mathura jwellers loot लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
mathura jwellers loot लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 27 मई 2017

यक्ष प्रश्‍नों का जवाब दिए बिना पुलिस ने “मयंक चेन” पर हुए मर्डर व लूट को खोलने का किया दावा

मथुरा। एक मुठभेड़ के बाद पुलिस ने आज आधा दर्जन बदमाशों को पकड़कर ज्‍यूलिरी फर्म ”मयंक चेन” पर हुए डबल मर्डर व करोड़ों रुपए की लूट के पर्दाफाश का दावा किया है।
15 मई की रात करीब साढ़े आठ बजे शहर के मध्‍य कोयला वाली गली में स्‍थित मयंक चेन नामक ज्‍यूलिरी फर्म पर आधा दर्जन सशस्‍त्र बदमाशों ने धावा बोला और अंधाधुंध गोलीबारी करके विकास एवं मेघ अग्रवाल की हत्‍या कर दी तथा विकास के भाई मयंक सहित तीन लोगों को गंभीर रूप से घायल कर दिया।
बदमाश यहां से करोड़ों रुपए मूल्‍य का सोना तथा लाखों रुपए नकद ले जाने में सफल रहे।
 घटना  से  जुड़ा  बीडियो  यहां  देखें - 

 https://youtu.be/5ESX391bTU4


बदमाशों द्वारा की गई यह दुस्‍साहसिक वारदात दुकान के अंदर लगे सीसीटीवी कैमरे में कैद हो गई किंतु अधिकांश बदमाशों के चेहरे कपड़े व हैलमेट से ढके होने के कारण उनकी पहचान करना मुश्‍किल हो रहा था।
हमलावर बदमाशों में से एक का चेहरा आधा खुला था। पुलिस का दावा है कि वही कुख्‍यात ईनामी अपराधी राकेश उर्फ रंगा है, जो गैंग का सरगना भी है।
रंगा का एक अन्‍य भाई बिल्‍ला हत्‍या के दूसरे मामले में काफी समय से जेल के अंदर निरुद्ध है।

रंगा और बिल्‍ला के नाम से कुख्‍यात यह दोनों भाई सबसे पहले तब सुर्खियों में आए जब करीब डेढ़ दशक पूर्व इन्‍होंने होलीगेट के अंदर भीड़ भरे छत्ता बाजार से आर के ज्‍वैलर्स के कर्मचारी को गोली मारकर भारी मात्रा में सोने के जेवरात व नकदी लूट ली।
दीपावली से ठीक दो दिन पहले की गई इस लूट के बाद भी शहर में काफी हंगामा हुआ था। रंगा-बिल्‍ला पकड़े तब भी गए थे और पुलिस ने इनके कब्‍जे से लूट का पूरा माल बरामद होने की बात भी कही थी किंतु बताया जाता है कि अधिकांश माल की बरामदगी नहीं हो सकी क्‍योंकि पीड़ित सर्राफा व्‍यापारी ने अंत तक अपने नुकसान का ब्‍यौरा पुलिस को नहीं दिया।
इसके बाद इन दोनों भाइयों ने एक मामूली सी बात पर अपने पड़ोसी भूलेश्‍वर चतुर्वेदी को समझौते के बहाने घर बुलाकर उसकी हत्‍या कर दी। बाद में भूलेश्‍वर के बड़े भाई तोलेश्‍वर उर्फ तोले बाबा को भी तब मार दिया गया जब वह भूलेश्‍वर के केस की पैरवी के लिए कचहरी जा रहा था। हत्‍या के इन्‍हीं मामलों में रंगा का भाई बिल्‍ला इन दिनों मथुरा जिला कारागार में बंद है।
इस रंजिश के चलते रंगा-बिल्‍ला के चाचा विजय को भी चौबिया पाड़ा क्षेत्र में मार दिया गया था।
पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार राकेश उर्फ रंगा पर फिलहाल एक दर्जन संगीन मामले दर्ज हैं साथ ही 15 हजार रुपए का ईनाम भी घोषित है।
पुलिस का दावा है कि पकड़े गए बदमाशों में शामिल कुख्‍यात ईनामी बदमाश राकेश उर्फ रंगा ही वह शख्‍स है जो मयंक चेन से प्राप्‍त सीसीटीवी फुटेज में प्रमुख रूप से दिखाई दे रहा है।
रंगा के साथ पुलिस ने उसके दो छोटे भाई नीरज एवं चीनी उर्फ कामेश को भी पकड़ा है। गिरफ्त में आए बाकी तीन बदमाशों के नाम आयुष, विष्‍णु उर्फ छोटे तथा आदित्‍य बताए गए हैं।
बताया जाता है कि पुलिस से मुठभेड़ में नीरज गंभीर रूप से घायल हुआ है और उसे गोली लगी है तथा रंगा व चीनी भी घायल हैं।
पुलिस ने इनके कब्‍जे से 20 लाख रुपए मूल्‍य के सोने व हीरे के आभूषण तथा असलाह और मय सिम कार्ड मोबाइल की बरामदगी दिखाई है।
सीसीटीवी फुटेज में दिखाई देने वाले नकाबपोश बदमाश यही थे, इसका पता तो फुटेज की फॉरेंसिक जांच के बाद ही लगेगा अलबत्ता पुलिस ने इस बावत बुलाई गई अपनी प्रेस वार्ता में ऐसी कोई जानकारी नहीं दी कि बदमाशों के कब्‍जे से बरामद माल 16 मई को मयंक चेन के पड़ोसी सर्राफ के यहां से मिले माल से अलग है। यहां यह जान लेना भी जरूरी है कि पुलिस को अब तक पीड़ित व्‍यापारियों ने लूट के माल का कोई ब्‍यौरा नहीं दिया और न ही एफआईआर में इसकी कोई जानकारी दी गई थी।
गौरतलब है कि 16 मई को बरामद वह माल पांच व्‍यापारियों की कमेटी के सामने सीओ सिटी जगदीश सिंह ने मृतक व्‍यापारी मेघ अग्रवाल के पिता को इस शर्त पर सौंप दिया था कि इसे बरामदगी मानते हुए पुलिस की जरूरत के हिसाब से प्रस्‍तुत किया जाएगा।
इसके ठीक विपरीत व्‍यापारियों का कहना था कि उस माल के मिलने में पुलिस की कोई भूमिका नहीं थी। उसे पड़ोसी सर्राफा व्‍यापारी ने व्‍यापारियों को दिया था लिहाजा उसे बरामदगी नहीं माना जा सकता।
पुलिस द्वारा रंगा गैंग से दिखाई जा रही 20 लाख रुपए मूल्‍य की बरामदगी का कोई विस्‍तृत ब्‍यौरा न दिए जाने और आज सुबह ही मेघ अग्रवाल के पिता महेश अग्रवाल द्वारा यह कहे जाने कि उनके ऊपर पुलिस सौंपे गए माल को देने का दबाव बना रही है, यह संदेह होना स्‍वाभाविक है कि पुलिस जिसे रंगा गैंग से बरामद माल बता रही है वह कहीं मेघ अग्रवाल के पिता को सौंपा गया माल ही तो नहीं है।
यदि ऐसा है तो पुलिस के पास बरामदगी के नाम पर रह क्‍या जाता है और कोर्ट में पुलिस का यह गुडवर्क पीड़ित को कितनी राहत दिला सकेगा।
सीसीटीवी फुटेज में दिखाई देने वाले चेहरों से पकड़े गए बदमाशों की शिनाख्‍त पर भी लोग उंगली उठा रहे हैं। बहुत से लोगों का लग रहा है कि जो आधे या पूरे खुले चेहरे सीसीटीवी की फुटेज में दिखाई दे रहे हैं, उनसे पकड़े गए बदमाशों का चेहरा हूबहू मेल खाता नजर नहीं आता।
बहरहाल, इसमें कोई दो राय नहीं कि रंगा-बिल्‍ला के नाम से मशहूर चार भाइयों के इस गैंग की इलाके में भारी दहशत थी और आम आदमी तथा व्‍यापारी इनसे खौफ खाते थे। आसपड़ोस में भी इन्‍होंने आतंक फैला रखा था।
यही कारण है कि न सिर्फ शहर के लोगों ने बल्‍कि आस-पड़ोस के लोगों ने भी इनके पकड़े जाने पर राहत की सांस ली है और चौबिया पाड़ा क्षेत्र में जश्‍न का माहौल बना हुआ है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

सुलझने की बजाय उलझ गया मथुरा का डबल मर्डर और लूट कांड, व्‍यापारियों की नीयत पर भी उठने लगे सवाल

मथुरा की कोयला वाली गली में ”मयंक चेन” नाम ज्‍यूलिरी फर्म पर हुए डबल मर्डर तथा करोड़ों रुपए की लूट का मामला अब सुलझने की बजाय और अधिक उलझ गया है। साथ ही इस जघन्‍य कांड के बाद सक्रिय हुए कुछ व्‍यापारियों की नीयत पर भी पुलिस से मिलीभगत को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
आज विभिन्‍न अखबारों में छपी खबर और पुलिस द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक फर्म के मालिक मयंक सहित तीन लोगों को घायल करके उनके भाई विकास व व्‍यापारी मेघ अग्रवाल की हत्‍या करने वाले लुटेरों की नजर से वहां पड़ा सोने व नकदी से भरा एक बैग छूट गया था। इस बैग को लुटेरों के निकल जाने पर घायल कर्मचारी मोहम्‍मद अली ने एक पड़ोसी सर्राफ के पास यह कहकर रख दिया कि यह मेरा है और इसे मैं हॉस्‍पीटल से लौटने के बाद ले जाऊंगा।
यह भी बताया जा रहा है कि मोहम्‍मद अली को एक नहीं बल्‍कि दो बैग अशोक शाहू नामक मेरठ के कारीगर ने दिए थे जो वारदात के वक्‍त दुकान में मौजूद था और बदमाशों के हमले में वह भी घायल हुआ था। मोहम्‍मद अली को दिए गए दूसरे बैग में क्‍या था और उसका क्‍या हुआ, इसका फिलहाल कुछ पता नहीं है।
बहरहाल, पुलिस का कहना है कि वारदात के अगले ही दिन यह बैग मिल गया था जिसे पांच व्‍यापारियों की कमेटी के सामने इस शर्त पर सीओ सिटी जगदीश सिंह ने मृतक मेघ अग्रवाल के पिता को सौंपा कि इसे ”बरामदगी मानते हुए” जरूरत पड़ने पर प्रस्‍तुत किया जाएगा।
यहां सबसे पहला सवाल तो यह खड़ा होता है कि पुलिस को इस बैग के बारे में सूचना किसने दी और कैसे पुलिस उस सर्राफ तक पहुंची जिसके यहां मोहम्‍मद अली ने बैग रखा था।
पुलिस की मानें तो सीओ सिटी जगदीश सिंह को वारदात की सीसीटीवी फुटेज चैक करते वक्‍त दिखाई दिया कि एक बैग अशोक शाहू के नीचे दबा पड़ा है।
पुलिस की बात सच भी मान ली जाए तो यह प्रश्‍न बाकी रह जाता है कि सीओ सिटी को पड़ोसी सर्राफ के यहां बैग रखे होने की जानकारी किससे मिली।
पुलिस कहती है कि शक के आधार पर उसने हॉस्‍पीटल में एडमिट घायल मोहम्‍मद अली और अशोक शाहू से जब उस बैग के बारे में पूछताछ की तो उन्‍होंने बताया कि एक बैग पड़ोसी सर्राफ के यहां रखा है।
पुलिस यह भी कहती है कि इस बीच मोहम्‍मद अली की पत्‍नी और उसका बेटा उस सर्राफ के यहां बैग लेने पहुंचे थे क्‍योंकि मोहम्‍मद अली व अशोक शाहू की माल को लेकर नीयत खराब हो गई किंतु तब तक चूंकि पुलिस को पता लग चुका था इसलिए उसने सर्राफ को बैग किसी अन्‍य के हवाले न करने की हिदायत दे दी।
दूसरी ओर व्‍यापारी नेताओं का कहना है कि पुलिस ने कोई बैग बरामद नहीं किया लिहाजा वह पुलिस का गुडवर्क नहीं है। पुलिस को तो उन्‍होंने ही सोने से भरा एक बैग छूट जाने तथा पड़ोसी सर्राफ के यहां से मिल जाने की सूचना दी थी। सच्‍चाई जो भी हो, परंतु इतना तय है कि पुलिस के संज्ञान में वारदात के अगले ही दिन सोने से भरा एक बैग मिल जाने की बात आ चुकी थी।
इन दोनों ही स्‍थितियों में बड़ा सवाल यह पैदा होता है कि वारदात के अगले ही दिन एक बैग मिल जाने का पता लग जाने के बावजूद पुलिस ने तीसरे दिन मथुरा आए प्रदेश के डीजीपी सुलखान सिंह और मुख्‍यमंत्री के प्रतिनिधि व प्रदेश के ऊर्जा मंत्री व मथुरा के विधायक श्रीकांत शर्मा को क्‍यों नहीं दी जबकि वह पीड़ित परिवारों के साथ-साथ व्‍यापारियों के जबर्दस्‍त आक्रोश को चुपचाप झेलते रहे।
यदि डीजीपी वहां अपने स्‍तर से इस बात की सूचना देते तो कुछ आक्रोश कम अवश्‍य होता। दूसरे दिन ही एक बैग मिल जाने का पता लगने के बाद क्‍या सीओ सिटी अगले दिन डीजीपी के आने व उनके द्वारा अपने निलंबन की घोषणा किए जाने का इंतजार कर रहे थे।
आश्‍चर्य इस बात पर भी होता है कि डीजीपी सुलखान सिंह तथा ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा को मेघ अग्रवाल के परिवार ने भी बैग मिल जाने की जानकारी देना क्‍यों जरूरी नहीं समझा जबकि यह बात तो व्‍यापारी व सीओ सिटी दोनों स्‍वीकार कर रहे हैं कि बैग अगले दिन यानि 16 मई को ही मिल गया था और डीजीपी व ऊर्जा मंत्री का मथुरा दौरा 17 तारीख की सुबह हुआ है।
पुलिस तथा व्‍यापारी नेताओं की कहानी में एक बड़ा झोल इस बात को लेकर लगता है कि माल से भरे बैग पर यदि मोहम्‍मद अली तथा अशोक शाहू की नीयत खराब हो चुकी थी और मोहम्‍मद अली ने अपनी पत्‍नी व बेटे को सर्राफ के यहां बैग लेने भी भेजा था तो पुलिस ने अब तक उन्‍हें आरोपी क्‍यों नहीं बनाया।
दो हत्‍याएं करके करोड़ों का माल लूट ले जाने वाले और उसी माल में से किसी तरह छूट गए माल पर नीयत खराब करने वालों में क्‍या कोई अंतर है?
नहीं है तो पुलिस और व्‍यापारी नेता दोनों ही मोहम्‍मद अली व अशोक शाहू पर मेहरबान क्‍यों हैं।
इन सबके अतिरिक्‍त एक अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण प्रश्‍न यह भी है कि जिस हिसाब से लुटेरों ने दुकान में घुसने के साथ ही ताबडतोड़ गोलीबारी शुरू कर दी और वारदात को अंजाम देकर भागते वक्‍त भी गली में खड़ी गाय व कुत्‍ते के ऊपर तक फायर झोंके, छतों से झांक रहे लोगों तक पर निशाना साधा, उसके बाद भी वह सर्राफ क्‍या लुटेरों की निगाह से बचे बैग को मोहम्‍मद अली से लेने के लिए बैठा रहा। वो भी तब जबकि गोलीबारी होने के साथ ही कोयला वाली गली ही नहीं, पूरे छत्‍ता बाजार में भगदड़ मच गई थी और दुकानदार अपनी-अपनी दुकानें बंद करके भाग खड़े हुए थे।
इस सबके बावजूद यह मान भी लिया जाए कि किसी तरह वह सर्राफ बैठा रह गया तो भी क्‍या कोई व्‍यक्‍ति इतनी बड़ी व जघन्‍य वारदात के बाद एक कर्मचारी के कहने पर सोने व नकदी से भरा बैग उसके मात्र इतना कहने पर रख लेगा कि यह उसका है और हॉस्‍पीटल से लौटकर वह उसे ले जाएगा। क्‍या कोई व्‍यक्‍ति इस तरह के माहौल में खुद को बिना वजह परेशानी में डालना मुनासिब समझेगा।
अगर बैग रखने वाले सर्राफा व्‍यवसाई को बहुत दिलेर भी मान लिया जाए तो पुलिस ने अपनी तरफ से न तो उसका नाम उजागर किया और न यह बताया कि उसने अच्‍छा काम किया या बुरा।
अच्‍छा काम किया तो उसकी प्रशंसा की जानी चाहिए थी और गलत काम किया है तो उसे भी लूट के बाद हुए घटनाक्रम में षड्यंत्र का आरोपी बनाना चाहिए क्‍योंकि उसने लगभग चौबीस घंटों तक बैग अपने पास छिपाकर रखा ही क्‍यों। हालांकि पब्‍लिक में अब उस सर्राफ का नाम सार्वजनिक हो चुका है।
अमर उजाला में इस बावत एसएसपी विनोद मिश्रा के हवाले से छपी खबर के अनुसार एसएसपी को मृतक मेघ अग्रवाल के पिता ने उनके पास पहुंच कर यह बात बताई कि उनके पुत्र का सोने व नकदी से भरा बैग उन्‍हें मिल गया है।
अगर यह बात सही है तो एसएसपी ने भी इतनी बड़ी बात अपने किसी उच्‍च अधिकारी अथवा मीडिया को बताना क्‍यों जरूरी नहीं समझा, और क्‍यों एसएसपी को भी बैग मिलने की जानकारी सीओ सिटी अथवा किसी अन्‍य अधीनस्‍थ से न मिलकर मेघ अग्रवाल के पिता से मिली। उस बैग के मिलने में ऐसा क्‍या था कि अधीनस्‍थ अधिकारी ने एसएसपी को भी उसके बारे में सूचित करना उचित नहीं समझा।
बताया जाता है कि बैग मिलने का खुलासा दरअसल कल तब हुआ जब मेघ अग्रवाल के परिजन होलीगेट पर भूख हड़ताल एवं धरना प्रदर्शन करने बैठ गए और विकास के परिजनों को इसकी भनक तक नहीं लगी।
विकास के परिजनों ने तब इस बात को आधार बनाकर आक्रोश व्‍यक्‍त किया कि मेघ का कथित माल तो उसके परिवार को दे दिया गया और मेघ व विकास की हत्‍या का खुलासा साथ ही होगा, ऐसे में वह अकेले अब यह सब किसलिए कर रहे हैं।
विकास के परिवार से जुड़े सूत्रों का यह भी कहना है कि बिना किसी जांच के यह कैसे मान लिया गया कि बदमाशों की नजर से छूटा बैग मेघ अग्रवाल का ही था। यह ठीक है कि मेघ अग्रवाल मयंक चेन को माल देता था और उस दिन भी माल देने ही आया था लेकिन बिना जांच के उस माल पर मेघ अग्रवाल के परिजनों का हक कैसे मान लिया गया।
यह भी तो हो सकता है कि मेघ अग्रवाल मयंक चेन के लिए लाए गए माल को उनके हवाले कर चुका हो, एसे में उस माल पर हक मेघ का न होकर मयंक चेन का बनता है।
इस संबंध में व्‍यापारी नेताओं का कहना था कि सोने के हर आभूषण पर उसे बनाने वाली कंपनी का ब्रांड नेम अंकित होता है और उसी आधार पर यह मान लिया गया कि माल मेघ अग्रवाल का है।
इसके जवाब में दूसरे सर्राफा कारोबारी बताते हैं कि ब्रांड किसी का भी हो किंतु उस पर हक तो उसे खरीदने वाली फर्म का होता है। जब मेघ अग्रवाल मयंक चेन के लिए सामान लाया था और वारदात के वक्‍त वहीं बैठा था तो बिना जांच के उस पर मेघ अग्रवाल के परिजनों का हक मान लेना अनुचित है।
वारदात से ठीक पहले के वीडियो फुटेज भी शो करते हैं कि दुकान पर मौजूद सभी लोग इत्‍मीनान के साथ बैठे हैं और सामान्‍य बातचीत में मशगूल हैं। लेनदेन होने जैसी कोई गतिविधि उसमें कहीं दिखाई नहीं देती।
सूत्रों से प्राप्‍त जानकारी के अनुसार इस पूरे घटनाक्रम में कुछ ऐसे तत्‍वों ने भूमिका अदा की है जिनकी पुलिस से अत्‍यंत निकटता है और मयंक चेन की अपेक्षा मेघ अग्रवाल के परिजनों से अधिक सहानुभूति।
इन्‍हीं तत्‍वों ने एक सोची समझी योजना के तहत डीजीपी सुलखान सिंह तथा ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा को घटना स्‍थल पर जाने से रोका और इन्‍हीं तत्‍वों ने सर्राफा कमेटी के स्‍थानीय पदाधिकारियों को भी उनसे मुलाकात तक नहीं करने दी जबकि पहले यह दोनों कार्यक्रम डीजीपी व ऊर्जा मंत्री के दौरे में शामिल थे।
यह भी पता लगा है कि मौका ए वारदात पर सबसे पहले पहुंचने वालों में एक ऐसा सर्राफा व्‍यवसाई था जिसके कर्मचारी को सरेराह गोली मारकर कुछ वर्ष पूर्व नामजद बदमाश भारी मात्रा में सोने के आभूषण तथा नकदी लूट ले गए थे। तब इस सर्राफा व्‍यवसाई ने घटना के बाद लूटे गए माल की कोई जानकारी पुलिस को नहीं दी और सारा जोर आभूषणों के साथ मौजूद कागजों की बरामदगी पर लगाया, परिणाम स्‍वरूप पकड़े जाने के उपरांत भी बदमाश भारी मात्रा में आभूषण व नकदी पचा गए।
पुलिस को शक है कि मयंक चेन पर भी हत्‍या व लूट को अंजाम उन्‍हीं बदमाशों ने दिया है।
यहां इस बात का जिक्र करना इसलिए जरूरी हो जाता है कि मयंक चेन पर हुए डबल मर्डर व लूट के बाद छूटे गए बैग की बरामदगी में उक्‍त सर्राफ की बड़ी भूमिका बताई जाती है जबकि घटना वाले दिन से पूरी तरह पीड़ित परिवारों के पक्ष में खड़े रहने वाले सर्राफा कमेटी के स्‍थानीय पदाधिकारियों को छूटे गए बैग की कोई जानकारी नहीं दी गई। और तो और मेघ अग्रवाल के पिता को जिन पांच व्‍यापारियों की कमेटी बनाकर उनका कथित माल सौंपा गया, उस कमेटी में भी सर्राफा कमेटी का एक भी व्‍यक्‍ति शामिल नहीं किया गया और न यह बताया कि सपुर्दगी कमेटी में शामिल पांच व्‍यापारी कौन-कौन से हैं।
खबरों के मुताबिक पुलिस-प्रशासन ने कल मेघ अग्रवाल के परिजनों को 48 घंटों में घटना के अनावरण का आश्‍वासन देकर भूख हड़ताल व धरने से उठाने पर राजी किया, जिसमें से 24 घंटे से अधिक बीत चुके हैं।
वहीं प्रदेश के डीजीपी ने उनके आश्‍वासन के बाद भी मेघ अग्रवाल के परिजनों द्वारा धरना देने की बात पर अपनी कोई टिप्‍पणी करने से इंकार कर दिया।
दूसरी ओर आज प्रदेश की सर्राफा कमेटी के आह्वान पर प्रदेश भर के सर्राफा कारोबारियों ने बंद रखा है। स्‍थानीय व्‍यापारी और सर्राफा कमेटी के लोगों ने भी आज मथुरा के जिलाधिकारी अरविंद एम बंगारी से मुलाकात कर अपना रोष व्‍यक्‍त किया है।
हो सकता है कि पुलिस प्रशासन मेघ अग्रवाल के परिजनों को दिए गए समय के अंदर ही वारदात का खुलासा कर दे लेकिन वह वारदात के बाद पैदा हुए घटनाक्रम तथा छूटे गए बैग की कहानी के पीछे का सच बता पाएगी, यह कहना मुश्‍किल है।
पुलिस द्वारा अब तक अख्‍तियार किया गया रवैया तो कतई ऐसे कोई संकेत नहीं देता कि वह पूरे माल की बरामदगी करके असली अपराधियों को बेनकाब कर पाएगी। पुलिस को तो फिलहाल खुद ही नहीं पता कि मयंक चेन से बदमाश आखिर कितना माल लूट ले जाने में सफल रहे और छूटे गए बैग को छिपाकर रखने वालों की असली मंशा क्‍या थी।
बदमाशों की कुल संख्‍या को लेकर पुलिस पहले दिन से कनफ्यूज है ही।
अंधेरे में तीर चलाना पुलिस की कार्यप्रणाली का हिस्‍सा बन चुका है और वह इस मामले में भी वही कर रही है।
यही कारण है कि हर वारदात के बाद अगली वारदात कहीं अधिक जघन्‍य व कहीं अधिक दुस्‍साहसिक होती है। तो इंतजार कीजिए और देखिए आगे-आगे होता है क्‍या।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

मथुरा का सर्राफा व्‍यवसाई हत्‍या और लूटकांड: 5 करोड़ रुपए का सोना ले जाने में सफल रहे बदमाश!

मथुरा के होली गेट क्षेत्र में दो सर्राफा व्‍यवसाइयों की हत्‍या करने वाले बदमाश करीब 5 करोड़ रुपए का सोना लूटकर ले गए हैं।
यह जानकारी सर्राफा व्‍यवसाय से जुड़े सूत्रों ने दी है, हालांकि पीड़ित परिवारों ने अभी नुकसान का आंकलन नहीं किया है।
गौरतलब है कि कोयला वाली गली में मयंक चेन के नाम से सर्राफा व्‍यवसाय करने वाले विकास अग्रवाल सिर्फ सोने का ही व्‍यवसाय करते थे और इसलिए उनके यहां सोने के ही दूसरे कारोबारियों का आवागमन रहता था।
यही कारण था कि लूट के वक्‍त एक अन्‍य सर्राफा व्‍यवसाई 30 वर्षीय मेघ अग्रवाल भी व्‍यावसायिक कारोबार के संदर्भ में मयंक चेन पर मौजूद थे।
सर्राफा कमेटी के सूत्रों से प्राप्‍त जानकारी के अनुसार ढाई से तीन किलो सोना तो मेघ अग्रवाल ही अपने साथ मयंक चेन पर लेकर गए थे।
सर्राफा कमेटी ने इस जघन्‍य वारदात का खुलासा न होने तक सर्राफा बाजार पूरी तरह बंद करने का निर्णय लिया है और आगे की रणनीति के लिए आज शाम बैठक बुलाई है।
Also See the Video


मथुरा में किसी सर्राफा व्‍यवसाई के यहां होने वाली यह कोई पहली जघन्‍य वारदात नहीं है। इससे पहले भी बदमाश कई दुस्‍साहसिक वारदातों को अंजाम दे चुके हैं और कई सर्राफा व्‍यवसाई इसमें अपनी जान गंवा चुके हैं।
पुलिस हर वारदात का अपने रटे-रटाए तरीके से खुलासा कर देती है किंतु वारदातें हैं कि रुकने का नाम नहीं लेतीं।
ऐसे में यह सवाल खड़ा होना लाजिमी है कि जब पुलिस बदमाशों को पकड़ती है तो फिर वारदातों पर लगाम क्‍यों नहीं लगती ?
इस सवाल के जवाब में ही छिपा है जघन्‍य अपराधों का पूरा कच्चा चिठ्ठा और यही जवाब बता सकता है कि सत्ता बदल जाने के बावजूद अपराधों का ग्राफ नीचे क्‍यों नहीं आता।
प्रथम तो सोने-चांदी का धंधा अधिकांशत: ”वायदा कारोबार” पर निर्भर है जिसमें लिखा-पढ़ी काफी कम होती है। सर्राफा कारोबार की इस सच्‍चाई से बदमाश भी भली-भांति वाकिफ हैं लिहाजा वह बेखौफ होकर वारदात को अंजाम देते हैं। उन्‍हें पता होता है कि पकड़े जाने पर भी उनके पास लूट का इतना माल बच जाएगा जिससे वह पुलिस को भी सेट कर सकते हैं और कानूनी लड़ाई भी लड़ सकते हैं।
नोटबंदी के बाद शहर के कृष्‍णा नगर क्षेत्र में हुई लूट की ऐसी ही एक वारदात को पीड़ित सर्राफ ने किस तरह नकार दिया और बदमाशों को लूट की रकम के साथ पकड़ने के बावजूद पुलिस की कितनी छीछालेदर हुई, यह इसका एक उदाहरण है अन्‍यथा इससे पहले भी अनेक वारदातों में इसी प्रकार सच्‍चाई छिपाई जाती रही है। पुलिस को फिर वह पैसा आयकर विभाग में जमा कराना पड़ा।
दूसरे जब कोई बड़ी वारदात हो जाती है तो पुलिस पर उसे जल्‍द से जल्‍द खोलने का दबाव इतना अधिक रहता है कि वह असली अपराधियों तक पहुंच नहीं पाती और अपने यहां दर्ज आपराधिक रिकॉर्ड को खंगाल कर उन्‍हीं में से किसी को बलि का बकरा बना देती है ताकि एक ओर जहां पब्‍लिक का आक्रोश शांत कर वाहवाही लूटी जा सके वहीं दूसरी ओर राजनीतिक दबाब से भी मुक्‍ति पाई जा सके।
सर्राफा व्‍यवसाइयों के यहां लूट की वारदातें लगातार होते रहने का तीसरा कारण उन व्‍यक्‍तियों का कभी गिरफ्त में न आ पाना है जो बदमाशों के लिए मुखबिरी का काम करते हैं और उसके एवज में लूट के माल का अच्‍छा खासा हिस्‍सा पाते हैं।
कौन नहीं जानता कि कोई भी लूट की ऐसी वारदात तभी होती है जब बदमाशों को किसी से अपने शिकार की सटीक जानकारी मिलती है। बदमाशों को पता होता है कि जहां वह वारदात को अंजाम देने जा रहे हैं वहां उन्‍हें कितना माल मिल सकता है और उसमें से कितना माल नंबर दो यानि बिना लिखा-पढ़ी का होगा।
उधर पुलिस भी वारदात का जल्‍द से जल्‍द अनावरण करने के लिए जो मिलता है और जैसा मिलता है, उसी को आरोपी बनाकर अपने कर्तव्‍य की इतिश्री कर लेती है। ऐसे में उसके दोनों हाथ में लड्डू होते हैं।
सरकार योगी की हो अथवा किसी अन्‍य की, पुलिस वही है और पुलिस की कार्यप्रणाली भी वही है। सत्‍ता जरूर बदलती है किंतु बाकी कुछ नहीं बदलता।
सत्‍ता पर काबिज होने वाले लोग पुलिस तथा प्रशासनिक अधिकारियों का सिर्फ तबादला करके या उन्‍हें ताश के पत्‍तों की तरह फैंटकर यह समझ लेते हैं कि व्‍यवस्‍था परिवर्तन हो जाएगा लेकिन ऐसा होता नहीं है। अधिकारी और कर्मचारियों की सूरतें बदलती अवश्‍य दिखाई देती हैं परंतु सीरत जस के तस रहती है।
लगता है कि नेताओं से कहीं ज्‍यादा अच्‍छी तरह इस चूहे-बिल्‍ली के खेल को बदमाश समझते हैं और इसलिए वह ”बंदर” बनकर अपना उल्‍लू सीधा करते रहते हैं।
मयंक चेन पर हुई जघन्‍य वारदात को आज विधानसभा में भी उठाया गया और सरकार के प्रवक्‍ता, मथुरा शहर के विधायक और प्रदेश के ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा ने भी एक कुशल राजनेता की तरह उसके शीघ्र अनावरण की बात कही।
हो सकता है कि जल्‍द से जल्‍द वारदात का अनावरण कर भी दिया जाए लेकिन क्‍या इससे सर्राफा व्‍यवसाइयों के साथ हो रही वारदातों पर प्रभावी अंकुश लग पाएगा, इसका जवाब किसी के पास नहीं।
होगा भी नहीं, क्‍योंकि सत्‍ता बदलती हैं पर व्‍यवस्‍थाएं नहीं। चेहरे बदलते हैं किंतु कार्यप्रणाली नहीं। यहां तक कि मानसिकता भी नहीं बदलती। और जब सबकुछ वही रहता है तो कैसे संभव है कि लखनऊ की कुर्सी पर बैठने वाले एक अदद व्‍यक्‍ति के बदल जाने से व्‍यवस्‍थाओं में आमूल-चूल परिवर्तन हो जाएगा।
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट का डिजिटिलाइजेशन किए जाने के कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा कहे गए ये शब्‍द बहुत मायने रखते हैं कि व्‍यवस्‍थाएं तब बदलती हैं जब उन्‍हें एप्‍लाई करने वालों का मन बदलता है। व्‍यवस्‍थाएं केवल तकनीक से नहीं बदल सकतीं।
बहुत बड़ा है उत्‍तर प्रदेश, इसलिए कहीं न कहीं बदमाश इसी प्रकार व्‍यावसायिक, राजनीतिक और प्रशासनिक खामियों का लाभ उठाकर जघन्‍य वारदातों को अंजाम देते रहेंगे। कहीं न कहीं कोई मेघ अग्रवाल, कोई विकास मारे जाते रहेंगे।
यूपी में सरकार जरूर बदली है किंतु सरकारी तंत्र का मन बदलता दिखाई नहीं दे रहा। और जब तक इस तंत्र का मन नहीं बदलेगा तब तक कुछ भी बदलने की उम्‍मीद भी करना, खुद को धोखे में रखने जैसा ही है।
-Legend News
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...