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सोमवार, 23 फ़रवरी 2026
MVDA के भ्रष्टाचार की बुनियाद पर तेजी से खड़ा हो रहा है 5 सितारा प्रोजेक्ट, शिकायतें डस्टबिन में
वृंदावन हो या गोवर्धन, कोसी हो या बरसाना, या फिर मथुरा शहर ही क्यों न हो। MVDA (मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण) के क्षेत्र में कहीं भी हो रहा निर्माण कार्य उसके भ्रष्टाचार की दास्तान चीख-चीख कर सुना रहा है किंतु न कोई सुनने वाला है और न एक्शन लेने वाला क्योंकि इस हमाम में सब नंगे जो हैं। कॉलोनी, होटल, दुकान, मकान, मॉल, आश्रम, धर्मशाला, हॉस्पिटल, गेस्ट हाउस, यहां तक कि कारों के शोरूम भी इस धर्म नगरी में अधर्म के रास्ते पर चलकर खड़े कर दिए गए और लगातार खड़े किए जा रहे हैं किंतु कहीं किसी पर कोई लगाम भी लगती नजर नहीं आ रही।
ऐसा नहीं है कि लोग शिकायत नहीं करते। शिकायतें भी हो रही हैं, परंतु नतीजा शून्य निकल रहा है क्योंकि शिकायतों का निस्तारण ही शब्दों के जाल में इस कदर उलझाकर किया जाता है कि शिकायतकर्ता अपना माथा पीटने पर मजबूर हो जाता है। आखिर में उसके पास एक ही ऑप्शन बचता है, और बचता है न्यायालय की शरण में जाने का।
हालांकि वहां से भी अब तक अवैध निर्माण करने वालों के खिलाफ तो फैसले आए है परंतु कराने वाले जिम्मेदार अधिकारी साफ बच निकलते हैं इसलिए उनका भ्रष्टाचार बदस्तूर जारी रहता है। कानून की किताब में बेशक रिश्वत लेने वाला और देने वाला दोनों को दोषी माना जाता हो, किंतु अधिकांशत: नुकसान देने वाले को ही उठाना पड़ता है।
MVDA के भ्रष्टाचार की बुनियाद पर कोसी में तेजी से खड़ा हो रहा है पांच सितारा होटल Country Inn
दिल्ली-मथुरा-आगरा नेशनल हाईवे पर लगभग 14 एकड़ में फैला होटल Country Inn मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के भ्रष्टाचार का एक और ज्वलंत उदाहरण है।
इस पांच सितारा प्रोजेक्ट के लिए बेखौफ किए जा रहे अवैध निर्माण कार्य और सरकारी जमीन कब्जाने की शिकायत जब हुई तो प्राधिकरण की ओर से 30 अक्टूबर 2025 को इस आशय का जवाब दिया गया कि स्थल का निरीक्षण किया गया। मानचित्र स्वीकृत कराए बिना निर्माण कार्य कराए जाने पर उत्तर प्रदेश नगर योजना एवं विकास अधिनियम की धारा 1973 के तहत सुसंगत धाराओं के अंतर्गत वाद संख्या MTDA/Z2/ANI/2025/00000680 योजित किया गया है।
तत्पश्चात् आवेदक/निर्माणकर्ता द्वारा शमन मानचित्र प्रस्तुत किए गए हैं। स्थलीय एवं अभिलेखीय सत्यापन कर जांच आख्या उपलब्ध कराने के लिए तहसीलदार छाता को पत्र दिनांक 06.10.2025 प्रेषित किया गया है।
तहसीलदार छाता की जांच आख्या क्या कहती है?
तहसीलदार छाता ने इस प्रकरण में 13 फरवरी 2026 को अपनी जांच आख्या प्रस्तुत करते हुए लिखा- लेखपाल कोसी द्वारा मौके का निरीक्षण किया गया। राजस्व निरीक्षक की आख्या के अनुसार यह प्रकरण नगर पालिका कोसी कलां की आबादी का है। कुल मिलाकर सरकारी जमीन को कब्जामुक्त कराने का जिम्मा अब नगर पालिका कोसीकलां के पाले में डाल दिया गया।
रही बात बिना नक्शा पास कराए एक प्राइम लोकेशन पर पांच सितारा होटल खड़ा किए जाने की तो उसके लिए मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के अधिकारी होटल मालिकों को बीच का रास्ता निकालने की सलाह उसी प्रकार दे रहे हैं, जिस प्रकार वह दूसरे अवैध निर्माण कार्यों के मामले में अब तक देते रहे हैं।
जाहिर है ये दूसरा रास्ता भी जल्द ही तब खुल जाएगा जब प्रोजेक्ट की लागत, बिना नक्शा पास कराए किए गए निर्माण कार्य तथा अन्य सभी अनियमितताओं से होने वाले लाभ-हानि को देखकर लेन-देन की रकम तय हो जाएगी और उसकी पहली किस्त अधिकारियों तक पहुंचा दी जाएगी।
विकास प्राधिकरण के ही सूत्र बताते हैं होटल Country Inn के मालिकों से विकास प्राधिकरण के अफसरों की बैठकों का सिलसिला जारी है, और उम्मीद है कि शीघ्र ही 'सुविधा शुल्क' के लेन-देन की प्रक्रिया पूरी हो जाएगी। फिर प्रक्रिया पूरी होते ही योजित वाद संख्या MTDA/Z2/ANI/2025/00000680 को समायोजित कर लिया जाएगा।
वाद समायोजित होने के साथ ही सब-कुछ उसी तरह आयोजित होगा जिस तरह अब तक होता रहा है। ये बात अलग है कि शिकायतकर्ता एकबार फिर इसलिए अपना सिर पीट लेगा कि आखिर उसने शिकायत की ही क्यों थी, और शिकायत का नतीजा क्या निकला।
-Legend News
शुक्रवार, 26 दिसंबर 2025
सनसिटी अनंतम: विकास प्राधिकरण के भ्रष्टाचार की अनंत कथा का ज्वलंत उदाहरण
महाभारत नायक योगीराज भगवान श्रीकृष्ण की लीला स्थली में डेवलव हो रही 'सनसिटी अनंतम' को यदि MVDA (मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण) के भ्रष्टाचार की अनंत कथा का एक अध्याय कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। दूसरे शब्दों में कहें तो इस विश्व प्रसिद्ध धार्मिक नगरी की डेवलपमेंट अथॉरिटी के हर प्रोजेक्ट का आदि और अंत भ्रष्टाचार की एक ऐसी अनंतकथा होता है जिसमें पर्त-दर पर्त 'योगीराज' के आदेश-निर्देशों सहित नियम-कानून की धज्जियां उड़ाई जाती हैं। फिर वह चाहे MVDA का अपना प्रोजेक्ट हो या उसके द्वारा अधिकृत किसी का निजी प्रोजेक्ट।
डालमिया बाग के गुरू कृपा तपोवन में डेवलपर को अनुचित लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से की गई अनेक कारस्तानियों के बाद अब मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण ने सनसिटी अनंतम से जुड़े रियल एस्टेट कारोबारियों के हित में वो काम कर दिखाया है जिसकी जांच की जाए तो भ्रष्टाचार की एक ऐसी मिसाल सामने होगी जिसकी सामान्यत: कल्पना करना भी मुश्किल होगा। साधारण शब्दों में कहें तो वृंदावन के इस लग्जरी हाउसिंग प्रोजेक्ट के लिए MVDA के खास जिम्मेदार अधिकारी ने एक रियल एस्टेट के ''दलाल'' की भूमिका अदा की है।
अधिकारियों के ''दलाल'' बन जाने की पुष्टि करता पत्र
सनसिटी अनंतम को डेवलप कराने के अथक प्रयासों में अधिकारियों की दलाल वाली भूमिका का खुलासा उस पत्र द्वारा होता है जो MVDA के तत्कालीन उपाध्यक्ष श्याम बहादुर सिंह के हस्ताक्षर से 28 जून 2025 को जिलाधिकारी मथुरा को लिखा गया है और जिसमें डीएम के समक्ष 5.8236 हेक्टेयर भूमि के अधिग्रहण का प्रस्ताव रखा गया है।
यह पत्र मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण में बेखौफ भष्टाचार का बड़ा सबूत है क्योंकि इसमें नियामक और लाभार्थी के बीच की रेखा को ताक पर रखकर बिल्डर को ही आवेदक बता दिया गया है।
आरटीआई पर खामोशी भी बहुत कुछ कहती है
यहां गौर करने वाली बात यह है कि राज्य की एक महत्वपूर्ण इकाई निजी स्वार्थ में किस कदर अंधी है कि वह सनसिटी अनंतम के हित में खेले जा रहे इस खेल की कोई जानकारी तक देने को तैयार नहीं है और आरटीआई का इस्तेमाल करने वालों को लगातार गुमराह करती रही है। कुछ आरटीआई का जवाब नहीं दिया जाता तो कुछ को शब्दों के जाल में उलझा दिया जाता है जिससे आवेदनकर्ता थक-हार कर घर बैठ जाए।
दरअसल, मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण आरटीआई के मामले में एक लंबे समय से इसी रणनीति को अख्तियार किए हुए है और इससे अपने मकसद में सफल होता रहा है।
चौंकाता है लेन-देन का यह गणित
रियल एस्टेट कारोबार से जुड़े माफिया और डेवलपमेंट अथॉरिटी की कुटिल चालों वाली प्रक्रिया से सामने आने वाला लेन-देन का गणित किसी को भी चौंका सकता है।
अगर बात करें सनसिटी अनंतम की तो यहां का वर्तमान अनुमानित सर्किल रेट 20 करोड़ रुपए प्रति हेक्टेयर है जबकि डेवलपर की ओर से वर्तमान विक्रय मूल्य रखा गया है 1 लाख रुपए वर्ग मीटर। इस हिसाब से यह मूल्य बनता है लगभग 100 करोड़ रुपए (एक अरब) प्रति हेक्टेयर यानी अधिग्रहण के अधिकतम मूल्य से भी पूरा पांच गुना ज्यादा। संभवत: यही कारण है कि आज हर वो व्यक्ति रियल एस्टेट के करोबार में उतरने को आतुर रहता है जिसके पास थोड़ा भी पैसा है।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता और सनसिटी अनंतम के याचिकाकर्ता की ओर से एनजीटी में पैरवी कर रहे नरेन्द्र कुमार गोस्वामी कहते हैं कि भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापना अधिनियम 2013 के तहत निजी कंपनियों के लिए अधिग्रहण हेतु 80% प्रभावित परिवारों की सहमति अनिवार्य है लेकिन इस मामले में सार्वजनिक सुनवाई के अभिलेख सहमति नहीं बल्कि बड़ी आपत्तियाँ और 'असहमति' दर्शाते हैं।
पहले डालमिया बाग और अब सनसिटी अनंतम के लिए मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण की रियल एस्टेट माफिया के साथ साबित होती सांठगांठ यह बताती है कि विकास प्राधिकरण के अधिकारियों को योगी आदित्यनाथ की भ्रष्टाचार को लेकर प्रचारित जीरो टॉलरेंस नीति के सच का पता लग चुका है।
वह जान गए हैं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ ढोल पीटने और उसके खिलाफ पूरी ताकत से खड़े हो जाने में बड़ा फर्क है। यदि ऐसा न होता तो मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के अनेक कारनामे खुल जाने के बावजूद किसी एक जिम्मेदार अधिकारी को कठघरे में खड़ा किया जाता। किसी से तो पूछा जाता कि धर्म की नगरी में खुलेआम खेले जा रहे अधर्म के इस खेल का असल खिलाड़ी कौन है और कौन है जो रियल एस्टेट माफिया को संरक्षण देता है।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
रविवार, 5 अक्टूबर 2025
वो सरकारी विभाग, जहां दम तोड़ देती है योगी बाबा की भ्रष्टाचार को लेकर बनी जीरो टॉलरेंस नीति
दैनिक जागरण के आगरा एडिशन की संपादकीय में 2 अक्टूबर गांधी जयंती को 'यह कैसी कार्यशैली' शीर्षक से एक महिला का दर्द लिखा है। दरअसल, इस महिला ने लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) से नीलामी में सवा करोड़ रुपए मूल्य का एक भूखंड खरीदकर वहां अपना घर बनवाया। प्राधिकरण से ही नीलाम भूखंड पर बने इस घर को हाल ही में लखनऊ विकास प्राधिकरण ने ध्वस्त कर दिया। शिकायत के बाद जांच होने पर एलडीए ने माना कि लेआउट परिवर्तन के दौरान गलती से यह भूखंड 'मिसिंग' में दर्ज हो गया, जिसके कारण मकान के ध्वस्तीकरण की कार्रवाई हुई। नीलामी में सवा करोड़ का प्लॉट खरीदने के बाद महिला ने उस पर मकान कितनी मुश्किलों से और और कैसे-कैसे पैसे का इंतजाम करके बनवाया होगा, इसका अंदाज कोई भी लगा सकता है। लेकिन भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे सरकारी संरक्षण प्राप्त विकास प्राधिकरण के अधिकारी अब उस महिला को 'फ्लैट' ऑफर कर रहे हैं। जरा सोचिए कि यह हाल तो प्रदेश की राजधानी के उस विकास प्राधिकरण का है जहां स्वयं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपने पूरे मंत्रिमंडल और सभी बड़े अफसरों के साथ बैठते हैं।
यह भी सोचिए कि जब लखनऊ विकास प्राधिकरण का यह आलम है तो प्रदेश के उन शहरों की डेवलपमेंट अथॉर्टीज का क्या हाल होगा, जहां से लखनऊ तक आवाज पहुंचाना भी आसान काम नहीं है।
सीएम योगी अपने पहले कार्यकाल से यह कहते चले आ रहे हैं कि भ्रष्टाचार पर उनकी सरकार कोई कंप्रोमाइज नहीं करेगी और इसे लेकर उनकी नीति हमेशा जीरो टॉलरेंस की रहेगी।
ऐसे में इस तरह के सवाल उठना स्वाभाविक है कि योगी सरकार की इतनी सख्ती और स्वयं योगी आदित्यनाथ की बेदाग छवि के बावजूद विकास प्राधिकरण के भ्रष्ट अधिकारियों एवं कर्मचारियों की पूंछ सीधी क्यों नहीं होती?
क्यों प्रदेशभर के विकास प्राधिकरण भ्रष्टाचार का पर्याय बने हुए हैं और क्यों उनके मन में योगी सरकार अथवा योगी आदित्यनाथ का कोई खौफ नहीं है?
इन प्रश्नों का एक ही उत्तर है कि योगी सरकार ने जिस तरह का अभियान कानून-व्यवस्था पर फोकस करके सामाजिक अपराधियों के खिलाफ चलाया, वैसा कोई अभियान भ्रष्टाचारियों के खिलाफ आज तक कभी नहीं चलाया गया। कभी-कभार किसी अधिकारी पर कोई कार्रवाई हुई भी है तो वह भ्रष्टाचारियों के मन में भय व्याप्त करने के लिए अपर्याप्त रही। और अगर बात करें विशेष तौर पर प्रदेश के सर्वाधिक भ्रष्ट विभाग विकास प्राधिकरण की तो उसका कोई अधिकारी शायद ही कभी कार्रवाई के भी दायरे में आया हो। यही कारण है कि विकास प्राधिकरण के आगे शहरों के नाम भले ही बदल जाते हैं परंतु उसकी भ्रष्ट कार्यशैली कहीं नहीं बदलती। वह हर जगह एक जैसी पायी जाती है।
मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण, अंधेर नगरी-चौपट राजा
देश ही नहीं, दुनिया में अपनी विशिष्ट धार्मिक पहचान रखने वाली योगीराज भगवान श्रीकृष्ण की पावन जन्मस्थली और क्रीड़ास्थली मथुरा-वृंदावन के विकास प्राधिकरण का हाल जानकर तो ऐसा लगता है जैसे यहां अंधेर नगरी-चौपट राजा की कहावत चरितार्थ हो रही हो।
मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण को यदि भ्रष्ट अधिकारियों का पसंदीदा स्थान कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
वृंदावन का डालमिया बाग घोटाला है सबसे बड़ा उदाहरण
पिछले साल इन्हीं दिनों वृंदावन स्थित डालमिया बाग पर गुरुकृपा तपोवन के नाम से एक कॉलानी डेवलप करने के लिए मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण में नक्शा मूव किया गया, लेकिन अप्रूवल से पहले ही भूमाफिया ने जमकर उसका फर्जी प्रचार किया और प्लॉट बुक करने शुरू कर दिए। माफिया ने इस नक्शे के आवेदन की आड़ में अनुमानत: एक हजार करोड़ रुपया एकत्र कर लिया परंतु विकास प्राधिकरण तमाशा देखता रहा।
चूंकि भूमाफिया ने कॉलोनी डेवलेव करने की जल्दी में डालमिया बाग के साढ़े चार सौ से अधिक हरे वृक्ष रातों-रात काट डाले इसलिए यह मामला पहले एनजीटी और फिर सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंचा।
मामला देश की सर्वोच्च अदालत की चौखट पर पहुंचा तो सरकार के कानों पर भी जूं रेंगनी प्रारंभ हुई, नतीजतन तत्कालीन कमिश्नर आगरा मंडल ऋतु माहेश्वरी ने भी मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण (एमवीडीए) की भूमिका का पता लगाने के लिए एक कमेटी का गठन कर जांच रिपोर्ट पेश करने को कहा।
बहरहाल, चोर-चोर मौसेरे भाई की कहावत फिर सच साबित हुई और मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के किसी अधिकारी का कुछ नहीं बिगड़ा। ये बात अलग है कि सुप्रीम कोर्ट के सख्त फैसले ने एक ओर जहां भूमाफिया की पूरी प्लानिंग चौपट कर दी वहीं विकास प्राधिकरण (एमवीडीए) के अधिकारियों की हसरतों पर पानी फेर दिया क्योंकि इस प्रोजेक्ट के डेवलपर, एमवीडीए के अधिकारियों की दुधारू गाय साबित हो रहे थे। यदि सब-कुछ वैसे ही चलता रहता जैसे एमवीडीए के अधिकारी और भूमाफिया चाह रहे थे तो भूमाफिया जहां अरबों कमाते वहीं कई अधिकारी करोड़ों कमा ले गए होते।
जो भी हो, मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के लिए न तो गुरुकृपा तपोवन कोई पहला प्रोजेक्ट था और न अंतिम। दुनिया के आकर्षण का केंद्र मथुरा नगरी में जाने कितने डेवलपर हर रोज विकास प्राधिकरण के चक्कर काटने को मजबूर हैं। कोई अवैध निर्माण के लिए चक्कर काट रहा है तो कोई वैध काम कराने के लिए क्योंकि काम कैसा भी हो, विकास प्राधिकरण की चौखट चूमे बिना कुछ भी संभव नहीं हो सकता।
बड़े-बड़े करोड़पति और अरबपति दो के चार और सात के सोलह इनकी कृपा के बिना नहीं कर सकते। इनकी नजर बनी रहे तो शहर के बीचों-बीच अवैध बहुमंजिला इमारत खड़ी की जा सकती है और ये यदि नजर फेर लें तो वैध इमारत को भी मिट्टी में मिला सकते हैं।
लखनऊ की उस महिला का वैध मकान इसका सबसे बड़ा सबूत है। जमीन चाहे प्राधिकरण से ही क्यों न खरीदी हो, प्राधिकरण के अधिकारियों को चढ़ावा चढ़ाए बिना लेआउट आसानी से परिवर्तन हो सकता है और भूखंड ''मिसिंग'' शो करके मकान पर बुलडोजर भी चल सकता है।
रही बात योगी बाबा के जीरो टॉलरेंस की तो उसकी जद में अब तक विकास प्राधिकरण आता दिखाई नहीं देता। क्या प्रदेश की राजधानी लखनऊ और क्या कृष्ण की जन्मभूमि मथुरा, सबका हाल समान है। नक्कारखाने में तूती की आवाज वैसे भी सुनाई कहां देती है।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
शुक्रवार, 8 अगस्त 2025
मथुरा-वृंदावन नगर निगम का RDF घोटाला: करोड़ों के खेल में आखिर कितने हिस्सेदार?
नगर निगम मथुरा-वृंदावन में हुए RDF घोटाले की शिकायत यूं तो विभागीय मंत्री अरविंद कुमार शर्मा तथा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक पहुंच चुकी है, किंतु यहां बड़ा सवाल यह है कि करोड़ों के इस घोटाले में शामिल लोगों को आखिर कौन और क्यों बचा रहा है। कहीं ऐसा तो नहीं घोटाले में कुछ ऐसे विभागीय अधिकारी एवं कर्मचारी भी हिस्सेदार हों, जिनके ऊपर घोटाले को सामने लाने की जिम्मेदारी बनती है।
ये गंभीर सवाल इसलिए उठ खड़े हुए हैं क्योंकि नगर निगम ने इस पूरे कांड की प्रमुख किरदार कंपनी के साथ "नोटिस-नोटिस" का खेल तो खूब खेला लेकिन उसे बैक डोर से न सिर्फ भुगतान किया जाता रहा बल्कि शेष भुगतान को भी दिलाए जाने की व्यवस्था की जा रही है।
गौरतलब है कि दयाचरण एंड कंपनी को वर्ष 2023 में नगर निगम मथुरा-वृंदावन ने कूड़े के निस्तारण का ठेका दिया लेकिन ठेका हासिल करने वाली यह कंपनी शुरू से ही अपने काम में बेहद लापरवाह रही नतीजा जहां-तहां काफी कूड़ा एकत्र होता रहा। \
जैसे-तैसे जब कंपनी पर काम पूरा करने का दबाव बनाया तो उसने उसे निर्धारित डंपिंग यार्ड में न डलवाकर सार्वजनिक स्थानों और यहां तक कि तालाब एवं जलाशयों में फिंकवा दिया जिससे कई बीमारियों के फैलने का खतरा है।
आश्चर्य की बात यह है इस पूरे प्रकरण में मथुरा-वृंदावन नगर निगम का कोई जिम्मेदार अधिकारी मुंह खोलने को तैयार नहीं है, अलबत्ता दबी जुबान ने कुछ कर्मचारी यह जरूर कहते हैं कि यदि किसी अधिकारी ने जुबान खोल दी तो कई पूर्व अधिकारी भी इस घोटाले की जांच के दायरे में होंगे इसलिए चुप्पी साधे बैठे हैं।
ऐसे ही कुछ कर्मचारियों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि वह 2019-20 में डूडा के माध्यम से नगर निगम में लगे थे लेकिन तब से लेकर आज तक न तो उनकी सुरक्षा के लिए तय उपकरण उपलब्ध कराए गए हैं और न उनका स्वास्थ्य परीक्षण कराया गया। यही नहीं, पिछले करीब दो साल से कूड़ा निस्तारण के लिए जरूरी मशीनें खराब पड़ी हुई हैं जिस कारण कूड़े के पहाड़ खड़े हो चुके हैं।
कर्मचारियों का दावा है कि दयाचरण एंड कंपनी को ठेका दिए जाने से लेकर अब तक मात्र 25 प्रतिशत कूड़े का निस्तारण किया गया है जबकि टेंडर के मुताबिक कंपनी को कूड़े के निस्तारण की प्रक्रिया पूरी करके उसे जूते बनाने वाली तथा कागज बनाने वाली कंपनियों को भेजना था जिससे नगर निगम की आय होनी थी।
दयाचरण एंड कंपनी की लापरवाही एवं अधिकारियों पर उसकी मेहरबानी के आलम का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कूड़ा निस्तारण की प्रक्रिया के लिए जरूरी बिजली का कनेक्शन तक उसने नहीं लगवाया और जो कुछ आंशिक काम किया उसके लिए नगर निगम की बिजली का इस्तेमाल किया गया।
हालांकि पिछले दिनों जब प्रदेश के नगर निकाय मंत्री अरविंद कुमार शर्मा मथुरा आए तो उनके संज्ञान में इस पूरे घोटाले और इसे संरक्षण दिए जाने की बात लाई गई किंतु उन्होंने शिकायत लिखित में पहुंचाने को कहकर लगभग अपना पल्ला झाड़ लिया। लेकिन बताया जाता है कि अब कुछ लोगों ने लिखित शिकायत भी मंत्री तथा मुख्यमंत्री तक पहुंचा दी है ताकि ठेकेदार का शेष भुगतान भी चोरी-छिपे कराकर करोड़ों के इस घोटाले का पूरी तरह पटाक्षेप न कर दिया जाए।
विश्वस्त सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार नगर निगम के कुछ जिम्मेदार अधिकारी एवं कर्मचारियों द्वारा यह सारा खेल इसलिए खेला जा रहा है क्योंकि दयाचरण एंड कंपनी ने कहीं अन्यत्र कोई बड़ा टेंडर हासिल कर लिया है। ऐसे में यदि उसके खिलाफ मथुरा-वृंदावन नगर निगम से कोई कार्रवाई की जाती है तो उसका यह टेंडर भी खटाई में पड़ सकता है।
उसके खिलाफ मथुरा-वृंदावन नगर निगम से कोई ठोस कार्रवाई न हो और सबकुछ सामान्य तरीके से निपट जाए इसके लिए अधिकारियों को ऑब्लाइज भी किया जा रहा है क्योंकि यदि ऐसा नहीं होता तो अब तक दयाचरण एंड कंपनी को ब्लैक लिस्ट किया जा चुका होता।
जाहिर है कि कोई तो है जो इस पूरे घोटाले को पहले दिन से प्राश्रय दे रहा है और तमाम अनियमितताओं के बावजूद कंपनी के खिलाफ ठोस कार्रवाई करने की बजाय उसे लगातार बच निकलने के रास्ते उपलब्ध करा रहा है।
योगी सरकार की भ्रष्टाचार को लेकर जीरो टॉलरेंस की नीति तथा भगवान श्रीकृष्ण की नगरी के निवासियों की खुशहाली के लिए जरूरी है कि इस घोटाले की उच्च स्तरीय जांच कराकर इसमें संलिप्त सभी लोगों के चेहरे सामने लाए जाएं और उससे होने वाले बड़े नुकसान को रोका जाए।
-Legend News
सोमवार, 3 जुलाई 2023
मथुरा में कोर्ट के आदेश से केनरा बैंक के 8 अधिकारी और कर्मचारियों पर भ्रष्टाचार की FIR दर्ज
एक ओर जहां केंद्र सरकार व उसका वित्त मंत्रालय भरसक इस कोशिश में लगा है कि न तो बैंकों पर NPA यानी नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स का बोझ बढ़े और न बैंकें किसी उद्योगपति या व्यापारी के सामने ऐसी स्थितियां उत्पन्न करें कि वह चाहते हुए भी ऋण की अदायगी कर पाने में खुद को असहाय महसूस करने लगे। लेकिन ऐसा हो रहा है, और लगातार हो रहा है क्योंकि बैंकें तथा उसके अधिकांश अधिकारी व कर्मचारी बैंक की बजाय निजी हित साधने में लग जाते हैं। वह उन परिस्थितियों का लाभ उठाकर निजी स्वार्थ पूरा करने की कोशिश करते हैं जबकि वह चाहें तो सेटलमेंट करके लोन लेने वाले के साथ-साथ बैंक को भी बंधनमुक्त करने का काम कर सकते हैं। बैंक अधिकारी एवं कर्मचारियों की ऐसी ही बदनीयती का एक मामला उत्तर प्रदेश के मथुरा जनपद से सामने आया है, जिसके बाद कोर्ट ने संबंधित बैंक के 8 अधिकारी/कर्मचारियों के खिलाफ गंभीर आपराधिक धाराओं में FIR दर्ज करने के आदेश दिए और अब पुलिस फिलहाल इसकी जांच कर रही है।
केनरा बैंक की महोली रोड शाखा से जुड़े इस मामले में CJM मथुरा के आदेश पर हाईवे थाना पुलिस ने 17 जून 2023 की रात 8 बजे बैंककर्मियों क्रमश: हिमांशु मित्तल, जीके मेहरा, बी. अनंतराव, नईम अख्तर, बीएस सत्यार्थी, पंकज, सीजी पासवान तथा पुनीत गौड़ के खिलाफ IPC की धारा 420, 467, 468, 471, 384, 504, 506 और 120 बी के तहत केस दर्ज कर विवेचना शुरू कर दी है।
इस संबंध में वादी श्रीमती नीलिमा खंडेलवाल पत्नी श्री उमेश खंडेलवाल डायरेक्टर WIC-CHEM (P) LTD. निवासी C-38 इंडस्ट्रियल एरिया, साइट A, थाना हाईवे जिला मथुरा द्वारा दायर प्रकीर्ण वाद संख्या 746/2023 के अनुसार उन्होंने और उनके पति उमेश खंडेलवाल ने सिंडीकेट बैंक (सम्प्रति केनरा बैंक) की महोली रोड शाखा से 74 लाख 50 हजार रुपए का लोन लिया था। इस लोन के लिए नीलिमा व उमेश खंडेलवाल द्वारा कंपनी की जमीन, बिल्डिंग एवं मशीनरी दृष्टिबंधक की गई।
नीलिमा व उमेश खंडेलवाल के अनुसार कुछ समय तक तो उन्होंने ऋण की किश्तें बैंक को नियमित रूप से अदा कीं किंतु फिर कारोबार में मंदी के चलते वह किश्तें देने में असमर्थ रहे।
इसके लिए उन्होंने बैंक से अतिरिक्त ऋण की मांग की किंतु बैंक ने यह कहते हुए अतिरिक्त ऋण देने से इंकार कर दिया कि प्रोजेक्ट की लैंण्ड वैल्यूएशन काफी कम है।
ऐसी स्थिति में नीलिमा व उमेश खंडेलवाल ने बैंक के सामने लोन के एकमुश्त समाधान का प्रस्ताव रखा जिसे बैंक ने 1 मार्च 2011 को स्वीकार करते हुए 1 करोड़ 6 लाख रुपए चुकाने पर सहमति दे दी, किंतु जब इन्होंने एकमुश्त लोन चुकाने की व्यवस्था की तो बैंक के उक्त कर्मचारी समाधान से पहले 10 लाख रुपए की नाजायज मांग करने लगे।
नीलिमा व उमेश खंडेलवाल का आरोप है कि समाधान की कोशिश में लगे उनके पुत्र अनुराग खंडेलवाल से उक्त बैंक कर्मचारियों ने चौथ वसूली के रूप में कुछ रकम ले भी ली और जब उन्होंने इसका विरोध किया तो बैंक के वैल्यूअर हिमांशु मित्तल से एक फर्जी मूल्यांकन रिपोर्ट तैयार करवा कर हमारा उत्पीड़न किया जाने लगा।
इन लोगों द्वारा इसके बाद इस आशय की धमकी दी जाने लगी कि यादि हमारी मांग पूरी नहीं की जाती तो बैंक से तय रकम की जगह फर्जी मूल्यांकन को आधार बनाकर आपसे अधिक रकम की वसूली की जाएगी।
नीलिमा व उमेश खंडेलवाल का कहना है कि बैंक कर्मचारियों की बदनीयती और नाजायज मांग के मद्देनजर वो न्यायालय की शरण में जाने पर मजबूर हुए अन्यथा वो आज भी बैंक के साथ पूर्व में हुए एकमुश्त समाधान के समझौते पर कायम हैं तथा बैंक का पूरा पैसा चुकाने की नीयत रखते हैं।
इस संबंध में 'लीजेण्ड न्यूज़' ने बैंक के वर्तमान सीनियर मैनेजर को फोन करके बैंक का पक्ष जानने की कोशिश की तो उनका कहना था कि वो कुछ समय पहले ही यहां आए हैं इसलिए उन्हें इस मामले की कोई जानकारी नहीं है।
उनका कहना था कि वैसे भी ऐसे मामलों में अपना पक्ष रखने के लिए बैंक का लीगल सेल अधिकृत होता है इसलिए मैं कुछ कहने में असमर्थ हूं।
बहरहाल, एक बात तय है कि यदि बैंक कर्मचारी चाहते तो संभवत: यह मामला कोर्ट तक नहीं पहुंचता और कानूनी पचड़े में पड़ने की बजाय बैंक की रकम भी अदा हो सकती थी।
-Legend News
बुधवार, 20 जुलाई 2022
योगी जी... देखिए तो कि भ्रष्टाचार पर आपकी जीरो टॉलरेंस नीति का मथुरा पुलिस ने कैसा मजाक बनाया है?
हालांकि इसकी भनक लगते ही एक ओर जहां एसएसपी मथुरा अभिषेक यादव ने विभागीय जांच के आदेश देते हुए संबंधित थाना प्रभारी इंस्पेक्टर अजय कौशल और चौकी प्रभारी सतोहा योगेश नागर को निलंबित कर दिया वहीं दूसरी ओर आईजी आगरा जोन नचिकेता झा ने भी जिले में तैनात आईपीएस अधिकारी (एएसपी) संदीप मीणा को जांच सौंपी है, लेकिन यहां सवाल यह पैदा होता है कि किसी इतने गंभीर मामले में क्या केवल विभागीय जांच कराया जाना पर्याप्त है?
पूरे पुलिस विभाग को शर्मिंदा करने और योगी सरकार के आदेश-निर्देशों को बेखौफ होकर ताक पर रखने के इस मामले में प्रथम दृष्ट्या संलिप्त दिखाई दे रहे पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं की जानी चाहिए?
बताया जाता है भ्रष्टाचार के इस पूरे नायाब खेल की सूचना लखनऊ में बैठे बड़े अधिकारियों को भी लग चुकी है, और वो आगरा तथा मथुरा के बड़े अधिकारियों की कार्रवाई पर पूरी नजर बनाए हुए हैं।
क्या है पूरा मामला
घटनाक्रम के अनुसार मथुरा जनपद के मलाईदार थानों में शुमार हाईवे थाना पुलिस ने विगत 11 जुलाई को साइबर क्राइम करने वाले गिरोह के 19 सदस्यों को मुखबिर की सूचना पर एकसाथ धर-दबोचा।
पुलिस के लिए सिरदर्द बना हुआ है साइबर क्राइम
यहां यह जान लेना जरूरी है कि सोशल मीडिया के इस दौर में साइबर क्राइम पुलिस के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है और इसीलिए हर जनपद में पुलिस का एक साइबर सेल काम भी कर रहा है।
ये बात अलग है कि अपराधियों के हमेशा पुलिस से दो कदम आगे चलने तथा पुलिस के पास उनकी तुलना में संसाधनों के अभाव की वजह से पुलिस को साइबर अपराधियों से निपटने में दिक्कतें पेश आती हैं।
यही कारण है कि हर दिन कोई न कोई व्यक्ति कहीं न कहीं साइबर अपराधियों का शिकार होता है।
पैसे लेकर छोड़ दिए सभी 19 अपराधी
पुलिस भी इस बात से भली-भांति परिचित है और उच्च अधिकारी इनकी धर-पकड़ के लिए परेशान भी रहते हैं, बावजूद इसके मथुरा के थाना हाईवे की पुलिस ने साइबर अपराधियों के इस पूरे गिरोह को लाखों रुपए लेकर छोड़ दिया और अपने अधिकारियों को इसकी भनक तक नहीं लगने दी।
विभागीय सूत्र बताते हैं कि हाईवे थाना पुलिस ने गिरोह के सभी 19 सदस्यों को छोड़ने की एवज में दलालों के माध्यम से प्रति सदस्य करीब डेढ़ लाख रुपया वसूला। दलालों को क्या मिला, इसकी जानकारी होना बाकी है।
थाना पुलिस के इस योजनाबद्ध भ्रष्टाचार का अंदाज लगाने के लिए यह जान लेना काफी है कि थाने में कुछ देर रखने के बाद इन सभी 19 अपराधियों को थाना परिसर में पीछे की ओर बने कमरों में रखा गया, जिससे मामला चुपचाप निपटाने में आसानी हो।
छोड़े गए अपराधियों के नाम
रविकांत पुत्र श्रीचंद निवासी गांव नवादा थाना हाईवे, जितेन्द्र पुत्र राजकुमार निवासी अलीगढ़, गिर्राज पुत्र रवीन्द्र निवासी एटा, विनोद पुत्र नवी निवासी असम, सैकुल पुत्र रेशम, साहिल पुत्र अब्दुल, तस्लीम पुत्र नसरू, रॉबिन पुत्र रेशम, हमीद पुत्र आशू, मकसूद पुत्र कमरुद्दीन, साहिल पुत्र आयन, भाकिल पुत्र मोहन्दा, सुहैल पुत्र याकतअली, साबिर पुत्र अनवर, ताहिर पुत्र जाकिर, सकलम पुत्र मोहन्दा, इरशाद पुत्र महमूदा और राशिद।
सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार जांच अधिकारी आईपीएस संदीप मीणा ने इस मामले में एक बड़ी उपलब्धि हासिल करते हुए थाने के सीसीटीवी कैमरे की फुटेज हासिल कर ली है और उसमें ये अपराधी आते व जाते हुए दिखाई दे रहे हैं। इसके अलावा जांच अधिकारी को एक साक्ष्य सतोहा चौकी के रजिस्टर से प्राप्त हुआ है।
दरअसल, चौकी प्रभारी सतोहा ने किसी आंशका के चलते इन सभी 19 आरोपियों का नाम चौकी के रजिस्टर में दर्ज कर लिया था क्योंकि अपराधियों की धरपकड़ में वह भी शामिल थे। संभवत: इसीलिए चौकी प्रभारी सतोहा योगेश नागर अब खुद को पूरी तरह निर्दोष बता रहे हैं और कह रहे हैं कि मैं अधिकारियों के सामने पूरा सच लेकर आऊंगा।
ऐसे में एक सवाल यह और उठता है कि बिना ठोस कार्रवाई हुए और लाखों रुपए हड़प कर एकसाथ 19 साइबर अपराधियों को छोड़ देने जैसे संगीन मामले में एफआईआर दर्ज किए बिना क्या पूरा सच सामने आ पाएगा। या मथुरा के ही डॉ. निर्विकल्प अपहरण काण्ड की तरह ये भी फाइलों में दब कर रह जाएगा।
क्या है डॉ. निर्विकल्प का अपहरण काण्ड
10 दिसंबर 2019 को रात करीब 8 बजे हाईवे थाना क्षेत्र में ही गोवर्धन चौराहे के फ्लाई ओवर पर मथुरा के मशहूर ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. निर्विकल्प का अपहरण कर उनसे वसूली गई 52 लाख रुपयों की फिरौती को इलाका पुलिस हड़प गई और बदमाश छोड़ दिए गए।
जब इस मामले में शोर-शराबा हुआ तो पूरे दो महीने बाद 11 फरवरी 2020 की रात 10 बजकर 53 मिनट पर हाईवे थाना पुलिस ने अपनी ओर से IPC की धारा 364 A के तहत एक एफआईआर दर्ज की।
हाईवे थाने के तत्कालीन प्रभारी इंस्पेक्टर जगदंबा सिंह की ओर से दर्ज कराई गई इस एफआईआर में सनी मलिक पुत्र देवेन्द्र मलिक निवासी न्यू सैनिक विहार कॉलोनी थाना कंकरखेड़ा मेरठ, महेश पुत्र रघुनाथ निवासी ग्राम कौलाहार थाना नौहझील मथुरा, अनूप पुत्र जगदीश निवासी ग्राम कौलाहार थाना नौहझील मथुरा तथा नीतेश उर्फ रीगल पुत्र नामालूम निवासी भोपाल मध्यप्रदेश (हाल निवासी दिल्ली एनसीआर) को नामजद किया गया।
इस पूरे प्रकरण का एक दिलचस्प पहलू यह भी रहा कि डॉ. निर्विकल्प के अपहरण की अपनी ओर से FIR दर्ज कराने वाले इंस्पेक्टर जगदंबा सिंह को उसी दिन तत्काल प्रभाव से तत्कालीन एसएसपी शलभ माथुर ने निलंबित कर दिया। जिन्हें बाद में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश पर बहाल भी कर दिया गया।
नामजद अपराधियों को पुलिस ने पकड़ा भी, लेकिन उन 52 लाख रुपए का कुछ पता नहीं लगा जिन्हें अपराधियों को फिरौती के रूप में देने की पुष्टि खुद डॉ निर्विकल्प कर चुके थे।
बहरहाल, अब देखना यह होगा कि लाखों रुपए लेकर साइबर क्राइम के गिरोह से जुड़े डेढ़ दर्जन अपराधियों को छोड़ने का यह संगीन मामला भी डॉ. निर्विकल्प अपहरण काण्ड की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा या फिर ईमानदार पुलिस अफसरों के रहते किसी ऐसे अंजाम तक पहुंचेगा, जिसके बाद कोई थाना या चौकी प्रभारी इतना बड़ा दुस्साहर न कर सके और योगी सरकार की भ्रष्टाचार के मामले में अपनाई गई जीरो टॉलरेंस की नीति का इस तरह मजाक न उड़ा पाए।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
सोमवार, 14 मार्च 2022
मथुरा के एक सरकारी विभाग में “भ्रष्टाचार” का ठेका, पढ़कर झटका लग सकता है लेकिन हकीकत यही है
अब आप खबर के ऊपर लगी तस्वीरों को देखिए। ये तस्वीरें हैं मथुरा (यूपी) के कलक्ट्रेट स्थित रजिस्ट्री कार्यालय की, जहां कार्यालय के अलग-अलग पटल पर बैठे हैं ये चेहरे। इन चेहरों में से कोई ऐसा नहीं है जो सरकारी मुलाजिम हो किंतु रजिस्ट्री कार्यालय का काम इनके बिना करा पाना संभव नहीं है।
मथुरा जनपद में कुल पांच रजिस्ट्री कार्यालय हैं जिनमें से मुख्य है सदर तहसील का कलक्ट्रेट स्थित कार्यालय, जहां दो सब रजिस्ट्रार हैं। यहां सब रजिस्ट्रार प्रथम के पद पर एके त्रिपाठी और सब रजिस्ट्रार द्वितीय के पद पर विजय कुमार पांडे फिलहाल नियुक्त हैं।
इनके अतिरिक्त मांट, छाता और महावन तहसीलों के रजिस्ट्री कार्यालयों में एक-एक सब रजिस्ट्रार की तैनाती रहती है।
सदर तहसील के सब रजिस्ट्रार प्रथम एके त्रिपाठी के स्टाफ में नवल, देव, आरिफ, अतुल, राजू, रवि, शंकर और रजा कार्यरत हैं जबकि सब रजिस्ट्रार द्वितीय के अधीन हैं हेमवीर, केके, नेत्रपाल, यामीन, राहुल तथा विजय।
घोर आश्चर्य की बात यह है कि एक दर्जन से अधिक इन नामों में से कोई ऐसा नहीं है जो सरकारी मुलाजिम हो, या जिसे उत्तर प्रदेश सरकार ने स्थायी अथवा अस्थायी तौर पर नियुक्ति दी हो लेकिन ये रजिस्ट्री कार्यालय में इस शान के साथ कुर्सी पर काबिज मिलेंगे जैसे सरकारी दामाद हों।
कार्यालय के अलग-अलग पटल पर बैठे ये अवैध मुलाजिम एक ओर जहां बड़ी बेशर्मी के साथ हर जायज काम के लिए भी खुलेआम रिश्वत मांगते हैं वहीं तमाम नाजायज काम करके सरकार को प्रति माह करोड़ों रुपए के राजस्व की हानि पहुंचाते हैं।
रिश्वत मांगने या कहें कि पैसा झपटने में ये अवैध कर्मचारी इतने माहिर हैं कि काम कैसा भी और किसी का भी हो, इनको भेंट दिए बिना न तो कोई काम करा सकता है और न इनकी नजरों से बच के आ सकता है।
सामान्य तौर पर किसी तृतीय या चतुर्थ श्रेणी के सरकारी कर्मचारी को जितना वेतन महीने में एकबार मिलता है, उतना तो रजिस्ट्री कार्यालय का एक-एक अवैध कर्मचारी हर रोज अपनी जेबों में भरकर ले जाता है।
जाहिर है कि भ्रष्टाचार से होने वाली ये वो कमाई है जो ऊपर तक हिस्सा पहुंचाने के बाद बचती है और जिस पर सिर्फ और सिर्फ अवैध कर्मचारी का हक होता है। ऐसे में इनके अधिकारियों की अकूत कमाई का अंदाज लगाना कोई मुश्किल काम नहीं।
योगीराज भगवान श्रीकृष्ण की पावन जन्मस्थली का मुख्य रजिस्ट्री कार्यालय तो एक उदाहरण है अन्यथा बात करें जनपद की बाकी तीन तहसीलों के रजिस्ट्री कार्यालयों की या फिर प्रदेश भर के रजिस्ट्री कार्यालयों की, तो सब जगह कमोबेश स्थितियां यही मिलेंगी। यानी हर जगह भ्रष्टाचार के ठेके बेखौफ और बेझिझक चलते मिलेंगे, वो भी उस योगीराज में जिसने भ्रष्टाचार को लेकर जीरो टॉलरेंस की नीति अख्तियार की हुई है और जिसे सख्ती से लागू करने की बात कहकर 2022 में भी वापसी की है।
मथुरा या प्रदेश के किसी भी रजिस्ट्री कार्यालय में अवैध कमाई के कितने रास्ते होते हैं और किसकी कितनी कीमत तय है, इसका विस्तृत विवरण अगली बार…
कौन उठाता है भ्रष्टाचार का ये ठेका, और कौन करता है अवैध नियुक्तियां
रजिस्ट्री कार्यालय के ही सूत्र बताते हैं कि यहां अवैध तौर पर कार्यरत कर्मचारियों की जानकारी यूं तो सभी उच्च अधिकारियों को है किंतु इनकी नियुक्तियों में प्रमुख भूमिका सहायक स्टांप आयुक्त की होती है जो विकास प्राधिकरण में बैठते हैं।
जाहिर है कि सब रजिस्ट्रारों की सहमति के बिना या उनकी जानकारी के बगैर ये नियुक्तियां संभव नहीं हैं लिहाजा वो दूध के धुले नहीं हो सकते।
सूत्र बताते हैं कि किसी भी उच्च प्रशासनिक अधिकारी का कभी रजिस्ट्री कार्यालय में आकस्मिक निरीक्षण के लिए न आना और न अवैध नियुक्तियों को लेकर कभी किसी जिम्मेदार अधिकारी से कोई जवाब तलब करना, यह समझने के लिए काफी है कि स्थितियां किस हद तक बिगड़ी हुई हैं।
इसे यूं भी समझा जा सकता है सर्वाधिक कमाई वाले सरकारी विभागों में शुमार रजिस्ट्री कार्यालय के अवैध कर्मचारी ही अधिकारियों की वो दुधारू गाय हैं जो हर रोज उनके साथ-साथ विकास प्राधिकरण को भी मोटी कमाई करने तथा कमाई के नए-नए ‘ठिकाने’ तलाश कर देते हैं।
किसी भी जिले में कलक्ट्रेट वो जगह होती है जहां पुलिस व प्रशासन के आला अफसर बैठते हैं। यहीं से आमजन को न्याय मिलता है, किंतु जब पूरे कुएं में भी भांग घुली हो तो किससे शिकायत और कैसी शिकायत।
कहते हैं मथुरा तीन लोक से न्यारी है। शायद इसीलिए कभी एक ‘रामवृक्ष यादव’ नाम का दुबला-पतला शख्स अपने गुर्गों के साथ यहां आया था और सरकारी जवाहर बाग की सैंकड़ों एकड़ बेशकीमती जमीन पर वर्षों काबिज रहा।
इसी कलक्ट्रेट पर ऐसे ही बड़े-बड़े अधिकारियों की नाक के नीचे उसने जवाहर बाग में नंगा नाच किया, और जब उच्च न्यायालय की सख्ती के बाद अधिकारी उसे अवैध कब्जे से बेदखल करने पर मजबूर हुए तो दो पुलिस अफसरों को जान गंवानी पड़ी।
आज बेशक कोई सरकारी जमीन किसी के अवैध कब्जे में न सही किंतु वैध को अवैध तथा अवैध को वैध बताकर लोगों को खुलेआम लूटने और सरकारी खजाने को चूना लगाने का खेल बदस्तूर जारी है।
साथ ही जारी है एक ऐसे प्रदेश में अवैध नियुक्तियों के जरिए भ्रष्टाचार को ठेके पर उठाने का कारनामा, जहां नौकरी के लिए लाखों युवा दर-दर की ठोकरें खाते देखे जा सकते हैं।
यह सब इसलिए हो पा रहा है क्योंकि शिकवा-शिकायत के बावजूद भ्रष्टाचार के इन ठेकेदारों का कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाता। बिगड़ना तो दूर, कोई यह तक पूछने वाला नहीं कि भ्रष्टाचार को ठेके पर देने की कारस्तानी किसकी शह पर तथा किसकी कलम से हो रही है।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
बुधवार, 23 जून 2021
सेतु निगम का कारनामा: 50 साल की मियाद वाला ‘ओवरब्रिज’ 5 साल बाद ही जर्जर अवस्था को प्राप्त
इसे उत्तर प्रदेश राज्य सेतु निगम का कारनामा कहें या इस विभाग में व्याप्त भारी भ्रष्टाचार का उदाहरण कि एक विश्व विख्यात धार्मिक स्थल को जोड़ने वाला ओवरब्रिज मात्र 5 वर्षों बाद ही आज जर्जर अवस्था को प्राप्त हो चुका है, जबकि इसकी मियाद 50 साल घोषित की गई थी।गौरतलब है दिल्ली-मथुरा के बीच मथुरा स्थित कृष्ण जन्मस्थान की ओर जाने वाले मार्ग पर रेलवे क्रॉसिंग के ऊपर वर्ष 2015 में जब ओवरब्रिज बनकर तैयार हुआ तो लग रहा था कि अब न केवल लोगों की जान का जोखिम खत्म हो जाएगा बल्कि आवागमन भी सुगम होगा किंतु सेतु निगम के कारनामे की वजह से यह ओवरब्रिज पहले दिन से लेकर अब तक किसी बड़े हादसे को न्योता दे रहा है।
दरअसल, गोविंदनगर रेलवे मार्ग पर बनाए गए इस ओवरब्रिज में उद्घाटन से पहले ही दरारें दिखाई देने लगी थीं।
चूंकि मार्च 2015 में प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को इस ओवरब्रिज का उद्घाटन करना था लिहाजा ओवरब्रिज में दरारें देख सेतु निगम के अधिकारी परेशान हो गए और उन्होंने आनन-फानन में दरारें भरना शुरू कर दिया ताकि खामियों को ढककर उद्घाटन कराया जा सके।
बहरहाल, सेतु निगम के अधिकारियों का भाग्य अच्छा रहा कि अखिलेश यादव मथुरा तो आये किंतु वह दूसरे कार्यक्रमों में व्यस्तता के चलते इस ओवरब्रिज का लोकार्पण नहीं कर सके लिहाजा इसे अनौपचारिक तौर पर आवागमन के लिए खोल दिया गया।
नेशनल हाईवे नंबर- 2 को कृष्ण की पावन जन्मस्थली से जोड़ने वाले इस मार्ग पर प्रतिदिन हजारों की संख्या में देशी-विदेशी लोग यात्री बसों से अथवा निजी वाहनों से आते हैं अत: इस ओवरब्रिज के खुलते ही इस पर वाहनों का आवागमन शुरू हो गया।
ओवरब्रिज पर बेफिक्र होकर दौड़ रहे वाहन चालकों को इस बात का इल्म तक नहीं हुआ कि भ्रष्टाचार के गारे से बने करीब 50 वर्ष की लाइफ वाले इस ओवरब्रिज ने तो लोकार्पण से पहले ही सेतु निगम की असलियत बता कर रख दी थी।
करोड़ों की लागत से बने करीब 900 मीटर लंबे इस ओवरब्रिज की खामियां तथा अपना भ्रष्टाचार छिपाने के लिए सेतु निगम के स्थानीय अधिकारियों ने जैसे-तैसे मरम्मत कराकर तब तो राहत की सांस ले ली परंतु अब वही भ्रष्टाचार एकबार फिर सामने आ खड़ा हुआ है।
तीन-चार दिन पहले ओवरब्रिज का एक बड़ा सा टुकड़ा भरभरा कर गिर पड़ा, जिसके बाद सेतु निगम ने तत्काल काम कराने की बजाय ब्रिज के ऊपर और नीचे दोनों ओर ‘सावधान…कार्य प्रगति पर है’ का बोर्ड लगाकर ब्रिज में आरपार बने ‘होल’ को चारों ओर से कवर कर दिया है।
इस दौरान यदि कोई अच्छी बात है तो वह यह कि कोरोना के कारण यूपी में लगा लॉकडाउन 21 जून से ही समाप्त हुआ है इसलिए कृष्ण जन्मस्थान पर आने वाले देशी-विदेशी श्रद्धालुओं की संख्या अभी हजारों में न होकर सैकड़ों में है, बावजूद इसके कोई हादसा होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।
आश्चर्य की बात यह भी है कि तीन-चार दिन पहले ही ओवरब्रिज का एक हिस्सा गिर जाने पर सेतु निगम के अधिकारियों ने अब तक उसकी मरम्मत कराना जरूरी नहीं समझा। उन्हें शायद बोर्ड लगाकर काम चलाना उचित लगा क्योंकि वो जानते हैं कि उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। सरकार चाहे अखिलेश की हो, या योगी आदित्यनाथ की। ब्यूरोक्रेसी वही थी, और वही रहेगी।
ऐसा न होता तो जिस ओवरब्रिज की ‘मियाद’ वर्ष 2065 में खत्म होनी थी, वो न तो यूं लोकार्पण से पहले ही चटकता और न 2021 तक जर्जर अवस्था को प्राप्त होता।
मथुरा में यमुना पर बने पुल का भी यही हाल
यहां यह बताना भी जरूरी है कि उत्तर प्रदेश में योगी सरकार आ जाने के बाद सेतु निगम ने ही मथुरा में यमुना नदी पर दूसरे नए पुल का निर्माण किया है क्योंकि उससे पहले बना पुल अपनी मियाद पूरी कर चुका था।
मार्च 2018 में आम जनता के लिए खोले गए इस पुल की भी दुर्दशा यह बताने के लिए काफी है कि सेतु निगम ने यहां अपना ‘खेल’ करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। हालांकि इसके एप्रोच रोड का निर्माण लोक निर्माण विभाग के उस निर्माण खंड ने कराया था जो भ्रष्टाचार के मामले में सेतु निगम से भी चार कदम आगे है।
वर्तमान में सेतु निगम उत्तर प्रदेश लोक निर्माण विभाग की एक इकाई है। इन दोनों विभागों के मंत्री उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य हैं।
उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार बनने के बाद 1 अप्रैल 2017 से फरवरी 2021 तक राज्य सेतु निगम नदियों पर सैकड़ों पुल, रेलवे ओवरब्रिज तथा फ्लाईओवर बना चुका है।
ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि मथुरा जैसे विश्वविख्यात धार्मिक स्थल पर कृष्ण जन्मभूमि को जोड़ने वाले ओवरब्रिज का जब यह हाल है तो बाकी सैकड़ों का क्या होगा?
सवाल तो बहुत हैं लेकिन दुख का विषय यह है कि जवाब देने वाला कोई नहीं। तब भी नहीं जब योगीराज में भ्रष्टाचार को लेकर ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनाने का दावा सत्ता ग्रहण करने के पहले दिन से लगातार किया जा रहा है।
अब जबकि प्रदेश में चुनाव सिर पर हैं तो हो सकता है कि विभागीय मंत्री और उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य सेतु निगम व लोकनिर्माण विभाग के भ्रष्टाचार पर संज्ञान लेकर कोई ठोस कार्यवाही करते नजर आएं।
इस पर लोग कहते हैं कि उम्मीद ही की जा सकती है, भरोसा जताना मुश्किल है।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
शनिवार, 3 अक्टूबर 2020
क्या योगी सरकार अवैध खनन में लगे पुलिस-प्रशासन और माफिया के संगठित गिरोह को तोड़ पाएगी?
भ्रष्टाचार के मामले में जीरो टॉलरेंस की नीति पर काम करने का दावा करने वाले योगीराज में भ्रष्टाचार की शिकायतें क्यों आम हो गई हैं और क्यों इन पर अंकुश नहीं लग पा रहा, इसके पीछे यदि देखा जाए तो पुलिस-प्रशासन और माफिया का ऐसा संगठित गिरोह है जिसे किसी का खौफ नहीं रहा।महोबा के संदर्भ में इस बात की पुष्टि करते हुए खुद मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने यह कहा है कि ऐसा लगता है जैसे पूरा गिरोह बनाकर भ्रष्टाचार को अंजाम दिया जा रहा है।
यहां सवाल किसी एक क्षेत्र से मिल रही शिकायत का नहीं है, हर सरकारी क्षेत्र का है क्योंकि कोई क्षेत्र ऐसा बाकी नहीं है जिसमें भ्रष्टाचार की गंध न बसी हो।
अगर बात करें अवैध खनन की तो शासन भी उसके सामने हारता दिखाई देता है, शायद इसीलिए प्रदेश का कोई हिस्सा खनन माफिया की सक्रियता से अछूता नहीं रहा।
वो जिले भी उनकी मनमानी से त्रस्त हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि योगी आदित्यनाथ की उन पर सीधी निगाह रहती है।
ऐसा ही एक जिला है भगवान श्रीकृष्ण की पावन जन्मस्थली मथुरा। मथुरा से योगी आदित्यनाथ की कैबिनेट में दो ताकतवर मंत्री हैं और जनपद की कुल पांच विधानसभा सीटों में से चार पर भाजपा काबिज है। यहां की सांसद हेमा मालिनी भाजपा के विशिष्ट सांसदों में से एक हैं जबकि जिला पंचायत से लेकर नगर निगम तक पर भाजपा का परचम लहरा रहा है।
कुल मिलाकर यदि यह कहा जाए कि योगी आदित्यनाथ और भाजपा की नाक, आंख और कान यहां सब सक्रिय हैं तो कुछ गलत नहीं होगा परंतु आश्चर्यजनक रूप से यहां का जिला प्रशासन निष्क्रिय है।
उत्तर प्रदेश के तमाम दूसरे जिलों की तरह अवैध खनन मथुरा जनपद की एक बड़ी समस्या है। कृष्ण की पटरानी कालिंदी को खनन माफिया ने यहां पूरी तरह खोखला कर दिया है। अवैध खनन की शिकायतें आए दिन सक्षम अधिकारियों तक पहुंचाई जाती हैं लेकिन वो एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल देते हैं।
अधिकारी ऐसा क्यों करते हैं, इससे कोई अनभिज्ञ नहीं है लेकिन मजबूरी यह है कि आम आदमी शिकायत करे तो किससे करे।
नियम कानूनों का हवाला देकर खनन माफिया पर हाथ न डालने वाली पुलिस भी तब उनके खिलाफ कार्यवाही करती है जब उसे उनसे मिलने वाली महीनेदारी में कमी दिखाई देने लगती है।
प्रशासनिक अधिकारी ये कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि खनन माफिया को पुलिस का संरक्षण प्राप्त है लिहाजा वो उन्हें पकड़ने में उनका सहयोग नहीं करती।
सच तो यह है कि पुलिस-प्रशासन और माफिया के संगठित गिरोह ने जिले के कोयला अलीपुर, करनावल और अगरपुरा जैसे खादर के क्षेत्र को जेसीबी मशाीनों से छलनी कर दिया है।
बाढ़ के पानी को रोकने में सहायक इन इलाकों में अब इतने गहरे-गहरे गड्ढे बन गए हैं कि कई-कई हाथी एक के ऊपर एक खड़े किए जा सकते हैं। कृषि कार्य में उपयोगी ट्रैक्टर-ट्रालियां यहां भोर होने से पहले खनन करने में लगा दी जाती हैं जिससे अधिकतम खुदाई की जा सके।
यमुना किनारे के किसानों ने अवैध खनन को ही अपनी आमदनी का मुख्य जरिया बना लिया है और वो इसलिए अपने खेत की मिट्टी का भी सौदा करने से नहीं हिचकिचाते। स्थिति यह है कि जिले में जितना खनन यमुना की बालू का हो रहा है, उतना ही खेतों का सीना भी बड़ी बेदर्दी से चीरा जा रहा है।
मजे की बात यह है कि जिन क्षेत्रों में बाकायदा जेसीबी के साथ सैकड़ों की संख्या में ट्रैक्टर-ट्रॉली लगाकर खनन किया जा रहा है, उनके बारे में भी शिकायत करने पर पुलिस-प्रशासन कहता है कि उनकी जानकारी में ऐसा कुछ नहीं है।
यह हाल तो तब है जबकि बिना सेटिंग किए जा रहे खनन को पुलिस द्वारा सड़क पर रोककर वसूली करते कभी भी देखा जा सकता है।
दिन-रात चल रहे अवैध खनन के इस खेल ने सरकार द्वारा बनाई जाने वाली कई सड़कों का तो सत्यानाश किया ही है, लोगों के स्वास्थ्य पर भी प्रभाव डाला है क्योंकि दिन-रात उड़ने वाली रेत और धूल उन्हें गंभीर बीमारियों की सौगात दे रही है।
खनन माफिया के वाहन चूंकि हर वक्त बहुत जल्दी और तेजी में रहते हैं इसलिए उनके कारण आए दिन सड़क दुर्घटनाएं होना आम बात है।
राजस्व विभाग, खनन विभाग, पुलिस विभाग, परिवहन विभाग आदि सबकी चुप्पी यह बताती है कि कोई भी इस अवैध धंधे से होने वाली अतिरिक्त आमदनी का मोह त्यागने को तैयार नहीं है।
सच तो यह है कि यदा-कदा यदि इन्हें किसी शिकायत पर कार्यवाही करने को बाध्य होना भी पड़ता है तो ये अपने नेटवर्क के माध्यम से माफिया तक पहले ही सूचना भेज देते हैं नतीजतन शिकायतकर्ता सबके सामने झूठा साबित हो जाता है, साथ ही वह सबके निशाने पर भी आ जाता है। फिर एक लाइन से सबके सब शिकायतकर्ता से दुश्मनी निकालने में जुट जाते हैं ताकि दोबारा वह वैसी हिमाकत न करे।
यही कारण है कि वह शिकायतकर्ताओं को खुलेआम धमकी देने से बाज नहीं आते, यहां तक कि मीडिया को धमकाने से भी नहीं हिचकते क्योंकि उन्हें मालूम है कि उनके वर्चस्व को चुनौती देना इतना आसान नहीं है।
खनन माफिया के बुलंद हौसलों का अंदाज इस बात से भी लगाया जा सकता है कि यदि कभी कोई ईमानदार पुलिस या प्रशासनिक अधिकारी उसके काम में बाधक बने हैं तो उन्होंने उस पर प्राणघातक हमला करने में जरा भी देरी नहीं की।
समूचे उत्तर प्रदेश में रह-रहकर होने वाली ऐसी घटनाएं खनन माफिया के दुस्साहस की तस्दीक करती हैं।
विश्व के प्रमुख धार्मिक स्थानों में शुमार कृष्ण की जन्मभूमि मथुरा के एक ओर तो चूंकि यमुना बहती है और दूसरी ओर पवित्र अरावली पर्वत श्रृंखला है इसलिए खनन माफिया के लिए यह अन्य जिलों से कहीं अधिक मुफीद है। साथ ही मुफीद है, उन अफसरों के लिए भी जिनके लिए खनन माफिया किसी दुधारू गाय से कम नहीं।
अब देखना यह होगा कि भ्रष्टाचार एवं भ्रष्टाचारियों पर इन दिनों सख्त कार्यवाही करने में लगे योगी आदित्यनाथ कृष्ण की नगरी में चल रहे इस सुनियोजित अवैध धंधे की कड़ी तोड़ पाते हैं या पुलिस-प्रशासन और माफिया का संगठित गिरोह उन्हें फिर गुमराह करने में सफल हो जाता है।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी


