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रविवार, 24 जनवरी 2021

उत्तर प्रदेश में अधिकारियों के लिए अगर कहीं स्‍वर्ग है तो वह यहीं है… यहीं है… यहीं है

 प्रशासनिक आधार पर 18 मंडलों वाले उत्तर प्रदेश में यूं तो 75 जिले हैं किंतु ऐसे जिलों की संख्‍या बहुत कम है, जो अधिकारियों को मुफीद बैठते हैं।

ऐसे जिलों में कृष्‍ण की जन्‍मस्‍थली का गौरव प्राप्‍त ‘मथुरा’ का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है।

वैकुण्‍ठ से भी श्रेष्‍ठ और तीन लोक से न्‍यारी नगरी की उपमा प्राप्‍त मथुरा को उन सप्‍तपुरियों में भी शुमार किया जाता है जिन्‍हें मोक्षदायिनी माना गया है।
एक ओर हरियाणा तथा दूसरी ओर राजस्‍थान की सीमा से सटे इस विश्‍व प्रसिद्ध धार्मिक स्‍थल की एक विशेषता यहां से राष्‍ट्रीय राजधानी दिल्‍ली का अत्‍यधिक नजदीक होना भी है।
कभी लखनऊ के लिए किसी सीधे रास्‍ते को तरसने वाले इस जनपद से आज प्रदेश की राजधानी तक मात्र पांच घंटों के अंदर पहुंचा जा सकता है।
अधिकारियों के लिए सर्वाधिक मुफीद क्‍यों?
इन सब सुविधाओं के बावजूद मथुरा में ऐसा कुछ अतिरिक्‍त भी है जो पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को इतना अधिक प्रिय है कि वो न सिर्फ यहां लंबी से लंबी पोस्‍टिंग चाहते हैं बल्‍कि बार-बार यहीं पोस्‍टिंग कराना चाहते हैं।
क्‍या है ऐसा?
इस सवाल पर थोड़ी गंभीरता से गौर किया जाए तो स्‍थिति आसानी से स्‍पष्‍ट हो जाती है।
उदाहरण के लिए मथुरा का आम नागरिक शांतिप्रिय है और चैन से जिंदगी गुजारने में यकीन रखता है। टकराव का रास्‍ता चुनना उसे पसंद नहीं है और उसकी यह आदतें अधिकारियों का काम काफी आसान बना देती हैं।
आम मथुरावासी की इन आदतों के कारण ‘सुविधा शुल्‍क’ सर्वसुलभ है क्‍योंकि अमन पसंद स्‍थानीय नागरिक अधिकारियों को दाम देकर काम कराने में अधिक रुचि लेता है अपेक्षाकृत अन्‍य तरीकों के।
अधिकारियों के काम में दखल ‘ना’ के बराबर
शासन में मथुरा का प्रतिनिधित्व हमेशा बने रहने तथा सत्ता के गलियारों से बराबर आमदरफ्त होते हुए भी यह एक ऐसा जिला है जिसके बाबत यह कहा जा सकता है कि यहां कोई नेता ही नहीं है। नेताओं के नाम पर कुछ है तो चापलूसों की फौज, दलालों का जमघट और बिना रीढ़ वाले वो जंतु जिन्‍हें साष्‍टांग करने में महारत हासिल है।
सरकार चाहे सपा की रही हो या बसपा की, गठबंधन से चल रही हो अथवा पूर्ण बहुमत से लेकिन मथुरा को हमेशा तरजीह दी गई।
मथुरा के लोगों ने वो दौर भी देखा है जब यहां के कुल जमा पांच में से चार विधायक मंत्री हुआ करते थे किंतु तब भी इस जिले में तूती बोलती थी तो सिर्फ अधिकारियों की। मंत्री रहते हुए अधिकारियों के सामने मिमियाने वाले नेता यहां हर दौर में पाये जाते रहे हैं।
इसका ज्वलंत उदाहरण है हाल ही में घटी वो घटना जब प्रदेश के कद्दावर मंत्री, सरकार के प्रवक्‍ता और मथुरा-वृंदावन सीट से विधायक श्रीकांत शर्मा को स्‍थानीय अधिकारियों के खिलाफ सीधे मुख्‍यमंत्री के नाम इसलिए पत्र लिखना पड़ा क्‍योंकि प्रस्‍तावित कुंभ मेले के इंतजामों को वो उनके कहने से तरजीह नहीं दे रहे थे।
हुआ भी वही, मुख्‍यमंत्री तक शिकायत पहुंचने के बाद ही कुंभ मेले से जुड़े अधिकारियों ने सक्रियता दिखाई अन्‍यथा न तो उनके ऊपर ऊर्जा मंत्री का भारी भरकम पद कोई प्रभाव डाल पा रहा था और न संत-महंतों की नाराजगी कोई असर छोड़ रही थी।
हर जिले में अधिकारियों को उनकी जिम्‍मेदारी का अहसास कराने वाला दूसरा सर्वाधिक प्रभावशाली तबका होता है ‘पत्रकारों’ का, किंतु बात करें कृष्‍ण नगरी की तो यहां ‘पत्रकारों’ की संख्‍या भले ही सैकड़ों में हो परंतु ‘पत्रकारिता’ करने वाले ढूंढे नहीं मिलते।
नेता नगरी से कदम-ताल मिलाते हुए अधिकांश पत्रकार अधिकारियों की जी-हजूरी में अपना समय जाया करना अधिक उपयुक्‍त समझते हैं क्‍योंकि किसी एक अधिकारी की कृपा भी उनके लिए पर्याप्‍त होती है।
अधिकारी के कृपा पात्र बनते ही उनकी आर्थिक एवं सामाजिक दरिद्रता तो दूर होने ही लगती है, साथ ही घर-परिवार व नाते रिश्‍तेदारों में रुतबा भी बढ़ जाता है।
सुबह से शाम तक कलेक्‍ट्रेट के इर्द-गिर्द घूमने वाले तथाकथित पत्रकारों की एक जमात को तो इसलिए भी अधिकारियों का वरदहस्‍त जरूरी होता है क्‍योंकि उसके बिना उनके गोरखधंधे बंद हो जाएंगे और वो कानून के शिकंजे में इस कदर फंसेंगे कि लंबे समय तक उससे बाहर आना संभव नहीं होगा।
पत्रकारों का ये वर्ग अधिकारियों की जी-हजूरी में इतना मुस्‍तैद रहता है कि उनके निजी शौक और ऐब भी पूरे कराने में परहेज नहीं करता।
लोकतंत्र के चौथे खंभे को इस स्‍थिति में देख किसी को भी पत्रकारों और पत्रकारिता से भी घृणा हो सकती है लेकिन इन कथित पत्रकारों को खुद से कभी घृणा नहीं होती इसलिए वो पूरी शिद्दत के साथ हमेशा अधिकारियों के सामने दुम हिलाते देखे जा सकते हैं।
पत्रकारों की यही वो श्रेणी है जिनके बल पर पत्रकारों को कई-कई गुटों में बांटकर अधिकारी अपना उल्‍लू सीधा करते रहते हैं। अधिकारियों द्वारा डाले हुए टुकड़ों पर जीविका और जिजीविषा पाने वाले ये तत्‍व उनके साथ एक अदद फोटो खिंचवाने तक को लालायित रहते हैं और ‘पत्रकारिता दिवस’ पर भी आयोजन-प्रायोजनों के जरिए उन्‍हें सम्‍मानित करने का मौका नहीं चूकते।
घोर आश्‍चर्य की बात तो यह है कि इतना सब करने के बाद भी बमुश्‍किल वह मात्र उतना ही हासिल कर पाते हैं जितना कि कोई नेता अपने चमचों को सुबह-शाम बख़्शीश में दिलवा देता है।
नेता और पत्रकारों के अलावा हर जिले में एक तीसरा वर्ग भी होता है जो अधिकारियों की कार्यप्रणाली को ऑब्जर्व करता है। सामाजिक संगठनों के रूप में सक्रिय यह वर्ग चूंकि सुविधा संपन्‍न पाया जाता है इसलिए इसकी समाज में महत्ता बड़ी होती है।
महाभारत नायक योगीराज श्रीकृष्‍ण की पावन जन्‍मस्‍थली में भी ऐसे संगठन तो बहुत पाए जाते हैं लेकिन वो भी नेता और पत्रकारों की तरह चापलूसी के माध्‍यम से अपनी दुकान चलाने में माहिर हैं।
इस तबके के लोगों का भी कार्य नेता और पत्रकारों की भांति किसी न किसी तरह अधिकारियों का सानिध्‍य पाना और इसके लिए हद से भी गुजर जाना है।
इस वर्ग के लोगों से जुड़ा यह कड़वा सच जानकर कोई भी हैरान हुए बिना नहीं रह सकता कि ये वर्ग अधिकारियों को खुश करने के लिए थ्री डब्‍ल्‍यू यानी वाइन, वेल्‍थ और यहां तक कि वुमैन का इंतजाम करने से भी पीछे नहीं हटता।
यही कारण है कि विश्‍व प्रसिद्ध इस धार्मिक जनपद में एकबार पोस्‍टिंग पा जाने वाला अधिकारी एक ओर जहां बार-बार यहां पोस्‍टिंग पाने की कोशिश में लगा रहता है वहीं दूसरी ओर यहां से चले जाने अथवा नौकरी से अवकाश प्राप्‍ति के बाद भी किसी ने किसी रूप में यहीं मंडराता रहता है। वर्तमान में भी कई अधिकारी इसकी जीती जागती नजीर हैं लेकिन क्‍या मजाल कि कोई उनके ऊपर उंगली भी उठा सके।
भांग, भोजन तथा भजन के लिए विश्‍व के पटल पर विशिष्‍ट पहचान रखने वाली मथुरा नगरी ने ऐसे कई अधिकारी देखे हैं जिन्‍होंने यहां की एक अदद पोस्‍टिंग से अपनी तीन-तीन पीढ़ियों का मुकम्‍मल इंतजाम कर लिया लेकिन उनका बाल तक बांका नहीं हो सका।
ऐसे-ऐसे नेता उसके सामने हैं जो कुछ वर्षों पहले तक लंबे-लंबे कुर्ते पहनकर कचहरी पर दिन-रात छोटे-मोटे कामों के लिए चक्‍कर लगाते थे लेकिन आज करोड़ों नहीं अरबों की संपत्ति के मालिक हैं। शहर के तमाम व्‍यवसायी उनके द्वारा किए गए पैसे के निवेश से अपनी शानो-शौकत बनाए हुए हैं।
जिनकी औकात एक दुपहिया खरीदने की नहीं हुआ करती थी और कचहरी तक जाने के लिए भी किसी से लिफ्ट पाने का मौका तलाशले थे आज उनके गुर्गे कई-कई लग्‍जरी गाड़ियों के मालिक हैं।
अधिकारियों और नेताओं के इस वर्ग की अंधी कमाई से बहुत से मशहूर शिक्षण संस्‍थान संचालित हो रहे हैं और भूमाफिया बेनामी संपत्ति एकत्र कर रहे हैं।
पत्रकारों का एक खास वर्ग भी अपनी औकात से अधिक धन अर्जित करके इनके संरक्षण में ही अपनी सुरक्षा देखता है इसलिए उन्‍हें उपकृत करने का कोई अवसर हाथ से निकलने नहीं देता।
‘अंधे पीसें कुत्ते खाएं’ की कहावत को चरितार्थ करने के कारण ही मथुरा आज तक अधिकारियों के लिए दुधारू गाय साबित होता रहा है और उस गरिमामय मुकाम को हासिल करने के लिए तरस रहा है जिसका वह सही मायनों में हकदार है।
बात चाहे कालिंदी के कलुष की हो या निरंकुश अधिकारियों की, भ्रष्‍टाचार की हो या बदहाली की। कृष्‍ण की नगरी हर मामले में अपनी कलंक कथा खुद कहती है, लेकिन सुनने और देखने वाला कोई नहीं। सुनेगा और देखेगा भी कैसे, जब जिम्‍मेदार वर्ग ही आंख, कान व मुंह बंद करके बैठा होगा।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी 

सोमवार, 18 मई 2020

पत्रकारिता और पत्रकारों को समर्पित है यह आर्टिकल क्‍योंकि…

This article is dedicated to journalism and journalists because ...


अधिकांशत: पत्रकारों का एक बड़ा वर्ग इस बात से क्षुब्‍ध रहता है कि सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के अधीन कार्यरत जिला सूचना अधिकारी उन्‍हें तरजीह नहीं देते।
वो पत्रकारों के बीच न सिर्फ भेदभाव बरतते हैं बल्‍कि उन्‍हें बड़े और छोटे में विभक्‍त करते हैं। सतही तौर पर देखें तो उनकी यह पीड़ा जायज लगती है परंतु हकीकत कुछ और है।
हकीकत जानने के लिए पत्रकारों को एक ओर जहां पहले अपने अधिकार और कर्तव्‍य जानने होंगे वहीं दूसरी ओर ‘जिला सूचना अधिकारी’ के पद की वास्‍तविकता और सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के औचित्‍य को भी समझना होगा।
सबसे पहले तो पत्रकारों को अपने दिमाग से यह निकालना होगा कि जिला सूचना अधिकारी, कोई उनके ऊपर बैठा सरकारी अधिकारी है। सच तो यह है कि जिला सूचना अधिकारी उनसे है, वो जिला सूचना अधिकारी से नहीं हैं।
जिला सूचना अधिकारी देशभर में जिलाधिकारी के पीआरओ की भूमिका निभाते हैं इसलिए वो ‘यथा राजा तथा प्रजा’ की कहावत को ही चरितार्थ करते हैं। उनसे इससे अधिक की अपेक्षा की भी नहीं जा सकती।
इसके अलावा पत्रकारों को उस दौर की रटी-रटाई पत्रकारिता से बाहर निकलना होगा जिसमें सूचना अधिकारी ही उसके पास सूचना का एकमात्र स्‍त्रोत हुआ करता था। आज हर पल विभिन्न माध्‍यमों से खबरें तैरती रहती हैं। जिला सूचना अधिकारी आपको उनमें से कोई सूचना देने के लिए अधिकृत भी नहीं है। यदि आप उनमें से विश्‍वसनीय खबरों का संकलन कर पाते हैं तो सूचना विभाग चलकर आपके पास आएगा, आपको सूचना विभाग का मुंह देखने की कभी जरूरत महसूस नहीं होगी।
जहां तक सवाल पत्रकारों को मान्‍यता देने अथवा दिलाने का है तो उसका लोभ भी पत्रकारों को छोड़ देना चाहिए क्‍योंकि आज खुद सूचना विभाग ही मान्‍यता का मोहताज है। जनसामान्‍य तो जानता तक नहीं कि जिले में कोई सूचना विभाग भी होता है और वो पत्रकारों को मान्‍यता दिलाता है। आम आदमी के लिए हर वो व्‍यक्‍ति पत्रकार के रूप में मान्‍य है जो उनके बीच काम करता है और उनकी समस्‍याओं को अपने माध्‍यम से उठाता है।
वो समय भी बीत गया जब सूचना विभाग अखबारों की कटिंग चिपकाकर ऊपर तक फाइल भेजा करता था। आज सूचना विभाग जब तक किसी कटिंग पर निशान लगाने की सोचता है, तब तक तो सोशल मीडिया के माध्‍यम से वो खबर शासन के हर वर्ग तक पहुंच चुकी होती है।
सोशल मीडिया के जमाने में सूचना एवं जनसंपर्क विभाग और उसके अधीनस्‍थ कार्यरत जिला सूचना अधिकारी आउट डेटेड हो चुके हैं। जब तक उसे सरकार अपडेट नहीं करती तब तक उसका होना या न होना कोई मायने नहीं रखता। इनफेक्‍ट सूचना अधिकारी का पद औचित्‍यहीन हो गया है।
और हां, जो पत्रकार किसी सरकारी विभाग अथवा सरकार के अधिकारी से कोई मान-सम्‍मान पाने की अपेक्षा रखते हों तो उन्‍हें समझ लेना चाहिए कि सम्‍मान कभी किसी को भीख में नहीं मिलता।
सच तो यह है कि सूचना विभाग ही नहीं, प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया भी अपना महत्‍व खो चुकी है। आज तक उसके दायरे में न इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया है और न वेब मीडिया या सोशल मीडिया।
जिस प्रिंट मीडिया के लिए उसका महत्‍व है, वो भी वेब मीडिया के बिना आज अधूरा है इसलिए प्रेस काउंसिल एक ऐसी अपूर्ण संस्‍था बनकर रह गई है जो सिर्फ अधिकार और कर्तव्‍यों की लकीर पीट रही है।
यूं भी यदि किसी पत्रकार पर कोई हमला होता है, या उसका किसी के द्वारा उत्‍पीड़न किया जाता है तो प्रेस काउंसिल के पास कोई दंडात्‍मक कार्यवाही करने का अधिकार पहले से नहीं है। उसके पास अधिकतम अधिकार संस्‍तुति करने का है, जिसे मानना या न मानना संबधित विभाग के अधिकारियों पर निर्भर करता है। और यदि पत्रकार न्‍यायालय की शरण में चला जाता है तो प्रेस काउंसिल के पास दखल देने का उतना अधिकार भी नहीं रह जाता।
आज से ठीक तीन साल पहले प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के तत्‍कालीन अध्‍यक्ष न्यायमूर्ति सीके प्रसाद ने कहा था कि सभी प्रकार की मीडिया को इस वैधानिक निकाय के दायरे में लाना चाहिए किंतु आज तक कुछ नहीं हुआ। इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया ने अपनी एक स्‍वयंभू संस्‍था का गठन किया हुआ है और वेब मीडिया के लिए तो डोमेन नेम तक अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर रजिस्‍टर्ड होता है। ऐसे में सूचना विभाग का उसके लिए कोई अर्थ नहीं रह जाता।
इन परिस्‍थितियों में पत्रकारों को यदि मांग ही करनी है तो इस बात की करनी चाहिए कि सरकार या तो सूचना एवं जनसंपर्क विभाग को अपडेट करे या फिर उसे समाप्‍त कर दे।
इस आर्टिकल के साथ लगाया गया इजिप्‍ट के एक पेंटर का पत्रकारों एवं पत्रकारिता को रेखांकित एवं परिभाषित करता हुआ चित्र संभव है कि बहुत से पत्रकारों को समझ में न आए, लेकिन कोशिश जरूर कीजिए क्‍योंकि यदि समझ में आ गया तो अधिकारियों को आपसे शिकायत होगी, आपको अधिकारियों से नहीं।
– सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी





शुक्रवार, 8 मई 2020

बहुत कुछ कहता है ‘कोरोना वॉरियर्स’ पत्रकार पंकज कुलश्रेष्‍ठ का ‘बलिदान’, श्रद्धांजलि देकर काम न चलाएं


Says a lot 'Corona Warriors' journalist Pankaj Kulshreshtha's 'sacrifice'

लगभग ढाई दशक से दैनिक जागरण में सेवारत और फिलहाल उप समाचार संपादक के तौर पर कार्यरत पत्रकार पंकज कुलश्रेष्‍ठ का कल देर शाम निधन हो गया। दैनिक जागरण के आगरा संस्‍करण में चौथे पन्‍ने पर छपे दो कॉलम वाले छोटे से समाचार के मुताबिक उनके कोरोना संक्रमित होने की पुष्‍टि 4 मई को हुई।
पंकज कुलश्रेष्‍ठ ‘मथुरा’ में भी करीब 8 साल दैनिक जागरण के ‘ब्‍यूरो चीफ’ रहे लिहाजा कृष्‍ण नगरी के लिए उनका नाम भली प्रकार जाना पहचाना था। यही कारण रहा कि दैनिक जागरण के मथुरा संस्‍करण में भले ही उनके निधन की खबर अगले दिन यानि ‘आज भी नहीं छपी’ और एक अन्‍य प्रमुख अखबार ने छापी भी तो कोरोना से मरने वालों की संख्‍या के साथ, बिना किसी परिचय के ढाई लाइन लिखकर। इस तरह दो प्रमुख अखबारों ने अपने कर्तव्‍य की इतिश्री कर ली और तीसरे ने इतना भी जरूरी नहीं समझा, किंतु मथुरा में विभिन्‍न माध्‍यमों से कल ही उनके निधन की सूचना सोशल मीडिया पर तैरने लगी थी।
यूं तो किसी भी पत्रकार का असमय जाना पत्रकार जगत को कभी नहीं चौंकाता क्‍योंकि पत्रकारिता का पेशा ही ऐसा है किंतु पंकज की मृत्‍यु जिन परिस्‍थितियों में हुई है, वो न सिर्फ ‘पत्रकारिता’ बल्‍कि बड़े-बड़े मीडिया संस्‍थानों और शासन-प्रशासन सहित पत्रकारों के उन तथाकथित संगठनों पर भी सवाल खड़े करती है जिनके पदाधिकारी विशुद्ध राजनेताओं की तरह आचरण करते हुए पत्रकारों के हितों की हिमायत का ढकोसला करते हैं।
आज भी बहुत कम लोग इस कड़वे सच से वाकिफ होंगे कि पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्‍तंभ सिर्फ ‘कहा जाता है’, क्‍योंकि उसे ऐसे कोई संवैधानिक अधिकार प्राप्‍त नहीं हैं जैसे बाकी तीनों स्‍तंभों न्‍यायपालिका, विधायिका तथा कार्यपालिका को प्राप्‍त हैं।
देश ने पत्रकारों को पिछले 70 वर्षों से लोकतंत्र के ‘चौथे स्‍तंभ’ का ‘तथाकथित सम्‍मान’ एक झुनझुने की तरह थमा रखा है जिसे बजा-बजाकर वह यदा-कदा खुश हो लेते हैं। मजे की बात ये है कि वह झुनझुना भी ‘पत्रकारों’ के हाथ में न होकर मीडिया संस्‍थानों के हाथ में है जो किसी नजरिए से पत्रकार नहीं कहे जा सकते। वो ठीक उसी प्रकार विशुद्ध व्‍यापारी व उद्योगपति हैं जिस प्रकार कोई दूसरा व्‍यापारी अथवा उद्योगपति होता है और जिसके लिए उसके कारिंदे ‘कामगार’ होते हैं।
यदि ऐसा नहीं होता तो दिवतिया आयोग, शिंदे आयोग, पालेकर आयोग, बछावत आयोग, मणिसाना आयोग और उसके बाद मजीठिया वेतन आयोग तक की सिफारिशें यूं जाया नहीं होतीं और तमाम बातों का स्‍वत: संज्ञान लेने वाला सर्वोच्‍च न्‍यायालय भी तमाशबीन बना न बैठा होता।
क्‍या कहती हैं इन आयोगों की सिफारिशें और सुप्रीम कोर्ट के आदेश-निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने 7 फरवरी 2014 को अखबारों एवं समाचार एजेंसियों को मजीठिया आयोग की सिफारिशें लागू करने का आदेश दिया और कहा कि वे अपने कर्मचारियों को संशोधित पे स्केल के हिसाब से भुगतान करें।
न्यायालय के आदेश के अनुसार यह वेतन आयोग 11 नवंबर 2011 से लागू होना था, जब इसे सरकार ने पेश किया था और 11 नवंबर 2011 से मार्च 2014 के बीच बकाया वेतन भी पत्रकारों को एक साल के अंदर चार बराबर किस्तों में दिया जाना था।
आयोग की सिफारिशों के अनुसार अप्रैल 2014 से नया वेतन लागू होना चाहिए था। तत्कालीन चीफ जस्टिस पी. सतशिवम और जस्टिस रंजन गोगोई तथा जस्टिस एसके सिंह की बेंच ने इस आयोग की सिफारिशों को चुनौती देने वाली याचिकाएं खारिज कर दीं।
बेंच ने आयोग की सिफारिशों को वैध ठहराया और कहा कि सिफारिशें उचित विचार-विमर्श पर आधारित हैं इसलिए भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत इसमें हस्तक्षेप करने का कोई वैध आधार नहीं है।
बहरहाल, तमाम अखबारों के प्रबंधन मजीठिया आयोग के विधान, काम के तरीके, प्रक्रियाओं और सिफारिशों से नाखुश थे। इनका मानना था कि अगर इन सिफारिशों को पूरी तरह माना गया तो वेतन में एकदम से 80 से 100 फीसदी तक इजाफा करना पड़ सकता है और जिस कारण छोटे और कमजोर समूहों व कंपनियों पर तालाबंदी का अंदेशा बढ़ा सकता है। दलील यह भी थी कि अन्य उद्योगों की तुलना में प्रिंट मीडिया में गैर-पत्रकार कर्मचारियों को वैसे भी ज्यादा वेतन दिया जा रहा है। अगर सिफारिशें लागू की गईं तो वेतन में अंतर का यह दायरा और बढ़ जाएगा। हालांकि सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने इनमें से किसी दलील को तवज्जो नहीं दी। साथ ही कहा कि यह केंद्र सरकार का विशेषाधिकार है कि वह सिफारिशों को मंजूर करे या खारिज़ कर दे। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर सरकार ने कुछ सिफारिशें मंजूर नहीं कीं तो यह पूरी रिपोर्ट को खारिज़ करने का आधार नहीं है। इसके बाद मीडिया संस्‍थानों की रिव्यू पिटीशन भी सुप्रीम कोर्ट ने खारिज़ कर दी।
मीडिया हाउसेस की चालबाजी से धूल फांक रहे आदेश-निर्देश
न्यायपालिका के इतने सख्त आदेश-निर्देशों के बावजूद मीडिया संस्थान इसे लागू नहीं कर रहे। 6 साल से ये आदेश-निर्देश धूल फांक रहे हैं क्‍योंकि सिफारिशें लागू न करने के इनके पास अनेक हथकंडे जो हैं।
मसलन उनके खिलाफ कोर्ट में जाने वाले पत्रकारों का शोषण, कंपनी को छोटी यूनिटों में बांटना, कम आय दिखाना, कर्मचारियों से कांट्रैक्ट साइन करवाना कि उन्हें आयोग की सिफारिशें नहीं चाहिए। हालांकि मीडिया संस्‍थानों द्वारा किए जा रहे इस शोषण की पीछे एक ही बड़ा कारण है, और वो कारण है पत्रकारों में एकजुटता कमी।
मीडिया संस्‍थानों के मालिक यहां फंसा रहे पेंच
दैनिक जागरण, राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर, हिन्‍दुस्‍तान व अन्य बड़े अखबारों के प्रबंधन ने अपने कर्मचारियों से एक फॉर्म पर इस आशय के साइन ले लिए कि उन्हें मजीठिया आयोग की सिफारिशें नहीं चाहिए। वे कंपनी प्रदत्त वेतन एवं सुविधाओं से संतुष्ट हैं। कंपनी उनकी सुख-सुविधा का ध्यान रखती है। समय से उन्हें प्रमोशन मिलता है, अच्छा इंक्रीमेंट लगता है, बच्चे अगर हैं तो उनकी पढ़ाई-लिखाई, स्वास्थ्य-चिकित्सा, उनकी बेहतरी का पूरा ख्याल कंपनी रखती है।
कौन नहीं जानता कि मीडिया संस्‍थानों के सारे हथकंडे पूरी तरह झूठ पर आधारित हैं।
मीडिया संस्‍थानों के झूठ का सबसे बड़ा उदाहरण है पंकज कुलश्रेष्‍ठ का उनके संस्‍थान दैनिक जागरण में पद। 25 वर्षों से एक ही संस्‍थान में सेवारत पंकज कुलश्रेष्‍ठ अब भी उप समाचार संपादक थे जिसकी हैसियत कोई भी मीडियाकर्मी अच्‍छी तरह समझता है।
चूंकि इसी से जुड़ी हैं वेतन, इंक्रीमेंट, स्वास्थ्य, चिकित्सा, बच्‍चों की पढ़ाई लिखाई आदि की सुविधाएं, इसलिए समझा जा सकता है कि पंकज कुलश्रेष्‍ठ ढाई दशक बाद भी संस्‍थान में क्‍या हैसियत रखते थे।
आज भी बड़े-बड़े अखबारों में ‘उप-संपादक’ का भी मासिक वेतनमान इतना नहीं है जिसमें वह अपने परिवार का ठीक तरह भरण-पोषण कर सके। जिलों में ब्‍यूरो चीफ के पदों को सुशोभित करने वाले पत्रकारों का भी वेतन सम्‍मानजनक नहीं होता।
और यदि बात करें जिले के स्‍टाफ और तहसील आदि में कार्यरत पत्रकारों की तो उनका ‘मानदेय’ बताने तक में शर्म आती है। उनके लिए वेतन तो कल्‍पना से परे की बात है।
यही नहीं, आज के दौर में जहां चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी को भी वेतन के साथ आवश्‍यक भत्‍ते और अवकाश प्राप्‍ति के उपरांत पेंशन मिलना तय है वहां किसी पत्रकार के लिए कोई ऐसा प्रावधान नहीं है।
सरकारी कर्मचारी की मृत्‍यु के बाद भी उसके परिवार को पेंशन का एक भाग मिलता है परंतु पत्रकारों के परिवार उनकी मौत के बाद भगवान भरोसे जिंदा रहने की जद्दोजहद में लगे रहने पर मजबूर हैं।
माना कि राजनीति के गलियारों में जिस तरह लुटियंस जोन है, उसी प्रकार मीडिया में भी एक क्रीमी लेयर है और उस लेयर का एक-एक पत्रकार नेताओं की भांति ही सैकड़ों करोड़ रुपए का मालिक बना बैठा है परंतु वो उंगलियों पर गिने जाने लायक हैं। बाकी तो सारा धान बाईस पसेरी बिकता है।
प्रिंट हो या इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया, सब अपने मुलाजिमों का खून चूसने में पीछे नहीं रहते। हाथ में लगे ‘LOGO’ को किसी के भी मुंह में ठूंस देने का रुतबा हासिल करने वाले बड़े-बड़े न्यूज़ चैनल्‍स के स्‍ट्रिंगर की दयनीय दशा किसी से नहीं छिपी।
हजारों करोड़ रुपए की पूंजी वाले उनके संस्‍थान उन्‍हें कई बार आंशिक मानदेय देने की बजाय LOGO पकड़ाने के बदले उनसे उलटी वसूली कर लेते हैं। फिर वो उसकी भरपाई के लिए क्‍या कुछ नहीं करते।
शोषण-शोषण और खालिस शोषण का जितना घिनौना खेल मीडिया हाउस पत्रकारों के साथ खेलते हैं, उतना शायद ही किसी दूसरे क्षेत्र में खेला जाता होगा।
पत्रकारों के साथ दशकों से खेले जा रहे इस खेल से नेतानगरी भली प्रकार परिचित है और इसीलिए उसकी नजर में कोई पत्रकार ‘कोरोना वॉरियर्स’ भी नहीं है। अपनी जान देकर भी नहीं।
कोरोना वॉरियर्स की श्रेणी में पत्रकारों को शामिल कर लिया गया तो संभवत: शासन-प्रशासन की दुविधा बढ़ जाएगी। उन्‍हें दूसरे कोरोना वॉरियर्स की तरह मान-सम्‍मान एवं कानूनी अधिकारों के साथ मुआवजा भी देना पड़ सकता है।
आगरा मंडल ही नहीं, शायद समूचे उत्तर प्रदेश में कोरोना से जान गंवाने वाले पंकज कुलश्रेष्‍ठ शायद पहले पत्रकार होंगे लेकिन कोरोना संक्रमित पत्रकारों की संख्‍या अच्‍छी-खासी हो सकती है।
न करे भगवान कि कल किसी और को अपना कर्तव्‍य निभाते-निभाते जान से हाथ धोने पड़ जाएं, तो भी क्‍या पत्रकार इसी गति को प्राप्‍त होते रहेंगे।
पंकज कुलश्रेष्‍ठ का बलिदान ऐसे कई सवाल पीछे छोड़ गया है। यदि समय रहते इनके जवाब नहीं मांगे गए तो पत्रकारों की मौत सिर्फ एक आंकड़ा बनकर रह जाएगी क्‍योंकि उसकी गिनती कोरोना वॉरियर्स में नहीं, कोरोना संक्रमित लाशों के साथ होगी।
पत्रकारों की दशा और दिशा पर किसी अनाम शायर द्वारा लिखा गया यह शेर इस दौर में बड़ा सार्थक प्रतीत होता है कि-
‘बड़ा महीन है ये अखबार का मुलाजिम भी, खुद में खबर है मगर दूसरों की छापता है’
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

शुक्रवार, 12 अप्रैल 2019

कान में चुपचाप एक बात बतातौ जा मेरे राजा, मथुरा कौ सबरौ मीडिया “मैनेज” है गयौ का?

कोई दो दशक पुरानी बात है। राजाधिराज बाजार में एक चौबे जी आगे चल रहे व्‍यक्‍ति को संबोधित करके जोर-जोर से आवाज लगा रहे थे। अरे पत्रकार…ओ भइया पत्रकार…नैक रुक। तोते जरूरी काम है।
आगे चल रहे एक प्रख्‍यात अखबार के सुविख्‍यात पत्रकार ने पीछे मुड़कर देखा और अपने कदमों को लगाम लगाई। इतनी देर में चौबे जी उनके नजदीक जा पहुंचे और पूछने लगे- मैंने तोय सही पहचानौ, तू पत्रकार ही है।
पत्रकार ने असीम धैर्य का परिचय देते हुए चौबे जी से पूछा- कहिए क्‍या काम है आपको मुझसे।
अरे यार, आज फिल्‍म देखवे कौ बड़ो मन कर रह्यौ है, ये बता कि मिलन टॉकीज में कौन सी फिल्‍म चल रही है?
अब पत्रकार का मुंह देखने लायक था। उसे बुरा तो बहुत लगा लेकिन चौबे जी का इलाका था इसलिए गुस्‍से को पीकर बोले- मुझे नहीं पता।
तौ तू काहे कौ पत्रकार है, जब तोय ये तक नाय पतौ कि मिलन टॉकीज में कौन सी फिल्‍म चल रही है। बड़ौ पत्रकार बनें।
पत्रकार साहब ने चौबे जी से पिण्‍ड छुड़ाकर चुपचाप निकल लेने में ही अपनी भलाई समझी और द्रुत गति से नौ-दो-ग्‍यारह हो लिए।
दो दशक बाद अब फिर वही बाजार है और वही चौबे जी, लेकिन पत्रकार कोई और। इस बार चौबे जी ने फिर पत्रकार को आवाज लगाई। सुन भइया, तोते कुछ जरूरी बात करनी है।
जैसे ही पत्रकार रुका, चौबे जी ने सवाल दागा- कान में चुपचाप एक बात बतातौ जा मेरे राजा। इन लोकसभा चुनावन के लिएं मथुरा कौ सबरौ मीडिया “मैनेज” है गयौ का, या कछू बचौ है ?
चौबे जी के जहर बुझे सवाल का कोई जवाब न सूझते देख पत्रकार महोदय ने कुछ तल्‍खी के साथ कहा- ये बात आप मुझसे क्‍यों पूछ रहे हैं।
इस पर चौबे जी का जवाब था- लै भइया…तो ते न पूछें तो कौन तो पूछें, पत्रकार तौ तूही है। रस्‍ता चलतौ आदमी बिचारौ का जानें पत्रकारन की माया।
मैंने सुनी कि या बार ‘पेड न्‍यूज़’ पै चुनाव आयोग बहुत बिगड़ गयौ है। बड़ी सख्‍ती बरती है, और या लिएं अब तक अखबारन के पन्‍ना कोरे दीख रहे हैं। न विज्ञापन हैं न समाचार।
अब सुनी है चुनाव लड़वे बारेन ने पत्रकारन ते सांठगांठ करकें कोऊ बीच कौ रास्‍ता निकारौ है। अब टेबिल के ऊपर की जगह टेबिल के नीचे ते काम चल रह्यौ है।
काऊ ने बताई कि तुम्‍हारे यहां कोऊ ”बीट सिस्‍टम” बन गयौ है और बीट के हिसाब ते हिसाब-किताब चल रह्यौ है। चुनाव लड़वे बारे एक तौ बीट एै सैट कर रहे हैं और दूसरी सैटिंग ”पीठ” ते कर रहे हैं। बतावें कि पीठ वाय कहें तुम्‍हारे यहां जो तुम्‍हारे ऊपर बैठौ रहै।
खैर भइया, हमें का। दो पइसा तुम्‍हें मिल जाएं तो हमें का। हमें तौ दुख दो बातन कौ है।
पहली बात तौ ये कि जैसी खबरें इन दिनन अखबारन में पढ़वै कों मिलतीं, वैसी अब नाय मिल रहीं। और दूसरी ये कि तुमने अपने मालिकन के पेट पै लात मार दीनी है। बेचारे चुनावन में लाखन पीट लेते लेकिन अब सूखे संख बजाय रहे हैं। नेतन की हू मौज आय गई है। ”बीट और पीठ” ते सेटिंग करके सस्‍ते में निपट लिए, नहीं तौ लाखन को पैकेज देकेऊं हाय-हत्‍या।
वैसें मेरे राजा, तू बुरौ न मानें तो एक बात कहों। ये बड़े-बड़े अफसर जो बुद्धि के पुतला बने फिरें, तुम्‍हारे सामने कछू नाएं। हर्द लगै न फटकरी, रंग चौखौ। ऐसी सेटिंग करी है नेतन ते कि आंख को काजर चुराय लिए और कानौं-कान काउए पतौ ही नाय लगी।
चुनाव आयोग अखबार में ढूंढतौ रह जायेगौ ”पेड न्‍यूज़”। वाय का पतौ कि या बार ”पेड पत्रकार” कौ खेल चल रह्यौ है। अखबार वारेन कों अखबार जैसौ चढ़ावौ और चैनल वारेन कों चैनल जैसौ। जैसौ देवता, वैसी पूजा।
बड़ी देर में मौका पाकर पत्रकार ने चौबे जी से कहा, आप कहें तो अब मैं निकलूं।
पत्रकार को खिसकते देख चौबे जी बोले- भइया मेरे, एक आखिरी बात और बतायजा।
कोई प्रशासन को टोपी वारौ बताय गयो वा दिन, कि अखबारन में पेड न्‍यूज़ देखवे के लिए कोऊ कमेटीऊ बनाई गयी है। का कहें वाय…अरे हां, मॉनिटिरिंग कमेटी।
वा मै सुनी है कि अफसरन के अलावा पत्रकारू रखे गए हैं। ये का बात बही। मलाई की रखवारी के लिएं कोऊ बिल्‍ली एै रखवारी सौंपै का। ये का खेल चल रहयौ है। या की तौ तोय जरूर पतौ होएगी। अपनी मत बताय, वाकी तो कान में कुर्र कर जा।
देख राजा, मोय तो ते कुछ मतलब थोरैं हैं। तू तौ ये समझ कि घी गिरौ तो भात में ही गयौ।
मोय तो या बात ते मतलब है कि थौरे से दिन रह गए हैं वोट परवे में, और काऊ नै अब तक न तो प्रत्‍याशिन की ‘हिस्‍ट्री’ छापी, न ‘लेनदारी-देनदारी’ छापी, न कर्म-कुकर्म छापे, न आमदनी के स्‍त्रोत बताए। बस लकीर पीट रहे हैं। 10 रुपैया खर्च करकें सबरे अखबार खरीदों, पर बाचौं तो सन्‍नाटौ।
मैंने तो सुनी है कि सुप्रीम कोर्ट ने ऑर्डर दे रखौ है कि हर उम्‍मीवार एै एक-दो बार नाय तीन-तीन बार अपनी गुण्‍डई कौ ब्‍यौरा अखबारन में छपवानों पड़ेगौ। और हां, वो का कहें, सोशल मीडिया पै हू देने पड़ैगौ, लेकिन अब तक तौ काऊ अखबार में ऐसौ कछू नाय देखौ। यहां ते चुनाव लड़वे बारे का सबरे राजा बेटा हैं। एक-दो कौ कच्‍चौ चिठ्ठा तौ मौऊएै पतौ है। वैसें मोय अकेले है का, पूरे शहर एै विनके अर्थ और अनर्थ की जानकारी है। बस मीडिया मठा पी कें बैठ गयौ है।
चल भइया, तौय मैंने बेमलब घेर लियौ। ये टेड़ी टांग वारे की जन्‍मभूमि है। यहां के सब खेल निराले हैं। दिल्‍ली यहां ते ज्‍यादा नाय तो डेढ़ सौ किलोमीटर दूर तौ है ही। यहां की लीला जब तक वहां बैठे अफसरन के कानन तक पहुंचैगी, तब तक तौ वोट गिरू जांगे और गिनूं जांगे।
वैसै हूं कहें कि दिल्‍ली नैक ऊंचौ सुनें। तू अपनौ रस्‍ता पकड़ भइया पत्रकार, और मैंऊं चलौं राजाधिराज एै ढोक दैवे।
जाकी चलै वो परपट तानें, या कौ बुरौ नैंक नहीं मानें।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

शनिवार, 5 मई 2018

टीआरपी के लिए हमारा इतना नीचे गिरना तो बनता है

यदि आपने कभी कतई सड़क छाप लोगों को आपस में लड़ते-भिड़ते और गाली-गलौज करते नहीं देखा-सुना तो यह खबर आपके लिए नहीं है।
यदि आपने कभी किसी को नमक से नमक खाते हुए नहीं देखा, तो भी यह खबर आपके मतलब की नहीं है।
और अगर कभी आपने किसी आदतन अपराधी को कोर्ट में यह दलील देते हुए नहीं पाया कि तमाम लोग अपराध करते हैं इसलिए मैं भी अपराध करता हूं, तो फिर यह खबर आपके किसी काम की नहीं क्‍योंकि यह खबर ऐसे ही लोगों के बारे में है।
उन लोगों के बारे में जो टीवी पर बैठकर सड़क छाप लोगों से भी गई-गुजरी भाषा का इस्‍तेमाल करते हैं। उन्‍हीं लोगों की तरह हर वक्‍त अशिष्‍टता करने पर आमादा रहते हैं।
जो नमक से नमक खाने की कोशिश को जायज ठहराने के साथ-साथ ऐसा करने की लगातार कोशिश भी करते हैं।
जो हर सवाल का हमेशा एक ही जवाब देते हैं कि दूसरों ने ऐसा किया इसलिए हम भी कर रहे हैं, अथवा हमने जो किया वही दूसरे भी कर रहे हैं तो फिर गलत क्‍या किया।
दरअसल, इन दिनों ऐसे तत्‍वों को विभिन्‍न टीवी चैनल पैनल डिस्‍कशन के नाम पर अपना मंच प्रदान करा रहे हैं। जिन्‍ना की तस्‍वीर टांगने जैसा कोई घटिया सा मुद्दा हो या फिर संवैधानिक संस्‍थाओं पर उंगली उठाने जैसा गंभीर मामला ही क्‍यों न हो। घटिया से घटिया और गंभीर से गंभीर मुद्दे पर बहस के लिए टीवी चैनल्‍स के पास कुछ रटे-रटाए चेहरे हैं। यही चेहरे आप हर रोज चीखते-चिल्‍लाते और अपनी असलियत बताते देख सकते हैं। बहस का विषय बेशक हर दिन बदलता हो परंतु बहस में शामिल होने वाले चेहरे कभी नहीं बदलते।
टीवी चैनल्‍स पर कराई जाने वाली बहसों का स्‍तर ऐसा हो गया है कि बहुत से लोग तो टीवी से नफरत करने लगे हैं। जहां तक इनकी पत्रकारिता का सवाल है, तो शायद ही अब कोई ऐसा व्‍यक्‍ति मिले जो इन्‍हें देखते ही समूची पत्रकार बिरादरी को कोसने न लगता हो।
सोशल साइट्स गवाह हैं इस सच्‍चाई की कि लिपे-पुते चेहरे वाले मेल व फीमेल टीवी एंकर्स जो पत्रकार होने का मुगालता भी पाले रहते हैं, उनकी आम छवि कैसी बन चुकी है।
आश्‍चर्य तो यह है कि इनमें से कुछ टीवी एंकर्स खुद को सेलेब्रिटी समझने लगे हैं। उनकी मानें तो लोग उन्‍हें इसलिए ट्रोल करते हैं, पीछा करते हैं, फोटो खींचते हैं और गरियाते भी हैं क्‍योंकि वह बहुत प्रसिद्ध हैं।
इन टीवी एंकर्स की नजर में कुख्‍यात और प्रख्‍यात शायद एक ही शब्‍द है, न कि विरोधाभाषी।
बहरहाल, आप किसी भी मुद्दे पर किसी भी टीवी चैनल की बहस का स्‍तर देख लीजिए। आपको आत्‍मसंतुष्‍टि होगी कि जिस प्रकार नेताओं की कोई जाति नहीं होती या यूं कह लीजिए कि हर नेता की एक ही जाति होती है, उसी प्रकार हर टीवी चैनल की बहस का स्‍तर भी समान होता है।
बहस की बदबू दूर-दूर तक मारक हो इसलिए अब तमाम टीवी चैनल अपने कथित पैनल डिस्‍कशन में पाकिस्‍तानियों तथा कश्‍मीर के अलगाववादियों को भी शामिल करने लगे हैं।
भारतीय टीवी चैनल्‍स की कृपा से पाकिस्‍तानी और उनके सरपरस्‍त चंद कश्‍मीरी सफेदपोश न सिर्फ अपना एजेंडा पूरे विश्‍व को बता जाते हैं बल्‍कि यह भी देख लेते हैं कि हमारे नेता भाषा के स्‍तर पर किस कदर कुत्‍तों के भोंकने से भी नीचे जा पहुंचे हैं।
टीवी चैनल्‍स की मानें तो वह पाकिस्‍तानियों एवं सफेदपोश आतंकवादियों को बहस का हिस्‍सा इसलिए बनाते हैं ताकि देश व देशवासियों को उनकी सोच का पता लग सके और अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता पर भी आंच न आए।
हो सकता है कि बहुत जल्‍द टीवी चैनल्‍स अपने इसी एजेंडे को आगे ले जाने के लिए उन सभी कुख्‍यात आतंकवादियों को भी बहस का हिस्‍सा बनाने लगें जो एक लंबे अरसे से भारत को तोड़ने की कोशिश में लगे हैं क्‍योंकि टीवी चैनल्‍स की नीति के अनुसार उनको भी अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता का उतना ही हक है जितना कि सैनिकों पर पत्‍थर बरसाने वाले कश्‍मीरियों का।
आगे आने वाले समय में अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वछंदता के पक्षधर टीवी चैनल्‍स बलात्‍कारियों को भी बहस का हिस्‍सा बनाने लगें तो कोई आश्‍चर्य नहीं क्‍योंकि बलात्‍कारी भी तो दिखता इंसानों की तरह ही है। वह अंदर से भेड़िया हो तो हो।
किसी भी टीवी चैनल की बहस में शामिल पैनल को देख लीजिए। एक पार्टी का नेता कहेगा कि हमारे शासनकाल में इतने बलात्‍कार नहीं होते थे। आंकड़े गवाह हैं कि हमारे पिछले दस साल के कार्यकाल में बलात्‍कारों की संख्‍या इस शासनकाल में हो रहे बलात्‍कारों से काफी कम थी। इनके चार साला कार्यकाल में हुए बलात्‍कारों की संख्‍या से हमारे साठ साल के शासनकाल में हुए बलात्‍कारों की संख्‍या से तुलना करके देख लीजिए कि इनके बलात्‍कार कितने ऊपर जाएंगे और हमारे बलात्‍कार कितने नीचे थे। मुद्दा कोई भी हो, तुलनात्‍मक अध्‍ययन शुरू हो जाता है और फिर बहस, बहस न होकर तू-तू-मैं-मैं से होती हुई तू कुत्‍ता और तेरा बाप कुत्‍ता तक जा पहुंच जाती है।
कुल मिलाकर टीवी चैनल्‍स के सहयोग से सभी पार्टियां और उनके नेता देश की आंखों में धूल झोंक रहे हैं। टीवी चैनल्‍स से हटते ही ये कभी किसी रेस्‍तरां में तो कभी संसद अथवा विधानसभाओं के गलियारों में एक-दूसरे की पीठ खुजाते देखे जा सकते हैं। इसके लिए बहुत प्रयास नहीं करने पड़ते।
कोई टीवी चैनल हर दिन ताल ठोक रहा है तो कोई दंगल करा रहा है। कोई चक्रव्‍यूह में फंसा रहा है तो कोई मास्‍टर स्‍ट्रोक लगा रहा है। सबके अपने धंधे हैं और सबके अपने फंदे। देश तथा देशवासी जाएं भाड़ में। हम तो अपने धंधे और फंदे के लिए पाकिस्‍तानियों को भी मंच देंगे और उन कश्‍मीरियों को भी जो खाते यहां की हैं लेकिन बजाते पाकिस्‍तानियों की हैं।
हजारों बलात्‍कारियों में से सजा किसी एक आसाराम और एक राम रहीम को ही तो होती है, बाकी तो अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता का मजा लूट रहे हैं। टीआरपी के खेल में देश के साथ बलात्‍कार होता हो तो हो, हम तो सबको मंच देंगे क्‍योंकि हम मीडिया हैं। अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता पर पहला हक हमारा है।
हम जानते हैं कि बलात्‍कार सिर्फ एक शरीर पर ही नहीं होता, आत्‍मा पर भी होता है। बलात किया गया हर कार्य बलात्‍कार की परिभाषा का हिस्‍सा है लेकिन यह ज्ञान दूसरों को बांटने के लिए है, खुद के लिए नहीं।
तीतर-बटेर लड़ाना हमारा पेशा है। ठीक उसी तरह जिस तरह वैश्‍यावृत्ति या देह व्‍यापार। शब्‍दों का फेर हो सकता है परंतु मूल में तो धंधा ही निहित है इसलिए कोई कुछ कहे, हम अपना धंधा जारी रखेंगे।
प्रेस से मीडिया और मीडिया से मीडिएटर का सफर ऐसे ही पूरा नहीं किया। उसके लिए बड़े पापड़ बेले हैं।
अब यदि हमारे प्‍लेटफार्म का उपयोग कोई लड़ने-भिड़ने, गाली-गलौज करने, अपने-अपने कुकर्मों का तुलनात्‍मक अध्‍ययन करने और नमक से नमक खाकर दिखाने की कलाकारी के लिए करता है तो हमें क्‍या।
तीतर-बटेर लड़ाकर, कुत्ते-बिल्‍लियों को भिड़ाकर और गुण्‍डे-मवालियों को बरगलाकर यदि अपना काम चलता है तो बुरा क्‍या है। आत्‍मा सुखी तो परमात्‍मा सुखी। चैनल की टीआरपी के लिए हमारा भी इतना नीचे गिरना तो बनता है।
-Legend News
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