BHRASHT INDIA
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बुधवार, 25 फ़रवरी 2026
हाईटेक प्रोजेक्ट सनसिटी अनंतम के अंत का आगाज़: कोर्ट ने रद्द किया करोड़ों का बैनामा, NEXUS का भी खुलासा
वृंदावन में प्राइम लोकेशन पर बन रहे हाईटेक रियल एस्टेट प्रोजेक्ट सनसिटी अनंतम के अंत का आगाज़ उस समय होता हुआ दिखाई दिया जब न्यायालय अपर जिला न्यायाधीश श्रीमती नीलम ढाका ने इस प्रोजेक्ट के कई बैनामे रद्द कर दिए और जबरन कराए गए इन बैनामों को प्रशासन और बिल्डर के NEXUS का नतीजा माना। 23 फरवरी 2026 को किए गए इस आदेश में साफ-साफ लिखा है कि न्यायालय ने इस पूरे मामले में राज्य के तंत्र और बिल्डर के बीच स्पष्ट तौर पर गठजोड़ पाया। बिल्डर के पास अधिग्रहण की अधिसूचना से पहले कोई भूमि थी ही नहीं, और वह सरकारी कार्रवाई की वजह से ही इस प्रक्रिया में शामिल हुआ।
सरकारी तंत्र ने अधिग्रहण के अपने अधिकारों का दुरुपयोग कर किसानों की जमीन बिल्डर को हस्तांतरित कर दी जो सीधे-सीधे सार्वजनिक न्यास सिद्धांत तथा संविधान के अनुच्छेद 14, 12 तथा 300-A का उल्लंघन है जबकि सिद्धांत कहता है कि जो काम सीधे नहीं किया जा सकता, वह अप्रत्यक्ष रूप से करना भी संभव नहीं है।
कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी टिप्पणी की कि अधिग्रहण की अधिसूचना जारी होने के बाद किसान फंस गए क्योंकि वह फिर अपनी जमीन किसी और को बेच नहीं सकते थे। बिल्डर ने उनकी इस दयनीय स्थिति का लाभ उठाकर उन्हें ऐसा प्रस्ताव दिया जो सरकारी मुआवजे से बेहतर तो प्रतीत होता था किंतु वह बाध्यकारी तथा अन्यायपूर्ण था।
कोर्ट ने इस दौरान Land Acquisition Act 1894 के अंतर्गत अधिग्रहण की चरणबद्ध प्रक्रिया का उल्लेख किया और बताया कि कैसे इस मामले में धारा 17 के आपातकालीन प्रावधानों का दुरुपयोग किया गया और किसानों को उनके आपत्ति दर्ज कराने के अधिकार से भी वंचित कर दिया।
अदालत ने सनसिटी द्वारा किए गए उस दावे की भी जांच की जिसमें हाईटेक टाउनशिप नीति के अंतर्गत छूट का हवाला दिया गया था, लेकिन हाईटेक टाउनशिप नीति तो वर्ष 2010 में ही समाप्त कर दी गई थी।
कोर्ट ने अपने निर्णय में क्या-क्या लिखा
✅ निचली अदालत का निर्णय दिनांक 18.12.2018 तथा डिक्री दिनांक 10.01.2019 निरस्त किए जाते हैं।
✅ विक्रय विलेख (बैनामा) दिनांक 11.01.2007— उप-पंजीयक कार्यालय, मथुरा में पंजीकृत — रद्द किया जाता है तथा शून्य एवं अमान्य घोषित किया जाता है।
✅ अपीलकर्ताओं/किसानों के पक्ष में स्थायी निषेधाज्ञा जारी की जाती है — Suncity (प्रतिवादी संख्या 1) और उसके एजेंट खसरा संख्या 393, क्षेत्रफल 7.486 हेक्टेयर, छटीकरा, मथुरा पर निर्माण या हस्तांतरण नहीं कर सकते।
✅ अपीलकर्ताओं को यह विकल्प दिया जाता है कि वे Suncity से प्राप्त विक्रय राशि (₹2,65,00,000) 6 माह के भीतर वापस करें तथा प्रतिवादी इसे स्वीकार करें।
करीब 14 वर्षों से अधिक समय तक चले वाद-विवाद के बाद अपीलीय न्यायालय ने निचली अदालत के निर्णय को पलटते हुए धोखाधड़ीपूर्ण विक्रय विलेख को निरस्त कर दिया तथा बिल्डर को उनकी भूमि पर किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप करने से स्थायी रूप से रोक दिया। न्यायालय ने माना कि पूरा लेनदेन सरकार और बिल्डर की मिलीभगत, मिथ्या प्रतिरूपण तथा भूमि अधिग्रहण शक्तियों के दुरुपयोग का परिणाम था।
छटीकरा स्थित गरुण गोविंद मंदिर के सामने खसरा नंबर 393 की 7.4860 हेक्टेयर जमीन के लिए 14 वर्ष से लड़ाई लड़ रहा सेंगर परिवार न्याय मिलने पर बहुत खुश है।
गौरतलब है कि सनसिटी अनंतम के लिए ऐसा ही प्रयास जिला प्रशासन के पत्र पर नगर निगम मथुरा-वृंदावन द्वारा किया जा रहा है, हालांकि कई प्रयासों के बाद अभी तक लेंड एक्सचेंज का प्रस्ताव पास नहीं हो सका लेकिन कोशिश जारी है।
-Legend News
सोमवार, 23 फ़रवरी 2026
MVDA के भ्रष्टाचार की बुनियाद पर तेजी से खड़ा हो रहा है 5 सितारा प्रोजेक्ट, शिकायतें डस्टबिन में
वृंदावन हो या गोवर्धन, कोसी हो या बरसाना, या फिर मथुरा शहर ही क्यों न हो। MVDA (मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण) के क्षेत्र में कहीं भी हो रहा निर्माण कार्य उसके भ्रष्टाचार की दास्तान चीख-चीख कर सुना रहा है किंतु न कोई सुनने वाला है और न एक्शन लेने वाला क्योंकि इस हमाम में सब नंगे जो हैं। कॉलोनी, होटल, दुकान, मकान, मॉल, आश्रम, धर्मशाला, हॉस्पिटल, गेस्ट हाउस, यहां तक कि कारों के शोरूम भी इस धर्म नगरी में अधर्म के रास्ते पर चलकर खड़े कर दिए गए और लगातार खड़े किए जा रहे हैं किंतु कहीं किसी पर कोई लगाम भी लगती नजर नहीं आ रही।
ऐसा नहीं है कि लोग शिकायत नहीं करते। शिकायतें भी हो रही हैं, परंतु नतीजा शून्य निकल रहा है क्योंकि शिकायतों का निस्तारण ही शब्दों के जाल में इस कदर उलझाकर किया जाता है कि शिकायतकर्ता अपना माथा पीटने पर मजबूर हो जाता है। आखिर में उसके पास एक ही ऑप्शन बचता है, और बचता है न्यायालय की शरण में जाने का।
हालांकि वहां से भी अब तक अवैध निर्माण करने वालों के खिलाफ तो फैसले आए है परंतु कराने वाले जिम्मेदार अधिकारी साफ बच निकलते हैं इसलिए उनका भ्रष्टाचार बदस्तूर जारी रहता है। कानून की किताब में बेशक रिश्वत लेने वाला और देने वाला दोनों को दोषी माना जाता हो, किंतु अधिकांशत: नुकसान देने वाले को ही उठाना पड़ता है।
MVDA के भ्रष्टाचार की बुनियाद पर कोसी में तेजी से खड़ा हो रहा है पांच सितारा होटल Country Inn
दिल्ली-मथुरा-आगरा नेशनल हाईवे पर लगभग 14 एकड़ में फैला होटल Country Inn मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के भ्रष्टाचार का एक और ज्वलंत उदाहरण है।
इस पांच सितारा प्रोजेक्ट के लिए बेखौफ किए जा रहे अवैध निर्माण कार्य और सरकारी जमीन कब्जाने की शिकायत जब हुई तो प्राधिकरण की ओर से 30 अक्टूबर 2025 को इस आशय का जवाब दिया गया कि स्थल का निरीक्षण किया गया। मानचित्र स्वीकृत कराए बिना निर्माण कार्य कराए जाने पर उत्तर प्रदेश नगर योजना एवं विकास अधिनियम की धारा 1973 के तहत सुसंगत धाराओं के अंतर्गत वाद संख्या MTDA/Z2/ANI/2025/00000680 योजित किया गया है।
तत्पश्चात् आवेदक/निर्माणकर्ता द्वारा शमन मानचित्र प्रस्तुत किए गए हैं। स्थलीय एवं अभिलेखीय सत्यापन कर जांच आख्या उपलब्ध कराने के लिए तहसीलदार छाता को पत्र दिनांक 06.10.2025 प्रेषित किया गया है।
तहसीलदार छाता की जांच आख्या क्या कहती है?
तहसीलदार छाता ने इस प्रकरण में 13 फरवरी 2026 को अपनी जांच आख्या प्रस्तुत करते हुए लिखा- लेखपाल कोसी द्वारा मौके का निरीक्षण किया गया। राजस्व निरीक्षक की आख्या के अनुसार यह प्रकरण नगर पालिका कोसी कलां की आबादी का है। कुल मिलाकर सरकारी जमीन को कब्जामुक्त कराने का जिम्मा अब नगर पालिका कोसीकलां के पाले में डाल दिया गया।
रही बात बिना नक्शा पास कराए एक प्राइम लोकेशन पर पांच सितारा होटल खड़ा किए जाने की तो उसके लिए मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के अधिकारी होटल मालिकों को बीच का रास्ता निकालने की सलाह उसी प्रकार दे रहे हैं, जिस प्रकार वह दूसरे अवैध निर्माण कार्यों के मामले में अब तक देते रहे हैं।
जाहिर है ये दूसरा रास्ता भी जल्द ही तब खुल जाएगा जब प्रोजेक्ट की लागत, बिना नक्शा पास कराए किए गए निर्माण कार्य तथा अन्य सभी अनियमितताओं से होने वाले लाभ-हानि को देखकर लेन-देन की रकम तय हो जाएगी और उसकी पहली किस्त अधिकारियों तक पहुंचा दी जाएगी।
विकास प्राधिकरण के ही सूत्र बताते हैं होटल Country Inn के मालिकों से विकास प्राधिकरण के अफसरों की बैठकों का सिलसिला जारी है, और उम्मीद है कि शीघ्र ही 'सुविधा शुल्क' के लेन-देन की प्रक्रिया पूरी हो जाएगी। फिर प्रक्रिया पूरी होते ही योजित वाद संख्या MTDA/Z2/ANI/2025/00000680 को समायोजित कर लिया जाएगा।
वाद समायोजित होने के साथ ही सब-कुछ उसी तरह आयोजित होगा जिस तरह अब तक होता रहा है। ये बात अलग है कि शिकायतकर्ता एकबार फिर इसलिए अपना सिर पीट लेगा कि आखिर उसने शिकायत की ही क्यों थी, और शिकायत का नतीजा क्या निकला।
-Legend News
शनिवार, 14 फ़रवरी 2026
योगी जी! यहां तो 'सरकार' ही करा रहे हैं 'सरकारी जमीन' पर माफिया का कब्जा, अब आप क्या करेंगे?
उत्तर प्रदेश फार्मा कॉन्क्लेव 1.0 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का दिया गया एक बयान इन दिनों बहुत वायरल हो रहा है। इस बयान में वह प्रदेश के 'लैंड बैंक' का जिक्र करते हुए बताते हैं कि हमने सत्ता संभालने के बाद 'भूमाफिया टास्क फोर्स' गठित कर भूमाफिया को इस आशय की कड़ी चेतावनी दी कि वह या तो 24 घंटों के अंदर सरकारी जमीन खाली कर दे अन्यथा जमीन तो कब्जा मुक्त करवाई ही जाएगी, साथ ही उससे जो लाभ अर्जित किया गया है उसकी भी वसूली ब्याज सहित की जाएगी। सीएम योगी का बयान सर-माथे, लेकिन उन्हें ये कौन बताए कि जब स्वयं को संपूर्ण सरकार मानकर काम करने वाले जिला स्तरीय अधिकारी ही माफिया से मिलीभगत कर सरकारी जमीन पर कब्जा करा रहे हों, तो उनसे निपटने के लिए कौन सी टास्क फोर्स सामने आएगी और उनके द्वारा अर्जित किए गए लाभ की ब्याज सहित वसूली कैसे होगी।
मामला योगीराज श्रीकृष्ण की पावन क्रीड़ास्थली वृंदावन से जुड़ा है। जहां भूमाफिया की शक्ल में सक्रिय कॉलोनाइजर को नगर निगम की बेशकीमती जमीन देने की आतुरता में बार-बार बोर्ड बैठक के दौरान प्रस्ताव रखा जाता है और मीडिया द्वारा सारे खेल का खुलासा करने पर जिम्मेदार अधिकारी बाकायदा जांच कराकर लिखत-पढ़त में यह स्वीकार करते हैं कि लैंड एक्सचेंज का प्रस्ताव पास होने से पहले ही निगम की जमीन पर माफिया काबिज है और उसने वहां अवैध निर्माण करा लिया है।
यही नहीं, नगर निगम द्वारा अपनी जमीन पर किए गए अवैध निर्माण को ध्वस्त कराने के लिए 31 जनवरी 2026 के दिन डेवलपमेंट अथॉरिटी के नाम एक चिट्ठी भी लिखी जाती है परंतु न डेवलपमेंट अथॉरिटी के कान पर जूं रेंगती है और न उस सरकारी विभाग के, जिसकी जमीन को माफिया ने कब्जा लिया है।
मतलब नगर निगम ने मात्र चिट्ठी लिखकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली जबकि डेवलपमेंट अथॉरिटी कहती है कि नगर निगम तो अपनी जमीन स्वयं कब्जामुक्त कराने का अधिकार रखता है।
सच्चाई जो भी हो, फिलहाल तो जहां अधिकारियों का यह खेल जारी है वहीं माफिया इस प्रयास में लगा है कि किसी भी तरह सरकारी पत्राचार को यहीं विराम देकर अपना काम आगे बढ़ाया जाए।
बहरहाल, 'जिले की सरकार' ये खेल क्यों खेल रही है और माफिया को इतना मौका कैसे मिल रहा है... यह समझना 'रॉकेट सांइस' जितना जटिल नहीं है।
तब तो कतई नहीं जब मीडिया द्वारा इस बावत प्रश्न पूछने पर अधिकारी, मीडिया को ही देख लेने की धमकी देने लगें और नगर निगम में दोबारा घुसने का साहस करने पर सबक सिखाने की चेतावनी देकर सुरक्षागार्डों से बाहर का रास्ता दिखवा दें।
जाहिर है कि वृंदावन में डेवलप की जा रही सनसिटी अनंतम के मालिकों से पर्दे के पीछे कोई तो ऐसा 'छद्म एमओयू' साइन हुआ है जिसका मसौदा सामने आने पर हमाम के सारे चेहरे सामने आ सकते हैं।
यदि ऐसा नहीं हैं तो यह कैसे संभव है कि सीएम योगी के सारे आदेश-निर्देश ताक पर रखकर किसी जिले की सरकार अपनी बेशकीमती सरकारी जमीन का किसी निजी टाउनशिप के लिए विनिमय करने पर 'आमादा' है और ऊपर से नीचे तक के सारे अधिकारी एक-दूसरे के कंधे पर बंदूक रखकर काम पूरा करना चाहते हैं।
मीडिया के सामने आकर जवाब देने की बजाय क्यों ये अधिकारी चिट्ठी-चिट्ठी खेलते हुए निजी टाउनशिप के लिए भी लैंड एक्सचेंज की पॉलिसी को जायज ठहराने के प्रयास में लगे हैं।
क्यों वो अपने ही पत्राचार में एक ओर तो स्वीकार करते हैं कि सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा और अवैध निर्माण कर लिया गया है और दूसरी ओर उसी माफिया के पक्ष में लाए गए लैंड एक्सचेंज के प्रस्ताव को नियम-कानून सम्मत ठहराने की कोशिश कर रहे हैं।
इसमें दो राय नहीं कि सीएम योगी के प्रयास से प्रदेश में सक्रिय माफिया हतोत्साहित हुआ है, लेकिन सच यह भी है जो सामने है और सबको दिखाई दे रहा है। अगर कोई आंखें मूंदे बैठा है तो वो तबका जो हर जिले में अपनी एक समानांतर सरकार चलाता है और जिसके प्रोत्साहन से माफिया 'जीरो टॉलरेंस' को भी 'जीरो' बनाकर छोड़ देता है।
बेहतर होगा सीएम योगी एकबार मथुरा जनपद के उस लैंड बैंक का भी मौका मुआयना कर लें और जान लें कि कैसे उस बेशकीमती लैंड बैंक में माफिया और अधिकारियों का कॉकस पूरी शिद्दत से सेंध लगा रहा है।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
बुधवार, 4 फ़रवरी 2026
सनसिटी अनंतम मामला: अपने ही बुने जाल में फंसा नगर निगम, एक पत्र से हुआ काले कारनामों का खुलासा
वृंदावन में सनसिटी अनंतम के नाम से डेवलप की जा रही टाउनशिप को नगर निगम मथुरा-वृंदावन द्वारा लेंड एक्सचेंज की आड़ लेकर बेशकीमती जमीन देने की कोशिश का मामला अब निगम के ही गले की फांस बनता दिखाई दे रहा है।
अरबों रुपए के रियल एस्टेट प्रोजेक्ट के लिए भूमाफिया को जमीन देने का प्रयास भले ही फिलहाल बोर्ड की बैठकों में प्रस्ताव पेश करने से आगे न बढ़ा हो, किंतु नगर निगम के एक नए पत्र से इस बात का खुलासा जरूर हो गया है कि सारी कवायद उस करोड़ों रुपए की रिश्वत को पचाने की खातिर की जा रही है जो शासन में जनप्रतिनिधि और प्रशासन में अधिकारियों की शक्ल लेकर बैठे लोग ले चुके हैं।देखें नगर निगम द्वारा बीती 31 जनवरी को जिलाधिकारी मथुरा के नाम लिखा गया पत्र
जनसुनवाई शिकायत दिनांक 17 जनवरी 2026 के निस्तारण का हवाला देकर लिखे गए इस पत्र के अनुसार दीपक शर्मा पुत्र लक्ष्मीनारायण शर्मा उर्फ ब्रज बिहारीशर्मा निवासी वृंदावन बांगर, तहसील व जिला मथुरा ने मुख्यमंत्री पोर्टल पर एक शिकायत की है।
शिकायत के मुताबिक नगर निगम मथुरा-वृंदावन द्वारा सनसिटी अनंतम को टाउनशिप डेवलप करने के लिए काफी कम कीमत में अपनी जमीन विनिमय की जा रही है।
दीपक शर्मा की इसी शिकायत का जनसुनवाई के माध्यम से निस्तारण करते हुए नगर निगम ने जिलाधिकारी मथुरा को जो पत्र लिखा है, वह बताता है कि नगर निगम द्वारा इस संदर्भ में एक जांच कराई गई। जांच में पाया गया कि विनिमय में भूमि की बिक्री नहीं की जाती, अलबत्ता भूमि के मूल्य का आंकलन करके विनिमय किया जाता है।
नियमानुसार भूमि के विनिमय में सिर्फ 5 प्रतिशत अंतर मान्य है और नगर निगम द्वारा सनसिटी अनंतम को जितनी भूमि देने का प्रस्ताव लाया गया था, उससे अधिक क्षेत्रफल की भूमि नगर निगम को प्राप्त हो रही है। हालांकि प्रश्नगत भूमि का विनिमय अभी स्वीकृत नहीं हुआ है।
अपर नगर आयुक्त के हस्ताक्षर से जिलाधिकारी को भेजा गया यह पत्र ही न सिर्फ कई गंभीर सवाल खड़े करता है बल्कि यह भी जाहिर कराता है कि किसी न किसी स्तर पर सनसिटी अनंतम के प्रमोटर्स की कोई दुरभि संधि हुई है, जिसका उल्लेख सूत्रों के हवाले से लीजेण्ड न्यूज़ अपनी इससे पहली रिपोर्ट में कर चुका है।
जानिए कैसे?
वो इस तरह कि शिकायत का निस्तारण करते हुए नगर निगम ने लिखा है- विनिमय के लिए भूमि के मूल्य में सिर्फ 5 प्रतिशत का अंतर मान्य है।
अब यहीं एक पहला गंभीर सवाल तो यह खड़ा होता है कि ये 5 प्रतिशत का अंतर सनसिटी अनंतम के पक्ष में लाभकारी है या नगर निगम के पक्ष में?
दूसरा सवाल यह कि करोड़ों रुपए मूल्य की सरकारी जमीन के विनिमय में क्या 5 प्रतिशत का अंतर कोई अहमियत नहीं रखता, और यदि रखता तो नगर निगम ने अब तक साफ क्यों नहीं किया कि उसे सनसिटी के लिए लेंड एक्सचेंज करने में लाभ हो रहा है अथवा हानि?
तीसरा स्वाभाविक सवाल यह है कि एक सरकारी जमीन के निजी कंपनी के पक्ष में विनिमय की पहल किसने तथा किस स्तर से की?
चौथा सवाल कि अगर सनसिटी अनंतम की भूमि नगर निगम की भूमि से ज्यादा मूल्यवान है तो वो उसे एक्सचेंज करना क्यों चाहते हैं, और यदि नगर निगम की भूमि अधिक कीमती है तो नगर निगम किस स्वार्थ में सनसिटी अनंतम को अपनी जमीन देने का प्रस्ताव लेकर क्यों आया?
पांचवां प्रश्न यह है कि क्या शासन की स्वीकृति के बिना जिला प्रशासन की कोई इकाई इस तरह किसी प्राइवेट प्रोजेक्ट के लिए लेंड एक्सचेंज का प्रस्ताव ला सकती है?
और अंतिम प्रश्न कि जब इस भूमि के विनिमय का प्रस्ताव पास ही नहीं हुआ तो सनसिटी अनंतम कैसे इस भूमि पर काबिज हो गया, क्यों व किसके प्रोत्साहन से इस भूमि पर उसने अवैध निर्माण कार्य शुरू करा दिया। जिसकी पुष्टि खुद नगर निगम ने अपनी जांच के उपरांत की है तथा जिसे ध्वस्त कराने के लिए नगर निगम ने 22 जनवरी 2026 को ही मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के नाम भी एक पत्र लिखा है।
इन सब प्रश्नों के अतिरिक्त एक बड़ा अहम प्रश्न यह भी है कि क्या नगर निगम को अपनी ही जमीन को कब्जामुक्त कराने तथा उस पर किए जा रहे अवैध निर्माण को रोकने तथा ध्वस्त कराने के लिए मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण की जरूरत है, क्या नगर निगम के पास अपने ऐसे अधिकार नहीं हैं कि वह अपनी जमीन को भूमाफिया के चंगुल से छुड़ाकर उस पर काबिज हो सके?
आपसी सहमति से खेला जा रहा सारा खेल
दरअसल, हकीकत यह है कि लेंड एक्सचेंज का यह खेल अब तक बाकायदा एक षड्यंत्र के तहत आपसी सहमति से खेला जा रहा था, किंतु जब पहले तो एनजीटी में इसके खिलाफ याचिका दायर हुई और फिर मीडिया में आने के बाद शासन स्तर पर शिकायतें होने लगीं तो नगर निगम अपनी गर्दन बचाने की कवायद करने लगा।
जरा सोचिए कि जो जमीन सनसिटी अनंतम को देने के लिए नगर निगम बार-बार बोर्ड बैठक में प्रस्ताव लेकर आ रहा था, उस जमीन पर अवैध कब्जा तथा अवैध निर्माण की जानकारी नगर निगम को अब तक क्यों नहीं हुई। और जब हुई है तब भी उसे कब्जामुक्त कराने तथा अवैध निर्माण ध्वस्त कराने के लिए वह चिट्ठी-चिट्ठी क्यों खेल रहा है। वो इसलिए कि बहुत जल्द सारा प्रकरण सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर दस्तक देने जा रहा है।
हां! एक बात और कि इस काले कारनामे में मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण भी हर स्तर पर सहभागी है, लिहाजा जब बात निकलेगी तो बहुत दूर तलक जाएगी ही। विकास प्राधिकरण के अधिकारी भी आखिर कब तक खैर मनाने में कामयाब होंगे। आगे-आगे देखिए... होता है क्या?
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
दरअसल, हकीकत यह है कि लेंड एक्सचेंज का यह खेल अब तक बाकायदा एक षड्यंत्र के तहत आपसी सहमति से खेला जा रहा था, किंतु जब पहले तो एनजीटी में इसके खिलाफ याचिका दायर हुई और फिर मीडिया में आने के बाद शासन स्तर पर शिकायतें होने लगीं तो नगर निगम अपनी गर्दन बचाने की कवायद करने लगा।
जरा सोचिए कि जो जमीन सनसिटी अनंतम को देने के लिए नगर निगम बार-बार बोर्ड बैठक में प्रस्ताव लेकर आ रहा था, उस जमीन पर अवैध कब्जा तथा अवैध निर्माण की जानकारी नगर निगम को अब तक क्यों नहीं हुई। और जब हुई है तब भी उसे कब्जामुक्त कराने तथा अवैध निर्माण ध्वस्त कराने के लिए वह चिट्ठी-चिट्ठी क्यों खेल रहा है। वो इसलिए कि बहुत जल्द सारा प्रकरण सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर दस्तक देने जा रहा है।
हां! एक बात और कि इस काले कारनामे में मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण भी हर स्तर पर सहभागी है, लिहाजा जब बात निकलेगी तो बहुत दूर तलक जाएगी ही। विकास प्राधिकरण के अधिकारी भी आखिर कब तक खैर मनाने में कामयाब होंगे। आगे-आगे देखिए... होता है क्या?
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
शुक्रवार, 23 जनवरी 2026
बड़े खेल का खुलासा: करोड़ों की पेशगी लेकर लाया गया नगर निगम की जमीन कॉलोनाइजर को देने का प्रस्ताव, PIL दायर करने की तैयारी
वृंदावन में कुछ खास कॉलोनाइजर के लिए लेंड एक्सचेंज का प्रस्ताव यूं ही नहीं लाया गया। इसके लिए षड्यंत्र के तहत बाकायदा एक ''दुरभि संधि'' की गई। चूंकि मामला करोड़ों का नहीं, अरबों रुपए का था इसलिए करोड़ों रुपए तो पेशगी में ही दे दिए गए। हालांकि अब नगर आयुक्त कह रहे हैं कि ये प्रस्ताव दफन किया जा चुका है लिहाजा भविष्य में ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं लाया जाएगा। नगर आयुक्त कुछ भी कहें, लेकिन सवाल तो यह है कि निजी टाउनशिप के लिए पहले तो मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण और फिर मथुरा-वृंदावन नगर निगम, ये प्रस्ताव लेकर आया ही क्यों?
इस 'क्यों' का जवाब देने को कोई तैयार नहीं है इसलिए कुछ जागरूक लोग न्यायालय की शरण में जाने की तैयारी कर चुके हैं। वो इसे उच्च न्यायालय और फिर जरूरत पड़ने पर उच्चतम न्यायालय तक ले जाना चाहते हैं ताकि बेशकीमती सरकारी जमीन को माफिया के कब्जे में जाने से बचाया जा सके।
एनजीटी में ये मामला पहले ही जा चुका है और वहां से सभी संबंधित पक्षों को नोटिस भी जारी किए जा चुके हैं, परंतु अब लोगों को समझ में आ गया है कि डालमिया बाग की तरह इस केस को भी उच्च या उच्चतम न्यायालय ले जाना ही उपयुक्त होगा इसलिए वो इसकी तैयारी कर चुके हैं।
वृंदावन निवासी लक्ष्मीनारायण उर्फ ब्रजबिहारी शर्मा तथा दीपक शर्मा ने कल इसी संदर्भ में जिलाधिकारी मथुरा के नाम एक ज्ञापन सौंपा है और उसकी प्रति लोकायुक्त को भी भेजी है।
शिकायतकर्ताओं ने इस ज्ञापन में लिखा है कि इस ''लेंड एक्सचेंज'' का प्रस्ताव पेश करने से पहले न तो विकास प्राधिकरण ने और ना ही नगर निगम ने पारदर्शिता एवं नियमों का पालन किया जिससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि ऐसा एक निजी कंपनी को अनुचित लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से किया गया।
शिकायतकर्ताओं ने इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराने का अनुरोध किया है जिससे प्रस्ताव लाने के पीछे छिपी मंशा सामने आ सके और इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों को कठघरे में खड़ा किया जा सके।
मथुरा जिला प्रशासन तथा नगर निगम मथुरा-वृंदावन से जुड़े भरोसेमंद सूत्र बताते हैं कि सनसिटी अनंतम एवं अन्य बिल्डर्स के पक्ष में लेंड एक्सचेंज का मात्र प्रस्ताव लाने की पेशगी करीब 5 करोड़ रुपए प्राप्त की गई तथा 'शेष के लिए' पूरी 'साजिश' बनाई गई कि किसको किस तरह और कितना-कितना लाभ पहुंचाना है।
ये सारा काम कितनी गोपनीयता से किया जा रहा था, इसका अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि सनसिटी अनंतम के मालिकों तक का नाम किसी को नहीं बताया जाता।
सूत्र बताते हैं कि सैकड़ों एकड़ की इस टाउनशिप के मालिकों में मुख्य रूप से ZEE TV के मालिक सुभाष चंद्रा के भाई लक्ष्मी गोयल तथा उनके समधी (जो एक्शन शू कंपनी के मालिक) शामिल हैं।
इनके अलावा जिन अन्य के लिए लेंड एक्सचेंज का प्रस्ताव लाया गया, उनमें द्वारिकादास जीवराजका मैमोरियल ट्रस्ट तथा हरिनिवास खेतान मैमोरियल ट्रस्ट द्वारा विकसित की जा रही कॉलोनियों का नाम है।
''लीजेंड न्यूज़'' ने जब इस पूरे प्रकरण में कानूनी विशेषज्ञों की राय ली तो उन्होंने इसे साफ तौर पर पद के दुरुपयोग तथा निजी स्वार्थ की पूर्ति के लिए बदनीयती का मामला बताया, जो आपराधिक कृत्य बनता है।
कानूनी विशेषज्ञों की राय में ये न सिर्फ नियमों को ताक पर रखकर माफिया के एजेंट की तरह काम करने का अपराध है बल्कि इससे साफ-साफ जाहिर होता है कि मथुरा जिले के अधिकारी तो बिक ही चुके हैं, जनप्रतिनिधि भी ऑब्लाइज हैं अन्यथा ये मुद्दा अब तक विधानसभा में भी उठ जाना चाहिए था।
कानून के जानकारों की मानें तो इस पूरे प्रकरण में प्रशासनिक अधिकारियों सहित मेयर की भी भूमिका संदिग्ध प्रतीत होती है और इसलिए यदि इसकी निष्पक्ष जांच हो जाती है तो साफ हो जाएगा कि आखिर क्यों कुछ खास कॉलोनाइजर के पक्ष में लेंड एक्सचेंज के लिए प्रशासन से लेकर निगम तक में बैठे जिम्मेदार लोग इतने उतावले हैं।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
गुरुवार, 15 जनवरी 2026
माफिया पर मेहरबान प्रशासन: कौड़ियों की जमीन के बदले नगर निगम की बेशकीमती जमीन देने की तैयारी
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हर तीसरे दिन, और अपने प्रत्येक जनता दर्शन कार्यक्रम में कहते रहते हैं कि भूमाफिया किसी भी तरह पनपने न पाए। वह राज्य से माफिया को नेस्तनाबूद करने के आदेश और निर्देश अधिकारियों को देते रहते हैं, लेकिन यदि मेढ़ ही खेत को खाने पर आमादा हो तो सीएम योगी कर क्या सकते हैं। ऐसे में एक योगी क्या, योगी जैसे दस मिलकर भी शायद कुछ नहीं कर सकते। दूसरे जनपदों का यहां जिक्र न किया जाए तो कम से कम मथुरा का जिला प्रशासन भली-भांति समझ चुका है कि वह चाहे जितना खुल कर खेले, चाहे जितना भ्रष्टाचार करे किंतु उसका कुछ नहीं बिगड़ने वाला। तभी तो धर्म की नगरी में अधर्म का डंका डटकर बज रहा है और जिसकी जितनी बिसात है, वह उतनी ही माफिया की मदद करने पर आमादा है।
तभी तो पहले डालमिया बाग और अब सनसिटी अनंतम का मामला भी अदालत की चौखट तक पहुंचा, अन्यथा इसकी जरूरत ही क्यों पड़ती।
ताजा मामला एक बार फिर वृंदावन के सनसिटी अनंतम से जुड़ा है जिसे नगर निगम मथुरा-वृंदावन की बेशकीमती जमीन उपलब्ध कराने के लिए जिला प्रशासन के निर्देश पर बोर्ड बैठक में बाकायदा प्रस्ताव लाया गया।
आश्चर्य की बात यह है कि यह प्रस्ताव कौड़ियों की जमीन के बदले नगर निगम की बेशकीमती जमीन देने का है, जिस पर पूर्व में एक जिलाधिकारी आपत्ति भी दर्ज करा चुके हैं। अब यह प्रस्ताव निगम की बैठक में फिर लाया गया है।
क्या है प्रस्ताव?
9 अक्टूबर 2025 को पेश एजेण्डे के अनुसार अपर जिलाधिकारी (प्रशासन) मथुरा ने ग्राम जैत व छटीकरा में सनसिटी हाईटेक प्रोजेक्ट प्रा. लि. द्वारा विकसित की जा रही टाउनशिप के लिए भूमि विनिमय का प्रस्ताव बोर्ड से पास कराकर उपलब्ध कराने के निर्देश पत्रांक-322/सात-बी/भू.व्य./2023 दिनांक 06.09.2023 एवं 173/सात- बी/भू.व्य./2023 दिनांक 23.09.2024 के जरिए दिए हैं।
इस नए प्रस्ताव के मसौदे में बताया गया है कि ग्राम जैत व छटीकरा में सनसिटी हाईटेक प्रोजेक्ट प्रा. लि. द्वारा विकसित की जा रही टाउनशिप के लिए भूमि के विनिमय का जो प्रस्ताव कार्यकारिणी ने पहले रखा था, उसकी त्रुटियों को संशोधित करते हुए यह प्रस्ताव लाया गया है।
यहां यह जान लेना जरूरी है कि सनसिटी हाईटेक ने अपनी प्रस्तावित टाउनशिप में जमीन का प्राथमिक मूल्य लगभग एक लाख रुपए प्रति वर्ग गज रखा है जबकि मथुरा-वृंदावन नगर निगम को उसके विनिमय में जो भूमि मिलनी है उसकी कीमत बमुश्किल 10 हजार रुपए प्रति वर्ग गज है।
देखें नगर निगम मथुरा-वृंदावन की बोर्ड बैठक में पेश एजेण्डे की प्रति-
गौरतलब है कि समूचा मथुरा जनपद और विशेषकर भगवान श्रीकृष्ण की लीलास्थली वृंदावन इन दिनों ''धार्मिक पर्यटन'' के रूप में अपनी वैश्विक पहचान बना चुका है। वृंदावन में जमीनों के दाम आसमान छू रहे हैं इसलिए स्थानीय ही नहीं, बाहरी भूमाफिया भी इसका भरपूर लाभ उठाने में लगे हैं। चूंकि जिला प्रशासन उन्हें इसकी पूरी छूट दे रहा है इसलिए वह कोई मौका हाथ से जाने नहीं देना चाहते।
इन हालातों में यह बताने की तो आवश्यकता ही नहीं रह जाती कि मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण हो या फिर नगर निगम मथुरा-वृंदावन, सब आखिर कथित कॉलोनाइजर्स या यूं कहें कि भूमाफिया पर इतने मेहरबान क्यों हैं, और क्यों जिला प्रशासन विकास की आड़ लेकर भूमाफिया को सीधा लाभ पहुंचाने की जद्दोजहद में लगा है।
दरअसल ये सारा खेल करोड़ों का नहीं, अरबों का है। जाहिर है कि इससे होने वाली हराम की कमाई कितनी भी मामूली क्यों न हो, कुबेर के खजाने से कम नहीं होगी। राधे-राधे की रट लगाकर ब्रजवासियों को मूर्ख बनाने का यह धंधा बेशक बहुत दिनों से चल रहा है लेकिन अदालतें उम्मीद की किरण दिखा रही हैं।
वो आशा जगाती हैं कि कभी न कभी तो पाप का यह घड़ा भरेगा, और किसी न किसी दिन यह फूटेगा भी। तब अकेला माफिया नहीं, नेता और अधिकारी भी नापे जाएंगे। काली कमली वाले की नजर जिस दिन टेढ़ी हो गई, उस दिन ब्रज में यह कहावत चरितार्थ होते दिखाई देगी कि उसके घर में देर भले ही हो लेकिन अंधेर नहीं होता।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
शुक्रवार, 26 दिसंबर 2025
सनसिटी अनंतम: विकास प्राधिकरण के भ्रष्टाचार की अनंत कथा का ज्वलंत उदाहरण
महाभारत नायक योगीराज भगवान श्रीकृष्ण की लीला स्थली में डेवलव हो रही 'सनसिटी अनंतम' को यदि MVDA (मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण) के भ्रष्टाचार की अनंत कथा का एक अध्याय कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। दूसरे शब्दों में कहें तो इस विश्व प्रसिद्ध धार्मिक नगरी की डेवलपमेंट अथॉरिटी के हर प्रोजेक्ट का आदि और अंत भ्रष्टाचार की एक ऐसी अनंतकथा होता है जिसमें पर्त-दर पर्त 'योगीराज' के आदेश-निर्देशों सहित नियम-कानून की धज्जियां उड़ाई जाती हैं। फिर वह चाहे MVDA का अपना प्रोजेक्ट हो या उसके द्वारा अधिकृत किसी का निजी प्रोजेक्ट।
डालमिया बाग के गुरू कृपा तपोवन में डेवलपर को अनुचित लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से की गई अनेक कारस्तानियों के बाद अब मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण ने सनसिटी अनंतम से जुड़े रियल एस्टेट कारोबारियों के हित में वो काम कर दिखाया है जिसकी जांच की जाए तो भ्रष्टाचार की एक ऐसी मिसाल सामने होगी जिसकी सामान्यत: कल्पना करना भी मुश्किल होगा। साधारण शब्दों में कहें तो वृंदावन के इस लग्जरी हाउसिंग प्रोजेक्ट के लिए MVDA के खास जिम्मेदार अधिकारी ने एक रियल एस्टेट के ''दलाल'' की भूमिका अदा की है।
दस्तावेज पेश कर रहे हैं MVDA के काले कारनामों की दास्तान
दरअसल, 31 अगस्त 2024 को उत्तर प्रदेश प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड ने सनसिटी अनंतम का एक औपचारिक निरीक्षण किया। बोर्ड के अधिकारियों ने इस निरीक्षण में पाया कि प्रोजेक्ट के लिए मौके पर न तो कोई पर्यावरण प्रबंधन की योजना थी, न कोई कार्यशील सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट। यहां तक कि कोई ऐसी मशीनरी भी मौके पर उपलब्ध नहीं थी जिससे यह पता लगता हो कि 400 एकड़ से अधिक भूखंड पर प्रस्तावित प्रोजेक्ट के लिए इस तरह की मंशा भी रही हो।
इन हालातों को देखकर UPPCB ने इस आशय की स्पष्ट अनुशंसा की कि सनसिटी अनंतम नामक हाउसिंग प्रोजेक्ट का अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) अस्वीकृत किया जाए किंतु आश्चर्यजनक रूप से MVDA ने UPPCB की अनुशंसा के उलट चंद दिनों बाद ही 24 सितंबर 2024 को यूपी टाउनशिप पॉलिसी-2023 के तहत इसके लिए लाइसेंस जारी कर दिया जिसका नंबर 1836 है।
अधिकारियों के ''दलाल'' बन जाने की पुष्टि करता पत्र
सनसिटी अनंतम को डेवलप कराने के अथक प्रयासों में अधिकारियों की दलाल वाली भूमिका का खुलासा उस पत्र द्वारा होता है जो MVDA के तत्कालीन उपाध्यक्ष श्याम बहादुर सिंह के हस्ताक्षर से 28 जून 2025 को जिलाधिकारी मथुरा को लिखा गया है और जिसमें डीएम के समक्ष 5.8236 हेक्टेयर भूमि के अधिग्रहण का प्रस्ताव रखा गया है।
यह पत्र मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण में बेखौफ भष्टाचार का बड़ा सबूत है क्योंकि इसमें नियामक और लाभार्थी के बीच की रेखा को ताक पर रखकर बिल्डर को ही आवेदक बता दिया गया है।
आरटीआई पर खामोशी भी बहुत कुछ कहती है
यहां गौर करने वाली बात यह है कि राज्य की एक महत्वपूर्ण इकाई निजी स्वार्थ में किस कदर अंधी है कि वह सनसिटी अनंतम के हित में खेले जा रहे इस खेल की कोई जानकारी तक देने को तैयार नहीं है और आरटीआई का इस्तेमाल करने वालों को लगातार गुमराह करती रही है। कुछ आरटीआई का जवाब नहीं दिया जाता तो कुछ को शब्दों के जाल में उलझा दिया जाता है जिससे आवेदनकर्ता थक-हार कर घर बैठ जाए।
दरअसल, मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण आरटीआई के मामले में एक लंबे समय से इसी रणनीति को अख्तियार किए हुए है और इससे अपने मकसद में सफल होता रहा है।
चौंकाता है लेन-देन का यह गणित
रियल एस्टेट कारोबार से जुड़े माफिया और डेवलपमेंट अथॉरिटी की कुटिल चालों वाली प्रक्रिया से सामने आने वाला लेन-देन का गणित किसी को भी चौंका सकता है।
अगर बात करें सनसिटी अनंतम की तो यहां का वर्तमान अनुमानित सर्किल रेट 20 करोड़ रुपए प्रति हेक्टेयर है जबकि डेवलपर की ओर से वर्तमान विक्रय मूल्य रखा गया है 1 लाख रुपए वर्ग मीटर। इस हिसाब से यह मूल्य बनता है लगभग 100 करोड़ रुपए (एक अरब) प्रति हेक्टेयर यानी अधिग्रहण के अधिकतम मूल्य से भी पूरा पांच गुना ज्यादा। संभवत: यही कारण है कि आज हर वो व्यक्ति रियल एस्टेट के करोबार में उतरने को आतुर रहता है जिसके पास थोड़ा भी पैसा है।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता और सनसिटी अनंतम के याचिकाकर्ता की ओर से एनजीटी में पैरवी कर रहे नरेन्द्र कुमार गोस्वामी कहते हैं कि भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापना अधिनियम 2013 के तहत निजी कंपनियों के लिए अधिग्रहण हेतु 80% प्रभावित परिवारों की सहमति अनिवार्य है लेकिन इस मामले में सार्वजनिक सुनवाई के अभिलेख सहमति नहीं बल्कि बड़ी आपत्तियाँ और 'असहमति' दर्शाते हैं।
पहले डालमिया बाग और अब सनसिटी अनंतम के लिए मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण की रियल एस्टेट माफिया के साथ साबित होती सांठगांठ यह बताती है कि विकास प्राधिकरण के अधिकारियों को योगी आदित्यनाथ की भ्रष्टाचार को लेकर प्रचारित जीरो टॉलरेंस नीति के सच का पता लग चुका है।
वह जान गए हैं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ ढोल पीटने और उसके खिलाफ पूरी ताकत से खड़े हो जाने में बड़ा फर्क है। यदि ऐसा न होता तो मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के अनेक कारनामे खुल जाने के बावजूद किसी एक जिम्मेदार अधिकारी को कठघरे में खड़ा किया जाता। किसी से तो पूछा जाता कि धर्म की नगरी में खुलेआम खेले जा रहे अधर्म के इस खेल का असल खिलाड़ी कौन है और कौन है जो रियल एस्टेट माफिया को संरक्षण देता है।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
अधिकारियों के ''दलाल'' बन जाने की पुष्टि करता पत्र
सनसिटी अनंतम को डेवलप कराने के अथक प्रयासों में अधिकारियों की दलाल वाली भूमिका का खुलासा उस पत्र द्वारा होता है जो MVDA के तत्कालीन उपाध्यक्ष श्याम बहादुर सिंह के हस्ताक्षर से 28 जून 2025 को जिलाधिकारी मथुरा को लिखा गया है और जिसमें डीएम के समक्ष 5.8236 हेक्टेयर भूमि के अधिग्रहण का प्रस्ताव रखा गया है।
यह पत्र मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण में बेखौफ भष्टाचार का बड़ा सबूत है क्योंकि इसमें नियामक और लाभार्थी के बीच की रेखा को ताक पर रखकर बिल्डर को ही आवेदक बता दिया गया है।
आरटीआई पर खामोशी भी बहुत कुछ कहती है
यहां गौर करने वाली बात यह है कि राज्य की एक महत्वपूर्ण इकाई निजी स्वार्थ में किस कदर अंधी है कि वह सनसिटी अनंतम के हित में खेले जा रहे इस खेल की कोई जानकारी तक देने को तैयार नहीं है और आरटीआई का इस्तेमाल करने वालों को लगातार गुमराह करती रही है। कुछ आरटीआई का जवाब नहीं दिया जाता तो कुछ को शब्दों के जाल में उलझा दिया जाता है जिससे आवेदनकर्ता थक-हार कर घर बैठ जाए।
दरअसल, मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण आरटीआई के मामले में एक लंबे समय से इसी रणनीति को अख्तियार किए हुए है और इससे अपने मकसद में सफल होता रहा है।
चौंकाता है लेन-देन का यह गणित
रियल एस्टेट कारोबार से जुड़े माफिया और डेवलपमेंट अथॉरिटी की कुटिल चालों वाली प्रक्रिया से सामने आने वाला लेन-देन का गणित किसी को भी चौंका सकता है।
अगर बात करें सनसिटी अनंतम की तो यहां का वर्तमान अनुमानित सर्किल रेट 20 करोड़ रुपए प्रति हेक्टेयर है जबकि डेवलपर की ओर से वर्तमान विक्रय मूल्य रखा गया है 1 लाख रुपए वर्ग मीटर। इस हिसाब से यह मूल्य बनता है लगभग 100 करोड़ रुपए (एक अरब) प्रति हेक्टेयर यानी अधिग्रहण के अधिकतम मूल्य से भी पूरा पांच गुना ज्यादा। संभवत: यही कारण है कि आज हर वो व्यक्ति रियल एस्टेट के करोबार में उतरने को आतुर रहता है जिसके पास थोड़ा भी पैसा है।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता और सनसिटी अनंतम के याचिकाकर्ता की ओर से एनजीटी में पैरवी कर रहे नरेन्द्र कुमार गोस्वामी कहते हैं कि भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापना अधिनियम 2013 के तहत निजी कंपनियों के लिए अधिग्रहण हेतु 80% प्रभावित परिवारों की सहमति अनिवार्य है लेकिन इस मामले में सार्वजनिक सुनवाई के अभिलेख सहमति नहीं बल्कि बड़ी आपत्तियाँ और 'असहमति' दर्शाते हैं।
पहले डालमिया बाग और अब सनसिटी अनंतम के लिए मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण की रियल एस्टेट माफिया के साथ साबित होती सांठगांठ यह बताती है कि विकास प्राधिकरण के अधिकारियों को योगी आदित्यनाथ की भ्रष्टाचार को लेकर प्रचारित जीरो टॉलरेंस नीति के सच का पता लग चुका है।
वह जान गए हैं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ ढोल पीटने और उसके खिलाफ पूरी ताकत से खड़े हो जाने में बड़ा फर्क है। यदि ऐसा न होता तो मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के अनेक कारनामे खुल जाने के बावजूद किसी एक जिम्मेदार अधिकारी को कठघरे में खड़ा किया जाता। किसी से तो पूछा जाता कि धर्म की नगरी में खुलेआम खेले जा रहे अधर्म के इस खेल का असल खिलाड़ी कौन है और कौन है जो रियल एस्टेट माफिया को संरक्षण देता है।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
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