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सोमवार, 9 अगस्त 2021
बड़ा सवाल: यूपी में इस बार कौन बनेगा मुख्यमंत्री… बुआ, बबुआ, बबली या बाबा?
उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में यूं तो अभी पूरे 6 महीने बाकी हैं लेकिन यह बड़ा सवाल उछलने लगा है कि इस बार मुख्यमंत्री बनेगा कौन?चार नाम मुक़ाबिल हैं। बुआ, बबुआ, बबली और बाबा। 2017 के चुनाव में बुआ और बबुआ साथ थे किंतु इस मर्तबा आमने-सामने होंगे।
बबली पहली बार सीएम की संभावित उम्मीदवार हैं। हालांकि अंत तक उनकी पार्टी का ऊंट किस करवट बैठेगा, कहना थोड़ा मुश्किल है।
शेष रहे बाबा… तो उनका कोई विकल्प नहीं है इसलिए अपनी पार्टी के वही सीएम कैंडिडेट होंगे, इसमें किसी को कोई शक-शुबहा नहीं होना चाहिए। ये अलग बात है कि शक पैदा करने का भरसक प्रयत्न किया गया परंतु समय रहते उसकी हवा निकाल दी गई।
हवा निकली तो कुछ चेहरों की हवाइयां उड़ना स्वाभाविक था लेकिन चुनाव की चर्चा हवा टाइट करने की इजाजत नहीं देती इसलिए सबसे पहला कार्ड खेला बुआ ने।
ऐसा लगा जैसे किसी ने उन्हें झिंझोड़ कर नींद से उठा दिया हो, लिहाजा कल तक बुझी-बुझी सी बुआ ने ब्राह्मणों पर दांव लगाते हुए अयोध्या से प्रबुद्ध सम्मेलनों के आयोजन की शुरूआत कर डाली।
उन्होंने इतना भी नहीं सोचा कि जिन सजातीय बंधु-बांधवों ने उन्हें अर्श से फर्श तक पहुंचाया, वो क्या सोचेंगे। जिन्होंने साइकिल के डंडे की सवारी से उतारकर हाथी की सवारी करवाई, उनके कलेजे पर क्या बीतेगी। तिलक, तराजू और तलवार जैसे नारे का क्या होगा।
परंपरागत रूप से ‘स्वर्गीय’ कहलाने के हकदार उन कांशीराम की आत्मा कितनी बेचैन होगी, जिन्होंने कभी IAS बनने का सपना संजोने वाली एक आम सी लड़की को देखकर कहा था कि एक दिन सैकड़ों IAS तुम्हारे ‘चाकर’ होंगे।
यही नहीं, प्रदेश के उन 17 फीसदी अल्पसंख्यकों का धनीधोरी कौन होगा, जो कल तक यही समझते रहे कि हाथी ही उनका एकमात्र साथी है और साइकिल पंक्चर होने के बाद हाथी में ही वो दम बाकी है जिसकी सूंड के सहारे वह कमल को सबक सिखा सकते हैं।
बहरहाल, ब्राह्मणों को लेकर खेले गए बुआ के इस धोबी पछाड़ दांव ने बबुआ की पेशानी पर बल डलवा दिए और वो भी तत्काल ‘ब्राह्मण मोड’ में आते हुए बोले कि हम न सिर्फ ब्राह्मण सम्मेलन करेंगे बल्कि सरकार बनते ही प्रदेश के हर जिले में भगवान परशुराम के मंदिर स्थापित कराएंगे।
सरकार बनाने को लेकर बबुआ के कॉन्फिडेंस का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने 350 सीटें जीतने का दावा करते हुए यहां तक कह दिया कि उन्हें 400 सीटें भी मिल सकती हैं क्योंकि बाबा से लोग बहुतई नाराज हैं।
बबुआ के दावे पर प्रश्नचिन्ह लगाने का अधिकार पार्टी में किसी को है नहीं, इसलिए किसी ने लगाया भी नहीं। आखिर पिछले पांच साल से वो निठल्ला चिंतन कर रहे थे। Twitter-Twitter भी खेल रहे थे जिससे तत्काल साफ पता लग जाता है कि कितने करोड़ फॉलोअर हैं।
अब इतने विश्वसनीय सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से मिल रहे इनपुट को अवॉइड तो नहीं किया जा सकता न। वहां सक्रिय लोग इतने नकारा नहीं हो सकते कि 350 से 400 का आंकड़ा बताकर 35-40 पर ला पटकें।
सरकारी एजेंसियों को तो बाबा ने ऐसी पट्टी पढ़ाई है कि वो अब बबुआ के भरोसे की रही नहीं। पुलिस तक अब खाकी की तरह नहीं, बाबा की तरह खांटी भाषा का इस्तेमाल करने लगी है। खैर… बबुआ की खुशी को ग्रहण क्यों लगाया जाए, और क्यों उनके सपने में खलल डाला जाए।
बबली की पार्टी के एक महाबली ने तो ब्राह्मणों की सियासत पर ऐसा ‘चौका’ लगाया कि कहने लगे… हमारी तो सीएम कैंडिडेट खुद ही ब्राह्मण है। उनके नाम के साथ दो सरनेम बेशक पहले से जुड़े हों लेकिन ‘छद्म’ सरनेम सदा से वही है जो आज ‘बेचारे’ कश्मीरी हिन्दुओं के साथ जुड़ गया है। वक्त जरूरत उसे उसी तरह कुर्ते के ऊपर धारण कर लिया जाता है जिस तरह ‘जनेऊ’ धारण किया जा सकता है। और इसमें हर्ज ही क्या है। राजनीति के लिए मुखौटे हमेशा मुफीद साबित हुए हैं, और यही कारण है कि राजनेता किस्म-किस्म के मुखौटों का प्रयोग करने में माहिर होते हैं। जो राजनेता मुखौटों का सही इस्तेमाल करना नहीं जानता, वो सही मायनों में राजनेता कहलाने का हकदार नहीं होता।
कुल मिलाकर पब्लिक माने या ना माने परंतु बबली की पार्टी मानती है कि वो उसी ब्राह्मण कुल की शाखा हैं जो कश्मीर से टूटकर ‘संगम’ घाट आ गिरी थी और फिर विभिन्न जाति-धर्म संप्रदायों से होकर भी एक ओर जहां ‘सनातनी’ हैं वहीं दूसरी ओर उनका सूक्ष्मजीवी ब्राह्मणत्व अमरत्व को प्राप्त है।
शेष रहे बाबा… जो गेरूआ त्यागे बिना वाया गोरखनाथ सत्ता पर तो काबिज हुए ही, नए-नए कीर्तिमान भी गढ़े। एक झटके में राजनीति की परिभाषा बदल दी। ‘ठीक’ न होने पर ‘ठोक’ देने के हिमायती बाबा ने ‘सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास’ पर आगे बढ़ते हुए यह भी ऐलान कर दिया कि इसे मानना या ना मानना ‘उनकी’ मर्जी। जैसी जिसकी सोच।
बाबा ने बता दिया कि वो बिना रुके और बिना थके उस रास्ते पर चलते रहेंगे जिस पर चलकर प्रदेश को प्रगति के सोपान पर चढ़ाया जा सकता है।
बाबा बोलते हैं कि अभी बहुत कुछ करना बाकी है इसलिए एक बार की कसरत से प्रदेश की कमान सीधी नहीं की जा सकती। उसके लिए कम से कम दो पंचवर्षीय योजनाओं की और दरकार है। नहीं तो नौ दिन चले अढ़ाई कोस की कहावत चरितार्थ होते देर नहीं लगेगी।
बाबा बोलते हैं कि ये पब्लिक है, सब जानती है। सबको पहचानती है। फिर चाहे वह बुआ हो या बबुआ, बबली हो या बाबा। उसे पता है कि गोरखनाथ पीठ व गेरुआ वस्त्रधारी चाहे कहीं भी हों, न तो जाति और धर्म की राजनीति करते हैं और न ब्राह्मणों का इतना अपमान करते हैं कि मान-मनौवल के लिए या तो ब्राह्मण सम्मेलन करने पड़ जाएं या स्वयंभू ब्राह्मण की उपाधि हासिल करने की मजबूरी आ खड़ी हो जाए।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
शनिवार, 24 फ़रवरी 2018
शैतानी हो या साजिश…लेकिन ”निष्कलंक” नहीं रह पाया ”योगीराज”
योगी जी…क्या अब आप कभी यह कह सकेंगे कि मेरे शासनकाल में उत्तर प्रदेश के अंदर कोई सांप्रदायिक उपद्रव नहीं हुआ?
कासगंज में जो कुछ हुआ, वह कैसे हुआ और क्या उसके पीछे कोई साजिश थी…यह जांच का विषय है लिहाजा निष्कर्ष निकलने तक इस बावत कुछ भी नहीं कहा जा सकता किंतु यह जरूर कहा जा सकता है कि तमाम मुठभेड़ों के बावजूद न तो आपकी ”खाकी” अपराधियों के मन में भय बैठा सकी और न आप ”खाकी” के मन में।
एक सर्वमान्य सूक्ति है कि बेहतर शासन-प्रशासन चलाने के लिए सरकार का ”इकबाल” बुलंद होना लाजिमी है। जब सरकार का इकबाल बुलंद होता है तो सरकारी नुमाइंदे अपनी पूरी निष्ठा, लगन व ईमानदारी से सक्रिय रहते हैं। उनकी सक्रियता ही अपराधियों के लिए भय का वातावरण बनाती है और जनसामान्य के अंदर सुरक्षा की भावना पैदा करती है।
नि:संदेह उत्तर प्रदेश की कानून-व्यवस्था काफी पहले से बदहाल थी और आम लोगों का ”सरकारों” से भरोसा उठ चुका था परन्तु अब तो यह भरोसा पैदा होना चाहिए।
देश के इस सबसे बड़े राज्य की कमान योगी आदित्यनाथ ने 19 मार्च 2017 को संभाली थी। इस हिसाब से उनकी सरकार को आज 10 महीने और 13 दिन पूरे हो चुके हैं लेकिन प्रदेश के कई जिले ऐसे हैं जहां बदमाश पूरी तरह बेखौफ दिखाई देते हैं।
खुद सीएम योगी आदित्यनाथ ने इसी महीने की 23 तारीख को सहारनपुर, मथुरा और लखनऊ में लगातार हो रहीं गंभीर आपराधिक वारदातों पर नाराजगी जताई थी। उन्होंने प्रदेश के आला पुलिस अधिकारियों को तलब करके पूछा था कि अगर अपराधियों पर प्रभावी अंकुश नहीं लग पा रहा तो जिलों में बैठे पुलिस अधिकारी कर क्या रहे हैं। उनसे काम नहीं हो पा रहा तो वह पद छोड़ दें।
23 जनवरी को मुख्यमंत्री द्वारा अपनी मंशा स्पष्ट कर देने के बाद भी तीसरे ही दिन 26 जनवरी पर गणतंत्र दिवस की तिरंगा यात्रा में हुई कासगंज की घटना ने यह साबित कर दिया कि न तो ”योगी राज” से ”खाकी” की कार्यप्रणाली प्रभावित हुई है और न ”खाकी” से बदमाशों में कोई भय उत्पन्न हुआ है।
गौरतलब है कि प्रदेश के राज्यपाल रामनाइक ने भी कासगंज की घटना को उत्तर प्रदेश के लिए ”कलंक” बताया है। राज्यपाल इससे पहले भी कानून-व्यवस्था पर असंतोष जाहिर कर चुके हैं।
रामनाइक के बयान इसलिए ज्यादा महत्व रखते हैं क्योंकि पिछले कुछ वर्षों से राज्यपाल का पद भी दलगत राजनीति का शिकार होने लगा था और अमूमन राज्यपालों की छवि का आंकलन राजनीतिक नजरिए से किया जा रहा था।
कानून-व्यवस्था और कासगंज में हुई हिंसा पर राज्यपाल के रूप में रामनाइक के बयानों ने निश्चित ही इस पद की गरिमा बढ़ाई है किंतु सवाल यह खड़ा होता है कि क्या उनके बयानों को शासन-प्रशासन भी गंभीरता से लेगा ?
योगी आदित्यनाथ द्वारा उत्तर प्रदेश में 21वें मुख्यमंत्री की शपथ लेने के मात्र 15 दिनों के बाद “Legend News” ने ”सबसे बड़ी चुनौती: क्या पुलिस का DNA बदल पाएगी योगी सरकार ?” शीर्षक से लिखा था कि जरूरत से ज्यादा राजनीतिक दखल, भ्रष्टाचार, जातिवाद और अनुशासनहीनता के चलते पुलिस पूर्णत: निरंकुश हो चुकी है।
प्रदेश के तत्कालीन डीजीपी जावीद अहमद ने खुद स्वीकारा था कि पुलिस में काफी लोगों की अपराधियों से सांठगांठ है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश अर्थात मेरठ, मुजफ्फरनगर, गाजियाबाद, नोएडा, मथुरा, आगरा आदि में उन्होंने ऐसे पुलिसकर्मियों की भरमार बताई जो अपराधियों से मिले हुए हैं। जावीद अहमद ने हालांकि ऐसे पुलिसजनों की सूची तैयार कर उनके खिलाफ कठोर कार्यवाही करने की बात कही थी लेकिन यह काम इतना आसान नहीं था, लिहाजा न वो कर पाए और न उनके बाद बने दूसरे डीजीपी।
कासगंज की घटना को समय रहते नियंत्रित न कर पाना और चार-पांच दिनों तक उसका सुलगते रहना, यह साबित करता है कि स्थानीय पुलिस पूरी तरह फेल रही। कुछ पूर्व पुलिस अधिकारियों सहित आईजी तथा कमिश्नर ने भी यह माना है कि पुलिस की लापरवाही ने कासगंज के हालातों को ज्यादा बिगाड़ दिया।
यूं भी नामजद आरोपियों के घर से असलहों का बरामद होना और तिरंगा यात्रा के दौरान माहौल बिगड़ने की भनक तक न लग पाना, यह बताता है कि स्थानीय पुलिस-प्रशासन किस तरह काम कर रहा था।
योगी आदित्यनाथ से प्रदेश को बड़ी उम्मीदें हैं। उनके गेरुआ वस्त्र भरोसा दिलाते हैं लेकिन ”भय” के बिना ”प्रीति” नहीं होती, इसे मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम ने भी माना था।
गोस्वामी तुलसीदास कृत रामायण की यह चौपाई यहां गौरतलब है-
विनय न मानत जलधि जड़, गए तीन दिन बीत।
बोले राम सकोप तब, भय बिन होय न प्रीत।।
इसके अलावा ”चाणक्य नीति” भी कहती है कि ”दंड” प्रक्रिया का सख्ती पूर्वक प्रयोग किए बिना समाज में शांति स्थापित नहीं हो सकती।
”चाणक्य नीति” के इस गूढ़ार्थ को समझा जाए तो ”दंड” प्रक्रिया का सख्ती पूर्वक प्रयोग हर उस व्यक्ति, वर्ग अथवा गुट पर किया जाना चाहिए जो कानून-व्यवस्था में बाधा उत्पन्न करता हो। फिर वह शासन-प्रशासन के अंग ही क्यों न हों।
उत्तर प्रदेश जितना बड़ा है, उतनी ही बड़ी हो जाती हैं यहां कानून-व्यवस्था का राज कायम करने की जिम्मेदारियां।
माना कि उत्तर प्रदेश इससे पहले अनेक बार इतने बड़े-बड़े सांप्रदायिक उपद्रवों की आग में झुलसा है कि कासगंज में हुए उपद्रव की उनसे तुलना नहीं की जा सकती, किंतु दाग तो दाग है। योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार पर यह दाग लग चुका है। अब यह छोटा हो या बड़ा, लेकिन दाग तो है।
कासगंज की घटना चाहे शैतानी हो या किसी साजिश का हिस्सा, किंतु इसमें दोराय नहीं कि योगी राज ”निष्कलंक” नहीं रह पाया।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
कासगंज में जो कुछ हुआ, वह कैसे हुआ और क्या उसके पीछे कोई साजिश थी…यह जांच का विषय है लिहाजा निष्कर्ष निकलने तक इस बावत कुछ भी नहीं कहा जा सकता किंतु यह जरूर कहा जा सकता है कि तमाम मुठभेड़ों के बावजूद न तो आपकी ”खाकी” अपराधियों के मन में भय बैठा सकी और न आप ”खाकी” के मन में।
एक सर्वमान्य सूक्ति है कि बेहतर शासन-प्रशासन चलाने के लिए सरकार का ”इकबाल” बुलंद होना लाजिमी है। जब सरकार का इकबाल बुलंद होता है तो सरकारी नुमाइंदे अपनी पूरी निष्ठा, लगन व ईमानदारी से सक्रिय रहते हैं। उनकी सक्रियता ही अपराधियों के लिए भय का वातावरण बनाती है और जनसामान्य के अंदर सुरक्षा की भावना पैदा करती है।
नि:संदेह उत्तर प्रदेश की कानून-व्यवस्था काफी पहले से बदहाल थी और आम लोगों का ”सरकारों” से भरोसा उठ चुका था परन्तु अब तो यह भरोसा पैदा होना चाहिए।
देश के इस सबसे बड़े राज्य की कमान योगी आदित्यनाथ ने 19 मार्च 2017 को संभाली थी। इस हिसाब से उनकी सरकार को आज 10 महीने और 13 दिन पूरे हो चुके हैं लेकिन प्रदेश के कई जिले ऐसे हैं जहां बदमाश पूरी तरह बेखौफ दिखाई देते हैं।
खुद सीएम योगी आदित्यनाथ ने इसी महीने की 23 तारीख को सहारनपुर, मथुरा और लखनऊ में लगातार हो रहीं गंभीर आपराधिक वारदातों पर नाराजगी जताई थी। उन्होंने प्रदेश के आला पुलिस अधिकारियों को तलब करके पूछा था कि अगर अपराधियों पर प्रभावी अंकुश नहीं लग पा रहा तो जिलों में बैठे पुलिस अधिकारी कर क्या रहे हैं। उनसे काम नहीं हो पा रहा तो वह पद छोड़ दें।
23 जनवरी को मुख्यमंत्री द्वारा अपनी मंशा स्पष्ट कर देने के बाद भी तीसरे ही दिन 26 जनवरी पर गणतंत्र दिवस की तिरंगा यात्रा में हुई कासगंज की घटना ने यह साबित कर दिया कि न तो ”योगी राज” से ”खाकी” की कार्यप्रणाली प्रभावित हुई है और न ”खाकी” से बदमाशों में कोई भय उत्पन्न हुआ है।
गौरतलब है कि प्रदेश के राज्यपाल रामनाइक ने भी कासगंज की घटना को उत्तर प्रदेश के लिए ”कलंक” बताया है। राज्यपाल इससे पहले भी कानून-व्यवस्था पर असंतोष जाहिर कर चुके हैं।
रामनाइक के बयान इसलिए ज्यादा महत्व रखते हैं क्योंकि पिछले कुछ वर्षों से राज्यपाल का पद भी दलगत राजनीति का शिकार होने लगा था और अमूमन राज्यपालों की छवि का आंकलन राजनीतिक नजरिए से किया जा रहा था।
कानून-व्यवस्था और कासगंज में हुई हिंसा पर राज्यपाल के रूप में रामनाइक के बयानों ने निश्चित ही इस पद की गरिमा बढ़ाई है किंतु सवाल यह खड़ा होता है कि क्या उनके बयानों को शासन-प्रशासन भी गंभीरता से लेगा ?
योगी आदित्यनाथ द्वारा उत्तर प्रदेश में 21वें मुख्यमंत्री की शपथ लेने के मात्र 15 दिनों के बाद “Legend News” ने ”सबसे बड़ी चुनौती: क्या पुलिस का DNA बदल पाएगी योगी सरकार ?” शीर्षक से लिखा था कि जरूरत से ज्यादा राजनीतिक दखल, भ्रष्टाचार, जातिवाद और अनुशासनहीनता के चलते पुलिस पूर्णत: निरंकुश हो चुकी है।
प्रदेश के तत्कालीन डीजीपी जावीद अहमद ने खुद स्वीकारा था कि पुलिस में काफी लोगों की अपराधियों से सांठगांठ है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश अर्थात मेरठ, मुजफ्फरनगर, गाजियाबाद, नोएडा, मथुरा, आगरा आदि में उन्होंने ऐसे पुलिसकर्मियों की भरमार बताई जो अपराधियों से मिले हुए हैं। जावीद अहमद ने हालांकि ऐसे पुलिसजनों की सूची तैयार कर उनके खिलाफ कठोर कार्यवाही करने की बात कही थी लेकिन यह काम इतना आसान नहीं था, लिहाजा न वो कर पाए और न उनके बाद बने दूसरे डीजीपी।
कासगंज की घटना को समय रहते नियंत्रित न कर पाना और चार-पांच दिनों तक उसका सुलगते रहना, यह साबित करता है कि स्थानीय पुलिस पूरी तरह फेल रही। कुछ पूर्व पुलिस अधिकारियों सहित आईजी तथा कमिश्नर ने भी यह माना है कि पुलिस की लापरवाही ने कासगंज के हालातों को ज्यादा बिगाड़ दिया।
यूं भी नामजद आरोपियों के घर से असलहों का बरामद होना और तिरंगा यात्रा के दौरान माहौल बिगड़ने की भनक तक न लग पाना, यह बताता है कि स्थानीय पुलिस-प्रशासन किस तरह काम कर रहा था।
योगी आदित्यनाथ से प्रदेश को बड़ी उम्मीदें हैं। उनके गेरुआ वस्त्र भरोसा दिलाते हैं लेकिन ”भय” के बिना ”प्रीति” नहीं होती, इसे मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम ने भी माना था।
गोस्वामी तुलसीदास कृत रामायण की यह चौपाई यहां गौरतलब है-
विनय न मानत जलधि जड़, गए तीन दिन बीत।
बोले राम सकोप तब, भय बिन होय न प्रीत।।
इसके अलावा ”चाणक्य नीति” भी कहती है कि ”दंड” प्रक्रिया का सख्ती पूर्वक प्रयोग किए बिना समाज में शांति स्थापित नहीं हो सकती।
”चाणक्य नीति” के इस गूढ़ार्थ को समझा जाए तो ”दंड” प्रक्रिया का सख्ती पूर्वक प्रयोग हर उस व्यक्ति, वर्ग अथवा गुट पर किया जाना चाहिए जो कानून-व्यवस्था में बाधा उत्पन्न करता हो। फिर वह शासन-प्रशासन के अंग ही क्यों न हों।
उत्तर प्रदेश जितना बड़ा है, उतनी ही बड़ी हो जाती हैं यहां कानून-व्यवस्था का राज कायम करने की जिम्मेदारियां।
माना कि उत्तर प्रदेश इससे पहले अनेक बार इतने बड़े-बड़े सांप्रदायिक उपद्रवों की आग में झुलसा है कि कासगंज में हुए उपद्रव की उनसे तुलना नहीं की जा सकती, किंतु दाग तो दाग है। योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार पर यह दाग लग चुका है। अब यह छोटा हो या बड़ा, लेकिन दाग तो है।
कासगंज की घटना चाहे शैतानी हो या किसी साजिश का हिस्सा, किंतु इसमें दोराय नहीं कि योगी राज ”निष्कलंक” नहीं रह पाया।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
सोमवार, 8 मई 2017
योगी आदित्यनाथ ”एक्शन” में लेकिन मथुरा भाजपा ”डिप्रेशन” में
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ”एक्शन” में हैं लेकिन
मथुरा भाजपा ”डिप्रेशन” में है। लगता है जैसे कि सूबे की सत्ता से ”वनवास”
का समय पूरा होने के बाद अब मथुरा भाजपा ”अज्ञातवास” पर है।
मथुरा में भारतीय जनता युवा मोर्चा के प्रदेश उपाध्यक्ष को एसएसपी मुकुल गुप्ता इसलिए अपने ऑफिस से दो वरिष्ठ भाजपा नेताओं के सामने गिरफ्तार करा देते हैं क्योंकि वह एसएसपी को आइना दिखाने की कोशिश करते हैं किंतु मथुरा भाजपा का कुछ पता नहीं रहता। एक कार्यकर्ता को एक दरोगा बुरी तरह पीट देता है लेकिन मथुरा की भाजपा चुप्पी साधे बैठे रहती है।
वृंदावन की महिलाओं के अश्लील फोटो सोशल साइट पर डाले जा रहे हैं और यह काम एक गिरोह द्वारा किया जा रहा है, पीड़ित महिलाएं कभी थाने के तो कभी समाज सेवकों और नेताओं के चक्कर काट रही हैं लेकिन मथुरा भाजपा निष्क्रिय है।
पीड़ित महिलाओं को पुलिस उसी तरह मीठी गोली देकर बहला रही है जिस तरह समाजवादी शासन में बहला चुकी है लेकिन मथुरा भाजपा के किसी नेता ने पुलिस से जवाब तलब करना जरूरी नहीं समझा।
भारतीय जनता युवा मोर्चा के प्रदेश उपाध्यक्ष को अपने कार्यालय से पकड़वाकर उनका शांति भंग करने की धारा 151 में चालान कराने वाले एसएसपी मोहित गुप्ता इस संवेदनशील मामले में कहते हैं कि जांच चल रही है, हरकत करने वालों को गिरफ्तार करने के प्रयास जारी हैं जबकि पीड़ित महिलाओं का कहना है कि इस घ्रणित अपराध को अंजाम देने वाले वृंदावन के अंदर ही छिपे हैं।
सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के स्थानीय विधायक और मंत्री कहने को तो पार्टी कार्यालय पर बारी-बारी से जनशिकायतों के लिए मजमा लगाते हैं लेकिन उन जनशिकायतों का निवारण होना तो दूर, खुद विधायक और मंत्रियों की बात भी अधिकारी सुनने को तैयार नहीं। कभी बल्देव क्षेत्र के विधायक पूरन प्रकाश को पार्टी कार्यालय के निकट बने शौचालय का ताला तोड़ना पड़ता है तो कभी तत्कालीन डीएम का तबादला होने जैसी थोथी दलील देनी पड़ती है।
आश्चर्य की बात तो यह है कि बल्देव क्षेत्र के विधायक पूरन प्रकाश को जिस सार्वजनिक शौचालय का ताला तोड़ना पड़ा, उसकी चाभी उस नगर पालिका प्रशासन के कब्जे में थी जिस पर भाजपा नेत्री मनीषा गुप्ता काबिज हैं। विधायक पूरन प्रकाश पूर्व में पालिका प्रशासन से शौचालय का ताला खुलावाने को कह चुके थे लेकिन किसी के कान पर जूं नहीं रेंगी।
विश्व हिंदू परिषद के नेता और पूर्व आर्मी अफसर कैप्टिन हरिहर शर्मा अपने शहीद पुत्र की पत्नी के नाम जमीन को दंबंगों के अवैध कब्जे से मुक्त कराने के लिए कभी पुलिस की तो कभी अपनी ही पार्टी के विधायकों की गणेश परिक्रमा कर रहे हैं लेकिन कहीं से राहत मिलती नजर नहीं आ रही पर मथुरा भाजपा चुप्पी साधे बैठी है।
भाजपा के ही फायर ब्रांड हिंदूवादी नेता और यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट तथा एनजीटी में याचिका दाखिल करने वाले गोपेश्वर नाथ चतुर्वेदी को अधिकारियों से शिकायत करनी पड़ रही है कि आज भी अवैध रूप से बूचड़ खाने चल रहे हैं और अवैध बूचड़खाने चलाने वालों ने पूर्व में सील किए गए कट्टीघर की दीवार तोड़ दी है लेकिन मथुरा भाजपा के स्तर से उनका साथ देने कोई खड़ा नहीं होता।
होता है तो यह कि मीट की जिन अवैध दुकानों को बंद कराने के लिए सपा तथा उससे पहले बसपा के शासन में भी भाजपा के कुछ लोग एड़ी-चोटी का जोर लगाते रहे, उन्हें जब प्रदेश का निजाम बदलने के बाद हवा का रुख देखकर जिला प्रशासन ने बंद कराया तो भाजपा नेत्री मनीषा गुप्ता के नेतृत्व वाले नगर पालिका प्रशासन ने मानकों को ताक पर रखकर उनके लिए लाइसेंस जारी कर दिया। अब चंद भाजपाई उन लाइसेंसों को निरस्त कराने की कोशिश कर रहे हैं किंतु मथुरा भाजपा जीत की खुमारी उतारने में व्यस्त है।
योगी सरकार और उसके नुमाइंदे ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा द्वारा बार-बार कहे जाने के बावजूद बिजली विभाग गरीबों को बिना पैसे बिजली कनैक्शन देने के लिए तैयार नहीं है लेकिन मथुरा भाजपा हाथ पर हाथ रखे बैठी है।
मथुरा भाजपा की कमान संभाले बैठे चौधरी तेजवीर सिंह तीन बार सांसद रह चुके हैं, लिहाजा उनकी कार्यप्रणाली से जिले की जनता बखूबी परिचित है। मथुरा में भाजपा को ”इतिहास बनाने वालों” की सूची के वह टॉपर रहे हैं लेकिन प्रदेश भाजपा को उनमें पता नहीं ऐसा क्या नजर आ रहा है कि वह उन्हें ही खेवनहार समझे बैठी है।
सब जानते हैं कि जो चौधरी तेजवीर सिंह तीन बार की अपनी सांसदी के दौरान किसी समस्या का समाधान कराने में सफल नहीं हुए, वो जिलाध्यक्ष के रूप में ऐसा क्या कर लेंगे जिसकी जनता को भाजपा से उम्मीद की जा रही है।
प्रदेश के कबीना मंत्री और छाता क्षेत्र से विधायक लक्ष्मीनारायण चौधरी को पार्टी के जिला कार्यालय में जनसुनवाई के दौरान एक फरियादी ने बताया कि उसकी पत्रावली पर एडीएम वित्त से लेकर तहसीलदार तक ने काम करने के आदेश जारी कर रखे हैं लेकिन एक लेखपाल उस पर कुंडली मारकर बैठा है।
फरियादी के अनुसार लेखपाल का कहना है कि तुमने भाजपा को वोट दिया है इसलिए अब भाजपा वालों से ही काम करा लो।
सदर तहसील के इस लेखपाल को वहां से हटाकर छाता तहसील भेजने का मौखिक आदेश मंत्री चौधरी लक्ष्मीनारायण ने तत्कालीन डीएम नितिन बंसल को दिया ताकि वह निष्पक्ष काम में रुकावट न बने किंतु डीएम ने मंत्री जी का आदेश एक कान से सुना और दूसरे कान से निकाल दिया।
इसके बाद यही फरियादी प्रदेश के ऊर्जा मंत्री, सरकार के प्रवक्ता और मथुरा-वृंदावन क्षेत्र के विधायक श्रीकांत शर्मा से उनके राधा वैली स्थित मकान पर आकर मिला और अपनी व्यथा तथा प्रशासन की कथा बताई, जिस पर ऊर्जा मंत्री ने पूरी ऊर्जा से दावा किया कि 24 घंटों के अंदर समस्या का समाधान हो जाएगा। कल ऊर्जा मंत्री के दावे को 24 घंटे बीत गए लेकिन नतीजा अब भी ढाक के तीन पात है।
यह हाल तो तब है जबकि जिलाध्यक्ष चौधरी तेजवीर सिंह हर शिकायत का लेखा-जोखा रखने की बात कहते हैं और बताते हैं कि कृत कार्यवाही का ब्यौरा भी ले रहे हैं।
जिलाध्यक्ष की मानें तो जिस विभाग द्वारा काम नहीं किया जाएगा, उस विभाग की शिकायत मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से की जाएगी।
अब जिलाध्यक्ष को कौन समझाए कि यदि योगी आदित्यनाथ को ही सारी शिकायतों का निस्तारण कराना होता तो क्यों वह अधिकारियों को कोई आदेश-निर्देश देते और क्यों यह कहते कि जनप्रतिनिधियों को जनता की शिकायतें न सिर्फ सुननी हैं बल्कि उनका निराकरण भी करना व कराना है।
योगी आदित्यनाथ के स्तर से ही सब-कुछ होगा तो संगठन की जिला कार्यकारिणी क्या करेगी, क्या वह केवल मंत्रियों के आगमन पर उनके इर्द-गिर्द खड़े होकर फोटो खिंचवाती रहेगी ताकि सनद रहे और वक्त जरूरत काम आए।
कल की ही अपनी लखनऊ मीटिंग में योगी आदित्यनाथ ने कार्यकताओं से कहा है कि मंत्रियों का स्वागत करने और उन्हें मालाएं पहनाने तक सीमित मत रहो। जनता के बीच जाकर उसकी समस्याओं का समाधान करो क्योंकि सत्ता हमें मौज करने के लिए नहीं मिली है। जनता ने भरोसा किया है अत: उसके भरोसे का मान रखो किंतु लगता है कि मथुरा भाजपा ऊंचा सुनती है। उसे लखनऊ की आवाज सुनाई नहीं देती।
यह हाल तो तब है जबकि नगर निकाय के चुनाव सिर पर हैं और भाजपा नेत्री मनीषा गुप्ता के नेतृत्व वाले नगर पालिका प्रशासन पर पौने दो करोड़ रुपए के घोटाले का आरोप शासन स्तर पर तथा एनजीटी में लंबित है। आम जन तो क्या, खुद भाजपाई भी मनीषा गुप्ता के कार्यकाल से खुश नहीं हैं। चेयर पर्सन मनीषा गुप्ता पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाने वालों में भाजपाई ही आगे रहे हैं।
माना कि मोदी जी का मुखौटा फिलहाल जमकर बिक रहा है और उसके सामने शिकवा-शिकायतें फीकी पड़ जाती हैं किंतु नगर निकाय के बाद 2019 का लोकसभा चुनाव भी सामने है। स्वप्न सुंदरी सांसद ने तीन साल से ऊपर का समय तो यह बताकर निकाल लिया कि यूपी में भाजपा की सरकार न होने के कारण वह अपेक्षित काम नहीं कर सकीं किंतु अब यह डायलॉग काम आने वाला नहीं है। अब उन्हें भी कुछ करके दिखाना होगा वर्ना जनता उसी तरह ठेंगा दिखा देगी जिस तरह जयंत चौधरी को दिखाया था।
स्वप्न सुंदरी तो स्वप्न सुंदरी हैं, हो सकता है उन्हें आगे की जीत-हार से कोई खास फर्क न पड़े लेकिन चौधरी तेजवीर सिंह एंड पार्टी और तमाम दूसरे स्थानीय भाजपा नेता आगे आने वाले परिणामों से जरूर प्रभावित होंगे। प्रभावित तो मोदी जी और विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी भाजपा भी होगी इसलिए बेहतर है कि समय रहते सच्चाई को जान लें और समझ लें कि आमजन को कथा-पटकथा से ज्यादा मतलब नहीं होता। उसे मतलब होता है तो अपने काम से। काम के लिए आराम हराम है, और यही मंत्र मोदी जी का है तथा यही योगी जी का भी।
योगी जी की तरह एक्शन में रहोगे तो रिएक्शन नहीं होगा लेकिन यदि इसी प्रकार डिप्रेशन में बने रहे जैसे कि सत्ता पर काबिज होने के लगभग डेढ़ महीने बाद तक बने हुए हो तो तय जानिए कि रिएक्शन बड़ा भी हो सकता है।
जिलाध्यक्ष तेजवीर सिंह तो जनता के एक्शन और रिएक्शन दोनों का स्वाद भली प्रकार चख चुके हैं लिहाजा उनसे उम्मीद की जाती है कि लॉलीपॉप पकड़ाने की राजनीति समय रहते त्याग देंगे अन्यथा जनता के पास भाजपा को त्यागने के बहुत मौके होंगे।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
मथुरा में भारतीय जनता युवा मोर्चा के प्रदेश उपाध्यक्ष को एसएसपी मुकुल गुप्ता इसलिए अपने ऑफिस से दो वरिष्ठ भाजपा नेताओं के सामने गिरफ्तार करा देते हैं क्योंकि वह एसएसपी को आइना दिखाने की कोशिश करते हैं किंतु मथुरा भाजपा का कुछ पता नहीं रहता। एक कार्यकर्ता को एक दरोगा बुरी तरह पीट देता है लेकिन मथुरा की भाजपा चुप्पी साधे बैठे रहती है।
वृंदावन की महिलाओं के अश्लील फोटो सोशल साइट पर डाले जा रहे हैं और यह काम एक गिरोह द्वारा किया जा रहा है, पीड़ित महिलाएं कभी थाने के तो कभी समाज सेवकों और नेताओं के चक्कर काट रही हैं लेकिन मथुरा भाजपा निष्क्रिय है।
पीड़ित महिलाओं को पुलिस उसी तरह मीठी गोली देकर बहला रही है जिस तरह समाजवादी शासन में बहला चुकी है लेकिन मथुरा भाजपा के किसी नेता ने पुलिस से जवाब तलब करना जरूरी नहीं समझा।
भारतीय जनता युवा मोर्चा के प्रदेश उपाध्यक्ष को अपने कार्यालय से पकड़वाकर उनका शांति भंग करने की धारा 151 में चालान कराने वाले एसएसपी मोहित गुप्ता इस संवेदनशील मामले में कहते हैं कि जांच चल रही है, हरकत करने वालों को गिरफ्तार करने के प्रयास जारी हैं जबकि पीड़ित महिलाओं का कहना है कि इस घ्रणित अपराध को अंजाम देने वाले वृंदावन के अंदर ही छिपे हैं।
सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के स्थानीय विधायक और मंत्री कहने को तो पार्टी कार्यालय पर बारी-बारी से जनशिकायतों के लिए मजमा लगाते हैं लेकिन उन जनशिकायतों का निवारण होना तो दूर, खुद विधायक और मंत्रियों की बात भी अधिकारी सुनने को तैयार नहीं। कभी बल्देव क्षेत्र के विधायक पूरन प्रकाश को पार्टी कार्यालय के निकट बने शौचालय का ताला तोड़ना पड़ता है तो कभी तत्कालीन डीएम का तबादला होने जैसी थोथी दलील देनी पड़ती है।
आश्चर्य की बात तो यह है कि बल्देव क्षेत्र के विधायक पूरन प्रकाश को जिस सार्वजनिक शौचालय का ताला तोड़ना पड़ा, उसकी चाभी उस नगर पालिका प्रशासन के कब्जे में थी जिस पर भाजपा नेत्री मनीषा गुप्ता काबिज हैं। विधायक पूरन प्रकाश पूर्व में पालिका प्रशासन से शौचालय का ताला खुलावाने को कह चुके थे लेकिन किसी के कान पर जूं नहीं रेंगी।
विश्व हिंदू परिषद के नेता और पूर्व आर्मी अफसर कैप्टिन हरिहर शर्मा अपने शहीद पुत्र की पत्नी के नाम जमीन को दंबंगों के अवैध कब्जे से मुक्त कराने के लिए कभी पुलिस की तो कभी अपनी ही पार्टी के विधायकों की गणेश परिक्रमा कर रहे हैं लेकिन कहीं से राहत मिलती नजर नहीं आ रही पर मथुरा भाजपा चुप्पी साधे बैठी है।
भाजपा के ही फायर ब्रांड हिंदूवादी नेता और यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट तथा एनजीटी में याचिका दाखिल करने वाले गोपेश्वर नाथ चतुर्वेदी को अधिकारियों से शिकायत करनी पड़ रही है कि आज भी अवैध रूप से बूचड़ खाने चल रहे हैं और अवैध बूचड़खाने चलाने वालों ने पूर्व में सील किए गए कट्टीघर की दीवार तोड़ दी है लेकिन मथुरा भाजपा के स्तर से उनका साथ देने कोई खड़ा नहीं होता।
होता है तो यह कि मीट की जिन अवैध दुकानों को बंद कराने के लिए सपा तथा उससे पहले बसपा के शासन में भी भाजपा के कुछ लोग एड़ी-चोटी का जोर लगाते रहे, उन्हें जब प्रदेश का निजाम बदलने के बाद हवा का रुख देखकर जिला प्रशासन ने बंद कराया तो भाजपा नेत्री मनीषा गुप्ता के नेतृत्व वाले नगर पालिका प्रशासन ने मानकों को ताक पर रखकर उनके लिए लाइसेंस जारी कर दिया। अब चंद भाजपाई उन लाइसेंसों को निरस्त कराने की कोशिश कर रहे हैं किंतु मथुरा भाजपा जीत की खुमारी उतारने में व्यस्त है।
योगी सरकार और उसके नुमाइंदे ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा द्वारा बार-बार कहे जाने के बावजूद बिजली विभाग गरीबों को बिना पैसे बिजली कनैक्शन देने के लिए तैयार नहीं है लेकिन मथुरा भाजपा हाथ पर हाथ रखे बैठी है।
मथुरा भाजपा की कमान संभाले बैठे चौधरी तेजवीर सिंह तीन बार सांसद रह चुके हैं, लिहाजा उनकी कार्यप्रणाली से जिले की जनता बखूबी परिचित है। मथुरा में भाजपा को ”इतिहास बनाने वालों” की सूची के वह टॉपर रहे हैं लेकिन प्रदेश भाजपा को उनमें पता नहीं ऐसा क्या नजर आ रहा है कि वह उन्हें ही खेवनहार समझे बैठी है।
सब जानते हैं कि जो चौधरी तेजवीर सिंह तीन बार की अपनी सांसदी के दौरान किसी समस्या का समाधान कराने में सफल नहीं हुए, वो जिलाध्यक्ष के रूप में ऐसा क्या कर लेंगे जिसकी जनता को भाजपा से उम्मीद की जा रही है।
प्रदेश के कबीना मंत्री और छाता क्षेत्र से विधायक लक्ष्मीनारायण चौधरी को पार्टी के जिला कार्यालय में जनसुनवाई के दौरान एक फरियादी ने बताया कि उसकी पत्रावली पर एडीएम वित्त से लेकर तहसीलदार तक ने काम करने के आदेश जारी कर रखे हैं लेकिन एक लेखपाल उस पर कुंडली मारकर बैठा है।
फरियादी के अनुसार लेखपाल का कहना है कि तुमने भाजपा को वोट दिया है इसलिए अब भाजपा वालों से ही काम करा लो।
सदर तहसील के इस लेखपाल को वहां से हटाकर छाता तहसील भेजने का मौखिक आदेश मंत्री चौधरी लक्ष्मीनारायण ने तत्कालीन डीएम नितिन बंसल को दिया ताकि वह निष्पक्ष काम में रुकावट न बने किंतु डीएम ने मंत्री जी का आदेश एक कान से सुना और दूसरे कान से निकाल दिया।
इसके बाद यही फरियादी प्रदेश के ऊर्जा मंत्री, सरकार के प्रवक्ता और मथुरा-वृंदावन क्षेत्र के विधायक श्रीकांत शर्मा से उनके राधा वैली स्थित मकान पर आकर मिला और अपनी व्यथा तथा प्रशासन की कथा बताई, जिस पर ऊर्जा मंत्री ने पूरी ऊर्जा से दावा किया कि 24 घंटों के अंदर समस्या का समाधान हो जाएगा। कल ऊर्जा मंत्री के दावे को 24 घंटे बीत गए लेकिन नतीजा अब भी ढाक के तीन पात है।
यह हाल तो तब है जबकि जिलाध्यक्ष चौधरी तेजवीर सिंह हर शिकायत का लेखा-जोखा रखने की बात कहते हैं और बताते हैं कि कृत कार्यवाही का ब्यौरा भी ले रहे हैं।
जिलाध्यक्ष की मानें तो जिस विभाग द्वारा काम नहीं किया जाएगा, उस विभाग की शिकायत मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से की जाएगी।
अब जिलाध्यक्ष को कौन समझाए कि यदि योगी आदित्यनाथ को ही सारी शिकायतों का निस्तारण कराना होता तो क्यों वह अधिकारियों को कोई आदेश-निर्देश देते और क्यों यह कहते कि जनप्रतिनिधियों को जनता की शिकायतें न सिर्फ सुननी हैं बल्कि उनका निराकरण भी करना व कराना है।
योगी आदित्यनाथ के स्तर से ही सब-कुछ होगा तो संगठन की जिला कार्यकारिणी क्या करेगी, क्या वह केवल मंत्रियों के आगमन पर उनके इर्द-गिर्द खड़े होकर फोटो खिंचवाती रहेगी ताकि सनद रहे और वक्त जरूरत काम आए।
कल की ही अपनी लखनऊ मीटिंग में योगी आदित्यनाथ ने कार्यकताओं से कहा है कि मंत्रियों का स्वागत करने और उन्हें मालाएं पहनाने तक सीमित मत रहो। जनता के बीच जाकर उसकी समस्याओं का समाधान करो क्योंकि सत्ता हमें मौज करने के लिए नहीं मिली है। जनता ने भरोसा किया है अत: उसके भरोसे का मान रखो किंतु लगता है कि मथुरा भाजपा ऊंचा सुनती है। उसे लखनऊ की आवाज सुनाई नहीं देती।
यह हाल तो तब है जबकि नगर निकाय के चुनाव सिर पर हैं और भाजपा नेत्री मनीषा गुप्ता के नेतृत्व वाले नगर पालिका प्रशासन पर पौने दो करोड़ रुपए के घोटाले का आरोप शासन स्तर पर तथा एनजीटी में लंबित है। आम जन तो क्या, खुद भाजपाई भी मनीषा गुप्ता के कार्यकाल से खुश नहीं हैं। चेयर पर्सन मनीषा गुप्ता पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाने वालों में भाजपाई ही आगे रहे हैं।
माना कि मोदी जी का मुखौटा फिलहाल जमकर बिक रहा है और उसके सामने शिकवा-शिकायतें फीकी पड़ जाती हैं किंतु नगर निकाय के बाद 2019 का लोकसभा चुनाव भी सामने है। स्वप्न सुंदरी सांसद ने तीन साल से ऊपर का समय तो यह बताकर निकाल लिया कि यूपी में भाजपा की सरकार न होने के कारण वह अपेक्षित काम नहीं कर सकीं किंतु अब यह डायलॉग काम आने वाला नहीं है। अब उन्हें भी कुछ करके दिखाना होगा वर्ना जनता उसी तरह ठेंगा दिखा देगी जिस तरह जयंत चौधरी को दिखाया था।
स्वप्न सुंदरी तो स्वप्न सुंदरी हैं, हो सकता है उन्हें आगे की जीत-हार से कोई खास फर्क न पड़े लेकिन चौधरी तेजवीर सिंह एंड पार्टी और तमाम दूसरे स्थानीय भाजपा नेता आगे आने वाले परिणामों से जरूर प्रभावित होंगे। प्रभावित तो मोदी जी और विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी भाजपा भी होगी इसलिए बेहतर है कि समय रहते सच्चाई को जान लें और समझ लें कि आमजन को कथा-पटकथा से ज्यादा मतलब नहीं होता। उसे मतलब होता है तो अपने काम से। काम के लिए आराम हराम है, और यही मंत्र मोदी जी का है तथा यही योगी जी का भी।
योगी जी की तरह एक्शन में रहोगे तो रिएक्शन नहीं होगा लेकिन यदि इसी प्रकार डिप्रेशन में बने रहे जैसे कि सत्ता पर काबिज होने के लगभग डेढ़ महीने बाद तक बने हुए हो तो तय जानिए कि रिएक्शन बड़ा भी हो सकता है।
जिलाध्यक्ष तेजवीर सिंह तो जनता के एक्शन और रिएक्शन दोनों का स्वाद भली प्रकार चख चुके हैं लिहाजा उनसे उम्मीद की जाती है कि लॉलीपॉप पकड़ाने की राजनीति समय रहते त्याग देंगे अन्यथा जनता के पास भाजपा को त्यागने के बहुत मौके होंगे।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
रविवार, 9 अप्रैल 2017
आखिर कितनी तर्कसंगत हैं योगी आदित्यनाथ को लेकर विपक्ष और मीडिया की आशंकाएं ?
महंत योगी आदित्यनाथ द्वारा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने
के साथ ही न केवल विपक्ष बल्कि मीडिया भी तरह-तरह की आशंकाएं व्यक्त कर
रहा है। विपक्ष जहां योगी आदित्यनाथ की ताजपोशी को आरएसएस का एजेंडा बता
रहा है वहीं मीडिया कुछ ऐसा प्रचार-प्रसार कर रहा है जैसे कोई अनहोनी हो गई
हो।
योगी आदित्यनाथ पर यूं तो बहुत पहले से मीडिया काफी कठोर रहा है और उनके हर बयान को सिर्फ और सिर्फ सांप्रदायिक चश्मे से देखता रहा है, लेकिन अब वह उन्हें कतई समय देने के लिए तैयार नहीं है।
योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ भले ही कल दोपहर सवा दो बजे ली हो किंतु मीडिया ने उन्हें 18 मार्च की शाम तभी से टारगेट करना शुरू कर दिया था जब मुख्यमंत्री पद के लिए उनके नाम की घोषणा की गई।
जहां तक सवाल विपक्ष द्वारा योगी को उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य के मुख्यमंत्री बतौर न पचा पाने का है, तो यह बात समझ में आती है क्योंकि पहले तो भाजपा की अप्रत्याशित जीत ने विपक्ष को कहीं का नहीं छोड़ा और फिर योगी की ताजपोशी ने उनके जले पर नमक छिड़कने का काम किया परंतु यदि बात करें मीडिया की तो ऐसा लगता है कि जैसे मीडिया भी एक प्रतिपक्ष बनकर रह गया है। उसने भाजपा और मोदी के अंधे विरोध में अपने सोचने व समझने की शक्ति खो दी है।
तभी तो राजनीति के ककहरे की जो छोटी सी सीख योगी आदित्यनाथ के क्षेत्र से ताल्लुक रखने वाले मुस्लिम संप्रदाय के लोगों को है, उसे भी मीडिया समझने को तैयार नहीं है।
योगी आदित्यनाथ के इलाके से संबंध रखने वाले मुस्लिमों का साफ-साफ कहना है कि योगी अपने बयानों में जो कुछ अब तक कहते रहे हैं, वो वोट बैंक की और चुनावी राजनीति का हिस्सा है न कि वह उनके व्यक्तित्व का परिचय देता है।
इन मुस्लिमों ने हर मीडिया पर्सन से यही कहा है कि योगी के दरबार में बिना किसी भेदभाव के लोगों की समस्याओं का समाधान किया जाता रहा है और उनके पास समस्या लेकर जाने वालों में मुस्लिम समुदाय के लोगों की बड़ी संख्या रहती है।
यही नहीं, योगी के स्थाई निवास गोरखनाथ मंदिर प्रांगण में जो दुकानें आवंटित हैं, उनमें से 60 प्रतिशत दुकानें मुस्लिमों को दी हुई हैं। गोरखनाथ मंदिर भी मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र में स्थित है किंतु योगी के आचार-व्यवहार को लेकर कभी उस क्षेत्र के मुस्लिमों को कोई आपत्ति नहीं हुई। योगी का लगातार पांच बार सांसद निर्वाचित होना और हर निर्वाचन में जीत का अंतर बढ़ते जाना इस बात की पुष्टि करता है कि योगी को लेकर विपक्ष या मीडिया चाहे जितना भ्रमित हो किंतु उनके अपने क्षेत्र में किसी को कोई भ्रम नहीं है।
गोरखनाथ मंदिर पर हर साल मकर संक्रांति के दौरान आयोजित होने वाले ‘खिचड़ी मेले’ में लाखों लोग आते हैं ओर पूरे एक महीने तक रहते भी हैं.
इस मेले में हर जाति, धर्म और संप्रदाय के लोगों की भारी तादाद में उपस्थिति मठ की कट्टर हिंदूवादी छवि को तोड़ती है जबकि मुस्लिम शासन काल में हिन्दुओं और बौद्धों के अन्य सांस्कृतिक केन्द्रों की भांति इस पीठ को भी कई बार भीषण कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
इसकी व्यापक प्रसिद्धि के कारण विक्रमी चौदहवीं सदी में भारत के मुस्लिम सम्राट अलाउद्दीन खिलजी ने अपने शासन काल में इस मठ को नष्ट किया और साधक व योगी बलपूर्वक मठ से निष्कासित कर दिए।
सत्रहवीं और अठारहवीं सदी में अपनी धार्मिक कट्टरता के कारण मुग़ल शासक औरंगजेब ने इसे दो बार नष्ट किया। क़रीब 52 एकड़ के सुविस्तृत क्षेत्र में स्थित इस मंदिर का रूप व आकार-प्रकार परिस्थितियों के अनुसार समय-समय पर बदलता रहा है। वर्तमान में गोरक्षनाथ मंदिर की भव्यता और पवित्र रमणीयता अत्यन्त कीमती आध्यात्मिक सम्पत्ति है। प्रतिदिन मंदिर में स्थानीय लोगों के अतिरिक्त भारत के सुदूर प्रांतों से भी असंख्य लोगों की भीड़ पर्यटकों व यात्रियों के रूप में आती है।
अब यदि बात करें इन विधानसभा चुनावों में भाजपा द्वारा वोटों की खातिर ध्रुवीकरण की राजनीति पर, तो कौन सा ऐसा राजनीतिक दल है जो ध्रुवीकरण की राजनीति नहीं करता। कांग्रेस ने देश और विभिन्न प्रदेशों में इतने लंबे समय तक शासन वोटों का ध्रुवीकरण करके ही किया। क्षेत्रीय पार्टियां भी यही करती रही हैं।
उत्तर प्रदेश की दोनों प्रमुख क्षेत्रीय पार्टियों बसपा व सपा की पूरी राजनीति वोटों के ध्रुवीकरण पर टिकी रही है। बसपा ने तो इन चुनावों में सुप्रीम कोर्ट के आदेश की खुली अवहेलना करके मुस्लिमों के ध्रुवीकरण की पूरी कोशिश की और बड़ी मात्रा में मुस्लिम प्रत्याशियों को खड़ा किया। मायावती ने अपने चुनावी मंचों से बेझिझक मुस्लिमों का आह्वान किया और दलितों के एक वर्ग को भी डराया।
उत्तर प्रदेश के अलावा बिहार, पश्चिम बंगाल, दिल्ली, पंजाब आदि कौन सा ऐसा राज्य है जहां के शासक ध्रुवीकरण की राजनीति न करते रहे हों।
इस सब के इतर देखा जाए तो भाजपा पहली ऐसी पार्टी है जिसने तीन तलाक की मुखालफत और नोटबंदी व समान नागरिक संहिता की वकालत करने का दुस्साहस दिखाया। ये बात अलग है कि विपक्ष के भारी दुष्प्रचार के बाद भी यह सारे मुद्दे भाजपा के लिए मुफीद साबित हुए और अब कहा जा रहा है कि मुस्लिम महिलाओं ने भी इन चुनावों में भाजपा के लिए मतदान किया है।
उत्तर प्रदेश एक ऐसा राज्य है जिसके इर्द-गिर्द सारे देश की राजनीति घूमती है। ऐसे में भाजपा ने योगी आदित्यनाथ को उत्तर प्रदेश की कमान सौंपने से पहले राजनीति के सारे गुणा-भाग जरूर लगाए होंगे क्योंकि भाजपा नहीं चाहेगी कि वर्षों बाद समाप्त हुआ उसका वनवास, उपहास बनकर रह जाए।
योगी आदित्यनाथ जो कल तक मुंह से आग उगलने के लिए पहचाने जाते थे, उन्होंने मुख्यमंत्री का पद संभालने के साथ सबसे पहले अपनी कैबिनेट को हिदायत दी है कि मीडिया को वह नहीं, इसके लिए अधिकृत मंत्री ब्रीफ करेंगे। योगी ने बाकायदा दो मंत्रियों श्रीकांत शर्मा और सिद्धार्थनाथ सिंह को इसकी जिम्मेदारी सौंप दी है। श्रीकांत शर्मा व सिद्धार्थनाथ सिंह पहले से राष्ट्रीय प्रवक्ता की जिम्मेदारी संभालते चले आ रहे हैं।
योगी का अपनी कैबीनेट को दिया गया यह संदेश स्पष्ट करता है कि वह पद की गरिमा को बखूबी समझ रहे हैं और उसकी जिम्मेदारी का अहसास भी कर रहे हैं।
संभवत: इसीलिए उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने से पूर्व ही प्रदेश पुलिस के मुखिया को इस आशय का आदेश दे दिया था कि जीत के जश्न में निरंकुश होने वालों से सख्ती के साथ निपटें। कानून-व्यवस्था से खिलवाड़ करने की इजाजत किसी को नहीं मिलनी चाहिए।
योगी ने यह आदेश कुछ स्थानों से आ रहीं उन खबरों के आधार पर दिया था जहां जीत के जश्न में वर्ग विशेष के खिलाफ नारेबाजी की बात बताई गई थी।
योगी का इतनी जल्दी एक्शन में आना यह बताता है कि उन्हें अपनी प्रचारित की गई कथित कट्टरवादी छवि का भी अच्छी तरह इल्म है और वह इसके लिए विपक्ष और मीडिया को कोई मौका नहीं देना चाहते।
सबका साथ, सबका विकास पर चलते हुए भाजपा के संकल्प पत्र पर पूरी तरह अमल करने की बात उन्होंने अपनी पहली प्रेस कांफ्रेंस में भी कही।
इन सब बातों पर गौर करें तो साफ लगता है कि जिस तरह केंद्र में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार का गठन होने के साथ विपक्ष ने मुस्लिमों के अंदर भय का वातावरण उत्पन्न करने की कोशिश की थी, उसी तरह की कोशिश वह अब योगी की ताजपोशी के बाद कर रहा है क्योंकि उसके तो नीचे से लगभग पूरी जमीन ही खिसक चुकी है। प्रमुख विपक्षी पार्टियां जहां से चली थीं, आज फिर वह वहीं आकर खड़ी हो गई हैं। योगी यदि पार्टी की उम्मीदों पर खरे साबित हुए और जनभावनाओं के अनुरूप शासन की कमान संभालने में सफल रहे तो सपा व बसपा जैसी पार्टियों का वजूद तक खतरे में पढ़ जाएगा। कांग्रेस की दुर्गति का अंदाज लगाने को तो इतना ही काफी है कि उसे अपना दल से भी कम सीटें मिली हैं, और वो भी तब जबकि उसने बड़े ढोल-नगाड़े पीटकर समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन किया था। यह साथ यूपी की जनता को कितना पसंद आया, इसका अब जिक्र करने की भी जरूरत नहीं रह गई।
बेहतर होगा कि विपक्ष और मीडिया अब योगी-राज को बेवजह शंका की दृष्टि से देखने की बजाय उनके काम को देखे और नकारात्मक प्रचार-प्रसार व बयानबाजी की प्रवृत्ति से बाहर निकल कर धरातल पर होने वाले कामों की समीक्षा करे ताकि एक स्वस्थ परंपरा कायम हो सके और उत्तर प्रदेश की जनता भी उस परंपरा का लाभ उठाकर भ्रम की स्थिति से बच सके।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
योगी आदित्यनाथ पर यूं तो बहुत पहले से मीडिया काफी कठोर रहा है और उनके हर बयान को सिर्फ और सिर्फ सांप्रदायिक चश्मे से देखता रहा है, लेकिन अब वह उन्हें कतई समय देने के लिए तैयार नहीं है।
योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ भले ही कल दोपहर सवा दो बजे ली हो किंतु मीडिया ने उन्हें 18 मार्च की शाम तभी से टारगेट करना शुरू कर दिया था जब मुख्यमंत्री पद के लिए उनके नाम की घोषणा की गई।
जहां तक सवाल विपक्ष द्वारा योगी को उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य के मुख्यमंत्री बतौर न पचा पाने का है, तो यह बात समझ में आती है क्योंकि पहले तो भाजपा की अप्रत्याशित जीत ने विपक्ष को कहीं का नहीं छोड़ा और फिर योगी की ताजपोशी ने उनके जले पर नमक छिड़कने का काम किया परंतु यदि बात करें मीडिया की तो ऐसा लगता है कि जैसे मीडिया भी एक प्रतिपक्ष बनकर रह गया है। उसने भाजपा और मोदी के अंधे विरोध में अपने सोचने व समझने की शक्ति खो दी है।
तभी तो राजनीति के ककहरे की जो छोटी सी सीख योगी आदित्यनाथ के क्षेत्र से ताल्लुक रखने वाले मुस्लिम संप्रदाय के लोगों को है, उसे भी मीडिया समझने को तैयार नहीं है।
योगी आदित्यनाथ के इलाके से संबंध रखने वाले मुस्लिमों का साफ-साफ कहना है कि योगी अपने बयानों में जो कुछ अब तक कहते रहे हैं, वो वोट बैंक की और चुनावी राजनीति का हिस्सा है न कि वह उनके व्यक्तित्व का परिचय देता है।
इन मुस्लिमों ने हर मीडिया पर्सन से यही कहा है कि योगी के दरबार में बिना किसी भेदभाव के लोगों की समस्याओं का समाधान किया जाता रहा है और उनके पास समस्या लेकर जाने वालों में मुस्लिम समुदाय के लोगों की बड़ी संख्या रहती है।
यही नहीं, योगी के स्थाई निवास गोरखनाथ मंदिर प्रांगण में जो दुकानें आवंटित हैं, उनमें से 60 प्रतिशत दुकानें मुस्लिमों को दी हुई हैं। गोरखनाथ मंदिर भी मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र में स्थित है किंतु योगी के आचार-व्यवहार को लेकर कभी उस क्षेत्र के मुस्लिमों को कोई आपत्ति नहीं हुई। योगी का लगातार पांच बार सांसद निर्वाचित होना और हर निर्वाचन में जीत का अंतर बढ़ते जाना इस बात की पुष्टि करता है कि योगी को लेकर विपक्ष या मीडिया चाहे जितना भ्रमित हो किंतु उनके अपने क्षेत्र में किसी को कोई भ्रम नहीं है।
गोरखनाथ मंदिर पर हर साल मकर संक्रांति के दौरान आयोजित होने वाले ‘खिचड़ी मेले’ में लाखों लोग आते हैं ओर पूरे एक महीने तक रहते भी हैं.
इस मेले में हर जाति, धर्म और संप्रदाय के लोगों की भारी तादाद में उपस्थिति मठ की कट्टर हिंदूवादी छवि को तोड़ती है जबकि मुस्लिम शासन काल में हिन्दुओं और बौद्धों के अन्य सांस्कृतिक केन्द्रों की भांति इस पीठ को भी कई बार भीषण कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
इसकी व्यापक प्रसिद्धि के कारण विक्रमी चौदहवीं सदी में भारत के मुस्लिम सम्राट अलाउद्दीन खिलजी ने अपने शासन काल में इस मठ को नष्ट किया और साधक व योगी बलपूर्वक मठ से निष्कासित कर दिए।
सत्रहवीं और अठारहवीं सदी में अपनी धार्मिक कट्टरता के कारण मुग़ल शासक औरंगजेब ने इसे दो बार नष्ट किया। क़रीब 52 एकड़ के सुविस्तृत क्षेत्र में स्थित इस मंदिर का रूप व आकार-प्रकार परिस्थितियों के अनुसार समय-समय पर बदलता रहा है। वर्तमान में गोरक्षनाथ मंदिर की भव्यता और पवित्र रमणीयता अत्यन्त कीमती आध्यात्मिक सम्पत्ति है। प्रतिदिन मंदिर में स्थानीय लोगों के अतिरिक्त भारत के सुदूर प्रांतों से भी असंख्य लोगों की भीड़ पर्यटकों व यात्रियों के रूप में आती है।
अब यदि बात करें इन विधानसभा चुनावों में भाजपा द्वारा वोटों की खातिर ध्रुवीकरण की राजनीति पर, तो कौन सा ऐसा राजनीतिक दल है जो ध्रुवीकरण की राजनीति नहीं करता। कांग्रेस ने देश और विभिन्न प्रदेशों में इतने लंबे समय तक शासन वोटों का ध्रुवीकरण करके ही किया। क्षेत्रीय पार्टियां भी यही करती रही हैं।
उत्तर प्रदेश की दोनों प्रमुख क्षेत्रीय पार्टियों बसपा व सपा की पूरी राजनीति वोटों के ध्रुवीकरण पर टिकी रही है। बसपा ने तो इन चुनावों में सुप्रीम कोर्ट के आदेश की खुली अवहेलना करके मुस्लिमों के ध्रुवीकरण की पूरी कोशिश की और बड़ी मात्रा में मुस्लिम प्रत्याशियों को खड़ा किया। मायावती ने अपने चुनावी मंचों से बेझिझक मुस्लिमों का आह्वान किया और दलितों के एक वर्ग को भी डराया।
उत्तर प्रदेश के अलावा बिहार, पश्चिम बंगाल, दिल्ली, पंजाब आदि कौन सा ऐसा राज्य है जहां के शासक ध्रुवीकरण की राजनीति न करते रहे हों।
इस सब के इतर देखा जाए तो भाजपा पहली ऐसी पार्टी है जिसने तीन तलाक की मुखालफत और नोटबंदी व समान नागरिक संहिता की वकालत करने का दुस्साहस दिखाया। ये बात अलग है कि विपक्ष के भारी दुष्प्रचार के बाद भी यह सारे मुद्दे भाजपा के लिए मुफीद साबित हुए और अब कहा जा रहा है कि मुस्लिम महिलाओं ने भी इन चुनावों में भाजपा के लिए मतदान किया है।
उत्तर प्रदेश एक ऐसा राज्य है जिसके इर्द-गिर्द सारे देश की राजनीति घूमती है। ऐसे में भाजपा ने योगी आदित्यनाथ को उत्तर प्रदेश की कमान सौंपने से पहले राजनीति के सारे गुणा-भाग जरूर लगाए होंगे क्योंकि भाजपा नहीं चाहेगी कि वर्षों बाद समाप्त हुआ उसका वनवास, उपहास बनकर रह जाए।
योगी आदित्यनाथ जो कल तक मुंह से आग उगलने के लिए पहचाने जाते थे, उन्होंने मुख्यमंत्री का पद संभालने के साथ सबसे पहले अपनी कैबिनेट को हिदायत दी है कि मीडिया को वह नहीं, इसके लिए अधिकृत मंत्री ब्रीफ करेंगे। योगी ने बाकायदा दो मंत्रियों श्रीकांत शर्मा और सिद्धार्थनाथ सिंह को इसकी जिम्मेदारी सौंप दी है। श्रीकांत शर्मा व सिद्धार्थनाथ सिंह पहले से राष्ट्रीय प्रवक्ता की जिम्मेदारी संभालते चले आ रहे हैं।
योगी का अपनी कैबीनेट को दिया गया यह संदेश स्पष्ट करता है कि वह पद की गरिमा को बखूबी समझ रहे हैं और उसकी जिम्मेदारी का अहसास भी कर रहे हैं।
संभवत: इसीलिए उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने से पूर्व ही प्रदेश पुलिस के मुखिया को इस आशय का आदेश दे दिया था कि जीत के जश्न में निरंकुश होने वालों से सख्ती के साथ निपटें। कानून-व्यवस्था से खिलवाड़ करने की इजाजत किसी को नहीं मिलनी चाहिए।
योगी ने यह आदेश कुछ स्थानों से आ रहीं उन खबरों के आधार पर दिया था जहां जीत के जश्न में वर्ग विशेष के खिलाफ नारेबाजी की बात बताई गई थी।
योगी का इतनी जल्दी एक्शन में आना यह बताता है कि उन्हें अपनी प्रचारित की गई कथित कट्टरवादी छवि का भी अच्छी तरह इल्म है और वह इसके लिए विपक्ष और मीडिया को कोई मौका नहीं देना चाहते।
सबका साथ, सबका विकास पर चलते हुए भाजपा के संकल्प पत्र पर पूरी तरह अमल करने की बात उन्होंने अपनी पहली प्रेस कांफ्रेंस में भी कही।
इन सब बातों पर गौर करें तो साफ लगता है कि जिस तरह केंद्र में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार का गठन होने के साथ विपक्ष ने मुस्लिमों के अंदर भय का वातावरण उत्पन्न करने की कोशिश की थी, उसी तरह की कोशिश वह अब योगी की ताजपोशी के बाद कर रहा है क्योंकि उसके तो नीचे से लगभग पूरी जमीन ही खिसक चुकी है। प्रमुख विपक्षी पार्टियां जहां से चली थीं, आज फिर वह वहीं आकर खड़ी हो गई हैं। योगी यदि पार्टी की उम्मीदों पर खरे साबित हुए और जनभावनाओं के अनुरूप शासन की कमान संभालने में सफल रहे तो सपा व बसपा जैसी पार्टियों का वजूद तक खतरे में पढ़ जाएगा। कांग्रेस की दुर्गति का अंदाज लगाने को तो इतना ही काफी है कि उसे अपना दल से भी कम सीटें मिली हैं, और वो भी तब जबकि उसने बड़े ढोल-नगाड़े पीटकर समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन किया था। यह साथ यूपी की जनता को कितना पसंद आया, इसका अब जिक्र करने की भी जरूरत नहीं रह गई।
बेहतर होगा कि विपक्ष और मीडिया अब योगी-राज को बेवजह शंका की दृष्टि से देखने की बजाय उनके काम को देखे और नकारात्मक प्रचार-प्रसार व बयानबाजी की प्रवृत्ति से बाहर निकल कर धरातल पर होने वाले कामों की समीक्षा करे ताकि एक स्वस्थ परंपरा कायम हो सके और उत्तर प्रदेश की जनता भी उस परंपरा का लाभ उठाकर भ्रम की स्थिति से बच सके।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2012
बुधवार, 8 फ़रवरी 2012
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