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शनिवार, 13 अप्रैल 2024

बड़े सवाल: क्या पैसे देकर BSP का टिकट लाए हैं सुरेश चौधरी, और क्या वह BJP के डमी उम्मीदवार हैं?


 महाभारत नायक भगवान श्रीकृष्ण की पावन जन्मस्थली से बहुजन समाज पार्टी (BSP) ने चौधरी सुरेश सिंह को चुनाव मैदान में उतारा है। सुरेश सिंह यूं तो एक उच्च शिक्षित पूर्व सरकारी अधिकारी हैं किंतु चुनावी दृष्‍टिकोण से उनकी विशेषता उनका उस जाट समुदाय से होना है जिसके मतदाताओं की मथुरा लोकसभा क्षेत्र में संख्‍या सर्वाधिक है। 

बसपा उम्मीदवार का पूरा परिचय 
विधानसभा क्षेत्र गोवर्धन के नगला अक्खा निवासी लगभग 62 वर्षीय सुरेश सिंह भारत सरकार के राजस्व विभाग सहित कई अन्य दूसरे विभागों में अपनी सेवाएं दे चुके हैं और फिलहाल लंबे समय से एक आवासीय शिक्षण संस्था का संचालन कर रहे हैं। 
इसके अलावा वह विश्व हिंदू परिषद और अंतर्राष्‍ट्रीय हिंदू परिषद के पदाधिकारी रहे हैं तथा राष्‍ट्रीय स्‍वयं सेवक संघ (RSS) से भी उनका गहरा नाता है। 
क्या पैसा देकर BSP का टिकट लाए हैं सुरेश चौधरी?
सुरेश चौधरी ने बीएसपी से अपनी उम्मीदवारी का टिकट क्या पैसा देकर लिया है, यह सवाल अब इस धर्म नगरी में इसलिए खड़ा हो रहा है क्यों कि बसपा के ही एक अन्य नेता और पत्रकार कमलकांत उपमन्‍यु ने पार्टी पर इस तरह के गंभीर आरोप लगाए हैं। 
दरअसल, कमलकांत उपमन्यु वो पहले व्यक्ति हैं जिनका नाम बसपा ने अपनी दूसरी लिस्‍ट में मथुरा से लोकसभा उम्मीदवार के तौर पर घोषित किया। उससे पहले बसपा के राष्‍ट्रीय महासचिव मुनकाद अली सहित कई अन्य प्रदेश स्तरीय पदाधिकारियों की मौजूदगी में बाकायदा कार्यकर्ता सम्मेलन बुलाकर मीडिया के सामने कमलकांत उपमन्‍यु को मथुरा से चुनाव लड़ाने का ऐलान किया गया, और यह खबर प्रकाशित तथा प्रसारित भी हुई। 
चूंकि कमलकांत उपमन्‍यु इससे पहले 1999 में मथुरा से बसपा की ही टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ चुके थे और तीसरे नंबर पर रहकर अच्‍छे मत प्राप्‍त किए थे इसलिए इस बार उनकी उम्मीदवारी ने किसी को आश्चर्य में नहीं डाला। लोगों को आश्चर्य तब हुआ जब उन्‍हें पता लगा कि बसपा ने उपमन्‍यु का टिकट काटकर चौधरी सुरेश सिंह को टिकट दे दिया है। 
अब क्या कह रहे हैं कमलकांत उपमन्‍यु 
चुनाव लड़ने की पूरी तैयारी कर चुके कमलकांत उपमन्‍यु को अपना टिकट कटने से झटका लगना तो स्‍वाभाविक था ही किंतु उन्‍होंने यह बताकर मथुरा की जनता को भी सोचने पर मजबूर कर दिया कि पार्टी ने उनका टिकट मुंह मांगी रकम न दे पाने के कारण काटा है। 
कमलकांत उपमन्‍यु का आरोप है कि चौधरी सुरेश सिंह ने पार्टी को उनसे कहीं अधिक पैसा देकर लोकसभा की उम्मीदवारी का टिकट खरीदा है। उपमन्‍यु ने दावा किया कि सुरेश सिंह को टिकट देने के बाद भी उनके ऊपर यह कहते हुए दबाव बनाया गया कि यदि वह पार्टी को अब भी पैसा दे देते हैं तो चुनाव उन्‍हें ही लड़वाया जाएगा। 
उपमन्‍यु ने कैमरे के सामने कहा कि एक करोड़ से शुरू की गई पार्टी की डिमांड 70 लाख तक आ गई, किंतु मैं इसके लिए तैयार नहीं हुआ। 
चौधरी सुरेश सिंह का क्या कहना है? 
उधर कमलकांत उपमन्‍यु के आरोपों पर चौधरी सुरेश सिंह का पक्ष जानने के लिए काफी प्रयास किए गए किंतु उन्‍होंने कोई जवाब नहीं दिया। सुरेश सिंह ने मोबाइल पर सिर्फ इतना मैसेज भेज दिया कि ''मुझे इस बारे में कोई जानकारी नहीं है। मैंने कोई पैसा नहीं दिया।'' 
क्‍या BJP के डमी उम्मीदवार हैं BSP उम्मीवार चौधरी सुरेश सिंह? 
चौघरी सुरेश सिंह पर एक आरोप यह भी लग रहा है कि वह BJP के डमी उम्मीदवार की हैसियत से चुनाव लड़ रहे हैं। इस तरह का आरोप लगाने वाले लोग सुरेश सिंह की विश्व हिंदू परिषद (VHP), अंतर्राष्‍ट्रीय हिंदू परिषद तथा राष्‍ट्रीय स्‍वयं सेवक संघ (RSS) से जुड़ी पृष्‍ठभूमि को अपने तर्क का आधार बनाते हैं जिसे पूरी तरह खारिज भी नहीं किया जा सकता। 
कांग्रेस के टिकट पर बॉक्सर विजेंदर सिंह का नाम आना भी एक कारण 
बताया जाता है कि उपमन्‍यु को बसपा की टिकट पर चुनाव लड़ाने की घोषणा के बाद सुरेश सिंह को सामने लाने का एक बड़ा कारण कांग्रेस के टिकट पर अंतर्राष्‍ट्रीय ख्‍याति प्राप्‍त बॉक्सर विजेंदर सिंह का कांग्रेस उम्‍मीदवारी के लिए नाम चर्चा में आना रहा। 
बॉक्सर विजेंदर सिंह भी जाट बिरादरी से ताल्‍लुक रखते हैं इसलिए कहा जाने लगा कि वो भाजपा के जाट वोट में सेंध लगा सकते हैं। मथुरा से दो बार की सांसद भाजपा उम्‍मीदवार हेमा मालिनी अभिनेता धर्मेन्द्र की पत्नी होने के कारण खुद को जाट बिरादरी से जोड़ती तो हैं लेकिन मथुरा का मतदाता इससे अधिक प्रभावित नहीं होता। वह मोदी के मैजिक का लाभ उठाकर इस धर्म नगरी में जीत का रिकॉर्ड कायम करती रही हैं, और इस बार भी वही मैजिक उनके काम आने की उम्मीद लगाई जा रही है। 
यही कारण है कि बॉक्सर विजेंदर सिंह का नाम कांग्रेस से उछलने के साथ ही भाजपा में भी हलचल दिखाई दी लिहाजा भाजपा की पूरी लॉबी सक्रिय हो गई। 
सूत्रों की मानें तो समय रहते भाजपा की सक्रियता का परिणाम चौधरी सुरेश सिंह के रूप में निकल कर आया ताकि यदि बॉक्सर विजेंदर सिंह कांग्रेस की टिकट पर ताल ठोकने उतर भी जाएं तो जाट वोट बंट जाए और इसका सीधा लाभ हेमा मालिनी को मिले। हालांकि सुरेश सिंह का नाम घोषित होने के बाद बॉक्सर विजेंदर सिंह ने कांग्रेस का ही 'हाथ' झटक दिया और वह भाजपा में शामिल हो गए। ऐसे में कांग्रेस को नामांकन के अंतिम दिन एक ऐसे कार्यकर्ता मुकेश धनकर को मथुरा से उम्मीदवार घोषित करना पड़ा जिसे कांग्रेस शायद सामान्‍य परिस्‍थितियों में कोई चुनाव नहीं लड़वाती। 
क्या बसपा का कैडर वोट भी सुरेश चौधरी की उम्मीदवारी से नाराज है? 
अब जबकि सुरेश चौधरी द्वारा बसपा उम्मीदवार के तौर पर नामांकन दाखिल किया जा चुका है तो पता लग रहा है कि बसपा का कैडर वोट भी पार्टी के इस परिवर्तन से नाराज है। वोटर का कहना है कि सुरेश चौधरी का झुकाव हमेशा से भाजपा की ओर रहा है और अब भी वह भाजपा को ही लाभ पहुंचाने के लिए चुनाव मैदान में उतरे हैं। 
गौरतलब है कि कभी बसपा को भर-भरकर वोट देने वाला अल्पसंख्‍यक समुदाय बसपा से छिटक चुका है। इंडी गठबंधन का हिस्‍सा होने के कारण मथुरा की लोकसभा सीट कांग्रेस के हिस्‍से में आई है जिस पर कांग्रेस का 'मजबूर' प्रत्याशी मैदान में है। गठबंधन के चलते सपा का कुछ वोट यदि कांग्रेस प्रत्याशी को मिल भी जाए तो वह सिर्फ वोटों की गिनती ही बढ़ा सकेगा क्योंकि सपा का अपना जनाधार मथुरा में कभी नहीं रहा। 
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है क‍ि एक ओर जहां कोई उल्‍लेखनीय काम न कर पाने के बाद भी हेमा मालिनी की किस्‍मत का सितारा बुलंदी पर है वहीं दूसरी ओर बसपा अपने आरोप-प्रत्यारोप से ही निजात नहीं पा रही। 
बाकी कसर उसके उम्‍मीदवार सुरेश चौधरी सहित पूरी पार्टी की चुप्पी पूरी कर दे रही है, जो अपनी ही पार्टी पर लग रहे आरोपों का माकूल जवाब तक देने को तैयार नहीं है। वह और उनके मुनकाद अली जैसे बाकी बड़े नेता सिर्फ आरोपों से पल्‍ला झाड़ते नजर आ रहे हैं जबकि कमलकांत उपमन्‍यु पार्टी पर खुलकर गंभीर आरोप लगा रहे हैं। 
चौधरी सुरेश सिंह को शायद अभी इस बात का इल्म नहीं कि चुनावों के दौर में इस तरह के आरोप किसी के पूरे राजनीतिक करियर को प्रभावित करते हैं। ये बात और है कि बसपा ऐसे आरोपों की आदी है। 
चौधरी सुरेश सिंह अपनी 'एक लाइना' सफाई से आरोपों का जवाब देने की कोशिश जरूर कर रहे हैं लेकिन बसपा पर टिकट बेचने के आरोप पहली बार नहीं लग रहे। चुनाव किसी स्‍तर का हो, कहते हैं कि बसपा बिना अपनी मांग पूरी कराए किसी को टिकट नहीं देती। 
और जहां तक सवाल सुरेश चौधरी को BJP के डमी उम्‍मीदवार की हैसियत से चुनाव लड़ाने के आरोप का है, तो इस आरोप में उनकी अपनी पृष्‍ठभूमि ही सहायक साबित हो ही रही है, साथ ही बसपा सुप्रीमो पर भी पहले से ये आरोप चस्‍पा हैं कि वह ईडी तथा सीबीआई के भय से अब हर चुनाव में वही निर्णय लेती हैं जो कहीं न कहीं बीजेपी को लाभ पहुंचाता प्रतीत होता है। 
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी

बुधवार, 12 जनवरी 2022

गठबंधन के बावजूद अखिलेश को जयंत पर भरोसा नहीं, चुनाव बाद पाला बदलने की आशंका


पश्‍चिमी उत्तर प्रदेश की जिन सीटों पर पहले चरण में ही मतदान होना है उनके लिए पर्चा दाखिल करने की शुरूआती तारीख लगभग सिर पर है, किंतु कई मुलाकातों के बाद भी अब तक राष्‍ट्रीय लोकदल और समाजवादी पार्टी के बीच टिकटों का बंटवारा नहीं हो सका है।

गठबंधन का ऐलान किए काफी समय हो जाने के बावजूद टिकटों के बंटवारे में जो सबसे बड़ी बाधा आ रही है, वह है सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव का आरएलडी सुप्रीमो जयंत चौधरी पर वो भरोसा न कर पाना जिसकी सर्वाधिक दरकार है।
दरअसल, अखिलेश यादव जयंत चौधरी पर आंख बंद करके इसलिए भरोसा नहीं करना चाहते क्‍योंकि आरएलडी का इतिहास उन्‍हें इसकी इजाजत नहीं देता।
अखिलेश यादव ही नहीं, सब जानते हैं कि सत्ता में साझेदारी की खातिर आरएलडी ने हमेशा अपने सहयोगियों को धोखा दिया है। जब-जब सत्ता और विपक्ष में से किसी एक को चुनने की नौबत आरएलडी के सामने आई है, तब-तब उसने सत्ता का चुनाव किया है।
हालांकि यह पहली बार है जब जयंत चौधरी आरएलडी के सर्वेसर्वा की हैसियत से चुनाव मैदान में हैं लिहाजा उनके पास अपने बड़ों की गलती से सीख लेने का अवसर भी है परंतु यह सवाल अभी भविष्‍य के गर्भ में है कि वह इस पर खुद को कितना खरा साबित कर पाते हैं।
संभवत: यही कारण है कि अखिलेश अपना हर कदम फूंक-फूंक कर रख रहे हैं। फिर बात चाहे चौधरी चरण सिंह के पोते और चौधरी अजीत सिंह के पुत्र चौधरी जयंत की हो या फिर अपने सगे चाचा शिवपाल यादव अथवा सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के मुखिया ओमप्रकाश राजभर की।
अखिलेश यादव ने तमाम लानत-मलामत को दरकिनार कर जिस तरह समाजवादी पार्टी की कमान पूरी तरह अपने हाथ में ली और चाचा शिवपाल को भी नाकों चने चबवाकर अपने सामने समर्पण करने को बाध्‍य कर दिया, उससे साफ जाहिर है कि राजनीति उनके लिए अब एक मंझे हुए खिलाड़ी का खेल बन चुकी है जबकि जयंत को अभी साबित करना है कि वह अपनी राजनीतिक विरासत को संभाल भी पाते हैं या नहीं।
बहरहाल, इन्‍हीं स्‍थिति-परिस्‍थितियों के मद्देनजर एक ओर जहां जयंत चौधरी चाहते हैं कि वह अखिलेश यादव से जितना अधिक संभव हो सीटें झटक लें वहीं अखिलेश यादव उन्‍हें ऐसा कोई मौका नहीं देना चाहते जिससे वो चुनाव बाद फ्रंट फुट पर खेलने की स्‍थिति में हों।
बताया जाता है कि अखिलेश और जयंत के बीच सीटों के बंटवारे से अधिक जिस मुद्दे को लेकर कशमकश चल रही है, वह है गठबंधन के प्रत्‍याशियों को किन-किन सीटों पर किस ‘सिंबल’ से चुनाव लड़ाया जाए।
अखिलेश यादव अपने दोनों हाथों में लड्डू रखकर चलना चाहते हैं जिससे चुनाव बाद पछताने की नौबत न आए। वह चाहते हैं कि पश्‍चिमी उत्तर प्रदेश में आरएलडी के प्रभाव वाली अधिकांश सीटों पर समाजवादियों को आरएलडी के सिंबल पर चुनाव मैदान में उतारें और जहां सपा व आरएलडी का मिला-जुला प्रभाव है वहां वह अपने सिंबल का इस्‍तेमाल कर चुनाव लड़ें। इस तरह उनके साथ आगे चलकर धोखा खाने की संभावना काफी क्षीण हो जाएगी।
उधर जयंत चौधरी चाहते हैं कि आरएलडी के हिस्‍से में न सिर्फ ज्‍यादा सीटें आएं बल्‍कि अपने और समाजवादी पार्टी के मिले-जुले प्रभाव वाली अधिकांश सीटों पर वह आरएलडी के सिंबल का इस्‍तेमाल करें।
राजनीतिक नजरिए से देखें तो दोनों अपनी-अपनी जगह सही हैं किंतु मौके की नजाकत दोनों को मजबूर कर रही है।
जयंत चौधरी को लगता है कि कृषि कानूनों के खिलाफ खड़े किए गए कथित किसान आंदोलन से भाजपा के प्रति उपजी किसानों की नाराजगी का उनकी पार्टी इन चुनावों में अच्‍छा लाभ ले सकती है लेकिन अखिलेश यादव का मानना है कि भाजपा के मुख्‍य मुकाबले में वही हैं इसलिए चुनावी समर का पूरा ताना-बाना समाजवादी पार्टी के इर्द-गिर्द ही बुना जाना चाहिए।
इसके अलावा अखिलेश किसी भी सहयोगी दल के लिए ऐसा कोई मौका नहीं देना चाहते जिसका प्रयोग कर वह अखिलेश के ‘किंग’ बनने की राह का रोड़ा बन जाए और खुद ‘किंग मेकर’ की भूमिका में आ खड़ा हो।
ऐसे में बस देखना बाकी है तो इतना कि गांठों के इस बंधन (गठबंधन) को लेकर खेले जा रहे खेल का बड़ा खिलाड़ी अंतत: कौन साबित होता है और कमान से छूटे कितने तीर चुनाव बाद उसके अपने तरकश की शोभा बढ़ाते हैं।

-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

योगी जी को वेस्टर्न यूपी के ही किसी जनपद से चुनाव लड़वाने पर विचार, चर्चा में मथुरा का नाम सबसे आगे


 उत्तर प्रदेश में जैसे-जैसे चुनावी सरगर्मी जोर पकड़ रही है, वैसे-वैसे इस बात की भी चर्चा तेज होती जा रही है कि योगी आदित्‍यनाथ को आखिर कहां से चुनाव मैदान में उतारा जाएगा।

योगी जी के चुनाव लड़ने के लिए संभावित सीटों की बात करें तो अयोध्या और गोरखपुर के साथ सबसे ज्यादा चर्चा मथुरा की है।
इस चर्चा का मुख्‍य आधार है अयोध्‍या तथा काशी के बाद मथुरा में श्रीकृष्‍ण जन्‍मभूमि पर बने मंदिर को भव्‍य तथा दिव्‍य बनाए जाने की वो मंशा, जिसे कभी खुद भाजपा ने जाहिर किया था।
बीजेपी के राज्यसभा सांसद हरनाथ सिंह यादव ने पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा को लिखा पत्र


बीजेपी के राज्यसभा सांसद हरनाथ सिंह यादव ने पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा को पत्र लिखकर योगी को मथुरा सीट से चुनाव लड़ाने की सलाह दी है। यादव ने लिखा है कि ब्रज क्षेत्र की जनता की विशेष इच्छा है कि योगीजी भगवान श्रीकृष्ण की नगरी मथुरा से चुनाव लड़ें। यादव ने कहा कि योगी जी ने भी कहा है कि पार्टी जहां से कहेगी, वह वहीं से चुनाव लड़ेंगे। हरिनाथ सिंह ने कहा, ‘बीती रात मेरी आंखें दो बार खुलीं और मुझे लगा कि भगवान श्रीकृष्ण मुझसे कह रहे हैं कि मैं नेतृत्व को कहूं कि योगी जी मथुरा से चुनाव लड़ें इसलिए सुबह मैंने राष्ट्रीय अध्यक्ष को पत्र लिखा।’

योगी जी ने भी जाहिर की थी इच्‍छा
ज्यादा दिन नहीं हुए जब योगी जी ने मंच से कहा कि अयोध्या में राम मंदिर बन रहा है, काशी में विश्वनाथ का धाम बना है, तो मथुरा-वृंदावन कैसे छूट जाएगा। मतलब साफ है कि बीजेपी इस चुनाव में भी हिंदुत्व के एजेंडे पर बढ़ रही है और सपा खेमे में चिंता का यही सबसे बड़ा कारण भी है। अयोध्या-काशी के बाद अब मथुरा की तैयारी है… यह नारा यूपी की चुनावी चर्चाओं गूंज रहा है।
वैसे भी बीजेपी के अंदर ये आवाज पहले से गूंजती रही है कि अयोध्या तो झांकी है, काशी मथुरा बाकी है! भगवान राम, कृष्ण, शिव से करोड़ों लोगों की आस्था जुड़ी है। अयोध्या, काशी, मथुरा तीनों ही जगहों पर मंदिर-मस्जिद का मसला रहा है और वैसे भी बीजेपी तथा संघ के एजेंडे में ये रहा है।
हरनाथ सिंह यादव खुद कहते हैं कि भगवान कृष्ण के मंदिर पर जो मस्जिद खड़ी है उससे मुक्ति कौन दिला सकता है, इस बारे में लोग सोच रहे हैं।
राम मंदिर ना बने इसके लिए जिन लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में वकीलों की फौज खड़ी कर दी थी, ऐसे लोग भगवान कृष्ण का मंदिर कभी नहीं बनाएंगे। चाहे वह अखिलेश यादव हों, राहुल गांधी हों, मायावती या कोई अन्‍य। भगवान कृष्ण के मंदिर का निर्माण सिर्फ योगी आदित्यनाथ ही कर सकते हैं। सियासी घटनाक्रम की कड़ियां जोड़ना शुरू करें तो योगी के मथुरा से चुनाव में उतरने की संभावना प्रबल दिखती है। हालांकि योगी आदित्यनाथ फिलहाल विधान परिषद के सदस्य हैं।
बीजेपी को फायदा क्या होगा?
मथुरा से योगी को चुनाव में उतारकर भाजपा कुछ वैसा ही समीकरण साधने की कोशिश कर रही है, जैसा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गुजरात छोड़कर काशी आने पर उसे पूर्वांचल में हुआ। यह हिंदुत्व के एजेंडे पर भी बिल्कुल सटीक बैठता है। मथुरा में कुछ दिनों में तो मंदिर बनने से रहा, हां योगी यहां से चुनाव लड़ते हैं तो इसका जनता में मैसेज साफ जाएगा। वैसे भी किसान आंदोलन के झटके से उबर रही बीजेपी को पश्चिमी यूपी की विशेष चिंता होगी। शायद यही वजह है कि भाजपा पश्चिमी उत्तर प्रदेश की रणनीति मुथरा-वृंदावन में ही तैयार कर रही है। इसके जरिए भगवा दल पूरे पश्चिम को साधने की कोशिश में है, जो किसान आंदोलन के चलते थोड़ा दूर जाता दिख रहा था।
सीटों का नफा-नुकसान भी समझ लीजिए
वेस्टर्न यूपी के राजनीतिक जानकारों का कहना है कि कृषि कानून के विरोध में जिस प्रकार से किसानों का आंदोलन एक साल से अधिक समय तक चला। कई किसानों की मौत भी हुई, उससे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बीजेपी को लेकर किसानों में नाराजगी है। इसका नुकसान बीजेपी को विधानसभा चुनाव में उठाना पड़ सकता है। इस मुद्दे का फायदा राष्ट्रीय लोक दल या उससे गठबंधन करने वाली समाजवादी पार्टी को मिल सकता है। अगर ऐसा हुआ तो 16 जनपदों की करीब 136 सीटों पर सीधे तौर पर बीजेपी को नुकसान हो सकता है। 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने इस क्षेत्र की 136 में से 109 सीटें जीती थीं। यही कारण है कि बीजेपी के रणनीतिकार इस बार कोई जोखिम नहीं लेना चाहते हैं। योगी इस चुनाव में बीजेपी के पास मजबूत चेहरा हैं, इसीलिए उन्हें वेस्टर्न यूपी के ही किसी जनपद से चुनाव लड़वाने पर विचार हो रहा है और मथुरा इसके लिए सबसे मुफीद नजर आता है।
मथुरा में श्रीकृष्‍ण जन्मभूमि को लेकर विवाद क्या है
कृष्ण जन्मभूमि विवाद मामले में मथुरा की जिला सिविल कोर्ट में याचिका दायर की गई है। इसमें कहा गया है कि मुसलमानों की मदद से शाही ईदगाह ट्रस्ट ने श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर कब्जा कर लिया और ईश्वर के स्थान पर एक ढांचे का निर्माण कर दिया। भगवान विष्णु के आठवें अवतार श्रीकृष्ण का जन्मस्थान उसी ढांचे के नीचे स्थित है। 13.37 एकड़ जमीन पर दावा करते हुए स्वामित्व मांगने के साथ ही शाही ईदगाह मस्जिद को हटाने की मांग की गई है। मथुरा में शादी ईदगाह मस्जिद कृष्ण जन्मभूमि से लगी हुई बनी है। इतिहासकार मानते हैं कि मुगल शासक औरंगजेब ने प्राचीन केशवनाथ मंदिर को नष्ट कर दिया था और शाही ईदगाह मस्जिद का निर्माण कराया था।
-Legend News

“योगीराज श्रीकृष्‍ण” की जन्‍मभूमि से “सीएम योगी” के चुनाव लड़ने की चर्चाएं!


 इन दिनों योगीराज श्रीकृष्‍ण की जन्‍मभूमि से सीएम योगी आदित्‍यनाथ के चुनाव लड़ने की राजनीतिक हलकों में खूब चर्चा हो रही है। पांच राज्‍यों में होने वाले चुनावों से पहले इस तरह की चर्चा होने का एक प्रमुख कारण उनका राम, कृष्‍ण और विश्‍वनाथ की भूमि पर विशेष फोकस होना बताया जा रहा है।

चूंकि राम जन्‍मभूमि पर सर्वोच्‍च न्‍यायालय का आदेश आने के बाद वहां मंदिर निर्माण का कार्य शुरू हो चुका है, और काशी विश्‍वनाथ कॉरिडोर का उद्घाटन इसी महीने की 13 तारीख को पीएम मोदी करने जा रहे हैं इसलिए कहा जा रहा है कि अब कृष्‍ण जन्‍मभूमि यानी मथुरा पर पूरा ध्‍यान केंद्रित है।
कृष्‍ण जन्‍मस्‍थान क्षेत्र में बनी मथुरा की शाही मस्‍जिद ईदगाह के अंदर बाबरी ध्‍वंस के दिन 06 दिसंबर को लड्डू गोपाल का जलाभिषेक करने की घोषणा के बाद हालांकि पुलिस-प्रशासन ने अपनी सारी ताकत झोंक कर स्‍थिति को संभाल लिया किंतु इस बीच प्रदेश के उप मुख्‍यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के बयान यह बताते रहे कि मथुरा स्‍थित कृष्‍ण जन्‍मभूमि का मुद्दा अब उनकी प्राथमिकता है और वह धर्म व आस्‍था के मामले में कोई समझौता नहीं करेंगे।
उप मुख्‍यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के इन बयानों को आम जनता योगी सरकार की मंशा ही मान रही है, हालांकि पुलिस-प्रशासन हमेशा की तरह अपना काम करता दिखाई दे रहा है।
दरअसल, कुछ समय से एक प्रश्‍न इस आशय का उठाया जाने लगा है कि क्या रामनगरी अयोध्‍या तथा बाबा विश्‍वनाथ की नगरी काशी की अपेक्षा कृष्‍ण की नगरी मथुरा को योगी सरकार कम तरजीह दे रही है और इसीलिए मथुरा का विकास उसकी गरिमा के अनुरूप अब तक नहीं हो पाया है।
इसी संदर्भ में मथुरा के लोग भी उत्तर प्रदेश तीर्थ विकास परिषद् के कामकाज सहित उसके लिए नियुक्त अधिकारियों की नेकनीयती पर शंका कर रहे हैं, जिससे संदेश अच्‍छा नहीं जा रहा।
जाहिर है कि चुनावी मौसम में यह संदेश प्रदेश स्‍तर पर नुकसान पहुंचा सकता है क्‍योंकि इसका सीधा संबंध धर्म से है और धर्म की ध्‍वजा फिलहाल भाजपा ने ही उठा रखी है।
ऐसा कोई संदेश न जाए और इसका कोई खामियाजा न भुगतना पड़े इसलिए सीएम योगी आदित्‍यनाथ को मथुरा से लड़ाने पर विचार किए जाने की खबरें आ रही हैं।
भाजपा का शीर्ष नेतृत्‍व जानता है कि योगी को मथुरा से चुनाव लड़ाकर पूरे प्रदेश ही नहीं, देशभर तक यह बात पहुंचाई जा सकती है कि अयोध्‍या तथा काशी की तरह मथुरा भी भाजपा के शीर्ष एजेंडे का हिस्‍सा है और वह इसके विकास में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती।
इस सबके अलावा यूं भी भाजपा मथुरा की 4 जीती हुई सीटों में से कोई सीट गंवाना नहीं चाहेगी। इसलिए संभव है कि योगी जी को यहां से चुनाव लड़ाने पर विचार किया जा रहा हो।
गौरतलब है कि आरएसएस ने मथुरा की कुल 5 विधानसभा सीटों में से 3 सीटों पर प्रत्‍याशी बदलने का मशविरा दिया था, जिसका सीधा अर्थ यह था कि सिटिंग विधायकों के बूते 2017 को दोहराना आसान नहीं होगा।
अब देखना यह है कि राम, कृष्‍ण, विश्‍वनाथ तीनों के पावन धामों को एक ही चश्‍मे से देखने का दावा करने वाली भाजपा क्या वाकई मथुरा को लेकर गंभीर है या फिलहाल होहल्‍ला मचाकर इसे होल्‍ड पर रखना चाहती है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

सोमवार, 4 अक्टूबर 2021

लखीमपुर खीरी कांड: सूखे में बारिश का मजा, बिन बादल बरसात… यूपी चुनाव के लिए मौका ही मौका…

चुनाव का मौसम हो तो सियासी दल फ्रंटफुट पर खेलते हैं। लोगों के दिलों को छूने वाले वोट बैंक वाले मुद्दों को सूंघकर खुद को जनता का हितैषी साबित करने की होड़ लग जाती है। लखीमपुर खीरी में रविवार को किसानों को कथित तौर पर कुचलकर मार डालने की खबर आई तो देशभर में किसान आंदोलित हो गए लेकिन अगले कुछ ही घंटों में नेताओं ने इतनी आक्रामकता दिखाई कि राजनीतिक पार्टियों ने पूरे विरोध को ‘हाइजैक’ कर लिया। सोशल मीडिया हो या टीवी चैनल, हर जगह पार्टियों के प्रदर्शन छाए हुए हैं।

यूपी में अगले कुछ महीनों के अंदर चुनाव होने हैं, सभी राजनीतिक पार्टियां अपनी टीमें खड़ी करने में जुटी हैं। मुद्दे राष्ट्रीय हों या क्षेत्रीय, पार्टियां संभल-संभलकर आगे बढ़ रही हैं। किसान आंदोलन का वोट बैंक पर असर कम से कम हो, बीजेपी इसके लिए कोई कसर नहीं छोड़ रही थी, तभी लखीमपुर खीरी कांड ने उसके लिए नई चुनौती खड़ी कर दी। ताक में बैठे विपक्ष को अच्‍छा मौका मिल गया। आधी रात के बाद से कांग्रेस ही नहीं, सपा, बसपा, AAP और दूसरे दल भी अपने-अपने तरीके से किसानों के समर्थन में उतर आए हैं। बीजेपी के विजय रथ को रोकने के लिए पार्टियां इस मुद्दे को अपने लिए ‘संजीवनी’ समझ रही हैं क्यों किसानों से ज्यादा पार्टियां लखीमपुर कांड को लपक रही हैं। आइए हर पार्टी के हिसाब से इसे समझते हैं।
पहले बात कांग्रेस की
अंदरूनी कलह में उलझी कांग्रेस पार्टी ने लखीमपुर-खीरी कांड के बाद थोड़ी राहत की सांस ले रही होगी। पहले मीडिया का पूरा फोकस पंजाब और छत्तीसगढ़ पर था, जहां से पार्टी के लिए टेंशन देने वाली खबरें ही आ रही थीं। पंजाब में भी अगले साल चुनाव है, वहां कैप्टन अमरिंदर सिंह को हटाकर कांग्रेस ने दलित नेता चरणजीत सिंह चन्नी को सीएम बनाया। पहले लगा कि यह सिद्धू की सियासी विजय है, पर कुछ ही दिन में ऐसा टकराव बढ़ा कि उन्होंने पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। कहा गया कि पंजाब में सब कुछ राहुल-प्रियंका गांधी के निर्देश पर हो रहा है। ऐसे में उनकी नेतृत्व क्षमता पर भी सवाल उठने लगे। G-23 के नेता भी खुलकर केंद्रीय नेतृत्व के विरोध में बोलने लगे थे। अब ऐसे में लखीमपुर-खीरी कांड हो गया। यूपी चुनाव से पहले मौका देख महासचिव प्रियंका गांधी ने सुबह का इंतजार किए बगैर रात में ही लखीमपुर जाने का प्लान बना लिया। सुबह जब तक लोगों की नींद खुलती उनके रौद्र रूप वाला वीडियो वायरल हो चुका था।
वीडियो में वह पुलिस अफसर से वह कहती सुनी जा सकती हैं, ‘तुम मेरा अपहरण करोगे… ये है लीगल स्टेटस तुम्हारा। मत समझो कि मैं नहीं समझती। अरेस्ट करो… हम खुशी से जाएंगे तुम्हारे साथ। तुम जो जबरदस्ती ढकेल रहे हो न, इसमें आप फिजिकल असॉल्ट, किडनैप और छेड़छाड़ करने की कोशिश कर रहे हो…. समझती हूं मैं सब कुछ। छूकर देखो मुझे…जाकर अपने अफसरों से और मंत्रियों से जाकर वारंट लाओ।’ ऐसा लगता है कि इस अंदाज से प्रियंका हताश और निराश कांग्रेस कार्यकर्ताओं को ताकत देने की कोशिश कर रही हैं।
इससे पहले जब 2019 में सोनभद्र हत्याकांड हुआ था तो प्रियंका गांधी पीड़ितों से मिलने पर अड़ गई थीं। उस समय उनके इस कदम को दादी इंदिरा गांधी से जोड़कर देखा गया था। ‘बेलछी नरसंहार’ की घटना से जोड़कर तुलना की जा रही थी। समझा जाता है कि आपातकाल के बाद जनता का विश्वास खो चुकी इंदिरा गांधी जब 1977 का चुनावी हारीं तो बेलछी की घटना के बाद उनका वहां जाना एक बार फिर से उनके राजनीतिक कद को बढ़ाने वाला साबित हुआ। सोनभद्र कांड के बाद अब लखीमपुर कांड के लिए भी जिस तरह से प्रियंका गांधी ने तेवर दिखाए हैं, उससे कांग्रेस के लोग काफी जोश में आ गए हैं।
कुछ समय पहले पंजाब में सीएम पद के दावेदार माने जा रहे वरिष्ठ कांग्रेसी नेता सुनील जाखड़ ने 3 अक्टूबर 2021 को प्रियंका गांधी को हिरासत में लेने के मामले की तुलना 3 अक्टूबर 1977 के घटनाक्रम से कर डाली। दरअसल, तब जनता पार्टी की सरकार में 3 अक्टूबर के दिन इंदिरा गांधी को भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ्तार कर लिया था। हालांकि बाद में सबूतों के अभाव में कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया। जाखड़ ने लिखा, ‘अगर श्रीमती इंदिरा गांधी की 3 अक्टूबर 1977 को गिरफ्तारी से जनता पार्टी सरकार की विदाई का मार्ग प्रशस्त हुआ तो 3 अक्टूबर 2021 को प्रियंका गांधी को हिरासत में लेना बीजेपी सरकार के सफाये की शुरुआत बनेगी।’ यह साफ-साफ बताता है कि इतिहास दोहराने का सपना पालकर किसान आंदोलन के मुद्दे को पूरी तरह भुनाना चाहती है।
यही वजह है कि यूपी के प्रभारी बनाए गए छत्तीसगढ़ के सीएम भूपेश बघेल को फौरन रायपुर से और पंजाब के उप मुख्यमंत्री रंधावा को चंडीगढ़ से लखनऊ के लिए उड़ने को कहा गया। यह बात अलग है कि किसी भी नेता के प्लेन को लखनऊ में लैंड करने की इजाजत नहीं मिली। कांग्रेस की पूरी कोशिश है कि जनता और मीडिया का पूरा फोकस लखीमपुर और किसानों के मुद्दों पर केंद्रित रखा जा सके जिससे बीजेपी को घेरने का उसे मौका मिल सके। वैसे भी उसे आंतरिक संकट से नुकसान ही हो रहा था।
…और सपा के लिए एक सुनहरी मौका
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव योगी सरकार पर लगातार हमले करते रहे हैं। लखीमपुर जाने के उनके प्लान की आहट मिलते ही पुलिस प्रशासन ने उन्हें और दूसरे सपा नेताओं को नजरबंद कर लिया। अखिलेश नहीं माने और सड़क पर आकर कार्यकर्ताओं के साथ धरने पर बैठ गए। उधर, उनके घर के बाहर पुलिस की एक जीप में आग लगा दी गई। तड़के से प्रियंका लाइमलाइट में थीं, लेकिन 10 बजते-बजते मीडिया के सारे कैमरे अखिलेश पर फोकस कर चुके थे। अखिलेश यादव ने मांग थी कि केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा को इस्तीफा देना चाहिए और पीड़ितों के परिजनों को 2 करोड़ रुपये की मदद दी जानी चाहिए। इतना ही नहीं, लखनऊ में आवास से जब पुलिस ने अखिलेश को हिरासत में लिया तो सैकड़ों की संख्या जमे समर्थकों ने पुलिस की गाड़ी को घर लिया। सपा के झंडे और टोपी के साथ पहुंचे लोगों ने एक तरफ जिंदाबाद के नारे लगाए तो दूसरी तरफ मीडिया के सामने झंडे भी लहराते दिखे जिससे टीवी के सामने बैठी करोड़ों जनता को यह संदेश जाए कि सपा के लोग सड़क पर उतरकर किसानों का समर्थन कर रहे हैं।
लखीमपुर खीरी जिले के तिकोनिया क्षेत्र में रविवार को उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा के पैतृक गांव जाने के दौरान हुए संघर्ष में चार किसानों समेत आठ लोगों की मौत हुई है।
सच तो यह है कि चुनाव में काफी कुछ अब नैरेटिव पर सेट होने लगा है। ऐसे में सभी पार्टियां जनता का परसेप्शन अपने प्रति पॉजिटिव रखना चाहती हैं। 2012-17 के कार्यकाल के दौरान युवाओं को लैपटॉप, गोमती रिवर फ्रंट, एक्सप्रेसवे जैसे कई मुद्दों पर चर्चा बटोरने वाली सपा की ओर से ये आरोप लगाया जाता रहा है कि यूपी में योगी सरकार ने उसके ही शुरू किए गए कामों को अपना नाम दे दिया है। अखिलेश के सामने इस चुनाव में चुनौती बढ़ने वाली है क्योंकि उसका कोर वोट बैंक समझे जाने वाले मुस्लिम और यादव वोटों में भी सेंध लगाने की बीजेपी और ओवैसी की पार्टी कोशिश कर रही हैं। ऐसे में सपा किसान आंदोलन के सहारे अपने पक्ष में माहौल बनाने की तैयारी में है।
यूपी के मैदान में इस बार AAP भी हैं…
यूपी में इस बार आम आदमी पार्टी भी चुनाव लड़ रही है। 24 घंटे आपूर्ति के साथ घरेलू उपभोक्ताओं को 300 यूनिट फ्री बिजली का वादा किया गया है। AAP के नेता दिल्ली के मॉडल को यूपी में लागू करने की बात कर रहे हैं। दिल्ली जैसी फ्री बिजली, बेहतर शिक्षा और फ्री इलाज की बात कर केजरीवाल-सिसोदिया की टीम चुनाव में करिश्मा करने का दावा कर रही है। ऐसे में उनके नेताओं के लिए लखीमपुर कांड में खुद को जनता के करीब ले जाने का बेहतर मौका दूसरा नहीं हो सकता था। केजरीवाल से लेकर सिसोदिया और संजय सिंह सभी नेता एक्टिव हो गए और ट्विटर पर वीडियो लाकर योगी सरकार पर बरसने लगे।
यूपी के सुल्तानपुर से ताल्लुक रखने वाले संजय सिंह रात में ही लखीमपुर के लिए निकल चुके थे। उन्हें विसवां चुंगी सीतापुर के पास 2.30 बजे गिरफ्तार कर लिया गया। संजय सिंह ने इस जानकारी को ट्वीट भी किया। रात में पुलिस से नोकझोंक का उनका वीडियो भी ट्विटर पर छा गया। आप के नेता और कार्यकर्ता रीट्वीट करने लगे। AAP के ट्विटर हैंडल से सीधे बीजेपी पर हमला करते हुए कहा गया, ‘किसानों के परिवार के ये आंसू भारी पड़ेंगे BJP वालो!’।
AAP की कोशिश है कि अगले चुनाव में दिल्ली मॉडल, किसान आंदोलन के सहारे ज्यादा से ज्यादा सीटें अपनी झोली में लाई जा सकें क्योंकि पार्टी को पता है कि जातिगत समीकरण साधने में सभी पार्टियां लगी हैं और वह तरीके उनके काम नहीं आएगा। वैसे भी दिल्ली बॉर्डर पर किसानों के हित में व्यवस्था कर आप ने आंदोलन के पहले दिन से समर्थन दे रखा है। उसे यूपी के साथ-साथ पंजाब भी देखना है।
बसपा के मिश्रा जी भी आक्रामक
बीएसपी ने भी ट्वीट कर बीजेपी सरकार को घेरा। बसपा सुप्रीमो मायावती ने सिलसिलेवार ट्वीट कर सुप्रीम कोर्ट से स्वत: संज्ञान लेने की मांग की। पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और राज्यसभा सांसद एससी मिश्र को रविवार देर रात लखनऊ में उनके निवास पर नजरबंद कर दिया गया। यूपी में अनुसूचित जाति और जनजाति के इर्द-गिर्द घूमती बसपा की राजनीति इस बार अपने पुराने समीकरण पर लौटती दिख रही है। ब्राह्मणों को साधने के लिए बसपा ने प्रबुद्ध सम्मेलन शुरू किया है। बसपा को 2014 लोकसभा चुनाव के बाद 2017 विधानसभा और फिर 2019 लोकसभा चुनाव की तरह 2022 में जातिगत समीकरण के फेल होने का डर सता रहा है। केंद्र में मोदी सरकार बनने के बाद जातीय ऐंगल फेल रहे हैं। ऐसे में मायावती की कोशिश है कि वह खुद को किसानों के समर्थन में खड़ा दिखाएं और अगले चुनाव में पार्टी के लिए जीत की राह प्रशस्त हो सके।
ओवैसी और दूसरे दल भी मैदान में
मुसलमानों के बड़ी भूमिका में आने की बात करते हुए ओवैसी की पार्टी AIMIM भी यूपी चुनाव में कूद चुकी है। अयोध्या से चुनावी दौरे का आगाज हो या मुसलमानों का हितैषी बनने की कोशिश, ओवैसी यूपी की सियासत में एक मजबूत किरदार बनना चाहते हैं। ऐसे में उन्होंने लखीमपुर घटना पर फौरन ट्वीट कर न्यायिक जांच की मांग कर डाली। उन्होंने कहा कि जान गंवाने वाले 8 लोगों के परिवारों को मुआवज़ा दिया जाए। इसके साथ ही उन्होंने तीनों कृषि कानून को जल्द से जल्द वापस लेने की मांग की है।
मुश्किल में बीजेपी
किसान आंदोलन के बीच लखीमपुर में किसानों की हत्या पर राजनीतिक दल बड़े हों या छोटे, इस समय सबके निशाने पर बीजेपी है। विपक्षी ही नहीं, कुछ अपने भी योगी सरकार के लिए मुश्किल बढ़ाने वाले साबित हो रहे हैं। इनमें से एक हैं बीजेपी सांसद वरुण गांधी। उन्होंने एक लंबा लेटर लिखकर योगी सरकार से सख्त कार्रवाई की मांग की है। उन्होंने लेटर में साफ लिखा कि एक दिन पहले अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी की जयंती मनाई गई और दूसरे दिन लखीमपुर खीरी में जिस तरह से ”हमारे अन्नदाताओं” की हत्या की गई, वह सभ्य समाज में अक्षम्य है। इससे बीजेपी पर प्रेशर बढ़ रहा है। वह इस मुद्दे को ज्यादा खींचना नहीं चाहती।
ऐसे में हो सकता है किसानों से जुड़ा मामला होने के कारण पार्टी और केंद्रीय नेतृत्व निष्पक्ष जांच का हवाला देते हुए आरोपी मोनू मिश्रा के पिता केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा टेनी का इस्तीफा भी ले ले। हालांकि बड़ा सवाल फिर भी यही है कि क्या किसान आंदोलन से बीजेपी विरोध की भड़की आग चुनाव तक शांत हो पाएगी?

- सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
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