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शुक्रवार, 23 जनवरी 2026
बड़े खेल का खुलासा: करोड़ों की पेशगी लेकर लाया गया नगर निगम की जमीन कॉलोनाइजर को देने का प्रस्ताव, PIL दायर करने की तैयारी
वृंदावन में कुछ खास कॉलोनाइजर के लिए लेंड एक्सचेंज का प्रस्ताव यूं ही नहीं लाया गया। इसके लिए षड्यंत्र के तहत बाकायदा एक ''दुरभि संधि'' की गई। चूंकि मामला करोड़ों का नहीं, अरबों रुपए का था इसलिए करोड़ों रुपए तो पेशगी में ही दे दिए गए। हालांकि अब नगर आयुक्त कह रहे हैं कि ये प्रस्ताव दफन किया जा चुका है लिहाजा भविष्य में ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं लाया जाएगा। नगर आयुक्त कुछ भी कहें, लेकिन सवाल तो यह है कि निजी टाउनशिप के लिए पहले तो मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण और फिर मथुरा-वृंदावन नगर निगम, ये प्रस्ताव लेकर आया ही क्यों?
इस 'क्यों' का जवाब देने को कोई तैयार नहीं है इसलिए कुछ जागरूक लोग न्यायालय की शरण में जाने की तैयारी कर चुके हैं। वो इसे उच्च न्यायालय और फिर जरूरत पड़ने पर उच्चतम न्यायालय तक ले जाना चाहते हैं ताकि बेशकीमती सरकारी जमीन को माफिया के कब्जे में जाने से बचाया जा सके।
एनजीटी में ये मामला पहले ही जा चुका है और वहां से सभी संबंधित पक्षों को नोटिस भी जारी किए जा चुके हैं, परंतु अब लोगों को समझ में आ गया है कि डालमिया बाग की तरह इस केस को भी उच्च या उच्चतम न्यायालय ले जाना ही उपयुक्त होगा इसलिए वो इसकी तैयारी कर चुके हैं।
वृंदावन निवासी लक्ष्मीनारायण उर्फ ब्रजबिहारी शर्मा तथा दीपक शर्मा ने कल इसी संदर्भ में जिलाधिकारी मथुरा के नाम एक ज्ञापन सौंपा है और उसकी प्रति लोकायुक्त को भी भेजी है।
शिकायतकर्ताओं ने इस ज्ञापन में लिखा है कि इस ''लेंड एक्सचेंज'' का प्रस्ताव पेश करने से पहले न तो विकास प्राधिकरण ने और ना ही नगर निगम ने पारदर्शिता एवं नियमों का पालन किया जिससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि ऐसा एक निजी कंपनी को अनुचित लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से किया गया।
शिकायतकर्ताओं ने इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराने का अनुरोध किया है जिससे प्रस्ताव लाने के पीछे छिपी मंशा सामने आ सके और इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों को कठघरे में खड़ा किया जा सके।
मथुरा जिला प्रशासन तथा नगर निगम मथुरा-वृंदावन से जुड़े भरोसेमंद सूत्र बताते हैं कि सनसिटी अनंतम एवं अन्य बिल्डर्स के पक्ष में लेंड एक्सचेंज का मात्र प्रस्ताव लाने की पेशगी करीब 5 करोड़ रुपए प्राप्त की गई तथा 'शेष के लिए' पूरी 'साजिश' बनाई गई कि किसको किस तरह और कितना-कितना लाभ पहुंचाना है।
ये सारा काम कितनी गोपनीयता से किया जा रहा था, इसका अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि सनसिटी अनंतम के मालिकों तक का नाम किसी को नहीं बताया जाता।
सूत्र बताते हैं कि सैकड़ों एकड़ की इस टाउनशिप के मालिकों में मुख्य रूप से ZEE TV के मालिक सुभाष चंद्रा के भाई लक्ष्मी गोयल तथा उनके समधी (जो एक्शन शू कंपनी के मालिक) शामिल हैं।
इनके अलावा जिन अन्य के लिए लेंड एक्सचेंज का प्रस्ताव लाया गया, उनमें द्वारिकादास जीवराजका मैमोरियल ट्रस्ट तथा हरिनिवास खेतान मैमोरियल ट्रस्ट द्वारा विकसित की जा रही कॉलोनियों का नाम है।
''लीजेंड न्यूज़'' ने जब इस पूरे प्रकरण में कानूनी विशेषज्ञों की राय ली तो उन्होंने इसे साफ तौर पर पद के दुरुपयोग तथा निजी स्वार्थ की पूर्ति के लिए बदनीयती का मामला बताया, जो आपराधिक कृत्य बनता है।
कानूनी विशेषज्ञों की राय में ये न सिर्फ नियमों को ताक पर रखकर माफिया के एजेंट की तरह काम करने का अपराध है बल्कि इससे साफ-साफ जाहिर होता है कि मथुरा जिले के अधिकारी तो बिक ही चुके हैं, जनप्रतिनिधि भी ऑब्लाइज हैं अन्यथा ये मुद्दा अब तक विधानसभा में भी उठ जाना चाहिए था।
कानून के जानकारों की मानें तो इस पूरे प्रकरण में प्रशासनिक अधिकारियों सहित मेयर की भी भूमिका संदिग्ध प्रतीत होती है और इसलिए यदि इसकी निष्पक्ष जांच हो जाती है तो साफ हो जाएगा कि आखिर क्यों कुछ खास कॉलोनाइजर के पक्ष में लेंड एक्सचेंज के लिए प्रशासन से लेकर निगम तक में बैठे जिम्मेदार लोग इतने उतावले हैं।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
शुक्रवार, 26 दिसंबर 2025
सनसिटी अनंतम: विकास प्राधिकरण के भ्रष्टाचार की अनंत कथा का ज्वलंत उदाहरण
महाभारत नायक योगीराज भगवान श्रीकृष्ण की लीला स्थली में डेवलव हो रही 'सनसिटी अनंतम' को यदि MVDA (मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण) के भ्रष्टाचार की अनंत कथा का एक अध्याय कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। दूसरे शब्दों में कहें तो इस विश्व प्रसिद्ध धार्मिक नगरी की डेवलपमेंट अथॉरिटी के हर प्रोजेक्ट का आदि और अंत भ्रष्टाचार की एक ऐसी अनंतकथा होता है जिसमें पर्त-दर पर्त 'योगीराज' के आदेश-निर्देशों सहित नियम-कानून की धज्जियां उड़ाई जाती हैं। फिर वह चाहे MVDA का अपना प्रोजेक्ट हो या उसके द्वारा अधिकृत किसी का निजी प्रोजेक्ट।
डालमिया बाग के गुरू कृपा तपोवन में डेवलपर को अनुचित लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से की गई अनेक कारस्तानियों के बाद अब मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण ने सनसिटी अनंतम से जुड़े रियल एस्टेट कारोबारियों के हित में वो काम कर दिखाया है जिसकी जांच की जाए तो भ्रष्टाचार की एक ऐसी मिसाल सामने होगी जिसकी सामान्यत: कल्पना करना भी मुश्किल होगा। साधारण शब्दों में कहें तो वृंदावन के इस लग्जरी हाउसिंग प्रोजेक्ट के लिए MVDA के खास जिम्मेदार अधिकारी ने एक रियल एस्टेट के ''दलाल'' की भूमिका अदा की है।
दस्तावेज पेश कर रहे हैं MVDA के काले कारनामों की दास्तान
दरअसल, 31 अगस्त 2024 को उत्तर प्रदेश प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड ने सनसिटी अनंतम का एक औपचारिक निरीक्षण किया। बोर्ड के अधिकारियों ने इस निरीक्षण में पाया कि प्रोजेक्ट के लिए मौके पर न तो कोई पर्यावरण प्रबंधन की योजना थी, न कोई कार्यशील सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट। यहां तक कि कोई ऐसी मशीनरी भी मौके पर उपलब्ध नहीं थी जिससे यह पता लगता हो कि 400 एकड़ से अधिक भूखंड पर प्रस्तावित प्रोजेक्ट के लिए इस तरह की मंशा भी रही हो।
इन हालातों को देखकर UPPCB ने इस आशय की स्पष्ट अनुशंसा की कि सनसिटी अनंतम नामक हाउसिंग प्रोजेक्ट का अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) अस्वीकृत किया जाए किंतु आश्चर्यजनक रूप से MVDA ने UPPCB की अनुशंसा के उलट चंद दिनों बाद ही 24 सितंबर 2024 को यूपी टाउनशिप पॉलिसी-2023 के तहत इसके लिए लाइसेंस जारी कर दिया जिसका नंबर 1836 है।
अधिकारियों के ''दलाल'' बन जाने की पुष्टि करता पत्र
सनसिटी अनंतम को डेवलप कराने के अथक प्रयासों में अधिकारियों की दलाल वाली भूमिका का खुलासा उस पत्र द्वारा होता है जो MVDA के तत्कालीन उपाध्यक्ष श्याम बहादुर सिंह के हस्ताक्षर से 28 जून 2025 को जिलाधिकारी मथुरा को लिखा गया है और जिसमें डीएम के समक्ष 5.8236 हेक्टेयर भूमि के अधिग्रहण का प्रस्ताव रखा गया है।
यह पत्र मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण में बेखौफ भष्टाचार का बड़ा सबूत है क्योंकि इसमें नियामक और लाभार्थी के बीच की रेखा को ताक पर रखकर बिल्डर को ही आवेदक बता दिया गया है।
आरटीआई पर खामोशी भी बहुत कुछ कहती है
यहां गौर करने वाली बात यह है कि राज्य की एक महत्वपूर्ण इकाई निजी स्वार्थ में किस कदर अंधी है कि वह सनसिटी अनंतम के हित में खेले जा रहे इस खेल की कोई जानकारी तक देने को तैयार नहीं है और आरटीआई का इस्तेमाल करने वालों को लगातार गुमराह करती रही है। कुछ आरटीआई का जवाब नहीं दिया जाता तो कुछ को शब्दों के जाल में उलझा दिया जाता है जिससे आवेदनकर्ता थक-हार कर घर बैठ जाए।
दरअसल, मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण आरटीआई के मामले में एक लंबे समय से इसी रणनीति को अख्तियार किए हुए है और इससे अपने मकसद में सफल होता रहा है।
चौंकाता है लेन-देन का यह गणित
रियल एस्टेट कारोबार से जुड़े माफिया और डेवलपमेंट अथॉरिटी की कुटिल चालों वाली प्रक्रिया से सामने आने वाला लेन-देन का गणित किसी को भी चौंका सकता है।
अगर बात करें सनसिटी अनंतम की तो यहां का वर्तमान अनुमानित सर्किल रेट 20 करोड़ रुपए प्रति हेक्टेयर है जबकि डेवलपर की ओर से वर्तमान विक्रय मूल्य रखा गया है 1 लाख रुपए वर्ग मीटर। इस हिसाब से यह मूल्य बनता है लगभग 100 करोड़ रुपए (एक अरब) प्रति हेक्टेयर यानी अधिग्रहण के अधिकतम मूल्य से भी पूरा पांच गुना ज्यादा। संभवत: यही कारण है कि आज हर वो व्यक्ति रियल एस्टेट के करोबार में उतरने को आतुर रहता है जिसके पास थोड़ा भी पैसा है।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता और सनसिटी अनंतम के याचिकाकर्ता की ओर से एनजीटी में पैरवी कर रहे नरेन्द्र कुमार गोस्वामी कहते हैं कि भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापना अधिनियम 2013 के तहत निजी कंपनियों के लिए अधिग्रहण हेतु 80% प्रभावित परिवारों की सहमति अनिवार्य है लेकिन इस मामले में सार्वजनिक सुनवाई के अभिलेख सहमति नहीं बल्कि बड़ी आपत्तियाँ और 'असहमति' दर्शाते हैं।
पहले डालमिया बाग और अब सनसिटी अनंतम के लिए मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण की रियल एस्टेट माफिया के साथ साबित होती सांठगांठ यह बताती है कि विकास प्राधिकरण के अधिकारियों को योगी आदित्यनाथ की भ्रष्टाचार को लेकर प्रचारित जीरो टॉलरेंस नीति के सच का पता लग चुका है।
वह जान गए हैं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ ढोल पीटने और उसके खिलाफ पूरी ताकत से खड़े हो जाने में बड़ा फर्क है। यदि ऐसा न होता तो मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के अनेक कारनामे खुल जाने के बावजूद किसी एक जिम्मेदार अधिकारी को कठघरे में खड़ा किया जाता। किसी से तो पूछा जाता कि धर्म की नगरी में खुलेआम खेले जा रहे अधर्म के इस खेल का असल खिलाड़ी कौन है और कौन है जो रियल एस्टेट माफिया को संरक्षण देता है।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
अधिकारियों के ''दलाल'' बन जाने की पुष्टि करता पत्र
सनसिटी अनंतम को डेवलप कराने के अथक प्रयासों में अधिकारियों की दलाल वाली भूमिका का खुलासा उस पत्र द्वारा होता है जो MVDA के तत्कालीन उपाध्यक्ष श्याम बहादुर सिंह के हस्ताक्षर से 28 जून 2025 को जिलाधिकारी मथुरा को लिखा गया है और जिसमें डीएम के समक्ष 5.8236 हेक्टेयर भूमि के अधिग्रहण का प्रस्ताव रखा गया है।
यह पत्र मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण में बेखौफ भष्टाचार का बड़ा सबूत है क्योंकि इसमें नियामक और लाभार्थी के बीच की रेखा को ताक पर रखकर बिल्डर को ही आवेदक बता दिया गया है।
आरटीआई पर खामोशी भी बहुत कुछ कहती है
यहां गौर करने वाली बात यह है कि राज्य की एक महत्वपूर्ण इकाई निजी स्वार्थ में किस कदर अंधी है कि वह सनसिटी अनंतम के हित में खेले जा रहे इस खेल की कोई जानकारी तक देने को तैयार नहीं है और आरटीआई का इस्तेमाल करने वालों को लगातार गुमराह करती रही है। कुछ आरटीआई का जवाब नहीं दिया जाता तो कुछ को शब्दों के जाल में उलझा दिया जाता है जिससे आवेदनकर्ता थक-हार कर घर बैठ जाए।
दरअसल, मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण आरटीआई के मामले में एक लंबे समय से इसी रणनीति को अख्तियार किए हुए है और इससे अपने मकसद में सफल होता रहा है।
चौंकाता है लेन-देन का यह गणित
रियल एस्टेट कारोबार से जुड़े माफिया और डेवलपमेंट अथॉरिटी की कुटिल चालों वाली प्रक्रिया से सामने आने वाला लेन-देन का गणित किसी को भी चौंका सकता है।
अगर बात करें सनसिटी अनंतम की तो यहां का वर्तमान अनुमानित सर्किल रेट 20 करोड़ रुपए प्रति हेक्टेयर है जबकि डेवलपर की ओर से वर्तमान विक्रय मूल्य रखा गया है 1 लाख रुपए वर्ग मीटर। इस हिसाब से यह मूल्य बनता है लगभग 100 करोड़ रुपए (एक अरब) प्रति हेक्टेयर यानी अधिग्रहण के अधिकतम मूल्य से भी पूरा पांच गुना ज्यादा। संभवत: यही कारण है कि आज हर वो व्यक्ति रियल एस्टेट के करोबार में उतरने को आतुर रहता है जिसके पास थोड़ा भी पैसा है।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता और सनसिटी अनंतम के याचिकाकर्ता की ओर से एनजीटी में पैरवी कर रहे नरेन्द्र कुमार गोस्वामी कहते हैं कि भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापना अधिनियम 2013 के तहत निजी कंपनियों के लिए अधिग्रहण हेतु 80% प्रभावित परिवारों की सहमति अनिवार्य है लेकिन इस मामले में सार्वजनिक सुनवाई के अभिलेख सहमति नहीं बल्कि बड़ी आपत्तियाँ और 'असहमति' दर्शाते हैं।
पहले डालमिया बाग और अब सनसिटी अनंतम के लिए मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण की रियल एस्टेट माफिया के साथ साबित होती सांठगांठ यह बताती है कि विकास प्राधिकरण के अधिकारियों को योगी आदित्यनाथ की भ्रष्टाचार को लेकर प्रचारित जीरो टॉलरेंस नीति के सच का पता लग चुका है।
वह जान गए हैं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ ढोल पीटने और उसके खिलाफ पूरी ताकत से खड़े हो जाने में बड़ा फर्क है। यदि ऐसा न होता तो मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के अनेक कारनामे खुल जाने के बावजूद किसी एक जिम्मेदार अधिकारी को कठघरे में खड़ा किया जाता। किसी से तो पूछा जाता कि धर्म की नगरी में खुलेआम खेले जा रहे अधर्म के इस खेल का असल खिलाड़ी कौन है और कौन है जो रियल एस्टेट माफिया को संरक्षण देता है।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
रविवार, 5 अक्टूबर 2025
वो सरकारी विभाग, जहां दम तोड़ देती है योगी बाबा की भ्रष्टाचार को लेकर बनी जीरो टॉलरेंस नीति
दैनिक जागरण के आगरा एडिशन की संपादकीय में 2 अक्टूबर गांधी जयंती को 'यह कैसी कार्यशैली' शीर्षक से एक महिला का दर्द लिखा है। दरअसल, इस महिला ने लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) से नीलामी में सवा करोड़ रुपए मूल्य का एक भूखंड खरीदकर वहां अपना घर बनवाया। प्राधिकरण से ही नीलाम भूखंड पर बने इस घर को हाल ही में लखनऊ विकास प्राधिकरण ने ध्वस्त कर दिया। शिकायत के बाद जांच होने पर एलडीए ने माना कि लेआउट परिवर्तन के दौरान गलती से यह भूखंड 'मिसिंग' में दर्ज हो गया, जिसके कारण मकान के ध्वस्तीकरण की कार्रवाई हुई। नीलामी में सवा करोड़ का प्लॉट खरीदने के बाद महिला ने उस पर मकान कितनी मुश्किलों से और और कैसे-कैसे पैसे का इंतजाम करके बनवाया होगा, इसका अंदाज कोई भी लगा सकता है। लेकिन भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे सरकारी संरक्षण प्राप्त विकास प्राधिकरण के अधिकारी अब उस महिला को 'फ्लैट' ऑफर कर रहे हैं। जरा सोचिए कि यह हाल तो प्रदेश की राजधानी के उस विकास प्राधिकरण का है जहां स्वयं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपने पूरे मंत्रिमंडल और सभी बड़े अफसरों के साथ बैठते हैं।
यह भी सोचिए कि जब लखनऊ विकास प्राधिकरण का यह आलम है तो प्रदेश के उन शहरों की डेवलपमेंट अथॉर्टीज का क्या हाल होगा, जहां से लखनऊ तक आवाज पहुंचाना भी आसान काम नहीं है।
सीएम योगी अपने पहले कार्यकाल से यह कहते चले आ रहे हैं कि भ्रष्टाचार पर उनकी सरकार कोई कंप्रोमाइज नहीं करेगी और इसे लेकर उनकी नीति हमेशा जीरो टॉलरेंस की रहेगी।
ऐसे में इस तरह के सवाल उठना स्वाभाविक है कि योगी सरकार की इतनी सख्ती और स्वयं योगी आदित्यनाथ की बेदाग छवि के बावजूद विकास प्राधिकरण के भ्रष्ट अधिकारियों एवं कर्मचारियों की पूंछ सीधी क्यों नहीं होती?
क्यों प्रदेशभर के विकास प्राधिकरण भ्रष्टाचार का पर्याय बने हुए हैं और क्यों उनके मन में योगी सरकार अथवा योगी आदित्यनाथ का कोई खौफ नहीं है?
इन प्रश्नों का एक ही उत्तर है कि योगी सरकार ने जिस तरह का अभियान कानून-व्यवस्था पर फोकस करके सामाजिक अपराधियों के खिलाफ चलाया, वैसा कोई अभियान भ्रष्टाचारियों के खिलाफ आज तक कभी नहीं चलाया गया। कभी-कभार किसी अधिकारी पर कोई कार्रवाई हुई भी है तो वह भ्रष्टाचारियों के मन में भय व्याप्त करने के लिए अपर्याप्त रही। और अगर बात करें विशेष तौर पर प्रदेश के सर्वाधिक भ्रष्ट विभाग विकास प्राधिकरण की तो उसका कोई अधिकारी शायद ही कभी कार्रवाई के भी दायरे में आया हो। यही कारण है कि विकास प्राधिकरण के आगे शहरों के नाम भले ही बदल जाते हैं परंतु उसकी भ्रष्ट कार्यशैली कहीं नहीं बदलती। वह हर जगह एक जैसी पायी जाती है।
मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण, अंधेर नगरी-चौपट राजा
देश ही नहीं, दुनिया में अपनी विशिष्ट धार्मिक पहचान रखने वाली योगीराज भगवान श्रीकृष्ण की पावन जन्मस्थली और क्रीड़ास्थली मथुरा-वृंदावन के विकास प्राधिकरण का हाल जानकर तो ऐसा लगता है जैसे यहां अंधेर नगरी-चौपट राजा की कहावत चरितार्थ हो रही हो।
मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण को यदि भ्रष्ट अधिकारियों का पसंदीदा स्थान कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
वृंदावन का डालमिया बाग घोटाला है सबसे बड़ा उदाहरण
पिछले साल इन्हीं दिनों वृंदावन स्थित डालमिया बाग पर गुरुकृपा तपोवन के नाम से एक कॉलानी डेवलप करने के लिए मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण में नक्शा मूव किया गया, लेकिन अप्रूवल से पहले ही भूमाफिया ने जमकर उसका फर्जी प्रचार किया और प्लॉट बुक करने शुरू कर दिए। माफिया ने इस नक्शे के आवेदन की आड़ में अनुमानत: एक हजार करोड़ रुपया एकत्र कर लिया परंतु विकास प्राधिकरण तमाशा देखता रहा।
चूंकि भूमाफिया ने कॉलोनी डेवलेव करने की जल्दी में डालमिया बाग के साढ़े चार सौ से अधिक हरे वृक्ष रातों-रात काट डाले इसलिए यह मामला पहले एनजीटी और फिर सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंचा।
मामला देश की सर्वोच्च अदालत की चौखट पर पहुंचा तो सरकार के कानों पर भी जूं रेंगनी प्रारंभ हुई, नतीजतन तत्कालीन कमिश्नर आगरा मंडल ऋतु माहेश्वरी ने भी मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण (एमवीडीए) की भूमिका का पता लगाने के लिए एक कमेटी का गठन कर जांच रिपोर्ट पेश करने को कहा।
बहरहाल, चोर-चोर मौसेरे भाई की कहावत फिर सच साबित हुई और मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के किसी अधिकारी का कुछ नहीं बिगड़ा। ये बात अलग है कि सुप्रीम कोर्ट के सख्त फैसले ने एक ओर जहां भूमाफिया की पूरी प्लानिंग चौपट कर दी वहीं विकास प्राधिकरण (एमवीडीए) के अधिकारियों की हसरतों पर पानी फेर दिया क्योंकि इस प्रोजेक्ट के डेवलपर, एमवीडीए के अधिकारियों की दुधारू गाय साबित हो रहे थे। यदि सब-कुछ वैसे ही चलता रहता जैसे एमवीडीए के अधिकारी और भूमाफिया चाह रहे थे तो भूमाफिया जहां अरबों कमाते वहीं कई अधिकारी करोड़ों कमा ले गए होते।
जो भी हो, मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के लिए न तो गुरुकृपा तपोवन कोई पहला प्रोजेक्ट था और न अंतिम। दुनिया के आकर्षण का केंद्र मथुरा नगरी में जाने कितने डेवलपर हर रोज विकास प्राधिकरण के चक्कर काटने को मजबूर हैं। कोई अवैध निर्माण के लिए चक्कर काट रहा है तो कोई वैध काम कराने के लिए क्योंकि काम कैसा भी हो, विकास प्राधिकरण की चौखट चूमे बिना कुछ भी संभव नहीं हो सकता।
बड़े-बड़े करोड़पति और अरबपति दो के चार और सात के सोलह इनकी कृपा के बिना नहीं कर सकते। इनकी नजर बनी रहे तो शहर के बीचों-बीच अवैध बहुमंजिला इमारत खड़ी की जा सकती है और ये यदि नजर फेर लें तो वैध इमारत को भी मिट्टी में मिला सकते हैं।
लखनऊ की उस महिला का वैध मकान इसका सबसे बड़ा सबूत है। जमीन चाहे प्राधिकरण से ही क्यों न खरीदी हो, प्राधिकरण के अधिकारियों को चढ़ावा चढ़ाए बिना लेआउट आसानी से परिवर्तन हो सकता है और भूखंड ''मिसिंग'' शो करके मकान पर बुलडोजर भी चल सकता है।
रही बात योगी बाबा के जीरो टॉलरेंस की तो उसकी जद में अब तक विकास प्राधिकरण आता दिखाई नहीं देता। क्या प्रदेश की राजधानी लखनऊ और क्या कृष्ण की जन्मभूमि मथुरा, सबका हाल समान है। नक्कारखाने में तूती की आवाज वैसे भी सुनाई कहां देती है।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
बुधवार, 23 अक्टूबर 2024
...तो डालमिया बाग मामले में 120B के आरोपी बनाए जाएंगे MVDA के कई अधिकारी और कर्मचारी
वैसे तो समूचे उत्तर प्रदेश के विकास प्राधिकरण अपनी भ्रष्ट कार्यप्रणाली को लेकर अच्छे-खासे बदनाम हैं, लेकिन अगर बात करें मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण (MVDA) की तो यहां तैनात उसके अधिकारी एवं कर्मचारी बाकायदा अपराधियों के किसी संगठित गिरोह की तरह काम करते हैं। इसमें सबकी अपनी भूमिका और उसके अनुसार सबकी हिस्सेदारी भी तय है। कोई किसी के काम में दखल नहीं देता, इसलिए सबकुछ बहुत सहजता के साथ चलता रहता है। ताजा मामला वृंदावन के डालमिया बाग का है जिस पर एक रियल एस्टेट प्रोजेक्ट खड़ा करने के लिए गुरुकृपा तपोवन के नाम से MVDA में नक्शा मूव किया गया और नक्शा पास हुए बिना ही प्लॉट बुक करने शुरू कर दिए। यही नहीं, माफिया ने मात्र एक नक्शे की आड़ में अनुमानत: एक हजार करोड़ रुपया एकत्र कर लिया। चूंकि माफिया ने निवेशकों से एक बड़ी रकम हथिया ली थी इसलिए उसे एक ओर जहां डालमिया बाग पर अपना कब्जा दिखाना था वहीं दूसरी ओर ये भी जाहिर करना था कि उसका काम पूरी प्रगति पर है लिहाजा उसने बाग के साढ़े चार सौ से अधिक हरे वृक्षों को रातों-रात कटवा डाला। हरे वृक्षों के इस अवैध कटान ने माफिया की बदनीयति सामने लाकर रख दी।
MVDA की भूमिका पहले दिन से संदिग्ध
मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण ने हालांकि पेड़ कटने के बाद अपना मुंह साफ रखने की कोशिश में प्राधिकरण की रेलिंग काटने का एक केस भी दर्ज कराया किंतु उसका मुंह साफ हो नहीं पा रहा, जिसके कुछ ठोस कारण हैं।
सबसे पहला और बड़ा कारण तो यह है कि MVDA के जो अधिकारी एवं कर्मचारी अपने क्षेत्र में छोटे से छोटे अवैध निर्माण को सूंघते फिरते हैं और उसके खिलाफ कार्रवाई का भय दिखाकर मनमानी वसूली करने जा धमकते हैं, वो एक ऐसे रियल एस्टेट प्रोजेक्ट की आड़ में की जा रही अवैध बुकिंग पर क्यों मौन साधे रहे जिसका नक्शा उसके यहां विचाराधीन था लेकिन पास नहीं किया गया था। नियमानुसार MVDA को नक्शा पेश किए जाने की सूचना सार्वजनिक करनी चाहिए थी, जो उसने नहीं की।
ताज्जुब इस बात का भी है कि MVDA आज तक गुरुकृपा तपोवन के नक्शे की असलियत पर चुप्पी साधे बैठा है जबकि निवेशक अपनी रकम डूब जाने के भय से माफिया के यहां चक्कर काट रहा है। विकास प्राधिकरण की यही चुप्पी उसकी माफिया से मिलीभगत का दूसरा संकेत है।
नक्शा पास कराने के लिए पेश सपोर्टिंग पेपर्स की स्थिति तक स्पष्ट नहीं
यहां गौर करने वाली बात यह है कि किसी भी प्रोजेक्ट, यहां तक कि घर-दुकान या मकान का नक्शा पास कराने के लिए नक्शे के साथ कुछ सपोर्टिंग पेपर्स भी सबमिट करने होते हैं जिनमें सबसे जरूरी होता है मालिकाना हक साबित करना। इसके बाद नंबर आता है विभिन्न विभागों के नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (NOC) लगाने का जो आवश्यकता अनुसार लगाने होते हैं।
ऐसे में एक महत्वपूर्ण सवाल खुद-ब-खुद सामने खड़ा हो जाता है कि गुरुकृपा तपोवन का नक्शा पास कराने के लिए मालिकाना हक साबित करने वाले पेपर्स पेश किए गए हैं या नहीं, और किए गए हैं तो मालिकाना हक किसके पास बताया गया है।
यह मान भी लिया जाए कि MVDA को न तो डालिमया बाग में सैकड़ों हरे वृक्ष खड़े होने की कोई जानकारी थी और न रजिस्ट्री होने-न होने का कुछ पता था तब भी उसे यह स्पष्ट करना चाहिए कि गुरुकृपा तपोवन का नक्शा पास कराने किसने भेजा तथा किस आधार पर भेजा।
डालमिया बाग पर उपजे विवाद को अब एक महीने से ऊपर का समय बीत चुका है। जाहिर है कि अब तक तो MVDA को काफी कुछ पता लग चुका होगा, किंतु आज भी MVDA का कोई अधिकारी या कर्मचारी इस मुद्दे पर अपना मुंह खोलने को तैयार नहीं। आखिर क्यों?
आज भी 'लीजेण्ड न्यूज़' ने MVDA के उपाध्यक्ष श्याम बहादुर सिंह को whatsapp मैसेज भेजकर गुरुकृपा तपोवन के नक्शे पर विभाग की स्थिति सामने रखने का अनुरोध किया लेकिन मैसेज भेजे हुए कई घंटे बीत जाने के बावजूद कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली।
हजार करोड़ की ठगी में किस-किस की हिस्सेदारी
मात्र एक फर्जी नक्शा पेश करके पब्लिक से करीब हजार करोड़ रुपए ठग लिए गए लेकिन विकास प्राधिकरण मुंह सिल कर बैठ जाए तो इसका क्या अर्थ निकालता है, इसे समझना कोई मुश्किल काम नहीं।
गुरुकृपा तपोवन के नाम पर जो आपराधिक कृत्य किया गया वह सीधे-सीधे IPC की धारा 420, 467, 468 और 471 के अलावा 120B का गंभीर अपराध है क्योंकि एक ऐसे प्रोजेक्ट का सब्जबाग दिखाकर हजार करोड़ रुपया ठग लिया गया जिसका मालिकाना हक तो दूर नक्शा तक पास नहीं हुआ। जिसे लेकर कोई एग्रीमेंट नहीं हुआ। जो हुआ, वो सिर्फ और सिर्फ एक Memorandum of understanding (MOU) है यानी कोई सौदा करने के लिए दो पक्षों के बीच अंडरस्टेंडिंग।
चूंकि विकास प्राधिकरण इतना सब हो जाने पर भी अपनी स्थिति स्पष्ट करने को तैयार नहीं है इसलिए इससे यही संदेश जाता है कि उसकी माफिया से मिलीभगत है। ऐसा न होता तो जनहित में ही सही, वह कम से कम सच्चाई तो सामने ला ही सकता है ताकि अपने प्लॉट बुकिंग की कच्ची पर्ची हाथ में लेकर घूम रहे लोगों को तो पता लग सके कि वास्तविकता क्या है।
यदि वह ऐसा नहीं करता तो साफ है कि उसके भी कई अधिकारी एवं कर्मचारी न केवल हजार करोड़ की ठगी करने वाले गिरोह से मिले हुए हैं बल्कि वह उसका हिस्सा भी हैं जो उनको IPC की धारा 120B का आरोपी बनाने के लिए पर्याप्त है।
सबकुछ कमिश्नर द्वारा गठित जांच कमेटी की रिपोर्ट पर निर्भर
अब जबकि मंडलायुक्त ऋतु माहेश्वरी ने शासन के निर्देश पर इस मामले में मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण की भूमिका का पता लगाने को 3 सदस्यीय जांच कमेटी का गठन कर दिया है तो सबकुछ उस रिपोर्ट पर निर्भर करता है, लेकिन इतना तय है कि MVDA के अधिकारियों के लिए तमाम प्रश्नों के उत्तर देना बहुत मुश्किल होगा।
संभवत: यह पहली बार होगा जब माफिया और अधिकारियों का गठजोड़ बेनकाब होगा और आमजन भी यह जान सकेगा कि कैसे योगी सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद प्रदेश में भ्रष्टाचार एवं भ्रष्टाचारी फल-फूल रहे हैं क्योंकि एक ओर कमिश्नर आगरा ऋतु माहेश्वरी बहुत सख्त मिजाज अधिकारी हैं तो दूसरी ओर जांच कमेटी में शामिल तीनों उच्च अधिकारी भी ईमानदार बताए जाते हैं। बस इंतजार है तो निर्धारित 15 दिन पूरे होने का।
-Legend News
रविवार, 22 सितंबर 2024
योगी जी, एकबार देखिये तो सही कि भूमाफिया और अधिकारियों का गिरोह धार्मिक नगरी में आपके आदेश-निर्देशों की कैसे धज्जियां उड़ा रहा है...
अभी दो दिन पहले फायरब्रांड मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने गोरखपुर प्रवास के दौरान अधिकारियों को निर्देशित किया था कि यूपी में भूमाफिया और दबंग बख्शे न जाएं। उनके खिलाफ कठोर से कठोर कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। गोरखनाथ मंदिर में जनसमस्याओं को सुनते हुए सीएम योगी ने अधिकारियों को दो टूक यह हिदायत दी कि भूमाफियाओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई करना सरकार का संकल्प है इसलिए पेशेवर भूमाफियाओं को चिन्हित करके ऐसी कार्रवाई करें कि वो एक नजीर बन जाए।
उधर योगी अपने मठ से प्रदेश की ब्यूरोक्रेसी को अपनी सरकार का संकल्प एवं अधिकारियों को उनका कर्तव्य याद दिला रहे थे और इधर गोरखुपर से करीब पौने सात सौ किलोमीटर दूर कृष्ण की क्रीड़ा स्थली वृंदावन में भूमाफिया एवं ब्यूरोक्रेसी का संगठित गिरोह उनके आदेश-निर्देशों की खुलेआम धज्जियां उड़ा रहा था।
इस गिरोह ने सुनियोजित तरीके से वृंदावन की बेशकीमती जमीन पर खड़े लगभग 300 हरे पेड़ों को रातों-रात काट डाला और इसके मार्ग में बाधक विकास प्राधिकरण की रेलिंग भी उखाड़ दी।
हालांकि इन दोनों ही मामलों में एक ओर वन विभाग तो दूसरी ओर मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण ने अपनी-अपनी तरफ से शिकायत दर्ज कराने की औपचारिकता पूरी कर दी है किंतु इसमें भी यह ध्यान रखा गया है उनके कॉकस का कोई साथी न फंसने पाए।
बहरहाल, ये तो मात्र वो सतही जानकारी है जिसे स्थानीय मीडिया सामने लाने पर मजबूर हो गया अन्यथा सच्चाई इससे कहीं बहुत अधिक कड़वी है।
जनसामान्य के होश उड़ा देने वाली है सच्चाई
दरअसल, जनसामान्य के होश उड़ा देने वाली इस सच्ची कहानी का प्रारंभ वहां से होता है जहां से एक बड़े भूमाफिया की नजर इस बेशकीमती भूखंड पर पड़ती है। सैकड़ों एकड़ का यह भूखंड राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से मथुरा और आगरा को जोड़ने वाले नेशनल हाईवे के किनारे वृंदावन में छटीकरा रोड पर स्थित है।
डालमिया फॉर्म अथवा डालमिया बगीचे के नाम से मशहूर यह भूखंड चूंकि अपनी लोकेशन और वृंदावन जैसे पावन धाम में होने के कारण बहुत कीमती है इसलिए जिस भूमाफिया की नजर सबसे पहले इस पर पड़ी, उसने अपने दूसरे साथियों से इसका जिक्र किया।
बताया जाता है कि पूरी तरह मन बना लेने तथा पर्याप्त पैसों का इंतजाम करने के बाद इन माफियाओं ने डालमिया परिवार से संपर्क साधा और करीब 300 करोड़ रुपए में समूचे भूखंड का सौदा कर डालमिया परिवार को टोकन के रूप में अच्छी-खासी रकम भी दे दी।
सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार वृंदावन की सर्वाधिक प्राइम लोकेशन पर स्थित डालमिया के बगीचे का सौदा तय हो जाने की भनक लगते ही दूसरे माफिया भी सक्रिय हो गए और उन्होंने इसमें अपनी घुसपैठ बनाने के प्रयास शुरू कर दिए।
भूमाफियाओं से ही जुड़े लोगों की मानें तो अंतत: लगभग आठ लोग इस सौदे का हिस्सा बनकर डालमिया के बगीचे पर एक आलीशान रियल एस्टेट प्रोजेक्ट खड़ा करने के लिए सहमत हो गए।
इसके लिए सबसे पहले बाकी लोगों से उनके हिस्से की रकम एकत्र कर डालमिया परिवार को सौंपी गई जिससे बगीचे पर आधिपत्य स्थापित किया जा सके। और हुआ भी ऐसा ही।
अब बात शुरू हुई ब्यूरोक्रेट्स से सेटिंग और वृंदावन मानइर को कब्जाने की
बगीचे पर काबिज होने के बाद स्थानीय प्रशासन की मदद जरूरी थी इसलिए उस पर फोकस किया गया। बहुत कम लोगों की जानकारी में है कि डालमिया फॉर्म से सटी हुई एक वृंदावन माइनर हुआ करती थी। एक अनुमान के अनुसार 20 फुट चौड़ी इस माइनर को माफिया ने सर्वप्रथम समाप्त किया।
आज की तारीख में माइनर की जगह बमुश्किल दो फुट की पट्टी देखी जा सकती है। जमीन का कारोबार करने वाले और स्थानीय लोग समझ सकते हैं कि वृंदावन माइनर पर कब्जा कर लेने के क्या मायने हैं और उससे किसी प्रोजेक्ट की कीमत में कितना इजाफा हो सकता है।
सफेदपोश भूमाफियाओं ने इसकी आड़ में जुटाए सैकड़ों करोड़ रुपए
इतना सब-कुछ कर लेने के बाद असली खेल शुरू हुआ, यानी डालमिया फॉर्म पर प्रोजेक्ट खड़ा करने की रूपरेखा तैयार की गई जिसके लिए प्रशासन अर्थात संबंधित विभागों के उच्च अधिकारियों का सहयोग चाहिए था।
मथुरा जनपद ही नहीं, इसके बाहर भी लोग जानते हैं कि डालमिया के बगीचे को रियल एस्टेट प्रोजेक्ट के तौर पर डेवलप करने की कोशिश में लगे सफेदपोश भूमाफिया कोई मामूली आदमी नहीं हैं। इनमें से सबकी अपनी विशिष्ट पहचान तो है ही, साथ ही सबका अपना बड़ा रसूख है।
कोई सत्ता के शीर्ष तक पहुंच रखने का दावा करता है तो कोई संघ में अपनी तगड़ी पैठ बताता है। इसमें शाायद ही किसी को शक हो कि इस रियल एस्टेट प्रोजेक्ट में शामिल दूसरे कथित उद्योगपति एवं व्यापारी, ब्यूरोक्रेसी के अच्छे लाइजनर हैं और सचिवालय तक से काम कराकर लाने की क्षमता रखते हैं। कुछ तो न्यायपालिका तक में दखल रखने का दम भरते हैं।
मथुरा के एक चर्चित हत्याकांड से भी जुड़ती है कड़ी
बताते हैं कि पिछले साल मथुरा की एक पॉश कॉलोनी में हुए चर्चित हत्याकांड की कड़ियां भी कहीं न कहीं इस भूखंड के सौदे से जुड़ती हैं, बस जरूरत है तो उसकी तह तक पहुंचने की जो शायद ही संभव हो क्योंकि उसका बड़े तरीके से पटाक्षेप करके लीपापोती की जा चुकी है। यूं भी न तो अब किसी को पूरा सच जानने में रुचि है और न हिम्मत, चाहे सवाल बीसियों करोड़ का ही हो। यहां तो सैकड़ों करोड़ का खेल चल रहा है, फिर दस-बीस करोड़ की क्या अहमियत।
वन विभाग के साथ-साथ विकास प्राधिकरण और बिजली विभाग की भूमिका भी संदिग्ध
अगर गौर करें कि एक रात में 300 से अधिक हरे पेड़ कट कैसे गए तो तमाम सवाल खड़े होते हैं। इन सवालों के दायरे में वन विभाग के अलावा विकास प्राधिकरण तथा बिजली विभाग की भूमिका पूरी तरह संदिग्ध दिखाई देती है।
सूत्र बताते हैं कि जिस रात डालिमया फॉर्म हाउस के सैकड़ों पेड़ काटे गए, उस रात दर्जनों उपकरणों को विकास प्राधिकरण की रेलिंग तोड़कर अंदर ले जाया गया। क्षेत्रीय लोगों का कहना है कि इस दौरान बिजली भी कई घंटे बाधित रही जिस कारण पेड़ों का कटान आसान हो गया।
डेवलेपमेंट अथॉरिटी और रियल एस्टेट कारोबारियों के बीच का रिश्ता कितना प्रगाड़ होता है, यह किसी को बताने की शायद जरूरत भी नहीं है। और मथुरा के वन विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार की गूंज आगरा मंडल ही नहीं, लखनऊ तक सुनी जा सकती है किंतु योगी सरकार इस मामले में आज भी कुछ नहीं कर पा रही।
शेष रहा बिजली विभाग तो उसके कर्मचारी चंद हरे नोटों में पेड़ों का कटान होने तक बत्ती गुल करने को तैयार हो गए होंगे। उन्हें करना ही क्या था, बस किसी बहाने शट डाउन लेना था।
जब वन विभाग आंखों देखी मक्खी निगल सकता है, मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण ''एक पेड़ मां के नाम'' जैसे अभियान को पलीता लगाकर सैकड़ों हरे पेड़ एक रात में कटवा सकता है तो बिजली विभाग क्या कुछ घंटों के लिए बत्ती गुल नहीं कर सकता।
भ्रष्टाचार को लेकर योगी जी चलते रहें जीरो टॉलरेंस की नीति पर, मोदी जी चलाते रहें एक पेड़ मां के नाम का अभियान लेकिन सफेदपोश भूमाफिया और सरकारी अधिकारी एवं कर्मचारियों का गिरोह आज भी अपनी मनमानी से रत्तीभर नहीं चूक रहा। उसके मन में न योगी का कौई खौफ है न मोदी का।
2027 में 2022 जैसी परफॉरमेंस दोहराने की चिंता योगी जी को हो तो हो, मोदी जी उससे प्रभावित हों तो हों, लेकिन इस माफिया और अफसरों के गठजोड़ को इससे कोई लेना-देना नहीं है। सारे आदेश-निर्देश ताक पर, क्योंकि इतना कुछ हो जाने के बावजूद मथुरा-वृंदावन के लोग यही कहते सुने जा सकते हैं कि इस गठजोड़ का कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा।
अब देखना केवल यह है कि इस बार भी किसी के कानों पर जूं रेंगती है या फिर जनता के मन में घर कर चुकी धारणा फिर सच साबित होती है।
-Legend News
सोमवार, 23 जनवरी 2023
वैध कॉलोनियों में चल रहे अवैध निर्माण कार्य बने विकास प्राधिकरण की मोटी रिश्वत का जरिया
उत्तर प्रदेश में जिन सरकारी विभागों को 'भ्रष्टाचार का पर्याय' माना जाता है, उनमें विकास प्राधिकरण का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है। संभवत: इसीलिए आम आदमी की भाषा में इसे 'विनाश प्राधिकरण' कहते हैं। प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली बीजेपी की सरकार बनने के बाद भ्रष्टाचार को लेकर 'जीरो टॉलरेंस' की नीति अख्तियार करने का ऐलान किया गया। 2017 में पहली बार सीएम की कुर्सी पर काबिज हुए योगी आदित्यनाथ ने 25 मार्च 2022 को दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। इस तरह इस साल मार्च में उन्हें पूर्ण बहुमत के साथ यूपी की सत्ता संभाले हुए 6 वर्ष पूरे हो जाऐंगे।
इस दौरान गोरक्ष पीठाधीश्वर महंत अवैद्यनाथ के उत्तराधिकारी योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश को 'उत्तम प्रदेश' बनाने के प्रयास में कोई कसर नहीं छोड़ी, बावजूद इसके भ्रष्टाचार को लेकर 'जीरो टॉलरेंस' की नीति प्रभावी दिखाई नहीं देती।रिस्क अधिक तो रिश्वत भी अधिक
सच्चाई तो यह है कि तमाम सरकारी विभागों के अधिकारी और कर्मचारियों ने योगीराज की इस नीति को बड़ी चालाकी से अपने पक्ष में करके रिश्वत के रेट बढ़ा दिए हैं। इन विभागों में साफ-साफ कहा जाता है कि अब रिस्क अधिक है इसलिए काम कराने के पैसे भी अधिक देने होंगे। विकास प्राधिकरण इन विभागों में सबसे ऊपर आता है।
वैसे तो किसी भी अवैध निर्माण को पहले चुपचाप होते देखना और फिर मौका देखते ही उसे भुना लेना विकास प्राधिकरण के अधिकारियों की पुरानी फितरत है, लेकिन अब स्थिति यहां तक जा पहुंची है कि 'वैध कॉलोनियों' में किए जा रहे 'अवैध निर्माण' को भी विभाग ने 'दुधारू गाय' बना लिया है।
भरपूर भ्रष्टाचार के लिए अपनाई गई विकास प्राधिकरण की इस नई नीति का नतीजा है कि आज अप्रूव्ड और स्थापित पॉश कॉलोनियों में भी लोग बेखौफ होकर अवैध निर्माण कर रहे हैं, जिससे न सिर्फ इन कॉलोनियों की सुंदरता नष्ट हो रही है बल्कि सड़कें संकरी और पार्क आदि नष्ट-भ्रष्ट किए जा रहे हैं।
खबर के साथ दिखाए गए चित्र कृष्ण की पावन जन्मस्थली मथुरा में स्थित पॉश कॉलोनी 'श्री राधापुरम एस्टेट' के हैं। नेशनल हाईवे के किनारे बसी इस कॉलोनी में दो कमरे के एक मकान की कीमत सवा करोड़ रुपए से अधिक है, जिसे खरीद पाना सामान्य जन के लिए आसान नहीं।
मशहूर रियल स्टेट कारोबारी 'श्री ग्रुप' द्वारा 15 वर्ष पूर्व करीब 58 एकड़ में विकसित की गई इस कॉलोनी की खूबसूरती तब इसलिए चर्चा का विषय थी कि यहां बनाए गए सभी एक मंजिला मकान रूप-रंग में समान थे और उनके चारों ओर दर्जनों बेहतरीन पार्क बने थे।
लगभग एक हजार मकानों वाली इस कॉलोनी में आज की स्थिति यह है कि दस प्रतिशत मकान ही अपने मूल स्वरूप में बचे हैं। नब्बे प्रतिशत मकानों का पूरा नक्शा बदल दिया गया है। कुछ मकान तो पूरी तरह ध्वस्त करके दोबारा खड़े किए जा रहे हैं लेकिन कोई कुछ बोलने वाला नहीं। नक्शा पास कराए बिना अनेक मकानों का निर्माण एक मंजिल से दो और तीन मंजिल तक जा पहुंचा है परंतु सबकी सेटिंग हो जाती है।
कहने के लिए कॉलोनी का संचालन एक रजिस्टर्ड सोसायटी करती है लेकिन वह सिर्फ मेंटीनेंस चार्ज वसूलने तक सीमित है। फिर चाहे कोई मकान का नक्शा बदल ले, एक मंजिला से बहु मंजिला बना ले, पार्कों पर कब्जा कर ले या उन्हें बर्बाद कर दे, सोसायटी के पदाधिकारियों का इससे कोई लेना-देना नहीं।
यही कारण है कि आज सर्वाधिक पॉश कॉलोनियों में शुमार 'श्री राधापुरम एस्टेट' के अधिकांश निवासी मनमानी करते देखे जा सकते हैं।
हां, उनकी इस मनमानी का पूरा लाभ विकास प्राधिकरण उठा रहा है। नवधनाढ्यों की यह कॉलोनी आज उनके लिए मोटी अतिरिक्त आमदनी का बड़ा जरिया बन चुकी है।
बात चाहे मकान का नक्शा बदलने की हो या फिर उसे रीसेल करने की। हर हाल में विकास प्राधिकरण के अधिकारियों की बन आती है। वो मौका मुआयना करने के बाद खुद ही बता देते हैं कि गैर कानूनी कार्य को किस तरह 'कानूनी जामा' पहनाना है और उसकी कीमत कितनी होगी।
उदाहरण के लिए यदि किसी ने अपने दो मंजिला मकान का सौदा पौने दो करोड़ रुपए में किया है लेकिन कागजों पर वह एक मंजिला ही है क्योंकि कॉलोनी केवल एक मंजिला मकानों के लिए अप्रूव्ड हुई थी। अब ऐसे में मकान की रजिस्ट्री भी उसके मूल स्वरूप में संभव है लिहाजा रजिस्ट्री ऑफिस यथास्थिति दर्शाने का सुविधा शुल्क अपने हिसाब से वसूलता है, वो भी तब जबकि विकास प्राधिकरण से हरी झंडी मिल जाती है।
हरी झंडी दिखाने से पहले विकास प्राधिकरण के अधिकारी प्रथम तो रीसेल हो रहे मकान का स्थलीय निरीक्षण करते हैं, और फिर अवैध निर्माण सहित स्टांप ड्यूटी हड़प जाने तक का गुणा-भाग निकाल कर अपनी जेब गरम करते हैं। इस क्रिया में सरकार को लगने वाले चूने का लेखा-जोखा आंक कर सौदेबाजी की जाती है ताकि कोई पक्ष घाटे में न रहे।
यह एक पॉश कॉलोनी तो योगी सरकार की भ्रष्टाचार को लेकर अपनाई गई 'जीरो टॉलरेंस' नीति को भुनाने में अपनाई जा रही इस ट्रिक का उदाहरण भर है, अन्यथा ब्रज की दूसरी दर्जनों कॉलोनियों से लेकर प्रदेश भर की वैध कॉलोनियों में इसी ट्रिक से अवैध निर्माण कराया जा रहा है और इससे अपनी तिजोरियां भर रहे हैं विकास प्राधिकरण के अधिकारी तथा कर्मचारी।
सरकारी खजाने को चूना लगाने की यह ट्रिक चूंकि खरीदने और बेचने वालों के लिए भी मुफीद है इसलिए वो इस पर चुप रहने में ही अपनी भलाई समझते हैं।
इस ट्रिक का सबसे ज्यादा इस्तेमाल तब से शुरू हुआ है जब से नई कॉलोनियों के निर्माण में कमी आई है और रियल एस्टेट का कारोबार मंदा पड़ा है।
यदि सरकार अब भी इस ओर ध्यान दे तो एक ओर जहां अच्छी-खासी वेलडेवलप कॉलोनियां बदसूरत होने से बच सकती हैं वहीं दूसरी ओर वैध व व्यवस्थित तरीके से निर्माण कराकर सरकारी खजाना भी भरा जा सकता है। वर्ना तो भ्रष्टाचार रोकने के लिए बनी जीरो टॉलरेंस नीति इसी तरह सरकारी अधिकारी और कर्मचारियों के लिए वरदान साबित होती रहेगी, साथ ही विकास की बजाय विनाश का कारण भी बनेगी।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
गुरुवार, 17 जून 2021
एक नजर देखिए: केंद्र और राज्य के “अभियान” की किस तरह हवा निकाल रहा है “विकास प्राधिकरण”
लकड़ी से थनों को छूकर अपने क्षेत्र की दुधारू गाएं दुहने में माहिर उत्तर प्रदेश के विकास प्राधिकरण शासन के आदेश-निर्देशों और अभियानों की हवा निकालने में भी कितने दक्ष हैं, इसका एक ताजा उदाहरण तब देखने को मिला जब मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण की ओर से आज एक पेंपलेट अखबारों में रखकर लोगों के घर पहुंचाया गया।बिना किसी प्रोजेक्ट के निठल्ला चिंतन करने में व्यस्त इस धार्मिक जनपद के विकास प्राधिकरण की यूं तो अनगिनित कारगुजारियां चर्चा में हैं लेकिन फिलहाल बात केवल ‘वर्षा जल संचयन’ की।
देखिए ये पेंपलेट:
दर
असल, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विश्व जल दिवस के अवसर पर 22 मार्च 2021 को नई दिल्ली में वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से ‘जल शक्ति अभियान: वर्षा जल संचयन (Catch the Rain)’ अभियान की शुरूआत की थी। इस अभियान का उद्देश्य भारत के विकास में सामने आ रही जल संकट की चुनौती से निपटना है।
प्रधानमंत्री ने मानसून तक जल संरक्षण के प्रयासों को आगे बढ़ाने का आह्वान किया और सरपंचों से लेकर जिलाधिकारियों तथा उपायुक्तों से जोर देते हुए कहा कि जल शपथ’ जो पूरे देश में आयोजित की जा रही है, हर किसी की प्रतिज्ञा के साथ-साथ अब स्वभाव बननी चाहिए। उन्होंने कहा कि जब पानी को लेकर हमारा स्वभाव बदलेगा, तो प्रकृति भी हमारा साथ देगी।
30 नवंबर 2021 तक प्री-मानसून और मानसून अवधि के दौरान देशभर में चलने वाले इस जल संरक्षण अभियान को जमीनी स्तर पर लाने के लिए प्रधानमंत्री ने इसे बाकायदा एक आंदोलन के रूप में लॉन्च करने की बात कही है।
प्रधानमंत्री के आह्वान पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यानाथ ने भी वर्षा जल संचयन के लिए विशेष अभियान चलाने का फैसला किया।
इसके लिए उन्होंने 10 एकड़ से अधिक क्षेत्रफल वाली टाउनशिप के एक फीसदी क्षेत्र में जलाशय का निर्माण कराना अनिवार्य कर दिया।
इस संदर्भ में प्रमुख सचिव आवास दीपक कुमार ने एक शासनादेश जारी करते हुए कहा कि 10 एकड़ से अधिक क्षेत्रफल की योजनाओं के ले-आउट प्लान्स में पार्क और खुले क्षेत्र के लिए प्रस्तावित भूमि के अंतर्गत जलाशय या जलाशयों का निर्माण अनिवार्य रूप से किया जाएगा।
जलाशय निर्माण से पूर्व संबंधित योजना के अंतर्गत वर्षा जल के प्राकृतिक कैचमेंट एरिया को चिह्नित करते हुए पानी के ठहराव की व्यवस्था की जाएगी।
पार्क व खुले क्षेत्र के अंतर्गत निर्धारित मानकों के अनुसार एक कोने में रिचार्ज पिट, रिचार्ज शैफ्ट बनाए जाएंगे। ऐसे में रिचार्ज पिट, रिचार्ज शैफ्ट और जलाशय का निर्माण मानक के अनुसार किया जाएगा।
पार्कों में पक्का निर्माण पांच प्रतिशत से अधिक नहीं किया जाएगा। फुटपाथ व ट्रैक्स यथासंभव परमीएबिल या सेमी परिमीएबिल ब्लॉक्स के प्रयोग से ही बनाए जाएंगे। वर्षा जल के अधिकतम भूमिगत रिसाव को पार्क एवं खुले क्षेत्रों में प्रोत्साहित किया जाएगा। सड़कों, पार्कों और खुले स्थान में ऐसे पेड़-पौधों का वृक्षारोपण किया जाएगा, जिनको जल की न्यूनतम जरूरत होगी। शासकीय भवनों, निजी सोसायटियों, सहकारी आवास समितियों द्वारा प्रस्तावित नई योजनाओं के ले-आउट प्लान में दुर्बल व अल्प आय वर्ग को छोड़कर अवस्थापना सुविधाओं जैसे जलापूर्ति, ड्रेनेज व सीवरेज के नेटवर्क के साथ-साथ रूफ टॉप रेन वाटर हार्वेस्टिंग के माध्यम से भू-जल सामूहिक रिचार्जिंग के लिए अन्य नेटवर्क का प्रावधान किया जाएगा।
इसके अलावा 300 वर्ग मीटर या उससे अधिक क्षेत्रफल के भूखंडों में यदि सामूहिक रिचार्ज नेटवर्क नहीं है तो भवन स्वामी को स्वयं ही वर्षा जल संचयन के लिए व्यवस्था करनी होगी।
विकास प्राधिकरण वर्षा जल संचयन के संबंध में की गई कार्यवाही की रिपोर्ट हर माह की 15 तारीख को आवास बंधु के निदेशक को उपलब्ध कराएंगे।
अब देखिए मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण की उपलब्धि
एक ऐसे गंभीर संकट पर जिसे लेकर केंद्र ही नहीं राज्य सरकार भी चिंता जता रही है और तमाम आदेश-निर्देश जारी कर चुकी है, उसके लिए मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के जिम्मेदार अधिकारियों ने आज अखबारों में पेंपलेट डलवाने से पहले शायद ही कुछ किया हो।
इसके उलट हो ये रहा है कि प्राधिकरण से अप्रूव्ड पचासों एकड़ में फैली उन पॉश कॉलोनियों के अंदर भी मकान मालिक बिना किसी अनुमति के बेखौफ होकर अनावश्यक रूप से सबमर्सिबल लगवा रहे हैं, जबकि इन कॉलोनियों में नियमित सुबह-शाम कई-कई घंटे पेयजल की सप्लाई की जाती है।
ये सब हो इसलिए रहा है कि नक्शा पास करने की औपचारिकता पूरी करने के बाद विकास प्राधिकरण का कोई जिम्मेदार अधिकारी कभी पलटकर इन कॉलोनियों की ओर झांकने भी नहीं जाता।
बात बिजली-पानी या सड़क की हो अथवा पार्कों के रख-रखाव एवं अवैध निर्माण की, विकास प्राधिकरण के अधिकारियों को किसी बात से कोई मतलब नहीं जबकि ये सब देखना उनकी जिम्मेदारी है।
जाहिर है कि इस मानसिकता के चलते वो न तो किसी कॉलोनी में रेजिडेंट वेलफेयर सोसायटी यानी RWA के सहयोग से जल संचयन का कोई कार्य करवा सकेंगे और ना ही 300 वर्गमीटर से अधिक क्षेत्रफल वाले भूखंडों में रूफटॉप रेनवाटर हार्वेस्टिंग का प्रावधान सुनिश्चित करवा पाएंगे।
विकास प्राधिकरण के अधिकारियों की ऐसी मानसिकता किसी एक जिले तक सीमित नहीं है। सच तो यह है कि समूचे प्रदेश में अधिकांश अधिकारियों का यही हाल है इसलिए ज्यादातर विकास प्राधिकरण एक ढर्रे पर चलते दिखाई देते हैं।
हो सकता है कि ‘जल शक्ति अभियान: वर्षा जल संचयन (कैच द रेन)’ जैसा अभियान भी इन अधिकारियों के लिए ‘आपदा में अवसर’ साबित हो और समस्त सरकारी आदेश-निर्देश इसी तरह पेंपलेट बांटकर निपटा लिए जाएं क्योंकि उत्तर प्रदेश नगर योजना एवं विकास अधिनियम-1973 इन्हें किसी के भी खिलाफ ‘सुसंगत’ धाराओं में कार्यवाही करने का अधिकार जो देता है।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
प्रधानमंत्री ने मानसून तक जल संरक्षण के प्रयासों को आगे बढ़ाने का आह्वान किया और सरपंचों से लेकर जिलाधिकारियों तथा उपायुक्तों से जोर देते हुए कहा कि जल शपथ’ जो पूरे देश में आयोजित की जा रही है, हर किसी की प्रतिज्ञा के साथ-साथ अब स्वभाव बननी चाहिए। उन्होंने कहा कि जब पानी को लेकर हमारा स्वभाव बदलेगा, तो प्रकृति भी हमारा साथ देगी।
30 नवंबर 2021 तक प्री-मानसून और मानसून अवधि के दौरान देशभर में चलने वाले इस जल संरक्षण अभियान को जमीनी स्तर पर लाने के लिए प्रधानमंत्री ने इसे बाकायदा एक आंदोलन के रूप में लॉन्च करने की बात कही है।
प्रधानमंत्री के आह्वान पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यानाथ ने भी वर्षा जल संचयन के लिए विशेष अभियान चलाने का फैसला किया।
इसके लिए उन्होंने 10 एकड़ से अधिक क्षेत्रफल वाली टाउनशिप के एक फीसदी क्षेत्र में जलाशय का निर्माण कराना अनिवार्य कर दिया।
इस संदर्भ में प्रमुख सचिव आवास दीपक कुमार ने एक शासनादेश जारी करते हुए कहा कि 10 एकड़ से अधिक क्षेत्रफल की योजनाओं के ले-आउट प्लान्स में पार्क और खुले क्षेत्र के लिए प्रस्तावित भूमि के अंतर्गत जलाशय या जलाशयों का निर्माण अनिवार्य रूप से किया जाएगा।
जलाशय निर्माण से पूर्व संबंधित योजना के अंतर्गत वर्षा जल के प्राकृतिक कैचमेंट एरिया को चिह्नित करते हुए पानी के ठहराव की व्यवस्था की जाएगी।
पार्क व खुले क्षेत्र के अंतर्गत निर्धारित मानकों के अनुसार एक कोने में रिचार्ज पिट, रिचार्ज शैफ्ट बनाए जाएंगे। ऐसे में रिचार्ज पिट, रिचार्ज शैफ्ट और जलाशय का निर्माण मानक के अनुसार किया जाएगा।
पार्कों में पक्का निर्माण पांच प्रतिशत से अधिक नहीं किया जाएगा। फुटपाथ व ट्रैक्स यथासंभव परमीएबिल या सेमी परिमीएबिल ब्लॉक्स के प्रयोग से ही बनाए जाएंगे। वर्षा जल के अधिकतम भूमिगत रिसाव को पार्क एवं खुले क्षेत्रों में प्रोत्साहित किया जाएगा। सड़कों, पार्कों और खुले स्थान में ऐसे पेड़-पौधों का वृक्षारोपण किया जाएगा, जिनको जल की न्यूनतम जरूरत होगी। शासकीय भवनों, निजी सोसायटियों, सहकारी आवास समितियों द्वारा प्रस्तावित नई योजनाओं के ले-आउट प्लान में दुर्बल व अल्प आय वर्ग को छोड़कर अवस्थापना सुविधाओं जैसे जलापूर्ति, ड्रेनेज व सीवरेज के नेटवर्क के साथ-साथ रूफ टॉप रेन वाटर हार्वेस्टिंग के माध्यम से भू-जल सामूहिक रिचार्जिंग के लिए अन्य नेटवर्क का प्रावधान किया जाएगा।
इसके अलावा 300 वर्ग मीटर या उससे अधिक क्षेत्रफल के भूखंडों में यदि सामूहिक रिचार्ज नेटवर्क नहीं है तो भवन स्वामी को स्वयं ही वर्षा जल संचयन के लिए व्यवस्था करनी होगी।
विकास प्राधिकरण वर्षा जल संचयन के संबंध में की गई कार्यवाही की रिपोर्ट हर माह की 15 तारीख को आवास बंधु के निदेशक को उपलब्ध कराएंगे।
अब देखिए मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण की उपलब्धि
एक ऐसे गंभीर संकट पर जिसे लेकर केंद्र ही नहीं राज्य सरकार भी चिंता जता रही है और तमाम आदेश-निर्देश जारी कर चुकी है, उसके लिए मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के जिम्मेदार अधिकारियों ने आज अखबारों में पेंपलेट डलवाने से पहले शायद ही कुछ किया हो।
इसके उलट हो ये रहा है कि प्राधिकरण से अप्रूव्ड पचासों एकड़ में फैली उन पॉश कॉलोनियों के अंदर भी मकान मालिक बिना किसी अनुमति के बेखौफ होकर अनावश्यक रूप से सबमर्सिबल लगवा रहे हैं, जबकि इन कॉलोनियों में नियमित सुबह-शाम कई-कई घंटे पेयजल की सप्लाई की जाती है।
ये सब हो इसलिए रहा है कि नक्शा पास करने की औपचारिकता पूरी करने के बाद विकास प्राधिकरण का कोई जिम्मेदार अधिकारी कभी पलटकर इन कॉलोनियों की ओर झांकने भी नहीं जाता।
बात बिजली-पानी या सड़क की हो अथवा पार्कों के रख-रखाव एवं अवैध निर्माण की, विकास प्राधिकरण के अधिकारियों को किसी बात से कोई मतलब नहीं जबकि ये सब देखना उनकी जिम्मेदारी है।
जाहिर है कि इस मानसिकता के चलते वो न तो किसी कॉलोनी में रेजिडेंट वेलफेयर सोसायटी यानी RWA के सहयोग से जल संचयन का कोई कार्य करवा सकेंगे और ना ही 300 वर्गमीटर से अधिक क्षेत्रफल वाले भूखंडों में रूफटॉप रेनवाटर हार्वेस्टिंग का प्रावधान सुनिश्चित करवा पाएंगे।
विकास प्राधिकरण के अधिकारियों की ऐसी मानसिकता किसी एक जिले तक सीमित नहीं है। सच तो यह है कि समूचे प्रदेश में अधिकांश अधिकारियों का यही हाल है इसलिए ज्यादातर विकास प्राधिकरण एक ढर्रे पर चलते दिखाई देते हैं।
हो सकता है कि ‘जल शक्ति अभियान: वर्षा जल संचयन (कैच द रेन)’ जैसा अभियान भी इन अधिकारियों के लिए ‘आपदा में अवसर’ साबित हो और समस्त सरकारी आदेश-निर्देश इसी तरह पेंपलेट बांटकर निपटा लिए जाएं क्योंकि उत्तर प्रदेश नगर योजना एवं विकास अधिनियम-1973 इन्हें किसी के भी खिलाफ ‘सुसंगत’ धाराओं में कार्यवाही करने का अधिकार जो देता है।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
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