akhilesh yadav लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
akhilesh yadav लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 5 जून 2016

Mathura हिंसा: जांच से पहले ही नतीजा निकाल लेने की जल्‍दबाजी किसलिए ?

Mathura की हिंसा के प्रमुख खलनायक और दोनों नायक अब इस दुनिया में नहीं रहे। रामवृक्ष नामक जो सांप दो सालों से जवाहर बाग को अपना बिल बनाकर रह रहा था, उसके भी मारे जाने की पुष्‍टि प्रदेश पुलिस के मुखिया ने स्‍वयं कर दी। अब हमेशा की तरह लकीर पीटने का दौर शुरू हो चुका है। कोई अपने ही अधीनस्‍थों से जांच कराने के नाम पर लकीर पीट रहा है तो कोई सीबीआई जांच कराने की मांग के नाम पर। यहां यह कहना तो बेमानी है कि लाशों पर राजनीति की जा रही है अथवा चुनावों को देखते हुए वोट की राजनीति का प्‍लेटफॉर्म तैयार किया जा रहा है। राजनेता हैं तो राजनीति करेंगे ही। नेता यदि राजनीति नहीं करेंगे तो कौन करेगा। सत्‍ता की खातिर वोट की राजनीति भी जरूरी है और जनता उस राजनीति का शिकार होने के लिए अभिशप्‍त है। फिलहाल इस समस्‍या का कोई हल दूर-दूर तक नजर भी नहीं आ रहा इसलिए इसका जिक्र करने से भी कोई लाभ नहीं होगा।
अभी जो जरूरी है, वह यह कि जो भी और जैसी भी जांच हो, उस जांच की दिशा क्‍या होगी।
अगर जांच की दिशा सिर्फ यह रही कि दोनों पुलिस अधिकारी कैसे और किसकी चूक से मारे गए तो सच कभी सामने नहीं आ पायेगा। सच तभी सामने आएगा जब जांच की दिशा यह रहे कि आखिर किसकी शह से एक अदना से निपट देहाती इंसान शासन, प्रशासन और यहां तक कि उस न्‍याय पालिका को भी चुनौती देता रहा जिसके सामने अधिकांश मामलों में शासन व प्रशासन भी अंतत: नतमस्‍तक होने के लिए बाध्‍य होते हैं।
सबको मालूम है कि दोनों पुलिस अधिकारी कैसे मारे गए, उनको मारने वाले कौन थे इसलिए उसके बारे में जांच करना सिर्फ मामले को हमेशा की तरह लटकाना और लोगों की आंखों में धूल झोंकने से अधिक कुछ नहीं होगा।
नहीं मालमू तो यह कि आखिर एक मामूली सा वृक्ष इतना बड़ा विषवृक्ष कैसे बन गया। कौन उसे खाद दे रहा था और किसने उसे पानी दिया।
इतना अंदाज तो लोगों को लग चुका है कि सत्‍ता के गलियारों से उसे पूरा संरक्षण प्राप्‍त था और उसी संरक्षण के बल पर वह जवाहर बाग में बैठकर अपनी समानांतर सत्‍ता कायम कर पाया किंतु अब जरूरी है कि उस संरक्षणदाता का चेहरा भी बेनकाब हो क्‍योंकि जब तक ऐसे चेहरे बेनकाब नहीं होंगे तब तक कहीं न कहीं कोई न कोई जांबाज अफसर राजनीति की भेंट चढ़ता रहेगा।
जांच इस बात की होनी चाहिए कि किस वजह से मथुरा का पुलिस प्रशासन पूरे दो साल तक हाथ पर हाथ रखकर बैठा रहा और तमाशबीन बना रहा। ऐसी क्‍या मजबूरी थी कोर्ट की अवमानना तक बात पहुंच जाने के बावजूद जिले में तैनात पुलिस व प्रशासनिक अधिकारी असहायों की तरह लखनऊ की ओर टकटकी लगाए देखते रहे। वो कौन से अधिकारी थे जो यहां से जवाहर बाग के संबंध में जाने वाली हर चिठ्ठी को डस्‍टबिन के हवाले करते रहे और किसके इशारे पर करते रहे।
280 एकड़ में फैले सरकारी बाग को कब्‍जाने का ख्‍वाब देखने वाले रामवृक्ष यादव और उसके गुर्गों को रसद-पानी कहां से आ रहा था और उसे यह सब मुहैया कराने वाले का मकसद क्‍या था।
आखिर वह भी तो रामवृक्ष से कुछ न कुछ जरूर चाहता होगा। वह कोई व्‍यक्‍ति विशेष था अथवा कोई समूह या पूरी संस्‍था।
अगर कोई अब भी यह कहे कि रामवृक्ष को कहीं से कोई संरक्षण प्राप्‍त नहीं था और वह एक सिरफिरा सनकी इंसानभर था, तो इससे बड़ा झूठ कोई दूसरा नहीं हो सकता। ऐसा कहना सिर्फ और सिर्फ उस सच को छिपाने की कोशिश भर है जिसका पता लग जाने पर उत्‍तर प्रदेश तो क्‍या, देश के अंदर भूचाल आ सकता है।
सच को छिपाने के लिए ही रामवृक्ष की गिरफ्तारी नहीं की गई, सच को छिपाने के लिए ही पहले दिन से जांच बदलनी शुरू हो गई। सच को सामने लाने की मंशा होती तो सत्‍ता पर काबिज लोग इस आशय की थोथी दलील नहीं देते कि सीबीआई जांच में देरी होगी इसलिए प्रदेश सरकार सीबीआई जांच कराने की हिमायती नहीं है और अपने अधिकारियों से ही जांच कराना चाहती है।
एक सच यह भी है कि मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव पूरी घटना के लिए अधिकारियों को बिना जांच के ही जिम्‍मेदार ठहरा देते हैं और कहते हैं कि चूक तो उनसे हुई है, जबकि मथुरा के जिलाधिकारी राजेश कुमार पूरी तरह मुख्‍यमंत्री के निष्‍कर्ष को खारिज कर देते हैं। वह हर बात का सिलसिलेवार जवाब मीडिया को देते हैं और बताते हैं कि न सिर्फ उनके कार्यकाल में बल्‍कि उनसे पहले भी जितने अधिकारी रहे, सभी ने जवाहर बाग से अतिक्रमणकारियों को खदेड़ने के लिए यथासंभव प्रयास किए।
जिलाधिकारी का यह कथन बहुत कुछ कहता है और मुख्‍यमंत्री का कथन स्‍पष्‍ट करता है कि वह जांच से पहले ही नतीजे पर पहुंचने की जल्‍दबाजी में हैं। अब ऐसा क्‍यों है और क्‍यों वह घटना के दूसरे दिन ही इस निष्‍कर्ष पर जा पहुंचे कि अधिकारियों की चूक ही हिंसा के लिए जिम्‍मेदार है, इसका भी जवाब वही दे सकते हैं।
बहरहाल, कृष्‍ण की नगरी पर दो जांबाज पुलिस अधिकारियों की वीभत्‍स हत्‍या का कलंक तो लग ही गया। यह कलंक शायद ही कभी मिटे, लेकिन यदि इस कलंक से भी सबक सीखना है तो जांच से ज्‍यादा जरूरी है जांच की दिशा तय करना। एकबार यदि जांच सही दिशा में शुरू हो गई तो निश्‍चित ही नतीजा भी अपेक्षा के अनुरूप निकलेगा।
विभिन्‍न राजनीतिक दल, अपनी राजनीति करें। चुनावों के मद्देनजर पूरे घटनाक्रम को वोट की राजनीति में तब्‍दील करने की भी कोशिश करें, आरोप-प्रत्‍यारोप भी जारी रखें लेकिन सिर्फ इतना प्रयास जरूर करें कि पूरा सच सामने आ सके।
आज एसपी सिटी मुकुल द्विवेदी तथा एसआई संतोष यादव की शहादत को सलाम करने वाले और उन्‍हें विनम्र श्रंद्धाजलि अर्पित करने वाले भी यदि थोड़ी सी कोशिश जांच की दिशा तय कराने के लिए कर दें। उसके लिए धरना-प्रदर्शन सहित जो कुछ करना हो करें, तो निश्‍चित जानिए कि फिर सत्‍ता के संरक्षण में छिपकर न तो रामवृक्ष जैसा कोई भेड़िया मुकुल व संतोष जैसे शेरों का शिकार कर पायेगा और न सत्‍ता पर काबिज कोई रंगा हुआ सियार किसी भेड़िए अथवा भेड़ियों के झुण्‍ड को बेखौफ संरक्षण दे पायेगा।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

शुक्रवार, 4 मार्च 2016

UP: ठेके पर सरकार …या सरकार पर नकल का ठेका

समाजवादी कुनबे के चश्‍मो चिराग और UP के मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव पर यूं तो यह कहावत इन दिनों सटीक बैठती है कि बुझता हुआ दीया रौशनी ज्‍यादा करता है लेकिन यहां तो उक्‍त कहावत भी सिर्फ जुबानी जमाखर्च ही मालूम पड़ती है।
चूंकि 2017 के विधानसभा चुनाव लगभग सामने आ खड़े हुए हैं और सभी राजनीतिक दलों ने मिशन 2017 पर काम करना भी शुरू कर दिया है लिहाजा सूबे के सीएम अखिलेश यादव भी इन दिनों पूरी ताकत के साथ अपनी सरकार का बखान करने में लगे हैं।
बात चाहे कानून-व्‍यवस्‍था की हो अथवा विकास कार्यों की, अखिलेश यादव की मानें तो उन्‍होंने उत्‍तर प्रदेश को इतना उत्‍तम प्रदेश बना दिया है कि जितना पिछली कोई सरकार नहीं बना सकी।
अखिलेश के जुबानी जमाखर्च पर यकीन कर भी लिया जाता यदि हर रोज उनके दावों की पोल खोलने वाला कोई न कोई वाकया सामने न आ खड़ा होता।
उदाहरण के लिए इन दिनों यूपी में माध्‍यमिक शिक्षा बोर्ड की परीक्षाएं चल रही हैं। ये परीक्षाएं एक लंबे समय से नकल माफियाओं द्वारा संचालित की जाती हैं, उत्‍तर प्रदेश सरकार तो बस जैसे इनका टेंडर निकालती है। बोर्ड की परीक्षाओं के नाम पर शिक्षा का मजाक और शिक्षा व्‍यवसाय का घिनौना रूप इस दौरान खुलेआम देखा जा सकता है।
बोर्ड परीक्षाओं के लिए सेंटर बनाए जाने से शुरू हुआ यह खेल नकल द्वारा पास की गई परीक्षाओं पर जाकर वहां खत्‍म होता है जहां पीढ़ी-दर-पीढ़ी जाहिलों की एक पूरी फौज खड़ी कर दी जाती है। यही फौज फिर कभी कहीं किसी नौकरी में भर्ती के समय तो कभी आरक्षण की मांग के नाम पर किए जाने वाले आंदोलन के वक्‍त उपद्रवियों में तब्‍दील होती दिखाई देती है।
विश्‍व प्रसिद्ध धार्मिक नगरी मथुरा में आज ”लीजेंड न्‍यूज़” को कुछ ऐसे चित्र मिले जिनसे पूरी तरह स्‍पष्‍ट होता है कि यूपी में बोर्ड परीक्षाएं कितना बड़ा मजाक बनकर रह गई हैं और किस तरह समाजवादी पार्टी की सरकार शिक्षा माफियाओं के सामने या तो बेबस है या फिर उनसे मिली हुई है।
बोर्ड परीक्षाओं के नाम पर चल रहे नकल माफियाओं के इस काले धंधे को देखकर ऐसा लगता है जैसे प्रदेश में शासन नाम की कोई चीज है ही नहीं। और जब शासन ही नहीं होगा तो प्रशासन कहां होगा।
अगर यह राजनीतिक मुद्दा होता तो संभवत: अखिलेश सरकार इस स्‍थिति के लिए भी विपक्ष को जिम्‍मेदार ठहरा देती किंतु दुर्भाग्‍य से यह पूरी तरह कानून-व्‍यवस्‍था का मुद्दा है।
ऐसा नहीं है कि नकल का यह खेल सिर्फ समाजवादी सरकार की उपज हो और बसपा या दूसरे दलों के शासनकाल में परिस्‍थितियां कुछ अलग रही हों, लेकिन इस समय यूपी में अखिलेश के नेतृत्‍व वाली वो समाजवादी सरकार काबिज है जो दावा करती है कि उसके जैसी बेहतर कानून-व्‍यवस्‍था देश के कई दूसरे राज्‍यों में नहीं है।
यूपी बोर्ड की परीक्षाओं में चल रहा नकल का यह खेल इसलिए अत्‍यंत घातक है क्‍योंकि इससे तथाकथित पढ़े-लिखों की वो जमात तैयार हो रही है जो आगे आने वाले समय में शासन-प्रशासन के लिए चुनौती बनेगी। उसके पास बोर्ड का सर्टीफिकेट तो होगा लेकिन शिक्षा से उसका दूर-दूर तक कोई वास्‍ता नहीं होगा।
अखिलेश सरकार अब इस मामले में कुछ कर भी नहीं सकती क्‍योंकि उसमें इसके लिए इच्‍छाशक्‍ति ही नहीं है और नकल माफिया के पास हर तरह की शक्‍ति है।
उनके पास धनबल भी है और बाहुबल भी। उन्‍हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि अखिलेश यादव क्‍या करते हैं और मुलायम सिंह यादव क्‍या कहते हैं। उन्‍हें मतलब है तो इस बात से कि बोर्ड परीक्षाओं में नकल कराने के लिए ली गई उनकी ठेकेदारी इसी प्रकार चलती रहे।
उनकी ठेकेदारी कैसी चल रही है, इसका प्रत्‍यक्ष प्रमाण मथुरा के एक कॉलेज से लिए गए चित्रों के रूप में आपके सामने है।
-लीजेंड न्‍यूज़

गुरुवार, 4 फ़रवरी 2016

बचे-खुचे खुरों से जमीन खोदते Mulayam singh

akhilesh yadav and mulayam singh yadav
समाजवादी पार्टी के मुखिया Mulayam singh क्‍या पार्टी में अब खुद को हाशिए पर महसूस करने लगे हैं, क्‍या वो उपेक्षित महसूस कर रहे हैं, अथवा पार्टी का राजनीतिक भविष्‍य उन्‍हें डराने लगा है?
कभी शेर की तरह दहाड़ने वाले मुलायम सिंह, अब अपनी पूरी ताकत लगाकर दहाड़ते भी हैं तो ऐसा लगता है जैसे बस गुर्रा रहे हैं और गुर्रा कर ही अपनी खीझ मिटा रहे हैं।
मुलायम सिंह की यह स्‍थिति यूं तो काफी समय से दिखाई दे रही है किंतु हाल ही में उनके द्वारा अखिलेश सरकार के मंत्रियों को दी गई चेतावनी से तो कुछ ऐसा ही साफ जाहिर हो रहा है।
गत दिनों समाजवादी नेता कर्पूरी ठाकुर की जयंती पर लखनऊ के पार्टी कार्यालय में आयोजित कार्यक्रम के दौरान मुलायम सिंह ने कहा कि प्रदेश के कुछ मंत्री सिर्फ पैसा कमाने में लगे हैं।
मंत्रियों के रवैये पर घोर नाराजगी जताते हुए सपा मुखिया ने यहां तक कहा कि पैसा ही कमाना था राजनीति में नहीं आना चाहिए था।
इस मौके पर उन्‍होंने अपने पुत्र और प्रदेश के मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव को भी चुगलखोरों से आगाह किया और कहा कि सुनो भले ही सबकी लेकिन निर्णय खुद लो।
उन्‍होंने यह भी स्‍वीकारा कि खुद उनके द्वारा कई मंत्रियों को विभिन्‍न अवसरों पर समझाया गया है लेकिन वह नहीं सुधर रहे।
इससे पहले भी मुलायम सिंह कई मर्तबा कभी अखिलेश को टारगेट करके तो कभी सीधे-सीधे ऐसी बातें कह चुके हैं किंतु प्रदेश सरकार के ढर्रे में कोई परिवर्तन दिखाई नहीं दिया नतीजतन कानून-व्‍यवस्‍था का हाल दिन-प्रतिदिन खराब ही हुआ है।
ऐसे में हर कोई जानना चाहता है कि क्‍या मुलायम सिंह अब अपने ही कुनबे के सामने इस कदर बेबस हो चुके हैं कि उन्‍हें अपनी पीड़ा जाहिर करने के लिए किसी न किसी मंच की दरकार होती है, या फिर वह सार्वजनिक मंच को माध्‍यम बनाकर बताना चाहते हैं कि पार्टी की नैया डूब रही है अगर बचा सको तो बचा लो।
वैसे तो राजनीति के ऊंट की करवट का अंदाज लगाना बड़े-बड़े दिग्‍गजों को मुश्‍किल में डाल देता है लेकिन मुलायम सिंह को इस मामले में महारथ हासिल है। मुलायम के फेंके हुए पासे राजनीति के धुरंधरों पर भारी पड़े हैं लेकिन बिहार को लेकर मुलायम सिंह का दांव उल्‍टा क्‍या पड़ा, पार्टी और परिवार में ही उनके खिलाफ अंदरखाने बगावती सुर उठने की खबरें हैं।
बताया जाता है कि परिवार ने ही मुलायम सिंह को अब चुका हुआ राजनेता मान लिया है और उनकी सोचने-समझने की शक्‍ति पर सवाल खड़े किए जाने लगे हैं।
इसका एक उदाहरण विगत माह तब भी देखने को मिला जब मथुरा में पत्रकारों के राष्‍ट्रीय संगठन IFWJ की राष्‍ट्रीय कार्यकारिणी का दो दिवसीय अधिवेशन हुआ था।
इस अधिवेशन में सपा सुप्रीमो के भाई और प्रदेश के कद्दावर नेता शिवपाल यादव ने भी बतौर मुख्‍य अतिथि शिरकत की थी।
अधिवेशन के दौरान IFWJ के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष के. विक्रम राव ने शिवपाल यादव की राजनीतिक सूझ-बूझ को जहां सराहा वहीं बिहार को लेकर मुलायम सिंह यादव द्वारा लिए गए निर्णय पर जमकर निशाना साधा।
के. विक्रम राव के अनुसार शिवपाल यादव बिहार चुनाव में मुलायम सिंह द्वारा महागठबंधन से अलग होने के निर्णय पर अप्रसन्‍न थे लेकिन मुलायम सिंह ने उनकी बाात नहीं सुनी लिहाजा नतीजा सबके सामने है।
के. विक्रम राव ने देशभर से आये हजारों पत्रकारों के सामने कहा कि यदि मुलायम सिंह ने शिवपाल यादव की बात सुनी होती तो बिहार में आज उनकी और समाजवादी पार्टी की ऐसी दुर्गति नहीं हुई होती।
यहां सवाल यह नहीं है कि IFWJ के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष के. विक्रम राव ने शिवपाल यादव की शान में कसीदे क्‍यों पढ़े, सवाल यह है कि हजारों पत्रकारों के सामने शिवपाल यादव यह सब मुस्‍कुराते हुए सुनते रहे और जब उनके बोलने की बारी आई तब भी इस विषय पर एक शब्‍द नहीं बोले।
मौन स्‍वीकृति का सूचक होता है, यह सर्वमान्‍य सत्‍य है। तो क्‍या शिवपाल यादव यह मानने लगे हैं कि मुलायम सिंह यादव की राजनीतिक समझ-बूझ अब चुक गई है।
शिवपाल यादव का मौन तो यही कह रहा था।
अखिलेश की कैबिनेट के मंत्रियों पर कर्पूरी ठाकुर के जयंती समारोह में सीधे-सीधे आरोप लगाने वाले मुलायम सिंह यादव यदि उन मंत्रियों को लेकर कोई निर्णय नहीं ले पा रहे तो साफ है कि कहीं न कहीं वह खुद को कमजोर मान रहे हैं। उन्‍हें लग रहा है कि अब उनकी एक आवाज पर तूफान आने का दौर बीत गया है। अब वह अपने बचे-खुचे खुरों से जमीन खोदकर अपनी मौजूदगी का अहसास तो करा सकते हैं किंतु टकराने का माद्दा नहीं रखते।
जमीन भी इसलिए खोद रहे हैं ताकि इतने बड़े कुनबे में कहीं मान-सम्‍मान शेष बना रहे वर्ना तो वह भी दांव पर लगते देर नहीं लगेगी।
शायद यही वजह है कि कभी वह रामजन्‍म भूमि के लिए आंदोलनरत रामभक्‍तों पर गोलियां चलवाने का प्रायश्‍चित करते प्रतीत होते हैं तो कभी अखिलेश के मंत्रियों की धनलोलुपता पर खीझ निकालते हैं। कभी कहते हैं कि राजनीति, व्‍यापार नहीं है और कभी बताते हैं कि उन्‍होंने तो जनता से ही पैसे मांगकर चुनाव लड़ा था।
कुल जमा ऐसा लगता है कि वह अपने ही परिवार में पनप चुकी दौलत और शौहरत की भूख पर लगाम लगाना चाहते हैं किंतु परिवार है कि पूरी तरह बेलगाम हो चुका है।
मुलायम सिंह पर बेशक उम्र का प्रभाव पड़ रहा हो, भले ही उनकी समझ-बूझ पर उंगली उठाई जाने लगी हों लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि उनमें भविष्‍य को बांचने की समझ नए जमाने के नेताओं से कहीं अधिक है।
हो सकता है कि मुलायम सिंह आज अपने ही परिवार के फ्रेम में पूरी तरह फिट न बैठ पा रहे हों परंतु समाजवादी कुनबे का राजनीतिक भविष्‍य हमेशा उनकी तस्‍वीर का मोहताज रहेगा और जिस दिन उनकी तस्‍वीर को किसी कोने में टांग कर काम चलाने की कोशिश की गई, उस दिन पार्टी का ही काम तमाम हो जायेगा क्‍योंकि समाजवादी पार्टी में फिलहाल मुलायम सिंह यादव का स्‍थान लेने की योग्‍यता किसी के अंदर नजर नहीं आती…फिलहाल ही क्‍यों, दूर-दूर तक नजर नहीं आती।
-लीजेंड न्‍यूज़

शुक्रवार, 11 सितंबर 2015

आत्‍मप्रशंसा से अभिभूत समाजवादी सरकार

इधर उत्‍तर प्रदेश में विधानसभा चुनावों के लिए अब दो साल से भी कम समय बचा है और उधर अखिलेश यादव के नेतृत्‍व वाली समाजवादी कुनबे की सरकार अपनी आत्‍मप्रशंसा से अभिभूत है। वो उस कहावत को सिद्ध कर रही है कि दीपक जब बुझने को होता है तब ज्‍यादा रोशनी देता है।
अखिलेश यादव पर भरोसा करके जनता ने समाजवादी पार्टी को स्‍पष्‍ट बहुमत इस उम्‍मीद में दिया था कि एक ऊर्जावान युवा नेता संभवत: सूबे की सूरत बदल देगा और उत्‍तर प्रदेश की गिनती देश के उत्‍तम प्रदेशों में होने लगेगी किंतु अखिलेश यादव ने साबित कर दिया कि न तो हर चमकने वाली चीज सोना होती है तथा ना ही हर युवा ऊर्जावान हो सकता है।
आज उत्‍तर प्रदेश के हालात बद से बदतर हो चुके हैं। बात चाहे कानून-व्‍यवस्‍था की हो या फिर बिजली-पानी व सड़क आदि की। भ्रष्‍टाचार की हो अथवा औद्योगिक विकास की, रोजी-रोजगार की हो या व्‍यापार की, हर मायने में सरकार पूरी तरह फेल है और समाजवादी कुनबे को चुहलबाजी सूझ रही है।
सार्वजनिक मंचों से कभी समाजवादी कुनबे के भीष्‍मपितामह मुलायम सिंह यादव कहते हैं कि अखिलेश ब्‍यूराक्रेसी को हेंडिल करना नहीं जानते तो कभी कहते हैं कि उन्‍हें 100 में से 100 नंबर दिये जा सकते हैं।
एक पल कहते हैं कि यदि आज चुनाव हो जाएं तो हम फिर सत्‍ता में नहीं आ सकते तो दूसरे पल अपने मंत्रियों और पदाधिकारियों की फौज से पूछते हैं कि जितवा तो दोगे ना।
मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव के चचा शिवपाल यादव अधिकारियों को लेकर उन पर सार्वजनिक मंच से कटाक्ष करते हैं तो वहीं मुख्‍यमंत्री उन्‍हें जवाब देते हैं कि अब मुझे अधिकारियों को चलाना आ गया है।
तू मेरी पीठ खुजा, मैं तेरी खुजा देता हूं कि तर्ज पर पूरा समाजवादी कुनबा कभी आत्‍मप्रशंसा में मुग्‍ध हो जाता है तो कभी 2017 को याद करके अपने अंदर बैठे भय को दूर करने की कोशिश करता प्रतीत होता है।
पूरा प्रदेश बिजली की भारी किल्‍लत और कानून-व्‍यवस्‍था की बदहाली से त्रस्‍त है लेकिन समाजवादी कुनबा ”जो दिन कटें आनंद में जीवन कौ फल सोई…को चरितार्थ कर रहा है। जिनकी जुबान तक साफ नहीं है, वह नदियां साफ करने की बात कर रहे हैं। मुलायम से लेकर अखिलेश तक के बयानों को टीवी चैनल वाले अब लिखकर देने लगे हैं क्‍योंकि वह क्‍या बोल गए…इसका सिर्फ अंदाज ही लगाया जा सकता है। सुन पाना संभव नहीं है।
अखिलेश सरकार बिना कुछ सोचे-समझे भ्रष्‍टाचार का पर्याय बन चुके यादव सिंह की सुप्रीम कोर्ट में पैरवी कर रही है और सरकारी नौकरियों में यादवों की भर्ती करके सरकार का स्‍थाई रूप से यादवीकरण करने में लगी है।
कभी-कभी ऐसा लगता है कि समाजवादी कुनबे का बुझता हुआ दीपक इस प्रयास में है कि यादव सिंह जैसों को बचाकर तथा यादवों की अधिक से अधिक भर्ती करके कानून के शिकंजे से बच पाने का बेशक असफल ही सही किंतु आखिरी प्रयास कर लिया जाए। यूं भी कहते हैं पहलवानों का बुढ़ापा बड़ा कष्‍टप्रद होता है। मुलायम सिंह ने बड़ी अखाड़ेबाजी की है और अब भी अखाड़ा खोदने से बाज नहीं आ रहे। कहीं ऐसा न हो कि उनकी यही अखाड़ेबाजी उनके साथ-साथ पूरे कुनबे को ले डूबे।
नि:संदेह यादव सिंह की तूती माया सरकार में भी बोलती रही और जैसे-जैसे यादव सिंह पर सीबीआई का शिकंजा कसेगा, वैसे-वैसे मायावती की मायावी दुनिया का सच भी सामने आयेगा लेकिन समाजवादी कुनबे के भी बच पाने की उम्‍मीद कम ही है।
यादव सिंह की सही तरीके से जांच हो जाती है तो तय मानिए कि धुर-विरोधी माया-मुलायम एक ही जगह दिखाई देंगे। वो जगह कौन सी हो सकती है, इसका अंदाज लगाना कोई बहुत मुश्‍किल काम नहीं है।
फिलहाल सूबे की सत्‍ता पर काबिज समाजवादी कुनबा अपनी शान में कसीदे पढ़ता रहे या चुहलबाजी में मशगूल रहे परंतु इतना तय है कि जनता सब देख भी रही है और सुन भी रही है।
उसे पैर पटकते-पटकते जैसे तीन साल से ऊपर का समय बीत गया वैसे ही बाकी करीब दो साल भी काट लेगी लेकिन 2017 के चुनाव निश्‍चित ही अपना अंदाज कुछ अलग ही बयां करेंगे क्‍योंकि अति हर चीज की बुरी होती है। नशा चाहे सत्‍ता का हो या बोतल का, उतना ही करना चाहिए जितना खुद को झिल जाए और जिससे कोई दूसरा प्रभावित न हो। जब नशा सिर चढ़कर बोलने लगता है और दूसरों को प्रभावित करता है तो नागरिक ऐसा अभिनंदन करते हैं कि उसकी गूंज कई दशकों तक सुनाई देती है। कई बार तो उसकी गूंज में कई-कई पीढ़ियों दबकर रह जाती है।
-लीजेंड न्‍यूज़

बुधवार, 26 अगस्त 2015

मथुरा की कानून-व्‍यवस्‍था भी ”समाजवादी”

यूं तो समूचे सूबे में कानून-व्‍यवस्‍था की बदहाली के उदाहरण हर रोज सामने आते हैं लेकिन यदि बात करें सिर्फ विश्‍व विख्‍यात धार्मिक जनपद मथुरा की तो ऐसा लगता है कि यहां कानून-व्‍यवस्‍था भी ”समाजवादी” हो गई है।मसलन…जाकी रही भावना जैसी। जिसे अच्‍छी समझनी हो, वो अच्‍छी समझ ले और जिसे बदहाल समझनी हो, वो बदहाल समझ ले। इस मामले में अभिव्‍यक्‍ति की पूरी स्‍वतंत्रता है।
वैसे आम आदमी जो न समाजवादी है और न बहुजन समाजी है, न कांग्रेसी है और न भाजपायी है, न रालोद का वोटर है और न वामपंथी है…उसके अनुसार यहां कानून-व्‍यवस्‍था अब केवल एक ऐसा मुहावरा है जिसका इस्‍तेमाल अधिकारीगण अपनी सुविधा अनुसार करते रहते हैं।
कृष्‍ण की जन्‍मस्‍थली में तैनात होने वाले अधिकारियों को यह सुविधा स्‍वत: सुलभ हो जाती है क्‍योंकि यहां नेता और पत्रकार केवल दर्शनीय हुंडी की तरह हैं। अधिकांश नेता और पत्रकारों का मूल कर्म दलाली और मूल धर्म चापलूसी बन चुका है।
चोरी, डकैती, हत्‍या, लूट, बलात्‍कार, बलवा जैसे तमाम अपराध हर दिन होने के बावजूद मथुरा के नेता और पत्रकार अपने मूल कर्म व मूल धर्म को निभाना नहीं भूलते।
कहने को यहां सत्‍ताधारी समाजवादी पार्टी की एक जिला इकाई भी है और उसके पदाधिकारी भी हैं लेकिन उनका कानून-व्‍यवस्‍था से दूर-दूर तक कोई सरोकार नहीं।
दरअसल वो कन्‍फ्यूज हैं कि कानून-व्‍यवस्‍था के मामले में किसकी परिभाषा को उचित मानकर चलें।
जैसे प्रदेश पुलिस के मुखिया कहते हैं कि कानून-व्‍यवस्‍था नि:संदेह संतोषजनक नहीं है। पार्टी के मुखिया का भी यही मत है। वो कहते हैं कि यदि आज की तारीख में चुनाव हो जाएं तो पार्टी निश्‍चित हार जायेगी। उनके लघु भ्राता प्रोफेसर रामगोपाल की मानें तो स्‍थिति इतनी बुरी भी नहीं है जितनी प्रचारित की जा रही है। जबकि ”लिखा-पढ़ी” में मुख्‍यमंत्री पद संभाले बैठे अखिलेश यादव का कहना है कि उत्‍तर प्रदेश की कानून-व्‍यवस्‍था उत्‍तम है और यहां का पुलिस-प्रशासन बहुत अच्‍छा काम कर रहा है। दूसरे राज्‍यों से तो बहुत ही बेहतर परफॉरमेंस है उसकी।
ऐसे में किसकी परिभाषा को सही माना जाए और किसे गलत साबित किया जाए, यह एक बड़ी समस्‍या है।
मथुरा में एक पूर्व मंत्री के घर चोरी होती है तो कहा जाता है कि सुरक्षा बढ़वाने के लिए ऐसा प्रचार किया गया है। व्‍यापारी के यहां डकैती पड़ती है तो बता दिया जाता है कि पुराने परिचित ने डाली है। समय मिलने दो, पकड़ भी लेंगे। हाईवे पर वारदात होती है तो अगली वारदात का इंतजार इसलिए करना पड़ता है जिससे पता लग सके कि अपराधियों की कार्यप्रणाली है क्‍या। वो हरियाणा से आये थे या राजस्‍थान से। यह भी संभव है कि उनका राष्‍ट्रीय राजधानी क्षेत्र से सीधा कनैक्‍शन हो।
हां, इस बीच कुछ उचक्‍के टाइप के बदमाश पकड़ कर गुड वर्क कर लिया जाता है जिसे स्‍थानीय मीडिया पूरा कवरेज देकर साबित कर देता है कि मथुरा का पुलिस-प्रशासन निठल्‍ला चिंतन नहीं कर रहा। साथ में काम भी कर रहा है। एक्‍टिव है।
थोड़े ही दिन पहले की बात है जब मथुरा पुलिस की स्‍वाट टीम का बड़ा कारनामा जाहिर हुआ। बिना काम किए वैसा कारनामा कर पाना संभव था क्‍या।
स्‍वाट टीम के कारनामे ने साबित कर दिया कि वह दिन-रात काम कर रही है। यह बात अलग है कि वह काम किसके लिए और क्‍यों कर रही है। इस बात का जवाब देना न स्‍वाट टीम के लिए जरूरी है और न उनके लिए जिनके मातहत वह काम करती है। जांच चल रही है…नतीजा निकलेगा तो बता दिया जायेगा। नहीं निकला तो आगे देखा जायेगा।
आज यहां एसएसपी डॉ. राकेश सिंह हैं, इनसे पहले मंजिल सैनी थीं। उनसे भी पहले नितिन तिवारी थे। अधिकारी आते-जाते रहते हैं, कानून-व्‍यवस्‍था जस की तस रहती है। अधिकारी अस्‍थाई हैं, कानून-व्‍यवस्‍था स्‍थाई है।
मथुरा में हर अधिकारी सेवाभाव के साथ आता है। कृष्‍ण की पावन जन्‍मभूमि पर मिली तैनाती से वह धन्‍य हो जाता है। उसे समस्‍त ब्रजवासियों और ब्रजभूमि में आने वाले लोगों के अंदर कृष्‍णावतार दिखाई देने लगता है।
कृष्‍णावतार पर कानून का उपयोग करके वह इहिलोक और परलोक नहीं बिगाड़ना चाहता। बकौल मुलायम सिंह कृष्‍ण भी तो समाजवादी थे। यादव थे…इसका मतलब समाजवादी थे।
यहां कहा भी जाता है कि सभी भूमि गोपाल की। जब सब गोपाल का है तो गोपालाओं का क्‍या दोष। वह तो समाजवादी कानून के हिसाब से ही चलेंगे ना।
कृष्‍ण की भूमि पर तैनाती पाकर उसकी भक्‍ति में लीन अधिकारी इस सत्‍य से वाकिफ हो जाते हैं कि एक होता है कानून…और एक होता है समाजवादी कानून।
समाजवादी कानून सबको बराबरी का दर्जा देता है। लुटने वाले को भी और लूटने वाले को भी। पिटने वाले को भी और पीटने वाले को भी।
कागजी घोड़े सदा दौड़ते रहे हैं और सदा दौड़ते रहेंगे। बाकी अदालतें हैं न। वो भी तो देखेंगी कि कानून क्‍या है और व्‍यवस्‍था क्‍या है। कानून समाजवादी है और व्‍यवस्‍था मुलायमवादी है। चार लोग रेप नहीं कर सकते, इस सत्‍य से पर्दा हर कोई नहीं उठा सकता। पता नहीं ये गैंगरेप जैसा घिनौना शब्‍द किस मूर्ख ने ईजाद किया और किसने कानून का जामा पहना दिया।
उत्‍तर प्रदेश ऐसे कानून को स्‍वीकार नहीं करता। नेताजी को रेप स्‍वीकार है, रेपिस्‍ट स्‍वीकार हैं…गलती हो जाती है किंतु गैंगरेप स्‍वीकार नहीं क्‍योंकि वह गलती से भी नहीं किया जा सकता। संभव ही नहीं है।
ठीक उसी तरह जैसे कानून-व्‍यवस्‍था की बदहाली संभव नहीं है। वह कुछ गैर समाजवादी विरोधी दलों के दिमाग की उपज है। उनके द्वारा किया जाने वाला दुष्‍प्रचार है।
कानून-व्‍यवस्‍था कैसे बदहाल हो सकती है। वो बदहाल कर तो सकती है, खुद बदहाल हो नहीं सकती।
-लीजेंड न्‍यूज़

सोमवार, 11 मई 2015

अखिलेश सरकार की जड़ों में मठ्ठा डाल रहे हैं बिजली विभाग के एसई प्रदीप मित्‍तल

मथुरा। कृष्‍ण की पावन जन्‍मस्‍थली में तैनात बिजली विभाग के एसई प्रदीप मित्‍तल एक ओर जहां अखिलेश सरकार की जड़ों में मठ्ठा डाल रहे हैं, वहीं आम लोगों के लिए ”जले पर नमक छिड़कने” वाली कहावत को बखूबी चरितार्थ कर रहे हैं।
विश्‍वविख्‍यात धार्मिक स्‍थलों में शुमार इस शहर की जनता पिछले करीब पंद्रह दिनों यानि जब से गर्मी ने अपना रौद्र रूप दिखाना शुरू किया है, बिजली की भारी किल्‍लत का सामना कर रही है।
दिन तो लोगों का काम के बीच जैसे-तैसे बीत जाता है किंतु रात काटे नहीं कटती क्‍योंकि आधी रात के वक्‍त यहां तब बिजली काटी जाती है जब लोग गहरी नींद के आगोश में समाये होते हैं। बिजली की यह कटौती तीन से चार घंटे तक की होती है। दिन…और फिर रात में भी की जा रही इस भारी कटौती की वजह से लोगों के इन्‍वर्टर भी साथ छोड़ देते हैं क्‍योंकि वह पूरी तरह चार्ज ही नहीं हो पाते।
इस स्‍थिति में बीमार, वृद्ध और बच्‍चों के साथ घर के हर सदस्‍य को काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
जाहिर है कि इन हालातों में लोग यह जानने का प्रयास करते हैं कि बिजली की ऐसी किल्‍लत कब तक रहेगी क्‍योंकि अभी तो गर्मी ने अपने शुरूआती तेवर दिखाना शुरू ही किया है।
जनसामान्‍य इसके लिए मीडिया से भी यह अपेक्षा रखता है कि वह उसे किन्‍हीं बड़े अफसरों के मार्फत जानकारी दे क्‍योंकि बड़े विभागीय अफसर अपनी ओर से कोई जानकारी देना मुनासिब नहीं समझते।
बिना किसी पूर्व सूचना के इस धार्मिक शहर में दिन-रात की जा रही भारी बिजली कटौती के बावत पहले तो ”लीजेण्‍ड न्‍यूज़” ने राधापुरम एस्‍टेट के सब स्‍टेशन पर फोन किया। राधापुरम एस्‍टेट के सब स्‍टेशन पर जिन सज्‍जन ने फोन रिसीव किया उनका कहना था कि कटौती के बारे में उन्‍हें कुछ नहीं बताया जाता लिहाजा वह कुछ भी बता पाने में असमर्थ हैं। उच्‍च अधिकारी ही बता सकते हैं कि असलियत क्‍या है और यह स्‍थिति कब तक बनी रहेगी।
सब स्‍टेशन से इस आशय का जवाब मिलने पर ”लीजेण्‍ड न्‍यूज़” ने रात में ही एसई प्रदीप मित्‍तल को उनके सरकारी मोबाइल पर फोन किया।
आश्‍चर्यजनक रूप से एसई का भी जवाब वही था जो सब स्‍टेशन पर मौजूद रहे कर्मचारी का था।
एसई प्रदीप मित्‍तल के मुताबिक कटौती का फरमान सीधे लखनऊ से जारी होता है और उन्‍हें इसकी कोई सूचना नहीं दी जाती।
एसई का कहना था कि कटौती क्‍यों हो रही है और कितने दिन चलेगी, इसकी जानकारी लखनऊ में बैठे विभागीय अफसर ही दे सकते हैं इसलिए उन्‍हें फोन कर लें।
जब एसई से यह पूछा गया कि यहां के सबसे बड़े अफसर आप है, और आपको ही लखनऊ में बैठे अफसर कोई जानकारी नहीं देते तो किसी अन्‍य को वह जानकारी दे देंगे क्‍या?
इस पर एसई का जवाब था कि इसके लिए मैं क्‍या कर सकता हूं।
जब उनसे यह कहा गया कि लोगों से बिजली बिल के भुगतान की वसूली का जिम्‍मा आपका है और उसके लिए आप हरसंभव हथकंडा अपनाते हैं, बिल न दे पाने वालों के खिलाफ कार्यवाही आप कराते हैं, बिजली विभाग से मोटा वेतन-भत्‍ता आप लेते हैं तो क्‍या आपकी कोई जवाबदेही नहीं बनती, इस पर एसई का जवाब था कि डीएम साहब ने भी मुझसे कटौती के बारे में जानकारी मांगी थी और मैंने उन्‍हें बता दिया कि जवाब लखनऊ से ही मिल सकता है।
कहते हैं कि किसी को गुड़ भले ही न दे सको लेकिन उससे गुड़ जैसी बात तो करो ताकि वह आशान्‍वित रहे तथा उत्‍तेजित न हो…किंतु यहां तो जिम्‍मेदार अफसर ही लोगों के जले पर नमक छिड़कने का काम कर रहे हैं।
जिलाधिकारी राजेश कुमार से उन्‍होंने क्‍या कहा, इसकी पुष्‍टि तो नहीं हो पाई अलबत्‍ता इतना जरूर पता लग गया कि बिजली विभाग के एसई आने वाले समय में अपने जवाबों से इस धार्मिक शहर के अंदर किसी बड़े उपद्रव का कारण बन सकते हैं क्‍योंकि उनका जवाब किसी भी समय आग के अंदर घी डालने का काम कर बैठेगा।
आज ही लखनऊ से छपे समाचार में स्‍पष्‍ट चेतावनी दी गई है कि पॉवर कार्पोरेशन ने पश्‍चिमी उत्‍तर प्रदेश को और बिजली दे पाने में असमर्थता जाहिर की है इसलिए पश्‍चिमी उत्‍तर प्रदेश के लोग बिजली का भारी संकट झेलने को तैयार रहें।
इन स्‍थितियों में गर्मी और बिजली संकट के साथ-साथ लोगों का दिमागी पारा भी बढ़ना स्‍वाभाविक है। उत्‍तेजित लोगों को जब कहीं से कोई संतोषजनक या आशावादी उत्‍तर नहीं मिलेगा तो टकराव की संभावना भी बढ़ जायेगी।
यूं भी बिजली विभाग ने प्रति किलोवाट के हिसाब से हर कनेक्‍शन पर मिनीमम बिल तो निर्धारित कर रखा है किंतु मिनीमम सप्‍लाई आज तक तय नहीं की।
कहने का मतलब यह है कि यदि कोई उपभोक्‍ता अपने निर्धारित भार का ईमानदारी के साथ इस्‍तेमाल कर रहा है तो बिजली विभाग उसे उसके हक की बिजली दिये बिना भी जबरन मिनमम बिल वसूल रहा है।
यह बात अलग है कि कोई भी ईमानदार उपभोक्‍ता अतिरिक्‍त एक यूनिट बिजली का इस्‍तेमाल नहीं कर सकता।
प्रदेश के सर्वाधिक भ्रष्‍ट विभागों में से एक बिजली विभाग के अंदर बिलिंग से किये गये करोड़ों के भ्रष्‍टाचार का मामला गत दिनों सामने आ ही चुका है। कनेक्‍शन से लेकर बिल के भुगतान तक में सुविधा शुल्‍क देकर कुछ भी खेल इस विभाग के कर्मचारी और अधिकारियों से करा लेना आम बात है, लेकिन बिजली की भारी किल्‍लत पर जवाबदेही लेने को कोई तैयार नहीं।
मथुरा ही नहीं, प्रदेश के हर जिले में बिजली विभाग के अफसरों की कार्यशैली लगभग ऐसी ही देखने को मिलती है जबकि उनकी माली हैसियत उनके पद से मिलने वाली तनख्‍वाह की तुलना में बहुत अच्‍छी देखी जा सकती है।
अतिरिक्‍त कमाई में बिजली विभाग का अदना सा कर्मचारी भी किसी से पीछे नहीं रहता किंतु जवाबदेही में उच्‍च अफसर भी सबसे छोटे कर्मचारी से तुलना करते नहीं शरमाते। वो बेझिझक कहते हैं कि उन्‍हें कुछ नहीं पता, कब तक हालात सुधरेंगे।
शायद इसीलिए सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह बार-बार कहते हैं कि कुछ अफसर ही अखिलेश सरकार की छवि धूमिल करने पर आमादा हैं। संभवत: मुलायम सिंह जानते हैं कि प्रदीप मित्‍तल जैसे अफसरों की संख्‍या ही अधिक है जो सरकार से तो सब-कुछ ले रहे हैं लेकिन उसकी ओर से गुड़ तो छोड़िये गुड़ जैसी बात भी नहीं करते।
गौरतलब है कि मथुरा, प्रदेश के उन अजूबे जिलों में से है जहां आज तक समाजवादी पार्टी का न तो कभी लोकसभा में कोई प्रतिनिधि पहुंच सका और न विधानसभा में, हालांकि पार्टी ने हरसंभव प्रयास किया।
अब 2017 में फिर विधानसभा के चुनाव होने हैं, अखिलेश सरकार केंद्र की पिछली यूपीए सरकार जैसा आचार-व्‍यवहार कर रही है। मुख्‍यमंत्री मुगालते में हैं कि उन्‍होंने उत्‍तर प्रदेश को उत्‍तम प्रदेश बनाने की राह पर ला खड़ा किया है। अफसर उनके इस मुगालते को बनाये रखना चाहते हैं। पार्टी की जिला इकाइयां सत्‍ता के मद में चूर हैं। पार्टी के पदाधिकारी या तो अंतर्कलह के शिकार हैं या निजी स्‍वार्थ पूरे कराने में लिप्‍त। आम आदमी के लिए जवाबदेही वह भी महसूस नहीं कर रहे।
फिर चाहे बात आज के लिए आवश्‍यक आवश्‍यकता बन चुकी बिजली की किल्‍लत से ताल्‍लुक रखती हो अथवा बेलगाम हो चुकी कानून-व्‍यवस्‍था से जुड़ी हो। अधिकारी चूंकि ले-देकर सीधे अपनी मनमाफिक तैनाती कराने में सक्षम हैं, इसलिए वह न तो जनता की सुनते हैं और न पार्टी पदाधिकारियों को कुछ समझते हैं।
अब भी वक्‍त है यदि माननीय मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव और उनका समाजवादी कुनबा इस तल्‍ख सच्‍चाई को महसूस करते हुए कुछ ठोस कदम उठा लें अन्‍यथा प्रदीप मित्‍तल जैसे अफसर उनकी जड़ों में मठ्ठा डालने का काम बखूबी कर ही रहे हैं।
-लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष

शनिवार, 28 मार्च 2015

उत्‍तर प्रदेश विधान सभा: न पक्ष, न विपक्ष…सिर्फ एक पक्ष और समकक्ष

कल के किसी अखबार में पहले पन्‍ने पर दो कॉलम की एक खबर छपी थी। खबर का मजमून कुल जमा यह था कि उत्‍तर प्रदेश विधान सभा के बजट सत्र का आखिरी दिन ‘माननीयों के नाम रहा।
इस दिन विधान सभा व विधान परिषद् सदस्‍यों के वेतन-भत्‍ते व कूपन बढ़ाने का विधेयक पेश किया गया, जिस पर ‘आश्‍चर्यजनक किंतु सत्‍य’ की तरह समूची विधायिका ने गजब की एकजुटता दिखाते हुए अपनी सहमति प्रदान कर दी लिहाजा पलक झपकते यह विधेयक पास भी हो गया।
”माननीयों” के वेतन-भत्‍ते व कूपनों में हुई इस वृद्धि से सरकारी खजाने पर करीब-करीब 48 करोड़ रुपए का सालाना खर्च और बढ़ जायेगा।
वैसे यह कोई पहला अवसर नहीं है जब माननीयों ने सर्वसम्‍मति से इस तरह अपने वेतन-भत्‍ते बढ़ाये हों, पूर्व में भी हमेशा यही होता रहा है। अपवाद स्‍वरूप कभी किसी माननीय ने इस पर विरोध दर्ज कराया भी है तो उसकी आवाज नक्‍कार खाने में ‘तूती’ ही साबित हुई है।
यूं देखा जाए तो भारतीय राजनीति का यही कड़वा सच है किंतु जाति, धर्म, संप्रदाय का शिकार आमजन इसे स्‍वीकार करने को तैयार नहीं होता। वह दलगत राजनीति की दलदल में इतना नीचे तक धंस चुका है कि उसे सच्‍चाई दिखाई नहीं देती। उसके लिए अपने मां-बाप से अधिक अपनी पार्टी के नेता की अहमियत है। जिन्‍हें अपने परिजनों की जन्‍म व पुण्‍य तिथियां याद नहीं रहतीं, वह अपनी पार्टी के नेता की इन तिथियों पर आयोजन करना कभी नहीं भूलते।
इसे आमजन का दुर्भाग्‍य कहें या राजनेताओं का सौभाग्‍य कि जिस देश में विभिन्‍न कारणों से लगभग हर दिन किसान आत्‍महत्‍या कर रहा है, महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं, युवक बेरोजगार हैं, अपराधियों का बोलबाला है, कानून का राज केवल किताबों तक सीमित है, उस देश के सबसे बड़े प्रदेश में माननीयों के वेतन-भत्‍ते बढ़ाने का विधेयक तो बिना किसी विरोध के एक दिन के अंदर पास हो जाता है और जनहित से जुड़े विधेयक दलगत राजनीति की भेंट चढ़ जाते हैं।
उत्‍तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के युवराज पर भरोसा करके जनता ने उन्‍हें उसी तरह भारी समर्थन देकर सत्‍तारुढ़ कराया था, जिस तरह 2014 के लोकसभा चुनावों में मोदी पर भरोसा करके भाजपा को कराया। अखिलेश सरकार ने अपने तीन साल पूरे कर लिये। अभी दो साल बाकी हैं।
आत्‍ममुग्‍धता की शिकार अखिलेश सरकार और सत्‍ता के नशे में चूर समाजवादी कुनबा शायद यह समझ बैठा है कि यूपी की सत्‍ता पर उनका स्‍थाई कब्‍जा हो चुका है। तभी तो नेता सदन अहमद हसन ने पिछले दिनों हुई बेमौसम बारिश व ओलावृष्‍टि से बर्बाद फसल को देखकर किसानों की आत्‍महत्‍या पर कहा था कि प्रदेश में एक भी किसान ने आत्‍महत्‍या नहीं की, उनकी मौत तो प्राकृतिक आपदा के चलते हुई है।
कुछ ऐसा ही मुगालता संभवत: भाजपा, बसपा और दूसरे दलों को है कि समाजवादी पार्टी से ऊब चुकी जनता के पास 2017 के विधानसभा चुनावों में उनके अलावा कोई विकल्‍प नहीं है।
वर्तमान राजनीतिक परिस्‍थितियों पर दृष्‍टि डालें तो उनका मुगालता एक बार को सही प्रतीत होता है परंतु हकीकत कुछ और भी है। अब जनता अपने शासकों के हर कर्म व कुकर्म पर पैनी नजर गढ़ाये रहती है और सही वक्‍त का इंतजार करती है। लोकसभा चुनावों से पहले उसने कांग्रेस के नेतृत्‍व वाली यूपीए सरकार को खूब सहा और दिल्‍ली में चुनावों से पूर्व भी उसने अपने भाव प्रकट नहीं होने दिये। अब बारी उत्‍तर प्रदेश की है। देश के एक ऐसे सूबे की जिसने अब तक सर्वाधिक प्रधानमंत्री दिये हैं। जिसने देश की राजनीति की दिशा व दशा दोनों को तय करने में हमेशा महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई है।
बजट सत्र के आखिरी दिन ‘माननीयों’ के वेतन-भत्‍ते बढ़ाने को जो विधायकी खेल खेला गया, उससे समाजवादी पार्टी को कोई नुकसान शायद ही पहुंचे क्‍योंकि वह अपना जितना तथा जो कुछ नुकसान अपने ही हाथों कर सकती थी वह कर चुकी है और उसकी भरपाई करने का वक्‍त भी निकल चुका है लेकिन 2017 में सत्‍तारूढ़ होने का ख्‍वाब देख रहीं भाजपा एवं बसपा जैसी पार्टियों के लिए यह खेल भारी पड़ सकता है।
सामान्‍य तौर पर सांप और नेवले की भांति हर वक्‍त एक दूसरे को पटखनी देने की जुगत में लगे दिखाई देने वाले और सदन के अंदर सारी मान-मर्यादाओं को ताक पर रखकर लड़ने-झगड़ने वाले, बात-बात पर सदन को बाधित करने तथा उसके लिए नियम-कानूनों की धज्‍जियां उड़ाने वाले माननीय जब अपने वेतन-भत्‍तों पर चोर-चोर मौसेरे भाई की कहावत को चरितार्थ करते दिखाई देते हों तो जनता का सोचने पर मजबूर होना स्‍वाभाविक है।
इस सबके बीच इस सारे घटनाक्रम पर सिर्फ राज्‍यपाल रामनाइक का आपत्‍ति दर्ज कराना गौरतलब है। माना कि वह भारतीय जनता पार्टी से ही ताल्‍लुक रखते हैं किंतु उनकी आपत्‍ति पद की गरिमा के अनुकूल तथा भाजपा के प्रतिकूल कही जा सकती है। भाजपा के प्रतिकूल इसलिए क्‍योंकि भाजपा के माननीय भी विधेयक पास कराने वालों में शामिल थे।
हो सकता है कि रामनाइक को व्‍यक्‍तिगत स्‍तर पर माननीयों की यह करतूत नागवार गुजरी हो परंतु राज्‍यपाल जिस तरह अब इस देश में मात्र एक पद नाम रह गया है, उससे ऐसा लगता है कि इससे अधिक महामहिम राज्‍यपाल और कुछ कर भी नहीं सकते थे।
जनहित में कोई क्रांतिकारी कदम उठाने की अपेक्षा तो अब किसी से भी करना, अपनी अक्‍ल पर प्रश्‍नचिन्‍ह लगवाने के समान है। फिर रामनाइक ऐसा कोई कदम कैसे उठा सकते हैं, आखिर अंग्रेजों से विरासत में मिली व्‍यवस्‍था का सुख उम्र के इस पड़ाव पर मिलना कुछ तो अहमियत रखता ही है। ताजिंदगी न सही, जब तक मोदी सरकार है तब तक ही सही। सूबे के महामहिम का तमगा यूं ही नहीं छोड़ा जाता।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2015

मैं... मेरा परिवार... और हमारी सबसे अच्‍छी सरकार

मुलायम सिंह, शिवपाल सिंह, रामगोपाल और आजम खान जैसी सपाई सूरमाओं से घिरे सूबे के मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव अपने अधिकारियों के साथ क्रिकेट का मैच खेल रहे हैं जबकि कहीं जेल के अंदर गैंगवार हो रही है तो कहीं कोर्ट के अंदर।
मथुरा में जेल के अंदर हुई गैंगवार का नतीजा जब गैंगेस्‍टर के अनुकूल नहीं निकलता तो वह पुलिस अभिरक्षा में अपने घायल प्रतिद्वंदी को तब सरेराह मौत के घाट उतार देते हैं जब उसे इलाज के लिए आगरा ले जाया जा रहा था।
मुजफ्फरनगर में अदालत के अंदर नाबालिग लड़का वकील का चोला पहनकर कुख्‍यात अपराधी को 'माननीय' की आंखों के सामने गोलियां बरसाकर भून देता है।
सहारनपुर में तनिष्‍क के शोरूम पर डाका पड़ता है और बदमाश करीब दस करोड़ रुपए के गहने ले जाते हैं।
यह आपराधिक वारदातें तो चंद उदाहरण भर हैं, अन्‍यथा प्रदेश का शायद ही कोई जिला ऐसा हो जहां अपराधी बेखौफ होकर अपने मकसद को अंजाम न दे रहे हों। ऐसा लगता है जैसे प्रदेश में सरकार नाम की कोई चीज है भी नहीं। सरकार के नाम पर जो कुछ व जितना कुछ नजर आ रहा है, वह सिर्फ एक परिवार का आधिपत्‍य है।
अधिकारी भी रोज-रोज होने वाली अपनी ट्रांसफर-पोस्‍टिंग्‍स से परेशान हैं किंतु समाजवादी कुनबे के लिए यह सब एक ऐसा धंधा है जिसमें बिना कुछ लगाये करोड़ों की कमाई हो रही है। प्रदेश में शायद ही कोई ऐसा पुलिस अथवा प्रशासनिक अधिकारी होगा, जिसे कहीं टिकने दिया गया हो।
पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी अब दबी जुबान से यह कहने भी लगे हैं कि निर्धारित समय के अंदर जिसने अपनी पोस्‍टिंग का रिन्‍यूअल नहीं कराया तो समझो अगली लिस्‍ट में उसका नप जाना तय है। 
घोर आश्‍चर्य की बात यह है कि इतना सब-कुछ होने के बाद भी मुख्‍यमंत्री से लेकर सुपर मुख्‍यमंत्रियों तक की फौज कहती है कि उत्‍तर प्रदेश की कानून-व्‍यवस्‍था दूसरे सभी राज्‍यों से बेहतर है।
यह स्‍थिति करीब-करीब वैसी ही है जैसी 2012 से मनमोहन सिंह के नेतृत्‍व वाली यूपीए
सरकार की हो गई थी। लोकसभा के चुनाव बेशक 2014 में होने थे किंतु सरकार 2012 से ही अपंगता का शिकार बन चुकी थी।
सपा और यूपीए सरकार के बीच एक अन्‍य समानता भी देखी जा रही है। और यह समानता है आत्‍मप्रशंसा करने के मामले में। कांग्रेस की दुर्गति पूरे देश को साफ-साफ दिखाई दे रही थी लेकिन कांग्रेसी कहते थे कि उनसे अच्‍छी सरकार चलाना कोई जानता ही नहीं। आज यही काम अखिलेश के नेतृत्‍व वाली सरकार कर रही है।
सच तो यह है कि पूरा समाजवादी कुनबा प्रदेश को कुछ इस तरह चला रहा है जैसे कोई अपनी प्राइवेट कंपनी को चलाता है। समाजवादी कुनबा संभवत: इस मुगालते में है कि 2017 के चुनावों का नतीजा उनके अनुकूल रहेगा क्‍योंकि उनसे अच्‍छा शासक कोई है नहीं। बेहतर ही रहेगा यदि वह और कुछ समय तक इस मुगालते को पाले रहें क्‍योंकि उनके ऐसे मुगालते में ही जनता की भलाई छिपी है। जनता को इनके शासन से छुटकारा इनके ऐसे मुगालते से ही मिल सकता है।
इसमें कोई दो राय नहीं कि 2017 के चुनावों तक उत्‍तर प्रदेश को यह लोग लालू के कार्यकाल का बिहार बना कर रख देंगे लेकिन उत्‍तर प्रदेश के उत्‍तम प्रदेश बनने का मार्ग भी तभी प्रशस्‍त होगा।
आज हालांकि आशा की कोई किरण स्‍पष्‍ट नहीं है परंतु 2017 के चुनावों तक जरूर हो जायेगी। यूं भी जनता अब काफी समझदार हो चुकी है। वह राजनेताओं की मनमानी का जवाब देने के लिए अपने समय का इंतजार करती है और मौका मिलते ही वही हाल बना देती है जैसे लोकसभा चुनावों के दौरान यूपी के अंदर कांग्रेस, सपा, बसपा तथा रालोद का किया था, या फिर हाल ही में दिल्‍ली के अंदर कांग्रेस व भाजपा का किया।
इसलिए और कुछ समय इंतजार कीजिए, फिर जनता बता देगी कि अखिलेश सरकार कितनी काबिल रही तथा समाजवादी कुनबे की मनमानी का नतीजा क्‍या रहा।
-लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष

बुधवार, 17 दिसंबर 2014

किशनी से लेकर कृष्‍ण के धाम तक...

आगरा से प्रकाशित दैनिक जागरण अखबार के सातवें पृष्‍ठ पर बॉटम में एक खबर छपी है। इस सिंगल कॉलम खबर का शीर्षक है- दुष्‍कर्म के बाद मुकद्दमे का इंतजार, थाने में बैठी किशोरी।
खबर के अनुसार विधवा और गूंगी-बहरी अपनी मां के साथ किशनी थाना क्षेत्र के गांव ढकरोई में रह रही एक पंद्रह वर्षीय किशोरी को गांव के ही 45 वर्षीय सरविंद उर्फ पुलंदर बाथम ने तब अपनी हवस का शिकार बना डाला जब वह शौच के लिए खेत पर गई थी।
मंगलवार सुबह 7 बजे की गई इस वारदात का मुकद्दमा लिखाने थाने पहुंची किशोरी के प्रार्थना पत्र पर पुलिस ने जांच के आदेश दे दिये लेकिन मुकद्दमा दर्ज नहीं किया। मुकद्दमा दर्ज होने के इंतजार में पीड़िता देर शाम तक थाने पर ही बैठी थी।
यहां यह जान लेना जरूरी है कि कस्‍बा किशनी, मैनपुरी जिले का हिस्‍सा है और वहां से सांसद हैं सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के पौत्र तेज प्रताप सिंह यादव। वही तेज प्रताप सिंह यादव जिनका रिश्‍ता कल ही राजद मुखिया लालू प्रसाद यादव की पुत्री राजलक्ष्‍मी के साथ तय हुआ है।
समाजवादी कुनबे के सबसे लाड़ले सदस्‍य की कांस्‍टीट्यूएन्‍सी में पुलिस का यह हाल है तो जाहिर है कि सूबे के अन्‍य जनपदों की पुलिस का इससे अलग कुछ होने से रहा।
फिर कृष्‍ण की नगरी मथुरा में तो समाजवादी पार्टी बदहाल है। यहां से न उसका कोई सांसद है और न विधायक। लाख प्रयास के बावजूद मुलायम के नेतृत्‍व वाला समाजवादी कुनबा यहां अपना खाता तक खोल पाने में कभी सफल नहीं हुआ।
समाजवादी पार्टी के लिए ऐसे सूखाग्रस्‍त क्षेत्र में यदि एमबीए की छात्रा से बलात्‍कार की वारदात का मुकद्दमा तीन दिन तक जांच कराने के बाद लिखा गया, तो इसमें कौन सी बड़ी बात हो गई।
ऊपर से यहां तो लड़की जिस व्‍यक्‍ति के खिलाफ बलात्‍कार के आरोप की तहरीर लेकर गई थी, वह तमाम तमगों से विभूषित था।
वह उत्‍तर प्रदेश जर्नलिस्‍ट एसोसिएशन का प्रदेश उपाध्‍यक्ष, ब्रज प्रेस क्‍लब का अध्‍यक्ष, स्‍थानीय छावनी परिषद् का पूर्व उपाध्‍यक्ष होने के साथ-साथ पत्रकार था... वकील था... और पता नहीं क्‍या-क्‍या था। साथ में बसपा की टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ चुका था।
मथुरा की महिला एसएसपी मंजिल सैनी स्‍वयं उसके निजी कार्यक्रम का हिस्‍सा बनने उसके निवास तक पहुंच चुकी थीं।
उसे समाज के तमाम सफेदपोश सभ्रांत उद्योगपति, व्‍यापारी, नेता, बिल्‍डर, ब्‍यूरोक्रेट्स और पत्रकारों से न केवल चरित्र प्रमाण पत्र प्राप्‍त था बल्‍कि वह उसके दरबार की शोभा बढ़ाया करते थे। उसके यहां हर दिन हाजिरी लगाना बहुत से तथाकथित सभ्रांतजनों का शगल था।
कृष्‍ण का धाम जिन नेताओं के कारण समाजवादी पार्टी की पहचान बना हुआ है, वह भी बलात्‍कार के आरोपी की खुलेआम पैरवी कर रहे थे और एसएसपी से मुलाकात करके बता रहे थे कि पत्रकार को साजिश का शिकार बनाया जा रहा है।
दूसरी पार्टियों का भी कोई नेता उसके खिलाफ मुंह खोलने की जुर्रत नहीं कर सकता था क्‍योंकि सब आये दिन उसके लिए राग दरबारी का गायन करते रहे थे। अधिकांश पत्रकार तो हर दिन उसकी चौखट चूमने ऐसे जाया करते थे जैसे द्वारिकाधीश मंदिर की मंगला या शयन आरती करने बहुत से उनके भक्‍त बेनागा जाते हैं।
इन हालातों में मंजिल सैनी यदि बलात्‍कार के आरोपी को लेकर किसी मंजिल तक फिलहाल नहीं पहुंच पाईं हैं, तो उन्‍हें दोष देना भी किसी साजिश का हिस्‍सा लगता है। एफआईआर तो कोई भी किसी के खिलाफ लिखा सकता है।
मंजिल सैनी ने तो उसके बाद बहुत कुछ करवा दिया। कई दिन बाद ही सही लेकिन पीड़िता का मेडीकल कराया, 161 के बयान कराये, उससे पहले खुद उससे सफाई मांगी, उसके अगले दिन कोर्ट में 164  के बयान कराये।
बाकी रह गई गिरफ्तारी...तो वह होती रहेगी। तब तक आरोपी को पीड़िता और उसके परिजनों से जबरन सुलह-सफाई कराने का अवसर देने में क्‍या हर्ज है।
इसके लिए पीड़िता के परिजनों पर एक नहीं, दो-दो मुकद्दमे कायम किये गये। सुलह-सफाई के लिए वो उपलब्‍ध रहें इसलिए गिरफ्तारी उनकी भी नहीं की गई।
एसएसपी महोदया भी आखिर हैं तो सामाजिक प्राणी, वह भी समाज का हिस्‍सा हैं और इसीलिए मानती हैं कि जो काम समाज के तथाकथित ही सही पर सभ्रांत तत्‍वों द्वारा समझौता करके संपन्‍न करा लिया जाता है, वह कानून नहीं कर पाता।
समझौते के लिए समय की दरकार होती है, इसलिए समय अफरात में दिया जा रहा है। यूं भी उनके पास समय की कमी होती तो वह निजी कार्यक्रमों का हिस्‍सा बनने नहीं जातीं।
रहा सवाल ''आजतक'' जैसे राष्‍ट्रीय चैनल का... तो उसने अपने कार्यक्रम ''वारदात'' में 'कानून का रेप' जैसे शीर्षक वाली सनसनीखेज रिपोर्टिंग करके क्‍या कर लिया। एसएसपी महोदया को न गिरफ्तारी करनी थी, न की।
करें भी क्‍यों...जब किशनी से लेकर कृष्‍ण के धाम तक समाजवादी पुलिस का रवैया आम आरोपियों के लिए एक समान है तो खास आरोपियों के साथ खास व्‍यवहार करना कैसे गुनाह हो सकता है।
मथुरा में बलात्‍कार की शिकार लड़की के 3 तारीख के प्रार्थना पत्र पर 6 तारीख को मुकद्दमा दर्ज करा दिया, 11 तारीख को 161 के बयान तथा मेडीकल करवा दिया, 12 तारीख को 164 के बयान कराकर अपना कर्तव्‍य पूरा कर दिया। उसी दिन पीड़िता के बयानों की कोर्ट से नकल लेने के लिए एप्‍लीकेशन डाल दी। 15 तारीख को नकल हासिल कर ली।
इतना कुछ कर डाला सिवाय एक गिरफ्तारी के, तो इसमें इतनी हायतौबा मचाने वाली क्‍या बात है।
जब लड़की करीब डेढ़ साल तक यौन उत्‍पीड़न सहने के बाद एफआईआर करा सकती है तो पुलिस उसकी जांच के लिए साल-छ: महीने का समय नहीं ले सकती। इसमें गलत क्‍या है।
और फिर बिना जांच के ऐसे कैसे किसी सभ्रांत पत्रकार को गिरफ्तार किया जा सकता है। जांच होती किसलिए है। जांच में कोई आंच आरोपी पर नहीं आई तो पुलिस किसे मुंह दिखायेगी।
तभी तो कृष्‍ण का धाम हो या तेजू भैया की किशनी...बिना जांच के रेप जैसे संगीन आरोप की एफआईआर दर्ज नहीं की जाती।
एक जांच एफआईआर से पहले और एक जांच एफआईआर के बाद...यही है सच्‍चा समाजवाद और इसी को कहते हैं समाजवादी सरकार का इकबाल।
-लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष

रविवार, 5 अक्टूबर 2014

IAS के उत्‍पीड़न में अखिलेश सरकार पर 5 लाख जुर्माना

लखनऊ। 
सुप्रीम कोर्ट ने अखिलेश सरकार पर एक आईएएस अफसर के उत्पीड़न के मामले में पांच लाख रुपए का जुर्माना लगाया है। साथ ही, अफसर को सभी आरोपों से बरी कर दिया।
मामला 1979 बैच के आईएएस विजय शंकर पांडेय से जुड़ा है। उन्हें मायावती सरकार में 16 अप्रैल 2011 को प्रमुख सचिव सूचना, सचिवालय प्रशासन और खाद्य एंव औषधि नियंत्रण विभाग से हटा दिया गया था। उन्हें सदस्य राजस्व परिषद के पद पर तैनात किया गया था। उन पर यह कार्रवाई सिर्फ इसलिए की गई थी क्योंकि वह एक भ्रष्टाचार विरोधी संगठन के संस्थापक सदस्य थे। पांडेय ने इंडिया रिजुवनेशन इनिशिएटिव नाम के भ्रष्टाचार रोधी संगठन बनाया। बाद में, विदेश से कालाधन वापस लाने और टैक्स चोर हसन अली के खिलाफ जांच की सुस्त रफ्तार पर प्रवर्तन निदेशालय के खिलाफ याचिका दाखिल की थी। मायावती सरकार ने इसे आईएएस सेवा नियमों का उल्लंघन माना। विभागीय जांच बिठाई। वह बेदाग निकले। अखिलेश यादव सरकार ने भी जांच बिठाई। इस पर पांडेय कैट गए, जहां उनकी याचिका खारिज हो गई।
फैसले में क्या कहा सुप्रीम कोर्ट
कोर्ट के फैसले में कहा गया कि इस गलत कार्रवाई के लिए उन अफसरों की तलाश होनी चाहिए, जो इसके लिए जिम्मेदार हैं। साथ ही, उनसे जुर्माना भी वसूला जाना चाहिए। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इसलिए लपेट लिया, क्योंकि केंद्र सरकार ही आईएएस अफसरों का कैडर तय करती है।
कैसे चला संघर्ष
विजय शंकर पांडेय की इस कार्यवाही से उस दौरान मुख्यमंत्री रही मायावती उन पर भड़क उठी थी। उन्होंने इसे आईएएस सर्विस रुल का उल्लंघन माना और  27 फरवरी 2012 को विजयशंकर पर विभागीय जांच बैठा दी। इस जांच की जिम्मेदारी जांच अधिकारी जगन मेथ्यु को सौंपी गईं थी। जगन ने अपनी जांच रिपोर्ट 30 अगस्त को सौंपी। इसमें उन्होंने विजय शंकर पांडेय पर लगाए गए सारे आरोप निराधार पाए।
हालांकि, मायावती की सरकार चले जाने के बावजूद उनका उत्पीड़न बंद नहीं हुआ था। जब जांच में उनके ऊपर आरोप सिद्ध नहीं हुए तो अखिलेश सरकार ने 11 सितंबर को विजय शंकर पांडेय के मामले पर जांच कमिटी बिठा दी। इस कमिटी में तत्कालीन कृषि उत्पादन आयुक्त आलोक रंजन और अनिल कुमार गुप्ता थे।
सरकार के इस फैसले के खिलाफ विजय शंकर ने 26 सितंबर को कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। लेकिन 20 दिसंबर 2013 को कोर्ट ने उनकी अर्जी खारिज कर दी। इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन वहां भी याचिका खारिज हो गई। इसके बाद विजय शंकर पांडेय तीन अप्रैल 2014 को सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए। शुक्रवार को उन्हें न्याय मिला, कोर्ट ने अखिलेश सरकार और केंद्र सरकार पर जुर्माना ठोंकते हुए पांच लाख रुपए का जुर्माना लगाया गया। यह जुर्माना दोनों सरकार को मिलकर विजय शंकर पांडेय को देना है।
क्या कहते हैं जानकार
पूर्व आईएएस अफसर एसएन शुक्ला का कहना हैं कि सुप्रीम कोर्ट का यह ऐतिहासिक फैसला है। इसे सिर्फ विजय शंकर पांडेय के लिए नहीं मानना चाहिए, बल्कि यह फैसला उन सभी अफसरों का हौसला बढ़ाने के लिए है, जो सरकार के गलत कामों पर अपनी आवाज बुलंद करना चाहते हैं। यह फैसला सिर्फ सरकारों के साथ उन अफसरों की भी आंख खोलेगा, जो सरकार के कहने पर ईमानदार अफसरों का उत्पीड़न करते हैं।
क्या कहना हैं सरकार में बैठे अफसरों का
सरकार में बैठे कई आईएएस अफसर सुप्रीमकोर्ट के इस फैसले से उत्साहित हैं। नाम नहीं छपने की शर्त पर वह कहते हैं कि इस फैसले से अफसरों का मोरल बढ़ा है। अब जो अधिकारी दबाव में चुप्पी साधे रहते थे, वह अब गलत काम के खिलाफ अपना मुंह खोल सकेंगे। एक वरिष्ठ सीनियर आईएएस अफसर कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने इस फैसले से सरकार के गलत कामों के खिलाफ बोलने वाले अफसरों को एक सुरक्षा कवच दे दिया है। 
कौन हैं विजय शंकर पांडेय
1979 बैच के आईएएस विजय शंकर पांडेय उप्र सहकारी कताई मिल संघ में एमडी रहते हुए लिए गए निर्णयों को लेकर चर्चित हुए थे। उनके फैसलों को लेकर सतर्कता जांच तक हुई। इसके बाद भ्रष्ट आईएएस अफसरों को चिन्हित करने को लेकर छेड़ी गई अपनी मुहिम के कारण चर्चा में रहे। इससे तमाम वरिष्ठ आईएएस अफसर उनसे नाराज हुए और तत्कालीन प्रमुख सचिव नीरा यादव का उनसे टकराव हुआ। बसपा शासन में कैबिनेट सचिव के साथ उनकी अंदरखाने में होने वाली खटपट को लेकर भी वह खासे चर्चित रहे।
-एजेंसी

गुरुवार, 9 जनवरी 2014

जनहित की नई परिभाष गढ़ रही सपा: मंत्री से रेप केस वापस लेंगे CM

लखनऊ। 
सरकार ने अब स्टैंप एवं पंजीयन राज्य मंत्री मनोज कुमार पारस पर चल रहे रेप के मुकद्दमे को वापस लेने का फैसला किया है। न्याय विभाग के विशेष सचिव रंगनाथ पांडेय ने बिजनौर के डीएम को पत्र लिखकर कहा है कि सरकार जनहित में इस मुकद्दमे को वापस लेना चाहती है। बिजनौर कोर्ट में चल रहे इस मुकद्दमे की कार्यवाही पर हाईकोर्ट ने स्टे लगा रखा है।
न्याय विभाग के विशेष सचिव रंगनाथ पांडेय की ओर से डीएम को भेजे गए पत्र में कहा गया है कि थाना नगीना, जिला बिजनौर में दर्ज इस मुकद्दमे के तथ्यों और उपलब्ध आख्या पर विचार के बाद सरकार ने जनहित व न्यायहित में वापस लेने का फैसला लिया है। उन्होंने यह भी लिखा है कि राज्यपाल ने भी इस मुकद्दमे के अभियोजन को वापस लेने के लिए लोक अभियोजनक को न्यायालय में प्रार्थना पत्र पेश करने की अनुमति दे दी है।
कोर्ट में दाखिल किया प्रार्थना-पत्र
पत्र मिलने के बाद बिजनौर के सहायक लोक अभियोजक ने सीआरपीसी की धारा 321 के तहत कोर्ट में अर्जी दाखिल कर दी है। अर्जी में कहा गया है कि जनहित में सरकार ने केस वापस लेने का फैसला किया है। यह भी तर्क दिया जा रहा है कि अदालत में मुकद्दमों का भार ज्यादा है, ऐसे में इस तरह के मामलों को न्यायहित में वापस लिया जाना चाहिए।
2006 में लगा था आरोप
नगीना के विधायक और मंत्री मनोज कुमार पारस पर आरोप लगा था कि एक दलित महिला को अपने घर बुलाकर 8 दिसंबर, 2006 को 3 सहयोगियों के साथ रेप किया था। महिला को राशन की दुकान आवंटित कराने का लालच दिया गया था। तब राज्य में एसपी की सरकार थी। महिला ने काफी प्रयास किया पर उसका केस दर्ज नहीं हुआ। 19 दिसंबर, 2006 को महिला ने सीजेएम कोर्ट में अर्जी दी तो 15 जनवरी, 2007 को उसका केस दर्ज किया गया। मंत्री और उसके सहयोगियों पर गैंग रेप, एससी-एसटी ऐक्ट दर्ज है। बिजनौर कोर्ट ने मंत्री के खिलाफ कुर्की के आदेश जारी किए तो मंत्री ने हाई कोर्ट से इस पर स्टे ले लिया।
इस मुद्दे पर विक्टिम की वकील ऐश्वर्य चैधरी ने कहा, 'सरकार इतने गंभीर मामले में भी मंत्री को संरक्षण दे रही है, साथ ही कानून का भी उल्लंघन कर रही है। अभी यह मामला हाईकोर्ट से स्टे है। वहीं सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश के अनुसार इस मामले को तब तक वापस नहीं लिया जा सकता जब तक कि इसमें पीड़ित महिला की अनुमति न हो।'
बिजनौर के डीएम ने कहा, 'शासन से इस मामले का एक पत्र जरूर मिला है लेकिन उस पर कोई कार्यवाही नहीं हो रही है। इस पर विचार किया जा रहा है।'
-एजेंसी

बुधवार, 8 जनवरी 2014

ये रहे हमारे नीरो और उनकी बांसुरी

लखनऊ। 
यूपी के मुजफ्फरनगर दंगों को अभी ज्यादा वक्त नहीं बीता है। दंगा पीड़ित अभी भी मुसीबतों से भरी जिंदगी जीने को मजूबर हैं। कंपकंपा देने वाली ठंड में वह बिना बुनियादी सुविधाओं के खुले आसमान में रहने पर मजबूर हैं। इनको राहत देने की बजाय उत्तर प्रदेश सरकार के आठ राज्य मंत्री और नौ विधायक पांच देशों की स्टडी यात्रा पर निकले हैं। गौरतलब है कि सरकार मुजफ्फरनगर दंगों में अव्यवस्था को लेकर आलोचना झेल रही है। समूह में एक भाजपा और आरजेडी विधायक के साथ राजस्व मंत्री अंबिका चौधरी भी शामिल हैं।
यूपी के नेताओं का दल 18 दिन विदेश में रहेगा। राज्य की कॉमनवेल्थ पार्लियामेंट्री एसोसिएशन के सदस्य मंत्री और विधायक टर्की, नीदरलैंड, यूके, ग्रीस और यूएई की सरकारी खर्च पर यात्रा करेंगे। यह यात्रा एक तरह से सवैतनिक छुटि्टयों की तरह होती है। यात्रा का उद्देश्‍य दूसरे देशों की पार्लियामेंट्री टेक्नीक्स सीखना होता है।
मंत्रियों और विधायकों का यह दल आज सुबह इस्तांबुल के लिए रवाना हुआ। समाजवादी सरकार ने यात्रा के लिए करीब एक करोड़ रूपए मंजूर किए हैं। दल शहरी विकास मंत्री आजम खान के नेतृत्व में गया है। मुजफ्फरनगर जिले का चार्ज भी इन्ही के पास है।
सिंतबर 2013 में हुए मुजफ्फरनगर दंगों के हजारों पीड़ित अब भी घर से बाहर राहत शिविरों में रह रहे हैं। कड़कड़ाती ठंड में बिना बुनियादी सुविधाओं और ठंड के बचने के कपड़ों के बिना जिंदगी जूझ रहे हैं। राज्य सरकार पीड़ितों को जबर्दस्ती अपने घरों में वापस भेजने के लिए दबाव बना रही है। सरकार ने आलोचना से बचने के लिए यह कदम उठाया है।
यात्रा करने वाले समूह में विवादित मंत्री रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैय्या भी शामिल हैं। हाल में राजा भैया पर एक पुलिस अधिकारी की हत्या का आरोप लगा था। जिसके बाद उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। आठ महीने के बाद उन्हें अखिलेश के कैबिनेट में दोबारा से शामिल कर लिया गया था।
-एजेंसी

7141 की आबादी वाले गांव को 334 करोड़ के प्रॉजेक्ट्स

लखनऊ। 
उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में भले ही मूलभूत सुविधाएं न हों लेकिन सत्ताधारी यादव परिवार के गांव सैफई पर सरकार की मेहरबानी जमकर बरस रही है। सैफई महोत्सव पर राज्य के खजाने से करोड़ों रुपये फूंकने की खबरों के बीच एक खबर यह भी है कि सूबे में पिछले 21 महीनों के दौरान समाजवादी पार्टी की सरकार ने सैफई को 334 करोड़ रुपये के प्रॉजेक्ट्स दिए हैं।
सैफई, इटावा जिले का एक गांव है और जसवंत नगर विधानसभा व मैनपुरी लोकसभा क्षेत्र में पड़ता है। इस गांव की कुल आबादी 7141 है। जसवंत नगर से राज्य के पीडब्ल्यूडी मंत्री शिवपाल यादव विधायक हैं और मैनपुरी से मुलायम सिंह यादव सांसद हैं। मुलायम के मुख्यमंत्री रहते भी सैफई का जमकर ख्याल रखा गया था। सैफई को सबडिवीजन बनाया गया और रूरल इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज व रिसर्च, एक स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स और हवाई पट्टी का तोहफा मिला था।
अखिलेश के मुख्यमंत्री बनने के बाद फिर से सैफई के लिए खजाना खोल दिया गया है। एक रिपोर्ट के मुताबिक यहां पांच करोड़ रुपये की लागत से एक स्पोर्ट्स कॉलेज बनाए जाने की योजना है। कक्षा छह से कक्षा 12 तक के लड़कों के लिए यह कॉलेज 71.25 एकड़ में बनाया जाएगा। इसमें वे सारी सुविधाएं होंगी, जो एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर के स्पोर्ट्स कॉलेज में होती हैं।
इसके अलावा 3.11 करोड़ की लागत से एक टूरिजम कॉम्प्लेक्स बनाए जाने की योजना है। पर्यटन सचिव संजीव सरन बताते हैं कि उन्हें इस प्रॉजेक्ट के ज्यादा डीटेल्स याद नहीं है, क्योंकि यह काफी छोटा प्रॉजेक्ट है। 42 करोड़ रुपये की लागत से एक ट्रॉमा और बर्न सेंटर बनाया जा रहा है। इस सेंटर के निर्माण की जिम्मेदारी पिछले साल उत्तर प्रदेश राजकीय निर्माण निगम को दी गई थी।
103.21 करोड़ रुपये की लागत से अंतर्राष्ट्रीय स्पर्धाओं के लिए स्विमिंग पूल्स बनाए जाने का फैसला कैबिनेट ने नवंबर 2012 में लिया था। इस कॉम्प्लेक्स में एक प्रैक्टिस पूल, एक मेन पूल और एक डाइविंग पूल होगा। साथ ही इस कॉम्प्लेक्स में एक प्रशासनिक ब्लॉक, एक जिम, एक वीआईपी गैलेरी और तैराकों के रहने के लिए भी जगह होगी। पिछले महीने ही यहां स्पोर्ट्स डायरेक्टर के पद पर तैनात एक आईएएस ऑफिसर को काम में हो रही देरी की वजह से सस्पेंड कर दिया गया था।
चार करोड़ रुपये 2012 में सैफई हवाई पट्टी लाइट्स की रिपेयरिंग और रखरखाव के लिए पीडब्ल्यूडी को आवंटित किए गए थे। साथ ही 90 लाख रुपये हवाई पट्टी की दीवार की मरम्मत के लिए दिए गए। 26 करोड़ रुपये की लागत से अपना बाजार बनाए जाने की योजना है। इसमें दुकानें, ऑफिस, कैफेटेरिया और किचन बनाए जाएंगे। ये किसानों के लिए एक लोकल मंडी की तरह होगा। इसको यूपी मंडी परिषद् द्वारा बनाया जाना है। 150 करोड़ की लागत से सैफई और मैनपुरी के बीच दो लेन की सड़क को चार लेन का बनाया जा रहा है।
-एजेंसी

गुरुवार, 26 दिसंबर 2013

मुलायम सिंह, मुस्‍लिम और मुंगेरी लाल

(लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष) एक ओर सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह 2014 में किसी भी तरह प्रधानमंत्री की कुर्सी पर काबिज होना चाहते हैं और उसके लिए अपने कार्यकर्ताओं से साफ-साफ कह भी रहे हैं कि अखिलेश को आप लोगों ने सीएम बनवाया, अब मुझे पीएम बनवाओ लेकिन दूसरी ओर वही कार्यकर्ता अपने कारनामों से प्रदेश की जनता के बीच इतना नकारात्‍मक संदेश दे रहे हैं, जितना आजतक इतनी जल्‍दी किसी सरकार का नहीं दिया गया।
सपा मुखिया ने खुद अपने श्रीमुख से कार्यकर्ता और पदाधिकारियों के कारनामों को गुंडई की संज्ञा दी है और वह पूरी तरह सही भी है।
ऐसे में कुछ सवाल स्‍वत: इस आशय के खड़े हो जाते हैं कि सपा मुखिया को जुबानी जमा खर्च करने की जगह क्‍या पहले अपने प्‍यादों को हद में रखने की व्‍यवस्‍था नहीं करनी चाहिए ?
उन्‍हें प्रधानमंत्री की कुर्सी पर काबिज होने का दिवास्‍वप्‍न देखने की बजाय क्‍या पहले अपने पुत्र तथा प्रदेश के मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव को यह नहीं समझाना चाहिए कि वह ऐसा कुछ करें जिससे उन्‍हें अपनी तारीफ में कसीदे खुद न गढ़ने पढ़ें और यह काम प्रदेश की जनता करे ?
क्‍या सपा मुखिया की यह जिम्‍मेदारी नहीं बनती कि वह जिला स्‍तर पर पार्टी पदाधिकारियों में व्‍याप्‍त फूट व अंतर्कलह को समाप्‍त करें और खेमों में बंटे सपाइयों को जनहित में काम करने की सीख सख्‍ती के साथ दें ?
इन सबके अलावा सपा मुखिया को यह भी समझना होगा कि मुस्‍लिम मतदाता अब भली प्रकार वोटों की राजनीति का खेल समझ चुका है और उनकी हर चाल के पीछे छिपी मंशा को भी भांप लेता है। यही कारण है कि उसका सपा सहित उस कांग्रेस से भी मोहभंग हो गया है जिसे सांप्रदायिक शक्‍तियों को किनारे रखने की आड़ में समाजवादी पार्टी बिना शर्त समर्थन देती रही। मुस्‍लिम समाज जान चुका है कि कांग्रेस ने भी उसके साथ जो घिनौना खेल अब तक खेला, उसमें जाने-अनजाने समाजवादी पार्टी की बड़ी भूमिका रही है।
मुलायम सिंह यादव को समझना होगा कि यदि आंख बंद करके हिंदुत्‍व की दुहाई देना सांप्रदायिकता की श्रेणी में आता है तो बिना वजह और बुद्धि व विवेक को ताक पर रखकर मुसलमानों के तथाकथित हितों की थोथी दुहाई देना भी न सिर्फ एक अलग किस्‍म की सांप्रदायिकता है बल्‍कि प्रदेश व देश के दूसरे तबके के साथ अन्‍याय भी है।
समाजवादी पार्टी हो या कांग्रेस, बहुजन समाज पार्टी हो या राष्‍ट्रीय लोकदल, सबकी राजनीति का तरीका और उनकी फितरत अब उन लोगों के गले नहीं उतर रही जिन्‍हें वो अब तक मात्र वोट बैंक समझकर कुर्सी कब्‍जाने का मकसद बारी-बारी से पूरा करते रहे।
यहां भाजपा का जिक्र करना इसलिए बेमानी है क्‍योंकि भाजपा को तो पहले ही इन्‍होंने सांप्रदायिक पार्टी घोषित कर रखा है। यह बात दीगर है कि मुस्‍लिम समाज अब इनके इस प्रचार के पीछे छिपी असलियत का उद्देश्‍य भी जान चुका है लिहाजा खुलेआम इन्‍हें जवाब दे रहा है।
ताजा उदाहरण मुजफ्फरनगर के शरणार्थी शिविरों में मुलायम सिंह द्वारा कही गई बात से मुस्‍लिमों में उपजे आक्रोश का है। मुस्‍लिम समाज ने मुलायम से अपने उस बयान को लेकर माफी तक मांगने की बात कही है।
मुलायम माफी मांगेंगे या नहीं, यह तो वही जानें अलबत्‍ता एक बात तय है कि मुलायम के मुस्‍लिम प्रेम की असलियत खुद मुस्‍लिम समाज के सामने आ चुकी है और ऐसे में मुलायम सिंह व समाजवादी पार्टी दोनों को भली-भांति समझ लेनी चाहिए कि 2014 में उनका प्रधानमंत्री की कुर्सी के लिए ख्‍वाब देखना मुंगेरी लाल के हसीन सपने सरीखा ही है।
बेहतर होगा कि सपा मुखिया और उनका कुनबा समय रहते यह जान ले कि काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती। कहीं ऐसा न हो कि केंद्र की सत्‍ता पर काबिज होने की महत्‍वाकांछा उन्‍हें प्रदेश की राजनीति से भी इतनी दूर ले जाए, जहां से यूपी भी उतनी दूर दिखाई देने लगे जितनी आज दिल्‍ली दूर है। 

शुक्रवार, 13 दिसंबर 2013

विधायक जी बोले...लाश ठिकाने लगवा देंगे

आजमगढ़। 
उत्तर प्रदेश की अखिलेश सरकार के एक विधायक ने ठेका न मिलने पर एक पंचायत ‌‌अधिकारी को जान से मारने की धमकी दी है। धमकी में उन्होंने पंचायत ‌‌अधिकारी से कहा कि उनके आदमी तुम्हारी हत्या कर लाश ठिकाने लगा देंगे। पंचायत ‌‌अधिकारी ने जिले के आला अधिकारियों के साथ-साथ मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव को पत्र भेज कर कार्यवाही की मांग की है। यह मामला आजमगढ़ जिले की जीयनपुर नगर पंचायत का है। आरोपी विधायक अभय नारायण पटेल सगड़ी विधानसभा क्षेत्र से निर्वाचित हैं।
सपा विधायक का कहना है कि पंचायत ‌‌अधिकारी के स्थानांतरण के लिए उन्होंने नगर विकास मंत्री आजम खां को पत्र लिखा था। मामले की जांच शुरू होते ही पंचायत ‌‌अधिकारी अनाप-शनाप आरोप लगा रहे हैं।
'लाश ठिकाने लगा देंगे'
पंचायत ‌‌अधिकारी धुरंधर सिंह मूलरूप से देवरिया जिले के लार कस्बे के निवासी हैं। उनके शिकायती पत्र के अनुसार आठ दिसंबर को तबीयत खराब होने पर वह इलाज कराने के लिए अपने घर गए थे। इस बीच रात आठ बजे सपा विधायक अभय नारायण पटेल का उनके मोबाइल पर फोन आया।
आरोप है कि अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल करते हुए विधायक ने कहा, 'मेरे आदमियों को ठेका नहीं दिया। अब तुम्हें यहां रहने नहीं दिया जाएगा। मेरे आदमी तुम्हारी हत्या कर लाश ठिकाने लगा देंगे।'
इससे भयभीत पंचायत ‌‌अधिकारी ने पत्र में कहा कि जीयनपुर में अब नौकरी करने लायक नहीं रह गया है। विधायक किसी भी समय हत्या करवा सकते हैं।
आरोप बेबुनियाद
विधायक अभय नारायण पटेल का कहना है कि जीयनपुर की जनता की शिकायत पर उन्होंने इस साल 22 मई को पंचायत ‌‌अधिकारी के स्थानांतरण के लिए नगर विकास मंत्री आजम खां को पत्र लिखा था। इस संबंध में जांच की जा रही है।
पटेल ने बताया कि आठ दिसंबर को उन्होंने पंचायत ‌‌अधिकारी को फोन किया तो वह गाली-गलौज करने लगे। कहा कि कौन बोल रहे हैं। मैंने कहा विधायक अभय नारायण बोल रहा हूं। तब पंचायत ‌‌अधिकारी माफी मांगने लगे। विधायक ने कहा कि जांच शुरू होने से बौखलाए पंचायत ‌‌अधिकारी मेरे खिलाफ बेबुनियाद आरोप लगा रहे हैं।
-एजेंसी

रविवार, 10 नवंबर 2013

दंगा पीड़ितों पर दबाव: मुआवजा लो लेकिन घर मत जाओ

लखनऊ 
मुजफ्फरनगर के दर्जनों दंगा पीड़ितों ने कल लखनऊ में विरोध मार्च निकाला। उनका कहना था कि उन पर 5 लाख मुआवजे के बदले अपनी जमीन-जायदाद को छोड़ने का दबाव बनाया जा रहा है, और अपने गांव वापस लौटने से मना किया जा रहा है। वहीं अधिकारियों का कहना है कि पीड़ितों को आर्थिक मदद इसीलिए दी जा रही है ताकि वह कहीं भी बस सकें।
दंगा पीड़ित सलीम अहमद ने बताया कि 'जिला प्रशासन हम पर एक हलफनामा साइन करने के लिए दबाव बना रहा है, जिसमें लिखा हुआ है कि आर्थिक मदद पाने के बाद हमें राहत कैंपों को तो छोड़ना होगा मगर हम अपने गांव वापस नहीं लौट सकते।' सलीम अहमद 50 अन्य लोगों के साथ अपनी मांगों को सरकार के सामने रखने लखनऊ आए थे।
गौरतलब है कि मुजफ्फरनगर दंगे उत्तर प्रदेश के इतिहास के सबसे भयावह दंगों में से एक थे। इन दंगों में 65 लोगों की मौत हो गई थी और लगभग 60,000 लोग बेघर हो गए थे। दंगों से प्रभावित हजारों लोग कैंपों में बदतर जिंदगी जीने को मजबूर हैं। कई लोग सरकार की मदद से असंतुष्ट हैं और उन्हें 5 लाख रुपयों की सहायता कम लग रही है। अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ एक राहत कैंप में रह रहे एक दंगा पीड़ित ने बताया, 'मेरी बीवी के साथ गैंगरेप किया गया और हमारा घर जला दिया गया। मुआवजे के अलावा सरकार को हमें घर और नौकरी भी देनी चाहिए।'
एक और दंगा पीड़ित का कहना था कि उसकी पत्नी के साथ रेप करने वालों ने केस वापस लेने के लिए धमकाया था। पीड़ित महिला ने कहा कि 'हमने दंगों में अपना सब कुछ गंवा दिया। हमें पांच लोगों के परिवार का पालन-पोषण करना है, जिनमें दो बच्चे भी हैं।' एक अन्‍य दंगा पी़ड़ित ने कहा कि घर खो देने के अलावा उसके दो बच्चे भी दंगों के दौरान अपंग हो गए, जिसे कि पैसों से सही नहीं किया जा सकता। कुछ दंगा पीड़ितों ने बताया कि उनके घर वाले अब तक गायब हैं।
वकील असद हयात, जिन्होंने दंगों की सीबीआई जांच के लिए जनहित याचिका दायर की है, ने कहा कि सरकार ने सिर्फ 9 गांवों के परिवारों के लिए मुआवजे का ऐलान किया है जबकि 162 गांवों के परिवार कैंपों में रह रहे हैं। उन्होंने कहा कि 'कुछ लोगों को अचल संपत्ति के नुकसान के लिए मुआवजे मिल रहे हैं मगर पीड़ितों के चुनाव और उनको मुआवजा देने के लिए कोई ढंग का नियम नहीं है। न सिर्फ यह रकम कम है, बल्कि अभी भी बहुत सारे पीड़ितों की पहचान होनी बाकी है।'
रिहाई मंच के प्रवक्ता शाहनवाज आलम, राजीव यादव के साथ सामाजिक कार्यकर्ता संदीप पांडेय के नेतृत्व में इन दंगा पीड़ितों की जनसुनवाई के लिए जयशंकर प्रसाद सभागार में शनिवार को कार्यक्रम आयोजित किया था। इस कार्यक्रम के लिए प्रशासन से अनुमति भी ले ली गई थी लेकिन कार्यक्रम शुरू होता इससे पहले उन्हें बताया गया कि प्रशासन ने कार्यक्रम की अनुमति निरस्त कर दी और इसके बदले उन्हें एक विरोध मार्च निकालने की अनुमति दी थी।
-एजेंसी

मंगलवार, 28 मई 2013

ये 'बिजली' ले डूबेगी अखिलेश बाबू

(लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष)
उत्‍तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में मिली अप्रत्‍याशित सफलता की तरह समाजवादी पार्टी 2014 के लोकसभा चुनावों में भी सफलता पाने के ख्‍वाब संजोये हुए है। पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव सोचे बैठे हैं कि इस बार के लोकसभा चुनाव उन्‍हें दिल्‍ली का किंग न सही लेकिन किंगमेकर जरूर बनवा सकते हैं।
सोचें भी क्‍यों नहीं, आखिर उत्‍तर प्रदेश न सिर्फ उनके सर्वाधिक प्रभाव वाला सूबा है बल्‍कि दिल्‍ली की गद्दी पर काबिज होने का रास्‍ता भी यहीं से बनता है।
अब जबकि लोकसभा चुनावों की आहट सुनाई देने लगी है तो यह सवाल स्‍वत: पैदा हो जाता है कि क्‍या वाकई मुलायम सिंह अपने मकसद में सफल होंगे ?
इस सवाल का जवाब देने से पहले उत्‍तर प्रदेश की वर्तमान परिस्‍थितियों पर नजर डालनी लाजिमी है।
देशभर की राजनीति को प्रभावित करने वाले यूपी की कमान बड़ी हसरत के साथ जनता ने समाजवादी पार्टी को और पार्टी ने अपने युवराज अखिलेश यादव को सौंपी थी क्‍योंकि ऐसा माना गया कि सपा की अप्रत्‍याशित जीत में अखिलेश की बड़ी भूमिका रही।
जनता ने मुलायम तथा सपा से अधिक उस चेहरे पर भरोसा किया जो ताजगी तथा उत्‍साह से भरपूर था और जिसके अंदर कुछ कर गुजरने का जज्‍बा दिखाई देता था।
किसी हद तक यह बात सही भी थी लिहाजा जनता ने भी अखिलेश का खै़र मक़दम किया।
अब अखिलेश को यूपी की कमान संभाले हुए सालभर से करीब दो महीने अधिक बीत चुके हैं पर उनका रिपोर्ट कार्ड आमजन को निराश करता है।
बेशक अखिलेश यादव जनता से किए गये चुनावी वादों को निभाने में लगे हैं लेकिन प्रदेश पर उनकी पकड़ हर रोज ढीली होती जा रही है।

मंगलवार, 16 अप्रैल 2013

सुनो लखनऊ....कि तुम बदनाम क्‍यूं हो

(लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष)
दिल्‍ली किसकी....जो सत्‍ता में हो उसकी। लखनऊ किसका..जो सत्‍ता पर काबिज हो उसका। कभी बसपा का तो कभी सपा का, कभी भाजपा का तो कभी भाजपा और बसपा का संयुक्‍त। आम जनता की न दिल्‍ली कभी हुई और ना लखनऊ।
जिसकी लाठी...उसकी भैंस।
पर यहां तो ऐसी कहावतों के मायने भी बदल रहे हैं। जिसके हाथ में लाठी है, भैंस उसे सींग दिखा रही है।
जो बहिनजी सत्‍ता से बेदखल हैं, वह खुलेआम सत्‍ताधारियों को गुण्‍डों की जमात कहकर धमका रही हैं। कह रही हैं कि सत्‍ता में आने दो, एक-एक की हड्डी-पसली तुड़वा दूंगी। जो सपाई सत्‍ता में हैं, वह लगभग मिमियाते हुए जवाब दे रहे हैं... समझ लो तुम जब सत्‍ता में आओगी तब आओगी लेकिन हम तो सत्‍ता में हैं। हम चाहें तो अभी जेल भिजवा सकते हैं।

सोमवार, 1 अप्रैल 2013

यूपी को चला रहे हैं साढ़े चार CM

लखनऊ। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के वरिष्ठ नेता नसीमुद्दीन सिद्दकी ने आज आरोप लगाया कि उत्तर प्रदेश की कानून-व्यवस्था में कोई सुधार नहीं आया है क्योंकि प्रदेश में "एक से ज्यादा सत्ता के केन्द्र हैं।
आजमगढ़ में पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं की बैठक लेने आए पूर्व मंत्री ने कहा कि प्रदेश को जब साढ़े चार मुख्यमंत्री चला रहे हैं तो कानून-व्यवस्था कैसे सुधर सकती है।
उन्होंने कहा कि मेरे हिसाब से मुलायम सिंह यादव, आजम खान, शिवपाल सिंह यादव और राम गोपाल यादव प्रदेश के चार मुख्यमंत्री हैं, जबकि अखिलेश यादव आधे मुख्यमंत्री हैं। जब इतने मुख्यमंत्री हों तो प्रदेश में लोग कैसे भयमुक्त रह सकते हैं।

मंगलवार, 12 मार्च 2013

महज स्‍वार्थपूर्ति कर रही है परवीन:डा.मुस्‍तकीम

अमरोहा। उत्तर प्रदेश में प्रतापगढ़ के पुलिस उपाधीक्षक जिया उल हक की पिछले दो मार्च को हुई हत्या को सांप्रदायिकता से जोड़ने तथा निर्दलीय विधायक रघुराज प्रताप सिंह का नाम घसीटने पर समाजशास्त्री, धर्मगुरु तथा योग से जुड़े लोगों ने सवालिया निशान लगाए हैं और राज्य सरकार की ओर से इस तरह मुहैया कराई गई आर्थिक सहायता की आलोचना की है।
प्रसिद्ध समाजशास्त्री डॉ. मुस्तकीम, धर्मगुरु आचार्य प्रमोद कृष्णम तथा योग गुरु स्वामी कर्मवीर समेत कई विद्वानों व सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कड़ी निंदा की है तथा कहा है कि पुलिस बल व सरकारी मशीनरी को धार्मिक रंग से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। हालांकि कर्तव्यनिष्ठा के लिए संवैधानिक दायरे में ऐसी घटनाओं की जांच व मदद आवश्यक है।
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...