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सोमवार, 7 नवंबर 2022

होटल अग्निकांड: क्या ''बसेरा ग्रुप'' के मालिक को बचाव का मौका दे रही है मथुरा पुलिस?

 क्या "बसेरा ग्रुप" के मालिक रामकिशन अग्रवाल को मथुरा पुलिस बचाव का मौका दे रही है? 


यह सवाल इसलिए खड़ा होता है कि बसेरा ग्रुप के वृंदावन स्‍थित होटल 'वृंदावन गार्डन' में हुए अग्निकांड को आज पांचवां दिन है, लेकिन अब तक इसके जिम्‍मेदार किसी आरोपी की गिरफ्तारी पुलिस नहीं कर सकी है जबकि इस अग्निकांड ने होटल के ही दो कर्मचारियों की जान ले ली और एक की हालत गंभीर है। 
यह सवाल इसलिए भी किया जा रहा है क्योंकि दुर्घटना वाले दिन पहले तो वृंदावन पुलिस ने FIR में ही लीपापोती करने का प्रयास किया और 'नामजदगी' की जगह 'स्‍वामी प्रबंधक' होटल 'वृंदावन गार्डन' लिखकर सबको गुमराह करने की कोशिश की किंतु 'लीजेण्‍ड न्यूज' ने जब पुलिस की इस 'कारस्तानी' को 'हाईलाइट' किया तब अगले दिन बसेरा ग्रुप ऑफ होटल के मालिक रामकिशन अग्रवाल, प्रबंधक ऋषि कुंतल तथा एक अन्‍य कर्मचारी सतीश पाठक को नामजद किया। 
अग्निशमन अधिकारी की ओर से आईपीसी की धारा 304 और 308 के तहत दर्ज कराए गए इस मामले में 'नामजदगी' के बावजूद पांचवें दिन तक कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है। 
पुलिस दे रही है मौका 
बताया जा रहा है कि जिले की पुलिस ही नहीं, प्रशासन को भी विभिन्न माध्‍यमों से ऑब्‍लाइज करने वाला बसेरा ग्रुप का मालिक रामकिशन अग्रवाल लखनऊ तक पहुंच रखता है और इसीलिए पुलिस उस पर हाथ डालने की हिम्मत नहीं कर रही। 
सूत्रों से प्राप्‍त जानकारी के अनुसार सत्ता के गलियारों तक पैठ बना चुका रामकिशन अग्रवाल तीन स्‍तर पर अपने बचाव की कोशिश में लगा है। उसकी पहली कोशिश तो यह है कि पुलिस की तफ्तीश में ही उसे क्लीन चिट मिल जाए और वह साफ बच निकले। रामकिशन अग्रवाल की दूसरी कोशिश है कि हाई कोर्ट से उसे अरेस्‍ट स्‍टे या अग्रिम जमानत प्राप्‍त हो जाए। 
यदि इनमें से कुछ भी संभव नहीं होता तो रामकिशन अग्रवाल राजनीतिक प्रभाव से इस मामले की जांच सीबीसीआईडी के हवाले कराना चाहता है जिससे एक ओर गिरफ्तारी की आशंका से मुक्‍ति मिले तथा दूसरी ओर मामला ठंडे बस्‍ते के हवाले हो जाए क्योंकि सीबीसीआईडी की जांच ऐसे लोगों के लिए बहुत मुफीद साबित होती है, साथ ही उसकी जांच का तरीका किसी केस की गर्मी को शांत करने का पूरा मौका उपलब्‍ध कराता है। 
खबर के साथ लगा वर्ष 2014 का फोटो यह बताने के लिए काफी है कि रामकिशन अग्रवाल की सत्ता में पहुंच कब से तथा किस स्‍तर तक है। इस फोटो में वह किसी कार्यक्रम के दौरान यूपी के तत्‍कालीन राज्यपाल राम नाइक जी को गाय की प्रतिमा भेंट करते दिखाई दे रहा है। 
यूं भी किसी इतने बड़े कारोबारी से, जिससे पुलिस-प्रशासन समय-समय पर ऑब्‍लाइज होता रहता हो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई करना उसके लिए आसान नहीं होता। कारोबारी भी ऐसा, जिसकी सत्ताधारी पार्टी में ऊपर तक पहुंच हो। 
ये भी पता लगा है कि इस बीच पुलिस प्रशासन को इस आशय का संदेश भिजवाया गया है कि अग्निकांड की चपेट में आए होटल कर्मचारियों ने चूंकि शराब का सेवन कर रखा था इसलिए वो अपना बचाव नहीं कर सके। यानी आग का शिकार होने के लिए किसी हद तक वो भी जिम्‍मेदार थे। हालांकि जांच अधिकारी के गले यह बात कितनी उतरती है और क्या पोस्‍टमार्टम रिपोर्ट से ऐसी किसी बात की पुष्‍टि हुई है, इसका पता लगना बाकी है। 
बहरहाल, इतना तो साफ है कि लखनऊ के 'लेवाना' होटल में हुए अग्‍निकांड की तरह कृष्‍ण की नगरी में हुए इस अग्‍निकांड को न तो पुलिस उतनी गंभीरता से ले रही है और न प्रशासन अथवा राज्य सरकार। 
यही कारण है कि बिना एनओसी के चल रहे इस होटल में दो कर्मचारियों की मौत का करण बने अग्‍निकांड की बमुश्‍किल एफआईआर दर्ज किए जाने के अतिरिक्‍त अब तक कोई एक्शन नहीं लिया गया। न तो मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के किसी अधिकारी अथवा कर्मचारी से पूछताछ हुई और न किसी को बिना एनओसी होटल का नक्शा पास करने का जिम्‍मेदार ठहराया गया। 
बस यही फर्क है प्रदेश की राजधानी लखनऊ के एक होटल में हुए अग्निकांड में और मथुरा के वृंदावन स्‍थित होटल के अग्‍निकांड में। वहां न केवल 15 अधिकारी तत्‍काल निलंबित कर दिए गए बल्‍कि 19 अधिकारियों के ख़िलाफ़ सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए जिनमें कुछ रिटायर अधिकारी भी शामिल हैं। 
सीएम योगी आदित्‍यनाथ ने लखनऊ मंडल के पुलिस आयुक्त से जांच कराई। इस जांच रिपोर्ट में फायर ब्रिगेड, ऊर्जा विभाग, नियुक्ति विभाग, आवास और शहरी विकास विभाग सहित आबकारी विभाग के कई अधिकारियों की अनियमितता व लापरवाही पाई गई। 
जांच में पाया गया कि होटल 'लेवाना' को अवैध रूप से बनाया गया था। जिसके लिए लखनऊ विकास प्राधिकरण द्वारा 22 इंजीनियरों और जोनल अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की संस्‍तुति की गई लेकिन वृंदावन में दो मौतों के बाद भी किसी के कान पर जूं नहीं रेंग रही। आखिर लखनऊ, लखनऊ है। प्रदेश की राजधानी है। और मथुरा-वृंदावन एक अदना सा जिला। इसकी बराबरी प्रदेश की राजधानी से कैसे संभव है, चाहे मौत के मामले समान रूप से दुखदायी क्यों न माने जाते हों। 
-Legend News 

बुधवार, 20 जुलाई 2022

योगी जी... देखिए तो कि भ्रष्‍टाचार पर आपकी जीरो टॉलरेंस नीति का मथुरा पुलिस ने कैसा मजाक बनाया है?

ऐसा लगता है कि भ्रष्‍टाचार के मामले में योगी सरकार द्वारा अपनाई जा रही 'जीरो टॉलरेंस' की नीति को तमाम सरकारी विभागों की तरह बहुत से पुलिसकर्मी भी अपने लिए एक 'स्‍वर्णिम अवसर' मान कर चल रहे हैं, और इसलिए भ्रष्‍टाचार पर सख्‍ती के संदेश का भरपूर लाभ उठाने में लगे हैं। 

पुलिस में ऐसे ही एक सुनियोजित भ्रष्‍टाचार का मामला तब सामने आया जब साइबर क्राइम करने वाले पूरे गिरोह के डेढ़ दर्जन से अधिक सदस्‍यों को लाखों रुपए लेकर थाने से ही छोड़ दिया गया। 
हालांकि इसकी भनक लगते ही एक ओर जहां एसएसपी मथुरा अभिषेक यादव ने विभागीय जांच के आदेश देते हुए संबंधित थाना प्रभारी इंस्‍पेक्‍टर अजय कौशल और चौकी प्रभारी सतोहा योगेश नागर को निलंबित कर दिया वहीं दूसरी ओर आईजी आगरा जोन नचिकेता झा ने भी जिले में तैनात आईपीएस अधिकारी (एएसपी) संदीप मीणा को जांच सौंपी है, लेकिन यहां सवाल यह पैदा होता है कि किसी इतने गंभीर मामले में क्या केवल विभागीय जांच कराया जाना पर्याप्‍त है? 
पूरे पुलिस विभाग को शर्मिंदा करने और योगी सरकार के आदेश-निर्देशों को बेखौफ होकर ताक पर रखने के इस मामले में प्रथम दृष्‍ट्या संलिप्‍त दिखाई दे रहे पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं की जानी चाहिए? 
बताया जाता है भ्रष्‍टाचार के इस पूरे नायाब खेल की सूचना लखनऊ में बैठे बड़े अधिकारियों को भी लग चुकी है, और वो आगरा तथा मथुरा के बड़े अधिकारियों की कार्रवाई पर पूरी नजर बनाए हुए हैं। 
क्‍या है पूरा मामला 
घटनाक्रम के अनुसार मथुरा जनपद के मलाईदार थानों में शुमार हाईवे थाना पुलिस ने विगत 11 जुलाई को साइबर क्राइम करने वाले गिरोह के 19 सदस्‍यों को मुखबिर की सूचना पर एकसाथ धर-दबोचा। 
पुलिस के लिए सिरदर्द बना हुआ है साइबर क्राइम 
यहां यह जान लेना जरूरी है कि सोशल मीडिया के इस दौर में साइबर क्राइम पुलिस के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है और इसीलिए हर जनपद में पुलिस का एक साइबर सेल काम भी कर रहा है। 
ये बात अलग है कि अपराधियों के हमेशा पुलिस से दो कदम आगे चलने तथा पुलिस के पास उनकी तुलना में संसाधनों के अभाव की वजह से पुलिस को साइबर अपराधियों से निपटने में दिक्‍कतें पेश आती हैं। 
यही कारण है कि हर दिन कोई न कोई व्‍यक्‍ति कहीं न कहीं साइबर अपराधियों का शिकार होता है। 
पैसे लेकर छोड़ दिए सभी 19 अपराधी 
पुलिस भी इस बात से भली-भांति परिचित है और उच्‍च अधिकारी इनकी धर-पकड़ के लिए परेशान भी रहते हैं, बावजूद इसके मथुरा के थाना हाईवे की पुलिस ने साइबर अपराधियों के इस पूरे गिरोह को लाखों रुपए लेकर छोड़ दिया और अपने अधिकारियों को इसकी भनक तक नहीं लगने दी। 
विभागीय सूत्र बताते हैं कि हाईवे थाना पुलिस ने गिरोह के सभी 19 सदस्‍यों को छोड़ने की एवज में दलालों के माध्‍यम से प्रति सदस्‍य करीब डेढ़ लाख रुपया वसूला। दलालों को क्या मिला, इसकी जानकारी होना बाकी है। 
थाना पुलिस के इस योजनाबद्ध भ्रष्‍टाचार का अंदाज लगाने के लिए यह जान लेना काफी है कि थाने में कुछ देर रखने के बाद इन सभी 19 अपराधियों को थाना परिसर में पीछे की ओर बने कमरों में रखा गया, जिससे मामला चुपचाप निपटाने में आसानी हो।
छोड़े गए अपराधियों के नाम
रविकांत पुत्र श्रीचंद निवासी गांव नवादा थाना हाईवे, जितेन्‍द्र पुत्र राजकुमार निवासी अलीगढ़, गिर्राज पुत्र रवीन्द्र निवासी एटा, विनोद पुत्र नवी निवासी असम, सैकुल पुत्र रेशम, साहिल पुत्र अब्‍दुल, तस्‍लीम पुत्र नसरू, रॉबिन पुत्र रेशम, हमीद पुत्र आशू, मकसूद पुत्र कमरुद्दीन, साहिल पुत्र आयन, भाकिल पुत्र मोहन्‍दा, सुहैल पुत्र याकतअली, साबिर पुत्र अनवर, ताहिर पुत्र जाकिर, सकलम पुत्र मोहन्‍दा, इरशाद पुत्र महमूदा और राशिद।     
सूत्रों से प्राप्‍त जानकारी के अनुसार जांच अधिकारी आईपीएस संदीप मीणा ने इस मामले में एक बड़ी उपलब्‍धि हासिल करते हुए थाने के सीसीटीवी कैमरे की फुटेज हासिल कर ली है और उसमें ये अपराधी आते व जाते हुए दिखाई दे रहे हैं। इसके अलावा जांच अधिकारी को एक साक्ष्‍य सतोहा चौकी के रजिस्‍टर से प्राप्‍त हुआ है। 
दरअसल, चौकी प्रभारी सतोहा ने किसी आंशका के चलते इन सभी 19 आरोपियों का नाम चौकी के रजिस्‍टर में दर्ज कर लिया था क्‍योंकि अपराधियों की धरपकड़ में वह भी शामिल थे। संभवत: इसीलिए चौकी प्रभारी सतोहा योगेश नागर अब खुद को पूरी तरह निर्दोष बता रहे हैं और कह रहे हैं कि मैं अधिकारियों के सामने पूरा सच लेकर आऊंगा। 
ऐसे में एक सवाल यह और उठता है कि बिना ठोस कार्रवाई हुए और लाखों रुपए हड़प कर एकसाथ 19 साइबर अपराधियों को छोड़ देने जैसे संगीन मामले में एफआईआर दर्ज किए बिना क्या पूरा सच सामने आ पाएगा। या मथुरा के ही डॉ. निर्विकल्‍प अपहरण काण्‍ड की तरह ये भी फाइलों में दब कर रह जाएगा।
क्या है डॉ. निर्विकल्‍प का अपहरण काण्‍ड 
10 दिसंबर 2019 को रात करीब 8 बजे हाईवे थाना क्षेत्र में ही गोवर्धन चौराहे के फ्लाई ओवर पर मथुरा के मशहूर ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. निर्विकल्‍प का अपहरण कर उनसे वसूली गई 52 लाख रुपयों की फिरौती को इलाका पुलिस हड़प गई और बदमाश छोड़ दिए गए। 
जब इस मामले में शोर-शराबा हुआ तो पूरे दो महीने बाद 11 फरवरी 2020 की रात 10 बजकर 53 मिनट पर हाईवे थाना पुलिस ने अपनी ओर से IPC की धारा 364 A के तहत एक एफआईआर दर्ज की। 
हाईवे थाने के तत्‍कालीन प्रभारी इंस्‍पेक्‍टर जगदंबा सिंह की ओर से दर्ज कराई गई इस एफआईआर में सनी मलिक पुत्र देवेन्‍द्र मलिक निवासी न्‍यू सैनिक विहार कॉलोनी थाना कंकरखेड़ा मेरठ, महेश पुत्र रघुनाथ निवासी ग्राम कौलाहार थाना नौहझील मथुरा, अनूप पुत्र जगदीश निवासी ग्राम कौलाहार थाना नौहझील मथुरा तथा नीतेश उर्फ रीगल पुत्र नामालूम निवासी भोपाल मध्‍यप्रदेश (हाल निवासी दिल्‍ली एनसीआर) को नामजद किया गया।
इस पूरे प्रकरण का एक दिलचस्‍प पहलू यह भी रहा कि डॉ. निर्विकल्‍प के अपहरण की अपनी ओर से FIR दर्ज कराने वाले इंस्‍पेक्‍टर जगदंबा सिंह को उसी दिन तत्‍काल प्रभाव से तत्‍कालीन एसएसपी शलभ माथुर ने निलंबित कर दिया। जिन्‍हें बाद में इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय के आदेश पर बहाल भी कर दिया गया। 
नामजद अपराधियों को पुलिस ने पकड़ा भी, लेकिन उन 52 लाख रुपए का कुछ पता नहीं लगा जिन्हें अपराधियों को फिरौती के रूप में देने की पुष्‍टि खुद डॉ निर्विकल्‍प कर चुके थे। 
बहरहाल, अब देखना यह होगा कि लाखों रुपए लेकर साइबर क्राइम के गिरोह से जुड़े डेढ़ दर्जन अपराधियों को छोड़ने का यह संगीन मामला भी डॉ. निर्विकल्‍प अपहरण काण्‍ड की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा या फिर ईमानदार पुलिस अफसरों के रहते किसी ऐसे अंजाम तक पहुंचेगा, जिसके बाद कोई थाना या चौकी प्रभारी इतना बड़ा दुस्‍साहर न कर सके और योगी सरकार की भ्रष्‍टाचार के मामले में अपनाई गई जीरो टॉलरेंस की नीति का इस तरह मजाक न उड़ा पाए। 
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी   

मंगलवार, 1 जून 2021

मथुरा रिफाइनरी के तेल का खेल: कभी किसी वजीर के गिरेबां तक हाथ डालने की हिमाकत नहीं कर पायी पुलिस


 मथुरा रिफाइनरी से हो रहे तेल के खेल में जिन हमराहों पर हाथ डालकर मथुरा पुलिस उन्‍हें वजीर साबित करने की कोशिश कर रही है, वह दरअसल इस खेल का वजीर तो क्‍या, प्‍यादे तक नहीं हैं।

वजीर तो वाकई वजीर हैं, और उनके गिरेबां तक हाथ डालने की हिमाकत आगरा तथा मथुरा पुलिस का कोई अफसर नहीं कर पाया। ये वजीर हर सत्ता में अपना रसूख कायम रखते हैं, फिर चाहे वो सत्ता सपा की हो अथवा बसपा की, और किसी गठबंधन की हो या भाजपा की ही क्‍यों न हो।
इन दिनों मथुरा पुलिस थोड़ी-बहुत उछल-कूद करके अपनी जो सक्रियता दिखा रही है, उसका एकमात्र कारण है तेल के खेल में अपनी संलिप्‍तता से बचने का प्रयास करना वर्ना क्‍या ऐसा संभव है कि बार-बार पाइप लाइन में सूराख करके करोड़ों का माल पार कर लिया जाए और पुलिस लकीर पीटती रहे।
ऐसा नहीं है कि मथुरा को अब तक कोई ईमानदार पुलिस अफसर मिला ही न हो, पहले कई जांबाज पुलिस अफसरों ने मथुरा रिफाइनरी से होने वाले तेल के खेल में दखल देने की कोशिश की है लेकिन आज तक न तो कोई पुलिस अफसर किसी वजीर तक पहुंच पाया और न किसी वजीर के प्‍यादे को अपना मोहरा बना पाया। हां, थोड़े-बहुत हाथ-पैर मारने के बाद वह खुद उन वजीरों का मोहरा जरूर बन गया और अंतत: उनके तथा उनके हलूकरों के इशारों पर नाचते देखा गया।
इसी क्रम में नाम कमाने की चाह रखने वाले कुछ पुलिस अफसर दाम भले ही कमा गए परंतु बदनाम होने से नहीं बच सके। जो ये नहीं कर पाए उन्‍हें तत्‍काल प्रभाव से स्‍थानांतरित कर दिया गया।
आज उनमें से कोई डीआईजी बना बैठा है तो कोई आईजी और एडीजी। एक-दो पुलिस अफसर तो डीजी बनकर सेवामुक्‍त भी हो लिए और आज टीवी चैनल्‍स पर होने वाली डिबेट्स में खाकी पहनने वालों को नैतिकता व ईमानदारी का पाठ पढ़ाते देखे व सुने जा सकते हैं।
कड़वा सच यह है कि मथुरा में रिफाइनरी स्‍थापित होने के बाद से शुरू हुआ तेल का खेल कभी बंद हुआ ही नहीं। एक-दो मौकों पर इसमें शिथिलता अवश्‍य दिखाई दी किंतु वह भी चंद दिनों के लिए।
यही कारण है कि मथुरा तथा आगरा में इस खेल के चलते एक-दो नहीं दर्जनों मनोज गोयल पैदा हुए और दर्जनों मनोज अग्रवाल व सुजीत प्रधान। तेल के खेल की जन्‍मकुंडली खंगाली जाए तो पता लग जाएगा कि आज उनमें से कोई नामचीन बिल्‍डर बन चुका है तो कोई मशहूर व्‍यवसाई। किसी के नाम से उद्योगपति का टैग चस्‍पा किया जा चुका है तो कोई जनप्रतिनिधि बनकर जनता की सेवा करने का दम भर रहा है।
इतना सब होने के बावजूद हजारों करोड़ रुपए सलाना कमाई वाले तेल के इस खेल का वजीर हमेशा सत्ता के सोपान से चिपके रहने वाला ही कोई बन पाया, और वहां तक पहुंचने के माद्दा मथुरा-आगरा के इन चिरकुटों में था नहीं। ये लोग सत्‍ता के गलियारों में भटकते रह गए और उन्‍हीं झरोखों से झांककर खुदमुख्‍त्‍यारी का दम भरते रहे।
मथुरा रिफाइनरी से होने वाले तेल के खेल में संलिप्‍त हमराह, हलूकर, मोहरे तथा प्‍यादे तक नहीं जानते कि उनकी गर्दन में बंधी डोर का छोर आखिर है किसके हाथ में। वो तो सिर्फ इतना जानते हैं कि उस डोर के इशारे पर ही उन्‍हें नाचना है और उसी के इशारे पर अपने अधीनस्‍थों को नचाना है।
पाइप लाइन में सेंध लगाकर पेट्रोलियम पदार्थों की चोरी करने और पाइप लाइन तक पहुंचने के लिए सुरंग बनाने का मथुरा में यह कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी कई मर्तबा ऐसे कारनामे लोग करते रहे हैं लेकिन कभी ऐसी प्रभावी कार्यवाही किसी स्‍तर से नहीं हुई जिसके बाद यह मान लिया जाए कि आगे वैसा हो पाना संभव नहीं होगा। हर बार सांप निकल जाने के बाद लकीर पीटने का तमाशा किया गया जिसके परिणाम स्‍वरूप कोई उल्‍लेखनीय उपलब्‍धि हासिल नहीं हुई।
तेल शोधक कारखाना कहीं का भी हो, उसकी सुरक्षा एक अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण जिम्‍मेदारी होती है। इस जिम्‍मेदारी को यूं तो केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) निभाती है किंतु कई दूसरे विभागों सहित सिविल पुलिस की भी इसमें अहम भूमिका होती है।
ऐसे में रिफाइनरी के अंदर और बाहर होने वाली किसी भी गैरकानूनी गतिविधि का इतने लंबे समय तक पता न लग सके कि कोई सुरंग बनाकर पाइप लाइन से तेल निकालने में सफल हो जाए, यह हो नहीं सकता। ये तभी संभव है कि अंदर से लेकर बाहर तक और ऊपर से लेकर नीचे तक के लोगों की इसमें संलिप्‍तता हो और वो लोग किसी भी हद तक गिरने के लिए तत्‍पर हों।
रिफाइनरी से ही जुड़े सूत्रों की मानें तो तेल के इस खेल में सबसे बड़ी भूमिका मार्केटिंग डिवीजन से ताल्‍लुक रखने वाले उन कर्मचारियों की रहती है जो सप्‍लाई का काम देखते हैं और जिन्‍हें रिफाइनरी की ओर आने व जाने वाली एक-एक पाइप लाइन की जानकारी है।
बताया जाता है कि इन रिफाइनरी कर्मियों के पास पाइप लाइन के पूरे जाल का नक्‍शा रहता है और वही बता सकते हैं कि कहां-कहां वॉल्‍व लगे हैं तथा कहां-कहां सुरक्षा में सेंध लगाना संभव है।
सूत्रों से प्राप्‍त जानकारी के अनुसार यही वो लोग हैं जिनका प्रत्‍यक्ष में तो तेल के खेल से कोई सरोकार नहीं रहता लेकिन इनकी कमाई लाखों नहीं करोड़ों में होती है।
बताया जाता है कि ड्यूटी पर मौजूद रिफाइनरी कर्मियों के अलावा ऐसे रिफाइनरी कर्मियों की कोई कमी नहीं है जो अवकाश प्राप्‍त करने के बावजूद सिर्फ पाइप लाइन के नक्‍शों की बिना पर घर बैठे लाखों रुपए हासिल कर रहे हैं अन्‍यथा कितने आश्‍चर्य की बात है कि जिस पाइप लाइन की सुरक्षा पर बेहिसाब पैसा खर्च होता हो और जिसके अंदर चलने वाले प्रेशर तक से उसके लीकेज का पता लगाया जा सकता हो, उसमें छेद करके करोड़ों रुपए मूल्‍य का पेट्रोलियम पदार्थ चुरा लिया जाए फिर भी रिफाइनरी प्रशासन को तब भनक लगे जब कोई जनसामान्‍य अपनी जान हथेली पर रखकर अफसरों को बताने पहुंचे कि पाइप लाइन में सेंध लग चुकी है।
रिफाइनरी प्रशासन के दावों पर भरोसा करें तो समूची पाइप लाइन की एक ओर जहां नियमित चैकिंग होती है वहीं दूसरी ओर उसके ऊपर ऐसी प्‍लास्‍टिक कोटिंग भी की जाती है जिसे काटकर वॉल्‍व तक पहुंचना या पाइप लाइन में छेद कर पाना आसान नहीं होता। ऐसा करने की कोशिश के दौरान ही रिफाइनरी के अंदर बैठे अधिकारी व कर्मचारियों को आधुनिक उपकरणों के सहारे पता लग जाता है लेकिन यहां तो जैसे पूरे कुएं में ही भांग घुली हुई है लिहाजा आज तक मौके पर कभी कोई पकड़ा नहीं जा सका।
बहुत समय नहीं बीता जब रिफाइनरी के अंदर से सैकड़ों करोड़ रुपए मूल्‍य वाले पेट्रोलियम पदार्थों से भरे कंटेनर चोरी हो गए थे। तब भी इसी प्रकार शोर-शराबा हुआ और दावा किया गया कि इतनी बड़ी घटना को अंजाम देने वाला कोई अपराधी बच नहीं पाएगा, चाहे वह रिफाइनरी के अंदर बैठा हो अथवा बाहर। समय के साथ यह मामला पहले ढीला पड़ा और अब ठंडे बस्‍ते के हवाले किया जा चुका है।
जिस समय कृष्‍ण की इस पावन जन्‍मभूमि पर रिफाइनरी की शक्‍ल में एक आधुनिक मंदिर की नींव रखी जा रही थी तब कहा गया था कि मथुरा तथा मथुरा वासियों के लिए यह मंदिर बड़ा वरदान साबित होगा किंतु आज स्‍थिति इसके ठीक उलट है।
मथुरा रिफाइनरी आज की तारीख में तेल का अवैध कारोबार करने वालों, भ्रष्‍ट अफसरों, सफेदपोश नेताओं तथा पुलिस-प्रशासन के लिए भले ही वरदान बनी हुई हो किंतु मथुरा-आगरा के लिए किसी अभिशाप से कम नहीं है।
रिफाइनरी के कारण वायु और जल प्रदूषण तो बढ़ा ही है, साथ ही खतरा भी बहुत बढ़ गया है। आतंकवादियों के लिए यह एक बड़ा टारगेट है और दुश्‍मन देशों की भी इस पर हमेशा पैनी नजर रहती है।
कहने को मथुरा रिफाइनरी अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्‍सा शहर के विकास और उसके बेहतर रख-रखाव के लिए निकालती है लेकिन यह हिस्‍सा कहां जाता है, इसका कभी पता नहीं लगा।
रिफाइनरी स्‍थापित हुए साढ़े तीन दशक होने को आए लेकिन कृष्‍ण की पावन जन्‍मस्‍थली आज तक अपनी गरिमा के अनुरूप विकास को तरस रही है। सड़क, बिजली, पानी, जलभराव जैसे सामान्‍य समस्‍याओं तक के समाधान में मथुरा रिफाइनरी ने कोई उल्‍लेखनीय भूमिका कभी अदा की हो, ऐसा याद नहीं आता। हां, इसके कारण जनसामान्‍य की जिंदगी हर वक्‍त खतरे में जरूर पड़ी रहती है क्‍योंकि पता नहीं कब कौन तेल को चोरी करके पैसे बनाने की जगह उसका दूसरा गलत इस्‍तेमाल करने की ठान ले।
मथुरा का हर जागरूक नागरिक जानता है कि रिफाइनरी की सीमा में पड़ने वाले ”बाद रेलवे स्‍टेशन” से लेकर तेल के भण्‍डारण तक में सेंध लगाकर चोरी करने का सिलसिला कभी थमा नहीं है। रेलवे स्‍टेशन पर जहां वैगनों से बाकयदा पाइप डालकर तेल खींच लिया जाता है वहीं गोदामों से कंटेनर के कंटेनर गायब कर दिए जाते हैं किंतु सब तमाशबीन बने रहते हैं। यही हाल रिफाइनरी के लिए बिछी पाइप लाइनों को क्षतिग्रस्‍त करने के मामले में है। कितनी बार पाइप लाइनों में सूराख करके करोड़ों रुपए की चपत लगाई गई है लेकिन सरकारी माल पर हाथ साफ करना अपना जन्‍मसिद्ध अधिकार मानने वाले अधिकारी और कर्मचारी, अपराधियों को संरक्षण देने से नहीं चूकते। उनके लिए वह दुधारु गाय बने हुए हैं।
मथुरा की ओर आने वाली कोई सड़क हो अथवा यहां से दूसरे जनपदों एवं राज्‍यों को जोड़ने वाली कोई सड़क क्‍यों न हो, हरेक पर अवैध तेल के गोदामों का जाल बिछा मिल जाएगा लेकिन क्‍या मजाल कि कोई इनकी ओर आंख उठाकर देख ले।
देखेगा भी कैसे, आखिर तेल की धार से निकलने वाले पैसों की चमक किसी की भी आंखें चुंधियाने को काफी हैं। तभी तो कहावत है कि तेल देख और तेल की धार देख।
कहते हैं कि मथुरा तीन लोक से न्‍यारी है। कुछ समय के अंदर गधों को घोड़ों की तरह सरपट दौड़ते और फर्श से अर्श तक का सफर काफी कम समय में पूरा करते देखकर तो लगता है कि वाकई मथुरा तीन लोक से न्‍यारी है।
यहां हमराह पकड़े जाते हैं, हलूकर भी पकड़े जा सकते हैं लेकिन वजीरों का बाल भी बांका नहीं होता। सत्ता की खातिर उनकी निष्‍ठाएं बेशक लचीली हो जाती हों लेकिन उनके गोरखधंधों में लचीलापन कभी नहीं आता।
इसलिए तेल का खेल जारी था, जारी है और बदस्‍तूर जारी रहेगा। फॉलोअर पहले भी पकड़े जाते रहे हैं और हमेशा पकड़े जाते रहेंगे जिससे पुलिस इसी तरह अपनी पीठ खुद थपथपाती रहे किंतु वजीरों की वजारत कायम रहेगी। चुनाव का सीजन बीतने दें और फिर तेल भी देखना और तेल व तेलियाओं की धार भी।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

रविवार, 3 जनवरी 2021

डॉ. निर्विकल्‍प अपहरण कांड: क्‍या फिरौती के पूरे 52 लाख रुपए बदमाशों के साथ मिलकर हड़प गई पुलिस?


 10 दिसंबर 2019 को रात करीब 8 बजे मथुरा के मशहूर ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. निर्विकल्‍प का अपहरण कर वसूली गई 52 लाख रुपयों की फिरौती के पूरे 52 लाख रुपए क्‍या बदमाशों के साथ मिलकर पुलिस हड़प गई, या अब भी कोई उम्‍मीद बाकी है?

इस सवाल का संभावित जवाब तो “LEGEND NEWS” ने 13 फरवरी 2020 को ही अपनी इस खबर में जिसका लिंक नीचे दिया जा रहा है, दे दिया था किंतु फिर भी एक उम्‍मीद है कि योगीराज में शायद पुलिस इतनी आसानी से फिरौती की इतनी बड़ी रकम पचा न पाए।

“डॉ. निर्विकल्‍प अपहरण कांड: खेल खतम… पैसा हजम… जनता बजाए ताली” शीर्षक से 13 फरवरी 2020 को लिखी गई खबर को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्‍लिक कीजिए-
http://legendnews.in/dr-nirvikalp-kidnapping-case-khel-khatam-paisa-hazam-janta-bajaye-taali/

पुलिस द्वारा दर्ज की गई एफआईआर के मुताबिक हाईवे थाना क्षेत्र की गेटबंद पॉश कालॉनी राधापुरम एस्‍टेट निवासी डॉ. निर्विकल्‍प का अपहरण 10 दिसंबर 2019 को रात करीब 8 बजे थाना क्षेत्र के ही गोवर्धन फ्लाईओवर से तब कर लिया गया था जब वो महोली रोड स्‍थित अपने क्‍लीनिक से घर लौट रहे थे।
बताया जाता है कि डॉक्‍टर की रिहाई 52 लाख रुपए की फिरौती वसूलने के बाद की गई, बावजूद इसके न तो डॉक्‍टर ने इसकी FIR कराना जरूरी समझा और न पुलिस ने कोई एक्‍शन लिया लेकिन ‘अपहरण’ अच्‍छा-खासा चर्चा में बना रहा।
मथुरा और आगरा से लेकर लखनऊ तक फजीहत होने पर हाईवे थाना पुलिस ने पूरे दो महीने बाद 11 फरवरी 2020 की रात 10 बजकर 53 मिनट पर IPC की धारा 364 A के तहत एक एफआईआर दर्ज की।
हाईवे थाने के तत्‍कालीन प्रभारी इंस्‍पेक्‍टर जगदंबा सिंह की ओर से दर्ज कराई गई इस एफआईआर में सनी मलिक पुत्र देवेन्‍द्र मलिक निवासी न्‍यू सैनिक विहार कॉलोनी थाना कंकरखेड़ा मेरठ, महेश पुत्र रघुनाथ निवासी ग्राम कौलाहार थाना नौहझील मथुरा, अनूप पुत्र जगदीश निवासी ग्राम कौलाहार थाना नौहझील मथुरा तथा नीतेश उर्फ रीगल पुत्र नामालूम निवासी भोपाल मध्‍यप्रदेश (हाल निवासी दिल्‍ली एनसीआर) को नामजद किया गया।
इस मामले का एक दिलचस्‍प पहलू यह भी रहा कि डॉ. निर्विकल्‍प के अपहरण की अपनी ओर से FIR दर्ज कराने वाले इंस्‍पेक्‍टर जगदंबा सिंह को उसी दिन तत्‍काल प्रभाव से तत्‍कालीन एसएसपी शलभ माथुर ने निलंबित कर दिया।
ये बात और है कि विगत माह इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय ने इंस्‍पेक्‍टर जगदंबा सिंह को बहाल करने का आदेश दिया, जिसके बाद से वह ड्यूटी पर हैं लेकिन केस के बारे में कुछ बताने को तैयार नहीं।
पुलिस द्वारा दर्ज FIR के घटनाक्रम पर भरोसा करें तो 10 दिसंबर 2019 की रात करीब 8 बजे हुई इस वारदात का पता बीट सूचना के जरिए हाईवे थाना प्रभारी को 11 फरवरी 2020 की दोपहर में लगा।
पुलिस का दावा है कि FIR दर्ज किए जाने के बाद जब डॉ. निर्विकल्‍प से पुलिस ने पूछताछ की तब उन्‍होंने बताया कि बदमाशों ने उनके ही मोबाइल फोन से उनकी पत्‍नी डॉ. भावना को फोन करके 52 लाख रुपए की फिरौती वसूलकर नेशनल हाईवे स्‍थित सिटी हॉस्‍पीटल के पास मुक्‍त कर दिया।
मथुरा पुलिस पर आरोप
11 फरवरी 2020 को हाईवे थाना पुलिस द्वारा लिखाई गई एफआईआर से पहले मथुरा पुलिस पर जो आरोप लग रहे थे उनके अनुसार घटना के तत्‍काल बाद पुलिस को डॉ. के अपहरण और फिरौती का पता ही नहीं लग चुका था, बल्‍कि बदमाश भी उसकी गिरफ्त में आ चुके थे।
पुलिस ने बदमाशों को मिली फिरौती के पूरे 52 लाख रुपए उनसे छीनकर उसका बंदरबांट कर लिया क्‍योंकि डॉ. दंपत्ति कोई केस दर्ज कराने को तैयार नहीं थे। बदले में बदमाशों को अभयदान दे दिया गया।
बताया जाता है कि इस बंदरबांट में मथुरा जनपद के दो उच्‍च पुलिस अधिकारियों का नाम भी सामने आया लिहाजा जांच के दौरान आगरा जोन के एडीजी अजय आनंद तथा आईजी ए. सतीश गणेश ने उनके बयान भी दर्ज किए परंतु उसके बाद सबकुछ दबा दिया गया।
हां, लकीर पीटने के लिए मथुरा पुलिस एक आरोपी नितेश उर्फ रीगल को मध्‍यप्रदेश की राजधानी भोपाल से पकड़ लाई। मध्‍यप्रदेश पुलिसकर्मी के पुत्र नितेश के अनुसार उसने अपने पिता के कहने पर मध्‍यप्रदेश पुलिस के सामने ही सरेंडर किया था न कि मथुरा पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया।
उसने बताया कि मध्‍यप्रदेश से ही उसे यहां लाया गया है और इसलिए यहां की पुलिस ने उसके साथ कोई अभद्र व्‍यवहार करना तो दूर, हाथ तक नहीं लगाया।
दूसरे आरोपी सनी मलिक ने मेरठ पुलिस से सांठगांठ करके खुद को तमंचे में वहां गिरफ्तार करवा लिया लेकिन मथुरा पुलिस उसकी रिमांड तक नहीं ले सकी क्योंकि उससे पुलिस के बहुत से राज तो खुलते ही, साथ ही कई उच्‍च पुलिस अधिकारियों की भी नौकरी पर बन आती।
तीसरे आरोपी महेश को कई महीनों बाद एसटीएफ ने मथुरा में ही धर दबोचा लेकिन एक लाख रुपए का ईनाम घोषित किए जाने के बाद भी मास्‍टर माइंड अनूप चौधरी आज तक पुलिस की पकड़ से बाहर है।
ऐसे में यह सवाल उठना स्‍वाभाविक है कि डॉक्‍टर निर्विकल्‍प से फिरौती में वसूले गए 52 लाख रुपए गए कहां।
अब तक की पुलिसिया कार्यप्रणाली से तो यही लगता है कि पुलिस अपने हिस्‍से की और बदमाश अपने हिस्‍से की फिरौती डकार गए। जो मामूली रकम नितेश उर्फ रीगल से बरामद दिखाई भी है, वह उसे देर-सवेर कोर्ट से मिल ही जानी है क्‍योंकि डॉ. निर्विकल्‍प तो फिरौती देने की बात कोर्ट में स्‍वीकार करने से रहे।
फिरौती ही क्‍या, हो सकता है कि डॉ. निर्विकल्‍प तो अपने अपहरण की बात से भी कोर्ट में मुकर जाएं क्‍योंकि जब उन्‍होंने एफआईआर ही नहीं लिखाई तो वो अपहरण की बात क्‍यों स्‍वीकार करने लगे।
कुल मिलाकर निष्‍कर्ष यह निकलता है कि डॉ. निर्विकल्‍प के अपहरण से लेकर 52 लाख रुपए की फिरौती वसूलने जैसी दुस्‍साहसिक वारदात को अंजाम देने वाले सारे लोग आज मौज कर रहे हैं क्‍योंकि समय की काफी गर्द इस मामले की फाइलों पर जम चुकी है।
आरोपी नीतेश के खुलासे पर गौर करें तो डॉ. निर्विकल्‍प का अपहरण न सिर्फ पूर्व नियोजित था बल्‍कि पूरी ‘सेटिंग’ से किया गया था इसलिए चारों नामजद इस बात से आश्‍वस्‍त थे कि बिना हील-हुज्‍जत डॉक्‍टर के यहां से रुपए मिल ही जाएंगे।
किसकी सेटिंग से यह सारा खेल खेला, इसकी जानकारी तभी संभव है जब सनी और अनूप को गिरफ्त में लेकर पुलिस इस राज से पर्दा उठाने में रुचि ले।
नितेश के अनुसार डॉ. निर्विकल्‍प की गाड़ी में टक्‍कर मारने के बाद वह खुद भी तब आश्‍चर्यचकित रह गया था जब डॉ. निर्विकल्‍प की पत्‍नी डॉ. भावना मात्र 15 से 20 मिनट के अंदर पूरे 52 लाख रुपए लेकर आ गईं।
दरअसल, यह केस खुलता तो बहुत से चेहरों से नकाब उतरना तय था। मसलन अपहरणकर्ता न तो डॉक्‍टर निर्विकल्‍प के परिचित थे और न उनसे उनकी कोई रंजिश थी, फिर उन्‍हें डॉक्‍टर को अगवा करने को किसने व क्‍यों कहा।
बदमाशों द्वारा फोन करने के बाद मात्र 15 से 20 बीस मिनट के अंदर डॉ. निर्विकल्‍प की पत्‍नी डॉ. भावना किसके कहने पर पुलिस को सूचित किए बिना 52 लाख रुपए की बड़ी रकम बदमाशों को देने अकेली जा पहुंची। वो भी तब जबकि डॉ. भावना के घर की दीवार उनके अपने पिता के घर से सटी हुई है लेकिन उन्‍होंने किसी मदद नहीं ली।
इस सबके अलावा कुछ अन्‍य लोगों ने भी पुलिस और डॉक्‍टर निर्विकल्‍प व उनके परिवार को साधे रखने में बड़ी भूमिका निभाई थी। ये भूमिका निभाने के पीछे आखिर उनका मकसद क्‍या था और क्‍यों वो नहीं चाहते थे कि अपहरण के मूल मकसद का पता लगे।
जो भी हो, इसमें दो राय नहीं कि अब भी यदि डॉ. निर्विकल्‍प के अपहरण का खुलासा होता है तो 52 लाख रुपए की रकम सहित उन बड़े कारनामों से भी पर्दा उठ सकता है जिसे पुलिस, बदमाश और सफेदपोश लोगों का कॉम्‍बिनेशन अक्‍सर अंजाम देता आया है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

रविवार, 16 फ़रवरी 2020

डॉ. निर्विकल्‍प अपहरण कांड: खेल खतम… पैसा हजम… जनता बजाए ताली

मथुरा। मशहूर ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. निर्विकल्‍प अग्रवाल के अपहरण कांड में आखिर पुलिस ने वही किया, जिसका अंदेशा था।
मथुरा और आगरा से लखनऊ तक इस अपहरण कांड को लेकर हो रही पुलिस की फजीहत के बीच हाईवे थाना पुलिस ने गत 11 फरवरी 2020 की रात 10 बजकर 53 मिनट पर आईपीसी की धारा 364 A के तहत एक एफआईआर दर्ज कर उच्‍च अधिकारियों को यह संदेश दिया है कि ”तुम्‍हारी भी जै-जै हमारी भी जै-जै, न तुम जीते न हम हारे”





पुलिस द्वारा दर्ज की गई इस एफआईआर के मुताबिक हाईवे थाना क्षेत्र की गेटबंद पॉश कालॉनी राधापुरम एस्‍टेट निवासी डॉ. निर्विकल्‍प का अपहरण 10 दिसंबर 2019 को रात करीब 8 बजे थाना क्षेत्र के ही गोवर्धन फ्लाईओवर से तब कर लिया गया था जब वो महोली रोड अपने क्‍लीनिक से घर लौट रहे थे।
थाना प्रभारी इंस्‍पेक्‍टर जगदंबा सिंह की ओर से दर्ज कराई गई इस एफआईआर में सनी मलिक पुत्र देवेन्‍द्र मलिक निवासी न्‍यू सैनिक विहार कॉलानी थाना कंकरखेड़ा मेरठ, महेश पुत्र रघुनाथ निवासी ग्राम कौलाहार थाना नौहझील मथुरा, अनूप पुत्र जगदीश निवासी ग्राम कौलाहार थाना नौहझील मथुरा तथा नीतेश उर्फ रीगल पुत्र नामालूम निवासी भोपाल मध्‍यप्रदेश (हाल निवासी दिल्‍ली एनसीआर) को नामजद किया है।
पुलिस द्वारा एफआईआर में दर्ज घटनाक्रम पर भरोसा करें तो 10 दिसंबर 2019 की रात करीब 8 बजे हुई इस वारदात का पता बीट सूचना के जरिए हाईवे थाना प्रभारी को 11 फरवरी 2020 को दोपहर के वक्‍त लगा।
डॉ. निर्विकल्‍प का अपहरण कर उनसे 52 लाख रुपए की फिरौती वसूलने का मामला बीट के माध्‍यम से संज्ञान में आते ही ”उच्‍च अधिकारियों को अवगत कराकर” प्रभारी इंस्‍पेक्‍टर जगदंबा सिंह अपने साथ सर्विलांस सेल प्रभारी निरीक्षक जसबीर सिंह, एसओजी प्रभारी सुल्‍तान सिंह आदि के साथ डॉ. निर्विकल्‍प के राधापुरम एस्‍टेट स्‍थित निवास पर पहुंचे।
पुलिस का दावा है कि डॉ. निर्विकल्‍प ने पुलिस को पूरे घटनाक्रम से अवगत कराते हुए जानकारी दी कि बदमाशों ने उनके ही मोबाइल फोन से उनकी पत्‍नी भावना को फोन करके 52 लाख रुपए की फिरौती लेकर घटना स्‍थल से बमुश्‍किल 100 मीटर दूर स्‍थित सिटी हॉस्‍पीटल के पास मुक्‍त कर दिया।
पुलिस की एफआईआर बताती है कि अब भी ”उक्‍त अज्ञात बदमाश” डॉ. निर्विकल्‍प को फोन करके 50 लाख रुपए और मांग रहे हैं। हालांकि नामजद एफआईआर के ब्‍यौरे में ”उक्‍त अज्ञात बदमाश” लिखा जाना भी समझ से परे है।
एफआईआर का ब्‍यौरा कहता है कि डॉ. निर्विकल्‍प के माता-पिता की काफी समय पहले आगरा में हत्‍या कर दी गई थी, जिस कारण डॉ. दंपत्ति बहुत डरे रहते हैं और इसलिए उन्‍होंने अपने साथ हुई वारदात का पुलिस से जिक्र नहीं किया।
हाईवे थाना प्रभारी जगदंबा सिंह की ओर से लिखाई गई एफआईआर के अनुसार नामजद चारों बदमाशों की जानकारी भी उन्‍हें डॉ. से न मिलकर सर्विलांस प्रभारी तथा एसओजी प्रभारी से मिली। इन दोनों अधिकारियों को बदमाशों के बावत सूचना उनके मुखबिर तथा गोपनीय सूत्रों ने दी।
पुलिस की एफआईआर पर भरोसा करें तो डॉ. द्वारा कोई सहयोग न किए जाने के बावजूद सर्विलांस प्रभारी तथा एसओजी प्रभारी को चंद घंटों के अंदर डॉ. से 52 लाख रुपए फिरौती वसूलने वाले चारों बदमाशों की पूरी कुंडली हाथ लग गई, लेकिन यह पता नहीं लगा कि अब जो बदमाश डॉ. से फोन पर फिर 50 लाख रुपए की मांग कर रहे हैं, वह ज्ञात हैं अथवा अज्ञात।
डॉ. निर्विकल्‍प के अपहरण और उन्‍हें 52 लाख रुपए फिरौती लेकर मुक्‍त करने की घटना पर हाईवे थाना प्रभारी की ओर से एफआईआर दर्ज कराने की जानकारी आज लोगों को उस समय हुई, जब उन्‍होंने सुबह के अखबार पढ़े।
आगरा से प्रकाशित सभी प्रमुख अखबारों के समाचारों से लोगों को यह भी ज्ञात हुआ कि इस प्रकरण में एफआईआर लिखाने वाले प्रभारी निरीक्षक जगदंबा सिंह को ही अब निलंबित कर दिया गया है जबकि सीओ रिफाइरी को हटाकर उनके स्‍थान पर सीओ गोवर्धन को रिफाइनरी सर्किल का अतिरिक्‍त प्रभार सौंपा गया है। अब पता लगा है कि आई जी ने चारों नामजद आरोपियों पर 50-50 हजार रुपए के ईनाम की भी घोषणा कर दी है।
आईजी ए सतीश गणेश कर रहे हैं विभागीय जांच
गौरतलब है कि इस मामले की जांच करीब एक सप्‍ताह पूर्व से आईजी ए सतीश गणेश कर रहे हैं। आईजी ने इसमें मथुरा पुलिस के आधा दर्जन से अधिक पुलिस अधिकारियों को तलब कर उनके बयान भी दर्ज कराए थे, साथ ही इसे लेकर आगरा जोन के एडीजी अजय आनंद समय-समय पर आगरा के मीडिया को अपना वर्जन देते रहे।
बताया जाता है कि मथुरा के पुलिस अधिकारियों ने अपने बयानों में बदमाशों द्वारा डॉक्‍टर का अपहरण कर फिरौती वसूले जाने की जानकारी आईजी को दी थी।
मथुरा पुलिस पर आरोप
11 फरवरी 2020 को हाईवे थाना पुलिस द्वारा लिखाई गई एफआईआर से पहले मथुरा पुलिस पर जो आरोप लग रहे थे उनके अनुसार घटना के तत्‍काल बाद पुलिस को डॉ. के अपहरण और फिरौती का पता ही नहीं लग चुका था, बल्‍कि बदमाश भी उसकी गिरफ्त में आ चुके थे।
इलाका पुलिस ने बदमाशों से फिरौती के पूरे 52 लाख रुपए बरामद कर उसका बंदरबांट कर लिया क्‍योंकि डॉ. दंपत्ति एफआईआर कराने को तैयार नहीं थे।
डॉ. दंपत्ति को संतुष्‍ट करने के लिए पुलिस ने उन्‍हें फिरौती की उतनी रकम लौटा दी जितनी उन्‍होंने इनकम टैक्‍स के झमेले में न पड़ने के कारण बताई।
पहले छपी खबरों में बताया गया कि पुलिस इस तरह फिरौती की रकम में से लगभग 40 लाख रुपए तथा बदमाशों को छोड़ने के एवज में मिले कई लाख रुपयों को भी हजम कर गई।
कुल मिलाकर देखा जाए तो सारा खेल इन्‍हीं लाखों रुपयों को लेकर शुरू हुआ था और अब भी उन्‍हीं पर टिका है।
खेल खतम… पैसा हजम
दरअसल, पैसा तो जहां ठिकाने लगना था वो लग गया, अब लकीर पीटी जा रही है क्‍योंकि डॉक्‍टर अब भी सामने आने को तैयार नहीं है। न वो फिरौती की रकम के लिए कोई क्‍लेम कर रहा है।
पुलिस को डॉक्‍टर ने अब तक जो भी बयान दिए हैं, उनसे मुकर जाना लाजिमी है क्‍योंकि वह किसी पचड़े में पड़ना ही नहीं चाहता।
इन हालातों में पुलिस एफआई दर्ज करके सिर्फ और सिर्फ खानापूरी ही कर रही है क्‍योंकि बदमाशों को गिरफ्त में लेने का उसके पास कोई आधार नहीं है।
अब एफआईआर क्‍यों
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल सिर्फ एक यह रह जाता है कि पुलिस को इस खानापूरी की जरूरत क्‍यों पड़ी।
इसके बारे में विभागीय सूत्र बताते हैं कि आईजी ए सतीश गणेश ने अपनी जांच पूरी करके रिपोर्ट लखनऊ भेज दी थी लिहाजा कुछ न कुछ तो करना था।
एक पक्ष यह भी
इस पूरे घटनाक्रम का एक पक्ष यह भी सामने आ रहा है कि उच्‍च पुलिस अधिकारियों के बीच सामंजस्‍य का अभाव तथा ईगो प्रॉब्‍लम देखते हुए लखनऊ से सारा मामला रफा-दफा करने के मौखिक आदेश दिए गए जिससे खाकी को बदनामी से बचाया जा सके।
लखनऊ में बैठे आला अधिकारी भी यह जानते और समझते हैं कि डकारे गए लाखों रुपए अब पुलिस से निकलवा पाना संभव नहीं है इसलिए किसी तरह इतना किया जाए कि शर्मिंदगी न झेलनी पड़े।
पुलिस के भरोसेमंद सूत्र बताते हैं कि लखनऊ से मिले मौखिक आदेश-निर्देशों के अनुपालन में आगरा और मथुरा पुलिस ने यह कदम उठाया है। ये बात अलग है कि इसके दूरगामी परिणाम न पुलिस के हित में होंगे और न डॉक्‍टर के हित में। इससे सिर्फ हित पूरा होगा तो बदमाशों का ही होगा। आज डॉ. निर्विकल्‍प को निशाने पर लिया है तो कल किसी और को लिया जाएगा।
रही बात आम जनता की तो उसका क्‍या, वह हमेशा विजेता के पक्ष में ताली बजाने को खड़ी हो जाती है।
अंत में हैदर अली आतिश का ये शेर, और बात खत्‍म-
बड़ा शोर सुनते थे पहलू में दिल का
जो चीरा तो इक क़तरा-ए-ख़ूँ न निकला
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
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