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गुरुवार, 10 अक्टूबर 2019

केतु काल में कांग्रेस: जरूरत है महामृत्‍युंजय के जाप की, लेकिन कांग्रेसी हैं कि तुलसी-गंगाजल हाथ में लेकर खड़े हैं

ज्योतिष के अनुसार सूक्ष्‍म में समझें तो किसी की कुंडली पर केतु का प्रभाव अथवा केतु काल या अशुभ केतु होने से उसके सामने जीवन-मरण का संकट उत्‍पन्‍न हो जाता है। उसे बड़ी सर्जरी की जरूरत होती है अन्‍यथा उसके जीवन पर बन आती है।
वैसे कुंडली का अशुभ ‘केतु’ पितृ दोष का सूचक भी होता है, जिसके बहुत गहरे प्रभाव पड़ते हैं। इन प्रभावों का अध्‍ययन और उपचार खुद कांग्रेस ही कर सकती है।
कांग्रेस की दिशा एवं दशा पर गौर करें तो साफ पता लगता है कि उसका केतु काल मनमोहन सरकार के दूसरे टर्म में ही प्रारंभ हो गया था, और 2019 आते-आते उसके प्रभाव स्‍पष्‍ट दिखाई देने लगे थे।
केत छुड़ावै खेत
कहते हैं जब कुंडली में केतु का अंतर आता है तब बड़े परिवर्तन की दरकार होती है। जो इस बात को समझते हुए परिस्‍थितियों के अनुरूप खुद को ढालकर आगे का मार्ग पकड़ लेते हैं वो सफल हो जाते हैं परंतु जो परिवर्तन के लिए तैयार नहीं होते वो उसके दुष्‍परिणाम भोगने को अभिशप्त होते हैं।
2019 के चुनाव परिणाम बताते हैं कि कांग्रेस ने केतु काल के दोष निवारण का कोई प्रबंध नहीं किया। उसने परिस्‍थितिजन्‍य परिवर्तन की बजाय लकीर पीटते रहने का मार्ग चुना, नतीजतन वह आज उस मुकाम पर आकर खड़ी हो गई है जहां महामृत्‍युंजय जैसे मंत्र की आवश्‍यकता है।
राहुल गांधी पलायन के रास्‍ते पर हैं और कांग्रेसी राह भटक रहे हैं, बावजूद इसके कांग्रेस पार्टी है कि समझने को तैयार ही नहीं।
आत्‍मघाती कदम
केतु काल के शुरूआती दौर की बात न भी की जाए तो पिछले दिनों सबसे सीनियर कांग्रेसी नेता जयराम रमेश ने कहा कि केंद्र सरकार के हर कदम को गलत ठहराना आत्‍मघाती साबित हो रहा है। अच्‍छे कार्यों का सकारात्‍मक संदेश देने में कोई हर्ज नहीं है।
उसी समय शशि थरूर ने भी यही कहा कि सरकार के प्रत्‍येक क्रिया-कलाप की सिर्फ और सिर्फ निंदा करना उचित नहीं। जनभावना के अनुरूप कल्‍याणकारी कार्यों के लिए सरकार को प्रोत्‍साहित करना भी विपक्ष की भूमिका का हिस्‍सा है।
कांग्रेस ने अपने इन दोनों नेताओं की सलाह को मानना तो दूर, उन्‍हें परोक्ष और अपरोक्ष रूप से यह बता दिया कि पार्टी के प्रति आपकी निष्‍ठा संदिग्‍ध प्रतीत हो रही है।
दो दिन पहले सलमान खुर्शीद ने एक अंग्रेजी अखबार को दिए अपने इंटरव्‍यू में कहा कि देश का मिज़ाज बदल गया है। देश के सोचने का तरीका बदल चुका है और इस बदले मिज़ाज का पता लगाकर ही समस्या का समाधान निकाला जा सकता है।
सलमान खुर्शीद ने कहा कि देश में और देश की सोच में ऐसे क्या परिवर्तन आए कि हम सिकुड़ कर इतने छोटे हो गए, यह हमें समझना होगा। हमें समझना होगा कि इतने शानदार नेताओं की इतनी शानदार पार्टी का यह हाल क्यों हो गया।
सलमान खुर्शीद के राहुल गांधी पर दिए बयान से कांग्रेस नेता राशिद अल्वी इतने खफा हो गए कि उन्होंने इशारों-इशारों में खुर्शीद को घर (कांग्रेस पार्टी) में आग लगाने वाला और पार्टी का दुश्मन तक बता दिया। बावजूद इसके सलमान खुर्शीद ने राहुल गांधी के अध्यक्ष पद से इस्तीफे पर दिए गए अपने बयान को दोहराते हुए कहा कि ऐसे वक्त में जब देश का मिज़ाज बदल गया है, राहुल का ‘छोड़ जाना’ कांग्रेस के लिए बड़ी मुसीबत है।
सलमान खुर्शीद के सुर में सुर मिलाते हुए पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव ज्योतिरादित्य सिंधिया ने दोहराया कि कांग्रेस को आत्म-अवलोकन की जरूरत है। वर्तमान में कांग्रेस की जो स्थिति है, उसमें आत्‍मचिंतन ही एकमात्र उपचार है। उन्होंने स्‍पष्‍ट कहा कि कांग्रेस फिलहाल महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव में जीत दर्ज नहीं करा पाएगी।
यही बात कांग्रेस के महाराष्‍ट्र में कद्दावर नेता संजय निरुपम ने भी कही। हालांकि उनकी नाराजगी के अन्‍य कारण भी थे।
संजय निरुपम ने तो पार्टी छोड़ने की धमकी देते हुए यहां तक कह दिया कि कांग्रेस में राहुल गांधी के वफादारों को इरादतन निशाना बनाया जा रहा है ताकि उनका राजनीतिक भविष्‍य चौपट किया जा सके।
संजय निरुपम से पहले हरियाणा कांग्रेस के प्रदेश अध्‍यक्ष अशोक तंवर ने अपने पद से इस्‍तीफा देते हुए यही आरोप लगाए थे। उन्‍होंने सीधे सीधे पार्टी हाईकमान यानी सोनिया गांधी पर निशाना साधते हुए कहा कि धीरे-धीरे उन सभी का सफाया करने की साजिश रची जा रही है जो राहुल गांधी की टीम में थे।
अशोक तंवर के अनुसार अभी बहुत सी राजनीतिक हत्याएं होना बाकी है। मैं अकेला नहीं हूं, बहुत लंबी लाइन है।
राशिद अल्‍वी ने संजय निरुपम और अशोक तंवर दोनों पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि कोई महाराष्ट्र से बोल रहा है तो हरियाणा से बोल रहा है। ऐसा लग रहा है कि हमें बाहर के दुश्मनों की जरूरत ही नहीं रह गई है। घर को आग लग गई, घर के ही चिराग से।
राहुल बनाम प्रियंका
कांग्रेस के तमाम नेताओं की बयानबाजी यह इशारा करती है कि कहीं न कहीं पार्टी के अंदर राहुल बनाम प्रियंका चल रहा है।
याद कीजिए कि 2019 के लोकसभा चुनावों से ठीक पहले जब प्रियंका गांधी को अचानक कांग्रेस में बड़ा पद देते हुए बड़ी जिम्‍मेदारी भी सौंपी गई थी तब इसे गेम चेंजर बताया गया था। कोई प्रियंका गांधी वाड्रा में इंदिरा गांधी की छवि देख रहा था तो कोई उन्‍हें कांग्रेस के लिए तारनहार घोषित करने पर आमादा था।
इस सबसे परे पार्टी के कुछ बड़े नेता दीवार पर लिखी उस इबारत को पढ़ पाने में सफल रहे थे, जो राहुल-प्रियंका की कथित जुगलबंदी के पीछे से नजर आ रही थी। ये नेता बहन-भाई के दर्शनीय प्रेम पर संदेह के बादल महसूस कर रहे थे परंतु नतीजों के इंतजार में थे।
नतीजे आए तो बहुत कुछ अपने आप सामने आ गया। अटकलों के दौर व किंतु-परंतु के बीच राहुल गांधी ने अंतत: पलायन का मार्ग चुना जिससे एकबार फिर पार्टी की कमान सोनिया गांधी के हाथों में आ गई।
इधर भाई राहुल गांधी के पलायन से ठीक विपरीत प्रियंका की सक्रियता में इजाफा हो गया। उन्‍होंने न तो राहुल की तरह अपने पद से इस्‍तीफा देने की पेशकश की और न हार के लिए जिम्‍मेदारी ओढ़ी। सोनिया गांधी ने भी एक समय बाद राहुल गांधी को लेकर प्रतिक्रिया देना बंद कर दिया।
जाहिर है कि इतना सबकुछ केवल इत्तिफाकन नहीं हुआ होगा। इसके पीछे कोई योजना जरूर काम कर रही थी। शायद इसी योजना की ओर इशारा करते हुए जहां संजय निरुपम और अशोक तंवर जैसे नेता खुलकर बोल रहे हैं वहीं सलमान खुर्शीद तथा ज्‍योतिरादित्‍य सिधिंया पॉलिश्ड तरीके से बता रहे हैं।
सलमान खुर्शीद और ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया का यह कहना कहां गलत है कि हमें देश का मिज़ाज समझना होगा। हमें आत्‍मचिंतन और आत्‍मावलोकन करना होगा।
सलमान खुर्शीद को संभवत: यह भान भी था कि उनके कहे पर हंगामा होगा और उनकी पार्टी के प्रति निष्‍ठा को लेकर सवाल उठाए जाएंगे, इसीलिए उन्‍होंने लगेहाथ यह कह दिया कि वो कांग्रेस छोड़कर कहीं जाने वाले नहीं हैं। वह कांग्रेसी हैं और कांग्रेसी ही रहेंगे।
किसी के भी दुर्दिनों की एक विशेषता यह होती है कि वह अपने हितैषियों को पहचान नहीं पाता। वह अपने और पराये के भेद को समझने में सक्षम नहीं रहता। इस स्‍थिति‍ को कोई मतिभ्रष्‍ट होना कहता है तो कोई ग्रहों का प्रभाव बताता है।
कांग्रेस के संदर्भ में लक्षण देखकर निष्‍कर्ष निकाला जाए तो दोनों बातें सही प्रतीत होती हैं।
तभी तो यह हाल है कि इस स्‍थिति‍ में जब पार्टी के लिए मृत-संजीवनी कहे जाने वाले महामृत्‍युंजय मंत्र का जाप करने की जरूरत है तब पार्टी के कुछ बड़े नेता तुलसी-गंगाजल हाथ में लेकर खड़े हैं।
उन्‍हें इंतजार है उस आखिरी हिचकी का जिसके बाद तुलसी-गंगाजल डालकर अपना धर्म व कर्म पूरा करते हुए शेष सांसें भी थम जाने की दुहाई दे सकें। बता सकें कि मृत देह से चिपके रहने का कोई औचित्‍य नहीं।
जो भी हो, लेकिन कांग्रेस का यह हाल देश और देशवासी दोनों के लिए नुकसानदेह है।
उस लोकतंत्र के लिए नुकसानदेह है जिसे अब तक कायम रखने के लिए कई बलिदान दिए गए। लोकतंत्र के लिए एक परिपक्‍व व मजबूत विपक्ष का होना अत्‍यन्‍त आवश्‍यक है। परिपक्‍व व मजबूत विपक्ष नहीं रहेगा तो लोकतंत्र पर खतरा मंडराने लगेगा।
कांग्रेस की समस्‍या यह है कि वह विपक्ष की भूमिका स्‍वीकार नहीं कर पा रही। निजी स्‍वार्थों से उठकर वह यह भी नहीं सोच पा रही कि विपक्ष की भूमिका निभाना भी देशहित में उतना ही महत्‍वपूर्ण है जितना सत्ता में रहकर सरकार चलाना।
यदि वह अपनी इस जिम्‍मेदारी का निर्वहन नहीं करती तो देश व देशवासियों की गुनाहगार कही जाएगी। उसका गौरवशाली अतीत इतिहास में दफन हो जाएगा और आने वाली पीढ़ी उसके स्‍वर्णिम काल को भुला बैठेगी।
खतरा यह भी है कि आगे आने वाले समय में उसका उल्‍लेख एक ऐसे गुनाहगार के तौर पर किया जाने लगे जिसने विपक्षी दल का अपना धर्म न निभाकर निजी स्‍वार्थों को तरजीह दी और उसके नेता उन्‍हीं स्‍वार्थों की पूर्ति के लिए परस्‍पर लड़ते रहे।
यदि ऐसा हुआ तो तय जानिए कि ये देश कभी नेहरू-गांधी के इन वारिसों को माफ नहीं करेगा।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

मंगलवार, 14 मई 2019

प्रियंका चतुर्वेदी के कांग्रेस छोड़ने की बड़ी वजह महेश पाठक की “उम्‍मीदवारी” भी

नई दिल्‍ली। कांग्रेस की राष्‍ट्रीय प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी की पार्टी से नाराजगी की खबरों के बीच अब उनके पार्टी छोड़ने की खबर आ रही है। सूत्रों के हवाले से ऐसी खबर आ रही है कि मथुरा में हुई घटना के विरोध में प्रियंका ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया है। ट्विटर पर भी उन्होंने मथुरा घटना को लेकर खुलकर अपनी नाखुशी जाहिर की थी।
प्रियंका चतुर्वेदी ने अपने ट्विटर हैंडल के बायो इंट्रो में कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता पद का परिचय हटा लिया है।
प्रियंका चतुर्वेदी ने अपने ट्विटर हैंडल के बायो इंट्रो से कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता पद का परिचय हटा लिया है।
बता दें कि मथुरा में कांग्रेस पार्टी के ही कुछ कार्यकर्ताओं ने प्रियंका चतुर्वेदी से दुर्व्यवहार किया था। हालांकि, उन्हें अपने व्यवहार पर खेद जताने के बाद पार्टी में वापस ले लिया गया।
प्रियंका ने इस पर नाराजगी जताते हुए ट्वीट किया था कि कांग्रेस के लिए अपना खून-पसीना एक करने वालों के स्थान पर कुछ लंपट आचरण करने वालों को तरजीह मिल रही है।
मीडिया रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया जा रहा है कि मथुरा की घटना के कारण पार्टी छोड़ने से पहले ही कुछ अन्‍य कारणोंवश प्रियंका पार्टी से नाराज चल रही थीं। मीडिया रिपोर्ट्स का कहना है कि प्रियंका मुखरता से पार्टी का पक्ष लेती थीं और उन्हें इस चुनाव में टिकट मिलने की उम्मीद थी। टिकट नहीं मिलने के कारण ही उन्होंने नाराजगी में पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया।
कांग्रेस की मुखर प्रवक्ता के तौर पर प्रियंका ने बनाई पहचान 
मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से कांग्रेस प्रवक्ता के तौर पर प्रियंका चतुर्वेदी ने अलग पहचान बनाई। वह मीडिया चैनल्‍स और सार्वजनिक मंचों पर बीजेपी और मोदी सरकार के खिलाफ पार्टी का मुखर चेहरा बनकर उभरी थीं। कांग्रेस में उन्हें राष्ट्रीय प्रवक्ता का पद भी दिया गया। कई बार उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष के साथ भी मंच साझा किया। हाल ही में उन्‍होंंने स्‍मृृति ईरानी के हलफनामे में डिग्री विवाद पर ताना कसते हुए स्‍मृति के ही लोकप्रिय सीरियल का गाना गाया था, जिसकी सोशल मीडिया पर काफी चर्चा हुई।
प्रियंका की नाराजगी के पीछे ”मथुरा” से महेश पाठक की उम्‍मीदवारी भी 
बहुत कम लोग जानते हैं कि प्रियंका चतुर्वेदी की जड़ें उत्तर प्रदेश के मथुरा से जुड़ी हैं। प्रियंका के पिता और पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट पुरुषोत्तम चतुर्वेदी मथुरा के चौबच्‍चा मौहल्ला निवासी हैं। 
मथुरा और चतुर्वेदी समुदाय में ”लाला” के नाम से मशहूर प्रियंका चतुर्वेदी के पिता कुछ समय पहले तक चतुर्वेदी समाज की पत्रिका के संपादक भी हुआ करते थे। 
किन्‍हीं कारणोंवश उनका विवाद माथुर चतुर्वेद परिषद के संरक्षक महेश चतुर्वेदी यानि महेश पाठक से हुआ। 
ये वही उद्योगपति महेश पाठक हैं जिन्‍हें कांग्रेस ने इस बार मथुरा लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़वाया है। इस विवाद के बाद प्रियंका के पिता को समाज की पत्रिका के संपादक पद से मुक्‍त कर दिया गया। 
गौरतलब है कि महेश पाठक का नाम मथुरा से कांग्रेस प्रत्‍याशी के रूप में घोषित होने तक प्रियंका चतुर्वेदी का नाम काफी आगे चल रहा था और माना जा रहा था कि पार्टी उन्‍हें यहां से चुनाव मैदान में उतारने जा रही है किंतु ऐन वक्‍त पर महेश पाठक को टिकट दे दिया गया।
मथुरा कांग्रेस की गुटबाजी भी बड़ा कारण
इधर मथुरा कांग्रेस भी काफी लंबे समय से गुटबाजी का शिकार है। मथुरा में एकगुट पूर्व विधायक प्रदीप माथुर का है और दूसरा उन्‍हें पसंद न करने वाले कांग्रेसियों का। इस गुट में महेश पाठक भी बताए जाते हैं।
जाहिर है ऐसे में प्रदीप माथुर गुट को तरजीह देने वाली प्रियंका चतुर्वेदी को महेश पाठक की उम्‍मीदवारी रास नहीं आई।
प्रियंका चतुर्वेदी जिस विवाद का हवाला देकर कांग्रेस में गुंडों को महत्‍‍‍व देने की बात कर रही हैं, वो उस प्रेस कांफ्रेंस से ताल्‍लुक रखता है जिसे उन्‍होंने प्रदीप माथुर के साथ स्‍थानीय एक होटल में बुलाया था। यहीं गुटबाजी के चलते प्रियंका चतुर्वेदी से कथित तौर पर अभद्रता की गई।
अभद्रता की घटना पुरानी, फिर रिएक्‍शन अब क्‍यों 
प्रियंका चतुर्वेदी को महेश पाठक की उम्‍मीदवारी भले ही रास न आ रही हो किंतु उन्‍हें मौका तब मिला जब अभद्रता करने वालों का मथुरा में मतदान से ठीक तीन दिन पहले निलंबन वापस ले लिया गया।
पार्टी महासचिव ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया के स्‍तर से वापस लिए गए इस निलंबन के पीछे भी महेश पाठक की उनसे नजदीकियां मानी जा रही हैं। ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया इससे ठीक पहले मथुरा में महेश पाठक के लिए रैलियां करके गए थे।
ऐसे में यह अनुमान लगाया जा रहा है कि प्रियंका चतुर्वेदी के धुर विरोधी महेश पाठक के कहने पर ही उन सभी लोगों का निलंबन रद्द किया गया जिनकी शिकायत प्रियंका चतुर्वेदी ने की थी।
मथुरा में अब हालांकि मतदान हो चुका है किंतु महेश पाठक की उम्‍मीदवारी ने यहां की गुटबाजी को राष्‍ट्रीय स्‍तर पर हवा दे दी और उसी का परिणाम रहा प्रियंका का कांग्रेस को छोड़ना। अब देखना यह है कि पांच चरणों के शेष मतदान में प्रियंका की नाराजगी क्‍या गुल खिलाती है क्‍योंकि मुंबई में उनकी सक्रियता भी कांग्रेस के प्रत्‍याशियों को प्रभावित कर सकती है।
-Legend News

शुक्रवार, 12 अप्रैल 2019

उत्तर प्रदेश की इन 15 सीटों पर दिखाई देगा दिलचस्‍प सियासी संग्राम…

बीजेपी उम्मीदवारों की घोषणा के साथ ही उत्तर प्रदेश में कई हाई प्रोफाइल सीटों पर चुनावी घमासान का मंच सज चुका है।
यहां 15 सीटों पर बीजेपी और एसपी-बीएसपी-आरएलडी गठबंधन तथा कांग्रेस के बीच दिलचस्प सियासी संग्राम देखने को मिल सकता है।
बीजेपी ने लोकसभा चुनाव के लिए अपने प्रत्याशियों की पहली सूची जारी कर दी है। इस लिस्ट में उत्तर प्रदेश से 35 नाम हैं। इस लिस्ट में वाराणसी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बागपत से सत्यपाल सिंह व मथुरा से हेमा मालिनी सहित कई दिग्‍गजों के नाम शामिल हैं। 8 सीटों पर पहले चरण में 11 अप्रैल को मतदान होना है।
उत्तर प्रदेश की जिन सीटों पर कांटे का मुकाबला होने की संभावना नजर आ रही है उनमें ये सीटें प्रमुख हैं-
1- सहारनपुर 
राघव लखनपाल (बीजेपी)
इमरान मसूद (कांग्रेस)
मतदान- 11 अप्रैल
वेस्ट यूपी की इस सीट पर बीजेपी ने एक बार फिर राघव लखनपाल पर भरोसा जताया है। वहीं, कांग्रेस ने भी पिछली बार दूसरे नंबर पर रहे इमरान मसूद को टिकट दिया है। इमरान मसूद पिछले चुनाव में पीएम मोदी के खिलाफ विवादित बयान देकर सुर्खियों में रहे थे। यहां एसपी-बीएसपी-आरएलडी गठबंधन ने अभी अपने उम्मीदवार का ऐलान नहीं किया है। 2017 में सहारनपुर जातीय संघर्ष को लेकर चर्चा में रहा। इसके साथ ही यहां भीम आर्मी और उसके नेता चंद्रशेखर का उभार भी चुनाव में असर डाल सकता है।
2- मुजफ्फरनगर 
संजीव बालियान (बीजेपी)
चौधरी अजित सिंह (आरएलडी)
मतदान- 11 अप्रैल
सांप्रदायिक हिंसा की पृष्ठभूमि में हुए 2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान मुजफ्फरनगर में ध्रुवीकरण के हालात देखने को मिले थे। बीजेपी ने जहां एक बार फिर सिटिंग एमपी और केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान को उम्मीदवार बनाया है, वहीं एसपी-बीएसपी-आरएलडी गठबंधन के तहत इस सीट से चौधरी अजित सिंह लड़ रहे हैं। आरएलडी सुप्रीमो को पिछले चुनाव में बागपत सीट पर शिकस्त झेलनी पड़ी थी। यहां तक कि वह तीसरे नंबर पर जा पहुंचे थे लेकिन इस बार गठबंधन की वजह से मुजफ्फरनगर में दिलचस्प जंग देखने को मिलेगी।
3- बागपत 
सत्यपाल सिंह (बीजेपी)
जयंत चौधरी (आरएलडी)
मतदान- 11 अप्रैल
पहले चौधरी चरण सिंह और फिर उनके बेटे अजित सिंह की वजह से चर्चित सीट पर इस बार परिवार की राजनीतिक विरासत को जयंत चौधरी आगे बढ़ा रहे हैं। गठबंधन के तहत यह सीट आरएलडी के हिस्से में आई है।
बीजेपी ने पिछली बार जयंत के पिता को मात देने वाले सत्यपाल सिंह पर दोबारा दांव खेला है। मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर और वर्तमान में केंद्रीय मंत्री सत्यपाल सिंह पिछले चुनाव के दौरान काफी चर्चित रहे थे। अब देखना दिलचस्प होगा कि जयंत पिता की हार का बदला ले पाते हैं या जाट लैंड में सत्यपाल फिर विजयी होते हैं।
4- गाजियाबाद 
वी के सिंह (बीजेपी)
सुरेंद्र कुमार उर्फ मुन्नी शर्मा (एसपी)
डॉली शर्मा (कांग्रेस)
मतदान- 11 अप्रैल
गाजियाबाद यूपी की वह सीट है, जहां पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान बीजेपी ने राज्य में सबसे ज्यादा मतों के अंतर से जीत हासिल की थी। पूर्व सेनाध्यक्ष वी के सिंह को बीजेपी ने यहां से अपना उम्मीदवार बनाया है। गाजियाबाद सीट राजपूत बहुल है और साठा-चौरासी इलाके के तहत आने वाले 144 गांवों में इस समुदाय का बड़ा वोट बैंक है। बीजेपी ने राजपूत समुदाय से ही आने वाले रिटायर्ड जनरल वी के सिंह को मैदान में उतारा है। गठबंधन की तरफ से सुरेंद्र कुमार उर्फ मुन्नी शर्मा और कांग्रेस की ओर से डॉली शर्मा कैंडिडेट हैं।
5- गौतमबुद्धनगर 
महेश शर्मा (बीजेपी)
अरविंद सिंह चौहान (कांग्रेस)
मतदान- 11 अप्रैल
गौतमबुद्धनगर यानि नोएडा सीट पर अब तक बीजेपी का वर्चस्व रहा है। पार्टी ने यहां से केंद्रीय मंत्री डॉ. महेश शर्मा को फिर से टिकट दिया है। वहीं, कांग्रेस ने अरविंद सिंह चौहान को उतारा है। 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को उस वक्त बड़ा झटका लगा था, जब मतदान से एक हफ्ते पहले पार्टी कैंडिडेट रमेश चंद्र तोमर बीजेपी में शामिल हो गए थे। दूसरी ओर अलवर (राजस्थान) के मूल निवासी डॉ. महेश शर्मा लंबे समय से एनसीआर में सक्रिय हैं।
6- मुरादाबाद 
कुंवर सर्वेश कुमार सिंह (बीजेपी)
राज बब्बर (कांग्रेस)
मतदान- 23 अप्रैल
सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील मुरादाबाद में बीजेपी ने वर्तमान सांसद कुंवर सर्वेश कुमार सिंह पर भरोसा जताया है। इस बार यहां से कांग्रेस ने राज बब्बर को उतारकर मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है। यूपी कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष राज बब्बर ने पिछला चुनाव गाजियाबाद से लड़ा था। पीतल नगरी में अभी गठबंधन ने अपने कैंडिडेट का ऐलान नहीं किया है।
7- अलीगढ़ 
सतीश कुमार गौतम (बीजेपी)
चौधरी बृजेंदर सिंह (कांग्रेस)
मतदान- 18 अप्रैल
अलीगढ़ लोकसभा सीट पर बीजेपी ने वर्तमान सांसद सतीश कुमार गौतम को कैंडिडेट बनाया है। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) में जिन्ना की तस्वीर लगाने पर उन्होंने सवाल उठाए थे। इस मामले को लेकर देश की सियासत गरमा गई थी। एएमयू कैंपस में भी कई दिन तनाव देखने को मिला था। कांग्रेस ने यहां से चौधरी बृजेंदर सिंह को टिकट दिया है। 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने इस क्षेत्र के तहत आने वाली सभी पांचों विधानसभा सीटों पर जीत दर्ज की थी।
8- अमेठी 
स्मृति इरानी (बीजेपी)
राहुल गांधी (कांग्रेस)
मतदान- 6 मई
अमेठी लोकसभा सीट पर एक बार फिर देश की नजरें टिकी रहेंगी। जहां एक ओर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी लगातार चौथी बार इस सीट से सांसद की पारी खेलने की तैयारी में हैं, वहीं बीजेपी ने उनके खिलाफ स्मृति इरानी को फिर उतारा है। 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान हार के बावजूद स्मृति लंबे समय से इलाके में सक्रिय हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी लोकसभा चुनाव के ऐलान से पहले यहां बड़ी रैली की थी। पिछले चुनाव में राहुल ने स्मृति को 1.07 लाख वोटों से हराया था। राहुल की यह जीत 2009 के मुकाबले बेहद छोटी थी। 2009 में राहुल 3.70 लाख वोटों के अंतर से जीते थे।
9- संभल 
परमेश्वर लाल सैनी (बीजेपी)
शफीकुर्रहमान बर्क (एसपी)
मतदान- 23 अप्रैल
संभल सीट पर एसपी-बीएसपी-आरएलडी गठबंधन की ओर से शफीकुर्रहमान बर्क को टिकट मिला है। वहीं, बीजेपी ने यहां से परमेश्वर लाल सैनी को उतारा है। मुस्लिम बहुल इस सीट पर 23 अप्रैल को मतदान होना है। अभी कांग्रेस ने यहां से अपना कैंडिडेट घोषित नहीं किया है। लेकिन इस बार गठबंधन कैंडिडेट बर्क की स्थिति मजबूत मानी जा रही है। वह तीन बार मुरादाबाद और एक बार संभल से सांसद रह चुके हैं। संभल लोकसभा सीट से 2009 में उन्होंने बीएसपी टिकट से लोकसभा का चुनाव जीता था। 2013 में सांसद रहते उन्होंने कहा था, ‘मैं वंदे मातरम् का बहिष्कार करने के लिए सोमवार को संसद से अनुपस्थित रहूंगा।’ बर्क ने 1997 में संसद के 50 साल पूरे होने पर आयोजित स्वर्ण जयंती कार्यक्रम में भी वंदे मातरम् का बहिष्कार किया था।
10- बदायूं 
संघमित्र मौर्य (बीजेपी)
धर्मेंद्र यादव (एसपी)
सलीम इकबाल शेरवानी (कांग्रेस)
मतदान-23 अप्रैल
बदायूं सीट पर एसपी संरक्षक मुलायम सिंह यादव के भतीजे धर्मेंद्र यादव इस बार चक्रव्यूह में घिरे हैं। वर्तमान सांसद धर्मेंद्र के खिलाफ बीजेपी ने संघमित्र मौर्य को टिकट दिया है। चाचा शिवपाल यादव ने प्रगतिशील समाजवादी पार्टी लोहिया बनाकर उन्हें पहले से मुश्किल में डाल रखा है। वहीं, कांग्रेस ने इलाके के कद्दावर नेता सलीम इकबाल शेरवानी को उतारकर धर्मेंद्र के लिए मुसीबत खड़ी कर दी है।
11- उन्नाव 
साक्षी महाराज (बीजेपी)
अनु टंडन (कांग्रेस)
मतदान- 29 अप्रैल
टिकट बंटवारे से पहले चिट्ठी लिखने वाले साक्षी महाराज को बीजेपी ने आखिरकार टिकट दे दिया है। लेकिन इस बार साक्षी की राह आसान नहीं मानी जा रही है। कांग्रेस ने यहां से अनु टंडन को उतारा है। 2009 में कांग्रेस से सांसद रह चुकीं अनु इस क्षेत्र में काफी सक्रिय हैं। इसके साथ ही साक्षी महाराज को बाहरी होने का नुकसान उठाना पड़ सकता है। अभी यहां से गठबंधन कैंडिडेट का ऐलान नहीं हुआ है।
12- मथुरा 
हेमा मालिनी (बीजेपी)
नरेंद्र सिंह (आरएलडी)
मतदान- 18 अप्रैल
‘ड्रीम गर्ल’ हेमा मालिनी मथुरा से एकबार फिर चुनाव मैदान में हैं। बीजेपी ने वर्तमान सांसद हेमा मालिनी को ही प्रत्याशी बनाया है। उधर एसपी-बीएसपी-आरएलडी गठबंधन ने कुंवर नरेन्‍द्र सिंह को खड़ा किया है। हेमा पर क्षेत्र को कम समय देने का आरोप लगता रहा है। पिछले बार के चुनाव में हेमा ने आरएलडी के जयंत चौधरी को शिकस्त दी थी। जयंत इस बार वह बागपत से चुनाव लड़ रहे हैं। गठबंधन के तहत यह सीट आरएलडी के खाते में आई है। एसपी ने आरएलडी के लिए अपनी दावेदारी छोड़ दी थी।
13- लखीमपुर खीरी 
पूर्वी वर्मा (एसपी)
अजय कुमार मिश्रा (बीजेपी)
जफर अली नकवी (कांग्रेस)
मतदान-29 अप्रैल
लखीमपुर खीरी सीट पर बीजेपी ने जहां अजय कुमार मिश्रा को टिकट दिया है वहीं कांग्रेस ने यहां से पूर्व सांसद और मंत्री रह चुके जफर अली नकवी को उतारा है। गठबंधन कोटे के तहत यह सीट एसपी के हिस्से में आई है। पार्टी ने यहां से पूर्वी वर्मा को मैदान में उतारा है। 2009 के लोकसभा चुनाव में जीत दर्ज की थी। 1980 से 1991 तक वह इस सीट से विधानसभा सदस्य भी रहे। राजीव गांधी के करीबी रह चुके नकवी का इलाके में अच्छा जनाधार माना जाता है।
14- हरदोई 
ऊषा वर्मा (एसपी)
जय प्रकाश वर्मा (बीजेपी)
मतदान- 29 अप्रैल
हरदोई सीट पर नरेश अग्रवाल का अच्छा प्रभाव माना जाता है। कई पार्टियों की सवारी कर चुके नरेश इस समय बीजेपी के सदस्य हैं। हरदोई में बीजेपी ने जय प्रकाश वर्मा को टिकट दिया है जबकि गठबंधन के तहत एसपी ने ऊषा वर्मा को सियासी समर में उतारा है। कांग्रेस कैंडिडेट की अभी यहां से घोषणा नहीं हुई है लेकिन नरेश अग्रवाल फैक्टर का बीजेपी को लाभ मिल सकता है।
15- मिर्जापुर 
अनुप्रिया पटेल (अपना दल)
राजेंद्र एस बिंद (एसपी)
ललितेश पति त्रिपाठी (कांग्रेस)
मतदान- 19 मई
मिर्जापुर सीट बीजेपी ने एनडीए के सहयोगी अपना दल के लिए छोड़ दी है। यहां से केंद्रीय मंत्री और वर्तमान सांसद अनुप्रिया पटेल मैदान में हैं। वहीं, गठबंधन के तहत एसपी ने राजेंद्र एस बिंद को टिकट दिया है। कांग्रेस ने यहां से ललितेश पति त्रिपाठी को अपना उम्मीदवार बनाया है। इस बार अनुप्रिया पटेल की राह आसान नहीं मानी जा रही है।
-Legend News
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