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बुधवार, 27 मई 2026

माफिया की मुराद पूरी करने के लिए MVDA की 'हाई कोर्ट' को सीधी चुनौती, 'मन्नत रेजीडेंसी' की सील खोली


 जिस सरकारी जमीन को माफिया के कब्जे से मुक्त कराने के लिए सत्ताधारी दल भाजपा के ही एक पार्षद ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में जनहित याचिका (PIL) दाखिल की हुई है, उससे जुड़े हाउसिंग प्रोजक्‍ट 'मन्नत रेजीडेंसी' की बीती 22 मई को मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण (MVDA) ने न सिर्फ सील खोल दी बल्कि ये कहते हुए क्‍लीन चिट भी दे दी कि अब कोई विवाद शेष नहीं है जबकि इलाहाबाद हाई कोर्ट में यह PIL अब भी लंबित है और इसका स्टेटस हाई कोर्ट की वेबसाइट पर जाकर कोई भी चेक कर सकता है।    

इस संबंध में विकास प्राधिकरण के सचिव आशीष कुमार सिंह से जब जानकारी की गई तो उन्होंने बड़ी 'बेशर्मी' के साथ स्‍वीकार किया कि 'मन्नत रेजीडेंसी' की सील खोल दी गई है क्‍योंकि विभिन्न विभागों से ऐसी जानकारी हमें प्राप्त हुई थी। उनके अनुसार 'मन्नत रेजीडेंसी' को लेकर अब मथुरा-वृंदावन नगर निगम को भी कोई आपत्ति नहीं है। 
देखिए मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के सचिव आशीष कुमार सिंह ने इस बावत क्या-क्या कहा-

 
सचिव विकास प्राधिकरण आशीष कुमार सिंह के कथन से स्‍पष्ट होता है कि उन्हें इस पूरे प्रकरण और इसे लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट में लंबित जनहित याचिका की पूरी जानकारी थी, बावजूद इसके उन्होंने ये दुस्साहस करके हाई कोर्ट को सीधी चुनौती दी है। 
गौरतलब है कि मथुरा के पॉश एरिया मसानी लिंक रोड पर जहां मन्नत रेजीडेंसी खड़ी की जा रही है, वहां बाकायदा कभी मथुरा-वृंदावन नगर निगम के बोर्ड लगे हुए थे और उन पर चेतावनी भी दर्ज थी, किंतु माफिया ने नगर निगम की जमीन कब्‍जाने के लिए इन बोर्डों को 'जमींदोज' कर दिया ताकि आगे कोई उंगली न उठा सके। ये फोटो इसकी गवाही दे सकते हैं। 
सचिव विकास प्राधिकरण ने इतनी बड़ी हिमाकत क्यों और कैसे की होगी, इसका अंदाज हर वो व्‍यक्‍ति लगा सकता है जिसका कभी किसी मामले में इस विभाग से वास्ता पड़ा होगा। यही नहीं, जिनका वास्ता न भी पड़ा हो, वो भी मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण की कारगुजारियों से भलीभांति वाकिफ रहते हैं क्‍योंकि भ्रष्‍टाचार इस विभाग की कार्य संस्‍कृति का अभिन्न अंग जो है। 
देखें सचिव आशीष कुमार सिंह के हस्ताक्षर से 22 मई का जारी किया गया वो आदेश जो उनके गले की फांस बन सकता है- 
दरअसल, सचिव आशीष कुमार सिंह ने ये सारा खेल यूं ही नहीं खेला। वो जानते हैं कि यूपी का मथुरा एक ऐसा जिला है जहां उनके पूर्ववर्ती अधिकारियों ने भी खूब मनमानी की है, लेकिन उनमें से आज तक किसी का कुछ नहीं बिगड़ा। इसके ठीक उलट उनमें से कुछ अधिकारी तो आज उनके बॉस बने बैठे हैं। 
हो सकता है कि आशीष कुमार सिंह ने उन्‍हीं से प्राप्त 'फीडबैक' के आधार पर इतना खुलकर खेलने की हिम्मत जुटा ली हो और इलाहाबाद हाई कोर्ट को सीधी चुनौती दे डाली लेकिन जरूरी नहीं कि यदि पूर्ववर्तियों का दांव सीधा पड़ गया तो अब भी यथास्थिति कायम रहेगी। 
इस बार दांव उल्टा पड़ जाने की पूरी संभावना है, वो इसलिए कि याचिकाकर्ता ब्रजेश खरे ने इस मामले में अदालत की अवमानना का केस फाइल करने की पूरी तैयारी कर ली है।

जहां तक सवाल है उसके लिए जरूरी दस्तावेजों का तो वो खुद सचिव ने अपने हस्ताक्षरित पत्र तथा मीडिया को ऑन कैमरा दिए गए बयान से उसकी पूर्ति कर दी है। 
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी 

 

शुक्रवार, 22 मई 2026

कुछ बड़े अधिकारियों को भारी पड़ सकती है माफिया पर मेहरबानी, 'सनसिटी अनंतम' के मामले में PIL दायर


 राष्‍ट्रीय राजधानी दिल्ली और आगरा के बीच भगवान श्रीकृष्ण की पावन लीला स्थली वृंदावन में नेशनल हाईवे 19 के किनारे छटीकरा पर बन रही 'सनसिटी अनंतम' जल्द ही कुछ अधिकारियों के गले की फांस बनने जा रही है।  

दीपक शर्मा पुत्र लक्ष्मीनारायण शर्मा उर्फ ब्रज बिहारी शर्मा निवासी वृंदावन ने इस मामले में जिला प्रशासन के कुछ अधिकारियों की कॉलोनाइजर के रूप में सक्रिय माफिया पर मेहरबानी को इलाहाबाद हाई कोर्ट के सामने रखा है। 

अपनी जनहित याचिका में दीपक शर्मा ने बताया है कि चार महीने पहले मथुरा-वृंदावन नगर निगम ने ये स्वीकार किया कि नगर निगम की जमीन पर 'सनसिटी अनंतम' के मालिकों ने न सिर्फ कब्जा कर रखा है बल्कि उस पर अवैध निर्माण भी करा लिया है, लेकिन आज तक उस भूमि को कब्जा मुक्त नहीं कराया जिससे माफिया और संबंधित अधिकारियों के बीच सांठगांठ की पुष्टि होती है। 

दरअसल, ये सारा खेल इस बेशकीमती सरकारी जमीन को 'लैंड एक्सचेंज' की आड़ में माफिया को देने से जुड़ा है जिसके लिए कई बार नगर निगम की बोर्ड बैठकों में प्रस्ताव पास कराने का प्रयास किया गया किंतु किसी न किसी कारणवश अधिकारी अपने मकसद में सफल नहीं हो सके। 

चूंकि कुछ खास अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को इस काम के लिए बड़ी रकम 'नजराना' के रुप में दी जा चुकी है और उससे भी कई गुना अधिक रकम बतौर 'शुकराना' मिलना शेष है इसलिए वह मीडिया से लेकर आम जनता तक की आंखों में धूल तो झोंक रहे हैं लेकिन सरकरी जमीन को कब्जा मुक्त नहीं करा रहे। 

अधिकारियों की माफिया पर मेहरबानी का अंदाज उस पत्र से लगाया जा सकता है जो नगर निगम मथुरा-वृंदावन की ओर से मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण को लिखा गया था। 

इस पत्र में नगर निगम ने विकास प्राधिकरण को लिखा है कि सनसिटी अनंतम में सरकारी जमीन पर किए जा रहे अवैध निर्माण को रुकवाकर पूर्व में किए गए अवैध निर्माण को ध्‍वस्त किया जाए, किंतु चार महीने बीत जाने के बाद भी न तो अवैध निर्माण रुका और न ध्वस्त कराया गया। 


हालांकि उस वक्त भी 'लीजेंड न्यूज़' ने इस संबंध में प्रमुखता से खबर प्रकाशित की थी जिसे इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ा जा सकता है- 


https://legendnews.in/single-post?s=suncity-anantam-case-nagar-nigam-mathura-vrindavan-got-caught-in-its-own-trap-and-a-single-letter-exposed-its-corrupt-practices-39089

विकास प्राधिकरण ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि नगर निगम अपनी जमीन को कब्जा मुक्त कराने तथा अवैध निर्माण ध्‍वस्त कराने में स्‍वयं सक्षम है जबकि नगर निगम चिट्ठी-चिट्ठी खेल रहा है, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठा रहा। ये स्थिति तो तब है जबकि सरकारी जमीन को कब्जा मुक्त कराने के लिए 'अंतरिक्ष' से कोई दूसरे अधिकारी नहीं भेजे जाएंगे। जो कुछ करना है, यहां तैनात अधिकारियों को ही करना है परंतु उनकी समस्या यह है कि उन्‍हें 'नजराने' का हक भी अदा करना है और 'शुकराना' भी हासिल करना है लिहाजा वह सनसिटी अनंतम के मालिकों की शान में गुस्ताखी करें तो करें कैसे। 

बहरहाल, याचिकाकर्ता दीपक शर्मा ने इस मामले में जिन्हें पक्षकार बनाया है उनमें प्रिंसिपल सेक्रेटरी उत्तर प्रदेश के अलावा म्युनिसिपल कमिश्नर और एडिशनल म्युनिसिपल कमिश्नर मथुरा-वृंदावन नगर निगम, सचिव मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण, एसएसपी मथुरा तथा डायरेक्‍टर सनसिटी अनंतम शामिल हैं। 

दीपक शर्मा ने जनहित याचिका में उच्च न्यायालय से जो प्रेअर की है, उसके मुख्‍य बिंदु हैं- 

1- नगर निगम मथुरा द्वारा खुली नीलामी (Open Auction) एवं विधिसम्मत प्रक्रिया अपनाए बिना सरकारी भूमि का अवैध रूप से विनिमय (Exchange) किए जाने की प्रक्रिया चलाई जा रही है, जिससे केवल प्रतिवादी संख्या–6 अर्थात सनसिटी अनंतम को अनुचित लाभ पहुँचाया जा रहा है। 

2- यह स्पष्ट नहीं है कि मथुरा-वृंदावन नगर निगम द्वारा अत्यंत मूल्यवान सरकारी भूमि को बिना किसी खुली बोली, पारदर्शी प्रक्रिया एवं वास्तविक बाजार मूल्यांकन के प्रतिवादी संख्या–6 को क्यों दिया जा रहा है, जो कि विधि एवं जनहित दोनों के विरुद्ध है इसलिए उसे निजी लाभ हेतु किसी निजी कंपनी को न सौंपा जाए।

3- प्रस्तावित 'अवैध भूमि विनिमय' पूर्णतः जनहित के विरुद्ध है तथा केवल प्रतिवादी संख्या–6 को लाभ पहुँचाने हेतु किया जा रहा है। नगर निगम द्वारा भूमि का मूल्य मात्र ₹10,000 प्रति वर्गमीटर दर्शाया गया है, जबकि प्रतिवादी संख्या–6 उसी क्षेत्र में लगभग ₹85,000 प्रति वर्ग मीटर की दर से प्लॉट विक्रय कर रहा है। यह तथ्य स्वयं अधिकारियों एवं प्रतिवादी संख्या–6 के मध्य भ्रष्टाचार एवं मिलीभगत को प्रदर्शित करता है।

4- संबंधित प्राधिकरण स्वयं स्वीकार कर चुका है कि प्रतिवादी संख्या–6 द्वारा सरकारी भूमि पर बिना अनुमति अवैध निर्माण किया गया है तथा प्रतिवादी संख्या–3 द्वारा प्रतिवादी संख्या–4 को अवैध निर्माण रोकने एवं ध्वस्तीकरण हेतु रिपोर्ट भी भेजी गई, किन्तु प्रतिवादी संख्या–4 द्वारा कोई कार्रवाई नहीं की गई, जो कि विधि एवं नागरिकों के मौलिक अधिकारों के विरुद्ध है।

5- याचिकाकर्ता द्वारा प्रतिवादी संख्या–2, 3, 4 एवं 5 को अनेक शिकायतें प्रस्तुत की गईं, किन्तु किसी भी सक्षम प्राधिकारी द्वारा कोई वैधानिक कार्रवाई नहीं की गई। जबकि भूमि का वास्तविक बाजार मूल्य लगभग ₹1,00,000 प्रति वर्ग मीटर है, तथापि विनिमय मात्र ₹10,000 प्रति वर्ग मीटर की दर से प्रस्तावित किया गया है, जो कि Uttar Pradesh नगर निगम अधिनियम 1916 एवं संविधान के अनुच्छेद 14 एवं 21 का उल्लंघन है।

6- विवादित भूमि सरकारी भूमि है तथा उसका उपयोग जनता की आवश्यक सुविधाओं जैसे विद्यालय, अस्पताल, पार्क एवं अन्य सार्वजनिक उपयोग हेतु किया जाना चाहिए, जो कि संविधान के अनुच्छेद 14 एवं 21 के अंतर्गत प्रदत्त अधिकारों का अभिन्न हिस्सा है।

7- नगर निगम द्वारा उक्त भूमि को जनहित के स्थान पर निजी लाभ हेतु प्रतिवादी संख्या–6 को दिए जाने का प्रयास किया जा रहा है जबकि संबंधित क्षेत्र में पार्क एवं अस्पताल जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव है, अतः उक्त भूमि का उपयोग जनकल्याण हेतु किया जाना न्यायोचित एवं आवश्यक है।

8- उपर्युक्त तथ्यों एवं परिस्थितियों को दृष्टिगत रखते हुए माननीय न्यायालय से विनम्र प्रार्थना है कि कृपया प्रतिवादी संख्या–4 को दिनांक 22.01.2026 की रिपोर्ट/आदेश, जो प्रतिवादी संख्या–3 द्वारा पारित किया गया था, का अनुपालन सुनिश्चित करने हेतु परमादेश (Mandamus) जारी करने की कृपा करें।

9- प्रतिवादी संख्या–1 को माननीय न्यायालय की निगरानी में एक स्वतंत्र समिति गठित कर उक्त अवैध भूमि विनिमय प्रक्रिया की निष्पक्ष जाँच कराने हेतु निर्देशित करने की कृपा करें।

10- प्रतिवादी संख्या–1, 2, 3 एवं 4 को निर्देशित किया जाए कि विवादित सरकारी भूमि का उपयोग जनहित में विद्यालय, कॉलेज, अस्पताल, पार्क अथवा अन्य सार्वजनिक उपयोग हेतु किया जाए।

11- प्रतिवादी संख्या–5 को याचिकाकर्ता की सुरक्षा सुनिश्चित करने तथा प्राप्त शिकायतों पर विधिसम्मत कार्रवाई करने हेतु निर्देशित करने की कृपा करें।

12- माननीय न्यायालय परिस्थितियों के अनुसार जो अन्य उचित आदेश अथवा निर्देश पारित करना उचित समझे, वह भी पारित करने की कृपा करें। 

यहां यह जान लेना बहुत जरूरी है कि सनसिटी अनंतम के पक्ष में अधिकारियों के खुलकर खेलने का यह काम कोई हाल-फिलहाल शुरू नहीं हुआ। यह पिछले कई वर्षों से खेला जा रहा है। इस बीच कई अधिकारी आए, और चले भी गए किंतु सनसिटी अनंतम के मालिकों को लेकर 'समर्पण का भाव' किसी में कम नहीं हुआ क्योंकि इस प्रोजेक्ट का मालिकाना हक जिनके पास है, उनकी तूती कई राज्यों में बोलती है। 

चूंकि आज भी आमजन की आखिरी उम्मीद न्यायपालिका से ही लगी है इसलिए इस मामले में भी अंतत: न्यायपालिका की ही शरण लेनी पड़ी। अब देखना यह है कि 'नजराना' लेकर बैठे अधिकारी 'शुकराना' हासिल करने में सफल होते हैं या फिर अपनी इस लगातार की जा रही हिमाकत का खामियाजा भुगतते हैं। 

-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी


शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

बड़े खेल का खुलासा: करोड़ों की पेशगी लेकर लाया गया नगर निगम की जमीन कॉलोनाइजर को देने का प्रस्ताव, PIL दायर करने की तैयारी


 वृंदावन में कुछ खास कॉलोनाइजर के लिए लेंड एक्सचेंज का प्रस्‍ताव यूं ही नहीं लाया गया। इसके लिए षड्यंत्र के तहत बाकायदा एक ''दुरभि संधि'' की गई। चूंकि मामला करोड़ों का नहीं, अरबों रुपए का था इसलिए करोड़ों रुपए तो पेशगी में ही दे दिए गए। हालांकि अब नगर आयुक्त कह रहे हैं कि ये प्रस्ताव दफन किया जा चुका है लिहाजा भविष्य में ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं लाया जाएगा। 

नगर आयुक्त कुछ भी कहें, लेकिन सवाल तो यह है कि निजी टाउनशिप के लिए पहले तो मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण और फिर मथुरा-वृंदावन नगर निगम, ये प्रस्ताव लेकर आया ही क्यों? 
इस 'क्यों' का जवाब देने को कोई तैयार नहीं है इसलिए कुछ जागरूक लोग न्यायालय की शरण में जाने की तैयारी कर चुके हैं। वो इसे उच्च न्यायालय और फिर जरूरत पड़ने पर उच्चतम न्यायालय तक ले जाना चाहते हैं ताकि बेशकीमती सरकारी जमीन को माफिया के कब्‍जे में जाने से बचाया जा सके। 
एनजीटी में ये मामला पहले ही जा चुका है और वहां से सभी संबंधित पक्षों को नोटिस भी जारी किए जा चुके हैं, परंतु अब लोगों को समझ में आ गया है कि डालमिया बाग की तरह इस केस को भी उच्‍च या उच्चतम न्यायालय ले जाना ही उपयुक्त होगा इसलिए वो इसकी तैयारी कर चुके हैं।
वृंदावन निवासी लक्ष्मीनारायण उर्फ ब्रजबिहारी शर्मा तथा दीपक शर्मा ने कल इसी संदर्भ में जिलाधिकारी मथुरा के नाम एक ज्ञापन सौंपा है और उसकी प्रति लोकायुक्त को भी भेजी है। 
शिकायतकर्ताओं ने इस ज्ञापन में लिखा है कि इस ''लेंड एक्सचेंज'' का प्रस्ताव पेश करने से पहले न तो विकास प्राधिकरण ने और ना ही नगर निगम ने पारदर्शिता एवं नियमों का पालन किया जिससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि ऐसा एक निजी कंपनी को अनुचित लाभ पहुंचाने के उद्देश्‍य से किया गया। 
शिकायतकर्ताओं ने इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराने का अनुरोध किया है जिससे प्रस्ताव लाने के पीछे छिपी मंशा सामने आ सके और इसके लिए जिम्‍मेदार अधिकारियों को कठघरे में खड़ा किया जा सके। 
मथुरा जिला प्रशासन तथा नगर निगम मथुरा-वृंदावन से जुड़े भरोसेमंद सूत्र बताते हैं कि सनसिटी अनंतम एवं अन्य बिल्डर्स के पक्ष में लेंड एक्सचेंज का मात्र प्रस्‍ताव लाने की पेशगी करीब 5 करोड़ रुपए प्राप्त की गई तथा 'शेष के लिए' पूरी 'साजिश' बनाई गई कि किसको किस तरह और कितना-कितना लाभ पहुंचाना है। 
ये सारा काम कितनी गोपनीयता से किया जा रहा था, इसका अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि सनसिटी अनंतम के मालिकों तक का नाम किसी को नहीं बताया जाता। 
सूत्र बताते हैं कि सैकड़ों एकड़ की इस टाउनशिप के मालिकों में मुख्‍य रूप से ZEE TV के मालिक सुभाष चंद्रा के भाई लक्ष्‍मी गोयल तथा उनके समधी (जो एक्शन शू कंपनी के मालिक) शामिल हैं।  
इनके अलावा जिन अन्य के लिए लेंड एक्सचेंज का प्रस्‍ताव लाया गया, उनमें द्वारिकादास जीवराजका मैमोरियल ट्रस्ट तथा हरिनिवास खेतान मैमोरियल ट्रस्ट द्वारा विकसित की जा रही कॉलोनियों का नाम है। 
''लीजेंड न्यूज़'' ने जब इस पूरे प्रकरण में कानूनी विशेषज्ञों की राय ली तो उन्‍होंने इसे साफ तौर पर पद के दुरुपयोग तथा निजी स्‍वार्थ की पूर्ति के लिए बदनीयती का मामला बताया, जो आपराधिक कृत्य बनता है। 
कानूनी विशेषज्ञों की राय में ये न सिर्फ नियमों को ताक पर रखकर माफिया के एजेंट की तरह काम करने का अपराध है बल्कि इससे साफ-साफ जाहिर होता है कि मथुरा जिले के अधिकारी तो बिक ही चुके हैं, जनप्रतिनिधि भी ऑब्लाइज हैं अन्यथा ये मुद्दा अब तक विधानसभा में भी उठ जाना चाहिए था। 
कानून के जानकारों की मानें तो इस पूरे प्रकरण में प्रशासनिक अधिकारियों सहित मेयर की भी भूमिका संदिग्ध प्रतीत होती है और इसलिए यदि इसकी निष्पक्ष जांच हो जाती है तो साफ हो जाएगा कि आखिर क्यों कुछ खास कॉलोनाइजर के पक्ष में लेंड एक्सचेंज के लिए प्रशासन से लेकर निगम तक में बैठे जिम्मेदार लोग इतने उतावले हैं। 
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

रविवार, 3 फ़रवरी 2013

क्या है PIL (जनहित याचिका)

देश के हर नागरिक को संविधान की ओर से छह मूल अधिकार दिए गए हैं। ये हैं : समानता का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार, शोषण के खिलाफ अधिकार, संस्कृति और शिक्षा का अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार और मूल अधिकार पाने का रास्ता।

अगर किसी नागरिक (आम आदमी) के किसी भी मूल अधिकार का हनन हो रहा है, तो वह हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर मूल अधिकार की रक्षा के लिए गुहार लगा सकता है। वह अनुच्छेद-226 के तहत हाई कोर्ट का और अनुच्छेद-32 के तहत सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है।

अगर यह मामला निजी न होकर व्यापक जनहित से जुड़ा है तो याचिका को जनहित याचिका के तौर पर देखा जाता है। पीआईएल डालने वाले शख्स को अदालत को यह बताना होगा कि कैसे उस मामले में आम लोगों का हित प्रभावित हो रहा है।

अगर मामला निजी हित से जुड़ा है या निजी तौर पर किसी के अधिकारों का हनन हो रहा है तो उसे जनहित याचिका नहीं माना जाता। ऐसे मामलों में दायर की गई याचिका को पर्सनल इंट्रेस्ट लिटिगेशन कहा जाता है और इसी के तहत उनकी सुनवाई होती है।

दायर की गई याचिका जनहित है या नहीं, इसका फैसला कोर्ट ही करता है।

पीआईएल में सरकार को प्रतिवादी बनाया जाता है। सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट सरकार को उचित निर्देश जारी करती हैं। यानी पीआईएल के जरिए लोग जनहित के मामलों में सरकार को अदालत से निदेर्श जारी करवा सकते हैं।

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