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बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

सनसिटी अनंतम मामला: अपने ही बुने जाल में फंसा नगर निगम, एक पत्र से हुआ काले कारनामों का खुलासा

 वृंदावन में सनसिटी अनंतम के नाम से डेवलप की जा रही टाउनशिप को नगर निगम मथुरा-वृंदावन द्वारा लेंड एक्सचेंज की आड़ लेकर बेशकीमती जमीन देने की कोशिश का मामला अब निगम के ही गले की फांस बनता दिखाई दे रहा है। 

अरबों रुपए के रियल एस्टेट प्रोजेक्ट के लिए भूमाफिया को जमीन देने का प्रयास भले ही फिलहाल बोर्ड की बैठकों में प्रस्ताव पेश करने से आगे न बढ़ा हो, किंतु नगर निगम के एक नए पत्र से इस बात का खुलासा जरूर हो गया है कि सारी कवायद उस करोड़ों रुपए की रिश्वत को पचाने की खातिर की जा रही है जो शासन में जनप्रतिनिधि और प्रशासन में अधिकारियों की शक्ल लेकर बैठे लोग ले चुके हैं। 

देखें नगर निगम द्वारा बीती 31 जनवरी को जिलाधिकारी मथुरा के नाम लिखा गया पत्र 

जनसुनवाई शिकायत दिनांक 17 जनवरी 2026 के निस्‍तारण का हवाला देकर लिखे गए इस पत्र के अनुसार दीपक शर्मा पुत्र लक्ष्मीनारायण शर्मा उर्फ ब्रज बिहारीशर्मा निवासी वृंदावन बांगर, तहसील व जिला मथुरा ने मुख्यमंत्री पोर्टल पर एक शिकायत की है। 
शिकायत के मुताबिक नगर निगम मथुरा-वृंदावन द्वारा सनसिटी अनंतम को टाउनशिप डेवलप करने के लिए काफी कम कीमत में अपनी जमीन विनिमय की जा रही है। 
दीपक शर्मा की इसी शिकायत का जनसुनवाई के माध्यम से निस्तारण करते हुए नगर निगम ने जिलाधिकारी मथुरा को जो पत्र लिखा है, वह बताता है कि नगर निगम द्वारा इस संदर्भ में एक जांच कराई गई। जांच में पाया गया कि विनिमय में भूमि की बिक्री नहीं की जाती, अलबत्ता भूमि के मूल्य का आंकलन करके विनिमय किया जाता है। 
नियमानुसार भूमि के विनिमय में सिर्फ 5 प्रतिशत अंतर मान्य है और नगर निगम द्वारा सनसिटी अनंतम को जितनी भूमि देने का प्रस्ताव लाया गया था, उससे अधिक क्षेत्रफल की भूमि नगर निगम को प्राप्त हो रही है। हालांकि प्रश्नगत भूमि का विनिमय अभी स्वीकृत नहीं हुआ है। 
अपर नगर आयुक्त के हस्ताक्षर से जिलाधिकारी को भेजा गया यह पत्र ही न सिर्फ कई गंभीर सवाल खड़े करता है बल्कि यह भी जाहिर कराता है कि किसी न किसी स्तर पर सनसिटी अनंतम के प्रमोटर्स की कोई दुरभि संधि हुई है, जिसका उल्लेख सूत्रों के हवाले से लीजेण्‍ड न्यूज़ अपनी इससे पहली रिपोर्ट में कर चुका है। 
जानिए कैसे? 
वो इस तरह कि शिकायत का निस्तारण करते हुए नगर निगम ने लिखा है- विनिमय के लिए भूमि के मूल्य में सिर्फ 5 प्रतिशत का अंतर मान्य है। 
अब यहीं एक पहला गंभीर सवाल तो यह खड़ा होता है कि ये 5 प्रतिशत का अंतर सनसिटी अनंतम के पक्ष में लाभकारी है या नगर निगम के पक्ष में? 
दूसरा सवाल यह कि करोड़ों रुपए मूल्य की सरकारी जमीन के विनिमय में क्या 5 प्रतिशत का अंतर कोई अहमियत नहीं रखता, और यदि रखता तो नगर निगम ने अब तक साफ क्यों नहीं किया कि उसे सनसिटी के लिए लेंड एक्सचेंज करने में लाभ हो रहा है अथवा हानि?  
तीसरा स्वाभाविक सवाल यह है कि एक सरकारी जमीन के निजी कंपनी के पक्ष में विनिमय की पहल किसने तथा किस स्तर से की? 
चौथा सवाल कि अगर सनसिटी अनंतम की भूमि नगर निगम की भूमि से ज्यादा मूल्यवान है तो वो उसे एक्सचेंज करना क्यों चाहते हैं, और यदि नगर निगम की भूमि अधिक कीमती है तो नगर निगम किस स्‍वार्थ में सनसिटी अनंतम को अपनी जमीन देने का प्रस्ताव लेकर क्यों आया? 
पांचवां प्रश्न यह है कि क्या शासन की स्‍वीकृति के बिना जिला प्रशासन की कोई इकाई इस तरह किसी प्राइवेट प्रोजेक्ट के लिए लेंड एक्सचेंज का प्रस्ताव ला सकती है? 
और अंतिम प्रश्‍न कि जब इस भूमि के विनिमय का प्रस्ताव पास ही नहीं हुआ तो सनसिटी अनंतम कैसे इस भूमि पर काबिज हो गया, क्यों व किसके प्रोत्साहन से इस भूमि पर उसने अवैध निर्माण कार्य शुरू करा दिया। जिसकी पुष्‍टि खुद नगर निगम ने अपनी जांच के उपरांत की है तथा जिसे ध्‍वस्त कराने के लिए नगर निगम ने 22 जनवरी 2026 को ही मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के नाम भी एक पत्र लिखा है। 
इन सब प्रश्नों के अतिरिक्त एक बड़ा अहम प्रश्न यह भी है कि क्या नगर निगम को अपनी ही जमीन को कब्जामुक्त कराने तथा उस पर किए जा रहे अवैध निर्माण को रोकने तथा ध्वस्‍त कराने के लिए मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण की जरूरत है, क्या नगर निगम के पास अपने ऐसे अधिकार नहीं हैं कि वह अपनी जमीन को भूमाफिया के चंगुल से छुड़ाकर उस पर काबिज हो सके?
 

आपसी सहमति से खेला जा रहा सारा खेल 
दरअसल, हकीकत यह है कि लेंड एक्सचेंज का यह खेल अब तक बाकायदा एक षड्यंत्र के तहत आपसी सहमति से खेला जा रहा था, किंतु जब पहले तो एनजीटी में इसके खिलाफ याचिका दायर हुई और फिर मीडिया में आने के बाद शासन स्‍तर पर शिकायतें होने लगीं तो नगर निगम अपनी गर्दन बचाने की कवायद करने लगा। 
जरा सोचिए कि जो जमीन सनसिटी अनंतम को देने के लिए नगर निगम बार-बार बोर्ड बैठक में प्रस्ताव लेकर आ रहा था, उस जमीन पर अवैध कब्जा तथा अवैध निर्माण की जानकारी नगर निगम को अब तक क्यों नहीं हुई। और जब हुई है तब भी उसे कब्जामुक्त कराने तथा अवैध निर्माण ध्‍वस्त कराने के लिए वह चिट्ठी-चिट्ठी क्यों खेल रहा है। वो इसलिए कि बहुत जल्द सारा प्रकरण सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर दस्‍तक देने जा रहा है। 
हां! एक बात और कि इस काले कारनामे में मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण भी हर स्तर पर सहभागी है, लिहाजा जब बात निकलेगी तो बहुत दूर तलक जाएगी ही। विकास प्राधिकरण के अधिकारी भी आखिर कब तक खैर मनाने में कामयाब होंगे। आगे-आगे देखिए... होता है क्या? 
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

बड़े खेल का खुलासा: करोड़ों की पेशगी लेकर लाया गया नगर निगम की जमीन कॉलोनाइजर को देने का प्रस्ताव, PIL दायर करने की तैयारी


 वृंदावन में कुछ खास कॉलोनाइजर के लिए लेंड एक्सचेंज का प्रस्‍ताव यूं ही नहीं लाया गया। इसके लिए षड्यंत्र के तहत बाकायदा एक ''दुरभि संधि'' की गई। चूंकि मामला करोड़ों का नहीं, अरबों रुपए का था इसलिए करोड़ों रुपए तो पेशगी में ही दे दिए गए। हालांकि अब नगर आयुक्त कह रहे हैं कि ये प्रस्ताव दफन किया जा चुका है लिहाजा भविष्य में ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं लाया जाएगा। 

नगर आयुक्त कुछ भी कहें, लेकिन सवाल तो यह है कि निजी टाउनशिप के लिए पहले तो मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण और फिर मथुरा-वृंदावन नगर निगम, ये प्रस्ताव लेकर आया ही क्यों? 
इस 'क्यों' का जवाब देने को कोई तैयार नहीं है इसलिए कुछ जागरूक लोग न्यायालय की शरण में जाने की तैयारी कर चुके हैं। वो इसे उच्च न्यायालय और फिर जरूरत पड़ने पर उच्चतम न्यायालय तक ले जाना चाहते हैं ताकि बेशकीमती सरकारी जमीन को माफिया के कब्‍जे में जाने से बचाया जा सके। 
एनजीटी में ये मामला पहले ही जा चुका है और वहां से सभी संबंधित पक्षों को नोटिस भी जारी किए जा चुके हैं, परंतु अब लोगों को समझ में आ गया है कि डालमिया बाग की तरह इस केस को भी उच्‍च या उच्चतम न्यायालय ले जाना ही उपयुक्त होगा इसलिए वो इसकी तैयारी कर चुके हैं।
वृंदावन निवासी लक्ष्मीनारायण उर्फ ब्रजबिहारी शर्मा तथा दीपक शर्मा ने कल इसी संदर्भ में जिलाधिकारी मथुरा के नाम एक ज्ञापन सौंपा है और उसकी प्रति लोकायुक्त को भी भेजी है। 
शिकायतकर्ताओं ने इस ज्ञापन में लिखा है कि इस ''लेंड एक्सचेंज'' का प्रस्ताव पेश करने से पहले न तो विकास प्राधिकरण ने और ना ही नगर निगम ने पारदर्शिता एवं नियमों का पालन किया जिससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि ऐसा एक निजी कंपनी को अनुचित लाभ पहुंचाने के उद्देश्‍य से किया गया। 
शिकायतकर्ताओं ने इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराने का अनुरोध किया है जिससे प्रस्ताव लाने के पीछे छिपी मंशा सामने आ सके और इसके लिए जिम्‍मेदार अधिकारियों को कठघरे में खड़ा किया जा सके। 
मथुरा जिला प्रशासन तथा नगर निगम मथुरा-वृंदावन से जुड़े भरोसेमंद सूत्र बताते हैं कि सनसिटी अनंतम एवं अन्य बिल्डर्स के पक्ष में लेंड एक्सचेंज का मात्र प्रस्‍ताव लाने की पेशगी करीब 5 करोड़ रुपए प्राप्त की गई तथा 'शेष के लिए' पूरी 'साजिश' बनाई गई कि किसको किस तरह और कितना-कितना लाभ पहुंचाना है। 
ये सारा काम कितनी गोपनीयता से किया जा रहा था, इसका अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि सनसिटी अनंतम के मालिकों तक का नाम किसी को नहीं बताया जाता। 
सूत्र बताते हैं कि सैकड़ों एकड़ की इस टाउनशिप के मालिकों में मुख्‍य रूप से ZEE TV के मालिक सुभाष चंद्रा के भाई लक्ष्‍मी गोयल तथा उनके समधी (जो एक्शन शू कंपनी के मालिक) शामिल हैं।  
इनके अलावा जिन अन्य के लिए लेंड एक्सचेंज का प्रस्‍ताव लाया गया, उनमें द्वारिकादास जीवराजका मैमोरियल ट्रस्ट तथा हरिनिवास खेतान मैमोरियल ट्रस्ट द्वारा विकसित की जा रही कॉलोनियों का नाम है। 
''लीजेंड न्यूज़'' ने जब इस पूरे प्रकरण में कानूनी विशेषज्ञों की राय ली तो उन्‍होंने इसे साफ तौर पर पद के दुरुपयोग तथा निजी स्‍वार्थ की पूर्ति के लिए बदनीयती का मामला बताया, जो आपराधिक कृत्य बनता है। 
कानूनी विशेषज्ञों की राय में ये न सिर्फ नियमों को ताक पर रखकर माफिया के एजेंट की तरह काम करने का अपराध है बल्कि इससे साफ-साफ जाहिर होता है कि मथुरा जिले के अधिकारी तो बिक ही चुके हैं, जनप्रतिनिधि भी ऑब्लाइज हैं अन्यथा ये मुद्दा अब तक विधानसभा में भी उठ जाना चाहिए था। 
कानून के जानकारों की मानें तो इस पूरे प्रकरण में प्रशासनिक अधिकारियों सहित मेयर की भी भूमिका संदिग्ध प्रतीत होती है और इसलिए यदि इसकी निष्पक्ष जांच हो जाती है तो साफ हो जाएगा कि आखिर क्यों कुछ खास कॉलोनाइजर के पक्ष में लेंड एक्सचेंज के लिए प्रशासन से लेकर निगम तक में बैठे जिम्मेदार लोग इतने उतावले हैं। 
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

गुरुवार, 15 जनवरी 2026

माफिया पर मेहरबान प्रशासन: कौड़ियों की जमीन के बदले नगर निगम की बेशकीमती जमीन देने की तैयारी


 उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हर तीसरे दिन, और अपने प्रत्येक जनता दर्शन कार्यक्रम में कहते रहते हैं कि भूमाफिया किसी भी तरह पनपने न पाए। वह राज्य से माफिया को नेस्तनाबूद करने के आदेश और निर्देश अधिकारियों को देते रहते हैं, लेकिन यदि मेढ़ ही खेत को खाने पर आमादा हो तो सीएम योगी कर क्या सकते हैं। ऐसे में एक योगी क्या, योगी जैसे दस मिलकर भी शायद कुछ नहीं कर सकते। 

दूसरे जनपदों का यहां जिक्र न किया जाए तो कम से कम मथुरा का जिला प्रशासन भली-भांति समझ चुका है कि वह चाहे जितना खुल कर खेले, चाहे जितना भ्रष्टाचार करे किंतु उसका कुछ नहीं बिगड़ने वाला। तभी तो धर्म की नगरी में अधर्म का डंका डटकर बज रहा है और जिसकी जितनी बिसात है, वह उतनी ही माफिया की मदद करने पर आमादा है। 
तभी तो पहले डालमिया बाग और अब सनसिटी अनंतम का मामला भी अदालत की चौखट तक पहुंचा, अन्यथा इसकी जरूरत ही क्यों पड़ती। 
ताजा मामला एक बार फिर वृंदावन के सनसिटी अनंतम से जुड़ा है जिसे नगर निगम मथुरा-वृंदावन की बेशकीमती जमीन उपलब्ध कराने के लिए जिला प्रशासन के निर्देश पर बोर्ड बैठक में बाकायदा प्रस्ताव लाया गया। 
आश्चर्य की बात यह है कि यह प्रस्ताव कौड़ियों की जमीन के बदले नगर निगम की बेशकीमती जमीन देने का है, जिस पर पूर्व में एक जिलाधिकारी आपत्ति भी दर्ज करा चुके हैं। अब यह प्रस्ताव निगम की बैठक में फिर लाया गया है। 
क्या है प्रस्ताव? 
9 अक्टूबर 2025 को पेश एजेण्‍डे के अनुसार अपर जिलाधिकारी (प्रशासन) मथुरा ने ग्राम जैत व छटीकरा में सनसिटी हाईटेक प्रोजेक्ट प्रा. लि. द्वारा विकसित की जा रही टाउनशिप के लिए भूमि विनिमय का प्रस्ताव बोर्ड से पास कराकर उपलब्ध कराने के निर्देश पत्रांक-322/सात-बी/भू.व्‍य./2023 दिनांक 06.09.2023 एवं 173/सात- बी/भू.व्‍य./2023 दिनांक 23.09.2024 के जरिए दिए हैं। 
इस नए प्रस्ताव के मसौदे में बताया गया है कि ग्राम जैत व छटीकरा में सनसिटी हाईटेक प्रोजेक्ट प्रा. लि. द्वारा विकसित की जा रही टाउनशिप के लिए भूमि के विनिमय का जो प्रस्ताव कार्यकारिणी ने पहले रखा था, उसकी त्रुटियों को संशोधित करते हुए यह प्रस्ताव लाया गया है। 
यहां यह जान लेना जरूरी है कि सनसिटी हाईटेक ने अपनी प्रस्तावित टाउनशिप में जमीन का प्राथमिक मूल्य लगभग एक लाख रुपए प्रति वर्ग गज रखा है जबकि मथुरा-वृंदावन नगर निगम को उसके विनिमय में जो भूमि मिलनी है उसकी कीमत बमुश्किल 10 हजार रुपए प्रति वर्ग गज है। 
देखें नगर निगम मथुरा-वृंदावन की बोर्ड बैठक में पेश एजेण्‍डे की प्रति-
नगर-निगम की बोर्ड बैठक का एजेण्‍डा बताता है कि सनसिटी हाईटेक प्रोजेक्ट के अलावा भी दूसरे कथित कॉलोनाइजर्स के लिए इसी प्रकार भूमि विनिमय का संशोधित प्रस्ताव रखा गया है जिससे साफ है कि कितने बड़े स्तर पर ''ये खेल'' खेला जा रहा है। 
गौरतलब है कि समूचा मथुरा जनपद और विशेषकर भगवान श्रीकृष्‍ण की लीलास्थली वृंदावन इन दिनों ''धार्मिक पर्यटन'' के रूप में अपनी वैश्विक पहचान बना चुका है। वृंदावन में जमीनों के दाम आसमान छू रहे हैं इसलिए स्‍थानीय ही नहीं, बाहरी भूमाफिया भी इसका भरपूर लाभ उठाने में लगे हैं। चूंकि जिला प्रशासन उन्हें इसकी पूरी छूट दे रहा है इसलिए वह कोई मौका हाथ से जाने नहीं देना चाहते। 
इन हालातों में यह बताने की तो आवश्यकता ही नहीं रह जाती कि मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण हो या फिर नगर निगम मथुरा-वृंदावन, सब आखिर कथित कॉलोनाइजर्स या यूं कहें कि भूमाफिया पर इतने मेहरबान क्यों हैं, और क्यों जिला प्रशासन विकास की आड़ लेकर भूमाफिया को सीधा लाभ पहुंचाने की जद्दोजहद में लगा है। 
दरअसल ये सारा खेल करोड़ों का नहीं, अरबों का है। जाहिर है कि इससे होने वाली हराम की कमाई कितनी भी मामूली क्यों न हो, कुबेर के खजाने से कम नहीं होगी। राधे-राधे की रट लगाकर ब्रजवासियों को मूर्ख बनाने का यह धंधा बेशक बहुत दिनों से चल रहा है लेकिन अदालतें उम्मीद की किरण दिखा रही हैं। 
वो आशा जगाती हैं कि कभी न कभी तो पाप का यह घड़ा भरेगा, और किसी न किसी दिन यह फूटेगा भी। तब अकेला माफिया नहीं, नेता और अधिकारी भी नापे जाएंगे। काली कमली वाले की नजर जिस दिन टेढ़ी हो गई, उस दिन ब्रज में यह कहावत चरितार्थ होते दिखाई देगी कि उसके घर में देर भले ही हो लेकिन अंधेर नहीं होता। 
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

बुधवार, 30 जून 2021

UP चुनाव: खुद पैरों पर कुल्‍हाड़ी मार रहे हैं श्रीकांत शर्मा, या बिजली अधिकारियों ने ले ली है उन्‍हें हराने की ‘सुपारी



 

उत्तर प्रदेश के कद्दावर भाजपा नेताओं में शुमार और ऊर्जा जैसे महत्‍वपूर्ण विभाग के मंत्री तथा मथुरा की शहरी सीट के विधायक श्रीकांत शर्मा खुद अपने पैरों पर कुल्‍हाड़ी मार रहे हैं या फिर बिजली अधिकारियों ने उन्‍हें चुनाव हराने की ‘सुपारी’ ले रखी है?

अब जबकि UP के विधानसभा चुनाव होने में चंद महीने ही बचे हैं, तो ये सवाल इसलिए प्रासांगिक हो जाता है क्‍योंकि कुछ समय से न सिर्फ ऊर्जा मंत्री का समूचा गृह जनपद बल्‍कि उनका चुनाव क्षेत्र मथुरा-वृंदावन भी बिजली की भारी मार से त्रस्‍त है।
मथुरा को पूरी तरह विद्युत कटौती से मुक्‍त रखे जाने का दावा करने वाले ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा के विभागीय अधिकारियों का बचकाना बयान कहता है कि कोरोना के कारण लाइनें दुरुस्‍त करने का काम देरी से शुरू हुआ इसलिए ये समस्‍या आ रही है। वो ये भी कहते हैं कि शहरी क्षेत्र की विद्युत आपूर्ति में कोई समस्‍या नहीं है क्‍योंकि शहर के अधिकांश इलाकों को अंडरग्राउंड केबिल से जोड़ा जा चुका है। जो थोड़ी-बहुत परेशानी है, वो ग्रामीण क्षेत्रों में हो सकती है। यानी उन्‍हें मालूम ही नहीं है कि परेशानी है या नहीं।
अधीक्षण अभियंता प्रभाकर पांडे तो यहां तक बताते हैं कि अधिकांश लाइनें ठीक हैं, कुछ को ठीक करने का काम चल रहा है इसलिए जल्‍द समूची व्‍यवस्‍था में सुधार हो जाएगा।
अब जानिए ऊर्जा मंत्री के चुनाव क्षेत्र मथुरा-वृंदावन का हाल
पिछले करीब 15 दिनों में कल पांचवीं बार वृंदावन से आने वाली लाइन में फॉल्‍ट के कारण शहर का एक बड़ा हिस्‍सा बिजली से महरूम रहा। रात दस बजे बंद हुई लाइट आधी रात के बाद दो बजे सुचारू हो सकी। इससे पहले एक दिन 8 घंटे, एक दिन 6 घंटे तो दो दिन 5-5 घंटे के लिए लाइट बंद रही।
पूर्व में घंटों लाइट जाने का कारण जहां आंधी या बारिश बताया गया वहीं कल ऐसा बिना वजह तार टूट जाने से हुआ।
ग्राउंड पर काम करने वाले कर्मचारियों से पूछने पर पता लगता है कि राधापुरम, राधापुरम एस्‍टेट सहित छोटी-बड़ी एक दर्जन कॉलोनियों का लोड वृंदावन से आने वाली जिस लाइन पर डाल रखा है वह जर्जर अवस्‍था को प्राप्‍त है।
इस लाइन में जगह-जगह जोड़ हैं इसलिए मामूली सी हवा चलने अथवा आकाश से दो बूदें बरस जाने पर ही वो दिक्‍कत देने लगती है।
चूंकि विभागीय कर्मचारियों को यही पता नहीं होता कि वृंदावन से मथुरा तक दसियों किलोमीटर के बीच फॉल्‍ट कहां आया है इसलिए वो पहले तो घंटों पेट्रोलिंग करके फॉल्‍ट का पता लगाते हैं। उसके बाद कहीं जाकर काम किया जाता है, लेकिन तब तक सब स्‍टेशन पर बैठे लोगों की जान सूखती रहती है।
दरअसल, पेट्रोलिंग करने वाले कर्मचारी फॉल्‍ट न मिल जाने तक कुछ बताने की स्‍थिति में नहीं होते इसलिए वो संबंधित सब स्‍टेशन को ऐसी कोई जानकारी देने में असमर्थ होते हैं कि आपूर्ति सुनिश्‍चित होने में कितना वक्‍त लगेगा।
उधर सब स्‍टेशन पर बैठे एसएसओ से हर उपभोक्‍ता यह जानना चाहता है कि लाइट कब तक आएगी। ऐसे में वह अपने बुद्धि विवेक से जो बता सकता है वो बता तो देता है, किंतु सच्‍चाई नहीं बता पाता इसलिए समय के साथ उपभोक्‍ताओं का आक्रोश बढ़ना स्‍वभाविक है।
भीषण गर्मी के इस दौर में सब स्‍टेशन से ये तक जानकारी न मिल पाना कि बिजली क्‍यों गई है और कब तब आ पाएगी, आग में घी डालने की कहावत को कब सही साबित कर दे कहना मुश्‍किल है। लेकिन आला अधिकारियों का शायद इससे कोई वास्‍ता नहीं है। उन्‍हें वास्‍ता है तो अपनी ऐशो-आराम की नौकरी से, जिसे कैसे बजाना है वो भली प्रकार जानते हैं।
अगर कभी इन कारणों से झगड़ा होता भी है तो वो छोटे कर्मचारियों और उपभोक्‍ताओं को मोहरा बनाकर साफ बच निकलने की कला में माहिर हैं इसलिए उनका कभी कुछ बिगड़ने से रहा।
इसका एक उदाहरण गत 24 जून को तब मिला जब घंटों परेशान होने के बाद एक उपभोक्‍ता ने अधीक्षण अभियंता शहरी के सरकारी मोबाइल नंबर पर कॉल करके बिजली की स्‍थिति के बारे में जानकारी चाही। जाहिर है कि फोन उठा नहीं। फिर उपभोक्‍ता ने उन्‍हें वाट्सएप पर मैसेज भेजा, एसई महोदय ने मैसेज पढ़ भी लिया किंतु जवाब देना जरूरी नहीं समझा।


कड़वा सच यही है कि संबंधित जेई से लेकर एसई तक कोई किसी उपभोक्‍ता के फोन अथवा मैसेज का जवाब नहीं देता क्‍योंकि वो उनके लिए अहमियत रखते ही नहीं।
जिन दर्जनभर पॉश कॉलोनियों को वृंदावन से बिजली की आपूर्ति की जा रही है उन्‍हें विभाग ग्रामीण क्षेत्र मानता है या शहरी, इसका भी पता नहीं जबकि ये सर्वाधिक और समय से रेवेन्‍यू देने वाली कॉलोनियां हैं और यहां शत-प्रतिशत घरों में स्‍मार्ट मीटर लगाए जा चुके हैं इसलिए इन मीटरों की कमांड भी इलाके के एसडीओ संभालते हैं।
किसकी लाइट कब और कितना बिल बकाया होने पर गोल करनी है, ये वही तय करते हैं। इसके लिए अब विभाग के किसी कर्मचारी को उपभोक्‍ता के दरवाजे पर जाने या उसकी केबिल उतारने की जरूरत नहीं रह गई।
अधिकारियों द्वारा उपभोक्‍ताओं को कोई अहमियत न देने और सब स्‍टेशन पर बैठे कर्मचारियों को उनसे जूझने के लिए छोड़ देने का संभवत: एक बड़ा कारण ये भी हो सकता है, हालांकि ये एकमात्र कारण नहीं है।
स्‍थानीय जनप्रतिनिधि के तौर पर ऊर्जा मंत्री कितने जिम्‍मेदार
अगर बात करें स्‍थानीय जनप्रतिनिधि या ऊर्जा मंत्री के तौर पर श्रीकांत शर्मा द्वारा जिम्‍मेदारी निभाने की तो वो अपने किसी मतदाता अथवा आम उपभोक्‍ता के लिए कभी उपलब्‍ध नहीं होते। उनकी जगह ये जिम्‍मेदारी उनके बड़े भाई सूर्यकांत शर्मा पहले दिन से निभा रहे हैं।
अब उनकी बात अधिकारी कितनी सुनते हैं और कितनी मानते हैं, इसका अंदाज लगाने को बिजली की वह व्‍यवस्‍था ही काफी है जिसका जिक्र ऊपर किया गया है। बताया जाता है सूर्यकांत शर्मा ने व्‍यवस्‍था सुधारने के अपने स्‍तर से भरसक प्रयत्‍न किए परंतु फिलहाल नतीजा कुछ नहीं निकला।
अलबत्ता बताते हैं कि ऊर्जा मंत्री अपने कुछ खास लोगों से बंद कमरों में समय-समय पर जरूर मिलते हैं लेकिन उनसे क्‍या गुफ्तगू होती है, वो भी बाहर नहीं आ पाती।
भाजपा में भी ऊर्जा मंत्री के कार्य और व्‍यवहार की चर्चा
शायद यही कारण है कि जैसे-जैसे चुनावों की चर्चा शुरू हो रही है वैसे-वैसे आम लोगों के साथ-साथ भाजपा से जुड़े लोगों में भी श्रीकांत शर्मा के कार्य तथा व्‍यवहार की चर्चा होने लगी है।
उत्तर प्रदेश में योगी आदित्‍यनाथ के नेतृत्‍व वाली सरकार सत्ता पर दोबारा काबिज होने का ही नहीं, 350 सीटें जीतने का भी लक्ष्‍य लेकर चल रही है।
चार दिन पहले 25 जून को बांके बिहारी मंदिर के दर्शनार्थ वृंदावन आए प्रदेश के कबीना मंत्री सतीश महाना ने कहा था कि जिन मुद्दों पर हम चुनाव में जनता के बीच दोबारा जाएंगे उनमें चौबीसों घंटे बिजली की आपूर्ति भी अहम मुद्दा है। सतीश महाना शायद नहीं जानते कि यहां तो दीया तले अंधेरा है।
ऊर्जा मंत्री का गृह जनपद ही नहीं, उनका चुनाव क्षेत्र भी जब आए दिन चार-चार से लेकर आठ-आठ घंटों तक बिजली के लिए तरसने को अभिशप्‍त है तो फिर प्रदेश में बेहतर बिजली व्‍यवस्‍था के नाम पर चुनाव में उतरना क्‍या गुल खिलाएगा, इसका अंदाज लगाना बहुत मुश्‍किल काम नहीं होगा।
प्रदेश की बात छोड़ भी दें तो प्रश्‍न यह है कि अपना पहला विधानसभा चुनाव बड़े अंतर से जीतने वाले श्रीकांत शर्मा इन हालातों में क्‍या इस बार जीत दर्ज करा सकेंगे।
कहीं ऐसा तो नहीं कि स्‍थानीय बिजली अधिकारियों के खोखले दावों पर भरोसा करके वो खुद अपने पैरों पर कुल्‍हाड़ी चला रहे हैं या फिर अधिकारियों ने ही उन्‍हें गुमराह करके चुनाव हराने की ‘सुपारी’ ले रखी है?
अभी भी वक्‍त है कि श्रीकांत शर्मा और उनके शुभचिंतक यह तय कर लें कि उन्‍हें बिजली की अव्‍यवस्‍था से त्रस्‍त जनता के कथन पर भरोसा करना है अथवा उन अधिकारियों के झूठे दावों पर जो उन्‍हें चुनाव हराने का मुकम्‍मल बंदोबस्‍त कर चुके हैं क्‍योंकि अभी तो गर्मी भी शेष हैं और बारिश भी।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
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