बुधवार, 27 मई 2026

माफिया की मुराद पूरी करने के लिए MVDA की 'हाई कोर्ट' को सीधी चुनौती, 'मन्नत रेजीडेंसी' की सील खोली


 जिस सरकारी जमीन को माफिया के कब्जे से मुक्त कराने के लिए सत्ताधारी दल भाजपा के ही एक पार्षद ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में जनहित याचिका (PIL) दाखिल की हुई है, उससे जुड़े हाउसिंग प्रोजक्‍ट 'मन्नत रेजीडेंसी' की बीती 22 मई को मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण (MVDA) ने न सिर्फ सील खोल दी बल्कि ये कहते हुए क्‍लीन चिट भी दे दी कि अब कोई विवाद शेष नहीं है जबकि इलाहाबाद हाई कोर्ट में यह PIL अब भी लंबित है और इसका स्टेटस हाई कोर्ट की वेबसाइट पर जाकर कोई भी चेक कर सकता है।    

इस संबंध में विकास प्राधिकरण के सचिव आशीष कुमार सिंह से जब जानकारी की गई तो उन्होंने बड़ी 'बेशर्मी' के साथ स्‍वीकार किया कि 'मन्नत रेजीडेंसी' की सील खोल दी गई है क्‍योंकि विभिन्न विभागों से ऐसी जानकारी हमें प्राप्त हुई थी। उनके अनुसार 'मन्नत रेजीडेंसी' को लेकर अब मथुरा-वृंदावन नगर निगम को भी कोई आपत्ति नहीं है। 
देखिए मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के सचिव आशीष कुमार सिंह ने इस बावत क्या-क्या कहा-

 
सचिव विकास प्राधिकरण आशीष कुमार सिंह के कथन से स्‍पष्ट होता है कि उन्हें इस पूरे प्रकरण और इसे लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट में लंबित जनहित याचिका की पूरी जानकारी थी, बावजूद इसके उन्होंने ये दुस्साहस करके हाई कोर्ट को सीधी चुनौती दी है। 
गौरतलब है कि मथुरा के पॉश एरिया मसानी लिंक रोड पर जहां मन्नत रेजीडेंसी खड़ी की जा रही है, वहां बाकायदा कभी मथुरा-वृंदावन नगर निगम के बोर्ड लगे हुए थे और उन पर चेतावनी भी दर्ज थी, किंतु माफिया ने नगर निगम की जमीन कब्‍जाने के लिए इन बोर्डों को 'जमींदोज' कर दिया ताकि आगे कोई उंगली न उठा सके। ये फोटो इसकी गवाही दे सकते हैं। 
सचिव विकास प्राधिकरण ने इतनी बड़ी हिमाकत क्यों और कैसे की होगी, इसका अंदाज हर वो व्‍यक्‍ति लगा सकता है जिसका कभी किसी मामले में इस विभाग से वास्ता पड़ा होगा। यही नहीं, जिनका वास्ता न भी पड़ा हो, वो भी मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण की कारगुजारियों से भलीभांति वाकिफ रहते हैं क्‍योंकि भ्रष्‍टाचार इस विभाग की कार्य संस्‍कृति का अभिन्न अंग जो है। 
देखें सचिव आशीष कुमार सिंह के हस्ताक्षर से 22 मई का जारी किया गया वो आदेश जो उनके गले की फांस बन सकता है- 
दरअसल, सचिव आशीष कुमार सिंह ने ये सारा खेल यूं ही नहीं खेला। वो जानते हैं कि यूपी का मथुरा एक ऐसा जिला है जहां उनके पूर्ववर्ती अधिकारियों ने भी खूब मनमानी की है, लेकिन उनमें से आज तक किसी का कुछ नहीं बिगड़ा। इसके ठीक उलट उनमें से कुछ अधिकारी तो आज उनके बॉस बने बैठे हैं। 
हो सकता है कि आशीष कुमार सिंह ने उन्‍हीं से प्राप्त 'फीडबैक' के आधार पर इतना खुलकर खेलने की हिम्मत जुटा ली हो और इलाहाबाद हाई कोर्ट को सीधी चुनौती दे डाली लेकिन जरूरी नहीं कि यदि पूर्ववर्तियों का दांव सीधा पड़ गया तो अब भी यथास्थिति कायम रहेगी। 
इस बार दांव उल्टा पड़ जाने की पूरी संभावना है, वो इसलिए कि याचिकाकर्ता ब्रजेश खरे ने इस मामले में अदालत की अवमानना का केस फाइल करने की पूरी तैयारी कर ली है।

जहां तक सवाल है उसके लिए जरूरी दस्तावेजों का तो वो खुद सचिव ने अपने हस्ताक्षरित पत्र तथा मीडिया को ऑन कैमरा दिए गए बयान से उसकी पूर्ति कर दी है। 
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी 

 

शुक्रवार, 22 मई 2026

कुछ बड़े अधिकारियों को भारी पड़ सकती है माफिया पर मेहरबानी, 'सनसिटी अनंतम' के मामले में PIL दायर


 राष्‍ट्रीय राजधानी दिल्ली और आगरा के बीच भगवान श्रीकृष्ण की पावन लीला स्थली वृंदावन में नेशनल हाईवे 19 के किनारे छटीकरा पर बन रही 'सनसिटी अनंतम' जल्द ही कुछ अधिकारियों के गले की फांस बनने जा रही है।  

दीपक शर्मा पुत्र लक्ष्मीनारायण शर्मा उर्फ ब्रज बिहारी शर्मा निवासी वृंदावन ने इस मामले में जिला प्रशासन के कुछ अधिकारियों की कॉलोनाइजर के रूप में सक्रिय माफिया पर मेहरबानी को इलाहाबाद हाई कोर्ट के सामने रखा है। 

अपनी जनहित याचिका में दीपक शर्मा ने बताया है कि चार महीने पहले मथुरा-वृंदावन नगर निगम ने ये स्वीकार किया कि नगर निगम की जमीन पर 'सनसिटी अनंतम' के मालिकों ने न सिर्फ कब्जा कर रखा है बल्कि उस पर अवैध निर्माण भी करा लिया है, लेकिन आज तक उस भूमि को कब्जा मुक्त नहीं कराया जिससे माफिया और संबंधित अधिकारियों के बीच सांठगांठ की पुष्टि होती है। 

दरअसल, ये सारा खेल इस बेशकीमती सरकारी जमीन को 'लैंड एक्सचेंज' की आड़ में माफिया को देने से जुड़ा है जिसके लिए कई बार नगर निगम की बोर्ड बैठकों में प्रस्ताव पास कराने का प्रयास किया गया किंतु किसी न किसी कारणवश अधिकारी अपने मकसद में सफल नहीं हो सके। 

चूंकि कुछ खास अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को इस काम के लिए बड़ी रकम 'नजराना' के रुप में दी जा चुकी है और उससे भी कई गुना अधिक रकम बतौर 'शुकराना' मिलना शेष है इसलिए वह मीडिया से लेकर आम जनता तक की आंखों में धूल तो झोंक रहे हैं लेकिन सरकरी जमीन को कब्जा मुक्त नहीं करा रहे। 

अधिकारियों की माफिया पर मेहरबानी का अंदाज उस पत्र से लगाया जा सकता है जो नगर निगम मथुरा-वृंदावन की ओर से मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण को लिखा गया था। 

इस पत्र में नगर निगम ने विकास प्राधिकरण को लिखा है कि सनसिटी अनंतम में सरकारी जमीन पर किए जा रहे अवैध निर्माण को रुकवाकर पूर्व में किए गए अवैध निर्माण को ध्‍वस्त किया जाए, किंतु चार महीने बीत जाने के बाद भी न तो अवैध निर्माण रुका और न ध्वस्त कराया गया। 


हालांकि उस वक्त भी 'लीजेंड न्यूज़' ने इस संबंध में प्रमुखता से खबर प्रकाशित की थी जिसे इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ा जा सकता है- 


https://legendnews.in/single-post?s=suncity-anantam-case-nagar-nigam-mathura-vrindavan-got-caught-in-its-own-trap-and-a-single-letter-exposed-its-corrupt-practices-39089

विकास प्राधिकरण ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि नगर निगम अपनी जमीन को कब्जा मुक्त कराने तथा अवैध निर्माण ध्‍वस्त कराने में स्‍वयं सक्षम है जबकि नगर निगम चिट्ठी-चिट्ठी खेल रहा है, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठा रहा। ये स्थिति तो तब है जबकि सरकारी जमीन को कब्जा मुक्त कराने के लिए 'अंतरिक्ष' से कोई दूसरे अधिकारी नहीं भेजे जाएंगे। जो कुछ करना है, यहां तैनात अधिकारियों को ही करना है परंतु उनकी समस्या यह है कि उन्‍हें 'नजराने' का हक भी अदा करना है और 'शुकराना' भी हासिल करना है लिहाजा वह सनसिटी अनंतम के मालिकों की शान में गुस्ताखी करें तो करें कैसे। 

बहरहाल, याचिकाकर्ता दीपक शर्मा ने इस मामले में जिन्हें पक्षकार बनाया है उनमें प्रिंसिपल सेक्रेटरी उत्तर प्रदेश के अलावा म्युनिसिपल कमिश्नर और एडिशनल म्युनिसिपल कमिश्नर मथुरा-वृंदावन नगर निगम, सचिव मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण, एसएसपी मथुरा तथा डायरेक्‍टर सनसिटी अनंतम शामिल हैं। 

दीपक शर्मा ने जनहित याचिका में उच्च न्यायालय से जो प्रेअर की है, उसके मुख्‍य बिंदु हैं- 

1- नगर निगम मथुरा द्वारा खुली नीलामी (Open Auction) एवं विधिसम्मत प्रक्रिया अपनाए बिना सरकारी भूमि का अवैध रूप से विनिमय (Exchange) किए जाने की प्रक्रिया चलाई जा रही है, जिससे केवल प्रतिवादी संख्या–6 अर्थात सनसिटी अनंतम को अनुचित लाभ पहुँचाया जा रहा है। 

2- यह स्पष्ट नहीं है कि मथुरा-वृंदावन नगर निगम द्वारा अत्यंत मूल्यवान सरकारी भूमि को बिना किसी खुली बोली, पारदर्शी प्रक्रिया एवं वास्तविक बाजार मूल्यांकन के प्रतिवादी संख्या–6 को क्यों दिया जा रहा है, जो कि विधि एवं जनहित दोनों के विरुद्ध है इसलिए उसे निजी लाभ हेतु किसी निजी कंपनी को न सौंपा जाए।

3- प्रस्तावित 'अवैध भूमि विनिमय' पूर्णतः जनहित के विरुद्ध है तथा केवल प्रतिवादी संख्या–6 को लाभ पहुँचाने हेतु किया जा रहा है। नगर निगम द्वारा भूमि का मूल्य मात्र ₹10,000 प्रति वर्गमीटर दर्शाया गया है, जबकि प्रतिवादी संख्या–6 उसी क्षेत्र में लगभग ₹85,000 प्रति वर्ग मीटर की दर से प्लॉट विक्रय कर रहा है। यह तथ्य स्वयं अधिकारियों एवं प्रतिवादी संख्या–6 के मध्य भ्रष्टाचार एवं मिलीभगत को प्रदर्शित करता है।

4- संबंधित प्राधिकरण स्वयं स्वीकार कर चुका है कि प्रतिवादी संख्या–6 द्वारा सरकारी भूमि पर बिना अनुमति अवैध निर्माण किया गया है तथा प्रतिवादी संख्या–3 द्वारा प्रतिवादी संख्या–4 को अवैध निर्माण रोकने एवं ध्वस्तीकरण हेतु रिपोर्ट भी भेजी गई, किन्तु प्रतिवादी संख्या–4 द्वारा कोई कार्रवाई नहीं की गई, जो कि विधि एवं नागरिकों के मौलिक अधिकारों के विरुद्ध है।

5- याचिकाकर्ता द्वारा प्रतिवादी संख्या–2, 3, 4 एवं 5 को अनेक शिकायतें प्रस्तुत की गईं, किन्तु किसी भी सक्षम प्राधिकारी द्वारा कोई वैधानिक कार्रवाई नहीं की गई। जबकि भूमि का वास्तविक बाजार मूल्य लगभग ₹1,00,000 प्रति वर्ग मीटर है, तथापि विनिमय मात्र ₹10,000 प्रति वर्ग मीटर की दर से प्रस्तावित किया गया है, जो कि Uttar Pradesh नगर निगम अधिनियम 1916 एवं संविधान के अनुच्छेद 14 एवं 21 का उल्लंघन है।

6- विवादित भूमि सरकारी भूमि है तथा उसका उपयोग जनता की आवश्यक सुविधाओं जैसे विद्यालय, अस्पताल, पार्क एवं अन्य सार्वजनिक उपयोग हेतु किया जाना चाहिए, जो कि संविधान के अनुच्छेद 14 एवं 21 के अंतर्गत प्रदत्त अधिकारों का अभिन्न हिस्सा है।

7- नगर निगम द्वारा उक्त भूमि को जनहित के स्थान पर निजी लाभ हेतु प्रतिवादी संख्या–6 को दिए जाने का प्रयास किया जा रहा है जबकि संबंधित क्षेत्र में पार्क एवं अस्पताल जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव है, अतः उक्त भूमि का उपयोग जनकल्याण हेतु किया जाना न्यायोचित एवं आवश्यक है।

8- उपर्युक्त तथ्यों एवं परिस्थितियों को दृष्टिगत रखते हुए माननीय न्यायालय से विनम्र प्रार्थना है कि कृपया प्रतिवादी संख्या–4 को दिनांक 22.01.2026 की रिपोर्ट/आदेश, जो प्रतिवादी संख्या–3 द्वारा पारित किया गया था, का अनुपालन सुनिश्चित करने हेतु परमादेश (Mandamus) जारी करने की कृपा करें।

9- प्रतिवादी संख्या–1 को माननीय न्यायालय की निगरानी में एक स्वतंत्र समिति गठित कर उक्त अवैध भूमि विनिमय प्रक्रिया की निष्पक्ष जाँच कराने हेतु निर्देशित करने की कृपा करें।

10- प्रतिवादी संख्या–1, 2, 3 एवं 4 को निर्देशित किया जाए कि विवादित सरकारी भूमि का उपयोग जनहित में विद्यालय, कॉलेज, अस्पताल, पार्क अथवा अन्य सार्वजनिक उपयोग हेतु किया जाए।

11- प्रतिवादी संख्या–5 को याचिकाकर्ता की सुरक्षा सुनिश्चित करने तथा प्राप्त शिकायतों पर विधिसम्मत कार्रवाई करने हेतु निर्देशित करने की कृपा करें।

12- माननीय न्यायालय परिस्थितियों के अनुसार जो अन्य उचित आदेश अथवा निर्देश पारित करना उचित समझे, वह भी पारित करने की कृपा करें। 

यहां यह जान लेना बहुत जरूरी है कि सनसिटी अनंतम के पक्ष में अधिकारियों के खुलकर खेलने का यह काम कोई हाल-फिलहाल शुरू नहीं हुआ। यह पिछले कई वर्षों से खेला जा रहा है। इस बीच कई अधिकारी आए, और चले भी गए किंतु सनसिटी अनंतम के मालिकों को लेकर 'समर्पण का भाव' किसी में कम नहीं हुआ क्योंकि इस प्रोजेक्ट का मालिकाना हक जिनके पास है, उनकी तूती कई राज्यों में बोलती है। 

चूंकि आज भी आमजन की आखिरी उम्मीद न्यायपालिका से ही लगी है इसलिए इस मामले में भी अंतत: न्यायपालिका की ही शरण लेनी पड़ी। अब देखना यह है कि 'नजराना' लेकर बैठे अधिकारी 'शुकराना' हासिल करने में सफल होते हैं या फिर अपनी इस लगातार की जा रही हिमाकत का खामियाजा भुगतते हैं। 

-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी


सोमवार, 18 मई 2026

बांके बिहारी के लाइव-स्ट्रीमिंग कॉन्ट्रैक्ट विवाद में सुप्रीम कोर्ट से नोटिस जारी, कमेटी से जवाब तलब


 सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को (आज) W.P.(C) No. 1228/2025 ठाकुर श्री बांके बिहारी जी महाराज मंदिर प्रबंध समिति बनाम श्री बांके बिहारी जी मंदिर हाई पॉवर्ड प्रबंधन समिति एवं अन्य के मामले में दाखिल IA No. 6809/2026 अर्थात हस्तक्षेप/पक्षकार बनाए जाने के आवेदन पर नोटिस जारी किया है। यह मामला 18 मई 2026 को चीफ जस्टिस की कोर्ट के समक्ष आइटम नंबर 48.1 के रूप में सूचीबद्ध था।

यह विवाद वृंदावन स्थित ठाकुर श्री बांके बिहारी जी महाराज मंदिर की लाइव-स्ट्रीमिंग का कॉन्ट्रैक्ट कथित रूप से सुयोग्य मीडिया को अपारदर्शी और अनियमित तरीके से दिए जाने से संबंधित है।
आवेदक अनिल गुप्ता की ओर से उपस्थित अधिवक्ता नरेंद्र कुमार गोस्वामी ने चीफ जस्टिस सूर्यकान्त की अध्यक्षता वाली बेंच के समक्ष प्रस्तुत किया कि कोर्ट-निगरानी में कार्यरत हाई पावर्ड मैनेजमेंट कमेटी द्वारा यह कॉन्ट्रैक्ट कथित रूप से “बैकडोर और पैराशूट एंट्री” के माध्यम से ऐसी संस्था को दिया गया, जिसने न तो कॉन्ट्रैक्ट के लिए आवेदन किया था और न ही पूर्व प्रक्रिया या बैठकों में भाग लिया था।
अधिवक्ता गोस्वामी ने आगे कहा कि आवेदक की आपत्तियों, शिकायतों और आरटीआई आवेदनों का कोई उत्तर नहीं दिया गया जिससे कोर्ट-निगरानी वाली कमेटी की पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं। उन्होंने तर्क दिया कि यह मामला मात्र टेंडर अनियमितता का नहीं, बल्कि न्यायालय-निगरानी में कार्यरत संस्था की संस्थागत पवित्रता और विश्वसनीयता से जुड़ा है।
एक महत्वपूर्ण दलील में अधिवक्ता गोस्वामी ने कहा कि जिस प्रकार से कॉन्ट्रैक्ट प्रदान किया गया, वह कथित रूप से न्यायालय की अपनी प्रक्रिया के साथ धोखाधड़ी के समान है।
आरोपों को गंभीर मानते हुए चीफ जस्टिस सूर्यकान्त ने टिप्पणी की कि “ये आरोप अत्यंत गंभीर प्रकृति के हैं” और राज्य पक्ष की ओर से उपस्थित learned AAG/ASG से इन आरोपों पर जवाब देने को कहा। 
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी करते हुए संबंधित प्रतिवादियों/कमेटी से जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। बेंच ने IA No. 6809/2026 पर एक सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने को कहा।
मामले की अगली सुनवाई अगले सप्ताह होने की संभावना है, जहाँ सुप्रीम कोर्ट लाइव-स्ट्रीमिंग कॉन्ट्रैक्ट से जुड़े आरोपों पर स्पष्ट हलफनामे के माध्यम से स्पष्टीकरण प्राप्त करेगा।
ज्ञात रहे कि यह विवाद अब केवल एक साधारण कॉन्ट्रैक्ट विवाद नहीं रह गया है। सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मूल प्रश्न यह है कि क्या न्यायिक निगरानी में गठित कोई संस्था मंदिर से जुड़े कॉन्ट्रैक्ट को बिना पारदर्शी प्रक्रिया तथा आपत्तियों पर विचार किए बिना और सार्वजनिक जवाबदेही के बगैर इस तरह किसीको भी कॉन्ट्रैक्ट दे सकती है। 

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026

2027 के चुनावों में मोदी-योगी और भाजपा की लुटिया डुबो देंगे ये 'गिरोहबद्ध' प्रशासनिक अधिकारी...

 
 नाथ संप्रदाय से जुड़ी गोरखनाथ पीठ (गोरक्षपीठ) के महंत योगी आदित्यनाथ ने 25 मार्च 2022 को दूसरी बार देश के सबसे बड़े प्रदेश की कमान संभाली थी। इस हिसाब से अगले साल की पहली तिमाही में यूपी विधानसभा के चुनाव तय हैं। 

इस बार के चुनाव मुख्यमंत्री योगी और प्रधानमंत्री मोदी सहित भारतीय जनता पार्टी के लिए भी किसी चुनौती से कम नहीं हैं क्‍योंकि 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा और पीएम मोदी को सबसे बड़ा झटका यूपी ने ही दिया था। इस झटके ने एक ओर जहां 'अबकी आर 400 पार' के नारे की हवा निकाल दी थी, वहीं दूसरी ओर भाजपा को अपने दम पर बहुमत से काफी दूर कर दिया था। 
अब यूपी के चुनावों में लोकसभा चुनावों जैसा कोई झटका न लग जाए इसलिए भाजपा तो चुनावी मोड में आ ही चुकी है, विपक्षी दलों ने भी अपनी राजनीतिक सरगर्मियां बढ़ा दी हैं। 
राजनीति की आंच पर रखी जा चुकी चुनावी हड़िया के पकने में भले ही अभी विलंब हो किंतु उसके तापमान का अंदाज लगाना बहुत मुश्‍किल भी नहीं है, क्योंकि ये तपिश बहुत दूर से महसूस की जा सकती है। लेकिन तब, जबकि पिछली सफलताओं से पाल ली गई गफलत हकीकत का सामना करने में आड़े न आ जाए। 
मथुरा से लगाया जा सकता है इस तपिश का अंदाज 
चार सैकड़ा से अधिक  विधानसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश में कृष्‍ण की पावन जन्मस्थली मथुरा की भागीदारी कहने को तो मात्र 5 सीटों की ही है, किंतु यहां से मिलने वाली हार-जीत का संदेश बहुत बड़ा जाता है। ठीक उसी तरह जिस तरह अयोध्‍या लोकसभा सीट के नतीजे से गया था। उसकी गूंज प्रदेश ही नहीं, देशभर में सुनाई दी थी, और आज भी उसकी प्रतिध्‍वनि सुनाई देती है। 
हड़िया का एक चावल मान सकते हैं मथुरा को 
हड़िया के एक चावल से पूरी हड़िया के चावलों की स्‍थिति का पता लगाने वाली लोकोक्ति का अनुसरण करें तो धार्मिक नगरी मथुरा इसके लिए सर्वाधिक उपयुक्त मानी जा सकती है क्‍योंकि फिलहाल यहां सभी पांचों सीटों पर भाजपा काबिज है। 
यही नहीं, यहां से प्रसिद्ध अभिनेत्री हेमा मालिनी 2024 में भाजपा की टिकट पर तीसरी बार सांसद चुनी गई हैं। यहां की जिला पंचायत से लेकर नगर निगम और कोसी नगर पालिका पर भी भाजपा काबिज है। इस लिहाज से मथुरा को भाजपा का गढ़ कहा जा सकता है परंतु आज यहां की जमीनी हकीकत कुछ और बयां करती है। कुछ ऐसा जो भाजपा को शायद ही हजम हो। 
सत्ताधारी पार्टी के स्‍थानीय अकर्मण्य नेताओं की फौज 
कहने को तो हर जिले की तरह मथुरा में भी कागजों पर भाजपा नेताओं की पूरी फौज दिखाई देती है, लेकिन विभिन्न पदनामों से सुसज्जित ये फौज इतनी अकर्मण्य और नकारा है कि इससे जनहित का कोई काम नहीं किया जाता। निजी स्वार्थ पूरे करने में लिप्त इस फौज के पदलोलुप नेता खुलेआम अधिकारियों की जी हुजूरी करते हैं, और यहां तक कि तलवे चाटते देखे जा सकते हैं। कभी 'पार्टी विद् डिफरेंस' का नारा देने वाली भारतीय जनता पार्टी के अधिकांश स्थानीय नेता और जनप्रतिनिधि इस कदर निकम्मे हैं कि उन्हें जनभावनाओं तक की कोई फिक्र नहीं। सत्तासुख भोगने में व्यस्त इन नेताओं को अब जनसमस्याओं से कोई सरोकार नहीं रह गया। महत्वपूर्ण पद प्राप्त कई भाजपा नेताओं को यदि 'भूमाफिया' भी कहा जाए तो कोई अतिशयोक्‍ति नहीं होगी। अफसरों से इनकी सांठगांठ का ही परिणाम है कि मथुरा जनपद की कोई सरकारी जमीन आज सुरक्षित नहीं है। 
बहुत सी जमीन को इनके 'संरक्षण' और 'परोक्ष हिस्‍सेदारी' के चलते भूमाफिया हड़प चुके हैं। और जो शेष हैं, उन्‍हें भी किसी न किसी बहाने हड़पने की तैयारी है। इसे यूं भी कहा जा सकता है सत्‍ताधारी दल के नेता और भ्रष्‍ट अधिकारियों की जुगलबंदी ने मथुरा की हर समस्या को सुरसा के मुंह की तरह विकराल बना दिया है क्‍योंकि उनके पास इन समस्‍याओं को देखने की फुर्सत ही नहीं है। 
यही कारण है कि वर्षों बीत जाने के बावजूद न तो यहां यातायात व्यवस्था दुरुस्त हो पा रही है और न भीड़ को नियंत्रित करने का कोई रास्ता निकाला गया है। यमुना कब तक प्रदूषण मुक्त हो पाएगी, इस सवाल को यदि छोड़ भी दिया जाए तो बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया है कि 'अधिकारियों की बेशर्मी' से बढ़ रहे 'कालिंदी के कलुष' को कैसे रोका जाए? 
यमुना को प्रदूषण से मुक्त रखने के लिए उपलब्ध साधन और संसाधन भ्रष्‍टाचार की भेंट चढ़ चुके हैं। इस संबध में हाई कोर्ट से लेकर एनजीटी तथा सुप्रीम कोर्ट से लेकर शासन स्तर से दिए गए सभी आदेश-निर्देश फाइलों की धूल फांक रहे हैं। 
कहने को तो मथुरा में उस 'तीर्थ विकास परिषद' के उपाध्यक्ष भी अपने आलीशान ऑफिस में बैठते हैं जिसके अध्‍यक्ष स्‍वयं सीएम योगी हैं, किंतु मोक्षदायिनी की संज्ञा प्राप्‍त सप्तपुरियों में शामिल तीर्थ नगरी मथुरा का 'तीर्थ विकास परिषद' ने कितना विकास किया है, इससे कोई अनभिज्ञ नहीं है। 
गिरोहबद्ध अधिकारी और उनका भ्रष्‍टाचार मथुरा के विकास में सबसे बड़ी बाधा
कड़वा सच तो यह है कि मथुरा में पिछले कई वर्षों से प्रशासनिक अधिकारियों का एक ऐसा गिरोह तैनात है जिसने भ्रष्‍टाचार की सारी हदें पार कर रखी हैं। चूंकि भ्रष्‍ट अधिकारियों के लिए मथुरा के भाजपा नेताओं की 'नीयत और नीति' खाद-पानी का काम करती है और वह इस जिले को उनके लिए सबसे मुफीद बनाती है इसलिए वो बार-बार यहीं लौट कर आ जाते हैं। 
समय के साथ उनका पद नाम भले ही बदल जाए किंतु मथुरा में तैनाती पाने की उनकी मंशा कभी नहीं बदलती। आज जिला स्तर पर ही नहीं, आगरा मंडल स्‍तर पर भी ऐसे अधिकारी तैनात हैं जिनकी अफसरशाही का एक बड़ा दौर इस धर्म नगरी में बीत गया। आज वो चाहे अवकाश पाने के निकट हों किंतु मथुरा से अधिकतम लूट कर ले जाने की उनकी ख्वाहिश बराबर बनी हुई है। 
मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण, मथुरा-वृंदावन नगर निगम, लोकनिर्माण विभाग, बिजली विभाग, जल निगम, सरकारी अस्पताल, सब रजिस्‍ट्रार कार्यालय तथा एआरटीओ सहित दर्जनों सरकारी विभाग ऐसे हैं जिन्होंने पुलिस में व्‍याप्त भ्रष्टाचार को भी बहुत पीछे छोड़ दिया है। 
इन विभागों की यह स्‍थिति कमोबेश पूरे प्रदेश में एक जैसी है। मथुरा उसका एक बड़ा उदाहरण भले ही है, लेकिन बहुत ज्यादा अंतर दूसरे जिलों में भी नहीं है। 
इसमें कोई दो राय नहीं कि मुलायम सिंह और अखिलेश यादव की सरकारों में सपा कार्यकर्ताओं को लूट का लाइसेंस मिला हुआ था और अधिकारी भी बेलगाम थे, परंतु भाजपा की सीएम योगी के नेतृत्व वाली सरकार भी यदि भ्रष्‍टाचार के मामले में जीरो टॉलरेंस का मात्र ढिंढोरा पीटने तक सीमित रह जाए और 'जीरो टॉलरेंस' को आड़ बनाकर अधिकारी एवं नेता अपनी अवैध कमाई के खजाने में 'जीरो' बढ़ाते चले जाएं तो दोनों में कोई बहुत अंतर नहीं रह जाता। 
शेष समय में सख्‍ती नहीं बरती तो नतीजे 2024 के लोकसभा चुनावों जैसे 
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि अब जबकि यूपी के विधानसभा चुनावों में कुछ महीने ही शेष हैं, योगी सरकार ने भ्रष्‍ट अफसरों एवं पार्टीजनों को चिन्हित कर उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं की तो परिणाम चौंकाने वाले हो सकते हैं। यदि ये भी मान लिया जाए कि योगी-मोदी का मैजिक अभी कायम है तो भी भ्रष्‍टाचार से आजिज जनता स्‍पष्ट बहुमत से दूर तो ले ही जा सकती है। 
यूपी विधानसभा चुनावों का हश्र भी 2024 के लोकसभा चुनावों जैसा न हो, इसके लिए जरूरी है कि योगी सरकार मथुरा से ऐसे भ्रष्‍ट अधिकारियों एवं नेताओं के खिलाफ कार्रवाई की शुरूआत करे जो 'कुंडली' मारे बैठे हैं और जनता के बीच पार्टी की छवि को दिन-प्रतिदिन धूमिल कर रहे हैं। 
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

 

शनिवार, 11 अप्रैल 2026

एक सवाल योगी जी से: वृंदावन में कल 10 जानें जाने का जिम्मेदार कौन, क्या होगा किसी पर कोई एक्शन?


 योगीराज भगवान कृष्ण की क्रीड़ास्थली वृंदावन में कल 10 जानें अकाल मृत्यु का शिकार हो गईं। पलक झपकते ही पंजाब के 10 तीर्थयात्री काल के गाल में समा गए, लेकिन घटना के 24 घंटे बाद तक जिला प्रशासन यही बताने की स्थिति में नहीं है कि आखिर इस हृदय विदारक मोटर बोट हादसे का जिम्मेदार है कौन, किसके नकारापन ने एक साथ 10 लोगों की जिंदगियां छीन लीं।  

चूंकि वृंदावन सहित समूचे मथुरा जनपद में प्रतिदिन लाखों तीर्थयात्री आते हैं इसलिए लोगों का यह जान लेना जरूरी है कि यदि आप यहां आ रहे हैं तो आपकी सुरक्षा की जिम्मेदारी भी आपकी ही है। 

कहने को इस विश्व प्रसिद्ध धार्मिक स्थल पर यात्रियों की सुख-सुविधा के लिए अनेक सरकारी इंतजामात का ढिंढोरा पीटा जाता है, हर आयोजन-प्रायोजन तथा तीज-त्यौहार एवं विशेष पर्वों पर अधिकारियों का लाव-लश्कर भी नजर आता है किंतु चलता सब रामभरोसे ही है क्योंकि धर्म की आड़ में अधर्म का जैसा नंगा नाच मथुरा में होता है, वैसा शायद ही कहीं और देखने को मिले।

See The video link here: 

https://www.youtube.com/shorts/UrYhV5TSIWM

दुख और अफसोस की बात यह है कि इस धार्मिक जनपद में पर्यटन के लिए आने वाले उच्च अधिकारी भी किसी प्रश्न का जवाब देने को तैयार नहीं हैं। यहां तैनात अधिकारी शायद इसलिए बेलगाम हैं क्यों कि दर्जनों बार मथुरा के विभिन्न स्थानों का अलग-अलग मौकों पर दौरा कर चुके सीएम योगी आदित्यनाथ ने एक बार भी न तो मीडिया से मुलाकात करना जरूरी समझा और न किसी अन्य सूत्रों से यह जानने की कोशिश की कि यहां तैनात अधिकारियों को लेकर आमजन क्या विचार रखता है। 

इसीलिए अब सीधा सवाल सूबे के सीएम योगी से क्योंकि एक झटके में 10 जिंदगियां जाने के बावजूद मथुरा में तैनात अधिकारी, लापरवाही का ठीकरा एक-दूसरे के सिर फोड़ने में व्यस्त हैं। 

इन फैक्‍ट, वो यमुना में सैकड़ों मोटर बोट... चप्पू नाव तथा स्‍टीमर के अवैध संचालन तक की जिम्मेदारी शासन की कार्यप्रणाली पर डाल रहे हैं जबकि यमुना में इनका अवैध संचालन उनकी तिजोरियां भर रहा है। 

कल जब इस बारे में मीडिया ने नगर निगम के अधिकारियों से बात की तो उनकी बेशर्मी का आलम यह था कि वो इनके अवैध संचालन को स्वीकार करते हुए भी ढाई महीने पहले प्रयागराज भेजे गए उस गजट का हवाला दे रहे थे जो नावों के संचालन हेतु लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया का हिस्सा है। 

क्या सीएम योगी यह बताएंगे कि बिना लाइसेंस यमुना में चल रही सैकड़ों नावों के खिलाफ जिम्मेदार अधिकारियों ने कभी कोई एक्शन क्यों नहीं लिया? 

विभिन्न मौकों पर अधिकारी इन्हीं अवैध मोटर बोटों में खुद कैसे भ्रमण करते रहे हैं, और क्यों किसी आमजन के लिए लाइफ जैकेट जरूरी नहीं की गई, क्या उसके लिए भी किसी गजट की दरकार है या आम आदमी की जिंदगी का अधिकारियों की दृष्टि में कोई मोल है ही नहीं? 

किसी को भी यह जानकार आश्‍चर्य हो सकता है कि मथुरा-वृंदावन में अवैध रुप से चल रही इन नावों पर उनके संचालकों ने लोगों को आकर्षित करने के लिए बाकायदा सेल्फी प्‍वाइंट तक बना रखे हैं और उनका उपयोग ऊट-पटांग हरकतों के साथ बिना लाइफ जैकेट पहने बेखौफ किया जाता है क्योंकि न कोई रोकने वाला है और न टोकने वाला। 

कृष्‍ण की नगरी में आने वाले अधिकांश अधिकारी कहने को अपनी तैनाती के पहले दिन से तो धार्मिक चोला ओढ़ लेते हैं, किंतु उनकी गिद्ध दृष्टि हर समय अधिक से अधिक अतिरिक्त कमाई के स्‍त्रोत ढूंढने में लगी रहती है। अवैध रुप से संचालित नावें भी उनमें से एक हैं। 

यह भी मान सकते हैं उत्तर प्रदेश में मथुरा जनपद की तैनाती किसी भी अधिकारी के लिए उसकी सर्विस का स्‍वर्णिम काल साबित होता है। यही कारण है कि कार्यकाल के दौरान ही नहीं, रिटायरमेंट के बाद भी कोई अधिकारी मथुरा को छोड़ना नहीं चाहता। वह किसी न किसी रूप में यहीं बने रहना चाहता है। आज भी कई अधिकारी उसका प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। चाहे बांके बिहारी मंदिर की भीड़ में कोई दबकर मरे, या नाव दुर्घटना में किसी का पूरा परिवार समाप्त हो जाए, अधिकारियों को फर्क नहीं पड़ता। फर्क पड़ता तो इतनी दर्दनाक दुर्घटना के जवाब ऐसे बेदर्द नहीं होते। 

योगी जी, मथुरा बेशक एक विश्व प्रसिद्ध धार्मिक नगरी है लेकिन किसी भी अधर्म के लिए धर्म एक बड़ी आड़ का काम करता है इसलिए कृपया करके यहां हो रहे अधर्म तथा उसे संरक्षण देने वाले अधिकारियों की करतूतों पर भी गौर कीजिए ताकि फिर किसी की नाव इस तरह न डूबे और इस तरह इतने लोग अकाल मृत्यु का शिकार न बनें। 

-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी  

बुधवार, 11 मार्च 2026

विस्फोटक खुलासा: माफिया ने करोड़ों की सरकारी जमीन का कर दिया सौदा, नगर निगम अब केवल कागजों पर काबिज

 


 माफिया ने करोड़ों की सरकारी जमीन पर केवल कब्जा ही नहीं किया, बल्कि उसका कई हिस्‍सों में सौदा भी कर दिया और नगर निगम मथुरा-वृंदावन अब तक अपनी इस जमीन पर किए गए अवैध निर्माण को ध्वस्त कराने की दिखावटी कोशिश में लगा है ताकि लैंड एक्सचेंज के लिए लाए गए प्रस्ताव की पेशगी का हक अदा किया जा सके। 

वृंदावन के छटीकरा रोड पर स्‍थित सनसिटी अनंतम के लिए नगर निगम मथुरा-वृंदावन की बोर्ड बैठक में बार-बार लैंड एक्सचेंज का लाया गया प्रस्ताव भले ही अभी पास नहीं हुआ हो परंतु बिल्डर के रूप में सक्रिय माफिया ने न सिर्फ सरकारी जमीन पर कब्जा कर लिया बल्‍कि उसका सौदा भी कर दिया। 
बिल्डर के इस दुस्साहस का खुलासा तब हुआ जब सत्ताधारी दल भाजपा के ही कई निगम पार्षदों ने विभिन्न स्तर पर इसकी शिकायत की और सरकारी जमीन को खुर्द-बुर्द करने की जांच कराने के साथ इसके लिए जिम्मेदार पदाधिकारियों पर एक्शन लेने की मांग कर डाली। 
पार्षदों की मानें तो सनसिटी अनंतम के हक में लैंड एक्सचेंज का प्रस्ताव पास कराने पर नगर निगम मथुरा-वृंदावन इस कदर आमादा है कि अब उसके लिए दूसरी फर्मों के नाम का उपयोग किए जाने की तैयारी है जिससे सांप मर जाए और लाठी भी न टूटे। 
किन-किन भाजपा पार्षदों ने की है शिकायत? 
इस संबंध में एक शिकायत तो वार्ड नंबर 37 के भाजपा पार्षद राजीव कुमार सिंह ने 20 जनवरी 2026 को प्रदेश के नगर विकास मंत्री से की है। भाजपा पार्षद ने मंत्री महोदय को लिखा है कि नगर निगम मथुरा-वृंदावन के अंतर्गत सनसिटी अनंतम के लिए लैंड एक्सचेंज का प्रस्‍ताव पास हुए बिना सरकारी जमीनों का विक्रय तथा उन पर विकास कार्य करने एवं अन्य फर्जी कंपनियों का समावेश करने की तत्काल जांच कराकर प्रभावी कार्रवाई की जाए।  
भाजपा पार्षद ने लिखा है कि कृपया कार्यकारिणी की बैठक दिनांक 28.09.2022 के प्रस्ताव संख्‍या 9 एवं बोर्ड बैठक 15.11.2022 के प्रस्ताव संख्‍या 12 का अवलोकन करें जिसमें सनसिटी हाईटेक और उसकी सहायक कंपनी मै. अश्वमेघा कॉलोनाइजर्स का नाम सुनिश्‍चित किया गया था किंतु बोर्ड बैठक दिनांक 09.10.2025 के प्रस्ताव संख्‍या 2 को देखें तो उसमें सनसिटी हाईटेक प्रा. लि. के अलावा अक्षज रियलटर्स प्रा. लि. एवं सनसिटी इन्‍फ्रा रियलटर्स प्रा. लि. व सनसिटी प्रॉजेक्ट्स जैसी नई कंपनियों के नाम जोड़ दिए गए। 
तीन वर्ष पहले के प्रस्ताव में जहां मुख्‍य कंपनी की मात्र एक सहायक कंपनी थी, वहीं 2025 के प्रस्ताव में मुख्‍य कंपनी का बदल जाना और तीन नई कंपनियों का उदय हो जाना जाहिर कराता है कि इस सबके पीछे सरकारी जमीन को हस्तांतरित करने की कोई बड़ी साजिश रची जा रही है। 
भाजपा पार्षद राजीव कुमार सिंह ने अपने शिकायती पत्र में सवाल उठाया है कि अभी जबकि लैंड एक्सचेंज का प्रस्ताव पास ही नहीं हुआ तो सनसिटी अनंतम ने कैसे तो निगम की जमीन पर निर्माण कार्य शुरू कराया और कैसे उस जमीन का सौदा किया? 
राजीव कुमार सिंह के इस शिकायती पत्र पर वार्ड नंबर 16 के पार्षद गुलशन, गऊघाट क्षेत्र की पार्षद नीलम गोयल, वार्ड नंबर 31 के पार्षद मुन्ना मलिक तथा वार्ड नंबर 68 के पार्षद  कुलदीप पाठक ने भी हस्ताक्षर किए हैं। 
इसी संदर्भ में एक अन्य शिकायत वार्ड नंबर 17 के पार्षद ब्रजेश खरे ने मंडलायुक्त (आगरा मंडल) से की है। जिस पर वार्ड नंबर 56 के पार्षद कुंजबिहारी भारद्वाज, वार्ड नंबर 60 के पार्षद नीरज वशिष्‍ठ, वार्ड नंबर 46 के पार्षद चौधरी राजवीर सिंह ने भी अपने हस्ताक्षर किए हैं। 
इस पत्र में पार्षदों ने अवगत कराया है कि नगर निगम मथुरा-वृंदावन की दिनांक 09.10.2025 को संपन्न हुई बोर्ड बैठक प्रस्‍ताव संख्‍या 03 के द्वारा द्वारिकादास जीवराजका मैमोरियल ट्रस्ट एवं हरिनिवास खेतान मैमोरियल ट्रस्ट के हाउसिंग प्रोजेक्ट के लिए तथ्‍यों को छिपाकर नगर निगम की बेशकीमती जमीन को लैंड एक्सचेंज के नाम पर खुर्द-बुर्द किया गया है जिसकी उच्‍च स्‍तरीय जांच कराना अत्यंत आवश्‍यक है। 
इन पार्षदगणों ने स्‍पष्‍ट तौर पर लिखा है कि इस प्रक्रिया के तहत निगम की जमीन और उसके बदले निगम को मिलने वाली जमीन के दामों में 'जमीन-आसमान' का अंतर है जिससे प्रतीत होता है कि सारा खेल किसी खास मकसद से तथा निजी स्‍वार्थों की पूर्ति के लिए खेला जा रहा है। वो भी तब जबकि प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साफ-साफ निर्देश हैं कि निकायों की जमीन संरक्षित की जाए और उन जमीनों पर आय के स्‍त्रोत विकसित कर नगर निगमों को आमनिर्भर बनाए जाए। 
यमुना के प्रदूषण की मुक्ति के नाम पर भी बड़ा घोटाला किए जाने की तैयारी में है नगर निगम मथुरा-वृंदावन 
इस सबके अलावा नगर निगम मथुरा-वृंदावन यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने के नाम पर भी एक और बड़ा घोटाला करने की तैयारी में है। 
न‍िगम के ही सूत्रों से प्राप्‍त जानकारी के अनुसार इसके लिए 'वेल्‍युसेंट फाउंडेशन' (Valucent Foundation) नाम की किसी संस्‍था या फर्म के साथ निगम ने पिछले महीने बाकायदा एक एमओयू भी साइन किया है जिससे सब-कुछ जायज ठहराया जा सके लेकिन निगम की नीयत में खोट का अंदाज इस बात से ही लगाया जा सकता है कि निगम ने न तो अब तक इस एमओयू को सार्वजनिक किया है और न इसके बारे में निगम का कोई अधिकारी या कर्मचारी मुंह खोलने को तैयार है। यहां तक कि पार्षद भी इसकी पूरी जानकारी पाने में अब तक सफल नहीं हुए हैं। 
सूत्रों का कहना है कि इसी महीने होने वाली बोर्ड बैठक में इसका भी प्रस्‍ताव पास कराने की कोशिश की जाएगी क्योंकि सनसिटी अनंतम की तरह निगम इसमें अपनी छीछालेदर नहीं कराना चाहता। 
जो भी हो, इतना तो तय है कि नगर निगम में व्‍याप्त भ्रष्टाचार, मथुरा को लेकर इस लोकोक्‍ति को सार्थक जरूर करता है कि 'मथुरा तीन लोक से न्‍यारी'। 
क्‍योंकि दर्जनों बार मथुरा आ चुके सूबे के ईमानदार सीएम योगी आदित्यनाथ को न तो अब तक यहां के भ्रष्‍टाचार की भनक लगी है और न अपनी ही पार्टी के पार्षदों के शिकायती पत्रों का संज्ञान लिया गया है। 
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

 

बुधवार, 25 फ़रवरी 2026

हाईटेक प्रोजेक्ट सनसिटी अनंतम के अंत का आगाज़: कोर्ट ने रद्द किया करोड़ों का बैनामा, NEXUS का भी खुलासा


 वृंदावन में प्राइम लोकेशन पर बन रहे हाईटेक रियल एस्‍टेट प्रोजेक्ट सनसिटी अनंतम के अंत का आगाज़ उस समय होता हुआ दिखाई दिया जब न्‍यायालय अपर जिला न्‍यायाधीश श्रीमती नीलम ढाका ने इस प्रोजेक्‍ट के कई बैनामे रद्द कर दिए और जबरन कराए गए इन बैनामों को प्रशासन और बिल्डर के NEXUS का नतीजा माना। 

23 फरवरी 2026 को किए गए इस आदेश में साफ-साफ लिखा है कि न्‍यायालय ने इस पूरे मामले में राज्य के तंत्र और बिल्डर के बीच स्पष्‍ट तौर पर गठजोड़ पाया। बिल्डर के पास अधिग्रहण की अधिसूचना से पहले कोई भूमि थी ही नहीं, और वह सरकारी कार्रवाई की वजह से ही इस प्रक्रिया में शामिल हुआ। 
सरकारी तंत्र ने अधिग्रहण के अपने अधिकारों का दुरुपयोग कर किसानों की जमीन बिल्डर को हस्तांतरित कर दी जो सीधे-सीधे सार्वजनिक न्यास सिद्धांत तथा संविधान के अनुच्‍छेद 14, 12 तथा 300-A का उल्लंघन है जबकि सिद्धांत कहता है कि जो काम सीधे नहीं किया जा सकता, वह अप्रत्यक्ष रूप से करना भी संभव नहीं है। 
कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी टिप्‍पणी की कि अधिग्रहण की अधिसूचना जारी होने के बाद किसान फंस गए क्‍योंकि वह फिर अपनी जमीन किसी और को बेच नहीं सकते थे। बिल्डर ने उनकी इस दयनीय स्‍थिति का लाभ उठाकर उन्हें ऐसा प्रस्ताव दिया जो सरकारी मुआवजे से बेहतर तो प्रतीत होता था किंतु वह बाध्यकारी तथा अन्यायपूर्ण था। 
कोर्ट ने इस दौरान Land Acquisition Act 1894 के अंतर्गत अधिग्रहण की चरणबद्ध प्रक्रिया का उल्लेख किया और बताया कि कैसे इस मामले में धारा 17 के आपातकालीन प्रावधानों का दुरुपयोग किया गया और किसानों को उनके आपत्ति दर्ज कराने के अधिकार से भी वंचित कर दिया। 
अदालत ने सनसिटी द्वारा किए गए उस दावे की भी जांच की जिसमें हाईटेक टाउनशिप नीति के अंतर्गत छूट का हवाला दिया गया था, लेकिन हाईटेक टाउनशिप नीति तो वर्ष 2010 में ही समाप्‍त कर दी गई थी। 
कोर्ट ने अपने निर्णय में क्या-क्या लिखा 
 निचली अदालत का निर्णय दिनांक 18.12.2018 तथा डिक्री दिनांक 10.01.2019 निरस्त किए जाते हैं।
✅ विक्रय विलेख (बैनामा) दिनांक 11.01.2007— उप-पंजीयक कार्यालय, मथुरा में पंजीकृत — रद्द किया जाता है तथा शून्य एवं अमान्य घोषित किया जाता है।
✅ अपीलकर्ताओं/किसानों के पक्ष में स्थायी निषेधाज्ञा जारी की जाती है — Suncity (प्रतिवादी संख्या 1) और उसके एजेंट खसरा संख्या 393, क्षेत्रफल 7.486 हेक्टेयर, छटीकरा, मथुरा पर निर्माण या हस्तांतरण नहीं कर सकते।
✅ अपीलकर्ताओं को यह विकल्प दिया जाता है कि वे Suncity से प्राप्त विक्रय राशि (₹2,65,00,000) 6 माह के भीतर वापस करें तथा प्रतिवादी इसे स्वीकार करें।
करीब 14 वर्षों से अधिक समय तक चले वाद-विवाद के बाद अपीलीय न्यायालय ने निचली अदालत के निर्णय को पलटते हुए धोखाधड़ीपूर्ण विक्रय विलेख को निरस्त कर दिया तथा बिल्डर को उनकी भूमि पर किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप करने से स्थायी रूप से रोक दिया। न्यायालय ने माना कि पूरा लेनदेन सरकार और बिल्डर की मिलीभगत, मिथ्या प्रतिरूपण तथा भूमि अधिग्रहण शक्तियों के दुरुपयोग का परिणाम था। 
छटीकरा स्‍थित गरुण गोविंद मंदिर के सामने खसरा नंबर 393 की 7.4860 हेक्‍टेयर जमीन के लिए 14 वर्ष से लड़ाई लड़ रहा सेंगर परिवार न्‍याय मिलने पर बहुत खुश है। 
गौरतलब है कि सनसिटी अनंतम के लिए ऐसा ही प्रयास जिला प्रशासन के पत्र पर नगर निगम मथुरा-वृंदावन द्वारा किया जा रहा है, हालांकि कई प्रयासों के बाद अभी तक लेंड एक्सचेंज का प्रस्‍ताव पास नहीं हो सका लेकिन कोशिश जारी है।   
-Legend News
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