सोमवार, 17 अगस्त 2026

मियां नसीरुद्दीन! इतना भी न उबलिए कि कब्र तक नसीब न हो, और जाते-जाते काफ़िर साबित हो जाएं


 पाकिस्तान के मशहूर शायर सलमान हैदर की एक कविता ‘मैं भी काफ़िर, तू भी काफ़िर’ इन दिनों चर्चा का विषय बनी हुई है। यूं तो यह कविता बहुत लंबी है लेकिन इसकी कुछ लाइनें इस प्रकार हैं- 

सुर भी काफ़िर, ताल भी काफ़िर, भांगड़ा, नाच, धमाल भी काफ़िर । 
वारिस शाह की हीर भी काफ़िर, चाहत की जंजीर भी काफ़िर ।। 
हंसना-रोना कुफ्र का सौदा, कला और कलाकार भी काफ़िर । 
जो मेरी धमकी न छापे, वह सारे अखबार भी काफ़िर ।।
मंदिर में तो बुत होता है, मस्जिद का भी हाल बुरा है ।
कुछ मस्जिद के बाहर काफ़िर, कुछ मस्जिद के अंदर काफ़िर ।। 

नसीर मियां, सलमान हैदर की इस कविता को गौर से पढ़ेंगे तो पता लगेगा कि आप तो पैदायशी काफ़िर हैं, लेकिन हम ऐसा नहीं मानते। 
बहरहाल, इस समय मुद्दा कुछ और है इसलिए बात उस पर कर ली जाए। 
बात कुछ ऐसी है कि हाल ही में आपने कॉकरोचों के आंदोलन की आड़ लेकर अपनी बुरी सी शक्ल में एक वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट किया है। 
इस वीडियो में आप कह रहे हैं कि ''अगर एक जाहिल इस मुल्क की रहनुमाई करे तो उसका दिल यही चाहेगा कि पूरा मुल्क उसी की तरह जाहिल, नासमझ, नाकाबिल और बेरहम बने। इस वक्त मेरा दिल भी भरा हुआ है और मैं गुस्से से खौल गया हूं ये देखकर कि हमारे बच्‍चों के साथ किस तरह जुल्म का बर्ताव किया जा रहा है गुंडों के हाथों। कभी ये भी सोचा करो कि तुम्‍हारा अंजाम तुम्हें भी एक दिन मिलेगा जरूर। इस मुल्क की हुकूमत को मैं सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि सब याद रखा जाएगा...'' 
ठहरिए मियां, अपनी उम्र और हालात पर तरस खाइए। इतना मत उबलिए कि जलकर ख़ाक हो जाएं क्योंकि आपका धर्म आपको ख़ाक हो जाने की इजाजत नहीं देता। आपको तो कब्र में लेटाया जाएगा। और यदि आप इसी तरह गुस्से से उबल-उबल कर किसी दिन मिट्टी में मिल गए तो आप जाते-जाते काफ़िर साबित हो जाएंगे। जो शायद न आपके लिए ठीक होगा, और न आपकी कौम के लिए। 
कौम से मतलब किसी धर्म विशेष से नहीं है, उस जमात से है जिसे निजी स्वार्थों की पूर्ति में बाधक बनने वाला हर व्यक्ति ज़ालिम और जाहिल नजर आता है और वो उसके विरोध में इतनी उतावली तथा अंधी हो जाती है कि देश के साथ गद्दारी पर उतर आती है। 
खैर, चिंता इस बात की है कि अगर आप ख़ाक हो गए तो जन्नत की बजाय जहन्नुम नसीब होगा। ऐसे में आपकी अपनी कौम के प्रति ये वफादारी किसी काम नहीं आएगी। कब्र में पैर लटकाए बैठे हो इसलिए फिर कोई ऐसा वीडियो अपलोड करने से पहले सोचना जरूर। 
और आपके मुताबिक जहां तक सवाल एक जाहिल द्वारा मुल्क की रहनुमाई करने का है तो मुझे लगता है कि सबसे बड़े जाहिल आप खुद हैं, क्योंकि आप जाहिल की परिभाषा ही नहीं जानते। यदि आप कागज के टुकड़ों यानी किसी डिग्री से किसी की योग्यता का आंकलन करते हैं तो तय है कि आप बुद्धि से कतई पैदल हैं। 
आप रहीम और रसखान से लेकर ताजबीबी तथा सूर, कबीर एवं तुलसी दास से लेकर कुंभन दास तक पर सवालिया निशान लगा रहे हैं। मियां जरा बताइए तो कि ये विभूतियां किस कॉलेज, यूनिवर्सिटी, गुरुकुल या विश्वविद्यालय में पढ़ी थीं। 
इन्हें भी छोड़ दीजिए। यह बताइए कि जिस अकबर को आप महान बताते-बताते थकते नहीं हैं, वो कितना शिक्षित था। वो तो अंगूठा छाप था, और बमुश्‍किल अपने नाम का पहला अक्षर लिखना सीख पाया था। जाहिर है मियां कि एजुकेशन और क्वालिफिकेशन दोनों अलग-अलग हैं। कागज के टुकड़ों पर मिली डिग्री किसी को पढ़ा-लिखा तो साबित कर सकती है लेकिन शिक्षित नहीं। जैसे आप पढ़े-लिखे चाहे जितने हों लेकिन माफ कीजिए, शिक्षित नहीं हैं। 
इस तरह देखा जाए तो सही मायनों में जाहिल आप तथा आपके वो 'कथित बच्चे हैं' जिनके लिए आप गुस्‍से से उबल रहे हैं और जो अपने बाप-दादा की उम्र के प्रधानमंत्री को कैमरे के सामने मां-बहन की गालियां दे रहे हैं, परंतु आपके दुर्भाग्य तथा करोड़ों लोगों के सौभाग्य से फिलहाल तो वो शख्‍स देश की रहनुमाई कर ही रहा है। उम्मीद है कि आगे भी करता रहेगा। इसलिए सब याद रखने की जो धमकी आप उसे दे रहे हैं, जो सपने आप उसके अंजाम को लेकर देख रहे हैं, वो आपको 'दोजख' मिलने तक पूरे नहीं होने के। 
वैसे मियां नसरू, एक बात तो बताइए कि क्या बीए पास कोई आदमी सर्जन बन सकता है। मतलब कि क्या वो सर्जरी कर सकता है, नहीं न! 
तो आपके हिसाब से देश के जितने नेता और उनके राजनीतिक वारिस बने बैठे हैं, वो सब भी जाहिल हुए क्योंकि उनकी पढ़ाई-लिखाई चाहे जिस विषय में हुई हो, राजनीति शास्त्र में तो नहीं हुई। ऐसे उत्तराधिकारियों की लिस्ट इतनी लंबी है कि गिनाने बैठे तो बहुत समय जाया हो जाएगा। 
और हां, आपने अपने इस वीडियो में यह भी बताया है कि आप राष्‍ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) तथा पूना फिल्म इंस्‍टीट्यूट से अभिनय सीखकर आए थे। आपकी कुछ फिल्में मैंने भी देखी हैं। लगता था कि आप अच्छे अभिनेता हैं। लेकिन अब मेरी यह धारणा बदल गई है। आपके इस ताजा वीडियो को देखकर तो लगता है कि दो-दो प्रतिष्‍ठित संस्थाओं से पढ़कर आने के बावजूद आप जाहिल के जाहिल ही रहे। आपने लिखा-पढ़ी में यहां से सर्टिफिकेट तो ले लिए लेकिन अभिनय नहीं सीख पाए। अभिनय से आपका दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है। अभिनय सीखे होते और काबिल अभिनेता होते तो इस तरह अपने गुस्से का इजहार न करते। आपकी तो अभिनय की पूरी पढ़ाई मिट्टी में मिल गई, क्योंकि आपने देश तथा देश के प्रधानमंत्री को लेकर अपने मन में पाल रखी घृणा को सार्वजनिक कर दिया। ठीक उन कॉकरोचों की तरह जो जंतर-मंतर पर इकठ्ठा हुए थे, और जिनके लिए आप उबल रहे हैं। उम्र का लिहाज कीजिए। खून में इतना उबाल किसी लिहाज से आपके लिए ठीक नहीं है। वैसे आपसे ये उम्मीद तो नहीं है कि इतनी गूढ़ बातें आपके पल्ले पड़ेंगी, फिर भी कह दी हैं ताकि सनद रहें और वक्त जरूरत काम आएं। आमीन! 
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

रविवार, 12 जुलाई 2026

देश के सबसे बड़े 'ठग' का नाम है मुकेश अंबानी, Jio Fiber के जरिए हर दिन करते हैं करोड़ों की ठगी


 सामान्यत: किसी को भी यह जानकर झटका लग सकता है कि एशिया ही नहीं,  दुनियाभर के प्रमुख उद्योगपतियों में शुमार रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (RIL) के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक मुकेश अंबानी देश के सबसे बड़े 'ठग' भी हैं क्योंकि वो Jio Fiber के जरिए हर दिन अपने उपभोक्ताओं से करोड़ों रुपए की 'ठगी' करते हैं। 

यूं तो किसी भी आम व्यक्ति के साथ ठगी का ये खेल उसी दिन शुरू हो जाता है जिस दिन वह Jio Fiber का कनेक्शन लेने की प्रक्रिया शुरू करता है, किंतु उसे असली ठगी का अहसास तब होता है जब वो कुछ महीने अथवा कुछ सालों तक Jio Fiber का इस्तेमाल करता है। 
सबसे पहले 5G की स्‍पीड के नाम पर ठगी 
आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि आम आदमी को Jio Fiber उसी दिन से ठगना प्रारंभ कर देता है जब वो कनेक्शन प्रोवाइड कराने की प्रक्रिया के तहत यह बताता है उसके इंटरनेट की स्‍पीड 5G है और वो अधिकतम 1 Gbps (1000 Mbps) तक की तथा न्यूनतम 30 Mbps (मेगाबाइट प्रति सेकंड) की स्पीड प्रदान करता है जबकि यह सबसे बड़ा झूठ है। न तो वह किसी भी उपभोक्ता को अपनी अधिकतम स्पीड उपलब्ध करा पाता है और न न्यूनतम। 
कनेक्शन लेने के बाद जब Jio से इसकी शिकायत की जाती है तो वह अनेक ऐसी तकनीकी खामियां गिना देता है जो शायद ही कोई उपभोक्ता कभी पूरी कर सके, हालांकि कनेक्शन लगाने तक पूरी स्पीड देने का 'दावा' किया जाता है। 
उदाहरण के लिए स्‍पीड कम आने की शिकायत पर Jio के 'कर्मचारी या एजेंट' आपको बताएंगे कि दीवारों, उपकरणों और दूरी अधिक होने के कारण स्पीड थोड़ी कम हो सकती है। नेटवर्क जाम है, राउटर गलत जगह रखा है, अथवा आपके बहुत सारे डिवाइस एक ही राउटर से कनेक्ट हैं। ये सब बातें उपभोक्ता को कनेक्शन लेते समय नहीं बताई जातीं। यहां तक कि ये भी नहीं बताया जाता कि तकनीकी तौर पर आप सर्वाधिक बेहतर स्‍पीड किस तरह पा सकते हैं, या राउटर इंस्टॉल करने की सबसे उपयुक्त जगह कौन सी होगी। 
एक और बहाना: आपके डिवाइस 5G को सपोर्ट नहीं कर रहे 
कनेक्शन लेने के बाद जब उपभोक्ता स्‍पीड पूरी न मिलने की शिकायत करता है तब उसे बताया जाता है कि आपके डिवाइस 5G को सपोर्ट नहीं कर रहे। ऐसी स्‍थिति में आप या तो लाखों रुपए खर्च करके 5G को सपोर्ट करने वाले सभी डिवाइस खरीदें या फिर  50 और 100 Mbps की स्‍पीड वाले प्लान पर पैसा खर्च करने के बावजूद 'मिनीमम स्‍पीड' 30 Mbps पाकर खुश रहें। 
स्‍पीड के इस खेल से बचने वाला सारा पैसा रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड की जेब में जाता है, जिसका आपको कोई मुआवजा नहीं मिलने वाला। यदि आप इस सबसे आजिज आकर अपना प्लान बदलवाना चाहते हैं तो जो पैसा आप पहले दे चुके हैं, उसका हिसाब नहीं होगा। आप कोशिश कर-करके थक जाएंगे लेकिन रिलायंस उसका हिसाब अपने हिसाब से करेगा। 
स्‍पीड कम मिलने से एक ओर जहां आप उस गति से काम नहीं कर पाएंगे जिस गति से से काम की अपेक्षा में आपने हाई स्‍पीड नेट कनेक्शन लिया है, तो दूसरी ओर आपको अपना काम पूरा करने में समय भी अधिक जाया करना होगा जिससे रिलांयस को कोई मतलब नहीं। 
जियो एक्सटेंडर या जियो वाई-फाई मेश एक्सटेंडर लगवाने की सलाह 
स्‍पीड कम मिलने की शिकायत करने पर जियो के एजेंट आपको जियो एक्सटेंडर  या जियो वाई-फाई मेश एक्सटेंडर लगवाने की सलाह देते हैं जो अलग-अलग मॉडल और तकनीक के अनुसार ढाई हजार रुपए से लेकर 25 हजार रुपए तक आते हैं। 
यहां यह जान लेना भी जरूरी है कि सामान्य मध्‍यम वर्गीय व्‍यक्ति ऐसा कर पाने में सक्षम नहीं होता, लिहाजा इस पूरे तमाशे से बचने वाला डेटा भी रिलांयस कंपनी के खाते में जाता है और इस तरह कंपनी प्रति कनेक्शन, प्रति दिन एक बड़ी रकम हजम कर जाती है। 
Jio Fiber के देशभर में कुल कितने वाई-फाई कनेक्शन हैं? 
Reliance Jio Annual Report में दी गई जानकारी के मुताबिक देश में Jio Fiber के फिक्स्ड ब्रॉडबैंड (जियो फाइबर और जियो एयर फाइबर) के कुल 2.71 करोड़ उपभोक्ता हैं। इस तरह यदि रिलायंस कम स्‍पीड, आफ्टर सेल सर्विस तथा कस्‍टम केयर में धोखाधड़ी करके एक उपभोक्ता से हर महीने 100 रुपए भी ठगता है तो यह रकम प्रति माह 270 करोड़ रुपये से अधिक जाकर बैठती है। 
विचार कीजिए कि करोड़ों उपभोक्‍ताओं की मजबूरी का लाभ उठाकर मुकेश अंबानी की रिलायंस हर महीने 270 करोड़ रुपए तो सिर्फ ठगी करके कमा रही है। ये वो रकम है जिसमें कारोबार से होने वाला लाभ नहीं जुड़ा है। 
कस्टमर केयर और टोल फ्री नंबरों पर शिकायत का 'स्‍याह सच' 
जहां तक सवाल मामूली से मामूली शिकायत करने का है तो उसके लिए प्रक्रिया इतनी जटिल बना रखी है कि उपभोक्ता अपना माथा पीटने लगता है। जिला स्तर पर सुनवाई का कोई प्रावधान नहीं है। जो कुछ है वो एप के माध्यम से या फिर टोल फ्री नंबरों के  जरिए संभव है। इन दोनों माध्यमों से शिकायत करने वाला ही जान सकता है कि इस सब में अच्‍छा-खासा समय खर्च हो जाने तथा निरर्थक सवाल पूछे जाने के बावजूद नतीजा कुछ नहीं निकलता। थक-हारकर उपभोक्ता के पास सिर्फ एक चारा बचता है कि वह कंपनी के कर्मचारी का इंतजार करे। यह इंतजार 24 घंटों से लेकर एक सप्ताह तक भी हो सकता है क्योंकि आपने रिलायंस के Jio का कनेक्शन लेने की भारी भूल कर दी है। और हां, इस दौरान जो डेटा आप इस्तेमाल नहीं कर सके हैं, वो भी रिलायंस की संपत्ति में इजाफा करने के काम आएगा। 
बिलिंग साइकिल में हेराफेरी 
बिलिंग साइकिल में हेराफेरी करके भी रिलायंस की Jio Fiber करोड़ों रुपए हर महीने उपभोक्ताओं की जेब से निकाल लेती है। जैसे यदि आपका बिल प्लान हर महीने की 28 तारीख तक का है, तो अगले महीने इसे 27 या 26 कर दिया जाएगा। इस तरह सालभर में एक-एक, दो-दो दिन कम करते हुए करीब पूरा एक महीने का बिल अधिक वसूल कर लिया जाएगा, जिसका आपको अहसास तक नहीं होगा क्‍योंकि अधिकांश लोग बिल की आखिरी तारीख देखकर रीचार्ज करा लेते हैं। वह यह देखते ही नहीं कि पिछले महीने यही बिल जमा कराने की अंतिम तिथि एक दिन पहले थी। 
सालभर में किसी एक उपभोक्ता की जेब से पूरे एक महीने का पैसा ठग लेने का मतलब पूरे साल में करीब पौने तीन करोड़ उपभोक्ताओं की जेब काट कर कितना पैसा हड़प जाना होता है, इसका हिसाब आप अलग से लगाते रहिए। 
हां, अब आप बड़ी आसानी से यह अनुमान लगा सकते हैं वैश्विक रईसों की सूची में कैसे हर बार रिलायंस और उसके मालिक 'मुकेश धीरूभाई अंबानी' का नाम ऊपर चढ़ता जाता है और कैसे वह अपने बेटे की शादी का जश्न लगातार कई महीनों चलाते हुए उस पर अरबों रुपए खर्च कर देते हैं। 
Jio Fiber के कारनामे यहीं समाप्त नहीं हो जाते। सोशल मीडिया, डिजिटल मीडिया और शिकायती प्लेटफार्म उसकी 'ठगी' के किस्सों से भरे पड़े हैं परंतु फिलहाल स्‍थिति यह है कि न कोई सुनने वाला और न बताने वाला कि ठगी के इस नायाब तरीके से निपटा कैसे जाए। 
दरअसल, बड़ा सवाल यह भी है कि आज जबकि इंटरनेट 'मूलभूत आवश्यकता' बन चुका है और उसे पूरा करने वाले बाजार में बहुत कम हैं तो उपभोक्ता करे क्या? 
वह अर्थशास्‍त्र के उस सिद्धांत से बंधा है जो मांग और पूर्ति पर चलता है। मुकेश अंबानी जान चुके हैं कि जब तक बाजार में मांग अधिक है और उसकी पूर्ति करने वाले कम हैं, तब तक वह खुले हाथों से कितनी ही लूट करते रहें... लोग शिकायत भले ही कर लें... बिगाड़ कुछ नहीं सकते। 
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी   

बुधवार, 8 जुलाई 2026

MVDA के अफसर का दुस्साहस: भाजपा पार्षद के सील गेस्ट हाउस में कमरा लेने के लिए बनाया दबाव, पार्षद ने की शिकायत


 मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण (MVDA) के अफसरों का दुस्‍साहस किस कदर बढ़ चुका है, इसका एक उदाहरण आज तब फिर देखने को मिला जब नगर निगम मथुरा-वृंदावन के भाजपा पार्षद राधाकृष्‍ण पाठक को इसे लेकर बाकायदा उपाध्यक्ष विकास प्राधिकरण को लिखित शिकायत देनी पड़ी। 

गौरतलब है कि गत दिनों लखनऊ में हुए भीषण अग्निकांड के बाद प्रदेशभर में एक अभियान चलाकर ऐसे होटल, गेस्ट हाउस आदि को सील करने की कार्रवाई की गई जो संचालन के लिए जरूरी नियमों पर खरे नहीं उतरते थे। 
वृंदावन में भी ऐसे कई होटल तथा गेस्ट हाउस सील किए गए जिनमें से एक वृंदावन के रुक्मणि विहार सेक्‍टर-2 स्‍थित वृंदावन बालाजी सेवा सदन भी शामिल था। यह गेस्ट हाउस वार्ड 67 से निगम के पार्षद राधाकृष्‍ण पाठक का है। 
पार्षद और गेस्ट हाउस के मालिक राधाकृष्ण पाठक द्वारा की गई शिकायत के अनुसार उनके उक्त सील गेस्ट हाउस पर 28 जून की सुबह 7 बजे MVDA के सहायक अभियंता सुमित मौर्य अपनी सरकारी गाड़ी तथा चालक के साथ जा धमके और वहां मौजूद प्रबंधक अमर सिंह को जगाकर कमरा देने के लिए कहा। 
प्रबंधक द्वारा यह कहे जाने पर कि गेस्‍ट हाउस तो प्राधिकरण ने ही सील कर रखा है तो फिर में कमरा कैसे खोल सकता हूं, सहायक अभियंता सुमित मौर्य बोले कि मैं तुम्हें 2 हजार रुपए दूंगा। कमरा तुम दे दो। रही बात सील लगने की तो वह सब मैं देख लूंगा, उसकी चिंता तुम मत करो। 
पार्षद राधाकृष्‍ण पाठक ने अपने शिकायती पत्र के साथ गेस्‍ट हाउस के सीसीटीवी फुटेज भी पेश किए हैं जिसमें सहायक अभियंता अपने चालक के साथ मौजूद दिखाई दे रहे हैं। 
इस संबंध में विकास प्राधिकरण के सचिव आशीष कुमार सिंह से जानकारी मांगी गई तो उन्होंने भाजपा पार्षद द्वारा दिए गए शिकायती पत्र की पुष्‍टि की, किंतु कार्रवाई के बारे में पूछे जाने पर कहा कि जांच उपरांत कार्रवाई की जाएगी। 
दूसरी ओर सहायक अभियंता सुमित मौर्य ने भी भाजपा पार्षद के गेस्ट हाउस पर जाना तो स्वीकार किया किंतु कहा कि हम जांच-पड़ताल के लिए गए थे। 
ऐसे में एक सामान्य सा सवाल यह खड़ा होता है कि मौर्य साहब सुबह 7 बजे किस तरह की जांच-पड़ताल को गए थे, और यदि गए थे तो फिर उसकी कोई जानकारी अपने उच्च अधिकारियों को क्यों नहीं दी। 
बहरहाल, बताया जाता है कि मामला एक सत्ताधारी दल के पार्षद से जुड़ा होने के कारण उन्हें खुश करने के लिए प्राधिकरण ने ये किया कि तत्काल प्रभाव से उनके गेस्ट हाउस की सील खोल दी जिससे पार्षद राधाकृष्‍ण इस मामले को ज्यादा तूल न दें। 
सील खोले जाने की भी पुष्टि विकास प्राघिकरण के सचिव आशीष कुमार सिंह ने की है परंतु उनके अनुसार सील इसलिए खोली गई कि उन्‍होंने इस संबंध में दाखिल जवाब से प्राधिकरण को संतुष्ट कर दिया था। प्राधिकरण ने सील किए गए सभी होटल और गेस्ट हाउस मालिकों को इसके लिए 15 दिन का समय दिया था। 
सचिव विकास प्राधिकरण जो भी कहें किंतु इतना तो सिद्ध होता ही है कि सहायक अभियंता सुबह 7 बजे किसी नेक नीयत से नहीं गए थे। बल्कि उनका मकसद चिर-परिचित हथकंडों को अपना कर वही सब कार्य करना रहा होगा जिसके लिए समूचा मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण बदनाम है और जिसकी गूंज इन दिनों सीएम कार्यालय के साथ-साथ उच्च न्यायालय तक में सुनाई दे रही है। 
-Legend News 

शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

जल्द जेल जा सकते हैं MVDA, मथुरा-वृंदावन नगर निगम और तीर्थ विकास परिषद के कुछ बड़े भ्रष्ट अधिकारी


 कहते हैं ईश्वर की लीला कोई नहीं जानता। वह कब और किस उद्देश्य की पूर्ति के लिए कौन सी लीला रच दे, पता ही नहीं लगता। शायद इसीलिए वह ईश्वर है। सर्वशक्तिमान है। 

अब देखिए। कौन जानता था कि मथुरा से करीब 550 किलोमीटर दूर अयोध्‍या में विराजे रामलला, चढ़ावा चोरी को माध्यम बनाकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भ्रष्टाचारियों की ओर भी ध्यान देने पर बाध्य कर देंगे। 
बेशक खुद सीएम योगी की ईमानदारी पर कोई उंगली नहीं उठाई जा सकती और उनकी अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठा एक उदाहरण है। परंतु इसमें भी कोई दो राय नहीं कि भ्रष्टाचार को लेकर उनकी 'जीरो टॉलरेंस' की नीति एक मजाक बनकर रह गई है। 
जो हुआ सो हुआ, लेकिन आगे ऐसा नहीं हो सकेगा इसकी उम्मीद काफी बढ़ गई है। यही नहीं, अब तक अपनी काली कमाई में ज्यामितीय विधि से यानि दो के चार, चार के आठ और आठ के सोलह करने वाले अधिकारी बहुत जल्द जेल जा सकते हैं क्योंकि 'बाबा' ने हर जिले की 'काली भेड़ों' का पूरा चिट्ठा मंगवाना शुरू कर दिया है। उनकी हर गतिविधि पर पैनी नजर रखी जा रही है। जाहिर है कि अब तक ऐसा नहीं था। 
अगर बात करें भगवान विष्‍णु के आठवें अवतार श्रीकृष्‍ण की पावन जन्मस्थली मथुरा की, तो यहां एक लंबे समय से भ्रष्ट अधिकारियों की तूती बोल रही है। दूसरे शब्‍दों में कहें तो यह विश्व प्रसिद्ध धार्मिक नगरी, भ्रष्ट अधिकारियों के लिए दुधारू गाय बनी हुई है। 
यही कारण है कि कई अधिकारियों ने तो अपनी नौकरी का अधिकांश कार्यकाल यहीं बिता दिया है, उनका पदनाम बदलने के बाद भी वह घूम फिरकर यहीं अपने पोस्टिंग करा लेते हैं। आश्चर्य की बात यह है कि ऐसे अधिकारियों की संख्‍या अच्छी खासी है। 
फिलहाल सबसे अधिक चर्चा जिन विभागों की है, उनमें मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण (MVDA), मथुरा-वृंदावन नगर निगम और ब्रज तीर्थ विकास परिषद का नाम सबसे ऊपर है। हालांकि पुलिस भी इससे अछूती नहीं है। 
पहले बात मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण अर्थात MVDA की 
शासन से जुड़े सूत्रों के जरिए मिली ठोस जानकारी के अनुसार वृंदावन के डालमिया बाग प्रकरण में MVDA की भूमिका को उस समय बहुत गंभीरता से न लेने वाले सूबे के मुखिया योगी आदित्यनाथ ने अब न सिर्फ उसकी पूरी जानकारी नए सिरे से जुटानी शुरू कर दी है बल्कि वृंदावन की ही सन सिटी अनंतम, मथुरा की मन्नत रेजीडेंसी सहित द्वारिकादास जीवराजका मैमोरियल ट्रस्ट तथा हरिनिवास खेतान मैमोरियल ट्रस्ट आदि का ब्यौरा संकलित कर लिया है। 
इनमें से सन सिटी अनंतम तथा मन्नत रेजीडेंसी का मामला तो हाई कोर्ट तथा सुप्रीम कोर्ट, और यहां तक कि एनजीटी में भी विचाराधीन है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट के आदेश से ही डालमिया बाग में प्रस्तावित हाउसिंग प्रोजेक्ट को झटका लग चुका है, अन्यथा MVDA ने तो माफिया के लिए मुकम्मल व्यवस्था कर ही दी थी। 
इतना सब हो जाने के बावजूद चूंकि MVDA के किसी अधिकारी से कोई पूछताछ तक नहीं हुई, लिहाजा एक ओर जहां भ्रष्ट अधिकारी हर मामले में मनमानी करते रहे वहीं दूसरी ओर 'लैंड एक्सचेंज' की आड़ में माफिया के लिए बेशकीमती सरकारी जमीन देने का प्रस्ताव बार-बार 'बड़ी बेशर्मी' से लाते रहे। जब मीडिया ने इस खेल का खुलासा किया तो आपस में चिट्ठी-चिट्ठी खेलना शुरू कर दिया जिससे सबकी आंखों में धूल झोंकी जा सके। 
MVDA की निर्लज्जता का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि वह RTI का जवाब देना जरूरी नहीं समझता। अधिकारियों का आलम यह है कि वह मीडिया के पूछने पर भी उसके प्रश्नों का जवाब नहीं देते। फोन उठाना अपनी शान के खिलाफ समझते हैं और वाट्सएप पर भेजे गए मैसेज भी 'पी' जाते हैं। 
नगर निगम भी पीछे नहीं 
सरकारी जमीन को अपनी निजी जागीर समझने वाले मथुरा-वृंदावन नगर निगम के अधिकारी हों या वहां चुने हुए नुमाइंदे, भ्रष्टाचार के मामले में MVDA से ज्यादा न सही... तो कम भी नहीं हैं। 
उनके दुस्साहस का एक उदाहरण तो निजी हाउसिंग प्रोजेक्ट 'मन्नत रेसीडेंसी' के प्रमोटरों द्वारा हड़पी गई निगम की जमीन है। जिसके खिलाफ इलाहाबाद हाई कोर्ट में जनहित याचिका लंबित है लेकिन नगर निगम कहता है कि उनका मन्नत रेसीडेंसी के मालिकों से कोई विवाद शेष नहीं है। उधर, नगर निगम के बयान को आधार बनाकर विकास प्राधिकरण मन्नत रेसीडेंसी के निर्माण पर लगी सील खोल देता है। 
कागजों में जो खसरा नंबर नगर निगम के नाम दर्ज हैं, उन खसरा नंबरों को अपना बताकर मन्नत रेसीडेंसी के मालिकान विकास प्राधिकरण में नक्शा पास कराने को प्रयासरत हैं, किंतु नगर निगम के अनुसार उनका कोई विवाद ही नहीं है। 
नगर निगम मथुरा-वृंदावन में व्याप्त भ्रष्टाचार का दूसरा बड़ा उदाहरण सन सिटी अनंतम से जुड़ा है, जो अब भी भारी चर्चा का विषय बना हुआ है। यह मामला हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट तथा एनजीटी तक में पेंडिंग है। नगर निगम लिखा-पढ़ी में यह स्वीकार कर चुका है उसकी बेशकीमती जमीन सनसिटी अनंतम के प्रमोटरों ने दबा रखी है और उस पर अवैध निर्माण भी कराया जा रहा है, किंतु न तो सरकारी जमीन को कब्जामुक्‍त कराया जा रहा है और न अवैध निर्माण पर लगाम लगाई जा रही है। कहा तो यहां तक जाता है कि नगर निगम की जमीन का बड़ा हिस्सा कॉलोनाइजर बेच कर खा गया है लेकिन नगर निगम आंखें मूंदे बैठा है। 
सनसिटी अनंतम और मन्नत रेजीडेंसी तो नजीर भर हैं। इसके अलावा नगर निगम की दूसरी अन्य जमीनों को कहीं स्कूल-कॉलेज संचालक हड़प कर बैठे हैं और कहीं जमीन के कारोबारी। इन सब पर अवैध कब्जे की अनेक शिकायतें नगर निगम में पेंडिंग हैं लेकिन नगर निगम को तो जैसे सांप सूंघ गया है। इसके पीछे क्या कारण हो सकता है, इसे हर कोई समझता है। 
शासन से जुड़े सूत्र बताते हैं कि अब सीएम योगी ने उनके कार्यकाल और उससे पहले के भी सारे ऐसे मामलों का संज्ञान लेने की व्यवस्था करने का मन बना लिया है और अपने स्तर से सबूत जुटाने शुरू कर दिए हैं। 
बताया जाता है कि सीएम योगी ने तेजी से इस पर काम करने की हिदायत दी है ताकि 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले ऐसा उदाहरण पेश किया जा सके कि भ्रष्टाचार पर उनकी जीरो टॉलरेंस की नीति केवल जुमला भर नहीं थी। 
उत्तर प्रदेश ब्रज तीर्थ विकास परिषद के कारनामों पर भी नजर 
उत्तर प्रदेश ब्रज तीर्थ विकास परिषद जिसके अध्यक्ष स्‍वयं मुख्यमंत्री हैं, उसके भी कारनामे काफी समय से चर्चा का विषय बने हुए हैं, इसलिए योगी जी ने अब उसका भी हिसाब मांगा है। ब्रज तीर्थ विकास परिषद और मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण की स्‍थिति यह है कि वह एक-दूसरे के नाक-कान हैं। मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण ही मथुरा में ब्रज तीर्थ विकास परिषद की कार्यदायी संस्‍था है, और उसके अधिकारियों को ब्रज तीर्थ विकास परिषद में अतिरिक्त कार्यभार मिला हुआ है। 
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि घोर भ्रष्टाचारी के टैग वाली एक संस्था, घोर ईमानदार अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के 'टैग' वाली संस्था के कार्य कराती है। पता नहीं ईमानदारी सिर्फ टैग है, या भ्रष्‍टाचारी टैग है। 
शासन के सूत्र बताते हैं कि अब योगी बाबा इन 'टैगधारी संस्थाओं' का सत्यापन अपने स्तर से कराने में जुट गए हैं क्योंकि राम मंदिर के चढ़ावे की चोरी करने वालों ने उनकी छवि को डेंट लगाने का जो प्रयास किया है, वह इसके बाद किसी को कोई और मौका नहीं देना चाहते। वह चाहते हैं कि जिस तरह यूपी में सामाजिक अपराधी भयभीत रहते हैं, उसी तरह 'आर्थिक अपराधी' भी भय खाएं और भ्रष्टाचार अपवाद भले ही न बने किंतु भ्रष्टाचारी इतने भयाक्रांत जरूर रहें कि भ्रष्‍टाचार को लेकर जीरो टॉलरेंस की नीति का उस तरह मजाक न बने जिस तरह आज बनी हुई है। 
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

बुधवार, 27 मई 2026

माफिया की मुराद पूरी करने के लिए MVDA की 'हाई कोर्ट' को सीधी चुनौती, 'मन्नत रेजीडेंसी' की सील खोली


 जिस सरकारी जमीन को माफिया के कब्जे से मुक्त कराने के लिए सत्ताधारी दल भाजपा के ही एक पार्षद ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में जनहित याचिका (PIL) दाखिल की हुई है, उससे जुड़े हाउसिंग प्रोजक्‍ट 'मन्नत रेजीडेंसी' की बीती 22 मई को मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण (MVDA) ने न सिर्फ सील खोल दी बल्कि ये कहते हुए क्‍लीन चिट भी दे दी कि अब कोई विवाद शेष नहीं है जबकि इलाहाबाद हाई कोर्ट में यह PIL अब भी लंबित है और इसका स्टेटस हाई कोर्ट की वेबसाइट पर जाकर कोई भी चेक कर सकता है।    

इस संबंध में विकास प्राधिकरण के सचिव आशीष कुमार सिंह से जब जानकारी की गई तो उन्होंने बड़ी 'बेशर्मी' के साथ स्‍वीकार किया कि 'मन्नत रेजीडेंसी' की सील खोल दी गई है क्‍योंकि विभिन्न विभागों से ऐसी जानकारी हमें प्राप्त हुई थी। उनके अनुसार 'मन्नत रेजीडेंसी' को लेकर अब मथुरा-वृंदावन नगर निगम को भी कोई आपत्ति नहीं है। 
देखिए मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के सचिव आशीष कुमार सिंह ने इस बावत क्या-क्या कहा-

 
सचिव विकास प्राधिकरण आशीष कुमार सिंह के कथन से स्‍पष्ट होता है कि उन्हें इस पूरे प्रकरण और इसे लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट में लंबित जनहित याचिका की पूरी जानकारी थी, बावजूद इसके उन्होंने ये दुस्साहस करके हाई कोर्ट को सीधी चुनौती दी है। 
गौरतलब है कि मथुरा के पॉश एरिया मसानी लिंक रोड पर जहां मन्नत रेजीडेंसी खड़ी की जा रही है, वहां बाकायदा कभी मथुरा-वृंदावन नगर निगम के बोर्ड लगे हुए थे और उन पर चेतावनी भी दर्ज थी, किंतु माफिया ने नगर निगम की जमीन कब्‍जाने के लिए इन बोर्डों को 'जमींदोज' कर दिया ताकि आगे कोई उंगली न उठा सके। ये फोटो इसकी गवाही दे सकते हैं। 
सचिव विकास प्राधिकरण ने इतनी बड़ी हिमाकत क्यों और कैसे की होगी, इसका अंदाज हर वो व्‍यक्‍ति लगा सकता है जिसका कभी किसी मामले में इस विभाग से वास्ता पड़ा होगा। यही नहीं, जिनका वास्ता न भी पड़ा हो, वो भी मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण की कारगुजारियों से भलीभांति वाकिफ रहते हैं क्‍योंकि भ्रष्‍टाचार इस विभाग की कार्य संस्‍कृति का अभिन्न अंग जो है। 
देखें सचिव आशीष कुमार सिंह के हस्ताक्षर से 22 मई का जारी किया गया वो आदेश जो उनके गले की फांस बन सकता है- 
दरअसल, सचिव आशीष कुमार सिंह ने ये सारा खेल यूं ही नहीं खेला। वो जानते हैं कि यूपी का मथुरा एक ऐसा जिला है जहां उनके पूर्ववर्ती अधिकारियों ने भी खूब मनमानी की है, लेकिन उनमें से आज तक किसी का कुछ नहीं बिगड़ा। इसके ठीक उलट उनमें से कुछ अधिकारी तो आज उनके बॉस बने बैठे हैं। 
हो सकता है कि आशीष कुमार सिंह ने उन्‍हीं से प्राप्त 'फीडबैक' के आधार पर इतना खुलकर खेलने की हिम्मत जुटा ली हो और इलाहाबाद हाई कोर्ट को सीधी चुनौती दे डाली लेकिन जरूरी नहीं कि यदि पूर्ववर्तियों का दांव सीधा पड़ गया तो अब भी यथास्थिति कायम रहेगी। 
इस बार दांव उल्टा पड़ जाने की पूरी संभावना है, वो इसलिए कि याचिकाकर्ता ब्रजेश खरे ने इस मामले में अदालत की अवमानना का केस फाइल करने की पूरी तैयारी कर ली है।

जहां तक सवाल है उसके लिए जरूरी दस्तावेजों का तो वो खुद सचिव ने अपने हस्ताक्षरित पत्र तथा मीडिया को ऑन कैमरा दिए गए बयान से उसकी पूर्ति कर दी है। 
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी 

 

शुक्रवार, 22 मई 2026

कुछ बड़े अधिकारियों को भारी पड़ सकती है माफिया पर मेहरबानी, 'सनसिटी अनंतम' के मामले में PIL दायर


 राष्‍ट्रीय राजधानी दिल्ली और आगरा के बीच भगवान श्रीकृष्ण की पावन लीला स्थली वृंदावन में नेशनल हाईवे 19 के किनारे छटीकरा पर बन रही 'सनसिटी अनंतम' जल्द ही कुछ अधिकारियों के गले की फांस बनने जा रही है।  

दीपक शर्मा पुत्र लक्ष्मीनारायण शर्मा उर्फ ब्रज बिहारी शर्मा निवासी वृंदावन ने इस मामले में जिला प्रशासन के कुछ अधिकारियों की कॉलोनाइजर के रूप में सक्रिय माफिया पर मेहरबानी को इलाहाबाद हाई कोर्ट के सामने रखा है। 

अपनी जनहित याचिका में दीपक शर्मा ने बताया है कि चार महीने पहले मथुरा-वृंदावन नगर निगम ने ये स्वीकार किया कि नगर निगम की जमीन पर 'सनसिटी अनंतम' के मालिकों ने न सिर्फ कब्जा कर रखा है बल्कि उस पर अवैध निर्माण भी करा लिया है, लेकिन आज तक उस भूमि को कब्जा मुक्त नहीं कराया जिससे माफिया और संबंधित अधिकारियों के बीच सांठगांठ की पुष्टि होती है। 

दरअसल, ये सारा खेल इस बेशकीमती सरकारी जमीन को 'लैंड एक्सचेंज' की आड़ में माफिया को देने से जुड़ा है जिसके लिए कई बार नगर निगम की बोर्ड बैठकों में प्रस्ताव पास कराने का प्रयास किया गया किंतु किसी न किसी कारणवश अधिकारी अपने मकसद में सफल नहीं हो सके। 

चूंकि कुछ खास अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को इस काम के लिए बड़ी रकम 'नजराना' के रुप में दी जा चुकी है और उससे भी कई गुना अधिक रकम बतौर 'शुकराना' मिलना शेष है इसलिए वह मीडिया से लेकर आम जनता तक की आंखों में धूल तो झोंक रहे हैं लेकिन सरकरी जमीन को कब्जा मुक्त नहीं करा रहे। 

अधिकारियों की माफिया पर मेहरबानी का अंदाज उस पत्र से लगाया जा सकता है जो नगर निगम मथुरा-वृंदावन की ओर से मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण को लिखा गया था। 

इस पत्र में नगर निगम ने विकास प्राधिकरण को लिखा है कि सनसिटी अनंतम में सरकारी जमीन पर किए जा रहे अवैध निर्माण को रुकवाकर पूर्व में किए गए अवैध निर्माण को ध्‍वस्त किया जाए, किंतु चार महीने बीत जाने के बाद भी न तो अवैध निर्माण रुका और न ध्वस्त कराया गया। 


हालांकि उस वक्त भी 'लीजेंड न्यूज़' ने इस संबंध में प्रमुखता से खबर प्रकाशित की थी जिसे इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ा जा सकता है- 


https://legendnews.in/single-post?s=suncity-anantam-case-nagar-nigam-mathura-vrindavan-got-caught-in-its-own-trap-and-a-single-letter-exposed-its-corrupt-practices-39089

विकास प्राधिकरण ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि नगर निगम अपनी जमीन को कब्जा मुक्त कराने तथा अवैध निर्माण ध्‍वस्त कराने में स्‍वयं सक्षम है जबकि नगर निगम चिट्ठी-चिट्ठी खेल रहा है, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठा रहा। ये स्थिति तो तब है जबकि सरकारी जमीन को कब्जा मुक्त कराने के लिए 'अंतरिक्ष' से कोई दूसरे अधिकारी नहीं भेजे जाएंगे। जो कुछ करना है, यहां तैनात अधिकारियों को ही करना है परंतु उनकी समस्या यह है कि उन्‍हें 'नजराने' का हक भी अदा करना है और 'शुकराना' भी हासिल करना है लिहाजा वह सनसिटी अनंतम के मालिकों की शान में गुस्ताखी करें तो करें कैसे। 

बहरहाल, याचिकाकर्ता दीपक शर्मा ने इस मामले में जिन्हें पक्षकार बनाया है उनमें प्रिंसिपल सेक्रेटरी उत्तर प्रदेश के अलावा म्युनिसिपल कमिश्नर और एडिशनल म्युनिसिपल कमिश्नर मथुरा-वृंदावन नगर निगम, सचिव मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण, एसएसपी मथुरा तथा डायरेक्‍टर सनसिटी अनंतम शामिल हैं। 

दीपक शर्मा ने जनहित याचिका में उच्च न्यायालय से जो प्रेअर की है, उसके मुख्‍य बिंदु हैं- 

1- नगर निगम मथुरा द्वारा खुली नीलामी (Open Auction) एवं विधिसम्मत प्रक्रिया अपनाए बिना सरकारी भूमि का अवैध रूप से विनिमय (Exchange) किए जाने की प्रक्रिया चलाई जा रही है, जिससे केवल प्रतिवादी संख्या–6 अर्थात सनसिटी अनंतम को अनुचित लाभ पहुँचाया जा रहा है। 

2- यह स्पष्ट नहीं है कि मथुरा-वृंदावन नगर निगम द्वारा अत्यंत मूल्यवान सरकारी भूमि को बिना किसी खुली बोली, पारदर्शी प्रक्रिया एवं वास्तविक बाजार मूल्यांकन के प्रतिवादी संख्या–6 को क्यों दिया जा रहा है, जो कि विधि एवं जनहित दोनों के विरुद्ध है इसलिए उसे निजी लाभ हेतु किसी निजी कंपनी को न सौंपा जाए।

3- प्रस्तावित 'अवैध भूमि विनिमय' पूर्णतः जनहित के विरुद्ध है तथा केवल प्रतिवादी संख्या–6 को लाभ पहुँचाने हेतु किया जा रहा है। नगर निगम द्वारा भूमि का मूल्य मात्र ₹10,000 प्रति वर्गमीटर दर्शाया गया है, जबकि प्रतिवादी संख्या–6 उसी क्षेत्र में लगभग ₹85,000 प्रति वर्ग मीटर की दर से प्लॉट विक्रय कर रहा है। यह तथ्य स्वयं अधिकारियों एवं प्रतिवादी संख्या–6 के मध्य भ्रष्टाचार एवं मिलीभगत को प्रदर्शित करता है।

4- संबंधित प्राधिकरण स्वयं स्वीकार कर चुका है कि प्रतिवादी संख्या–6 द्वारा सरकारी भूमि पर बिना अनुमति अवैध निर्माण किया गया है तथा प्रतिवादी संख्या–3 द्वारा प्रतिवादी संख्या–4 को अवैध निर्माण रोकने एवं ध्वस्तीकरण हेतु रिपोर्ट भी भेजी गई, किन्तु प्रतिवादी संख्या–4 द्वारा कोई कार्रवाई नहीं की गई, जो कि विधि एवं नागरिकों के मौलिक अधिकारों के विरुद्ध है।

5- याचिकाकर्ता द्वारा प्रतिवादी संख्या–2, 3, 4 एवं 5 को अनेक शिकायतें प्रस्तुत की गईं, किन्तु किसी भी सक्षम प्राधिकारी द्वारा कोई वैधानिक कार्रवाई नहीं की गई। जबकि भूमि का वास्तविक बाजार मूल्य लगभग ₹1,00,000 प्रति वर्ग मीटर है, तथापि विनिमय मात्र ₹10,000 प्रति वर्ग मीटर की दर से प्रस्तावित किया गया है, जो कि Uttar Pradesh नगर निगम अधिनियम 1916 एवं संविधान के अनुच्छेद 14 एवं 21 का उल्लंघन है।

6- विवादित भूमि सरकारी भूमि है तथा उसका उपयोग जनता की आवश्यक सुविधाओं जैसे विद्यालय, अस्पताल, पार्क एवं अन्य सार्वजनिक उपयोग हेतु किया जाना चाहिए, जो कि संविधान के अनुच्छेद 14 एवं 21 के अंतर्गत प्रदत्त अधिकारों का अभिन्न हिस्सा है।

7- नगर निगम द्वारा उक्त भूमि को जनहित के स्थान पर निजी लाभ हेतु प्रतिवादी संख्या–6 को दिए जाने का प्रयास किया जा रहा है जबकि संबंधित क्षेत्र में पार्क एवं अस्पताल जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव है, अतः उक्त भूमि का उपयोग जनकल्याण हेतु किया जाना न्यायोचित एवं आवश्यक है।

8- उपर्युक्त तथ्यों एवं परिस्थितियों को दृष्टिगत रखते हुए माननीय न्यायालय से विनम्र प्रार्थना है कि कृपया प्रतिवादी संख्या–4 को दिनांक 22.01.2026 की रिपोर्ट/आदेश, जो प्रतिवादी संख्या–3 द्वारा पारित किया गया था, का अनुपालन सुनिश्चित करने हेतु परमादेश (Mandamus) जारी करने की कृपा करें।

9- प्रतिवादी संख्या–1 को माननीय न्यायालय की निगरानी में एक स्वतंत्र समिति गठित कर उक्त अवैध भूमि विनिमय प्रक्रिया की निष्पक्ष जाँच कराने हेतु निर्देशित करने की कृपा करें।

10- प्रतिवादी संख्या–1, 2, 3 एवं 4 को निर्देशित किया जाए कि विवादित सरकारी भूमि का उपयोग जनहित में विद्यालय, कॉलेज, अस्पताल, पार्क अथवा अन्य सार्वजनिक उपयोग हेतु किया जाए।

11- प्रतिवादी संख्या–5 को याचिकाकर्ता की सुरक्षा सुनिश्चित करने तथा प्राप्त शिकायतों पर विधिसम्मत कार्रवाई करने हेतु निर्देशित करने की कृपा करें।

12- माननीय न्यायालय परिस्थितियों के अनुसार जो अन्य उचित आदेश अथवा निर्देश पारित करना उचित समझे, वह भी पारित करने की कृपा करें। 

यहां यह जान लेना बहुत जरूरी है कि सनसिटी अनंतम के पक्ष में अधिकारियों के खुलकर खेलने का यह काम कोई हाल-फिलहाल शुरू नहीं हुआ। यह पिछले कई वर्षों से खेला जा रहा है। इस बीच कई अधिकारी आए, और चले भी गए किंतु सनसिटी अनंतम के मालिकों को लेकर 'समर्पण का भाव' किसी में कम नहीं हुआ क्योंकि इस प्रोजेक्ट का मालिकाना हक जिनके पास है, उनकी तूती कई राज्यों में बोलती है। 

चूंकि आज भी आमजन की आखिरी उम्मीद न्यायपालिका से ही लगी है इसलिए इस मामले में भी अंतत: न्यायपालिका की ही शरण लेनी पड़ी। अब देखना यह है कि 'नजराना' लेकर बैठे अधिकारी 'शुकराना' हासिल करने में सफल होते हैं या फिर अपनी इस लगातार की जा रही हिमाकत का खामियाजा भुगतते हैं। 

-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी


सोमवार, 18 मई 2026

बांके बिहारी के लाइव-स्ट्रीमिंग कॉन्ट्रैक्ट विवाद में सुप्रीम कोर्ट से नोटिस जारी, कमेटी से जवाब तलब


 सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को (आज) W.P.(C) No. 1228/2025 ठाकुर श्री बांके बिहारी जी महाराज मंदिर प्रबंध समिति बनाम श्री बांके बिहारी जी मंदिर हाई पॉवर्ड प्रबंधन समिति एवं अन्य के मामले में दाखिल IA No. 6809/2026 अर्थात हस्तक्षेप/पक्षकार बनाए जाने के आवेदन पर नोटिस जारी किया है। यह मामला 18 मई 2026 को चीफ जस्टिस की कोर्ट के समक्ष आइटम नंबर 48.1 के रूप में सूचीबद्ध था।

यह विवाद वृंदावन स्थित ठाकुर श्री बांके बिहारी जी महाराज मंदिर की लाइव-स्ट्रीमिंग का कॉन्ट्रैक्ट कथित रूप से सुयोग्य मीडिया को अपारदर्शी और अनियमित तरीके से दिए जाने से संबंधित है।
आवेदक अनिल गुप्ता की ओर से उपस्थित अधिवक्ता नरेंद्र कुमार गोस्वामी ने चीफ जस्टिस सूर्यकान्त की अध्यक्षता वाली बेंच के समक्ष प्रस्तुत किया कि कोर्ट-निगरानी में कार्यरत हाई पावर्ड मैनेजमेंट कमेटी द्वारा यह कॉन्ट्रैक्ट कथित रूप से “बैकडोर और पैराशूट एंट्री” के माध्यम से ऐसी संस्था को दिया गया, जिसने न तो कॉन्ट्रैक्ट के लिए आवेदन किया था और न ही पूर्व प्रक्रिया या बैठकों में भाग लिया था।
अधिवक्ता गोस्वामी ने आगे कहा कि आवेदक की आपत्तियों, शिकायतों और आरटीआई आवेदनों का कोई उत्तर नहीं दिया गया जिससे कोर्ट-निगरानी वाली कमेटी की पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं। उन्होंने तर्क दिया कि यह मामला मात्र टेंडर अनियमितता का नहीं, बल्कि न्यायालय-निगरानी में कार्यरत संस्था की संस्थागत पवित्रता और विश्वसनीयता से जुड़ा है।
एक महत्वपूर्ण दलील में अधिवक्ता गोस्वामी ने कहा कि जिस प्रकार से कॉन्ट्रैक्ट प्रदान किया गया, वह कथित रूप से न्यायालय की अपनी प्रक्रिया के साथ धोखाधड़ी के समान है।
आरोपों को गंभीर मानते हुए चीफ जस्टिस सूर्यकान्त ने टिप्पणी की कि “ये आरोप अत्यंत गंभीर प्रकृति के हैं” और राज्य पक्ष की ओर से उपस्थित learned AAG/ASG से इन आरोपों पर जवाब देने को कहा। 
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी करते हुए संबंधित प्रतिवादियों/कमेटी से जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। बेंच ने IA No. 6809/2026 पर एक सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने को कहा।
मामले की अगली सुनवाई अगले सप्ताह होने की संभावना है, जहाँ सुप्रीम कोर्ट लाइव-स्ट्रीमिंग कॉन्ट्रैक्ट से जुड़े आरोपों पर स्पष्ट हलफनामे के माध्यम से स्पष्टीकरण प्राप्त करेगा।
ज्ञात रहे कि यह विवाद अब केवल एक साधारण कॉन्ट्रैक्ट विवाद नहीं रह गया है। सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मूल प्रश्न यह है कि क्या न्यायिक निगरानी में गठित कोई संस्था मंदिर से जुड़े कॉन्ट्रैक्ट को बिना पारदर्शी प्रक्रिया तथा आपत्तियों पर विचार किए बिना और सार्वजनिक जवाबदेही के बगैर इस तरह किसीको भी कॉन्ट्रैक्ट दे सकती है। 
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