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शुक्रवार, 15 अगस्त 2025

सबूत सहित जानिए: क्या वाकई यूपी के बिजली विभाग ने ऊर्जा मंत्री और योगी सरकार की सुपारी ले रखी है?


 क्या वाकई यूपी के बिजली विभाग ने ऊर्जा मंत्री और योगी सरकार की सुपारी ले रखी है? ये सवाल इसलिए क्योंकि बीती 23 जुलाई को ऊर्जा मंत्री अरविंद कुमार शर्मा ने लखनऊ के शक्ति भवन में हुई समीक्षा बैठक के दौरान अधिकारियों को जमकर फटकारा था। इस समीक्षा बैठक में विभाग के चेयरमैन से लेकर अधिशासी अभियंता स्‍तर तक के अधिकारी शामिल थे।  

ऊर्जा मंत्री ने अधिकारियों से कहा कि आप लोग आंख-कान बंद किए बैठे हैं जबकि जनता बिजली न आने से परेशान है। उन्होंने यहां तक बोला कि हमारी सरकार कोई दुकान नहीं चला रही कि जिसमें हमें सिर्फ वसूली की चिंता हो, हमारे लिए यह एक जनसेवा है और हमें उसी के अनुरूप काम करना होगा। ऊर्जा मंत्री ने अधिकारियों को फील्ड में जाने के निर्देश भी दिए। मंत्री महोदय ने कहा कि आपके गलत आचरण का खामियाजा पूरा प्रदेश भुगत रहा है। 

इस समीक्षा बैठक के चार-पांच दिन बाद मंत्री महोदय के एक्स हैंडिल से लिखा गया कि विभाग के कुछ अधिकारी एवं कर्मचारियों ने ऊर्जा मंत्री की ''सुपारी'' ले रखी है। यही नहीं, सोशल साइट पर यह भी लिखा गया कि कुछ अधिकारी और कर्मचारी अराजक तत्वों के साथ मिलकर बिजली विभाग को बदनाम करने में लगे हैं। 

गौरतलब है कि यूपी के ऊर्जा मंत्री खुद गुजरात कैडर के एक नौकरशाह रहे हैं और इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के काफी करीबी तथा भरोसेमंद माने जाते हैं। अब जरा अंदाज लगाइए कि पीएम का नजदीकी कोई पूर्व नौकरशाह जब अपने विभागीय अधिकारियों पर इतने संगीन आरोप लगा रहा हो तो उसके मायने कितने गंभीर हो सकते हैं। गंभीर इसलिए भी कि जो व्‍यक्‍ति स्‍वयं नौकरशाह रहा हो, वह नौकरशाहों की सभी कारगुजारियों से भली-भांति परिचित तो होगा ही।  

मुख्‍यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी बोले 

ऊर्जा मंत्री की समीक्षा बैठक और एक्स हैंडिल पर लिखी गई उनकी पोस्ट के बीच गत 25 जुलाई को सीएम योगी आदित्यनाथ ने ऊर्जा विभाग की उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक के दौरान स्पष्ट शब्दों में कहा कि प्रदेश में बिजली व्यवस्था अब केवल तकनीकी या प्रशासनिक विषय नहीं, बल्कि जनता के भरोसे और शासन की संवेदनशीलता का पैमाना बन चुकी है। 

सीएम योगी ने अफसरों को दो टूक शब्दों में कहा कि ट्रिपिंग, ओवरबिलिंग और अनावश्यक कटौती अब किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं की जाएगी, सुधार करना ही होगा। इसके साथ ही सीएम ने कहा कि लापरवाही अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी। मुख्यमंत्री ने ट्रिपिंग की लगातार आ रही शिकायतों पर गहरी नाराजगी जताई और निर्देश दिया कि प्रत्येक फीडर की तकनीकी जांच हो, कमजोर स्थानों की पहचान कर तुरंत सुधार कराया जाए। 

मुख्यमंत्री ने ऊर्जा विभाग के अधिकारियों से कहा कि संसाधनों की कोई कमी नहीं है। सरकार ने बिजली उत्पादन, पारेषण और वितरण को मजबूत करने के लिए रिकॉर्ड बजट उपलब्ध कराया है। ऐसे में किसी भी स्तर पर लापरवाही अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी। सभी डिस्कॉम के प्रबंध निदेशकों से उनके क्षेत्रों की आपूर्ति की स्थिति जानने के बाद मुख्यमंत्री ने निर्देश दिया कि हर स्तर पर जवाबदेही तय की जाए। 

अचानक नाराज नहीं हुए ऊर्जा मंत्री और मुख्‍यमंत्री

ऊर्जा मंत्री और मुख्‍यमंत्री की बिजली विभाग के अधिकारियों को लेकर यह नाराजगी किसी एक दिन की कुव्यवस्‍था का परिणाम नहीं है। यह लंबे समय से चली आ रही अधिकारियों की लापरवाह कार्यप्रणाली से उपजा आक्रोश है। लेकिन घोर आश्चर्य की बात है कि विभागीय मंत्री तथा मुख्‍मंत्री की इतनी कठोर टिप्‍पणियों के बावजूद अधिकारी हैं कि सुधरने का नाम नहीं ले रहे। 

कृष्‍ण की नगरी मथुरा इसका बड़ा उदाहरण 

उदाहरण के तौर पर यूपी के अत्यंत महत्वपूर्ण जनपदों में शुमार मथुरा के बिजली अधिकारियों की कार्यशैली देखी जा सकती है। 

उल्लेखनीय है कि मथुरा न केवल भाजपा के लिए राजनीतिक दृष्‍टि से एक अहम जिला है बल्कि धार्मिक नजरिए से भी विश्व पटल पर विशिष्ट स्थान रखता है। यहां प्रतिदिन लाखों श्रद्धालु विभिन्न स्‍थानों का भ्रमण करने तथा अपने आराध्य के दर्शन करने आते हैं। 

योगी सरकार के सबसे पहले कार्यकाल में मथुरा-वृंदावन क्षेत्र के विधायक पंडित श्रीकांत शर्मा को ही प्रदेश के ऊर्जा मंत्रालय का जिम्मा सौंपा गया था, और तब उन्‍होंने पूरे पांच साल बहुत अच्छे तरीके से बिजली की व्यवस्था को संभालने का काम किया था। प्रदेश की जनता आज उनके कार्यकाल को याद करती है। लेकिन अब अचानक ऐसा क्या हो गया कि उसी व्‍यवस्था पर ऊर्जा मंत्री अरविंद शर्मा से लेकर मुख्‍यमंत्री योगी तक नाराजगी जता रहे हैं।  

कहने के लिए तो मथुरा में बिजली विभाग के सुपरिटेंडिंग इंजीनियर से लेकर चीफ इंजीनियर तक तैनात हैं किंतु उनके पास जनता तो छोड़िए, पत्रकारों तथा विधायकों की भी बात न तो सुनने का समय है और न उनके किसी मैसेज का जवाब देने का। सबूत के साथ बानगी देखिए-  

ये वो मैसेज हैं जो Legend News की ओर से चीफ इंजीनियर (CE) तथा सुपरिंटेंडेट इंजीनियर (SE) को समय-समय पर भेजे गए। इन वाट्सऐप मैसेज में समय का काफी अंतर होने के बाद भी अधिकारियों की कार्यप्रणाली में कोई अंतर नजर नहीं आता। 
मैसेज डिलीवर होने पर भी किसी प्रकार की कोई प्रतिक्रिया न देना इस बात को साबित करता है कि इन अधिकारियों को किसी का कोई खौफ नहीं है। इन्‍हें योगी सरकार के उन आदेश-निर्देशों की भी परवाह नहीं है जिसके तहत बार-बार कहा जाता है कि हर फोन तथा मैसेज का जवाब देना जरूरी है और तत्काल जवाब न दे पाने की स्‍थिति में समय मिलने पर संपर्क साधना आवश्यक है। 
जाहिर है कि ये और इन जैसे प्रदेश के तमाम अधिकारी आश्‍वस्‍त हैं कि उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। यहां तक कि मंत्री और मुख्‍यमंत्री भी। यदि ऐसा नहीं होता तो नौकरशाहों की इतनी हिमाकत नहीं होती, और न ये इतने बेलगाम होते कि मंत्री तथा मुख्‍यमंत्री की नाराजगी से भी इनके कानों पर जूं नहीं रेंगती। 
यहां यह जान लेना भी जरूरी है कि मथुरा में तैनात इन अधिकारियों सहित प्रदेशभर के बहुत से अधिकारियों का ऐसा दुस्‍साहस तभी संभव है जब वो जानते हों कि मंत्री और मुख्‍यमंत्री कहीं न कहीं इतने मजबूर हैं कि वो घुड़की तो दे सकते हैं, एक्शन नहीं ले सकते। वर्ना यदि एक-दो ऐसे अफसरों पर भी समुचित एक्शन हुआ होता तो ऐसी नौबत नहीं आती। 
एक्शन हुआ होता तो न ऊर्जा मंत्री इतने असहाय दिखाई देते और न मुख्‍यमंत्री को नाराजगी जाहिर करनी पड़ती। 2027 के विधानसभा चुनाव बहुत दूर नहीं हैं। समय रहते यदि योगी सरकार नहीं चेती, तो इसका भाजपा को बड़ा नुकसान भी उठाना पड़ सकता है। 
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी  

रविवार, 24 जनवरी 2021

उत्तर प्रदेश में अधिकारियों के लिए अगर कहीं स्‍वर्ग है तो वह यहीं है… यहीं है… यहीं है

 प्रशासनिक आधार पर 18 मंडलों वाले उत्तर प्रदेश में यूं तो 75 जिले हैं किंतु ऐसे जिलों की संख्‍या बहुत कम है, जो अधिकारियों को मुफीद बैठते हैं।

ऐसे जिलों में कृष्‍ण की जन्‍मस्‍थली का गौरव प्राप्‍त ‘मथुरा’ का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है।

वैकुण्‍ठ से भी श्रेष्‍ठ और तीन लोक से न्‍यारी नगरी की उपमा प्राप्‍त मथुरा को उन सप्‍तपुरियों में भी शुमार किया जाता है जिन्‍हें मोक्षदायिनी माना गया है।
एक ओर हरियाणा तथा दूसरी ओर राजस्‍थान की सीमा से सटे इस विश्‍व प्रसिद्ध धार्मिक स्‍थल की एक विशेषता यहां से राष्‍ट्रीय राजधानी दिल्‍ली का अत्‍यधिक नजदीक होना भी है।
कभी लखनऊ के लिए किसी सीधे रास्‍ते को तरसने वाले इस जनपद से आज प्रदेश की राजधानी तक मात्र पांच घंटों के अंदर पहुंचा जा सकता है।
अधिकारियों के लिए सर्वाधिक मुफीद क्‍यों?
इन सब सुविधाओं के बावजूद मथुरा में ऐसा कुछ अतिरिक्‍त भी है जो पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को इतना अधिक प्रिय है कि वो न सिर्फ यहां लंबी से लंबी पोस्‍टिंग चाहते हैं बल्‍कि बार-बार यहीं पोस्‍टिंग कराना चाहते हैं।
क्‍या है ऐसा?
इस सवाल पर थोड़ी गंभीरता से गौर किया जाए तो स्‍थिति आसानी से स्‍पष्‍ट हो जाती है।
उदाहरण के लिए मथुरा का आम नागरिक शांतिप्रिय है और चैन से जिंदगी गुजारने में यकीन रखता है। टकराव का रास्‍ता चुनना उसे पसंद नहीं है और उसकी यह आदतें अधिकारियों का काम काफी आसान बना देती हैं।
आम मथुरावासी की इन आदतों के कारण ‘सुविधा शुल्‍क’ सर्वसुलभ है क्‍योंकि अमन पसंद स्‍थानीय नागरिक अधिकारियों को दाम देकर काम कराने में अधिक रुचि लेता है अपेक्षाकृत अन्‍य तरीकों के।
अधिकारियों के काम में दखल ‘ना’ के बराबर
शासन में मथुरा का प्रतिनिधित्व हमेशा बने रहने तथा सत्ता के गलियारों से बराबर आमदरफ्त होते हुए भी यह एक ऐसा जिला है जिसके बाबत यह कहा जा सकता है कि यहां कोई नेता ही नहीं है। नेताओं के नाम पर कुछ है तो चापलूसों की फौज, दलालों का जमघट और बिना रीढ़ वाले वो जंतु जिन्‍हें साष्‍टांग करने में महारत हासिल है।
सरकार चाहे सपा की रही हो या बसपा की, गठबंधन से चल रही हो अथवा पूर्ण बहुमत से लेकिन मथुरा को हमेशा तरजीह दी गई।
मथुरा के लोगों ने वो दौर भी देखा है जब यहां के कुल जमा पांच में से चार विधायक मंत्री हुआ करते थे किंतु तब भी इस जिले में तूती बोलती थी तो सिर्फ अधिकारियों की। मंत्री रहते हुए अधिकारियों के सामने मिमियाने वाले नेता यहां हर दौर में पाये जाते रहे हैं।
इसका ज्वलंत उदाहरण है हाल ही में घटी वो घटना जब प्रदेश के कद्दावर मंत्री, सरकार के प्रवक्‍ता और मथुरा-वृंदावन सीट से विधायक श्रीकांत शर्मा को स्‍थानीय अधिकारियों के खिलाफ सीधे मुख्‍यमंत्री के नाम इसलिए पत्र लिखना पड़ा क्‍योंकि प्रस्‍तावित कुंभ मेले के इंतजामों को वो उनके कहने से तरजीह नहीं दे रहे थे।
हुआ भी वही, मुख्‍यमंत्री तक शिकायत पहुंचने के बाद ही कुंभ मेले से जुड़े अधिकारियों ने सक्रियता दिखाई अन्‍यथा न तो उनके ऊपर ऊर्जा मंत्री का भारी भरकम पद कोई प्रभाव डाल पा रहा था और न संत-महंतों की नाराजगी कोई असर छोड़ रही थी।
हर जिले में अधिकारियों को उनकी जिम्‍मेदारी का अहसास कराने वाला दूसरा सर्वाधिक प्रभावशाली तबका होता है ‘पत्रकारों’ का, किंतु बात करें कृष्‍ण नगरी की तो यहां ‘पत्रकारों’ की संख्‍या भले ही सैकड़ों में हो परंतु ‘पत्रकारिता’ करने वाले ढूंढे नहीं मिलते।
नेता नगरी से कदम-ताल मिलाते हुए अधिकांश पत्रकार अधिकारियों की जी-हजूरी में अपना समय जाया करना अधिक उपयुक्‍त समझते हैं क्‍योंकि किसी एक अधिकारी की कृपा भी उनके लिए पर्याप्‍त होती है।
अधिकारी के कृपा पात्र बनते ही उनकी आर्थिक एवं सामाजिक दरिद्रता तो दूर होने ही लगती है, साथ ही घर-परिवार व नाते रिश्‍तेदारों में रुतबा भी बढ़ जाता है।
सुबह से शाम तक कलेक्‍ट्रेट के इर्द-गिर्द घूमने वाले तथाकथित पत्रकारों की एक जमात को तो इसलिए भी अधिकारियों का वरदहस्‍त जरूरी होता है क्‍योंकि उसके बिना उनके गोरखधंधे बंद हो जाएंगे और वो कानून के शिकंजे में इस कदर फंसेंगे कि लंबे समय तक उससे बाहर आना संभव नहीं होगा।
पत्रकारों का ये वर्ग अधिकारियों की जी-हजूरी में इतना मुस्‍तैद रहता है कि उनके निजी शौक और ऐब भी पूरे कराने में परहेज नहीं करता।
लोकतंत्र के चौथे खंभे को इस स्‍थिति में देख किसी को भी पत्रकारों और पत्रकारिता से भी घृणा हो सकती है लेकिन इन कथित पत्रकारों को खुद से कभी घृणा नहीं होती इसलिए वो पूरी शिद्दत के साथ हमेशा अधिकारियों के सामने दुम हिलाते देखे जा सकते हैं।
पत्रकारों की यही वो श्रेणी है जिनके बल पर पत्रकारों को कई-कई गुटों में बांटकर अधिकारी अपना उल्‍लू सीधा करते रहते हैं। अधिकारियों द्वारा डाले हुए टुकड़ों पर जीविका और जिजीविषा पाने वाले ये तत्‍व उनके साथ एक अदद फोटो खिंचवाने तक को लालायित रहते हैं और ‘पत्रकारिता दिवस’ पर भी आयोजन-प्रायोजनों के जरिए उन्‍हें सम्‍मानित करने का मौका नहीं चूकते।
घोर आश्‍चर्य की बात तो यह है कि इतना सब करने के बाद भी बमुश्‍किल वह मात्र उतना ही हासिल कर पाते हैं जितना कि कोई नेता अपने चमचों को सुबह-शाम बख़्शीश में दिलवा देता है।
नेता और पत्रकारों के अलावा हर जिले में एक तीसरा वर्ग भी होता है जो अधिकारियों की कार्यप्रणाली को ऑब्जर्व करता है। सामाजिक संगठनों के रूप में सक्रिय यह वर्ग चूंकि सुविधा संपन्‍न पाया जाता है इसलिए इसकी समाज में महत्ता बड़ी होती है।
महाभारत नायक योगीराज श्रीकृष्‍ण की पावन जन्‍मस्‍थली में भी ऐसे संगठन तो बहुत पाए जाते हैं लेकिन वो भी नेता और पत्रकारों की तरह चापलूसी के माध्‍यम से अपनी दुकान चलाने में माहिर हैं।
इस तबके के लोगों का भी कार्य नेता और पत्रकारों की भांति किसी न किसी तरह अधिकारियों का सानिध्‍य पाना और इसके लिए हद से भी गुजर जाना है।
इस वर्ग के लोगों से जुड़ा यह कड़वा सच जानकर कोई भी हैरान हुए बिना नहीं रह सकता कि ये वर्ग अधिकारियों को खुश करने के लिए थ्री डब्‍ल्‍यू यानी वाइन, वेल्‍थ और यहां तक कि वुमैन का इंतजाम करने से भी पीछे नहीं हटता।
यही कारण है कि विश्‍व प्रसिद्ध इस धार्मिक जनपद में एकबार पोस्‍टिंग पा जाने वाला अधिकारी एक ओर जहां बार-बार यहां पोस्‍टिंग पाने की कोशिश में लगा रहता है वहीं दूसरी ओर यहां से चले जाने अथवा नौकरी से अवकाश प्राप्‍ति के बाद भी किसी ने किसी रूप में यहीं मंडराता रहता है। वर्तमान में भी कई अधिकारी इसकी जीती जागती नजीर हैं लेकिन क्‍या मजाल कि कोई उनके ऊपर उंगली भी उठा सके।
भांग, भोजन तथा भजन के लिए विश्‍व के पटल पर विशिष्‍ट पहचान रखने वाली मथुरा नगरी ने ऐसे कई अधिकारी देखे हैं जिन्‍होंने यहां की एक अदद पोस्‍टिंग से अपनी तीन-तीन पीढ़ियों का मुकम्‍मल इंतजाम कर लिया लेकिन उनका बाल तक बांका नहीं हो सका।
ऐसे-ऐसे नेता उसके सामने हैं जो कुछ वर्षों पहले तक लंबे-लंबे कुर्ते पहनकर कचहरी पर दिन-रात छोटे-मोटे कामों के लिए चक्‍कर लगाते थे लेकिन आज करोड़ों नहीं अरबों की संपत्ति के मालिक हैं। शहर के तमाम व्‍यवसायी उनके द्वारा किए गए पैसे के निवेश से अपनी शानो-शौकत बनाए हुए हैं।
जिनकी औकात एक दुपहिया खरीदने की नहीं हुआ करती थी और कचहरी तक जाने के लिए भी किसी से लिफ्ट पाने का मौका तलाशले थे आज उनके गुर्गे कई-कई लग्‍जरी गाड़ियों के मालिक हैं।
अधिकारियों और नेताओं के इस वर्ग की अंधी कमाई से बहुत से मशहूर शिक्षण संस्‍थान संचालित हो रहे हैं और भूमाफिया बेनामी संपत्ति एकत्र कर रहे हैं।
पत्रकारों का एक खास वर्ग भी अपनी औकात से अधिक धन अर्जित करके इनके संरक्षण में ही अपनी सुरक्षा देखता है इसलिए उन्‍हें उपकृत करने का कोई अवसर हाथ से निकलने नहीं देता।
‘अंधे पीसें कुत्ते खाएं’ की कहावत को चरितार्थ करने के कारण ही मथुरा आज तक अधिकारियों के लिए दुधारू गाय साबित होता रहा है और उस गरिमामय मुकाम को हासिल करने के लिए तरस रहा है जिसका वह सही मायनों में हकदार है।
बात चाहे कालिंदी के कलुष की हो या निरंकुश अधिकारियों की, भ्रष्‍टाचार की हो या बदहाली की। कृष्‍ण की नगरी हर मामले में अपनी कलंक कथा खुद कहती है, लेकिन सुनने और देखने वाला कोई नहीं। सुनेगा और देखेगा भी कैसे, जब जिम्‍मेदार वर्ग ही आंख, कान व मुंह बंद करके बैठा होगा।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी 

रविवार, 22 नवंबर 2020

बड़ा सवाल: ऊर्जा मंत्री की अधिकारियों पर ‘चल’ नहीं रही, या वो पब्‍लिक को ‘चला’ रहे हैं?


 बीजेपी के कद्दावर नेताओं में शामिल प्रदेश के ऊर्जा मंत्री और योगी सरकार के प्रवक्‍ता श्रीकांत शर्मा की अब अधिकारियों पर ‘चल’ नहीं रही या वो ऐसा दिखाकर पब्‍लिक को ‘चला’ रहे हैं?

यह सवाल 17 नवंबर को ‘दैनिक हिन्‍दुस्‍तान’ के आगरा संस्‍करण में छपी उस खबर के बाद पूछा जा रहा है जिसके अनुसार ऊर्जा मंत्री श्रीकांत ने वृंदावन कुंभ मेले की तैयारियों को लेकर स्‍थानीय प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा बरती जा रही ढील पर नाराजगी जताते हुए मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ को एक पत्र लिखा है और इस संबंध में उनसे अनुरोध किया है कि वह अधिकारियों को निर्देशित करें।
अखबार के पृष्‍ठ 3 पर छपी इस खबर के मुताबिक 16 फरवरी 2021 से 28 मार्च 2021 तक 41 दिन वृंदावन में यमुना किनारे चलने वाले इस कुंभ मेले की अब तक कोई भौतिक प्रगति नहीं है जिस कारण साधु-संतों सहित स्‍थानीय जनमानस निराश व आक्रोशित है।
खबर के अनुसार ऊर्जा मंत्री ने मुख्‍यमंत्री को भेजे पत्र में लिखा है कि जिला प्रशासन, ब्रज तीर्थ विकास परिषद के मुख्‍य कार्यपालक अधिकारी तथा अन्‍य एजेंसियों को परस्‍पर समन्‍वय स्‍थापित कर कुंभ मेले को भव्‍य बनाने और समय से कार्य पूर्ण कराने के लिए आदेशित किया जाए।
17 नवंबर को छपी इस खबर के बाद ‘दैनिक हिन्‍दुस्‍तान’ में ही आज यानी 19 नवंबर के दिन एक और खबर छपी है जिसके मुताबिक ब्रज तीर्थ विकास परिषद के सीईओ एवं कुंभ मेला अधिकारी तथा मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के उपाध्‍यक्ष नागेन्‍द्र प्रताप यादव ने बीते कल (बुधवार) को मेला स्‍थल का निरीक्षण किया।
इस दौरान उन्‍होंने जल निगम एवं नगर निगम के अधिकारियों को कुंभ मेला शुरू होने से पहले सभी व्‍यवस्‍थाएं पूरी करने के निर्देश देते हुए मेला क्षेत्र में सीवर का पानी फिर से भर दिए जाने पर नाराजगी जताई।
इसके अलावा मेला अधिकारी नागेन्‍द्र प्रताप यादव ने संबंधित अधिकारियों को पत्र लिखकर यमुना के दोनों ओर अतिक्रमण हटवाने तथा पार्किंग के लिए जमीन का चयन करने को भी कहा है।
नागेन्‍द्र प्रताप ने यह निरीक्षण कार्य ऊर्जा मंत्री द्वारा सीएम योगी को पत्र लिखने के बाद ही क्‍यों किया, यह तो वही जानते होंगे अलबत्ता नेता नगरी में चर्चाएं अच्‍छी-खासी हैं।
गौरतलब है कि नागेन्‍द्र प्रताप यादव एक ओर जहां मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के उपाध्‍यक्ष और ब्रज तीर्थ विकास प्ररिषद के सीईओ हैं वहीं दूसरी ओर ‘उज्‍जवल ब्रज’ नामक संस्‍था से भी जुड़े हैं जो ब्रज के विकास हेतु पंजीकृत कराई गई है।
कुल मिलाकर पहले से तीन-तीन बड़ी जिम्‍मेदारियां निभाते चले आ रहे नागेन्‍द्र प्रताप पर वृंदावन कुंभ मेला अधिकारी की भी अतिरिक्‍त जिम्‍मेदारी है।
बहरहाल, ऊर्जा मंत्री और योगी सरकार के प्रवक्‍ता श्रीकांत शर्मा का कुंभ मेले की तैयारियों में ढील बरतने पर स्‍थानीय प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ सीधे मुख्‍यमंत्री को शिकायती पत्र लिखना बहुत कुछ कहता है, वो भी तब जबकि 2022 में यूपी विधानसभा के चुनाव प्रस्‍तावित हैं।
मथुरा की जिस विधानसभा सीट से कांग्रेस के लगातार 15 साल विधायक रहे प्रदीप माथुर को हराकर श्रीकांत शर्मा सन् 2017 में भाजपा की टिकट पर विधायक निर्वावित हुए हैं, वह मथुरा-वृंदावन विधानसभा सीट ही है।
कस्‍बा गोवर्धन के मूल निवासी श्रीकांत शर्मा का इस तरह मथुरा न सिर्फ गृह जनपद है बल्‍कि निर्वाचन क्षेत्र भी है। ऐसे में श्रीकांत शर्मा का स्‍थानीय प्रशासनिक अधिकारियों को लेकर मुख्‍यमंत्री को लिखा गया पत्र समझ से परे है।
लोगों का मत है कि इस पत्र के दो मतलब निकलते हैं। जिसमें पहला तो ये कि श्रीकांत शर्मा का योगीराज में कद घट रहा है इसलिए प्रशासनिक अधिकारियों पर उनकी पकड़ ढीली पड़ रही है और वह श्रीकांत शर्मा की बात को तरजीह नहीं दे रहे।
इसके अलावा एक दूसरा मतलब यह भी निकलता है कि ऊर्जा मंत्री की खुद कुंभ मेले की तैयारियों में कोई रुचि नहीं है इसलिए वो पत्र लिखकर स्‍थानीय नागरिकों एवं साधु-संतों की नाराजगी से पल्‍ला झाड़ रहे हैं और उन्‍हें ‘चलता’ कर रहे हैं। हालांकि इसमें पहले वाली बात ज्‍यादा दमदार लगती है क्‍योंकि अधिकारी कई मौकों पर उनसे भारी पड़ते दिखाई दिए हैं।
यूं भी काफी समय बाद मथुरा में कोई जिलाधिकारी इतने लंबे समय तक तैनात रहा है, जिस कारण उनकी सत्ता के गलियारों में मजबूत पकड़ के खासे चर्चे हैं।
बताया जाता है कि जिलाधिकारी आसानी से किसी को भाव नहीं देते, फिर चाहे सत्ताधारी दल का कोई नेता हो, मंत्री हो या फिर मीडियाकर्मी ही क्‍यों न हों।
जहां तक प्रश्‍न ब्रज तीर्थ विकास परिषद से जुड़े प्रमुख अधिकारियों नागेन्‍द्र प्रताप और शैलजाकांत मिश्र का है तो उनकी कार्यप्रणाली को लेकर ऊर्जा मंत्री ने भले ही पहली बार सार्वजनिक तौर पर नाराजगी व्‍यक्‍त की हो किंतु आम जनता तथा विभिन्‍न समाजसेवी संगठनों सहित जागरूक लोगों में पहले से काफी नाराजगी है, बावजूद इसके हर बार उनका पलड़ा भारी साबित हुआ है।
यहां गौर करने वाली बात यह भी है कि आईपीएस अधिकारी शैलजाकांत मिश्र और प्रशासनिक अधिकारी नागेन्‍द्र प्रताप यादव का मथुरा से बहुत गहरा लगाव लगातार बना हुआ है।
नागेन्‍द्र प्रताप यादव जहां मथुरा में ही एसडीएम और एडीएम भी रहे हैं वहीं शैलजाकांत मिश्र करीब तीन दशक पहले बतौर पुलिस अधीक्षक यहां तैनाती रही। इसी दौरान वह ‘देवरिया बाबा’ के नाम से मशहूर संत ‘देवरहा बाबा’ के संपर्क में आए और फिर उनका निरंतर सानिध्‍य प्राप्‍त करने के लिए मथुरा-वृंदावन के होकर रह गए। उनकी तैनाती कहीं भी रही हो परंतु मथुरा आना उनका कम नहीं हुआ। फिलहाल ब्रज तीर्थ विकास परिषद के मुखिया की हैसियत से वो यहां सेवारत हैं।
शैलजाकांत मिश्र का दावा है कि देवरहा बाबा ने उन्‍हें मथुरा में तैनाती के दौरान ही ऐसा आशीर्वाद दिया था जिसके कारण उन्‍हें ब्रज तीर्थ विकास परिषद के मुखिया की हैसियत से दोबारा यहां सेवा करने का मौका मिल रहा है। ये बात और है कि लोग उनकी सेवा को संदिग्‍ध मानते हैं और सेवा की आड़ में मेवा हासिल करने का आरोप भी लगाते हैं।
जो भी हो, किंतु इसमें दो राय नहीं कि जिलाधिकारी सर्वज्ञराम मिश्र से लेकर ब्रज तीर्थ विकास परिषद के मुखिया शैलजाकांत मिश्र तक और तीन-तीन सरकारी जिम्‍मेदारियां निभा रहे नागेन्‍द्र प्रताप यादव सहित कई अन्‍य प्रशासनिक अधिकारियों की सत्ता के गलियारों में कहीं तो कोई ऐसी पकड़ है जिसके बूते वह श्रीकांत शर्मा जैसे कद्दावर मंत्री व भाजपा नेता की बात को दरकिनार करने का माद्दा रखते हैं।
यदि ऐसा नहीं है और श्रीकांत शर्मा आम जनता और साधु-संतों को गुमराह करने के उद्देश्‍य से मुख्‍यमंत्री को शिकायती पत्र लिखकर कोई खेल कर रहे हैं तो तय जानिए कि आगामी चुनाव उनके लिए इतना आसान नहीं होगा क्‍योंकि उन्‍हें लेकर भी जनता को बहुत शिकायतें हैं।
ये भी कह सकते हैं कि उनका अपना मतदाता हो या पार्टी का कार्यकर्ता, कम से कम उनसे खुश तो नहीं है। बेहतर होगा कि ऊर्जा मंत्री उनके अंदर निहित ऊर्जा को कम आंकने की भूल न करें अन्‍यथा चुनावों में उसका करंट मुश्‍किल में डाल सकता है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
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