन्‍यथा न तो उनके ऊपर ऊर्जा मंत्री का भारी भरकम पद कोई प्रभाव डाल पा रहा था और न संत-महंतों की नाराजगी कोई असर छोड़ रही थी।
हर जिले में अधिकारियों को उनकी जिम्‍मेदारी का अहसास कराने वाला दूसरा सर्वाधिक प्रभावशाली तबका होता है ‘पत्रकारों’ का, किंतु बात करें कृष्‍ण नगरी की तो यहां ‘पत्रकारों’ की संख्‍या भले ही सैकड़ों में हो परंतु ‘पत्रकारिता’ करने वाले ढूंढे नहीं मिलते।
नेता नगरी से कदम-ताल मिलाते हुए अधिकांश पत्रकार अधिकारियों की जी-हजूरी में अपना समय जाया करना अधिक उपयुक्‍त समझते हैं क्‍योंकि किसी एक अधिकारी की कृपा भी उनके लिए पर्याप्‍त होती है।
अधिकारी के कृपा पात्र बनते ही उनकी आर्थिक एवं सामाजिक दरिद्रता तो दूर होने ही लगती है, साथ ही घर-परिवार व नाते रिश्‍तेदारों में रुतबा भी बढ़ जाता है।
सुबह से शाम तक कलेक्‍ट्रेट के इर्द-गिर्द घूमने वाले तथाकथित पत्रकारों की एक जमात को तो इसलिए भी अधिकारियों का वरदहस्‍त जरूरी होता है क्‍योंकि उसके बिना उनके गोरखधंधे बंद हो जाएंगे और वो कानून के शिकंजे में इस कदर फंसेंगे कि लंबे समय तक उससे बाहर आना संभव नहीं होगा।
पत्रकारों का ये वर्ग अधिकारियों की जी-हजूरी में इतना मुस्‍तैद रहता है कि उनके निजी शौक और ऐब भी पूरे कराने में परहेज नहीं करता।
लोकतंत्र के चौथे खंभे को इस स्‍थिति में देख किसी को भी पत्रकारों और पत्रकारिता से भी घृणा हो सकती है लेकिन इन कथित पत्रकारों को खुद से कभी घृणा नहीं होती इसलिए वो पूरी शिद्दत के साथ हमेशा अधिकारियों के सामने दुम हिलाते देखे जा सकते हैं।
पत्रकारों की यही वो श्रेणी है जिनके बल पर पत्रकारों को कई-कई गुटों में बांटकर अधिकारी अपना उल्‍लू सीधा करते रहते हैं। अधिकारियों द्वारा डाले हुए टुकड़ों पर जीविका और जिजीविषा पाने वाले ये तत्‍व उनके साथ एक अदद फोटो खिंचवाने तक को लालायित रहते हैं और ‘पत्रकारिता दिवस’ पर भी आयोजन-प्रायोजनों के जरिए उन्‍हें सम्‍मानित करने का मौका नहीं चूकते।
घोर आश्‍चर्य की बात तो यह है कि इतना सब करने के बाद भी बमुश्‍किल वह मात्र उतना ही हासिल कर पाते हैं जितना कि कोई नेता अपने चमचों को सुबह-शाम बख़्शीश में दिलवा देता है।
नेता और पत्रकारों के अलावा हर जिले में एक तीसरा वर्ग भी होता है जो अधिकारियों की कार्यप्रणाली को ऑब्जर्व करता है। सामाजिक संगठनों के रूप में सक्रिय यह वर्ग चूंकि सुविधा संपन्‍न पाया जाता है इसलिए इसकी समाज में महत्ता बड़ी होती है।
महाभारत नायक योगीराज श्रीकृष्‍ण की पावन जन्‍मस्‍थली में भी ऐसे संगठन तो बहुत पाए जाते हैं लेकिन वो भी नेता और पत्रकारों की तरह चापलूसी के माध्‍यम से अपनी दुकान चलाने में माहिर हैं।
इस तबके के लोगों का भी कार्य नेता और पत्रकारों की भांति किसी न किसी तरह अधिकारियों का सानिध्‍य पाना और इसके लिए हद से भी गुजर जाना है।
इस वर्ग के लोगों से जुड़ा यह कड़वा सच जानकर कोई भी हैरान हुए बिना नहीं रह सकता कि ये वर्ग अधिकारियों को खुश करने के लिए थ्री डब्‍ल्‍यू यानी वाइन, वेल्‍थ और यहां तक कि वुमैन का इंतजाम करने से भी पीछे नहीं हटता।
यही कारण है कि विश्‍व प्रसिद्ध इस धार्मिक जनपद में एकबार पोस्‍टिंग पा जाने वाला अधिकारी एक ओर जहां बार-बार यहां पोस्‍टिंग पाने की कोशिश में लगा रहता है वहीं दूसरी ओर यहां से चले जाने अथवा नौकरी से अवकाश प्राप्‍ति के बाद भी किसी ने किसी रूप में यहीं मंडराता रहता है। वर्तमान में भी कई अधिकारी इसकी जीती जागती नजीर हैं लेकिन क्‍या मजाल कि कोई उनके ऊपर उंगली भी उठा सके।
भांग, भोजन तथा भजन के लिए विश्‍व के पटल पर विशिष्‍ट पहचान रखने वाली मथुरा नगरी ने ऐसे कई अधिकारी देखे हैं जिन्‍होंने यहां की एक अदद पोस्‍टिंग से अपनी तीन-तीन पीढ़ियों का मुकम्‍मल इंतजाम कर लिया लेकिन उनका बाल तक बांका नहीं हो सका।
ऐसे-ऐसे नेता उसके सामने हैं जो कुछ वर्षों पहले तक लंबे-लंबे कुर्ते पहनकर कचहरी पर दिन-रात छोटे-मोटे कामों के लिए चक्‍कर लगाते थे लेकिन आज करोड़ों नहीं अरबों की संपत्ति के मालिक हैं। शहर के तमाम व्‍यवसायी उनके द्वारा किए गए पैसे के निवेश से अपनी शानो-शौकत बनाए हुए हैं।
जिनकी औकात एक दुपहिया खरीदने की नहीं हुआ करती थी और कचहरी तक जाने के लिए भी किसी से लिफ्ट पाने का मौका तलाशले थे आज उनके गुर्गे कई-कई लग्‍जरी गाड़ियों के मालिक हैं।
अधिकारियों और नेताओं के इस वर्ग की अंधी कमाई से बहुत से मशहूर शिक्षण संस्‍थान संचालित हो रहे हैं और भूमाफिया बेनामी संपत्ति एकत्र कर रहे हैं।
पत्रकारों का एक खास वर्ग भी अपनी औकात से अधिक धन अर्जित करके इनके संरक्षण में ही अपनी सुरक्षा देखता है इसलिए उन्‍हें उपकृत करने का कोई अवसर हाथ से निकलने नहीं देता।
‘अंधे पीसें कुत्ते खाएं’ की कहावत को चरितार्थ करने के कारण ही मथुरा आज तक अधिकारियों के लिए दुधारू गाय साबित होता रहा है और उस गरिमामय मुकाम को हासिल करने के लिए तरस रहा है जिसका वह सही मायनों में हकदार है।
बात चाहे कालिंदी के कलुष की हो या निरंकुश अधिकारियों की, भ्रष्‍टाचार की हो या बदहाली की। कृष्‍ण की नगरी हर मामले में अपनी कलंक कथा खुद कहती है, लेकिन सुनने और देखने वाला कोई नहीं। सुनेगा और देखेगा भी कैसे, जब जिम्‍मेदार वर्ग ही आंख, कान व मुंह बंद करके बैठा होगा।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी 

रविवार, 22 नवंबर 2020

बड़ा सवाल: ऊर्जा मंत्री की अधिकारियों पर ‘चल’ नहीं रही, या वो पब्‍लिक को ‘चला’ रहे हैं?


 बीजेपी के कद्दावर नेताओं में शामिल प्रदेश के ऊर्जा मंत्री और योगी सरकार के प्रवक्‍ता श्रीकांत शर्मा की अब अधिकारियों पर ‘चल’ नहीं रही या वो ऐसा दिखाकर पब्‍लिक को ‘चला’ रहे हैं?

यह सवाल 17 नवंबर को ‘दैनिक हिन्‍दुस्‍तान’ के आगरा संस्‍करण में छपी उस खबर के बाद पूछा जा रहा है जिसके अनुसार ऊर्जा मंत्री श्रीकांत ने वृंदावन कुंभ मेले की तैयारियों को लेकर स्‍थानीय प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा बरती जा रही ढील पर नाराजगी जताते हुए मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ को एक पत्र लिखा है और इस संबंध में उनसे अनुरोध किया है कि वह अधिकारियों को निर्देशित करें।
अखबार के पृष्‍ठ 3 पर छपी इस खबर के मुताबिक 16 फरवरी 2021 से 28 मार्च 2021 तक 41 दिन वृंदावन में यमुना किनारे चलने वाले इस कुंभ मेले की अब तक कोई भौतिक प्रगति नहीं है जिस कारण साधु-संतों सहित स्‍थानीय जनमानस निराश व आक्रोशित है।
खबर के अनुसार ऊर्जा मंत्री ने मुख्‍यमंत्री को भेजे पत्र में लिखा है कि जिला प्रशासन, ब्रज तीर्थ विकास परिषद के मुख्‍य कार्यपालक अधिकारी तथा अन्‍य एजेंसियों को परस्‍पर समन्‍वय स्‍थापित कर कुंभ मेले को भव्‍य बनाने और समय से कार्य पूर्ण कराने के लिए आदेशित किया जाए।
17 नवंबर को छपी इस खबर के बाद ‘दैनिक हिन्‍दुस्‍तान’ में ही आज यानी 19 नवंबर के दिन एक और खबर छपी है जिसके मुताबिक ब्रज तीर्थ विकास परिषद के सीईओ एवं कुंभ मेला अधिकारी तथा मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के उपाध्‍यक्ष नागेन्‍द्र प्रताप यादव ने बीते कल (बुधवार) को मेला स्‍थल का निरीक्षण किया।
इस दौरान उन्‍होंने जल निगम एवं नगर निगम के अधिकारियों को कुंभ मेला शुरू होने से पहले सभी व्‍यवस्‍थाएं पूरी करने के निर्देश देते हुए मेला क्षेत्र में सीवर का पानी फिर से भर दिए जाने पर नाराजगी जताई।
इसके अलावा मेला अधिकारी नागेन्‍द्र प्रताप यादव ने संबंधित अधिकारियों को पत्र लिखकर यमुना के दोनों ओर अतिक्रमण हटवाने तथा पार्किंग के लिए जमीन का चयन करने को भी कहा है।
नागेन्‍द्र प्रताप ने यह निरीक्षण कार्य ऊर्जा मंत्री द्वारा सीएम योगी को पत्र लिखने के बाद ही क्‍यों किया, यह तो वही जानते होंगे अलबत्ता नेता नगरी में चर्चाएं अच्‍छी-खासी हैं।
गौरतलब है कि नागेन्‍द्र प्रताप यादव एक ओर जहां मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के उपाध्‍यक्ष और ब्रज तीर्थ विकास प्ररिषद के सीईओ हैं वहीं दूसरी ओर ‘उज्‍जवल ब्रज’ नामक संस्‍था से भी जुड़े हैं जो ब्रज के विकास हेतु पंजीकृत कराई गई है।
कुल मिलाकर पहले से तीन-तीन बड़ी जिम्‍मेदारियां निभाते चले आ रहे नागेन्‍द्र प्रताप पर वृंदावन कुंभ मेला अधिकारी की भी अतिरिक्‍त जिम्‍मेदारी है।
बहरहाल, ऊर्जा मंत्री और योगी सरकार के प्रवक्‍ता श्रीकांत शर्मा का कुंभ मेले की तैयारियों में ढील बरतने पर स्‍थानीय प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ सीधे मुख्‍यमंत्री को शिकायती पत्र लिखना बहुत कुछ कहता है, वो भी तब जबकि 2022 में यूपी विधानसभा के चुनाव प्रस्‍तावित हैं।
मथुरा की जिस विधानसभा सीट से कांग्रेस के लगातार 15 साल विधायक रहे प्रदीप माथुर को हराकर श्रीकांत शर्मा सन् 2017 में भाजपा की टिकट पर विधायक निर्वावित हुए हैं, वह मथुरा-वृंदावन विधानसभा सीट ही है।
कस्‍बा गोवर्धन के मूल निवासी श्रीकांत शर्मा का इस तरह मथुरा न सिर्फ गृह जनपद है बल्‍कि निर्वाचन क्षेत्र भी है। ऐसे में श्रीकांत शर्मा का स्‍थानीय प्रशासनिक अधिकारियों को लेकर मुख्‍यमंत्री को लिखा गया पत्र समझ से परे है।
लोगों का मत है कि इस पत्र के दो मतलब निकलते हैं। जिसमें पहला तो ये कि श्रीकांत शर्मा का योगीराज में कद घट रहा है इसलिए प्रशासनिक अधिकारियों पर उनकी पकड़ ढीली पड़ रही है और वह श्रीकांत शर्मा की बात को तरजीह नहीं दे रहे।
इसके अलावा एक दूसरा मतलब यह भी निकलता है कि ऊर्जा मंत्री की खुद कुंभ मेले की तैयारियों में कोई रुचि नहीं है इसलिए वो पत्र लिखकर स्‍थानीय नागरिकों एवं साधु-संतों की नाराजगी से पल्‍ला झाड़ रहे हैं और उन्‍हें ‘चलता’ कर रहे हैं। हालांकि इसमें पहले वाली बात ज्‍यादा दमदार लगती है क्‍योंकि अधिकारी कई मौकों पर उनसे भारी पड़ते दिखाई दिए हैं।
यूं भी काफी समय बाद मथुरा में कोई जिलाधिकारी इतने लंबे समय तक तैनात रहा है, जिस कारण उनकी सत्ता के गलियारों में मजबूत पकड़ के खासे चर्चे हैं।
बताया जाता है कि जिलाधिकारी आसानी से किसी को भाव नहीं देते, फिर चाहे सत्ताधारी दल का कोई नेता हो, मंत्री हो या फिर मीडियाकर्मी ही क्‍यों न हों।
जहां तक प्रश्‍न ब्रज तीर्थ विकास परिषद से जुड़े प्रमुख अधिकारियों नागेन्‍द्र प्रताप और शैलजाकांत मिश्र का है तो उनकी कार्यप्रणाली को लेकर ऊर्जा मंत्री ने भले ही पहली बार सार्वजनिक तौर पर नाराजगी व्‍यक्‍त की हो किंतु आम जनता तथा विभिन्‍न समाजसेवी संगठनों सहित जागरूक लोगों में पहले से काफी नाराजगी है, बावजूद इसके हर बार उनका पलड़ा भारी साबित हुआ है।
यहां गौर करने वाली बात यह भी है कि आईपीएस अधिकारी शैलजाकांत मिश्र और प्रशासनिक अधिकारी नागेन्‍द्र प्रताप यादव का मथुरा से बहुत गहरा लगाव लगातार बना हुआ है।
नागेन्‍द्र प्रताप यादव जहां मथुरा में ही एसडीएम और एडीएम भी रहे हैं वहीं शैलजाकांत मिश्र करीब तीन दशक पहले बतौर पुलिस अधीक्षक यहां तैनाती रही। इसी दौरान वह ‘देवरिया बाबा’ के नाम से मशहूर संत ‘देवरहा बाबा’ के संपर्क में आए और फिर उनका निरंतर सानिध्‍य प्राप्‍त करने के लिए मथुरा-वृंदावन के होकर रह गए। उनकी तैनाती कहीं भी रही हो परंतु मथुरा आना उनका कम नहीं हुआ। फिलहाल ब्रज तीर्थ विकास परिषद के मुखिया की हैसियत से वो यहां सेवारत हैं।
शैलजाकांत मिश्र का दावा है कि देवरहा बाबा ने उन्‍हें मथुरा में तैनाती के दौरान ही ऐसा आशीर्वाद दिया था जिसके कारण उन्‍हें ब्रज तीर्थ विकास परिषद के मुखिया की हैसियत से दोबारा यहां सेवा करने का मौका मिल रहा है। ये बात और है कि लोग उनकी सेवा को संदिग्‍ध मानते हैं और सेवा की आड़ में मेवा हासिल करने का आरोप भी लगाते हैं।
जो भी हो, किंतु इसमें दो राय नहीं कि जिलाधिकारी सर्वज्ञराम मिश्र से लेकर ब्रज तीर्थ विकास परिषद के मुखिया शैलजाकांत मिश्र तक और तीन-तीन सरकारी जिम्‍मेदारियां निभा रहे नागेन्‍द्र प्रताप यादव सहित कई अन्‍य प्रशासनिक अधिकारियों की सत्ता के गलियारों में कहीं तो कोई ऐसी पकड़ है जिसके बूते वह श्रीकांत शर्मा जैसे कद्दावर मंत्री व भाजपा नेता की बात को दरकिनार करने का माद्दा रखते हैं।
यदि ऐसा नहीं है और श्रीकांत शर्मा आम जनता और साधु-संतों को गुमराह करने के उद्देश्‍य से मुख्‍यमंत्री को शिकायती पत्र लिखकर कोई खेल कर रहे हैं तो तय जानिए कि आगामी चुनाव उनके लिए इतना आसान नहीं होगा क्‍योंकि उन्‍हें लेकर भी जनता को बहुत शिकायतें हैं।
ये भी कह सकते हैं कि उनका अपना मतदाता हो या पार्टी का कार्यकर्ता, कम से कम उनसे खुश तो नहीं है। बेहतर होगा कि ऊर्जा मंत्री उनके अंदर निहित ऊर्जा को कम आंकने की भूल न करें अन्‍यथा चुनावों में उसका करंट मुश्‍किल में डाल सकता है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

शनिवार, 27 जनवरी 2018

मंत्री महोदय! पुलिस में ”निकम्‍मेपन” की परिभाषा कुछ और है

सुना है कल प्रदेश के ऊर्जा मंत्री तथा योगी सरकार के प्रवक्‍ता श्रीकांत शर्मा ने मथुरा के एसएसपी स्‍वप्‍निल ममगाई और जिलाधिकारी सर्वज्ञराम मिश्र से कहा कि ”निकम्‍मे” थानाध्‍यक्षों एवं दरोगाओं को चिन्‍हित कर उनके खिलाफ कार्यवाही करें।
श्रीकांत शर्मा मथुरा में ही शहरी सीट से विधायक हैं और कस्‍बा गोवर्धन अंतर्गत गांव गांठौली के मूल निवासी हैं।
श्रीकांत शर्मा कल मथुरा पुलिस लाइन में कानून-व्‍यवस्‍था के मुद्दे पर जिलाधिकारी और एसएसपी सहित सभी प्रमुख पुलिस अधिकारियों के साथ बैठक कर रहे थे।
ऊर्जा मंत्री के अनुसार पुलिस विभाग में अब भी ”निचले स्‍तर पर” अवैध वसूली हो रही है और दरोगाओं की नाक के नीचे सिपाही उगाही कर रहे हैं।
पहली नजर में देखने से ऐसा लगता है कि जैसे प्रदेश के ऊर्जा मंत्री को पुलिस महकमे के बावत बहुत-कुछ पता है और नीचे से ऊपर तक व्‍याप्‍त भ्रष्‍टाचार तथा निकम्‍मेपन से वह परिचित हैं, किंतु गहराई से देखें तो पता लगेगा कि उन्‍होंने जो भी कहा वह उस रटी-रटाई स्‍क्रिप्‍ट का हिस्‍सा था जिसे सरकार में रहते सब बोलते हैं क्‍योंकि यही सरकारी भाषा है।
श्रीकांत शर्मा शायद नहीं जानते कि पुलिस में जिन ”निकम्‍मे” थानाध्‍यक्षों और दरोगाओं को चिन्‍हित कर उनके खिलाफ कार्यवाही की बात वह कर रहे हैं, उन्‍हें विभाग में ”कमाऊ पूत” अथवा ”दुधारु गाय” कहा जाता है। वह विभागीय अधिकारियों के नजरिए से काबिल हैं तभी तो थाना और चौकियों के प्रभारी बने हुए हैं, अन्‍यथा कृष्‍ण जन्‍मभूमि व शाही मस्‍जिद ईदगाह की सुरक्षा ड्यूटी में लगे होते।
प्रदेश के ऊर्जा मंत्री को संभवत: यह भी नहीं पता कि पुलिस ही नहीं, लगभग समूचे सरकारी महकमों में ”निकम्‍मेपन” की परिभाषा कुछ और है। यहां निकम्‍मे कर्मचारी की पहचान ”कामचोर” या काम न करने वाले के तौर पर नहीं बल्‍कि ऐसे कमाऊ पूत के रूप में होती है जो सूखी मिट्टी से भी तेल निकालना जानता हो।
ऊर्जा मंत्री को कौन समझाए कि जिस तरह के ”निकम्‍मे” थानाध्‍यक्षों, दरोगाओं और रिश्‍वतखोर सिपाहियों को चिन्‍हित कर उनके खिलाफ कार्यवाही करने का फरमान वह सुना रहे हैं, यदि उस पर अक्षरश: अमल हुआ तो प्रदेश सरकार को पुलिस विभाग में तत्‍काल नए सिरे से भर्ती करने की जरूररत पड़ जाएगी।
दरअसल, ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा कल ही इससे पहले मथुरा के थाना हाईवे अंतर्गत ग्राम मोहनपुर अडूकी में उस 8 वर्षीय बच्‍चे माधव के परिजनों से मिलकर आए थे जिसकी 17 जनवरी बुधवार को कथित मुठभेड़ के दौरान पुलिस की गोली लगने से तब मौत हो गई थी, जब वह खेत पर अपनी बहनों के साथ बेर तोड़ने गया हुआ था।
”चेतक” मोबाइल के जिन दो सिपाहियों की गोलीबारी का माधव शिकार हुआ उनकी अमानवीयता का आलम यह रहा कि वह बच्‍चे को खेत में ही तड़पता छोड़कर भाग खड़े हुए नतीजतन अस्‍पताल पहुंचाते-पहुंचाते उसकी मौत हो गई। अगर समय पर उसे पुलिस वाले ही अस्‍पताल ले गए होते तो हो सकता है उसकी जान बच जाती।
योगी सरकार ने हालांकि बच्‍चे के परिजनों को 5 लाख रुपए की आर्थिक सहायता देकर तथा आगरा जोन के आईजी राजा श्रीवास्‍तव द्वारा दो सब इंस्‍पेक्‍टरों सहित चार पुलिसकर्मियों को निलंबित कर पीड़ित परिवार के घाव पर मरहम लगाने की कोशिश की है लेकिन सवाल यह है कि इसमें नया क्‍या है। यह तो हर सरकार में होता है और कुछ दिन बाद फिर कहीं न कहीं पुलिस की ऐसी ही कोई कहानी सामने आती है। भद्रजनों के लिए ”खाकी” एक किस्‍म के ”खौफ” का पर्याय बन चुकी है। ऐसा खौफ जो स्‍वतंत्रता के 70 सालों बाद भी मिटने का नाम नहीं ले रहा।
योगी राज में हो रही मुठभेड़ों से भले ही कई ईनामी बदमाश जान गंवा चुके हों और तमाम पकड़े भी गए हों परंतु ऐसा कहीं नहीं लगता कि पुलिस का इकबाल बुलंद हुआ हो और आपराधिक वारदातों पर प्रभावी अंकुश लग पाया हो। जितने बदमाश मारे नहीं गए, उससे कई गुना अधिक संगीन वारदातें सामने आ चुकी हैं।
ऊर्जा मंत्री को याद होगा कि थाना हाईवे क्षेत्र की ही अमर कॉलोनी में हुए दोहरे हत्‍याकांड को पुलिस आजतक नहीं खोल पाई है जबकि तमाम धरने-प्रदर्शनों के बाद यह मामला न सिर्फ विधानसभा में उठ चुका है बल्‍कि हाईकोर्ट भी जा पहुंचा है और केस का अनावरण न होने की वजह से परिवार की बड़ी पुत्री आत्‍महत्‍या कर चुकी है।
इसी प्रकार बहुचर्चित रौनक हत्‍याकांड का भी पुलिस पर्दाफाश नहीं कर पाई है और इस मामले में आए दिन धरने-प्रदर्शन किए जा रहे हैं।
लूट, डकैती, चोरी और हत्‍याएं तो जैसे इस धार्मिक नगरी की पहचान बन चुके हैं क्‍योंकि शायद ही कोई दिन ऐसा व्‍यतीत होता है जिस दिन बदमाशों द्वारा पुलिस को खुली चुनौती न दी जा रही हो। चेन स्‍नेचिंग, लड़कियों से छेड़छाड़, वाहन चोरी आदि के साथ-साथ बढ़ते साइबर अपराधों की तो कोई गिनती ही नहीं है।
योगी आदित्‍यनाथ के शपथ ग्रहण करते ही मथुरा में दो युवा सर्राफा व्‍यवसाइयों की हत्‍या करके करोड़ों रुपए के आभूषण लूट कर ले जाने की जघन्‍य वारदात को शायद ही कोई अभी भूल पाया हो।
यहां अपराधियों के दुस्‍साहस का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि योगी सरकार के दस महीने बाद भी चंद रोज पहले मात्र एक दिन के अंतराल में बदमाशों ने एक ओर जहां प्रदेश के कबीना मंत्री चौधरी लक्ष्‍मीनारायण की गैस ऐजेंसी का लाखों रुपया लूट लिया वहीं दूसरी ओर उनके समधी की गोली मारकर हत्‍या कर दी। चौधरी लक्ष्‍मीनारायण मथुरा की ही छाता विधानसभा सीट से भाजपा की टिकट पर निर्वाचित हैं।
ऐसा नहीं है ”खाकी” का यह हाल सिर्फ मथुरा तक सीमित हो, प्रदेशभर में उसकी कार्यप्रणाली करीब-करीब एक जैसी है। सरकारें बदलती हैं किंतु ”खाकी” का चरित्र नहीं बदलता।
यही कारण है कि मथुरा हो या मुजफ्फरनगर और शामली हो या सहारनपुर, हर जगह उसका वही चेहरा सामने आता है जो उसकी स्‍थाई पहचान बन चुका है।
इसी गुरूवार रात की बात है। सहारनपुर जिले में बेरी बाग इलाके के मंगलनगर चौक पर एक बाइक अनियंत्रित होकर खंभे से जा टकराई और बाइक सवार दो किशोर गंभीर घायल हो गए। नुमाइश कैंप सेतिया विहार निवासी ये दोनों किशोर अर्पित खुराना और सन्नी तड़पते रहे लेकिन मौके पर पहुंचे पुलिसजनों ने उन्‍हें इसलिए अस्‍पताल ले जाने से मना कर दिया क्‍योंकि घायलों के खून से उनकी सरकारी गाड़ी गंदी हो जाती। बाद में जब इन नाबालिगों को किसी अन्‍य वाहन से अस्‍पताल पहुंचाया गया तो पता लगा कि तब तक वह दम तोड़ चुके थे।
बेशक पुलिस विभाग में भी अच्‍छे लोग हैं और वह हरसंभव जहां मानवता का परिचय देते हैं वहीं आमजनता के बीच बन चुकी पुलिस की अमानवीय छवि को दूर करने का प्रयास भी करते हैं किंतु ऐसे लोगों की संख्‍या इतनी कम है कि उनके सारे प्रयासों पर मथुरा व सहारनपुर जैसी घटनाएं पानी फेर देती हैं।
बेहतर होगा कि योगी आदित्‍यनाथ सरकार ”खाकी” के मूल चरित्र में परिवर्तन करने की कोशिश करे, न कि पूर्ववर्ती सरकारों की तरह हर बड़ी वारदात के बाद रटे-रटाए तरीके अपनाकर लीपापोती करके काम चलाए।
हर कोई जानता है कि पुलिस की चाल व चरित्र में आमूल-चूल परिर्वतन किए बिना उसके विभागीय सूत्र वाक्‍य ” परित्राणाय साधूनाम, विनाशाय च दुष्‍कृताम” को सार्थक कर पाना संभव नहीं होगा, और पुलिस में परिवर्तन तभी हो सकता है जब सरकारें एवं उसके नुमाइंदे रटी-रटाई स्‍क्रिप्‍ट पढ़ने की बजाय समस्‍या की उस जड़ को समाप्‍त करने की कोशिश करें जो परतंत्रता से स्‍वतंत्रता तक का सफर पूरा करने के बावजूद गहराई में समाई हुई है।
स्‍वयं सीएम योगी आदित्‍नाथ हों या उनके नुमाइंदे ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा, उन्‍हें समझना होगा कि ”खाकी” को बंदर घुड़की से बदलना संभव नहीं है।
खाकी के क्रिया-कलापों को बदलना है तो पहले सरकारी कार्यप्रणाली बदलनी होगी और सरकारी कार्यप्रणाली बदलने के लिए उस ”वीआईपी संस्‍कृति” को बदलना होगा जो आमजन का दर्द समझने में असहाय है। जिसके लिए किसी परिवार के ”भविष्‍य” की कीमत मात्र 5 लाख रुपए है। जिसके लिए सड़क पर तड़पते दुर्घटना के शिकार किशोरवय लड़कों की जिंदगी केवल इसलिए बेमानी है क्‍योंकि वो जिस सरकारी गाड़ी को इस्‍तेमाल करते हैं वह उनके खून से गंदी हो जाएगी।
सरकार और सरकारी कर्मचारियों की रग-रग में समा चुकी इस वीआईपी संस्‍कृति से मुक्‍ति पाए बिना न तो अपराध और अपराधियों से मुक्‍ति मिल सकेगी और न कानून का राज स्‍थापित हो पाएगा। फिर चाहे और अगले दस साल ”कोई योगी” सरकार चलाता रहे अथवा पूरे पांच साल कोई सत्‍ता का भोगी काबिज होकर चला जाए।
-www.legendnews.in
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