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शनिवार, 27 मई 2017

…और अब चैप्‍टर क्‍लोज

दो हत्‍याएं, करोड़ों की लूट, विधाता के धाम से विधानभवन तक गूंज, फिर उसकी भी अनुगूंज। अनशन, धरना-प्रदर्शन व बंद, सत्ता पक्ष व विपक्ष के दौरे, सवाल…सवाल और सवाल।
सवालों के जवाब में तीन कुख्‍यात भाइयों और उनके तीन हलूकरों की गिरफ्तारी, मात्र 20 लाख रुपए मूल्‍य के माल की कथित बरामदगी…और चैप्‍टर क्‍लोज।
पुलिस-प्रशासन मुर्दाबाद का नारा, चार दिन के अंतराल में पुलिस-प्रशासन जिंदाबाद में ”तरमीम” हो गया। बेडवर्क, गुडवर्क बन गया। चार दिन में पराई होते-होते एक पार्टी फिर से अपनी हो गई। राजनीति की रोटी सेंकने का प्रयास करने वालों के मंसूबे धरे-धरे के धरे रह गए। मरने वालों की चिता ठीक से ठंडी भी नहीं हुई कि पुलिस को प्रशस्‍ति पत्र बांट दिए गए। इनाम-इकराम से नवाजे जाने का ऐलान कर दिया गया। सम्‍मान समारोह की तैयारियां होने लगीं। राम राज्‍य लौट आया। जिंदगी से लेकर व्‍यापार तक सब अपने ढर्रे पर वापस।
कौन कह सकता है कि इसी महीने की 15 तारीख को मयंक चेन पर हुई जघन्‍य वारदात के बाद धर्म की यह छोटी सी दुनिया उबल रही थी। बच्‍चे से लेकर बूढे़ तक की जुबान सिर्फ यही बोल रही थी कि बहुत बुरा हुआ।
20 मई को भोर होते-होते वही जुबान पलटने लगी। सूर्य चढ़ने के साथ शहर का पारा नॉर्मल होने लगा। जो लोग खाकी को खाक में मिला देने को आतुर थे, वही लोग उसकी शान में कसीदे पढ़ने लगे। यही है फितरत और यही असलियत भी।
पुलिस जानती है कि उसकी स्‍क्रिप्‍ट पर उंगली उठाने की हिमाकत प्रथम तो कोई करता नहीं, और यदि कोई करता भी है तो जवाब देने की जरूरत नहीं।
प्रेस कांफ्रेंस होती हैं लेकिन लकीर पीटने के लिए। सवाल उठाने का दौर बीत गया। सवाल किसी को अच्‍छे नहीं लगते। जवाब सुहाते हैं।
मीडिया की आवाज़ नक्‍कारखाने की तूती बनकर रह गई है और मीडियाकर्मी मीडिएटर। वह न तो आवाज़ उठाते हैं और न आवाज़ बनते हैं, वह आवाज़ मिलाते हैं। जिसकी ढपली, उसका राग।
लिखा-पढ़ी में व्‍यापारी बेशक कमजोर हो किंतु पुलिस चुस्‍त-दुरुस्‍त है। उसने हवा का रुख भांपकर घटना के दूसरे दिन ही कर लिया एक तीर से कई निशाने साधने का इंतजाम। सांप मर जाए और लाठी भी जस की तस बनी रहे, इस कला में खाकी का कोई मुकाबला नहीं।
एक मृतक के परिजनों को आश्‍वासन की पोटली थमा दी तो दूसरे के परिजनों को सड़क पर मिली गहनों की पोटली। होगा कोई सर्राफ जिसने रख लिए लाखों के जेवरात।
होंगे कोई कर्मचारी व कारीगर जिनकी बदनीयत ने घायल अवस्‍था में गोलियों का धुंआ साफ होने से पहले ही सर्राफ को थमा दी जेवरात व नकदी की वह पोटली। पुलिस को अब इस सबसे क्‍या मतलब।
किसने की सर्राफों की सुरागरसी, कौन था आस्‍तीन का सांप..सारे प्रश्‍न अपनी जगह। प्रश्‍न शेष हैं तो रहें, उत्तर दिया जा चुका है। देखेंगे, देख रहे हैं और देखते रहेंगे।
किसी को छोड़ेंगे नहीं, लाखों का माल मिल गया अब करोड़ों के लिए भी कोशिश करेंगे लेकिन पहले ब्‍यौरा तो दो।
चार दिन में चार हजार बार पुलिस से उसके काम का हिसाब मांगा गया, पर कारोबार का हिसाब अब तक नहीं मिला। अब क्‍या बदमाश बताएंगे कि कितना माल लूट कर ले गए।
पहले हिसाब दो, फिर हिसाब मांगो। नहीं दे सकते तो हिसाब-किताब बराबर समझो। बहुतों का हिसाब इसी तरह हुआ है बराबर। गोली मारीं, गोली खाईं…इनका भी तो हिसाब देना है, और अकेले देना है। बदमाशों के असलाह से फायर निकले या फुहार, इससे किसी को क्‍या वास्‍ता। बदमाश खाकी को और खाकी बदमाशों को, दोनों एक-दूसरे को बहुत अच्‍छी तरह जानते हैं। दोनों के असलाह भी परस्‍पर पहचानते हैं। कितनी मार करनी है, कैसी करनी है, सब उन्‍हें पता होता है। आखिर चोली-दामन का साथ है। किसी एक घटना से कैसे छूट सकता है यह साथ।
यूं भी यूपी बहुत बड़ा है। कोई योगी आए या भोगी, कर्मयोगियों को फर्क नहीं पड़ता। ज्‍यादा से ज्‍यादा क्‍या? इधर या उधर।
वसीम बरेलवी का एक शेर, और बात खत्‍म।
जहां रहेगा, वहीं रोशनी लुटाएगा।
किसी चराग़ का अपना मकां नहीं होता।।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

यक्ष प्रश्‍नों का जवाब दिए बिना पुलिस ने “मयंक चेन” पर हुए मर्डर व लूट को खोलने का किया दावा

मथुरा। एक मुठभेड़ के बाद पुलिस ने आज आधा दर्जन बदमाशों को पकड़कर ज्‍यूलिरी फर्म ”मयंक चेन” पर हुए डबल मर्डर व करोड़ों रुपए की लूट के पर्दाफाश का दावा किया है।
15 मई की रात करीब साढ़े आठ बजे शहर के मध्‍य कोयला वाली गली में स्‍थित मयंक चेन नामक ज्‍यूलिरी फर्म पर आधा दर्जन सशस्‍त्र बदमाशों ने धावा बोला और अंधाधुंध गोलीबारी करके विकास एवं मेघ अग्रवाल की हत्‍या कर दी तथा विकास के भाई मयंक सहित तीन लोगों को गंभीर रूप से घायल कर दिया।
बदमाश यहां से करोड़ों रुपए मूल्‍य का सोना तथा लाखों रुपए नकद ले जाने में सफल रहे।
 घटना  से  जुड़ा  बीडियो  यहां  देखें - 

 https://youtu.be/5ESX391bTU4


बदमाशों द्वारा की गई यह दुस्‍साहसिक वारदात दुकान के अंदर लगे सीसीटीवी कैमरे में कैद हो गई किंतु अधिकांश बदमाशों के चेहरे कपड़े व हैलमेट से ढके होने के कारण उनकी पहचान करना मुश्‍किल हो रहा था।
हमलावर बदमाशों में से एक का चेहरा आधा खुला था। पुलिस का दावा है कि वही कुख्‍यात ईनामी अपराधी राकेश उर्फ रंगा है, जो गैंग का सरगना भी है।
रंगा का एक अन्‍य भाई बिल्‍ला हत्‍या के दूसरे मामले में काफी समय से जेल के अंदर निरुद्ध है।

रंगा और बिल्‍ला के नाम से कुख्‍यात यह दोनों भाई सबसे पहले तब सुर्खियों में आए जब करीब डेढ़ दशक पूर्व इन्‍होंने होलीगेट के अंदर भीड़ भरे छत्ता बाजार से आर के ज्‍वैलर्स के कर्मचारी को गोली मारकर भारी मात्रा में सोने के जेवरात व नकदी लूट ली।
दीपावली से ठीक दो दिन पहले की गई इस लूट के बाद भी शहर में काफी हंगामा हुआ था। रंगा-बिल्‍ला पकड़े तब भी गए थे और पुलिस ने इनके कब्‍जे से लूट का पूरा माल बरामद होने की बात भी कही थी किंतु बताया जाता है कि अधिकांश माल की बरामदगी नहीं हो सकी क्‍योंकि पीड़ित सर्राफा व्‍यापारी ने अंत तक अपने नुकसान का ब्‍यौरा पुलिस को नहीं दिया।
इसके बाद इन दोनों भाइयों ने एक मामूली सी बात पर अपने पड़ोसी भूलेश्‍वर चतुर्वेदी को समझौते के बहाने घर बुलाकर उसकी हत्‍या कर दी। बाद में भूलेश्‍वर के बड़े भाई तोलेश्‍वर उर्फ तोले बाबा को भी तब मार दिया गया जब वह भूलेश्‍वर के केस की पैरवी के लिए कचहरी जा रहा था। हत्‍या के इन्‍हीं मामलों में रंगा का भाई बिल्‍ला इन दिनों मथुरा जिला कारागार में बंद है।
इस रंजिश के चलते रंगा-बिल्‍ला के चाचा विजय को भी चौबिया पाड़ा क्षेत्र में मार दिया गया था।
पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार राकेश उर्फ रंगा पर फिलहाल एक दर्जन संगीन मामले दर्ज हैं साथ ही 15 हजार रुपए का ईनाम भी घोषित है।
पुलिस का दावा है कि पकड़े गए बदमाशों में शामिल कुख्‍यात ईनामी बदमाश राकेश उर्फ रंगा ही वह शख्‍स है जो मयंक चेन से प्राप्‍त सीसीटीवी फुटेज में प्रमुख रूप से दिखाई दे रहा है।
रंगा के साथ पुलिस ने उसके दो छोटे भाई नीरज एवं चीनी उर्फ कामेश को भी पकड़ा है। गिरफ्त में आए बाकी तीन बदमाशों के नाम आयुष, विष्‍णु उर्फ छोटे तथा आदित्‍य बताए गए हैं।
बताया जाता है कि पुलिस से मुठभेड़ में नीरज गंभीर रूप से घायल हुआ है और उसे गोली लगी है तथा रंगा व चीनी भी घायल हैं।
पुलिस ने इनके कब्‍जे से 20 लाख रुपए मूल्‍य के सोने व हीरे के आभूषण तथा असलाह और मय सिम कार्ड मोबाइल की बरामदगी दिखाई है।
सीसीटीवी फुटेज में दिखाई देने वाले नकाबपोश बदमाश यही थे, इसका पता तो फुटेज की फॉरेंसिक जांच के बाद ही लगेगा अलबत्ता पुलिस ने इस बावत बुलाई गई अपनी प्रेस वार्ता में ऐसी कोई जानकारी नहीं दी कि बदमाशों के कब्‍जे से बरामद माल 16 मई को मयंक चेन के पड़ोसी सर्राफ के यहां से मिले माल से अलग है। यहां यह जान लेना भी जरूरी है कि पुलिस को अब तक पीड़ित व्‍यापारियों ने लूट के माल का कोई ब्‍यौरा नहीं दिया और न ही एफआईआर में इसकी कोई जानकारी दी गई थी।
गौरतलब है कि 16 मई को बरामद वह माल पांच व्‍यापारियों की कमेटी के सामने सीओ सिटी जगदीश सिंह ने मृतक व्‍यापारी मेघ अग्रवाल के पिता को इस शर्त पर सौंप दिया था कि इसे बरामदगी मानते हुए पुलिस की जरूरत के हिसाब से प्रस्‍तुत किया जाएगा।
इसके ठीक विपरीत व्‍यापारियों का कहना था कि उस माल के मिलने में पुलिस की कोई भूमिका नहीं थी। उसे पड़ोसी सर्राफा व्‍यापारी ने व्‍यापारियों को दिया था लिहाजा उसे बरामदगी नहीं माना जा सकता।
पुलिस द्वारा रंगा गैंग से दिखाई जा रही 20 लाख रुपए मूल्‍य की बरामदगी का कोई विस्‍तृत ब्‍यौरा न दिए जाने और आज सुबह ही मेघ अग्रवाल के पिता महेश अग्रवाल द्वारा यह कहे जाने कि उनके ऊपर पुलिस सौंपे गए माल को देने का दबाव बना रही है, यह संदेह होना स्‍वाभाविक है कि पुलिस जिसे रंगा गैंग से बरामद माल बता रही है वह कहीं मेघ अग्रवाल के पिता को सौंपा गया माल ही तो नहीं है।
यदि ऐसा है तो पुलिस के पास बरामदगी के नाम पर रह क्‍या जाता है और कोर्ट में पुलिस का यह गुडवर्क पीड़ित को कितनी राहत दिला सकेगा।
सीसीटीवी फुटेज में दिखाई देने वाले चेहरों से पकड़े गए बदमाशों की शिनाख्‍त पर भी लोग उंगली उठा रहे हैं। बहुत से लोगों का लग रहा है कि जो आधे या पूरे खुले चेहरे सीसीटीवी की फुटेज में दिखाई दे रहे हैं, उनसे पकड़े गए बदमाशों का चेहरा हूबहू मेल खाता नजर नहीं आता।
बहरहाल, इसमें कोई दो राय नहीं कि रंगा-बिल्‍ला के नाम से मशहूर चार भाइयों के इस गैंग की इलाके में भारी दहशत थी और आम आदमी तथा व्‍यापारी इनसे खौफ खाते थे। आसपड़ोस में भी इन्‍होंने आतंक फैला रखा था।
यही कारण है कि न सिर्फ शहर के लोगों ने बल्‍कि आस-पड़ोस के लोगों ने भी इनके पकड़े जाने पर राहत की सांस ली है और चौबिया पाड़ा क्षेत्र में जश्‍न का माहौल बना हुआ है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

शनिवार, 25 जून 2016

खौफ के साये में खाकी: पुलिस ही पुलिस की सबसे बड़ी दुश्‍मन

मथुरा में 2 जून को जवाहर बाग खाली कराते वक्‍त एसपी सिटी तथा एसओ की शहादत के बाद भी दो उप निरीक्षकों को मौत के घाट उतारा जा चुका है
ड्यूटी के लिए खाक में मिल जाने की प्रेरणा देने वाली खाकी इस समय खुद खतरे में है। यूपी में खाकी पर मंडरा रहे खतरे का आलम यह है कि हर रोज Police मजामत व शहादत की खबरें अखबारों की सुर्खियां बन रही हैं। मथुरा में 2 जून को जवाहर बाग खाली कराते वक्‍त एसपी सिटी तथा एसओ की शहादत के बाद भी दो उप निरीक्षकों को मौत के घाट उतारा जा चुका है। एक को बदमाशों ने बदायूं में मार डाला तो दूसरे को हापुड़ में।
2 जून से पहले भी पुलिस पर हमलावर होने की घटनाएं लगातार मिलती रही हैं।
कल यानि शुक्रवार को आगरा के आंवलखेड़ा में खनन माफिया ने पुलिस को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा।
इससे पहले मथुरा में नेशनल हाईवे पर लावारिस खड़े ट्रक के अंदर गौवंश की बेरहमी से हुई मौत के बाद लोगों के आक्रोश ने कानून-व्‍यवस्‍था की पोल खोलकर रख दी थी। पूरे दो दिन नेशनल हाईवे पर गौवंश से भरा ट्रक खड़ा रहा और इलाका पुलिस ने यह तक जानने की जहमत नहीं उठाई कि आखिर यह ट्रक इस तरह खड़ा क्‍यों हैं तथा उसके अंदर है क्‍या ?
काफी उपद्रव हो जाने के बाद कोतवाल वृंदावन तथा रिपोर्टिंग चौकी प्रभारी जैत को निलंबित करके लोगों का आक्रोश शांत करने की कोशिश की गई है।
ऐसे में इस तरह के सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर क्‍यों बदमाशों के अंदर पुलिस का भय पूरी तरह खत्‍म होता जा रहा है ?
क्‍यों खाकी से सिर्फ शरीफ लोग खौफ खाते हैं और बदमाश उन्‍हें कहीं अपना सहयोगी तो कहीं अपना प्रतिद्वंदी मानकर चलते हैं ?
खाकी की इमेज क्‍यों सिर्फ और सिर्फ वर्दीधारी अपराधियों की बनकर रह गई है और कैसे उसका इकबाल पूरी तरह खत्‍म होता जा रहा है ?
क्‍यों सामाजिक लोग भी अब पुलिस के खिलाफ एकजुट होने लगे हैं और आपराधिक तत्‍व उस पर हमला करने से नहीं चूकते ?
इसमें कोई दोराय नहीं कि खाकी पर खादी के आधिपत्‍य ने पुलिस के इकबाल को खत्‍म करने में बड़ी भूमिका अदा की है, किंतु खाकी की वर्तमान दुर्दशा के लिए पुलिस खुद भी कम जिम्‍मेदार नहीं है।
पुलिस की इस दुर्दशा का सबसे बड़ा कारण है, उसके द्वारा की जाने वाली वो अवैध कमाई जो उनके वेतन-भत्‍तों से भी कई गुना अधिक होती है।
इस अवैध कमाई ने पुलिस की छवि एक ऐसे सड़क छाप गुंडे की बनाकर रख दी है जो लोगों को लूटने खसोटने के लिए किसी भी स्‍तर तक जा सकता है और जिसका एकमात्र धर्म तथा कर्म आमजन में भय व्‍याप्‍त कर अपना उद्देश्‍य पूरा करना होता है।
बेशक दूसरे तमाम सरकारी महकमे अवैध कमाई के मामले में पुलिस से कहीं पीछे नहीं हैं किंतु पुलिसिया कार्यप्रणाली ने जितनी बदनामी हासिल की है, उतनी किसी दूसरे विभाग ने नहीं की।
पुलिस की अवैध कमाई और उसकी बदनामी के कुछ महत्‍वपर्णू कारणों को चंद उदाहरणों से समझा जा सकता है।
उदाहरण के तौर पर एक अनुमान के अनुसार विश्‍व प्रसिद्ध धार्मिक स्‍थल मथुरा जनपद के शहरी क्षेत्र में ही पर्चा सट्टे की करीब 80 गद्दियां संचालित होती हैं। प्रत्‍येक गद्दी से पुलिस 90 हजार रुपया हर महीना लेती है। इस तरह शहरी पुलिस के पास हर माह सट्टे के अवैध करोबार से 72 लाख रुपया महीना आता है।
एमसीएक्‍स का गोरखधंधा भी इस जिले में खूब फल-फूल रहा है और क्रिकेट के सट्टे में मथुरा अपनी एक अलग पहचान बना चुका है। एमसीएक्‍स का अवैध धंधा तो अब तक दर्जनों लोगों की जान ले चुका है लेकिन पुलिस के लिए वह भी अवैध कमाई का अच्‍छा स्‍त्रोत है। एमसीएक्‍स का संचालन चूंकि पुलिस के सहयोग बिना संभव ही नहीं है इसलिए एमसीएक्‍स संचालकों को एक ओर जहां पुलिस के संरक्षण की जरूरत रहती है वहीं दूसरी ओर वसूली के लिए भी पुलिस का सहयोग जरूरी है।
इसी प्रकार डग्‍गेमार वाहनों में थ्री व्‍हीलर पुलिस की अतिरिक्‍त आमदनी का बड़ा जरिया हैं। जनपदभर में चलने वाले छोटे और बड़े टेम्‍पो से हर थाने-चौकी के लिए अवैध वसूली की जाती है। अनुमानत: जिले में लगभग 1500 टेम्‍पो चलते हैं और इन टेम्‍पो से वसूली का एवरेज 250 रुपया प्रति टेम्‍पो प्रतिमाह निकलता है। इस तरह पुलिस पौने चार लाख रुपए हर महीने टेम्‍पो चालकों से वसूलती है। इस काम को पुलिस ने जिन गुर्गों को लगा रखा है, उन्‍हें ठेकेदार कहते हैं। पुलिस इन टेम्‍पो चालकों से बेगार भी लेती है जिसमें चौकी-थानों के लिए पानी लेकर आने से लेकर इधर-उधर घुमाने, गश्‍त के लिए ले जाने तथा नाते-रिश्‍तेदारों को ब्रजदर्शन कराना तक शामिल है।
इसके अलावा जिलेभर में दूसरे बड़े अवैध डग्‍गेमार वाहन दौड़ते हैं जिनमें बसें तो हैं ही, ट्रक तथा बड़ी संख्‍या में जुगाड़ भी हैं। इन सभी वाहनों से पुलिस की महीनेदारी बंधी हुई है। पुलिस की मेहरबानी के बिना जिलेभर में किसी मार्ग पर कोई वाहन न तो सवारी ढो सकता है और न माल।
जुगाड़ तथा ट्रैक्‍टर तो चूंकि सबसे अधिक ईंट ढोने के काम में प्रयोग होते हैं और इसलिए वह पुलिस की कमाई का बड़ा जरिया हैं।
यहां यह जान लेना जरूरी है कि ताज ट्रपेजियम जोन में आने के कारण मथुरा की सीमा के अंदर ईंट भट्टा संचालित करना एक बड़ा अपराध है, बावजूद इसके न केवल यहां खुलेआम ईंटभट्टे चलते हैं बल्‍कि राष्‍ट्रीय राजमार्ग पर नियम-कानूनों को धता बताते हुए ईंट मंडी भी लगती है। सुबह से ही पूरे राजमार्ग पर सैकड़ों की संख्‍या में जगह-जगह ईंटों के ट्रैक्‍टर व जुगाड़ खड़े देखे जा सकते हैं। सड़क को घेरकर अवैध ईंट मंडी बना देने वाले इन वाहनों की वजह से आए दिन दुर्घटनाएं होती हैं लेकिन न कोई बोलने वाला है और न सुनने वाला।
यमुना से निकलने वाली बालू और जिले भर में हो रहा मिट्टी का अवैध खनन भी पुलिस के लिए किसी वरदान से कम नहीं।
राजस्‍थान सीमा से लगे मथुरा के गोवर्धन व बरसाना आदि में अरावली पर्वत श्रृंखला का अवैध खनन और यमुना से मछली व कछुओं की तस्‍करी में भी पुलिस की भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता।
नशीले पदार्थों की तस्‍करी जिसमें शराब भी शामिल है, के लिए मथुरा अच्‍छी-खासी शौहरत रखता है। एक ओर हरियाणा तथा दूसरी ओर राजस्‍थान की सीमा से सटे होने तथा राष्‍ट्रीय राजधानी दिल्‍ली से उसकी बहुत कम दूरी इस काम में मददगार है।
सर्वविदित है कि मथुरा में हेरोइन, चरस व गांजे के अतिरिक्‍त शराब, स्‍मैक तथा ब्राउन शुगर जैसे महंगे नशीले पदार्थों की भी अच्‍छी खपत है और इसलिए इन्‍हें बेचने वालों का यहां बड़ा नेटवर्क है।
वृंदावन, गोवर्धन तथा बरसाना में मौजूद तथाकथित विदेशी ”भक्‍त” इन नशीले पदार्थों का सेवन हर रोज करते देखे जा सकते हैं। ऐसे में यह अंदाज लगाना कोई मुश्‍किल काम नहीं कि उन्‍हें वह पदार्थ कहां से व कैसे मिलता होगा।
जाहिर है कि पुलिस की मदद के बिना किसी देसी या विदेशी नशीले पदार्थ की बिक्री के बारे में सोचा तक नहीं जा सकता। ड्रग्‍स के यह तस्‍कर पुलिस के पास अच्‍छा-खासा पैसा पहुंचाते हैं।
इन तमाम अवैध धंधों से ऊपर मथुरा में तेल से होने वाला वह खेल है जिसकी धार मथुरा रिफाइनरी से निकलती है। तेल के इस खेल ने मथुरा के कई लोगों को देखते-देखते रंक से राजा बना दिया। कल तक जिनकी हैसियत हजारों की नहीं थी, आज वह करोड़ों के मालिक हैं। तेल के इस खेल को पुलिस के साथ-साथ प्रशासन व स्‍थानीय नेताओं का भी पूरा वरदहस्‍त प्राप्‍त है। जिले में शायद ही कोई ऐसा बड़ा नेता हो, जो तेल के खेल में परोक्ष या अपरोक्ष भूमिका न निभाता रहा हो। तेल की बहती गंगा में अधिकांश नेता हाथ धोते हैं। रहा सवाल पुलिस का, तो पुलिस की मर्जी के बिना न तो तेल का कोई टैंकर जिले की सीमा से बाहर जा सकता है और न सड़क पर खड़ा हो सकता है। करोड़ों रुपए के इस खेल में पुलिस की भी अच्‍छी-खासी हिस्‍सेदारी रहती है।
कहने का तात्‍पर्य यह है कि यूपी के एक सी ग्रेड जिले मथुरा का जब यह हाल है तो बाकी उन जिलों का क्‍या होगा जो ए तथा बी ग्रेड जिले कहलाते हैं।
पुलिस की प्रति जिला अवैध कमाई को यदि जोड़ा जाए तो वह सरकारी खजाने से प्रति माह आने वाले उसके वेतन से भी अधिक बैठेगी।
संभवत: यही कारण है कि पेशेवर अपराधियों व अवैध काम करने वालों के मन से खाकी का खौफ दिन-प्रतिदिन खत्‍म होता जा रहा है और इसीलिए वह पुलिस पर हमलावर होने में रत्‍तीभर भी नहीं हिचकिचाते।
टेम्‍पो चालक इसके सबसे बड़े प्रतीक हैं। तिराहे-चौराहों पर बेतरतीब खड़े रहने वाले किसी टेम्‍पो चालक में पुलिस का लेशमात्र भी भय दिखाई नहीं देता। आश्‍चर्य की बात तो यह है कि यातायात व्‍यवस्‍था को सर्वाधिक बाधित करने का काम टेम्‍पो चालक पुलिस की नाक के नीचे और चौकी-थानों के सामने करते हैं। वहां करते हैं जहां पुलिस पिकेट हर वक्‍त मौजूद रहती है क्‍योंकि वह जानते हैं कि उनसे हर महीने मोटी कमाई करने वाली पुलिस उन्‍हें गीदड़ भभकी तो दे सकती है लेकिन ठोस कार्यवाही नहीं कर सकती। आखिर वह उसके लिए सोने का अंडा देने वाली मुर्गी जो हैं।
टेम्‍पो चालक तो मात्र एक उदाहरणभर हैं अन्‍यथा किसी भी धंधे को नियम-कानून से इतर जाकर सुविधाएं देने अथवा पूरी तरह अवैध धंधे को संचालित कराने में पुलिस जब खुद शामिल रहेगी तो उस धंधे को करने वाला पुलिस से डरने भी क्‍यों लगा। पुलिस उसके लिए उस स्‍थिति में सिर्फ और सिर्फ उसकी ऐसी हिस्‍सेदार बनकर रह जाती है जिसने वर्दी के रूप में कानून का जामा पहन रखा है वर्ना उसमें तथा पुलिस में फर्क ही कहां है। पुलिस के प्रति अवैध कारोबारियों तथा अपराधियों में बन रही यही छवि अब उसकी जान की दुश्‍मन बनने लगी है।
इन स्‍थिति तथा परिस्‍थितियों के बीच पुलिस की कांटे से कांटा निकालने की चिर-परिचित कार्यशैली भी अब पुलिस पर भारी पड़ने लगी है। जिस थ्‍यौरी को कभी पुलिस बदमाशों के ऊपर लागू करती थी, वह अब पुलिस ही पुलिस के ऊपर लागू करने लगी है।
पुलिस मजामत के अधिकांश मामलों की तह तक यदि जाया जाए तो पता लगेगा कि उसकी भी जड़ में कहीं न कहीं पुलिस ही है। जातिगत भेदभाव, वर्ण व्‍यवस्‍था, आरक्षण, आउट ऑफ टर्म प्रमोशन आदि के मामले तथा उससे उपजे द्वेषभाव अब पुलिस बल में इस कदर समा चुका है कि पुलिस अब संगठित बल नहीं रह गया। द्वेषभाव के दंश से कोई थाना-चौकी आज की तारीख में अछूता नहीं है। ऐसे में परस्‍पर दुश्‍मनी का भाव अंदर ही अंदर पनपने लगता है और मौका मिलने पर सबक सिखाने की मंशा मन में समा जाती है। दबिश, गश्‍त तथा अपराधियों की धर-पकड़ के मौकों पर पुलिस मजामत के मामले ऐसे ही द्वेषभाव की उपज होते हैं लेकिन पुलिस अधिकारी कभी इनकी तह में जाने का प्रयास नहीं करते। प्रथमद्ष्‍टया जिसका दोष परिलक्षित होता है, उसे लाइन भेजकर या अधिक से अधिक निलंबित करके अपने कर्तव्‍य की इतिश्री कर लेते हैं।
यही सब कारण हैं कि भले ही हर वर्ष पुलिस स्मृति दिवस (इक्कीस अक्तूबर) पर विभिन्न पुलिसबलों के सैकड़ों शहीद याद किए जाते हैं और कर्तव्य-वेदी पर प्राणों की आहुति की वार्षिक रस्म-अदायगी देश की तमाम पुलिस यूनिटों में हो रही होती है लेकिन पुलिस की छवि को लेकर भारतीय समाज में मिश्रित कुंठाएं ज्यों की त्यों बनी रहती हैं।
इस संबंध में स्वयं सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी वाली प्रकाश सिंह कमेटी द्वारा प्रस्‍तुत ‘पुलिस सुधार’ की कवायद भी मददगार सिद्ध नहीं हो सकी क्‍योंकि तमाम राज्‍य सरकारों की इन्‍हें लागू करने में कोई रुचि नहीं है जबकि औपनिवेशिक काल वर्ष 1861 के अधिनियम पर काम करने एवं नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों की उपेक्षा करने वाली पुलिस की साख सामान्य अपराध के आंकड़ों में हेराफेरी करके ही अपनी कुशलता दिखाने और शातिर अपराधियों से मिलीभगत करने की बनकर रह गई है।
राज्‍य सरकारें जानती हैं कि पुलिस को स्वायत्तता देने का मतलब समूची राजनीतिक बिरादरी के पैरों पर कुल्‍हाड़ी मारने के समान है।
गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय का पुलिस सुधार मुख्यत: स्वायत्तता, जवाबदेही और लोकोन्मुखता जैसे पांच बिंदुओं पर केंद्रित है।
इसमें डीजीपी, आईजीपी, एसपी, एसएचओ की दो वर्ष की निश्चित तैनाती और डीजीपी और चार अन्य वरिष्ठतम पुलिस अधिकारियों के (एस्टैब्लिशमेंट) बोर्ड को उप पुलिस अधीक्षक स्तर तक के तबादलों का अधिकार देने तथा पुलिस की स्वायत्तता को मजबूत कर उसे बाह्य दबावों से मुक्त रखने की सिफारिश की गई है।
इसमें पुलिस को भी कानूनी दायरे में रखने के लिए राज्य पुलिस आयोग और पुलिस शिकायत प्राधिकरण की व्‍यवस्‍था है लेकिन राज्‍यों की रुचि लोकोन्मुख पुलिस बनाने में है ही नहीं। राज्‍य सरकारें तो यही चाहती हैं कि पुलिस उनके हाथ की कठपुतली बनी रहे और वो उसे जैसे चाहें वैसे नचाती रहें।
इन हालातों में पुलिस को खुद हवा के बदलते रुख का भली-भांति अध्‍ययन करना होगा, और समझना होगा कि यदि समय रहते उसने पैसे के पीछे अंधी दौड़ की प्रवृत्‍ति को नहीं त्‍यागा तथा ट्रांसफर-पोस्‍टिंग आदि के लिए राजनेताओं की हर जायज-नाजायज बात सिर झुकार मान लेने की आदत नहीं बदली तो आगे आने वाला समय उसके लिए कितना घातक हो सकता है।
पुलिस को यह भी समझना होगा कि कम से कम कानून-व्‍यवस्‍था के अनुपालन में उसे जाति, धर्म व संप्रदाय से ऊपर उठकर काम करना होगा तथा अपराध व अपराधियों के उन्‍मूलन में कंधे से कंधा मिलाकर चलना होगा अन्‍यथा अपराधियों के उसके ऊपर हमलावर होने का सिलसिला दिन-प्रतिदिन बढ़ेगा ही। कम होने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता क्‍योंकि अब अपराधी, राजनेताओं से संपर्क साधने तक सीमित नहीं रहे। वह अब राजनीतिक दलों तथा राजनीतिज्ञों के हमराह हो चुके हैं।
खाकी को बदमाशों के मन में पहले जैसा खौफ पैदा करने तथा भद्रजनों के प्रति सद्भाव प्रदर्शित करने के लिए अपने सूत्रवाक्‍य ‘परित्राणाय साधुनाम विनाशाय च दुष्कृताम’ को सार्थक करना होगा, उस पर अमल करना होगा क्‍योंकि यही सूत्रवाक्‍य उसका अपना इकबाल पुनर्स्‍थापित करने की क्षमता रखता है। यही सूत्रवाक्‍य उसे बिना किसी बड़े फेर-बदल के सही मायनों में नागरिक पुलिस बनाने का माद्दा रखता है।
राजनीतिज्ञों का क्‍या है, उसके लिए पुलिस बल मात्र एक ऐसा संख्‍या बल है जिसकी शहादत भी आंकड़ों की बाजीगरी में दबा दी जायेगी और खाकी इसी प्रकार कभी नेताओं को बचाने तथा कभी आत्‍मरक्षा में खाक होती रहेगी।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

रविवार, 19 जून 2016

ऐसे तो कभी सामने नहीं आयेगा जवाहर बाग कांड का सच

मथुरा। 2 जून को हुए जवाहर बाग कांड का सच कभी सामने आ पायेगा, इस बात की संभावना समय के साथ क्षीण होती जा रही है। अब तक इस मामले में की गई पुलिसिया कार्यवाही से तो यही लगता है।
सबसे पहले गौर करें प्रदेश ही नहीं, पूरे देश को हिला देने वाले इस कांड की पहली महत्‍वपूर्ण गिरफ्तारी पर। यह गिरफ्तारी हुई चंदन बोस नामक उस व्‍यक्‍ति की जिसे रामवृक्ष यादव का दाहिना हाथ कहा जा रहा है। चंदन बोस की गिरफ्तारी जनपद बस्‍ती के परशुरामपुर थाना क्षेत्र अंतर्गत गांव कैथेलिया से बस्‍ती जिले की ही क्राइम ब्रांच (स्‍वाट टीम) करती है। पुलिस के अनुसार यह गांव चंदन बोस की ससुराल है और जवाहर बाग कांड को अंजाम देने के बाद से वह अपनी पत्‍नी सहित यहीं रह रहा था।
पुलिस के अनुसार चंदन बोस की पत्‍नी भी उसकी हर आपराधिक गतिविधि में समान रूप से साझीदार थी और रामवृक्ष के गैंग में महिला विंग की कमांडर थी। इस तरह देखा जाए तो बस्‍ती पुलिस ने एक नहीं, दो बड़े अपराधियों को गिरफ्तार करने में सफलता हासिल की। ऐसे दो बड़े अपराधी जो रामवृक्ष की पल-पल की जानकारी रखते थे और जवाहर बाग के पूरे सच से भली प्रकार वाकिफ थे।
अब देखिए कितने आश्‍चर्य की बात है कि जिस जवाहर बाग कांड पर न सिर्फ प्रदेश सरकार की नजर गढ़ी थी बल्‍कि विपक्षी दल भी पूरी तरह सक्रिय हो चुके थे और अपराधियों की धर-पकड़ के लिए मथुरा पुलिस ने कई टीमें गठित कर दी थीं, उस कांड के सरगना का दाहिना हाथ अपनी अपराधी पत्‍नी सहित पकड़ा जाता है मथुरा से करीब 650 किलोमीटर दूर बस्‍ती जिले के एक गांव में।
यही नहीं, बस्‍ती के पुलिस अधीक्षक चंदन बोस की गिरफ्तारी पर बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस करते हैं, और पूरी जानकारी मीडिया को देते हैं।
जाहिर है कि इसके बाद मथुरा पुलिस की भूमिका शुरू होती है और वो चंदन बोस व उसकी पत्‍नी को लेने के लिए जनपद बस्‍ती पहुंचती है।
जब बस्‍ती पुलिस ने चंदन बोस और उसकी पत्‍नी पूनम की अपने यहां कानूनन गिरफ्तारी प्रेस कांफ्रेंस करके दिखा दी तो मथुरा पुलिस के हाथ में रह क्‍या जाता है, सिवाय लकीर पीटने के।
मथुरा पुलिस चूंकि सारी कानूनी औपचारिकता पूरी करके चंदन और उसकी पत्‍नी को मथुरा लाई थी इसलिए न तो वह उन पर अपने चिर-परिचित हथकंडे इस्‍तेमाल कर सकती थी और न उनसे कोई बड़ा राज उगलवा सकती थी।
ऐसे में चंदन बोस ने वही सब बताया जो कई दिन पहले से अखबारों में छपता रहा था। उसने न तो रामवृक्ष को लेकर कोई जानकारी दी और न यह बताकर दिया कि आखिर रामवृक्ष रूपी विषबेल को दो साल तक खाद-पानी कहां से मिलता रहा। किसके इशारे पर वह 280 एकड़ में फैले सरकारी जवाहर बाग को कब्‍जाने का ख्‍वाब देख रहा था। क्‍यों पुलिस प्रशासन उनकी गालियां खाकर और जलील होकर भी उनके सामने असहाय बना रहा।
चंदन बोस और उसकी पत्‍नी पूनम की गिरफ्तारी के बाद फोटो सहित छपे समाचारों में देखा गया कि चंदन बोस को दो पुलिस वाले अपने कंधों का सहारा देकर ले जा रहे हैं। इसका तात्‍पर्य यह है कि चंदन बोस अपने बूते चलने-फिरने की स्‍थिति में भी नहीं था।
यहां एक सीधा सवाल यह खड़ा होता है कि जब चंदन बोस की घटना वाले दिन ही जवाहर बाग में टांग टूट गई थी और वह चलने फिरने लायक भी नहीं रह गया था तो कैसे वह मथुरा से 650 किलोमीटर दूर अपनी ससुराल जा पहुंचा। उसने अपनी टांग पर प्‍लास्‍टर ससुराल पहुंचने के बाद करवाया या कहीं बीच में इलाज कराकर ससुराल तक जा सका।
क्‍या इस सब काम में उसकी किसी ने मदद की, और की तो वह मददगार कौन था।
घटना के तुरंत बाद जब पूरे प्रदेश की पुलिस में एसपी सिटी मुकुल द्विवेदी तथा एसओ संतोष यादव की जान लेने वालों के प्रति भारी उबाल था और मथुरा के लोग तो जवाहर बाग के कथित सत्‍याग्रहियों को ढूंढ-ढूंढ कर पीट रहे थे तब कैसे चंदन बोस अपनी पत्‍नी व बच्‍चों सहित टूटी हुई टांग से सैकड़ों किलोमीटर दूर पहुंचने में कामयाब हो गया। क्‍या इस बीच उसे कहीं भी किसी जिले की पुलिस ने नहीं देखा।
अब जरा गौर करें जवाहर बाग कांड की दूसरी सबसे बड़ी गिरफ्तारी पर। यह गिरफ्तारी बदायूं पुलिस ने शुक्रवार 17 जून को की। गिरफ्तार किया गया शख्‍स राकेश गुप्‍ता बदायूं के ही थाना हजरतपुर अंतर्गत गांव शहापुर का निवासी है।
रामवृक्ष को लाखों रुपए खुद देने से लेकर जवाहर बाग में मौजूद हजारों लोगों के लिए रसद की व्‍यवस्‍था तथा पुलिस प्रशासन से मुकाबले के लिए हथियारों तक का बंदोबस्‍त करने वाला राकेश गुप्‍ता भी घटना वाले दिन जवाहर बाग में मौजूद था लेकिन पुलिस कार्यवाही के बाद बड़े इत्‍मीनान से सपरिवार मथुरा पुलिस लाइन होकर रेलवे स्‍टेशन जा पहुंचा तथा वहां से कासगंज, बरेली व फर्रुखाबाद होकर बदायूं पहुंच गया।
गौरतलब है कि कासगंज, बरेली तथा फर्रुखाबाद व बदायूं आदि सब उसी प्रदेश के हिस्‍से हैं जिस प्रदेश में दो पुलिस अफसरों को निर्ममता के साथ अवैध कब्‍जाधारियों ने हजारों लोगों के सामने मार डाला और जिस प्रदेश की पुलिस कथित तौर पर इन अफसरों की हत्‍या करने वालों को पूरी शिद्दत के साथ तलाश रही थी। जिनकी गिरफ्तारी के लिए कई टीमें सक्रिय थीं और शासन स्‍तर से हर पल जवाब तलब किया जा रहा था क्‍योंकि उस पर राजनीति शुरू हो चुकी थी।
पुलिस की अब तक की पूरी कार्यवाही तथा चंदन बोस, उसकी पत्‍नी पूनम एवं रामवृक्ष के फायनेंसर राकेश गुप्‍ता की गिरफ्तारियों को देखकर तो लगता है कि जवाहर बाग कांड की लीपापोती का खेल शुरू हो चुका है और पुलिस बड़े सुनियोजित तरीके से इसका पटाक्षेप करने में लगी है।
टूटी टांग लेकर चंदन बोस का पत्‍नी सहित जवाहर बाग से निकल भागना, दोनों की गिरफ्तारी पूनम के घर यानि चंदन के सुसराल बस्‍ती जिले के एक गांव से होना। बस्‍ती पुलिस द्वारा सारी लिखा-पढ़ी करने व मीडिया से रूबरू होने के बाद चंदन व पूनम को मथुरा पुलिस के हवाले करना। दो दिन बाद राकेश गुप्‍ता की गिरफ्तारी भी उसके गृह जनपद बदायूं से होना। उसे भी बदायूं की पुलिस द्वारा पूरी लिखा-पढ़ी व कानूनी प्रक्रिया के तहत मथुरा पुलिस के सुपुर्द करना, क्‍या सब-कुछ एक इत्‍तेफाकभर है।
क्‍या शासन-प्रशासन नहीं जानता कि कानूनी प्रक्रिया पूरी करके किसी अपराधी को दूसरे जिले की पुलिस के सुपुर्द करने पर उससे पूछताछ के कितने ”हथियार” शेष रह जाते हैं।
दो पुलिस अधिकारियों को घेरकर मार डालने जैसे गंभीर अपराध के आरोपियों को यदि दूसरे जनपद में पकड़ा भी गया था तो क्‍या सारी कानूनी प्रक्रिया पूरी करके ही उन्‍हें उस जिले की पुलिस के सुपुर्द करना जरूरी था, जिस जिले की पुलिस उनसे बहुत कुछ उगलवा सकती थी। या यूं कहें कि जिनसे बहुत कुछ उगलवाना बेहद जरूरी था।
चंदन बोस, उसकी पत्‍नी पूनम तथा राकेश गुप्‍ता की गिरफ्तारी को देखें तो ऐसा लगता है कि जैसे इनकी गिरफ्तारी के लिए स्‍क्रिप्‍ट पहले तैयार कर ली गई तथा गिरफ्तारी उसके बाद दिखाई गई जिससे सांप मर जाए और लाठी भी न टूटे।
यही कारण है कि दो-दो पुलिस अधिकारियों की नृशंस हत्‍या के जिम्‍मेदार दोनों शातिर अपराधियों से पुलिस ऐसा कुछ नहीं उगलवा सकी जिससे यह पता लग सके कि आखिर किसके संरक्षण में रामवृक्ष पूरे दो साल तक शासन, प्रशासन व अदालतों तक को खुली चुनौती देने में कामयाब रहा। कैसे वह पूरी प्‍लानिंग के साथ हथियार जमा करके पुलिस-प्रशासन पर बेखौफ हमला करने का दुस्‍साहस कर पाया।
पुलिस यह तक पता नहीं लगा सकी कि रामवृक्ष कैसे मारा गया। उसे किसने मारा और कहां मारा।
आगरा से प्रकाशित आज के ”दैनिक हिंदुस्‍तान” का समाचार सच मानें तो राकेश गुप्‍ता ने रामवृक्ष के बारे में पुलिस को जो जानकारी दी है उसके मुताबिक रामवृक्ष को घटना के तुरंत बाद जवाहर बाग की चारदीवारी के बाहर महिला-पुरुषों की भीड़ ने पत्‍थर आदि से तभी मार डाला जब वह भागने की कोशिश कर रहा था। राकेश गुप्‍ता का कहना है कि खुद को घिरा देख वह भी कपड़े उतारकर भीड़ का हिस्‍सा बन गया और भीड़ के साथ रामवृक्ष पर पथराव करने लगा। उसने खुद रामवृक्ष को अपनी आंखों से मरते हुए देखा।
राकेश के दावे से ठीक विपरीत उत्‍तर प्रदेश पुलिस के मुखिया जाविद अहमद ने रामवृक्ष यादव की मौत का कारण जवाहर बाग में उसकी खुद की लगाई गई आग के अंदर जल जाना बताया।
डीजीपी जाविद अहमद ने जिस दिन रामवृक्ष के मारे जाने की पुष्‍टि पहले ट्वीट करके और फिर मीडिया को दी, उस दिन बताया कि मथुरा के एसएसपी राकेश सिंह ने उन्‍हें सारी जानकारी उपलब्‍ध कराई है तथा रामवृक्ष के शव की शिनाख्‍त जेल में बंद उसके एक साथी से करा ली है।
डीजीपी साहब ओर मथुरा के तत्‍कालीन एसएसपी राकेश सिंह क्‍या अब यह बतायेंगे कि यदि रामवृक्ष की मौत जवाहर बाग के अंदर उसकी खुद की लगाई गई आग से हुई थी तो राकेश गुप्‍ता के सामने भीड़ ने जिसे मारा वह कौन था।
उल्‍लेखनीय है कि रामवृक्ष यादव की मौत के इस पुलिसिया दावे को मथुरा में एडीजे-9 की कोर्ट ने भी तब खारिज कर दिया जब वह उसके खिलाफ एक अन्‍य मामले में जारी गैर जमानती वारंट की तामील न करा पाने का कारण उसकी मौत बताकर अपना पीछा छुड़ाना चाहती थी।
कोर्ट ने पुलिस की कहानी पर सवालिया निशान लगाते हुए उसे आदेशित किया है कि वह रामवृक्ष का डीएनए कराकर पूरे तथ्‍यों सहित कोर्ट के समक्ष हाजिर हो।
जहां तक सवाल चंदन बोस और उसकी पत्‍नी का है, तो पुलिस की पूछताछ में उन्‍होंने रामवृक्ष के बावत कोई जानकारी नहीं दी।
आगरा से ही प्रकाशित आज का दैनिक जागरण भी यही कहता है कि चंदन बोस से पुलिस रामवृक्ष के बारे में कुछ नहीं उगलवा सकी। सिवाय इसके के रामवृक्ष मारा जा चुका है।
ऐसा लगता है कि पुलिस भी अपने ही दो अधिकारियों की शहादत को जैसे भूलने लगी है और शहीदों के परिजनों को आर्थिक मदद करके ही अपने कर्तव्‍य की इतिश्री मान बैठी है।
यदि ऐसा नहीं होता तो यह कैसे संभव था कि जहां इतना बड़ा कांड हुआ, जहां के दो बड़े अफसरान डीएम व एसएसपी को घटना के लिए जिम्‍मेदार ठहराते हुए उनका तबादला कर दिया गया, उस जिले की पुलिस रामवृक्ष के दाहिने व बाएं किसी हाथ को नहीं पकड़ सकी और मात्र खाना-पूरी करने तक सिमट कर रह गई।
जिन तेज-तर्रार एसएसपी बबलू कुमार और अनुभवी डीएम निखिल चंद्र शुक्‍ला को हवाई मार्ग के जरिए मथुरा भेजा गया, वो देखते रह गए और चंदन बोस तथा राकेश गुप्‍ता की गिरफ्तारी का श्रेय बस्‍ती व बदायूं की पुलिस ले गई।
क्‍या वाकई यह सब इत्‍तेफाक ही है अथवा इस सबके पीछे भी वही राजनीतिक ताकत काम कर रही है जो रामवृक्ष को दो साल तक संरक्षण देने में काम करती रही थी।
कहीं दो जांबाज अफसरों की हत्‍या के आरोपी चंदन बोस तथा रामवृक्ष के फायनेंसर राकेश गुप्‍ता सहित रामवृक्ष के पूरे गैंग और उसके संरक्षणदाताओं को बचाने के लिए ही तो यह ”सारे इत्‍तेफाक” नहीं हो रहे।
लगता तो ऐसा ही है क्‍योंकि अब तक पुलिस न तो उस असलाह को बरामद कर सकी है जिस असलाह से एसओ फरह संतोष यादव की हत्‍या हुई, न यह बता सकी है जब उसकी ओर से 200 राउंड फायर किए गए तो एक भी गोली किसी उपद्रवी को क्‍यों नहीं लगी जबकि राकेश गुप्‍ता की लाइसेंसी रायफल पुलिस को जवाहर बाग से मिल गई लेकिन रिवॉल्‍वर अब तक नहीं मिली।
नए एसएसपी बबलू कुमार ने यह तो मीडिया के समक्ष स्‍वीकार किया कि पुलिस की ओर 200 राउंड फायर किए गए लेकिन यह नहीं बताया कि फायर कहां तथा किसलिए किए गए।
मथुरा पुलिस ने तो घटना के 17 दिन बाद अब तक उन पुलिसकर्मियों के खिलाफ भी कोई कार्यवाही नहीं की है जो सत्‍याग्रह के नाम पर एकजुट हुए भेड़ियों के बीच मुकुल द्विवेदी को अकेला छोड़कर भाग खड़े हुए थे।
पुलिस के पास इस बात का भी शायद ही कोई जवाब हो कि जवाहर बाग में आगजनी करने वाले यदि कथित सत्‍याग्रही ही थे तो वह अपनी ही लगाई आग में कैसे जल गए और चंदन बोस, पूनम, राकेश यादव, रामवृक्ष का लड़का विवेक स्‍वाधीन यादव, वीरेश यादव व इनके जैसे अनेक दूसरे शातिर अपराधी कैसे बच निकलने में सफल रहे।
अब तक की पूछताछ से जो सामने आया है, उसके अनुसार जवाहर बाग की हिंसा के आरोपियों में से एकमात्र रामवृक्ष ही कथित तौर पर मारा गया है, बाकी सभी शातिर अपराधी बड़े इत्‍मीनान के साथ निकल गए।
अब जो पकड़े भी जा रहे हैं, वह भी अपने प्रभाव वाले दूसरे जनपदों में पकड़े जा रहे हैं ताकि मथुरा पुलिस सिर्फ खानापूरी करती रहे और कार्यवाही होती दिखाई तो दे किंतु नतीजा ढाक के तीन पात ही रहे।
अगर अब भी शहीद पुलिस अफसरों के परिजन अथवा मथुरा की जनता ऐसी कोई गलतफहमी पाले बैठी हो कि जवाहर बाग कांड का पूरा सच सामने आ पायेगा, तो उसे अपनी गलतफहमी दूर कर लेनी चाहिए क्‍योंकि उत्‍तर प्रदेश पुलिस इस इतने गंभीर व संगीन केस में भी उसी ढर्रे पर चल पड़ी है जिसके लिए वह पहचानी जाती है और जिसके कारण मुकुल द्विवेदी व संतोष यादव जैसे अफसरों को अपनी जान गंवानी पड़ती है।
सच तो यह है कि ”कोई शक्‍ति” लगातार इस पूरे कांड पर बारीकी से नजर रख रही है और पुलिस को हिदायत दे रही है कि उसे क्‍या करना है तथा कैसे करना है ताकि जवाहर बाग कांड के असली दोषियों को साफ बचाया जा सके।
विपक्षी दलों ने भी जवाहर बाग कांड पर एकसाथ चुप्‍पी साध ली है क्‍योंकि उनके हाथ अब राजनीति के लिए ”कैराना का सांप्रदायिक मुद्दा” लग चुका है। सांप्रदायिकता निश्‍चित ही हमेशा से राजनीतिज्ञों का पसंदीदा विषय रही है क्‍योंकि उससे जितना उबाल लाया जा सकता है, उतना दो पुलिस अफसरों की शहादत से संभव नहीं हो सकता। इस मामले में सारे राजनीतिक दल एक जैसे हैं। यूं भी यूपी में चुनावों की दुंदुभि बज चुकी है। चुनावों में ध्रुवीकरण के लिए आखिर जाति, धर्म, संप्रदाय की राजनीति ही काम आयेगी। जवाहर बाग में जो कुछ हुआ उसे किसी जाति, धर्म या संप्रदाय से जोड़ पाना संभव नहीं है। संभव होता तो पुलिस-प्रशासन इस तरह उसकी लीपापोती नहीं कर पाता जैसी कि अब की जा रही है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

रविवार, 5 जून 2016

बड़ा सवाल: कथित सत्‍याग्रहियों को Mathura में ”जवाहर बाग” ही क्‍यों दिया धरने के लिए ?

2 साल पहले Mathura में उद्यान विभाग की 280 एकड़ सरकारी जमीन पर कथित सत्‍याग्रहियों द्वारा लगाया गया मजमा 2 पुलिस अधिकारियों सहित 2 दर्जन लोगों को मौत की नींद सुलाने के बाद समाप्‍त तो हो गया, लेकिन यह मजमा अपने पीछे इतने सवाल छोड़ गया है जो वर्षों तक शासन और प्रशासन का पीछा करते रहेंगे।
मीडिया अपने स्‍तर से इन प्रश्‍नों को आज भी उछाल रहा है और शायद आगे भी उछालता रहे, किंतु अब उसमें वो ताकत नहीं रही जो शासन-प्रशासन को प्रश्‍नों का जवाब देने के लिए बाध्‍य कर सके।
दरअसल, पेशेवर मीडिया की हैसियत फिलहाल उस मदारी की तरह हो गई है जो अपनी डुगडुगी बजाकर लोगों की भीड़ तो इकठ्ठी कर सकता है किंतु उसकी झोली में नया कुछ दिखाने को होता नहीं है।
कल भी मथुरा कांड की रिपोटिंग करने आए एनडीटीवी के रिपोर्टर रवीश रंजन, स्‍टूडियो में बैठे रवीश कुमार को बता रहे थे कि कई बार फोन करने के बावजूद जिलाधिकारी मथुरा राजेश कुमार ने उनका फोन नहीं उठाया।
यह स्‍थिति अकेले किसी एक टीवी रिपोर्टर या अखबार से जुड़े व्‍यक्‍ति की नहीं है। यह स्‍थिति है पूरे मीडिया जगत की है।
सच्‍ची बात तो यह है कि अब शासन और प्रशासन में बैठे लोग मीडिया का इस्‍तेमाल केवल अपनी बात कहने के लिए करते हैं, बात सुनने के लिए नहीं।
मीडिया का सरोकार चूंकि सीधे जनता से होता है और वह वही प्रश्‍न उठाता है जिनके बारे में जनता की जिज्ञासा होती है इसलिए शासन-प्रशासन के लोग उनकी बात न सुनके सिर्फ अपनी बात पूरी करने के साथ उठ खड़े होते हैं जबकि कुछ वर्षों पहले तक ऐसा नहीं था।
तब मीडिया के प्रति भी शासन व प्रशासन की जवाबदेही थी और उसके द्वारा उठाए जाने वाले प्रश्‍नों का वो जवाब देता था। अब जवाबदेही किसी की रह ही नहीं गई, या यूं कहें कि जवाबदेही ओढ़कर कोई फंसना नहीं चाहता।
बहरहाल, इस सब के बावजूद यक्ष प्रश्‍न हमेशा खड़े होते रहे हैं और हमेशा खड़े होते रहेंगे।
mathuraजवाहर बाग प्रकरण में भी कई यक्ष प्रश्‍न खड़े हैं। इस प्रकरण की शुरूआत से समीक्षा की जाए तो सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि कथित सत्‍याग्रहियों को धरना देने के लिए ”जवाहर बाग” उपलब्‍ध होने का प्रस्‍ताव तत्‍कालीन जिलाधिकारी ने अपनी ओर से दिया था अथवा ऐसा कोई प्रस्‍ताव कथित सत्‍याग्रही खुद लेकर पहुंचे थे?
यह प्रश्‍न इसलिए महत्‍वपूर्ण हो जाता है कि उद्यान विभाग के 280 एकड़ क्षेत्र में फैले जवाहर बाग के अंदर धरना-प्रदर्शन करने की इजाजत न तो पहले कभी जिला प्रशासन द्वारा दी गई और न कथित सत्‍याग्रहियों के बाद किसी अन्‍य को इजाजत मिली।
ऐसे में यह सवाल बड़ा हो जाता है कि धरने के लिए आखिर जवाहर बाग ही क्‍यों चुना गया ?
जवाहर बाग न तो मुख्‍य सड़क के किनारे है और न वहां बैठकर जनता से सीधे संवाद किया जा सकता है, फिर धरने के लिए उसका चयन समझ से परे है।
जवाहर बाग को धरने के लिए चयनित करने की तह में यदि जाया जाए तो एक बात जरूर सामने आती है कि जवाहर बाग ही नहीं, मथुरा स्‍थित उद्यान विभाग की सभी जमीनों पर हमेशा ऐसे तत्‍वों की नजर रही है जो शासन-प्रशासन के सहयोग से उन्‍हें कब्‍जाना चाहते हैं।
इस मामले में सबसे बड़ा उदाहरण मथुरा-वृंदावन रोड स्‍थित उद्यान विभाग की करीब 43.15 एकड़ वह जमीन है जिस पर आज ”वात्‍सल्‍य ग्राम” बसा हुआ है। कभी विश्‍व हिन्दू परिषद् की फायरब्रांड नेत्री के रूप में पहचान रखने वाली साध्‍वी ऋतम्‍भरा का ”वात्‍सल्‍य ग्राम”। साध्‍वी ऋतम्‍भरा को उद्यान विभाग की यह बेशकीमती जमीन मात्र 1 रुपया प्रति एकड़ के सालाना पट्टे पर प्रदेश की तत्‍कालीन भाजपा सरकार ने दी थी।
साध्‍वी ऋतम्‍भरा के लिए पहले इस जमीन के पट्टे पर नवंबर 1992 में यूपी के तत्‍कालीन मुख्‍यमंत्री कल्‍याण सिंह ने हस्‍ताक्षर किए थे किंतु बाद में मुलायम सिंह सरकार ने यह पट्टा निरस्‍त कर दिया। इसके बाद जब वर्ष 1999 में रामप्रसाद गुप्‍त के नेतृत्‍व वाली भाजपा की सरकार यूपी पर काबिज हुई तो ऋतम्‍भरा के लिए आखिर इस 43.15 एकड़ जमीन का पट्टा कर दिया गया।
तब से साध्‍वी ऋतम्‍भरा का यही स्‍थाई निवास है और यहीं वह अपने धार्मिक व राजनीतिक क्रिया-कलापों को अंजाम देती हैं। समाज सेवा के नाम पर यदि उनके बारे में मथुरा की जनता से पूछा जाए तो शायद ही कोई कुछ बता पायेगा क्‍योंकि आज तक उन्‍होंने समाज के लिए कोई उल्‍लेखनीय काम किया ही नहीं। उद्यान विभाग की करीब 44 एकड़ जमीन अब पूरी तरह साध्‍वी ऋतम्‍भरा की निजी जागीर बन चुकी है और उसमें उनकी बिना इजाजत के कोई एक पल नहीं ठहर सकता।
जिस देश की आबादी का एक बड़ा हिस्‍सा अपनी पूरी जिंदगी दो कमरों का निजी छोटा सा मकान बनाने के सपने देखते बिता देता हो, उस देश में राजनीतिक संरक्षण प्राप्‍त लोग हजारों मकान बनने लायक जमीन पर इसी तरह कुंडली मारकर बैठे हैं और उनसे कोई सवाल नहीं पूछा जाता।
इसी तरह बात कांग्रेस के शासन में चाहे हरियाणा, पंजाब, राजस्‍थान और दिल्‍ली के अंदर नेशनल हेरल्‍ड अखबार के नाम पर आवंटित बेशकीमती जमीनों की हो अथवा सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट बाड्रा को व्‍यापार करने के लिए हेरफेर करके दी गई जमीनों की, सबका सार यही निकलता है कि जिसकी लाठी, उसकी भैंस। सत्‍ता का लाभ सत्‍ता पर काबिज लोग तो उठाते ही हैं, सत्‍ता के गलियारों तक पैठ बनाने वाले लोग भी खूब उठाते हैं।
इन हालातों में खुद को स्‍वाधीन भारत सुभाष सेना का स्‍वयंभू नेता बताने वाला और बाबा जयगुरुदेव का अनुयायी रामवृक्ष यादव यदि 280 एकड़ के जवाहर बाग को पूरी तरह कब्‍जाने का सपना देखने लगा था, तो कौन सी बड़ी बात थी।
आखिर उसके गुरू बाबा जयगुरुदेव का किसी ने क्‍या बिगाड़ लिया। न तो बाबा जयगुरुदेव के जीते जी उनके द्वारा कब्‍जाई गई सैकड़ों करोड़ रुपए कीमत की जमीन को कोई कब्‍जामुक्‍त करा पाया, और न उनके मरने बाद किसी की हिम्‍मत है कि कोई उधर आंख उठाकर भी देखे। क्‍या यह सब सत्‍ताधारियों के संरक्षण बिना संभव है। क्‍या सत्‍ताधारी लोगों की इस सब में परोक्ष अथवा अपरोक्ष भागीदारी नहीं है।
रामवृक्ष यादव के पीछे कोई तो ऐसी ताकत थी जिसके बल पर वह जिला प्रशासन की नाक के नीचे सैनिक क्षेत्र में 280 एकड़ की जमीन को कब्‍जाने की जुर्रत कर पाया। कोई तो था जिसके कारण जिला प्रशासन उसके सामने तब भी मिमियाता रहा जब कोर्ट ने अधिकारियों के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू कर दी थी।
कोई तो रहा होगा जो हजारों लोगों के खाने-पीने का इंतजाम कर रहा था और उसके लिए अंदर ही अंदर हथियारों का बंदोबस्‍त भी करा रहा था।
बस, यही वो सवाल हैं जिनके उत्‍तर यदि समय रहते मिल जाएं तो न किसी जांच की आवश्‍यकता रह जाती है और न जांच कमीशन की।
बेहद तल्‍ख लेकिन सच्‍ची बात तो यह है कि जवाहर बाग को अब भी कब्‍जामुक्‍त कराने में न हाईकोर्ट के आदेश-निर्देश किसी काम आए और न जिला प्रशासन काम आया। जवाहर बाग यदि अतिक्रमणकारियों के कब्‍जे से मुक्‍त हुआ है तो सिर्फ और सिर्फ एसपी सिटी मुकुल द्विवेदी तथा एसओ फरह संतोष यादव की शहादत से।
यदि जवाहर बाग को कब्‍जामुक्‍त कराने के लिए इन दोनों पुलिस अफसरों ने अपनी जान नहीं गंवाई होती तो निश्‍चित जानिए कि आज भी रामवृक्ष यादव अपने गुर्गों के साथ जवाहर बाग पर काबिज होता और पुलिस प्रशासन किसी नए बहाने के साथ बाहर खड़ा होकर डंडे फटकार रहा होता।
मुकुल द्विवेदी और संतोष यादव की शहादत ने जवाहर बाग को तो कब्‍जामुक्‍त करा ही दिया, साथ ही उन लोगों के अरमानों पर भी पानी फेर दिया जो इस बेशकीमती जमीन को हड़पने की पूरी प्‍लानिंग कर चुके थे।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

कथित सत्‍याग्रहियों को 99 साल के पट्टे पर जवाहर बाग देने की तैयारी कर चुकी थी Akhilesh Government

-एडवोकेट विजयपाल तोमर के प्रयासों ने नहीं पूरी होने दी Akhilesh Government की मंशा
-प्रदेश सरकार का संरक्षण ही बना हुआ था प्रशासन के ढीले रवैये की वजह
-विजयपाल तोमर ने अवमानना की कार्यवाही न की होती तो अब भी खाली न होता जवाहर बाग
मथुरा। 280 एकड़ में फैले उद्यान विभाग के जिस ”जवाहर बाग” से अवैध कब्‍जा हटवाते हुए कल दो जांबाज पुलिस अफसर शहीद हो गए और दर्जनों पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल हुए हैं, उसे कथित सत्‍याग्रहियों को 99 साल के पट्टे पर देने की प्रदेश सरकार ने पूरी तैयारी कर ली थी।
इस बात का दावा बार एसोसिएशन मथुरा के पूर्व अध्‍यक्ष और इस पूरे मामले को इलाहाबाद हाईकोर्ट तक ले जाने वाले एडवोकेट विजयपाल सिंह तोमर ने किया है।
एडवोकेट विजयपाल सिंह तोमर का कहना है कि यदि वह समय रहते जवाहर बाग पर अवैध कब्‍जे के मामले को हाईकोर्ट में नहीं ले जाते तो प्रदेश सरकार इस बेशकीमती सरकारी जमीन का पट्टा मात्र 1 रुपया सालाना प्रति एकड़ के हिसाब से कथित सत्‍याग्रहियों के नाम कर चुकी होती।
dmएडवोकेट विजयपाल तोमर को इस आशय की जानकारी सारा मामला हाईकोर्ट में ले जाने के तत्‍काल बाद ही हो गई थी और इसीलिए हाईकोर्ट ने उस पर कड़ा संज्ञान लेते हुए शासन प्रशासन को जवाहर बाग खाली कराने के आदेश दिए।
एडवोकेट विजयपाल तोमर के अनुसार मथुरा का जिला प्रशासन पूरी तरह प्रदेश सरकार के दबाव में था और इसीलिए वह चाहते हुए तथा कोर्ट के सख्‍त आदेश होने के बावजूद कथित सत्‍याग्रहियों के खिलाफ कठोर कार्यवाही नहीं कर पा रहा था जबकि प्रशासन के खिलाफ कोर्ट की अवमानना का मामला भी शुरू हो चुका था।
विजयपाल तोमर का कहना है कि कल भी जवाहर बाग को कथित सत्‍याग्रहियों के कब्‍जे से मुक्‍त कराने में अहम भूमिका पुलिस व आरएएफ के उन जवानों ने निभाई है, जो अभी-अभी ट्रेनिंग पूरी करके आए हैं और जिन्‍होंने अपने अफसरों को कथित सत्‍याग्रहियों की एकतरफा फायरिंग में घायल होते व दम तोड़ते देखा था अन्‍यथा पुलिस प्रशासन तो कल भी जवाहर बाग को शायद ही कब्‍जामुक्‍त करा पाता।
हालांकि इस सबके बावजूद एडवोकेट विजयपाल तोमर मथुरा के जिलाधिकारी राजेश कुमार तथा एसएसपी राकेश सिंह को इस बात के लिए धन्‍यवाद देते हैं कि शासन स्‍तर से भारी दबाव में होने पर भी दोनों अधिकारियों ने जवाहर बाग को खाली कराने के लिए हरसंभव प्रयास किया। यह बात अलग है कि शासन के दबाव में वह कब्‍जाधारियों के खिलाफ उतनी सख्‍त कार्यवाही नहीं कर सके, जितनी सख्‍ती की दरकार थी।
एडवोकेट विजयपाल तोमर का कहना है कि यदि पूर्व में ही कब्‍जाधारियों के ऊपर आवश्‍यक बल प्रयोग किया गया होता तो न उन्‍हें इतना असलाह जमा करने का अवसर मिलता और न वो पुलिस प्रशासन पर एकतरफा हमलावर होने की हिम्‍मत जुटा पाते।
जो भी हो, लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि जवाहर बाग को खाली करवाने में एडवोकेट विजयपाल तोमर ने बड़ी भूमिका निभाई क्‍योंकि वह जवाहर बाग पर कब्‍जा होने के कुछ समय बाद ही इस मामले को इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय ले गए। उनकी याचिका पर हाईकोर्ट ने 20 मई 2015 को ही सरकारी बाग खाली कराने के आदेश शासन-प्रशासन को दे दिए थे किंतु शासन के दबाव में प्रशासन यथासंभव नरमी बरतता रहा।
हारकर विजयपाल तोमर ने जब शासन-प्रशासन के खिलाफ 22 जनवरी 2016 को न्‍यायालय की अवमानना का केस शुरू किया, तब शासन प्रशासन सक्रिय हुआ लेकिन उसके बाद भी 4 महीने पर्याप्‍त फोर्स का इंतजाम न होने के बहाने गुजार दिए जिससे कब्‍जाधारियों को अपनी ताकत बढ़ाने तथा अवैध असलाह जमा करने का पूरा मौका मिला।
policeएडवोकेट विजयपाल तोमर की बात में इसलिए भी दम लगता है कि कब्‍जा करने वाले कथित सत्‍याग्रहियों का संबंध बाबा जयगुरुदेव में आस्‍था रखने वाले एक गुट से ही बताया जाता है। हालांकि जयगुरुदेव की विरासत पर काबिज लोग इस बात का खंडन करते हैं।
उल्‍लेखनीय है कि जयगुरूदेव धर्म प्रचारक संस्‍था की मथुरा में बेहिसाब चल व अचल संपत्‍ति है। जयगुरूदेव के जीवित रहते तथा अब उसके बाद भी जिन जमीनों पर आज जयगुरूदेव धर्म प्रचारक संस्‍था काबिज है, उनमें से अधिकांश जमीन विवादित हैं और उनके मामले विभिन्‍न न्‍यायालयों में लंबित हैं। इन जमीनों में सर्वाधिक जमीन ओद्यौगिक एरिया की है जिसे कभी उद्योग विभाग ने विभिन्‍न उद्यमियों के नाम एलॉट किया था।
जवाहर बाग पर कब्‍जा करने वाले कथित सत्‍याग्रहियों की प्रमुख मांग में यह भी शामिल था कि जिला प्रशासन उन्‍हें बाबा जयगुरुदेव का मृत्‍यु प्रमाणपत्र उपलब्‍ध कराए। कथित सत्‍याग्रहियों का कहना था कि बाबा जयगुरूदेव की मौत हुई ही नहीं है और जिस व्‍यक्‍ति को उनके नाम पर मृत दर्शाया गया था, वह कोई और था। बाबा जयगुरूदेव को उनके कथित अनुयायियों ने उनकी सारी संपत्‍ति हड़पने के लिए कहीं गायब कर दिया है।
कथित सत्‍याग्रहियों की इस मांग से यह तो साबित होता है कि किसी न किसी स्‍तर पर बाबा जयगुरुदेव तथा उनकी धर्म प्रचारक संस्‍था से कथित सत्‍याग्रहियों का कोई न कोई संबंध जरूर था अन्‍यथा उन्‍हें बाबा जयगुरुदेव की मौत से लेना-देना क्‍यों होता।
इस सबके अतिरिक्‍त सरकारी जमीन कब्‍जाने की उनकी कोशिश भी जयगुरूदेव व उनके अनुयायियों की मंशा से मेल खाती है।
अब सवाल यह खड़ा होता है कि जवाहर बाग को 2 साल से कब्‍जाए बैठे कथित सत्‍याग्रहियों के पास हर दिन हजारों लोगों के लिए रसद का इंतजाम कहां से हो रहा था। कौन कर रहा था यह इंतजाम ?
इस सवाल का जवाब आज 2 साल बाद भी जिला प्रशासन के पास क्‍यों नहीं है। यही वो सवाल है जिससे एडवोकेट विजयपाल तोमर के इस दावे की पुष्‍टि होती है कि कथित सत्‍याग्रहियों को प्रदेश सरकार का संरक्षण प्राप्‍त था और प्रदेश सरकार जवाहर बाग को उन्‍हें 99 साल के पट्टे पर देने की पूरी तैयारी कर चुकी थी।
यूं भी कथित सत्‍याग्रहियों का नेता कभी बाबा जयगुरुदेव के काफी निकट रहा था, इस बात की पुष्‍टि तो हो चुकी है लिहाजा आज जयगुरुदेव की विरासत पर काबिज लोग भले ही कथित सत्‍याग्रहियों से अपना कोई संबंध न होने की बात कहें लेकिन उनकी बात पूरी तरह सच नहीं है।
कथित सत्‍याग्रहियों की कार्यशैली से साफ जाहिर था कि वह उसी तरह जवाहर बाग की 280 एकड़ सरकारी जमीन पर काबिज होना चाहते थे जिस तरह बाबा जयगुरुदेव के रहते उनके अनुयायियों ने वर्षों पूर्व मथुरा के इंडस्‍ट्री एरिया तथा नेशनल हाईवे नंबर- 2 के इर्द-गिर्द की सैकड़ों एकड़ जमीन कब्‍जा ली थी और जिस पर आज तक मुकद्दमे चल रहे हैं।
स्‍वयं बाबा जयगुरुदेव का भी आपराधिक इतिहास था।
मूल रूप से इटावा जनपद के बकेवर थाना क्षेत्र अंतर्गत गांव खितौरा निवासी बाबा जयगुरुदेव के पिता का नाम रामसिंह था। बाबा पर उनके गृह जनपद ही नहीं, लखनऊ में भी आपराधिक मुकद्दमे दर्ज हुए और उनमें सजा हुई। मुकद्दमा अपराध संख्‍या 226 धारा 379 थाना कोतवाली इटावा के तहत बाबा को 13 अक्‍टूबर सन् 1939 में छ: माह के कारावास की सजा हुई। इसके बाद लखनऊ के थाना वजीरगंज में अपराध संख्‍या 318 धारा 381 के तहत 25 नवम्‍बर सन् 1939 को डेढ़ वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई।
यह बात दीगर है कि बाबा जयगुरुदेव ने जब से आध्‍यात्‍मिक दुनिया में खुद को स्‍थापित किया, तब से कभी कानून के लंबे हाथ भी उनके गिरेबां तक नहीं पहुंच सके।
इस दौरान एक सभा में खुद को नेताजी सुभाष चन्‍द्र बोस बताने पर बाबा का भारी अपमान हुआ और आपातकाल में उन्‍हें जेल की हवा भी खानी पड़ी लेकिन उसके बाद वोट बैंक की राजनीति के चलते इंदिरा गांधी तक बाबा के दर पर आने को मजबूर हुईं।
गौरतलब है कि बाबा जयगुरुदेव और उनकी धर्मप्रचारक संस्‍था से समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता और मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव के चाचा शिवपाल यादव का नाम जुड़ता रहा है। शिवपाल यादव समय-समय पर बाबा के पास आते भी रहते थे। कहा जाता है कि बाबा के उत्‍तराधिकारी के तौर पर उनके ड्राइवर पंकज को काबिज कराने में भी शिवपाल यादव की अहम भूमिका रही है। वही पंकज जो आज पंकज बाबा के नाम से बाबा के उत्‍तराधिकारी बने बैठे हैं।
प्रदेश की सत्‍ता पर काबिज समाजवादी कुनबे की बाबा जयगुरुदेव से निकटता का एक बड़ा कारण बाबा जयगुरुदेव का सजातीय होना भी रहा है।
उधर जिस ग्रुप से कथित सत्‍याग्रहियों का संबंध बताया जा रहा है, उस ग्रुप के तार उस उमाकांत तिवारी से भी जाकर जुड़ते हैं जो कभी बाबा जयगुरुदेव का दाहिना हाथ हुआ करता था और जिसकी मर्जी के बिना बाबा जयगुरुदेव एक कदम आगे नहीं बढ़ते थे।
जिस दौरान बाबा जयगुरूदेव और उनकी संस्‍था का उमाकांत तिवारी सर्वेसर्वा हुआ करता था, उन दिनों भी शिवपाल यादव का मथुरा स्‍थित जयगुरुदेव आश्रम में आना-जाना था इसलिए ऐसा संभव नहीं है कि शिवपाल यादव तथा समाजवादी कुनबा उमाकांत तिवारी से अपरिचित हो।
बताया जाता है कि जवाहर बाग 99 साल के पट्टे पर दूसरे गुट को दिलाने के पीछे भी समाजवादी कुनबे की यही मंशा थी कि एक ओर इससे जहां दोनों गुटों के बीच का विवाद हमेशा के लिए खत्‍म हो जायेगा, वहीं दूसरी ओर दूसरा गुट भी इस तरह समाजवादी पार्टी के कब्‍जे में होगा। पूर्व में भी समाजवादी पार्टी द्वारा दोनों गुटों के बीच इसीलिए समझौते के प्रयास किए गए बताए।
दरअसल, जवाहर बाग की 280 एकड़ जमीन कलक्‍ट्रेट क्षेत्र में आगरा रोड पर है और इसलिए बेशकीमती है। पूरी जमीन फलदार वृक्षों से अटी पड़ी है और इससे सालाना करोड़ों रुपए की आमदनी होती रही है। यह जमीन सेना की छावनी के क्षेत्र से भी जुड़ी है और पूरा प्रशासनिक अमला इसी के इर्द-गिर्द सिमटा हुआ है। यहां तक कि जिले की जुडीशियरी भी यहीं रहती है।
अब जरा विचार कीजिए कि ऐसे क्षेत्र में कैसे तो अवैध कब्‍जा हो गया और कैसे कथित सत्‍याग्रहियों ने इतनी ताकत इकठ्ठी कर ली कि पुलिस-प्रशासन पर बेखौफ हमलावर हो सकें।
जाहिर है कि यह सब किसी सामर्थ्‍यवान का संरक्षण पाए बिना संभव नहीं है।
कल एसपी सिटी मुकुल द्विवेदी तथा एसओ फरह संतोष कुमार सिंह की शहादत के बाद सक्रिय हुए पुलिस प्रशासन ने जितनी तादाद में जवाहर बाग से अवैध असलाह बरामद किया है, वह न तो एक-दो दिन में एकत्र होना संभव है और ना ही किसी के संरक्षण बिना संभव है। पुलिस प्रशासन की ठीक नाक के नीचे इतनी बड़ी संख्‍या में अवैध हथियारों का जखीरा इकठ्ठा कर लेना, इस बात का ठोस सबूत है कि कथित सत्‍याग्रहियों को उच्‍च स्‍तर से संरक्षण प्राप्‍त था।
जहां तक सवाल कल के घटनाक्रम का है तो आज उत्‍तर प्रदेश के डीजीपी जाविद अहमद ने प्रेस कांफ्रेस में मथुरा हिंसा के तहत कुल 24 लोगों के मारे जाने की पुष्‍टि की है।
उधर अपुष्‍ट खबरों तथा अफवाहों का बाजार गर्म है। कोई कह रहा है सैकड़ों की संख्‍या में सत्‍याग्रही भी मारे गए हैं और उनकी लाशें गायब कर दी गई हैं। कोई कह रहा है कि जिन पुलिसकर्मियों को सत्‍याग्रही उठा ले गए थे, उनका अब तक पता नहीं है।
इसी प्रकार कथित सत्‍याग्रहियों के नेता रामवृक्ष यादव की भी कोई खबर जिला प्रशासन नहीं दे रहा इसलिए उसे लेकर भी अफवाहों का बाजार गर्म है। कहा जा रहा है कि उसे कल ही पुलिस ने गोलियों से भून दिया था। अपने अफसरों की शहादत से आक्रोशित पुलिसजनों ने उसके ऊपर कारतूसों की पूरी मैगजीन खाली कर दी थी। एक अफवाह यह भी है कि हाईवे स्‍थित नीरा राडिया के नयति हॉस्‍पीटल में भी लाशों का ऐसा ढेर देखा गया है जिसकी शिनाख्‍त करने वाला कोई नहीं है।
सच्‍चाई क्‍या है और कभी वह सामने आयेगी भी या नहीं, इस बारे में तो कुछ भी कहना मुमकिन नहीं है लेकिन एक बात जरूर कही जा सकती है कि पुलिस-प्रशासन पिछले चार महीनों से जिस मंथर गति के साथ कार्यवाही कर रहा था, उसके पीछे कोई न कोई शक्‍ति जरूर थी। चार महीने की कोशिशों के बाद भी कथित सत्‍याग्रहियों को खदेड़ने के लिए शासन स्‍तर से पर्याप्‍त सुरक्षाबल उपलब्‍ध न कराना, किसी न किसी सोची-समझी रणनीति की ओर इशारा करता है।
मथुरा की जनता और सत्‍याग्रहियों के खिलाफ पिछले काफी समय से आवाज बुलंद करने वाले विभिन्‍न सामाजिक व राजनीतिक संगठनों का भी मानना है कि यदि सारा मामला मथुरा की पुलिस व प्रशासन के जिम्‍मे छोड़ दिया जाता और वह बिना दबाव के अपने स्‍तर से कार्यवाही करते तो न 2 जांबाज पुलिस अफसरों को अपनी जान से हाथ धोने पड़ते और न इतना रक्‍तपात हुआ होता।
पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों के बीच से भी छनकर आ रही खबरें इस बात की पुष्‍टि करती हैं कि 2017 में प्रस्‍तावित प्रदेश के विधानसभा चुनाव तथा उनके मद्देनजर वोट की राजनीति को देखते हुए शासन स्‍तर से जिला प्रशासन को इस आशय की स्‍पष्‍ट हिदायत दी गई थी कि कथित सत्‍याग्रहियों के खिलाफ किसी प्रकार की सख्‍ती न बरती जाए।
प्रदेश सरकार को डर था कि जवाहर बाग को खाली कराने के लिए बरती गई सख्‍ती 2017 के चुनावों में वोट की राजनीति को प्रभावित कर सकती है और उसका लाभ विपक्षी दल उठा सकते हैं।
पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों के बीच की इन खबरों में इसलिए भी सत्‍यता मालूम होती है क्‍योंकि एक चारदीवारी के अंदर सिमटे बैठे मात्र तीन-चार हजार कथित सत्‍याग्रहियों के सामने जिस तरह मथुरा का जिला प्रशासन असहाय व लाचार नजर आ रहा था, वह किसी की भी समझ से परे था। ऐसा लग रहा था जैसे पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी अपनी कुर्सी व मथुरा में अपनी तैनाती बचाने के लिए ही कवायद कर रहे थे, न कि 280 एकड़ में फैले सरकारी जवाहर बाग को खाली कराने की कोशिश में लगे थे।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

मंगलवार, 20 जनवरी 2015

टोंटा हत्‍याकांड: पुलिस द्वारा बताए गये ''मास्‍टर माइंड'' में तो पर्याप्‍त ''माइंड'' तक नहीं

मथुरा। मथुरा जिला कारागार में गोलियां चलने से एक की मौत तथा दो के घायल हो जाने और फिर एक घायल राजेश टोंटा को इलाज के लिए पुलिस अभिरक्षा में आगरा ले जाते वक्‍त चंद घंटों बाद ही नेशनल हाईवे पर भून डालने जैसी संगीन वारदातों का महज दो दिन के अंदर खुलासा करके उत्‍तर प्रदेश पुलिस ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि सूबे में चाहे किसी की सत्‍ता हो, चाहे कितने ही निजाम बदल जाएं किंतु वह न कभी बदली है और न बदलेगी।
कानून का राज कायम करने की बात कहकर सत्‍ता में आई समाजवादी पार्टी बेशक पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों को ताश के पत्‍तों की तरह फेंटकर कानून-व्‍यवस्‍था दुरुस्‍त करने का भ्रम पाल लेती हो किंतु सच्‍चाई यह है कि इससे सिर्फ अधिकारियों की सूरतें ही बदलती हैं, सीरत न बदली है और न बदलने की कोई उम्‍मीद नजर आती है।
आईजी जोन आगरा सुनील गुप्‍ता की मौजूदगी में कल देर शाम मथुरा की एसएसपी मंजिल सैनी ने पूरे प्रदेश को हिला देने वाली इन वारदातों का खुलासा करके पुलिस को भले ही दबाव मुक्‍त कर लिया हो लेकिन गैंगवार की नई पटकथा लिखे जाने का रास्‍ता साफ कर दिया।
दरअसल, अपने ऊपर उठ रहे तमाम सवालों के जवाब देने और जेल के अंदर व बाहर एक ही दिन में हुईं इतनी बड़ी वारदातों का पूरी तरह खुलासा करने की बजाय पुलिस ने जिस ''सॉफ्ट टारगेट गोपाल यादव'' को ''मास्‍टर माइंड'' बताकर सारा मामला रफा-दफा करने की कोशिश की है, उसमें तो इतनी बड़ी प्‍लानिंग करने लायक ''माइंड'' ही नहीं है।
चूंकि गोपाल यादव हाथरस में राजेश टोंटा के घर पर की गई ब्रजेश मावी की हत्‍या का चश्‍मदीद है तथा ब्रजेश मावी का दोस्‍त रहा है और मावी का शव बरामद करने की कवायद में मथुरा पुलिस उसे महीनों अपने साथ लेकर घूमती रही है इसलिए वह पुलिस के लिए न केवल आसानी से उपलब्‍ध था बल्‍कि सॉफ्ट टारगेट भी था लिहाजा उसे मास्‍टर माइंड बनाकर पेश कर दिया गया जबकि राजेश टोंटा जैसे कुख्‍यात व शातिर अपराधी को इस तरह ठिकाने लगाने की प्‍लानिंग वाकई बहुत तेज दिमाग व दुस्‍साहसी अपराधी ही कर सकता है।
पुलिस की कहानी पर यदि कुछ देर के लिए भरोसा कर भी लिया जाए तो उसके अनुसार गोपाल यादव ने बंदी रक्षक कैलाश गुप्‍ता के हाथों दीपक वर्मा के पास जेल में एक असलहा तथा एक लाख दस हजार रुपए भिजवाये जिसमें से उसने अपने लिए तय 20 हजार रुपए काटकर 90 हजार रुपए व असलहा दीपक को दे दिए।
17 तारीख को दोपहर बाद जेल में चली गोलियों से एक पक्ष के राजेश टोंटा व उसका साथी राजकुमार शर्मा घायल हो गये और दूसरे पक्ष का अक्षय सोलंकी मारा गया।
यहां गौर करने वाली बात यह है कि यदि मास्‍टर माइंड गोपाल यादव ने बंदी रक्षक कैलाश गुप्‍ता के हाथों जेल में दीपक वर्मा के पास मात्र एक हथियार ही पहुंचाया था तो फिर क्‍या सारे बदमाश बारी-बारी से एक ही हथियार का इस्‍तेमाल करते रहे। वो भी तब जब कि दीपक वर्मा, दीपक राणा व अक्षय सोलंकी को ब्रजेश मावी पक्ष से बताया जा रहा है और राजेश टोंटा के साथ राजकुमार शर्मा आदि को बताया गया है।
पुलिस के अनुसार राजेश टोंटा ने ही अक्षय सोलंकी पर गोली चलाई थी, तो पुलिस ने अब तक यह क्‍यों नहीं बताया कि राजेश टोंटा के पास असलहा कहां से आया और उसके पास असलहा पहुंचाने वाले कौन लोग थे।
जेल के अंदर से भी जो जानकारी मिल रही है उसके अनुसार गोलियां चलाने में दोनों ओर से तीन असलाहों का इस्‍तेमाल हुआ लेकिन पुलिस ने दो असलहा ही बरामद दिखाये हैं।
पुलिस ने तो दो असलहा बरामद करने के बावजूद अपनी कहानी में यह बताया है कि दीपक वर्मा का असलहा गिर जाने के बाद टोंटा ने उसी असलहा से अक्षय को गोली मारी। पुलिस की इस कहानी पर भरोसा किया जाए तो टोंटा को क्‍लीनचिट मिल जाती है जबकि पूर्व में पुलिस ने कहा था कि टोंटा ने ही फायरिंग शुरू की थी और उसी ने अक्षय को मारकर खुद को घायल किया।
अब जेल से बाहर की पुलिसिया कहानी पर ध्‍यान दें तो उसके अनुसार जेल के अंदर हुई फायरिंग में टोंटा के बच निकलने की जानकारी होने के बाद गोपाल व अजय चौधरी ने मावी के वफादार साथियों को सूचित करके उसे फिर ठिकाने लगाने की तैयारी की और मौका मिलते ही नेशनल हाईवे पर रात करीब 11 बजे तब छलनी कर दिया जब उसे पुलिस अभिरक्षा में उपचार के लिए आगरा ले जाया जा रहा था। 
पुलिस ने मौके से देशी तमंचों के खोखे बरामद दिखाये हैं और मास्‍टर माइंड गोपाल के कब्‍जे से भी एक तमंचा बरामद किया है।
यहां पुलिस से कोई यह पूछने वाला नहीं है कि राजेश टोंटा को जेल के अंदर ठिकाने लगाने के लिए नाइन एमएम के प्रतिबंधित बोर वाला असलहा भेजने वाला गोपाल और उसके साथी नेशनल हाईवे पर उसे मारने के लिए क्‍या देशी तमंचों का इस्‍तेमाल करने की मूर्खता करेंगे?
गौरतलब है कि जेल के अंदर पुलिस ने जो दो असलहा बरामद किये हैं, वह दोनों नाइन एमएम के हैं।
मजे की बात यह भी है कि पुलिस ने वारदात का खुलासा तो कर दिया लेकिन अब तक इस बात का खुलासा नहीं कर पाई कि मौके पर मिला AK-47 का खोखा किसकी गोली का था। पहले पुलिस कह रही थी कि बदमाशों ने  AK-47 का भी इस्‍तेमाल किया लेकिन जब मास्‍टर माइंड गोपाल ने कहा कि उनमें से किसी के पास ऐसा कोई हथियार नहीं था तो पुलिस कहने लगी कि अभिरक्षा में चल रहे एसओ के हमराह पर AK-47 थी और उसी ने फायर किया था। इस बारे में गोपाल की मानें तो पुलिस की ओर से उनके ऊपर कोई गोली चलाई ही नहीं गई।
यहां नया सवाल एक और खड़ा हो जाता है कि क्‍या किसी एसओ का हमराह सिपाही AK-47 जैसा हथियार रखने के लिए अधिकृत होता है और क्‍या इस सिपाही को यह हथियार दिया गया था? 
सच तो यह है कि ब्रजेश मावी की राजेश टोंटा के हाथरस स्‍थित घर पर की गई हत्‍या के बाद उसका शव बरामद करने के लिए मथुरा पुलिस गोपाल को महीनों अपने साथ लेकर घूमती रही थी और इसलिए गोपाल यादव को पूरा पुलिस महकमा पहचानता था। वह ब्रजेश मावी का बचपन का दोस्‍त है, इस बात से भी पुलिस परिचित हो चुकी थी। पुलिस उसे कभी भी बुला लेती थी और फिर छोड़ भी देती थी इसलिए गोपाल यादव उसके लिए सहज उपलब्‍ध था। वह उसके लिए इस मामले में भी सॉफ्ट टारगेट साबित हो सकता है, यह समझते पुलिस को देर नहीं लगी। हालांकि उससे पहले पुलिस ने ब्रजेश मावी के अधिवक्‍ता रहे दो लोगों को कोतवाली बुलाकर कहानी का ताना बाना बुनने की कोशिश की किंतु उसमें बार एसोसिएशन मथुरा द्वारा हंगामा काटे जाने के बाद पुलिस को दोनों अधिवक्‍ता छोड़ने पड़े और उसके बाद पुलिस ने गोपाल यादव को लेकर काम करना शुरू कर दिया।
इसमें कोई दो राय नहीं कि इस तरह पुलिस ने फिलहाल अपने ऊपर पड़ रहे भारी दबाव से खुद को मुक्‍त कर राहत की सांस ली होगी लेकिन इससे उसने फिर किसी बड़ी वारदात का रास्‍ता भी साफ कर दिया क्‍योंकि इससे असली मास्‍टर माइंड को बिना किसी प्रयास के बड़ा मौका मिलना स्‍वाभाविक है।
ब्रजेश मावी के बाद राजेश टोंटा मारा गया, अक्षय सोलंकी भी काम आ गया परंतु अभी राजकुमार शर्मा, दीपक वर्मा, दीपक राणा तथा लारेंस जैसे दोनों पक्ष के तमाम कुख्‍यात अपराधी बाकी हैं और वह वर्चस्‍व की इस लड़ाई में अपनी-अपनी भूमिका साबित करने से पीछे नहीं हटने वाले।
तय है कि जिस गैंगवार का आगाज़ हाथरस में राजेश टोंटा के घर से शुरू होकर मथुरा जिला कारागार के अंदर और फिर नेशनल हाईवे पर राजेश टोंटा की हत्‍या से 17 जनवरी 2015 को हुआ है, उसका अंजाम शेष है। वह कब और किस रूप में सामने आयेगा, यह बताना चाहे मुश्‍किल हो पर इतना आसानी से कहा जा सकता है कि होगा बहुत खौफनाक। शायद 17 तारीख से भी अधिक खौफनाक।
तो इंतजार कीजिए तथा देखिए कि पुलिस और क्‍या-क्‍या गुल खिलाती है।
एक करोड़ की रकम लुटने पर दो लाख बरामद दिखाकर अपनी पीठ खुद थपथपा लेने तथा ईनाम इकराम भी हासिल कर लेने का उसका शगल कोई नया नहीं है और न नई है उसकी कांटे से कांटा निकालने की थ्‍योरी।
कानून-व्‍यवस्‍था जाए भाड़ में, वह अपना शगल इसी प्रकार पूरा करती रहेगी और इसी थ्‍योरी पर काम करके वाहवाही भी लूटेगी।
उसके लिए गोपाल यादव जैसे सॉफ्ट टारगेट्स की न कभी कहीं कोई कमी रही है और न रहेगी क्‍योंकि माइंडलेस को मास्‍टर माइंड साबित करना उसे बखूबी आता है।
-लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष             

रविवार, 18 जनवरी 2015

पुलिस ने ही तो ठिकाने नहीं लगा दिया टोंटा?





मथुरा।  कल दोपहर बाद मथुरा जिला कारागार में जिस अंदाज से गैंगवार का आगाज़ हुआ, उसका अंजाम तो लगभग वही होना था जो देर रात नेशनल हाईवे स्‍थित टोल प्‍लाजा पर कुख्‍यात अपराधी राजेश टोंटा की हत्‍या के साथ हुआ लेकिन किसी को यह अंदाज शायद ही रहा हो कि चंद घंटों के अंतराल में ही यह आगाज़ अपने अंजाम की पहली किश्‍त पूरी कर लेगा।
अभी इस गैंगवार की कितनी पटकथाएं शेष हैं और इसकी समाप्‍ति किस रूप में होगी, यह कहना तो बहुत मुश्‍किल है किंतु इतना अवश्‍य कहा जा सकता है कि न सिर्फ अखिलेश सरकार बल्‍कि उसकी समूची कानून-व्‍यवस्‍था पूरी तरह चरमरा चुकी है। फिर चाहे यूपी सरकार और उसका समाजवादी कुनबा अपना मन बहलाने को दावे-प्रतिदावे चाहे कितने ही क्‍यों न करता रहे।
जिला कारागार के अंदर गैंगवार ने कई सवाल एकसाथ खड़े कर दिये हैं। सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि आखिर जेल के अंदर इतनी बड़ी तादाद में असलहा पहुंचा कैसे?
बेशक इसका जवाब हर आम व खास आदमी जानता है किंतु वो व्‍यववस्‍था उसे कभी स्‍वीकार नहीं करती जिसके लिए यह सवाल है और जिससे माकूल जवाब की उम्‍मीद की जाती है।
कौन नहीं जानता कि जिन सरकारी इमारतों के अंदर भ्रष्‍टाचार जैसा शब्‍द बहुत बौना प्रतीत होता है, उनमें जेल की इमारतें प्रमुख हैं। जेल के अंदर एक ओर जहां सारे मानवाधिकार खूंटी पर टंगे मिलते हैं, वहीं दूसरी ओर कानून उसकी चौखट के अंदर पहुंचने के साथ दम तोड़ देता है।
यही कारण है कि जेल में वहां के अधिकारी एवं कर्मचारियों की अपनी समानांतर सत्‍ता कायम रहती है और कुख्‍यात अपराधी उस सत्‍ता के महत्‍वपूर्ण अंग होते हैं। इन्‍हें एक-दूसरे का पूरक भी कह सकते हैं।
इसी प्रकार जेल के बाहर पुलिस की अपनी सत्‍ता है। वह अपनी सत्‍ता में किसी का भी दखल एक लिमिट तक बर्दाश्‍त करती है और जहां लिमिट क्रॉस होती नजर आती है, वह अपनी लिमिट क्रॉस करने से नहीं चूकती।
हाथरस में पश्‍चिमी उत्‍तर प्रदेश के माफिया डॉन ब्रजेश मावी की राजेश टोंटा के घर पर हुई हत्‍या के बाद गैंगवार होने की आशंका सबको थी, बावजूद इसके सारा प्रशासनिक अमला जैसे इसका इंतजार कर रहा था और उन तत्‍वों को मौका दे रहा था जो इसका ताना-बाना बुन रहे थे।
कितने आश्‍चर्य की बात है कि गोली लगने से जख्‍मी राजेश टोंटा को मात्र सात घंटे बाद फिर तब निशाना बनाया जाता है जब उपचार के लिए पुलिस भारी-भरकम सुरक्षा में उसे आगरा ले जा रही थी। इस बार टोंटा बच नहीं पाता और मौके पर ही मारा जाता है जबकि उसके साथ गये अमले में से किसी को चोट नहीं आती।
जिला कारागार से लेकर देर रात टोल प्‍लाजा तक के बीच जो कुछ एवं जितना कुछ हुआ, उसमें न तो जेल प्रशासन की भूमिका पाक-साफ प्रतीत हो रही है और न जिला प्रशासन की। ऐसा ल्रगता है कि जैसे पूरे घटनाक्रम का सूत्रधार इन्‍हीं के इर्द-गिर्द बैठा हो।
दरअसल आमजन के जेहन में इस पूरे घटनाक्रम को लेकर कई प्रश्‍न घूम रहे हैं। जैसे कि यदि राजेश टोंटा को गोली उसकी जांघ में लगी थी और वह खतरे से बाहर था तो फिर घने कोहरे के बावजूद उसे उपचार के नाम पर आगरा ले जाने की जरूरत क्‍या पड़ी?
पुलिस कह रही है कि ऐसा राजेश टोंटा के पिता की जिद पर किया गया।
अब यहां एक और सवाल यह पैदा हो जाता है कि एक कुख्‍यात अपराधी के पिता की जिद को पुलिस ने इतनी गंभीरता से क्‍यों ले लिया जबकि साफ जाहिर था कि उसके ऊपर मंडरा रहा खतरा टला नहीं है।
यूं भी पुलिस जब किसी का पोस्‍टमॉर्टम और यहां तक कि अंतिम संस्‍कार तक अपनी सुविधानुसार कराती है तो फिर टोंटा के मामले में ऐसा क्‍या हुआ कि खतरे के बाहर होने पर भी वह रात को 11 बजे उसे आगरा लेकर चल दी।
महुअन टोल प्‍लाजा पर बदमाशों ने खुद को टोंटा के परिजन बताते हुए एंबुलेंस के अंदर प्रवेश किया और उसे गोलियों से भून डाला।
यह वही पुलिस है जिसने जिला अस्‍पताल में टोंटा की पत्‍नी, पिता व भाई आदि को उससे मिलने तक नहीं दिया और उनसे तीखी झड़प के बाद उसकी पत्‍नी को बमुश्‍किल मिलने दिया गया।
बदमाश आये और टोंटा को इत्‍मीनान के साथ मौत की नींद सुला कर चले गये लेकिन उसके साथ का सुरक्षा अमला तमाशबीन बना रहा। एंबुलेंस में मौजूद अस्‍पताल कर्मी भी सुरक्षित रहे यानि किसी को कोई गंभीर चोट नहीं आई।
जिला जेल के अंदर दोपहर बाद हुई शुरूआत से लेकर हाईवे पर देर रात की वारदात तक का पूरा घटनाक्रम, जेल और जिला प्रशासन की भूमिका को केवल संदिग्‍ध ही साबित नहीं करता, उसकी संलिप्‍तता भी जाहिर कराता है।
संभवत: यही कारण है कि दबी जुबान से ही सही, पर ऐसा कहने वालों की कमी नहीं है कि गैंगवार के आगाज़ से लेकर, कल तक के अंजाम की पटकथा सरकारी नुमाइंदों ने ही लिखी है।
नि: संदेह इस गैंगवार का क्‍लाईमेक्‍स अभी बाकी है क्‍योंकि पर्दे के पीछे बैठे सूत्रधारों का न कभी कुछ बिगड़ा है और न अब बिगड़ेगा।
कुछ सरकारी नुमाइंदे निलंबित होंगे, कुछ का ट्रांसफर हो जायेगा, कुछ जांच की आंच से खुद को तपायेंगे और कुछ दूर बैठकर इस तपिश का आनंद लेंगे। मावी चला गया, अक्षय और टोंटा भी चले गये। राजकुमार शर्मा घायल है। लेकिन यह सब सरकारी मशीनरी के कलपुर्जों की तरह हैं। इन्‍हें कब, कहां और कैसे फिट करना है, किस तरह इनसे काम लेना है और कब इनका 'काम' कर देना है, इस खेल में जेल प्रशासन भी निपुण होता है और जिला प्रशासन भी।
होगा भी क्‍यों नहीं...मावी, टोंटा और अक्षय जैस अपराधी तो आते-जाते रहेंगे किंतु सरकारी वर्दी प्राप्‍त अपराधियों का अधिक से अधिक स्‍थानांतरण होगा। वह जहां जायेंगे, वहां एक नई कहानी का प्‍लॉट बना देंगे ताकि भ्रष्‍टाचार का सिलसिला अनवरत जारी रहे और जारी रहे इसी तरह उनकी अपराध व अपराधियों से दुरभि संधि का भी सिलसिला।
-लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष 

छात्रा रेप केस की जांच ट्रांसफर होने पर भारी रोष 'बार एसोसिएशन ने लिखा UP के DGP को पत्र'







मथुरा। 
बार एसोसिएशन मथुरा ने एमबीए की छात्रा से बलात्‍कार करने के मामले में आरोपी पत्रकार कमलकांत उपमन्‍यु के भाई की एप्‍लीकेशन पर जांच को गैर जनपद स्‍थानांतरित कर दिये जाने के खिलाफ पुलिस महानिदेशक लखनऊ को एक प्रार्थनापत्र भेजा है।
बार के अध्‍यक्ष विजयपाल सिंह तोमर के हस्‍तक्षरयुक्‍त इस पत्र में डीजीपी उत्‍तर प्रदेश से अनुरोध किया गया है कि वह कमलकांत उपमन्‍यु के खिलाफ आईपीसी की धारा 376 और 506 के केस की विवेचना को पुन: मथुरा जनपद स्‍थानांतरित कर आरोपी की गिरफ्तारी सुनिश्‍चित करें।
उल्‍लेखनीय है कि उत्‍तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी आनंद लाल बनर्जी ने सेवा निवृत होने से मात्र एक सप्‍ताह पूर्व आरोपी कमलकांत उपमन्‍यु के भाई त्रिभुवन उपमन्‍यु के प्रार्थना पत्र पर बलात्‍कार जैसे संगीन अपराध की विवेचना मथुरा से फिराजाबाद जनपद स्‍थानांतरित कर दी थी जो न सिर्फ नियम विरुद्ध है बल्‍कि ऐसे मामलों में सर्वोच्‍च न्‍यायालय द्वारा दिये गये आदेश-निर्देशों का खुला उल्‍लंघन है।
इस संबंध में आज जब 'लीजेण्‍ड न्‍यूज़' ने इस मामले के नये विवेचक और फिरोजाबाद की क्राइम ब्रांच में तैनात इंस्‍पेक्‍टर सत्‍यपाल सिंह से उनके सीयूजी नंबर 9412861327 पर बात की तो उन्‍होंने विवेचना खुद को सौंपे जाने की पुष्‍टि करते हुए यह भी स्‍वीकार किया कि बलात्‍कार जैसे संगीन आरोप की जांच सामान्‍यत: इस तरह तब्‍दील नहीं की जाती। उन्‍होंने कहा कि मैं अपनी जिम्‍मेदारी पूरी निष्‍पक्षता के साथ और ईमानदारी पूर्वक निभाऊंगा तथा तथ्‍यों का ध्‍यान रखूंगा।
गौरतलब है कि पत्रकार कमलकांत उपमन्‍यु के खिलाफ दर्ज बलात्‍कार और जान से मारने की धमकी देने के इस मामले की जांच इससे पहले मथुरा में ही तैनात महिला सब इंस्‍पेक्‍टर रीना द्वारा की जा रही थी। उप निरीक्षक रीना ने ही पीड़िता से 161 के बयान लिए थे और उन्‍होंने ही मैडिकल कराने के उपरांत कोर्ट में 164 के बयान कराकर कमलकांत उपमन्‍यु के खिलाफ गैर जमानती वारंट हासिल करके 82 की कार्यवाही कराई थी।
यह मामला पीड़िता द्वारा 3 दिसंबर को प्रार्थना पत्र देने पर एसएसपी मंजिल सैनी ने जांच के उपरांत 6 दिसंबर को थाना हाईवे में दर्ज कराया था, बावजूद इसके आरोपी कमलकांत की गिरफ्तारी नहीं की गई और उसे पीड़िता व उसके परिवार पर समझौते के लिए दबाव बनाने का पूरा मौका दिया गया।
यही नहीं, एसएसपी मंजिल सैनी से पर्याप्‍त सहयोग मिलने के कारण ही बलात्‍कार जैसे संगीन केस की विवेचना को आरोपी कमलकांत गैर जनपद स्‍थानांतरित कराने में सफल रहा।
आश्‍चर्य की बात यह है कि जिस तारीख यानि 22 दिसंबर को इस केस की विवेचना फिरोजाबाद स्‍थानांतरित किये जाने के आदेश तत्‍कालीन डीजीपी उत्‍तर प्रदेश आनंद लाल बनर्जी के हस्‍ताक्षर से हुए हैं, उस तारीख में आनंद लाल बनर्जी गंभीर अस्‍वस्‍थ्‍य बताये गये और उपचार के लिए हॉस्‍पीटल में एडमिट थे। ऐसे में उनके द्वारा विवेचना स्‍थानांतरित करना किसी बड़े षड्यंत्र की ओर इशारा करता है।
जाहिर है कि इस मामले में मथुरा की एसएसपी से लेकर तत्‍कालीन डीजीपी आनंद लाल बनर्जी की भूमिका से सूबे के पुलिस महकमे की छवि काफी धूमिल हुई है और आमजन के बीच इस आशय का संदेश भी गया है कि हाईप्रोफाइल मामलों में पुलिस की भूमिका कुछ और रहती है जबकि जनसमान्‍य के लिए कुछ और। कमलकांत उपमन्‍यु जैसे शासन व प्रशासन के लाइजनर्स, नियम-कानून तथा आदेश-निर्देशों की धज्‍जियां उड़ाकर किस तरह समूची व्‍यवस्‍था का मजाक उड़ाते प्रतीत होते हैं और आम आदमी छोटे से छोटे मामलों में प्रताड़ित किया जाता है।
बार एसोसिएशन ने डीजीपी को लिखे पत्र में इस आशय की चेतावनी भी दी है कि यदि समय रहते इस मामले में आरोपी की गिरफ्तारी नहीं की जाती और विवेचना को निष्‍पक्ष तरीके से निस्‍तारित करने में बाधा उत्‍पन्‍न की जाती है तो शीघ्र ही अधिवक्‍तागण इसे उच्‍च न्‍यायालय तक ले जाने को बाध्‍य होंगे क्‍योंकि इस तरह आरोपी के भाई की एप्‍लीकेशन पर संगीन अपराध की विवेचना गैर जनपद स्‍थानांतरित की जा सकती है तो यह अधिकार सभी मामलों में आरोपी अथवा उसके परिजनों को दिया जाना चाहिए ताकि कानून सबके लिए समान होने की बात केवल सुनाई न दे, बल्‍कि दिखाई भी दे।
-लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष      

गुरुवार, 4 दिसंबर 2014

संजय का अब तक पता नहीं, पुलिस ने गठित की टीम, JSR के सबसे बड़े हिस्‍सेदार थे संजय-कन्‍हैया

मथुरा। 
2 दिसंबर की रात को होडल से लौटते वक्‍त लापता हुए जेआरएस ग्रुप के निदेशक संजय देशवानी का फिलहाल कोई पता न तो पुलिस को लग पाया है और ना ही संजय के परिजनों को कहीं से कोई सूचना मिली है।
इस बीच संजय के पुत्र केशव देशवानी द्वारा ग्रुप के ही छ: अन्‍य हिस्‍सोदारों को हत्‍या के उद्देश्‍य से अपहरण की आशंका में नामजद कराये जाने के बाद कल एसएसपी मंजिल सैनी तथा एसपी सिटी सिटी ने सभी आरोपियों को तलब कर देर रात तक पूछताछ की।
बताया जाता है कि पूछताछ के दौरान ग्रुप के हिस्‍सेदार सभी आरोपियों ने संजय के बारे में कोई भी जानकारी होने से इंकार किया।
ग्रुप के एक हिस्‍सेदार और आरोपी नवीन कात्‍याल ने एसपी सिटी को बताया कि 2 दिसंबर की शाम संजय उनके पास होडल आए थे और उसके बाद बस से लौटने की कहकर चले गये।
नवीन कात्‍याल के मुताबिक संजय देशवानी अपने कपड़े के कारोबार से होडल आने-जाने में बस का इस्‍तेमाल किया करते थे, अपनी कार का प्रयोग वह बहुत जरूरी होने पर ही करते थे।
पुलिस के सूत्रों से प्राप्‍त जानकारी के अनुसार फिलहाल सभी नामजदों को पुलिस ने इस हिदायत के साथ छोड़ दिया है कि वह पुलिस को सहयोग करें तथा अपने स्‍तर से संजय का पता लगाने की कोशिश करें ताकि जल्‍द से जल्‍द इस मामले का पटाक्षेप हो सके।
इसके अलावा पुलिस ने संजय देशवानी का पता लगाने के लिए अपनी एक टीम गठित की है जो उनकी कॉल डीटेल तथा उनके अन्‍य व्‍यापारिक संबंधों के आधार पर उनका पता लगाने में जुटी है।
जहां तक सवाल संजय देशवानी और कन्‍हैया खत्री का जेएसआर ग्रुप में हिस्‍सेदारी को लेकर है तो ग्रुप के ही लोगों ने उनकी 50 प्रतिशत हिस्‍सेदारी होने की पुष्‍टि की है।
यही हिस्‍सेदारी संजय व कन्‍हैया ने ग्रुप के अन्‍य हिस्‍सेदारों को सरेंडर की थी और जिसे पैसों के अभाव में उन्‍होंने जयंती लाला के नाम से मशहूर जयंती अग्रवाल को बेच दी।
दरअसल, पूरे जेएसआर ग्रुप में जयंती लाला से पहले कुल सात हिस्‍सेदार हुआ करते थे।
इनमें सबसे बड़ी 25-25 प्रतिशत की हिस्‍सेदारी संजय देशवानी तथा कन्‍हैया खत्री के नाम थी जबकि नवीन कात्‍याल, सतपाल नागपाल, विजय गोयल तथा विकेश गोयल 10-10 प्रतिशत के भागीदार थे। इन सब के अलावा 10 प्रतिशत की हिस्‍सेदारी होडल के ही डीड रायटर (लिखिया) नरेश बंसल की थी जिनका अब तक इस पूरे घटनाक्रम में कहीं नाम नहीं आया है।
ग्रुप के सूत्र बताते हैं संजय व कन्‍हैया की हिस्‍सेदारी खरीदने के बाद जयंती लाला इस ग्रुप के सबसे बड़े शेयर होल्‍डर हो गये और अधिकांश फैसलों में उनका दखल हो गया।
सूत्रों के अनुसार जयंती लाला ने संजय व कन्‍हैया की कुल 50 प्रतिशत हिस्‍सेदारी में से साढ़े सैंतीस प्रतिशत का भुगतान कर दिया है और अब केवल साढ़े बारह प्रतिशत भुगतान शेष है।
ग्रुप के लोगों ने इस तरह की अफवाहों का खण्‍डन किया कि संजय ने अशोका सिटी के कुछ फ्लैटस का सौदा किया था और उनकी एडवांस रकम संजय ने ले रखी थी।
ग्रुप के ही लोगों का कहना था कि संजय या कन्‍हैया के पास ग्रुप की कोई रकम शेष नहीं है अलबत्‍ता जयंती लाला को उनका साढ़े बारह प्रतिशत शेष भुगतान करना है जो किसी कारणवश तय समय पर नहीं हो पाया और जिसे लेकर गलतफहमी पैदा हुई।
ग्रुप के लोगों की मानें तो उन्‍हें संजय के परिजनों से पूरी सहानुभूति है और वह चाहते हैं कि शीघ्र से शीघ्र संजय की सकुशल वापसी हो जाए।
उधर संजय के साथी और ग्रुप के दूसरे बड़े हिस्‍सेदार रहे कन्‍हैया खत्री ने बताया कि उन्‍हें अथवा संजय के परिजनों को अब तक संजय का कोई पता कहीं से नहीं लग पाया है और न इस संबंध में कोई सूचना मिली है। उनका कहना था कि पुलिस को कहीं से कोई सूचना मिली हो तो उसकी जानकारी फिलहाल हमारे पास नहीं है।
उनका कहना था कि सुबह सीओ सिटी अनिल यादव ने मुझे और संजय के पुत्र केशव को फोन पर कोतवाली आने के लिए सूचित किया था लिहाजा हम वहीं जा रहे हैं।
जेएसआर ग्रुप में हुए इस अप्रत्‍याशित घटनाक्रम को लेकर पुलिस, संजय के परिजन, कन्‍हैया खत्री तथा ग्रुप के बाकी हिस्‍सेदार तो परेशान हैं हीं, वो लोग भी काफी परेशान हैं जिन्‍होंने ग्रुप के किसी प्रोजेक्‍ट में निवेश कर रखा है या फ्लैट्स बुक करा रखे हैं।
उनकी परेशानी का कारण यह है कि उन्‍हें कोई पूरी सच्‍चाई बताने वाला नहीं है और वह छन-छन के आ रहीं तरह-तरह की खबरों पर ही निर्भर हैं।
उन्‍हें डर है कि ग्रुप के बीच कोई बड़ा विवाद होने की स्‍थिति में उनका पैसा न फंस जाए अथवा जिस एक अदद आशियाने का सपना देखा था, वह सपना बन कर ही न रह जाए।
-लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष     
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