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बुधवार, 14 जुलाई 2021
बबुआ! ऐसा लगता है कि पुलिस का खून सफेद हो गया है… वो पुराने हुक्मरानों से बेवफा हो गई है, समझ लो
सुनो…सुनो…सुनो। यूपी के वाशिंदो सुनो। बुआ एंड बबुआ पार्टी प्रदेश की पुलिस का कायापलट करने जैसा पावन विचार रखती है, बशर्ते आप उसे एक मौका और दें।बुआ एंड बबुआ, या बुआ अथवा बबुआ में से किसी को भी यदि आप 2022 के विधानसभा चुनावों में सत्ता की कमान सौंप देते हैं तो आपके प्रदेश की पुलिस कम से कम दोरंगी और अधिक से अधिक तिरंगी हो जाएगी।
यदि बुआ एंड बबुआ पार्टी को सत्ता मिलती है तो पुलिस की ‘खाकी को खाक’ में मिलाने का काम प्राथमिकता के आधार पर किया जाएगा और उसकी जगह पुलिस के सिर पर नीली टोपी, लाल कमीज और हरा पैंट सजेगा।
यदि सिर्फ बबुआ को यूपी का भाग्य विधाता बनाया जाता है तो पुलिस की कैप लाल, शर्ट हरी और उसके नीचे पैंट फिर लाल कलर का होगा।
ठीक इसी तरह अगर बुआ को ये जिम्मेदारी मिलती है तो प्रदेश पुलिस नीली वर्दी में सजी-संवरी नजर आएगा। दोनों ही परिस्थितियों में उसके क्रिया-कलाप वैसे नहीं होंगे जैसे आज दिखाई दे रहे हैं।
माना कि बुआ और बबुआ को एक मर्तबा किए गए गठबंधन का अनुभव कुछ अच्छा नहीं रहा और इसलिए फिलहाल वह अलग-अलग से दिखाई देते हैं परंतु सत्ता की खातिर चुनाव पूर्व नहीं तो चुनाव बाद पुन: एकसाथ प्रेस वार्ता कर सकते हैं।
हाल ही में ‘दोमुंह’ से एक ही बात निकलना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि बुआ और बबुआ के बीच कभी ‘मतभेद’ बेशक पनपे हों किंतु ‘मनभेद’ नहीं हैं लिहाजा वो समय पड़ने पर रिश्ता निभा सकते हैं।
बहरहाल, इतना जान लें कि यदि किसी तरह इनके मंसूबे पूरे हो गए तो पुलिस तब तक किसी आतंकी या आतंकियों के मॉड्यूल पर हाथ नहीं डालेगी जब तक कि उन्हें कोर्ट से आतंकी करार नहीं दे दिया जाता। और ये भी जान लें कि ऐसा ये होने नहीं देंगे। आखिर वोट बैंक भी कोई चीज है, उसे ऐसे कैसे सींखचों के अंदर जाने दिया जा सकता है।
किसी अपराध की प्लानिंग करना होता होगा कानून की नजर में अपराध, लेकिन बुआ और बबुआ की पुलिस इस तरह की किसी प्लानिंग को अपराध नहीं मानेगी। आतंकियों को उनकी योजना सफलता पूर्वक संपन्न करने का सुअवर अवश्य दिया जाएगा ताकि वो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हनन का आरोप चस्पा न कर सकें तथा सभी चुनावों में एकमत व एकजुट होकर मतदान करने निकलें।
ये दोरंगी या तिरंगी पुलिस ऐसे हर प्लान को पूरा करने का मौका इसलिए भी देगी जिससे बुआ-बबुआ की सरकार को कोई नया जनसंख्या नियंत्रण कानून लाने की जहमत न उठानी पड़े और बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के बम विस्फोटों के जरिए ये कार्य बखूबी होता रहे।
2022 के चुनाव घोषणा पत्र में बुआ-बबुआ दोनों इस बात का स्पष्ट उल्लेख कर सकते हैं कि आतंकवाद बहुत संवेदनशील मामला है इसलिए ”हमारी पुलिस” तब तक किसी संदिग्ध आतंकवादी पर हाथ डालने की हिमाकत नहीं करेगी जब तक कि वह अपने मकसद में सफल होकर इस बात को साबित न कर दे कि वह आतंकवादी ही है और उसके जेहन में आतंकवाद के अतिरिक्त कुछ नहीं रहता।
खालिस नीली अथवा लाल-नीली-हरी या फिर सिर्फ लाल और हरी वर्दी में सजी यह पुलिस जाति-धर्म-संप्रदाय का पुख्ता पता लगाने के बाद ही किसी पर हाथ डालेगी अन्यथा पहले पार्टी के डंडे में लगे झंडे को निहारेगी।
दोनों बात की पुष्टि होने के बाद ही तय करेगी कि आतंकवाद का कोई धर्म होता है या नहीं। अगर झंडे के रंगों से मेल मिलता है तो आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होगा और यदि नहीं मिलता तो तय जानिए कि धर्म निर्धारित होगा। ठीक उसी तरह जिस तरह आज पुलिस और उसकी वर्दी का रंग निर्धारित किया जा रहा है।
ऐसा लगता है कि पुलिस का खून सफेद हो गया है, वो बेवफा हो गई है और अपने पुराने हुक्मरानों की मंशा के विपरीत संदिग्ध आतंकियों पर चुनाव से ठीक पहले हाथ डालने का दुस्साहस कर रही है।
कहीं ऐसा तो नहीं कि खाकी पर ये असर उस खास पार्टी की वैक्सीन कर रही हो जिसे लगवाने से बबुबा ने साफ मना कर दिया था और बुआ चुप्पी साधे बैठी हुई है कि कहीं कोई वैक्सीनेशन के लिए पकड़ कर न ले जाए।
खतरों का भांपना कोई बुआ और बबुआ से सीखे। कोई पार्टी अपनी “पारदर्शी वैक्सीन” के डोज से आतंकवादियों का तथा उनका डीएनए बदलने की कोशिश करे इससे पहले ही भेड़िया आया-भेड़िया आया चिल्लाना शुरू कर दो। बाकी जब भेड़िया आएगा, तब देखा जाएगा।
14 करोड़ से अधिक मतदाताओं वाले इस प्रदेश में तमाम ऐसे निकल आएंगे जो बुआ-बबुआ की भेड़िया चाल के शिकार में फंसेंगे। फंसे तो ठीक, और नहीं फंसे तो अगले चुनावों तक फिर ऐसे ही मुद्दे खड़े करते रहेंगे। अभी ये तैयारी 2022 की है।
2022 में किसी तरह एकबार काठ की हड़िया चढ़ जाए फिर देखना…पुलिस की वर्दी ही नहीं, वैक्सीन भी रंगीन न बनवा दी तो नाम बदल देना।
रहा सवाल जनसंख्या का तो उस पर कैसी रोक, वो तो ऊपर वाले की देन हैं। नीचे वाले कौन होते हैं दखल देने वाले। किसी की विरासत संभालने वाला कोई नहीं होता तो किसी के तीन-तीन हो जाते हैं। और कोई इस बात पर भी रोता है कि जिसे अपने हाथों से कच्ची उम्र में प्रदेश का ताज सौंप दिया, आज वही आखिरी मुगल होने पर आमादा है। जैसी जिसकी सोच। ईश्वर सबका भला करे।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
शुक्रवार, 10 जुलाई 2020
सारे सवाल बेमानी: सवाल सिर्फ एक, क्या पुलिस का ज़मीर जाग गया है ?
यूं तो पुलिस की हर मुठभेड़ न सिर्फ शक के दायरे में रहती है बल्कि उसके साथ तमाम सवाल भी खड़े हो जाते हैं।
संभवत: इसीलिए पुलिस एनकाउंटर के दौरान हुई हर मौत की निष्पक्ष, प्रभावी और स्वतंत्र जांच के लिए कुछ नियम निर्धारित किए गए हैं।
जैसे पूरे घटनाक्रम की एक स्वतंत्र जांच सीआईडी से या दूसरे पुलिस स्टेशन की टीम से किसी एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की निगरानी में कराना।
यह वरिष्ठ पुलिस अधिकारी, उस एनकाउंटर में शामिल सबसे उच्च अधिकारी से भी एक रैंक ऊपर का होना।
इसके अलावा धारा 176 के अंतर्गत पुलिस फ़ायरिंग में हुई प्रत्येक मौत की मजिस्ट्रियल जांच भी जरूरी है। जिसकी एक रिपोर्ट न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास भेजी जाती है।
ऐसे में कानपुर शूटआउट के सरगना विकास दुबे की पुलिस एनकाउंटर में मौत पर सवाल उठना सामान्य सी बात है, इसलिए यहां सवाल एनकाउंटर पर न उठाकर इस बात पर किया जाना चाहिए कि क्या कानपुर कांड के बाद वाकई पुलिस का ज़मीर जाग गया है ?
अथवा ये सभी एनकाउंटर आठ पुलिसकर्मियों की शहादत से उपजा कोई ऐसा तात्कालिक क्रोध है, जिसका गुबार कुछ दिनों बाद स्वत: बैठ जाएगा।
यही एकमात्र सवाल ऐसा है जिसमें पुलिस की कार्यशैली पर उठने वाले सभी सवालों के जवाब निहित हैं।
इसी सवाल में निहित है कि कैसे कोई विकास दुबे पुलिस की नाक के नीचे फल-फूलकर इतना दुस्साहसी हो जाता है कि उसके अंदर खाकी का कोई खौफ नहीं रह जाता। यहां तक कि वह पुलिस पर पूरी प्लानिंग के साथ हमला करने से भी नहीं चूकता।
कैसे वो कानून-व्यवस्था और शासन-प्रशासन से इतर अपनी एक ऐसी समानांतर सत्ता कायम कर लेता है कि आमलोग भी न्याय की गुहार उसके दरबार पर जाकर लगाने लग जाते हैं।
इसमें कोई दो राय नहीं कि पुलिस की एक बड़ी समस्या राजनीति का अपराधीकरण या अपराधियों का राजनीतिकरण हो जाना है, परंतु इसका यह कतई मतलब नहीं कि पुलिस अपने कर्तव्य से इस कदर विमुख हो जाए कि उसका अस्तित्व ही तक दांव पर लगता दिखाई दे।
विकास दुबे ने 2/3 जुलाई की मध्य रात्रि में दरिंदगी का जो घिनौना खेल खेला, वो चंद घंटों के अंदर उपजी मनोवृत्ति का परिणाम नहीं था। वह उसे राजनीतिक गलियारों के साथ-साथ पुलिस से भी अनवरत मिलते रहे उस खाद-पानी की परिणिति थी जिसने उसे इंसान से हिंसक जानवर बनाने में मदद की।
घटना वाले दिन से ही यह एकदम साफ था कि पुलिस ने ही पुलिस की मुखबिरी की, क्योंकि बिना पूर्व सूचना के इतनी तैयारी के साथ हमला कर पाना संभव ही नहीं था। हालांकि पुलिस को इस बात का पताना लगाने में भी कई दिन लग गए और उसके बाद भी गाज गिरी तो एक एसओ और एक एसआई पर जिन्हें निलंबित किया गया है।
रहा सवाल पूरे चौबेपुर थाने के दूसरे पुलिसकर्मियों को लाइन हाजिर करने या सीओ के पत्र को दबाकर बैठ जाने वाले तत्कालीन एसएसपी कानपुर के तबादले का तो उसे कार्यवाही नहीं माना जा सकता।
दलगत राजनीति और आदतन सवाल उठाने वालों की बात अगर छोड़ दी जाए तो विकास दुबे और उसके साथियों का पुलिस ने जो हश्र किया, उससे किसी को कोई परेशानी नहीं है।
सच तो यह कि अधिकांश लोग खुश हैं, लेकिन ये खुशी तब अहमियत रखती है जब पुलिस अपने यहां से विपिन तिवारी तथा केके शर्मा जैसों सहित अनंतदेव जैसे आईपीएस अधिकारियों को भी चिन्हित कर खाकी पर चिपकी गंदगी साफ करने का बीड़ा उठाए।
बेशक ये काम बहुत कठिन है और इसके लिए राजनीतिक गलियारों में पल रहे सफेदपोश अपराधियों से भी टक्कर लेनी पड़ सकती हैं परंतु असंभव कतई नहीं है।
बस आवश्यकता है तो इस बात कि पुलिस अपनी इच्छाशक्ति दृढ़ कर ले और ठान ले कि अपराधी चाहे वर्दी में छिपा हो या समाज में, उसे सहन नहीं किया जाएगा।
ये काम असंभव इसलिए भी नहीं है कि स्वच्छ छवि वाले राजनेताओं को शायद ही इसमें कोई दिक्कत हो, और जिन्हें दिक्कत है वो हर हाल में पुलिस के लिए सिरदर्द ही साबित होते हैं।
हां, इतना जरूर है कि पुलिस को इसके लिए बाकायदा अभियान चलाकर ऐसी ही एकजुटता का प्रदर्शन करना होगा जैसा कि विकास दुबे के गैंग को नेस्तनाबूद करने के लिए दिखाई गई और तय किया गया कि चाहे जैसे भी व जितने भी सवाल उठेंगे, उनका जवाब दे दिया जाएगा।
विकास दुबे व उसके अधिकांश गुर्गे बेशक उसी दुर्गति को प्राप्त हुए जिसके वो हकदार थे लेकिन सही न्याय तब माना जाएगा जब इसी आत्मबल, साहस एवं एकजुटता के साथ खाकी और खद्दर के पीछे छिपे दुर्दांत अपराधियों को भी कठघरे में खड़ा किया जाए क्योंकि उनका अपराध किसी भी तरह विकास दुबे व उसके गुर्गों से कम नहीं है।
हकीकत तो यह है कि पर्दे के पीछे ही सही, लेकिन वो सब भी विकास दुबे के गैंग का हिस्सा हैं इसलिए ‘विकास दुबे’ तभी सही अर्थों में समाप्त होगा, जब वो सब भी अपनी-अपनी नियति को प्राप्त होंगे।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
शुक्रवार, 3 जुलाई 2020
पूरे सिस्टम पर गहरा सवालिया निशान लगाती है कानपुर की घटना, पुलिस के लिए भी आत्मचिंतन का ‘मौका’
पूरे सिस्टम पर गहरा सवालिया निशान लगाती है कानपुर की घटना, पुलिस के लिए भी आत्मचिंतन का ‘मौका’
कानपुर की वीभत्स घटना एक ओर जहां पूरे सिस्टम पर गहरा सवालिया निशान लगाती है वहीं दूसरी ओर पुलिस के लिए भी आत्मचिंतन का ‘मौका’ दे रही है।
पुलिस के लिए इसे ‘मौका’ इसलिए कहा जा सकता है कि इतने बड़े दुस्साहस की ‘पटकथा’ लिखने वाले यदि छूट गए और कार्यवाही सिर्फ अपराधियों तक सीमित रह गई तो ये सिलसिला आगे भी चलता रहेगा।
कौन नहीं जानता कि विकास दुबे जैसे दुर्दांत अपराधी पुलिस, प्रशासन और राजनेताओं के गठजोड़ का ही नतीजा होते हैं। वो इसी तिकड़ी के संरक्षण में पलते और बढ़ते हैं।
विकास दुबे तक पुलिस की दबिश पहुंचने से पहले सूचना कैसे लीक हुई होगी और कैसे उसने पुलिस को घेरकर मारने का फुलप्रूफ प्लान तैयार किया होगा, यह जानना बहुत बड़ी बात नहीं है। लेकिन कोई जानने चाहेगा तब जान पाएगा अन्यथा हमेशा की तरह सतही कानूनी कार्यवाही करने की लकीर पीट दी जाएगी।
कोई तो भेदिया होगा जिसने विकास दुबे को पुलिस पर हमलावर होने का इतना अवसर दिलाया ताकि वो रास्ते में आड़ी जेसीबी खड़ी करके मोर्चेबंदी कर सके।
मथुरा का जवाहरबाग कांड
मथुरा का जवाहरबाग कांड याद हो तो उसमें एक एसपी सिटी और एक एसओ को लगभग इसी तरह पूरी योजना के साथ घेरकर मार डाला गया।
कहने को सीबीआई इस मामले की जांच कर रही है किंतु 2016 से अब तक न रामवृक्ष का पता लगा न जांच आगे बढ़ी।
इन दो पुलिस अधिकारियों को बेरहमी से मार डालने वाला रामवृक्ष यादव नामक अपराधी पूरे ढाई साल तक कलेक्ट्रेट में ही सारे पुलिस एवं प्रशासनिक अधिकारियों की नाक के नीचे एक सरकारी बाग की ढाई सौ एकड़ से अधिक जमीन पर अपने गुर्गों के साथ काबिज रहा लेकिन सब के सब तमाशबीन बने रहे।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यदि पुलिस प्रशासन को मजबूर न किया होता तो रामवृक्ष की विषबेल कितनी और फल-फूल चुकी होती, इसका अंदाज लगाया जा सकता है।
डॉ. निर्विकल्प अपहरण कांड
बहुत दिन नहीं बीते जब मथुरा में ही डॉक्टर निर्विकल्प को अगवा कर बदमाशों ने चंद मिनटों के अंदर 52 लाख रुपए की फिरौती वसूल ली। बात खुली तो पता लगा कि उसमें से 40 लाख रुपए की रकम पुलिस हड़प गई थी। एफआर दर्ज हुई, एक इंस्पेक्टर को निलंबित भी किया गया किंतु उसके बाद नतीजा ढाक के तीन पात है।
जिन उच्च पुलिस अधिकारियों की इस अपहरण कांड में संलिप्तता का शक था, उनके खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं हुई। एक आरोपी और एक सह आरोपी महिला को गिरफ्तार कर पुलिस ने अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली।
पुलिस चौकी से करोड़ों की शराब बेच देने का मामला
मथुरा में ही नेशनल हाईवे के थाना कोसी की कोटवन बॉर्डर पुलिस चौकी से लॉकडाउन के दौरान पुलिस द्वारा दो करोड़ रुपए से ऊपर की शराब बेच दी गई लेकिन खानापूरी के अलावा उच्च अधिकारियों ने कुछ नहीं किया।
आश्चर्य की बात यह है कि ये वो शराब थी जो खुद पुलिस ने ही समय-समय पर शराब तस्करों से जब्त कर कई लोगों को जेल भेजा था। अब सारा खेल खतम और पैसा हजम। तस्कर भी खुश और पुलिस भी। रहा सवाल जांच का तो वह जैसे अब चल रही है, वैसे दस साल बाद भी चलती रहेगी।
छत्ता बाजार का दोहरा हत्याकांड
हाल ही में मथुरा के अत्यधिक भीड़-भाड़ वाले क्षेत्र छत्ता बाजार की गली सेठ भीकचंद के अंदर सुबह-सुबह मोटरसाइकिल सवार बदमाश अंधाधुंध फायरिंग करके दो लोगों की जान ले लेते हैं और तीन लोगों को घायल करके भाग जाते हैं किंतु पुलिस कुछ नहीं कर पाती।
करती है तो केवल इतना कि एक युवक जो क्रॉस केस बनाने के चक्कर में जिला अस्पताल जा पहुंचा था, उसे गिरफ्तार दिखा देती है और घटना स्थल पर पड़ी मिली एक रिवॉल्वर को उससे बरामद बताकर उसका चालान कर देती है।
इस दुस्साहसिक वारदात को अंजाम देने वाले नामजद और अज्ञात बदमाश आज तक पुलिस की पकड़ से दूर हैं जबकि उसमें मारे गए लोगों की तीन दिन बाद तेरहवीं होने वाली है।
दरअसल पूरे प्रदेश में कहीं भी पुलिस मजामत की घटना हो अथवा कोई ऐसी दुस्साहसिक वारदात, ऐसा संभव ही नहीं है कि पुलिस उससे कतई अनजान हो या उसे भनक तक न लगे।
पुलिस ही सूत्रधार
इसे यूं भी कह सकते हैं कि पुलिस ही ऐसी वारदातों की सूत्रधार होती है, कभी पैसे के लालच में तो कभी आपसी द्वेषभाव के कारण।
इसके अलावा एक तीसरा कारण होता है राजनीतिक संरक्षण बने रहने की वो चाहत जिसके बल पर ”चार्ज” चलता रहता है।
किसी के लिए जिले का ”चार्ज” अहमियत रखता है तो किसी के लिए ”सर्किल” का, किसी को थाने के चार्ज की चाहत होती है तो कोई खास चौकी थाना छोड़ना नहीं चाहता। कोई पैसे के लिए अपनों से गद्दारी करने को तत्पर रहता है तो कोई हुकुम बजाने के लिए।
जो भी हो, लेकिन एक बात तय है कि बिना भेदिया के इतनी बड़ी तो क्या छोटी से छोटी पुलिस पार्टी पर हमला करने की हिमाकत कोई नहीं कर सकता।
विकास दुबे का ‘इतना विकास’ संभव ही इसलिए हो पाया कि उसे पुलिस-प्रशासन और राजनेताओं की तिकड़ी का भरपूर सहयोग प्राप्त होता रहा।
जरा विचार कीजिए कि यही हिस्ट्रीशीटर गुंडा विकास दुबे थाने के अंदर एक दर्जाप्राप्त राज्यमंत्री ही हत्या कर देता है और इसके खिलाफ अदालत में कोई गवाही तक देने को तैयार नहीं होता, तो इसके मायने क्या हैं।
आज चूंकि आठ पुलिसजनों की शहादत हुई है और आधा दर्जन से अधिक गंभीर घायल हैं इसलिए सहानुभूति होना स्वाभाविक है, लेकिन क्या ये सहानुभति इस बात की गारंटी हो सकती है कि भविष्य में ऐसी किसी दुस्साहसिक घटना की पुनरावृत्ति नहीं होगी।
क्या कोई पुलिस अधिकारी अथवा कर्मचारी दावे के साथ कह सकता है कि जो कुछ हुआ और जिन परिस्थितियों में हुआ, उसके लिए पुलिस कतई जिम्मेदार नहीं है।
और यदि पुलिस जिम्मेदार है तो निश्चित ही यह घटना उसे आत्मचिंतन का मौका दे रही है ताकि हर पुलिस वाला सोच सके कि कब तक और क्यूं।
इसलिए तो नहीं कि ड्यूटी की खातिर खाक में मिलने की प्रेरणा देने वाली खाकी पर ही अब इतनी गर्द जम चुकी है कि उसे कुछ दिखाई नहीं देता, कुछ सुनाई नहीं देता।
दिखता है तो वही जो देखना चाहते हैं, और सुनना भी है वही जो सुनना चाहते हैं।
विकास दुबे जैसों का खेल हमेशा के लिए यदि खत्म करना है तो एकबार फिर जहां खाकी का इकबाल बुलंद करना होगा वहीं उसकी मान-मर्यादा को भी और तार-तार होने से बचाना होगा अन्यथा आज जो दुस्साहस विकास तथा उसके गुर्गों ने किया है, कल कोई और करेगा।
हो सकता है कि तब ये संख्या इससे भी अधिक हो।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
कानपुर की वीभत्स घटना एक ओर जहां पूरे सिस्टम पर गहरा सवालिया निशान लगाती है वहीं दूसरी ओर पुलिस के लिए भी आत्मचिंतन का ‘मौका’ दे रही है।
पुलिस के लिए इसे ‘मौका’ इसलिए कहा जा सकता है कि इतने बड़े दुस्साहस की ‘पटकथा’ लिखने वाले यदि छूट गए और कार्यवाही सिर्फ अपराधियों तक सीमित रह गई तो ये सिलसिला आगे भी चलता रहेगा।
कौन नहीं जानता कि विकास दुबे जैसे दुर्दांत अपराधी पुलिस, प्रशासन और राजनेताओं के गठजोड़ का ही नतीजा होते हैं। वो इसी तिकड़ी के संरक्षण में पलते और बढ़ते हैं।
विकास दुबे तक पुलिस की दबिश पहुंचने से पहले सूचना कैसे लीक हुई होगी और कैसे उसने पुलिस को घेरकर मारने का फुलप्रूफ प्लान तैयार किया होगा, यह जानना बहुत बड़ी बात नहीं है। लेकिन कोई जानने चाहेगा तब जान पाएगा अन्यथा हमेशा की तरह सतही कानूनी कार्यवाही करने की लकीर पीट दी जाएगी।
कोई तो भेदिया होगा जिसने विकास दुबे को पुलिस पर हमलावर होने का इतना अवसर दिलाया ताकि वो रास्ते में आड़ी जेसीबी खड़ी करके मोर्चेबंदी कर सके।
मथुरा का जवाहरबाग कांड
मथुरा का जवाहरबाग कांड याद हो तो उसमें एक एसपी सिटी और एक एसओ को लगभग इसी तरह पूरी योजना के साथ घेरकर मार डाला गया।
कहने को सीबीआई इस मामले की जांच कर रही है किंतु 2016 से अब तक न रामवृक्ष का पता लगा न जांच आगे बढ़ी।
इन दो पुलिस अधिकारियों को बेरहमी से मार डालने वाला रामवृक्ष यादव नामक अपराधी पूरे ढाई साल तक कलेक्ट्रेट में ही सारे पुलिस एवं प्रशासनिक अधिकारियों की नाक के नीचे एक सरकारी बाग की ढाई सौ एकड़ से अधिक जमीन पर अपने गुर्गों के साथ काबिज रहा लेकिन सब के सब तमाशबीन बने रहे।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यदि पुलिस प्रशासन को मजबूर न किया होता तो रामवृक्ष की विषबेल कितनी और फल-फूल चुकी होती, इसका अंदाज लगाया जा सकता है।
डॉ. निर्विकल्प अपहरण कांड
बहुत दिन नहीं बीते जब मथुरा में ही डॉक्टर निर्विकल्प को अगवा कर बदमाशों ने चंद मिनटों के अंदर 52 लाख रुपए की फिरौती वसूल ली। बात खुली तो पता लगा कि उसमें से 40 लाख रुपए की रकम पुलिस हड़प गई थी। एफआर दर्ज हुई, एक इंस्पेक्टर को निलंबित भी किया गया किंतु उसके बाद नतीजा ढाक के तीन पात है।
जिन उच्च पुलिस अधिकारियों की इस अपहरण कांड में संलिप्तता का शक था, उनके खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं हुई। एक आरोपी और एक सह आरोपी महिला को गिरफ्तार कर पुलिस ने अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली।
पुलिस चौकी से करोड़ों की शराब बेच देने का मामला
मथुरा में ही नेशनल हाईवे के थाना कोसी की कोटवन बॉर्डर पुलिस चौकी से लॉकडाउन के दौरान पुलिस द्वारा दो करोड़ रुपए से ऊपर की शराब बेच दी गई लेकिन खानापूरी के अलावा उच्च अधिकारियों ने कुछ नहीं किया।
आश्चर्य की बात यह है कि ये वो शराब थी जो खुद पुलिस ने ही समय-समय पर शराब तस्करों से जब्त कर कई लोगों को जेल भेजा था। अब सारा खेल खतम और पैसा हजम। तस्कर भी खुश और पुलिस भी। रहा सवाल जांच का तो वह जैसे अब चल रही है, वैसे दस साल बाद भी चलती रहेगी।
छत्ता बाजार का दोहरा हत्याकांड
हाल ही में मथुरा के अत्यधिक भीड़-भाड़ वाले क्षेत्र छत्ता बाजार की गली सेठ भीकचंद के अंदर सुबह-सुबह मोटरसाइकिल सवार बदमाश अंधाधुंध फायरिंग करके दो लोगों की जान ले लेते हैं और तीन लोगों को घायल करके भाग जाते हैं किंतु पुलिस कुछ नहीं कर पाती।
करती है तो केवल इतना कि एक युवक जो क्रॉस केस बनाने के चक्कर में जिला अस्पताल जा पहुंचा था, उसे गिरफ्तार दिखा देती है और घटना स्थल पर पड़ी मिली एक रिवॉल्वर को उससे बरामद बताकर उसका चालान कर देती है।
इस दुस्साहसिक वारदात को अंजाम देने वाले नामजद और अज्ञात बदमाश आज तक पुलिस की पकड़ से दूर हैं जबकि उसमें मारे गए लोगों की तीन दिन बाद तेरहवीं होने वाली है।
दरअसल पूरे प्रदेश में कहीं भी पुलिस मजामत की घटना हो अथवा कोई ऐसी दुस्साहसिक वारदात, ऐसा संभव ही नहीं है कि पुलिस उससे कतई अनजान हो या उसे भनक तक न लगे।
पुलिस ही सूत्रधार
इसे यूं भी कह सकते हैं कि पुलिस ही ऐसी वारदातों की सूत्रधार होती है, कभी पैसे के लालच में तो कभी आपसी द्वेषभाव के कारण।
इसके अलावा एक तीसरा कारण होता है राजनीतिक संरक्षण बने रहने की वो चाहत जिसके बल पर ”चार्ज” चलता रहता है।
किसी के लिए जिले का ”चार्ज” अहमियत रखता है तो किसी के लिए ”सर्किल” का, किसी को थाने के चार्ज की चाहत होती है तो कोई खास चौकी थाना छोड़ना नहीं चाहता। कोई पैसे के लिए अपनों से गद्दारी करने को तत्पर रहता है तो कोई हुकुम बजाने के लिए।
जो भी हो, लेकिन एक बात तय है कि बिना भेदिया के इतनी बड़ी तो क्या छोटी से छोटी पुलिस पार्टी पर हमला करने की हिमाकत कोई नहीं कर सकता।
विकास दुबे का ‘इतना विकास’ संभव ही इसलिए हो पाया कि उसे पुलिस-प्रशासन और राजनेताओं की तिकड़ी का भरपूर सहयोग प्राप्त होता रहा।
जरा विचार कीजिए कि यही हिस्ट्रीशीटर गुंडा विकास दुबे थाने के अंदर एक दर्जाप्राप्त राज्यमंत्री ही हत्या कर देता है और इसके खिलाफ अदालत में कोई गवाही तक देने को तैयार नहीं होता, तो इसके मायने क्या हैं।
आज चूंकि आठ पुलिसजनों की शहादत हुई है और आधा दर्जन से अधिक गंभीर घायल हैं इसलिए सहानुभूति होना स्वाभाविक है, लेकिन क्या ये सहानुभति इस बात की गारंटी हो सकती है कि भविष्य में ऐसी किसी दुस्साहसिक घटना की पुनरावृत्ति नहीं होगी।
क्या कोई पुलिस अधिकारी अथवा कर्मचारी दावे के साथ कह सकता है कि जो कुछ हुआ और जिन परिस्थितियों में हुआ, उसके लिए पुलिस कतई जिम्मेदार नहीं है।
और यदि पुलिस जिम्मेदार है तो निश्चित ही यह घटना उसे आत्मचिंतन का मौका दे रही है ताकि हर पुलिस वाला सोच सके कि कब तक और क्यूं।
इसलिए तो नहीं कि ड्यूटी की खातिर खाक में मिलने की प्रेरणा देने वाली खाकी पर ही अब इतनी गर्द जम चुकी है कि उसे कुछ दिखाई नहीं देता, कुछ सुनाई नहीं देता।
दिखता है तो वही जो देखना चाहते हैं, और सुनना भी है वही जो सुनना चाहते हैं।
विकास दुबे जैसों का खेल हमेशा के लिए यदि खत्म करना है तो एकबार फिर जहां खाकी का इकबाल बुलंद करना होगा वहीं उसकी मान-मर्यादा को भी और तार-तार होने से बचाना होगा अन्यथा आज जो दुस्साहस विकास तथा उसके गुर्गों ने किया है, कल कोई और करेगा।
हो सकता है कि तब ये संख्या इससे भी अधिक हो।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
रविवार, 2 सितंबर 2012
85 लाख की पड़ी मथुरा के ज्वेलर को आशिक मिजाजी
मथुरा के एक करोड़पति सर्राफा व्यवसायी को उनकी
आशिक मिजाजी ने एक ओर जहां बड़ी आर्थिक चोट पहुंचवा दी वहीं दूसरी ओर शहरभर
में खासी चर्चा का विषय बना रखा है। समस्या यह है कि इश्क की ये कसैली दास्तां पता नहीं कब तक अफसाने बनकर सेठजी को परेशान करती रहेगी।
यह
बात अलग है कि फिलहाल सेठजी इस बात से संतुष्ट हैं कि मामला ले-देकर निपट
गया और बात पुलिस तक नहीं पहुंची। कहावत भी है कि जो पकड़ा जाए वह चोर,
बाकी सब साहूकार। वर्ना हर दूसरा नवधनाड्य व्यक्ति गोपाल काण्डा साबित
होगा। मथुरा के बारे में तो यह बात शत-प्रतिशत सही मानी जा सकती है। सोमवार, 28 फ़रवरी 2011
मंगलवार, 25 जनवरी 2011
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