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चुनाव आयोग लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
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बुधवार, 12 जनवरी 2022
गोवर्धन के लिए 5 करोड़ की पेशगी और छाता के लिए मुंह मांगी रकम, निष्ठाएं बदलने को भी तैयार मथुरा के माननीय
उत्तर प्रदेश में चुनाव आयोग ने विधानसभा चुनावों का बिगुल फूंके जाने के साथ ही निष्ठाओं से किनारा कर लेने तथा टिकटों की खरीद-फरोख्त का अघोषित मुहूर्त भी निकाल दिया है।अब जैसे-जैसे राजनीतिक पार्टियां अपने उम्मीदवारों की सूची जारी करेंगी, वैसे-वैसे चुनावी मैदान में ताल ठोकने को आतुर नेता एक ओर पाला बदलते दिखाई देंगे तो दूसरी ओर उम्मीदवारी के लिए बोरे भर भरकर पैसा फेंकते भी नजर आएंगे।
ये स्थिति वैसे तो किसी एक जिला या एक विधानसभा की न होकर पूरे प्रदेश में दृष्टिगोचर होगी लेकिन यदि बात करें मथुरा की तो यहां इस मर्तबा ये खेल बड़े स्तर पर खेले जाने की संभावना है, और इसके लिए बिसात बिछनी शुरू हो चुकी है।
योगीराज भगवान श्रीकृष्ण की पावन जन्मस्थली मथुरा कहने के लिए हमेशा से ही राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रही है परंतु 2022 के विधानसभा चुनावों से पहले जिस तरह इसे सियासत का केंद्र बनाने की कोशिश की गई है और अयोध्या व काशी की तर्ज पर कृष्ण जन्मभूमि को भव्य-दिव्य बनाने का ऐलान किया गया है, तब से इस धार्मिक स्थान की चर्चा कुछ ज्यादा हो रही है।
जाहिर है कि ऐसे में यहां का चुनाव ही नहीं, उम्मीदवारों का चयन भी खासा अहम हो जाता है।
यही कारण है कि यहां से संभावित उम्मीदवारों के दिल की धड़कनें कुछ ज्यादा तेज चल रही हैं क्योंकि सवाल लगभग जीवन-मरण जैसा है।
पांच विधानसभा सीटों वाले मथुरा जनपद से फिलहाल भाजपा के चार विधायक हैं, और मांट सीट बसपा के पास है। भाजपा के चार विधायकों में से दो योगी सरकार में कबीना मंत्री हैं।
बताया जाता है कि विगत माह वृंदावन में हुई बैठक के बाद ”संघ” ने यहां 2017 के पांच प्रत्याशियों में से तीन को बदलने की संस्तुति पार्टी आलाकमान से की थी। इसके अलावा भाजपा के सूत्र भी बताते हैं कि पार्टी अबकी बार उम्मीदवारों के चयन को लेकर काफी सतर्क है।
ऐसे में एक ओर जहां ये आशंका है कि कुछ सिटिंग विधायकों पर भी गाज गिर सकती है, वहीं दूसरी ओर तमाम लोगों को उम्मीद बंधी है कि उनका नंबर आ सकता है।
टिकट के लिए 5 करोड़ का ऑफर
पार्टी सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार कल तक भाजपा से गोवर्धन के लिए आवेदन करने वाले एक महानुभाव कथित ‘राष्ट्रीय दल’ के मुखिया को 5 करोड़ पेशगी दे आए हैं जबकि उनसे पहले तीन करोड़ पहुंचा चुके संभावित प्रत्याशी ने अपना प्रचार तक शुरू कर दिया है।
कभी स्टांप वेंडर रहे ये महानुभाव इस बार हर कीमत पर चुनाव लड़ना चाहते हैं क्योंकि अतीत में रहे इनके ‘कारनामे’ इन्हें राजनीतिक संरक्षण को मजबूर कर रहे हैं।
ये माननीय कर सकते हैं घर वापसी
जनपद की बल्देव (सुरक्षित) सीट का भी हाल करीब-करीब ऐसा ही है। चर्चा है कि टिकट कटने की स्थिति में यहां एक माननीय घर वापसी कर सकते हैं और इसके लिए उन्होंने अपने जोते बांधना शुरू कर दिया है ताकि ऐन वक्त पर हाथ मलने की नौबत न आ जाए।
मंत्री महोदय की सांसें भी अटकीं
मथुरा-वृंदावन विधानसभा सीट पर चूंकि योगी आदित्यनाथ के लड़ने की अटकलें हैं लिहाजा मंत्री महोदय की भी सांसें अटकी हुई हैं। मंत्री महोदय की सांसें अटकने का एक कारण उनके प्रति पार्टी कार्यकर्ताओं का आक्रोश भी है। हालांकि उनके समर्थक किसी आक्रोश से इंकार करते हैं।
ये बात अलग है कि विपक्षी दल उनको चुनाव लड़ाना चाहते हैं जिससे उनके प्रति उपजी कथित नाराजगी का लाभ ले सकें। एक पूर्व विधायक को खुलेआम यह कहते सुना जा सकता है कि मंत्री महोदय यदि फिर चुनाव मैदान में उतरे तो मेरी जीत तय है।
हालात और समीकरणों का लाभ अन्य दूसरे दलों से जुड़े लोग भी उठाना चाहते हैं इसलिए सुगबुगाहट विपक्षी खेमे में भी कम नहीं हैं।
ऐसा माना जा रहा है कि मथुरा-वृंदावन तथा मांट सीट पर ‘गठबंधन’ के प्रत्याशियों को अलग-अलग चुनाव चिन्हों पर चुनाव लड़ाया जाएगा। एक जगह बड़े दल के चिन्ह पर जबकि दूसरी जगह छोटे दल के चिन्ह पर गठबंधन के प्रत्याशी मैदान में होंगे। हालांकि मांट सीट की उम्मीदवारी के लिए अच्छी बोली लगाई जा रही है लेकिन यहां अंतिम निर्णय ‘बड़े दल के नेताजी’ करेंगे।
एक चाल यह भी चली जा सकती है कि मांट से गठबंधन का उम्मीदवार खड़ा ही न किया जाए जिससे भाजपा को खाता खोलने का अवसर तक न मिल सके और मुकाबला त्रिकोणीय न होकर आमने-सामने का रहे।
शेष रही दूसरे मंत्री के चुनाव क्षेत्र छाता की बात, तो यहां भी स्वास्थ्य और उम्र की वजह से मंत्री जी खुद को बहुत सुखद महसूस नहीं कर रहे। पार्टी भी इस स्थिति पर गौर कर रही है किंतु मंत्री जी चाहते हैं कि उनके ही परिवार को प्राथमिकता दी जाए।
उन्होंने अपनी एक पुत्री का नाम आगे बढ़ाया भी है जिससे पार्टी संज्ञान ले सके लेकिन छाता क्षेत्र की राहें इस बार पहले जितनी आसान नहीं हैं।
गठबंधन के अलावा बसपा भी यहां से ठाकुर प्रत्याशी उतारकर बड़ा दांव खेलने के प्रयास में है लेकिन इस सबके बीच सर्वाधिक चर्चा है तो इसी बात की है कि कौन कितने में टिकट लेकर आता है और कौन निष्ठाएं बदलकर भाग्य आजमाने उतरता है।
जो भी हो, लेकिन एक बात तय है कि करोड़ों में टिकट खरीदने, और फिर करोड़ों चुनाव पर खर्च करने वाले ये नेता किसी भी रूप में जनता के भाग्य विधाता नहीं हो सकते।
हो सकते हैं तो केवल ऐसे सूदखोर जो हर वक्त किसी न किसी तरह मूल से कई गुना अधिक वसूलने की फिराक में लगा रहता है।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
शुक्रवार, 12 अप्रैल 2019
MATHURA के किसी प्रत्याशी ने अब तक नहीं बताया अपना क्राइम रिकॉर्ड, SC और EC के दिशा-निर्देश ताक पर
MATHURA से चुनाव लड़ रहे सभी प्रत्याशी क्या दूध के धुले हैं, या उन्होंने सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग के नए दिशा-निर्देशों को ताक पर रख दिया है?
यह सवाल आज इसलिए क्योंकि नामांकन और नाम वापसी आदि की प्रक्रिया पूरी हुए एक सप्ताह बीत जाने के बाद भी चुनाव मैदान में मौजूद किसी प्रत्याशी ने चुनाव आयोग के उन दिशा-निर्देशों का पालन करना जरूरी नहीं समझा है जिसके तहत उन्हें अपना क्राइम रिकॉर्ड भी सार्वजनिक करना होगा।
उत्तर प्रदेश के MATHURA जिले में 18 अप्रैल को मतदान होना है। इस हिसाब से मात्र 13 दिन बीच में हैं किंतु किसी प्रत्याशी ने अब तक चुनाव आयोग के उन दिशा-निर्देशों का पालन नहीं किया जो सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर इसलिए जारी किए गए हैं ताकि न सिर्फ आपराधिक पृष्ठभूमि वाले राजनीतिक लोगों को बेनकाब किया जा सके बल्कि आम जनता भी यह जान सके कि जिसे वह अपना प्रतिनिधि चुनने जा रहे हैं उसकी वास्तविकता क्या है।
MATHURA से कुल कितने प्रत्याशी
इस बार MATHURA से चुनाव मैदान में भारतीय जनता पार्टी की हेमा मालिनी हैं। उन्हें चुनौती देने के लिए 12 अन्य उम्मीदवार मैदान में हैं। इस तरह कुल 13 प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतरे हैं।
कांग्रेस ने महेश पाठक को 20 साल बाद दोबारा टिकट दिया है तो राष्ट्रीय लोक दल की टिकट पर गठबंधन प्रत्याशी के रूप में कुंवर नरेंद्र सिंह अपने जीवन का पहला लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं। सपा-बसपा और राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) के बीच हुए गठबंधन के तहत यह सीट राष्ट्रीय लोक दल को मिली है।
स्वतंत्र जनताराज पार्टी ने ओम प्रकाश को मैदान में उतारा है। मैदान में 3 निर्दलीय प्रत्याशियों के अलावा 5 अन्य प्रत्याशी छोटे-छोटे दलों के भी चुनाव लड़ रहे हैं।
क्या हैं चुनाव आयोग के नए दिशा-निर्देश
दरअसल, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दागी नेताओं के संदर्भ में दिए गए दिशा-निर्देशों का अनुपालन करते हुए इस बार चुनाव आयोग ने आदर्श आचार संहिता में कुछ नए नियम जोड़े हैं और इन नियमों से सभी राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों को बाकायदा पत्र भेजकर अवगत भी कराया गया है।
लोकसभा चुनाव 2019 के लिए लागू किए गए नियम ये हैं-
दागी उम्मीदवारों को आगामी लोकसभा चुनाव लड़ते समय अपना-अपना आपराधिक रिकॉर्ड अखबारों और टीवी चैनल्स के माध्यम से मतदाताओं को बताना होगा। उन्हें सभी लंबित आपराधिक मामलों का ब्योरा बड़े अक्षरों में छपवाना होगा। टीवी चैनल्स में भी ऐसे मामलों की जानकारी विस्तार से देनी होगी।
यहीं नहीं, ऐसे नेताओं को टिकट देने वाले राजनीतिक दलों को भी इस बारे में अपनी वेबसाइट पर विस्तार से बताना होगा।
कैसे बताना होगा
ऐसे नेताओं को अपने आपराधिक रिकॉर्ड और सजा आदि का विवरण अपने इलाके के सर्वाधिक प्रसार संख्या वाले अखबारों में तीन अलग-अलग तारीखों पर विज्ञापन के रूप में छपवाना होगा।
यह सूचना बड़े अक्षरों में (12 पॉइंट) में छपवानी होगी।
ये विज्ञापन नामांकन प्रक्रिया पूरी होने के बाद से लेकर मतदान से दो दिन पहले तक छपवाने होंगे।
इसी प्रकार टीवी चैनल्स पर तीन अलग-अलग दिन खुद पर लगे आरोप बताने होंगे।
सर्वोच्च न्यायालय की यह कवायद देश की राजनीति से आपराधिक पृष्ठभूमि के नेताओं को दूर रखने के लिए है। चुनाव आयोग भी इसे लेकर काफी सख्त बताया जा रहा है, इसलिए केंद्रीय चुनाव आयोग ने सभी राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों को पत्र भेजकर इस बारे में नए दिशा-निर्देश दिए हैं।
शपथपत्र काफी नहीं
आपराधिक रिकॉर्ड वाले उम्मीदवार अभी तक चुनाव आयोग को शपथपत्र देकर काम चला लेते थे। इससे आम जनता को उन पर चल रहे मुकद्मों की जानकारी नहीं मिलती थी।
अब आयोग ने साफ कहा है कि केवल शपथपत्र से काम नहीं चलेगा। उन्हें केसों के बारे में आम जनता को सार्वजनिक तौर से बताना होगा। उम्मीदवारों को जिला निर्वाचन अधिकारी के पास अपने चुनाव खर्च के साथ उन समाचार पत्रों की प्रतियां भी जमा करनी होंगी, जिनमें उनके आपराधिक इतिहास का ब्योरा बतौर विज्ञापन प्रकाशित हुआ हो।
राजनीतिक दल भी बताएंगे
इसी प्रकार आपराधिक रिकॉर्ड वाले उम्मीदवारों को टिकट देने वाले राजनीतिक दलों पर भी चुनाव आयोग ने अंकुश लगाया है। उन्हें भी ऐसे उम्मीदवारों के आपराधिक रिकॉर्ड की जानकारी अपनी वेबसाइट पर देनी होगी। साथ ही, इस बारे में अखबारों में प्रकाशित कराना होगा और चैनल्स पर भी प्रसारित कराना होगा। नामांकन के समय ”सी फॉर्म” में भी यह सब बताना होगा।
अगर बात करें मथुरा से चुनाव मैदान में मौजूद सभी 13 प्रत्याशियों की तो शायद ही यह बात किसी के गले उतरे कि सारे के सारे प्रत्याशी दूध के धुले हैं और किसी पर कोई आरोप नहीं लगा है। कोई केस लंबित नहीं है।
सूत्रों के प्राप्त जानकारी के अनुसार इस चुनाव में MATHURA से लड़ रहे कई प्रत्याशी ऐसे हैं जिनके ऊपर एक-दो नहीं कई-कई केस चल रहे हैं और वो केस भी गंभीर किस्म के बताए जाते हैं।
जहां तक सवाल उनके द्वारा इस संबंध में नामांकन के वक्त जानकारी देने या न देने का है तो उसकी सूचना उपलब्ध नहीं है किंतु किसी प्रत्याशी ने अब तक तो अपने किसी लंबित केस का ब्योरा प्रिंट अथवा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में देना जरूरी नहीं समझा जबकि ऐसा न करने पर नामांकन तक रद्द किए जाने का प्रावधान है।
इसके अलावा नए नियमों के मुताबिक प्रत्याशियों को अपनी आय के स्त्रोत सहित अपनी पत्नी तथा बच्चों की आय के स्त्रोत भी बताने होंगे लेकिन MATHURA के किसी प्रत्याशी ने ”बच्चों” की आय के स्त्रोत सार्वजनिक नहीं किए हैं।
विदेश में अपनी व रिश्तेदारों की संपत्ति और देनदारियों का ब्यौरा भी अनिवार्य
प्रत्याशियों को अपने पिछले पांच साल का आयकर रिटर्न सार्वजनिक करना अनिवार्य है। साथ ही प्रत्याशियों को विदेश में अपनी व रिश्तेदारों की संपत्ति और देनदारियों का ब्योरा भी अनिवार्य रूप से देना होगा। ऐसा न करने पर उनका नामांकन निरस्त किया जा सकता है परंतु मथुरा से चुनाव लड़ रहे किसी प्रत्याशी ने संभवत: ऐसा कोई ब्योरा अब तक नहीं दिया है।
सोशल मीडिया अकाउंट
चुनाव आयोग इस बार सोशल मीडिया पर भी बारीक नजर रखे हुए है। इसके लिए आयोग ने दिशा-निर्देश दिए हैं कि प्रत्याशियों को नामांकन के वक्त चुनावी दस्तावेजों के साथ उससे संबंधित सोशल मीडिया अकाउंट्स की भी पूरी जानकारी देनी होगी।
यह जानकारी कितने प्रत्याशियों ने जिला निर्वाचन कार्यालय को उपलब्ध कराई है, इसका पता फिलहाल नहीं लगा है।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
यह सवाल आज इसलिए क्योंकि नामांकन और नाम वापसी आदि की प्रक्रिया पूरी हुए एक सप्ताह बीत जाने के बाद भी चुनाव मैदान में मौजूद किसी प्रत्याशी ने चुनाव आयोग के उन दिशा-निर्देशों का पालन करना जरूरी नहीं समझा है जिसके तहत उन्हें अपना क्राइम रिकॉर्ड भी सार्वजनिक करना होगा।
उत्तर प्रदेश के MATHURA जिले में 18 अप्रैल को मतदान होना है। इस हिसाब से मात्र 13 दिन बीच में हैं किंतु किसी प्रत्याशी ने अब तक चुनाव आयोग के उन दिशा-निर्देशों का पालन नहीं किया जो सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर इसलिए जारी किए गए हैं ताकि न सिर्फ आपराधिक पृष्ठभूमि वाले राजनीतिक लोगों को बेनकाब किया जा सके बल्कि आम जनता भी यह जान सके कि जिसे वह अपना प्रतिनिधि चुनने जा रहे हैं उसकी वास्तविकता क्या है।
MATHURA से कुल कितने प्रत्याशी
इस बार MATHURA से चुनाव मैदान में भारतीय जनता पार्टी की हेमा मालिनी हैं। उन्हें चुनौती देने के लिए 12 अन्य उम्मीदवार मैदान में हैं। इस तरह कुल 13 प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतरे हैं।
कांग्रेस ने महेश पाठक को 20 साल बाद दोबारा टिकट दिया है तो राष्ट्रीय लोक दल की टिकट पर गठबंधन प्रत्याशी के रूप में कुंवर नरेंद्र सिंह अपने जीवन का पहला लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं। सपा-बसपा और राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) के बीच हुए गठबंधन के तहत यह सीट राष्ट्रीय लोक दल को मिली है।
स्वतंत्र जनताराज पार्टी ने ओम प्रकाश को मैदान में उतारा है। मैदान में 3 निर्दलीय प्रत्याशियों के अलावा 5 अन्य प्रत्याशी छोटे-छोटे दलों के भी चुनाव लड़ रहे हैं।
क्या हैं चुनाव आयोग के नए दिशा-निर्देश
दरअसल, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दागी नेताओं के संदर्भ में दिए गए दिशा-निर्देशों का अनुपालन करते हुए इस बार चुनाव आयोग ने आदर्श आचार संहिता में कुछ नए नियम जोड़े हैं और इन नियमों से सभी राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों को बाकायदा पत्र भेजकर अवगत भी कराया गया है।
लोकसभा चुनाव 2019 के लिए लागू किए गए नियम ये हैं-
दागी उम्मीदवारों को आगामी लोकसभा चुनाव लड़ते समय अपना-अपना आपराधिक रिकॉर्ड अखबारों और टीवी चैनल्स के माध्यम से मतदाताओं को बताना होगा। उन्हें सभी लंबित आपराधिक मामलों का ब्योरा बड़े अक्षरों में छपवाना होगा। टीवी चैनल्स में भी ऐसे मामलों की जानकारी विस्तार से देनी होगी।
यहीं नहीं, ऐसे नेताओं को टिकट देने वाले राजनीतिक दलों को भी इस बारे में अपनी वेबसाइट पर विस्तार से बताना होगा।
कैसे बताना होगा
ऐसे नेताओं को अपने आपराधिक रिकॉर्ड और सजा आदि का विवरण अपने इलाके के सर्वाधिक प्रसार संख्या वाले अखबारों में तीन अलग-अलग तारीखों पर विज्ञापन के रूप में छपवाना होगा।
यह सूचना बड़े अक्षरों में (12 पॉइंट) में छपवानी होगी।
ये विज्ञापन नामांकन प्रक्रिया पूरी होने के बाद से लेकर मतदान से दो दिन पहले तक छपवाने होंगे।
इसी प्रकार टीवी चैनल्स पर तीन अलग-अलग दिन खुद पर लगे आरोप बताने होंगे।
सर्वोच्च न्यायालय की यह कवायद देश की राजनीति से आपराधिक पृष्ठभूमि के नेताओं को दूर रखने के लिए है। चुनाव आयोग भी इसे लेकर काफी सख्त बताया जा रहा है, इसलिए केंद्रीय चुनाव आयोग ने सभी राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों को पत्र भेजकर इस बारे में नए दिशा-निर्देश दिए हैं।
शपथपत्र काफी नहीं
आपराधिक रिकॉर्ड वाले उम्मीदवार अभी तक चुनाव आयोग को शपथपत्र देकर काम चला लेते थे। इससे आम जनता को उन पर चल रहे मुकद्मों की जानकारी नहीं मिलती थी।
अब आयोग ने साफ कहा है कि केवल शपथपत्र से काम नहीं चलेगा। उन्हें केसों के बारे में आम जनता को सार्वजनिक तौर से बताना होगा। उम्मीदवारों को जिला निर्वाचन अधिकारी के पास अपने चुनाव खर्च के साथ उन समाचार पत्रों की प्रतियां भी जमा करनी होंगी, जिनमें उनके आपराधिक इतिहास का ब्योरा बतौर विज्ञापन प्रकाशित हुआ हो।
राजनीतिक दल भी बताएंगे
इसी प्रकार आपराधिक रिकॉर्ड वाले उम्मीदवारों को टिकट देने वाले राजनीतिक दलों पर भी चुनाव आयोग ने अंकुश लगाया है। उन्हें भी ऐसे उम्मीदवारों के आपराधिक रिकॉर्ड की जानकारी अपनी वेबसाइट पर देनी होगी। साथ ही, इस बारे में अखबारों में प्रकाशित कराना होगा और चैनल्स पर भी प्रसारित कराना होगा। नामांकन के समय ”सी फॉर्म” में भी यह सब बताना होगा।
अगर बात करें मथुरा से चुनाव मैदान में मौजूद सभी 13 प्रत्याशियों की तो शायद ही यह बात किसी के गले उतरे कि सारे के सारे प्रत्याशी दूध के धुले हैं और किसी पर कोई आरोप नहीं लगा है। कोई केस लंबित नहीं है।
सूत्रों के प्राप्त जानकारी के अनुसार इस चुनाव में MATHURA से लड़ रहे कई प्रत्याशी ऐसे हैं जिनके ऊपर एक-दो नहीं कई-कई केस चल रहे हैं और वो केस भी गंभीर किस्म के बताए जाते हैं।
जहां तक सवाल उनके द्वारा इस संबंध में नामांकन के वक्त जानकारी देने या न देने का है तो उसकी सूचना उपलब्ध नहीं है किंतु किसी प्रत्याशी ने अब तक तो अपने किसी लंबित केस का ब्योरा प्रिंट अथवा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में देना जरूरी नहीं समझा जबकि ऐसा न करने पर नामांकन तक रद्द किए जाने का प्रावधान है।
इसके अलावा नए नियमों के मुताबिक प्रत्याशियों को अपनी आय के स्त्रोत सहित अपनी पत्नी तथा बच्चों की आय के स्त्रोत भी बताने होंगे लेकिन MATHURA के किसी प्रत्याशी ने ”बच्चों” की आय के स्त्रोत सार्वजनिक नहीं किए हैं।
विदेश में अपनी व रिश्तेदारों की संपत्ति और देनदारियों का ब्यौरा भी अनिवार्य
प्रत्याशियों को अपने पिछले पांच साल का आयकर रिटर्न सार्वजनिक करना अनिवार्य है। साथ ही प्रत्याशियों को विदेश में अपनी व रिश्तेदारों की संपत्ति और देनदारियों का ब्योरा भी अनिवार्य रूप से देना होगा। ऐसा न करने पर उनका नामांकन निरस्त किया जा सकता है परंतु मथुरा से चुनाव लड़ रहे किसी प्रत्याशी ने संभवत: ऐसा कोई ब्योरा अब तक नहीं दिया है।
सोशल मीडिया अकाउंट
चुनाव आयोग इस बार सोशल मीडिया पर भी बारीक नजर रखे हुए है। इसके लिए आयोग ने दिशा-निर्देश दिए हैं कि प्रत्याशियों को नामांकन के वक्त चुनावी दस्तावेजों के साथ उससे संबंधित सोशल मीडिया अकाउंट्स की भी पूरी जानकारी देनी होगी।
यह जानकारी कितने प्रत्याशियों ने जिला निर्वाचन कार्यालय को उपलब्ध कराई है, इसका पता फिलहाल नहीं लगा है।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
मंगलवार, 31 जनवरी 2012
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