धर्म को यदि शाब्दिक रूप से
परिभाषित किया जाए तो उसके अनेक अर्थ सामने आ जायेंगे। इन अर्थों में तमाम
इतने क्लिष्ट होंगे जिन्हें समझना और समझाना काफी मुश्किल हो जायेगा।
धर्म की गूढ़ता और उसको परिभाषित करने वाले अर्थ व अनर्थों में न पड़ा जाए
तो इस बात से शायद ही किसी को आपत्ति हो कि धर्म को जब धंधा बना लिया
जाता है तब वह धर्म नहीं रह जाता। तब वह खालिस अधर्म बन जाता है और
अधर्मियों के खिलाफ सख़्त कार्यवाही करना सरकार की ज़िम्मेदारी बनती है।हाल ही में एक खबर इस आशय की आई है कि धर्म के नाम पर विदेशों से आ रहे धन को लेकर सरकार काफी चिंतित है और उसने इस धन पर अपनी निगाहें केंद्रित कर दी हैं।
गृह मंत्रालय ने इस संबंध में जो आंकड़े जुटाए हैं, उनके अनुसार धर्म के नाम पर विदेशों से आ रहे धन की तादाद में सिर्फ सालभर के अंदर 23 फीसदी का इजाफा हुआ है। एक साल के अंदर इसमें 162 करोड़ रुपए की रिकॉर्ड बढ़ोत्तरी हुई है जो चौंकाने वाली है।
गौर करने वाली बात यह और है कि 162 करोड़ की बढ़ोत्तरी केवल उन गैर सरकारी धार्मिक संगठनों की है जिन्होंने एफसीआर नियमों के तहत बाकायदा रिटर्न दाखिल किए हैं जबकि ऐसे संगठनों की संख्या बहुत अधिक है जो धर्म के नाम पर विदेशों से धन तो लेते हैं किंतु रिटर्न तक दाखिल करना जरूरी नहीं समझते।
हालांकि ऐसे 4138 संगठनों को पिछले तीन सालों में प्रतिबंधित किया गया है परंतु अब भी इनकी संख्या बहुत अधिक है।
धर्म की आड़ में चल रहा अवैध धंधा सरकार ही नहीं समाज के लिए भी अत्यधिक चिंता का विषय है क्योंकि सामाजिक विघटन तथा दंगे-फसादों में इस धंधे से प्राप्त धन की बड़ी भूमिका रहती है।
देश इस दौर में जिन बड़ी परेशानियों का सामना कर रहा है, उनमें तथाकथित धर्म और उस धर्म के कारोबारियों की भागीदारी महत्वपूर्ण है। वह न केवल धर्म को अपने हिसाब से परिभाषित कर रहे हैं बल्कि उससे अर्जित संपत्ति का भी भरपूर दुरुपयोग कर रहे हैं।
यही कारण है कि एक ओर समाज भले ही पहले से अधिक शिक्षित हो रहा हो किंतु सामाजिक विघटन बढ़ रहा है। धर्म के नाम पर झगड़े, फसाद और दंगे हो रहे हैं।
देश की कुल जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा पूरी मेहनत-मशक्कत करने के बावजूद जरूरी संसाधन नहीं जुटा पाता और धर्म के धंधेबाज करोड़ों तथा अरबों रुपए इमारतों पर खर्च कर रहे हैं।
आश्चर्य की बात यह है कि कोई धर्म इस सब से अछूता नहीं रहा। सभी धर्मों के अंदर ऐसे तत्व अच्छी-खासी मात्रा में समाहित हो चुके हैं जिनके लिए धर्म आड़ का काम कर रहा है और वह उस आड़ के ज़रिए अपना कारोबार सरहदों के पार तक फैला चुके हैं।
कड़वा सच तो यह है कि धर्म को धंधा बनाने तथा उसको बाकायदा एक संगठित कारोबार की तरह संचालित करने वाले लोग देश के लिए घातक बीमारी का रूप ले चुके हैं।
भारी तादाद में विदेशी पैसा प्राप्त करने वाले तथाकथित धार्मिक संगठन उस पैसे का दुरुपयोग अपनी ऐश-मौज तथा उस खोखले अहम् की तुष्टि पर कर रहे हैं जो अंतत: सामाजिक विघटन का कारण बनता है।
बेशक इसके लिए हमारा वो कानून भी कम जिम्मेदार नहीं जो धर्म के नाम पर देश-विदेश से आने वाले कालेधन को सफेद करने की सहूलियत धार्मिक संगठनों को मुहैया कराता है इसलिए अब वक्त आ गया है कि ऐसे कानून की भी नए सिरे से व्याख्या की जाए और उसमें जरूरी संशोधन हों।
धर्म के लिए मिलने वाले धन पर कर में छूट का प्राविधान जिस दौर के अंदर बनाया गया था, उस दौर में धर्म का अवैध कारोबार करने की बात संभवत: किसी के दिमाग में नहीं रही होगी किंतु आज धर्म को बतौर धंधा इस्तेमाल करने वाले ही अधिक हैं लिहाजा समय की मांग है कि धार्मिक कारोबारियों की बारीक समीक्षा हो ताकि धर्म ही नहीं, देश भी बचा रहे।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी