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रविवार, 3 जनवरी 2021

डॉ. निर्विकल्‍प अपहरण कांड: क्‍या फिरौती के पूरे 52 लाख रुपए बदमाशों के साथ मिलकर हड़प गई पुलिस?


 10 दिसंबर 2019 को रात करीब 8 बजे मथुरा के मशहूर ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. निर्विकल्‍प का अपहरण कर वसूली गई 52 लाख रुपयों की फिरौती के पूरे 52 लाख रुपए क्‍या बदमाशों के साथ मिलकर पुलिस हड़प गई, या अब भी कोई उम्‍मीद बाकी है?

इस सवाल का संभावित जवाब तो “LEGEND NEWS” ने 13 फरवरी 2020 को ही अपनी इस खबर में जिसका लिंक नीचे दिया जा रहा है, दे दिया था किंतु फिर भी एक उम्‍मीद है कि योगीराज में शायद पुलिस इतनी आसानी से फिरौती की इतनी बड़ी रकम पचा न पाए।

“डॉ. निर्विकल्‍प अपहरण कांड: खेल खतम… पैसा हजम… जनता बजाए ताली” शीर्षक से 13 फरवरी 2020 को लिखी गई खबर को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्‍लिक कीजिए-
http://legendnews.in/dr-nirvikalp-kidnapping-case-khel-khatam-paisa-hazam-janta-bajaye-taali/

पुलिस द्वारा दर्ज की गई एफआईआर के मुताबिक हाईवे थाना क्षेत्र की गेटबंद पॉश कालॉनी राधापुरम एस्‍टेट निवासी डॉ. निर्विकल्‍प का अपहरण 10 दिसंबर 2019 को रात करीब 8 बजे थाना क्षेत्र के ही गोवर्धन फ्लाईओवर से तब कर लिया गया था जब वो महोली रोड स्‍थित अपने क्‍लीनिक से घर लौट रहे थे।
बताया जाता है कि डॉक्‍टर की रिहाई 52 लाख रुपए की फिरौती वसूलने के बाद की गई, बावजूद इसके न तो डॉक्‍टर ने इसकी FIR कराना जरूरी समझा और न पुलिस ने कोई एक्‍शन लिया लेकिन ‘अपहरण’ अच्‍छा-खासा चर्चा में बना रहा।
मथुरा और आगरा से लेकर लखनऊ तक फजीहत होने पर हाईवे थाना पुलिस ने पूरे दो महीने बाद 11 फरवरी 2020 की रात 10 बजकर 53 मिनट पर IPC की धारा 364 A के तहत एक एफआईआर दर्ज की।
हाईवे थाने के तत्‍कालीन प्रभारी इंस्‍पेक्‍टर जगदंबा सिंह की ओर से दर्ज कराई गई इस एफआईआर में सनी मलिक पुत्र देवेन्‍द्र मलिक निवासी न्‍यू सैनिक विहार कॉलोनी थाना कंकरखेड़ा मेरठ, महेश पुत्र रघुनाथ निवासी ग्राम कौलाहार थाना नौहझील मथुरा, अनूप पुत्र जगदीश निवासी ग्राम कौलाहार थाना नौहझील मथुरा तथा नीतेश उर्फ रीगल पुत्र नामालूम निवासी भोपाल मध्‍यप्रदेश (हाल निवासी दिल्‍ली एनसीआर) को नामजद किया गया।
इस मामले का एक दिलचस्‍प पहलू यह भी रहा कि डॉ. निर्विकल्‍प के अपहरण की अपनी ओर से FIR दर्ज कराने वाले इंस्‍पेक्‍टर जगदंबा सिंह को उसी दिन तत्‍काल प्रभाव से तत्‍कालीन एसएसपी शलभ माथुर ने निलंबित कर दिया।
ये बात और है कि विगत माह इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय ने इंस्‍पेक्‍टर जगदंबा सिंह को बहाल करने का आदेश दिया, जिसके बाद से वह ड्यूटी पर हैं लेकिन केस के बारे में कुछ बताने को तैयार नहीं।
पुलिस द्वारा दर्ज FIR के घटनाक्रम पर भरोसा करें तो 10 दिसंबर 2019 की रात करीब 8 बजे हुई इस वारदात का पता बीट सूचना के जरिए हाईवे थाना प्रभारी को 11 फरवरी 2020 की दोपहर में लगा।
पुलिस का दावा है कि FIR दर्ज किए जाने के बाद जब डॉ. निर्विकल्‍प से पुलिस ने पूछताछ की तब उन्‍होंने बताया कि बदमाशों ने उनके ही मोबाइल फोन से उनकी पत्‍नी डॉ. भावना को फोन करके 52 लाख रुपए की फिरौती वसूलकर नेशनल हाईवे स्‍थित सिटी हॉस्‍पीटल के पास मुक्‍त कर दिया।
मथुरा पुलिस पर आरोप
11 फरवरी 2020 को हाईवे थाना पुलिस द्वारा लिखाई गई एफआईआर से पहले मथुरा पुलिस पर जो आरोप लग रहे थे उनके अनुसार घटना के तत्‍काल बाद पुलिस को डॉ. के अपहरण और फिरौती का पता ही नहीं लग चुका था, बल्‍कि बदमाश भी उसकी गिरफ्त में आ चुके थे।
पुलिस ने बदमाशों को मिली फिरौती के पूरे 52 लाख रुपए उनसे छीनकर उसका बंदरबांट कर लिया क्‍योंकि डॉ. दंपत्ति कोई केस दर्ज कराने को तैयार नहीं थे। बदले में बदमाशों को अभयदान दे दिया गया।
बताया जाता है कि इस बंदरबांट में मथुरा जनपद के दो उच्‍च पुलिस अधिकारियों का नाम भी सामने आया लिहाजा जांच के दौरान आगरा जोन के एडीजी अजय आनंद तथा आईजी ए. सतीश गणेश ने उनके बयान भी दर्ज किए परंतु उसके बाद सबकुछ दबा दिया गया।
हां, लकीर पीटने के लिए मथुरा पुलिस एक आरोपी नितेश उर्फ रीगल को मध्‍यप्रदेश की राजधानी भोपाल से पकड़ लाई। मध्‍यप्रदेश पुलिसकर्मी के पुत्र नितेश के अनुसार उसने अपने पिता के कहने पर मध्‍यप्रदेश पुलिस के सामने ही सरेंडर किया था न कि मथुरा पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया।
उसने बताया कि मध्‍यप्रदेश से ही उसे यहां लाया गया है और इसलिए यहां की पुलिस ने उसके साथ कोई अभद्र व्‍यवहार करना तो दूर, हाथ तक नहीं लगाया।
दूसरे आरोपी सनी मलिक ने मेरठ पुलिस से सांठगांठ करके खुद को तमंचे में वहां गिरफ्तार करवा लिया लेकिन मथुरा पुलिस उसकी रिमांड तक नहीं ले सकी क्योंकि उससे पुलिस के बहुत से राज तो खुलते ही, साथ ही कई उच्‍च पुलिस अधिकारियों की भी नौकरी पर बन आती।
तीसरे आरोपी महेश को कई महीनों बाद एसटीएफ ने मथुरा में ही धर दबोचा लेकिन एक लाख रुपए का ईनाम घोषित किए जाने के बाद भी मास्‍टर माइंड अनूप चौधरी आज तक पुलिस की पकड़ से बाहर है।
ऐसे में यह सवाल उठना स्‍वाभाविक है कि डॉक्‍टर निर्विकल्‍प से फिरौती में वसूले गए 52 लाख रुपए गए कहां।
अब तक की पुलिसिया कार्यप्रणाली से तो यही लगता है कि पुलिस अपने हिस्‍से की और बदमाश अपने हिस्‍से की फिरौती डकार गए। जो मामूली रकम नितेश उर्फ रीगल से बरामद दिखाई भी है, वह उसे देर-सवेर कोर्ट से मिल ही जानी है क्‍योंकि डॉ. निर्विकल्‍प तो फिरौती देने की बात कोर्ट में स्‍वीकार करने से रहे।
फिरौती ही क्‍या, हो सकता है कि डॉ. निर्विकल्‍प तो अपने अपहरण की बात से भी कोर्ट में मुकर जाएं क्‍योंकि जब उन्‍होंने एफआईआर ही नहीं लिखाई तो वो अपहरण की बात क्‍यों स्‍वीकार करने लगे।
कुल मिलाकर निष्‍कर्ष यह निकलता है कि डॉ. निर्विकल्‍प के अपहरण से लेकर 52 लाख रुपए की फिरौती वसूलने जैसी दुस्‍साहसिक वारदात को अंजाम देने वाले सारे लोग आज मौज कर रहे हैं क्‍योंकि समय की काफी गर्द इस मामले की फाइलों पर जम चुकी है।
आरोपी नीतेश के खुलासे पर गौर करें तो डॉ. निर्विकल्‍प का अपहरण न सिर्फ पूर्व नियोजित था बल्‍कि पूरी ‘सेटिंग’ से किया गया था इसलिए चारों नामजद इस बात से आश्‍वस्‍त थे कि बिना हील-हुज्‍जत डॉक्‍टर के यहां से रुपए मिल ही जाएंगे।
किसकी सेटिंग से यह सारा खेल खेला, इसकी जानकारी तभी संभव है जब सनी और अनूप को गिरफ्त में लेकर पुलिस इस राज से पर्दा उठाने में रुचि ले।
नितेश के अनुसार डॉ. निर्विकल्‍प की गाड़ी में टक्‍कर मारने के बाद वह खुद भी तब आश्‍चर्यचकित रह गया था जब डॉ. निर्विकल्‍प की पत्‍नी डॉ. भावना मात्र 15 से 20 मिनट के अंदर पूरे 52 लाख रुपए लेकर आ गईं।
दरअसल, यह केस खुलता तो बहुत से चेहरों से नकाब उतरना तय था। मसलन अपहरणकर्ता न तो डॉक्‍टर निर्विकल्‍प के परिचित थे और न उनसे उनकी कोई रंजिश थी, फिर उन्‍हें डॉक्‍टर को अगवा करने को किसने व क्‍यों कहा।
बदमाशों द्वारा फोन करने के बाद मात्र 15 से 20 बीस मिनट के अंदर डॉ. निर्विकल्‍प की पत्‍नी डॉ. भावना किसके कहने पर पुलिस को सूचित किए बिना 52 लाख रुपए की बड़ी रकम बदमाशों को देने अकेली जा पहुंची। वो भी तब जबकि डॉ. भावना के घर की दीवार उनके अपने पिता के घर से सटी हुई है लेकिन उन्‍होंने किसी मदद नहीं ली।
इस सबके अलावा कुछ अन्‍य लोगों ने भी पुलिस और डॉक्‍टर निर्विकल्‍प व उनके परिवार को साधे रखने में बड़ी भूमिका निभाई थी। ये भूमिका निभाने के पीछे आखिर उनका मकसद क्‍या था और क्‍यों वो नहीं चाहते थे कि अपहरण के मूल मकसद का पता लगे।
जो भी हो, इसमें दो राय नहीं कि अब भी यदि डॉ. निर्विकल्‍प के अपहरण का खुलासा होता है तो 52 लाख रुपए की रकम सहित उन बड़े कारनामों से भी पर्दा उठ सकता है जिसे पुलिस, बदमाश और सफेदपोश लोगों का कॉम्‍बिनेशन अक्‍सर अंजाम देता आया है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

गुरुवार, 6 फ़रवरी 2020

मथुरा डाॅक्‍टर अपहरण कांड: फिरौती हड़पने पर मथुरा पुलिस की चुप्‍पी सवालों के घेरे में

मथुरा। गेटबंद पॉश कॉलोनी राधापुरम एस्‍टेट निवासी जिस डॉक्‍टर के कथित अपहरण से मिली फिरौती की बड़ी रकम को चंद घंटों में पुलिस ने ठिकाने लगाकर सारा मामला रफा-दफा कर दिया, उसे लेकर अब तमाम सवाल खड़े हो रहे हैं।
सवाल खड़े करने वालों में खुद पुलिस भी है, डॉक्‍टर बिरादरी भी और आम आदमी भी।
इन सवालों का जवाब जानने से पहले इस ”कथित अपहरण” संबंधी पूरे घटनाक्रम पर एक बार फिर गौर करना जरूरी है।
अब तक सामने आई कहानी के अनुसार, एक मशहूर ऑर्थोपेडिक डॉक्‍टर पिछले माह जब अपने क्‍लीनिक से कार द्वारा लौट रहे थे तब नेशनल हाईवे स्‍थित गोवर्धन चौराहे के फ्लाईओवर पर उन्‍हें एक लग्जरी गाड़ी सवार चार बदमाशों ने ओवरटेक करके कब्‍जे में ले लिया और उन्‍हीं के मोबाइल से उनकी पत्‍नी को फोन करके डॉक्‍टर का अपहरण कर लिए जाने की जानकारी दी।
कहानी के मुताबिक कुछ घंटों के अंदर ही डॉक्‍टर की पत्‍नी से 55 लाख की फिरौती वसूलकर बदमाशों ने डॉक्‍टर को मुक्‍त कर दिया।
अखबारों में छपे इस पूरे घटनाक्रम पर भरोसा किया जाए तो 55 लाख रुपए की बड़ी रकम का मात्र चंद घंटों में डॉक्‍टर की पत्‍नी ने इंतजाम कर लिया और इस दौरान डॉक्‍टर को चारों बदमाश उन्‍हीं की गाड़ी में लेकर नेशनल हाईवे पर ही घूमते रहे।
दिल्‍ली-आगरा नेशनल हाईवे का ये वो हिस्‍सा है जहां दिन-रात पुलिस सक्रिय रहती है क्‍योंकि इस पर अनेक होटल, हॉस्‍पीटल, गेस्‍ट हाउस आदि के अलावा इंडस्‍ट्री एरिया भी पड़ता है।
इसके अलावा घटना स्‍थल से बमुश्‍किल 100 मीटर की दूरी पर शहर कोतवाली की रिपोर्टिंग पुलिस चौकी कृष्‍णानगर तथा हाईवे थाने की भी एक पुलिस चौकी है।
सवाल जो अब पूछे जा रहे हैं
अब इस अपहरण को लेकर उन सवालों को समझिए जिनकी वजह से इसे ‘कथित अपहरण’ कहा जा रहा है।
सवाल नंबर एक: क्‍या वाकई डॉक्‍टर का किडनैप हुआ था, या मामला कुछ ऐसा है जिसे छिपाना डॉक्‍टर दंपत्ति और उसके परिवार की मजबूरी था ?
ये सवाल इसलिए पूछा जा रहा है क्‍योंकि पेशेवर बदमाश यदि किसी का अपहरण करते हैं तो वो अपहृत के परिवार से तत्‍काल संपर्क स्‍थापित करने की गलती नहीं करते। पहले वो अपहृत के परिवार और पुलिस की गतिविधि को भांपते हैं, उसके बाद इत्‍मीनान से अपनी डिमांड रखते हैं।
इस मामले में बताया जा रहा है कि बदमाशों ने मात्र दो-ढाई घंटे में फिरौती की रकम वसूल ली और निकल गए, जोकि संभव नहीं है।
सवाल नंबर दो: क्‍या डॉक्‍टर ने अपने घर पर 55 लाख रुपए की बड़ी रकम पहले से रखी हुई थी, और क्‍या उनके कथित अपहरणकर्ताओं को इस बात का इल्‍म था कि डॉक्‍टर के घर पर इतनी बड़ी रकम है ?
ये सवाल इसलिए महत्‍वपूर्ण हो जाता है कि आज के इस दौर में जब बड़े-बड़े व्‍यापारी और उद्योगपति भी इतना कैश अपने घर पर नहीं रखते तो डॉक्‍टर ने इतना पैसा किसलिए रखा हुआ था।
सवाल नंबर तीन: जब डॉक्‍टर, डॉक्‍टर की पत्‍नी और उसके परिजनों में से भी किसी ने पुलिस को अपहरण की जानकारी नहीं दी तो पुलिस को सूचित किसने किया ?
इस सवाल का जवाब पूरे मामले की परतें खोल सकता है क्‍योंकि पुलिस पर फिरौती की रकम में 40 लाख रुपए हड़प जाने का आरोप लगा है।
समाचारों के अनुसार पुलिस ने चारों अपहरणकर्ताओं को गिरफ्त में लेकर और पूरे 55 लाख रुपए बरामद करके जब डॉक्‍टर दंपत्ति से संपर्क किया तो वो एफआईआर दर्ज कराने पर तैयार नहीं हुए लिहाजा पुलिस ने बिना कोई कार्यवाही किए बदमाशों को रिहा कर दिया।
बताया जाता है कि डॉक्‍टर दंपत्ति के रुख ने ही पुलिस के दोनों हाथों में लड्डू दे दिए और इसीलिए उसने 15 लाख बरामद बताकर वो तो डॉक्‍टर दंपत्ति को थमा दिए तथा शेष 40 लाख की फिरौती का बंटवारा कर लिया।
जानकारी के मुताबिक इसके अलावा पुलिस ने बदमाशों को सुरक्षित रिहा करने की एवज में उनसे भी कुछ रकम हथिया ली।
सवाल नंबर चार: जो पुलिस अपने इलाके में मशहूर डॉक्‍टर के अपहरण और उसकी फिरौती वसूलने तक गहरी नींद में थी, उसे अचानक बदमाशों का पूरा ब्‍यौरा उनकी लोकेशन के साथ कैसे मिल गया कि उसने चारों बदमाशों को फिरौती की रकम ठिकाने लगाने से पहले धर दबोचा ?
पुलिस की इस हरकत में यह निहित है कि क्‍या वाकई डॉक्‍टर का अपहरण हुआ या इसके पीछे की पूरी पटकथा पुलिस ने ही बदमाशों के साथ मिलकर लिखी थी ताकि सांप मर जाए और लाठी भी न टूटे।
यदि ऐसा नहीं है तो किसी भी ऐसी संगीन वारदात के बाद हफ्तों-हफ्तों टीम बनाकर अंधेरे में तीर चलाने वाली पुलिस ने कैसे इतनी जल्‍दी चारों बदमाश मय रकम के पकड़ लिए जबकि उनमें से एक बदमाश मेरठ का बताया जाता है।
कहीं ऐसा तो नहीं कि बदमाशों के साथ सुरक्षित गेम खेलने के लिए कुछ खास पुलिस वालों ने सारा ड्रामा रचा और बड़ी रकम हड़प कर डकार तक नहीं ली।
पुलिस के ही भरोसमंद सूत्रों की मानें तो इस खेल में एक नहीं, दो थानों की पुलिस शामिल रही है और ये दोनों ही थाने नेशनल हाईवे के हैं। इनमें से एक थाने के प्रभारी का मेरठ के बदमाशों से गहरा ताल्‍लुक बताया जाता है।
पुलिस और बदमाशों की जुगलबंदी इस बात से भी जाहिर होती है कि सामान्‍य तौर पर ऐसी किसी वारदात के बाद सीमा विवाद पैदा करके पीड़ित को ‘फुटबॉल’ बना देने वाली पुलिस ने इस मामले में कतई हील-हुज्‍जत न करते हुए घटनास्‍थल हाईवे थाना क्षेत्र में मान लिया जबकि शहर कोतवाली की रिपोर्टिंग चौकी कृष्‍णानगर का भी कुछ क्षेत्र इसमें आता है।
सवाल नंबर पांच: आगरा और लखनऊ में बैठे पुलिस के आला अधिकारियों तक इस अपहरण की बात पहुंचने से पहले डीआईजी/एसएसपी मथुरा को इसकी भनक क्‍यों नहीं लगी ?
गौरतलब है कि पिछले महीने हुई अपहरण और फिरौती की इस बड़ी वारदात का पता आम जनता तथा डॉक्‍टर बिरादरी को भी तब लगा जब 5 फरवरी के प्रमुख अखबारों में यह खबर एडीजी आगरा जोन अजय आनंद के वर्जन सहित छपी।
आश्‍चर्य की बात यह है कि जो खबर छापी गई, वह भी अखबारों के आगरा कार्यालय से छपी थी न कि मथुरा से, और उसके लिए मथुरा के किसी पुलिस अधिकारी का वर्जन तक लेना जरूरी नहीं समझा गया।
और अंतिम सवाल: यदि किसी विशेष कारणवश ऐसा हुआ है तो भी समाचार छप जाने के बाद अब तक मथुरा पुलिस के किसी अधिकारी ने मुंह क्‍यों नहीं खोला ?
जैसा कि एडीजी आगरा जोन अजय आनंद ने कहा, यदि डॉक्‍टर व उसका परिवार अपहरण की एफआईआर दर्ज कराने में रुचि नहीं ले रहा था तो भी इलाका पुलिस को खुद एफआईआर दर्ज कर बदमाशों का चालान करना चाहिए था क्‍योंकि एक बड़ी रकम बरामद की गई थी।
समाचार के अनुसार उच्‍चाधिकारियों द्वारा इस पूरे मामले में मथुरा पुलिस से चार दिन पहले ही जवाब तलब किया जा चुका है, बावजूद इसके मथुरा पुलिस द्वारा न तो कोई कार्यवाही की गई है और न अपनी सफाई में कुछ कहा गया है।
उधर डॉक्‍टर से जुड़े सूत्रों का कहना है कि डॉक्‍टर ने कुछ दिनों पहले ही अपना निजी हॉस्‍पिटल बनाने के लिए कोई बड़ी जमीन महंगे इलाके में खरीदी है।
सूत्रों के मुताबिक इस वारदात का संबंध उस सौदे से भी हो सकता है क्‍योंकि बिना हील-हुज्‍जत आनन-फानन में 55 लाख रुपए की रकम बदमाशों तक कोई यूं ही नहीं पहुंचा सकता।
हो सकता है कि पुलिस को शामिल करने के पीछे भी बदमाशों की कुछ ऐसी ही मंशा रही हो जिससे सेफ गेम खेला जा सके और बाद के लिए कोई कांटा न बचे।
पूर्व में भी होती रही हैं ऐसी वारदातें
विश्‍व प्रसिद्ध इस धार्मिक जनपद में डॉक्‍टर्स के अपहरण और उनसे चौथ वसूली का यह कोई पहला केस नहीं है, और न पहली बार पुलिस तथा बदमाशों की मिलीभगत से रकम एंठने का मामला प्रकाश में आया है।
इससे पहले भी यह सब हुआ है और सीओ स्‍तर के पुलिस अधिकारी जेल भी गए हैं।
कुख्‍यात बदमाशों को मथुरा के डॉक्‍टर बहुत पहले से आकर्षित करते रहे हैं और ऐसे भी मामले सामने आए हैं जब एक डॉक्‍टर ने ही दूसरे डॉक्‍टर की बदमाशों के लिए सुरागरसी अथवा मुखबिरी की है।
जो भी हो लेकिन इस पूरे घटनाक्रम से पर्दा उठना एक ओर जहां इसलिए जरूरी है जिससे पुलिस की छवि और प्रभावित न हो वहीं दूसरी ओर इसलिए भी आवश्‍यक है कि अन्‍य डॉक्‍टर खुद को सुरक्षित महसूस कर सकें।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
http://legendnews.in/mathura-polices-silence-surrounded-by-questions-on-doctor-kidnapping-and-ransom-case/

शुक्रवार, 20 जुलाई 2018

राधापुरम एस्‍टेट: जहां परिवार सहित “अकाल मौत” का मुकम्‍मल इंतजाम कर रहे हैं लोग

मथुरा। नेशनल हाईवे नंबर 2 के सहारे गनेशरा रोड पर बसी हुई गेटबंद कॉलोनी राधापुरम एस्‍टेट, जिले की ही नहीं संभवत: आगरा मंडल की सबसे पॉश कॉलोनी मानी जाती है ।
कॉलोनी की ख्‍याति के अनुरूप यहां एक ओर जनपद का ‘समृद्ध’ तबका निवास करता है तो दूसरी ओर अधिकारियों की भी कोई कमी नहीं है।
समृद्धि का सीधा संबंध बुद्धि से है लिहाजा यह कहना भी मुनासिब होगा कि राधापुरम एस्‍टेट में ‘बुद्धि के पुतलों’ की भरमार है। बुद्धि से धनबल और धनबल से बाहुबल पैदा होना स्‍वाभाविक है इसलिए राधापुरम एस्‍टेट में एक से बढ़कर एक ‘बाहुबलियों’ की खासी तादाद है।
यहां तक तो सब ठीक है किंतु ‘गांठ के पूरे लेकिन आंखों से सूरदास’ राधापुरम एस्‍टेट के अधिकांश निवासियों में अचानक अपनी, और यहां तक कि अपने परिजनों की “अकाल मौत” का मुकम्‍मल इंतजाम करने की होड़ लग गई है।
आश्‍चर्यजनक रूप से इस मामले में कोई अपनी बुद्धि का इस्‍तेमाल नहीं कर रहा और सब के सब एक अंधी दौड़ का हिस्‍सा बनते जा रहे हैं। बिना यह सोचे-समझे कि इस दौड़ का नतीजा क्‍या निकलेगा।
जी हां, यह प्रतिस्‍पर्धा है घर के बाहर सबमर्सिबल लगवाने की। अपने ही मकान की नींव को खोखला कर देने की।
ऐसा नहीं है कि कॉलोनी में पानी की सप्‍लाई न होती हो। पानी की सप्‍लाई के लिए कॉलोनी में बाकायदा टंकी बनी है और सुबह करीब 5 बजे से लेकर दोपहर साढ़े बारह बजे तक तथा शाम 4 बजे से लेकर रात्रि 10 बजे तक वहां से हर घर को पानी मुहैया कराया जाता है।
हालांकि कॉलोनाइजर ने घर बेचते वक्‍त 24X7 पानी की आपूर्ति का दावा किया था किंतु धीरे-धीरे उसमें कमी आने लगी, फिर भी अब सुबह करीब साढ़े सात घंटे और शाम को 6 घंटे पानी दिया जा रहा है जो किसी भी परिवार के लिए पर्याप्‍त है।
चूंकि कॉलोनाइजर ने करीब चार साल पहले अपना आधिपत्‍य छोड़कर कॉलोनी सोसायटी के हवाले कर दी है इसलिए अब पानी-बिजली, सुरक्षा, सफाई आदि की सारी जिम्‍मेदारियां सोसायटी के ऊपर हैं।
बहरहाल, पानी की समस्‍या सबसे पहले तब शुरू हुई जब लोगों ने अपनी सुविधा और मनमर्जी से दूसरी, तीसरी और यहां तक कि चार-चार मंजिलें खड़ी करना शुरू कर दिया। फिर इतनी ऊंचाई पर पानी पहुंचाने के लिए टुल्‍लू पंप लगवाए। टुल्‍लू पंपों की संख्‍या में इजाफा होने का परिणाम यह हुआ कि पहली मंजिल पर रखी टंकियों तक भी पानी पहुंचने में असुविधा होने लगी। ऐसे में हर घर के अंदर टुल्‍लू पंप लग गए।
अब जबकि टुल्‍लू पंपों से पानी खींचे जाना भी समस्‍या बन गया तो लोगों ने निजी बोरिंग कराना शुरू कर दिया है। आज आलम यह है कि कॉलोनी में किसी न किसी घर के सामने बोरिंग होती देखी जा सकती है। बिना यह सोचे-समझे कि धरती की कोख को अंधाधुंध तरीके से खोखला करने का परिणाम आखिर होगा क्‍या। अपने ही मकान की जड़ (नींव) में ‘मठ्ठा’ डालकर क्‍या हासिल करना चाहते हैं लोग।
हाल ही में भूगर्भीय हलचल और इसके प्रभावों का विश्लेषण करने वाले देश के चार बड़े संस्थानों ने एक अध्ययन में दावा किया है कि भविष्य में आने वाले बड़े भूकंप की तीव्रता रिक्टर पैमाने पर 8 से भी ज्यादा हो सकती है और तब जान-माल की भीषण तबाही होगी।
उल्‍लेखनीय है कि दिल्‍ली और उससे सटे हुए सारे इलाके जिनमें मथुरा व आगरा भी शामिल है, इस संभावित खतरे की जद में हैं लिहाजा यह अनुमान लगाना बहुत कठिन नहीं कि यदि कभी धरती डोलती है तो परिणाम कितने भयावह हो सकते हैं।
गौरतलब है कि राधापुरम एस्‍टेट सहित आसपास की सभी कॉलोनियां ‘भर्त’ की जमीन पर खड़ी की गई हैं इसलिए इनका धरातल पहले से ही बहुत मजबूत नहीं है। भू विज्ञानियों की मानें तो ऐसी जमीन पर कई-कई मंजिला इमारत खड़ी करना खतरे से खाली नहीं होता। ऊपर से यदि इस जमीन का सीना बेहिसाब बोरिंगों से छलनी कर दिया जाएगा तो उसके दुष्‍परिणाम झेलने ही पड़ेंगे।
ऐसे में यह कहना अतिशयोक्‍ति नहीं हो सकती कि राधापुरम एस्‍टेट के निवासी न सिर्फ अपने लिए बल्‍कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी किसी अकाल मौत का मुकम्‍मल इंतजाम कर रहे हैं।
यूं भी विश्‍व के बुद्धिजीवी जब यह मान रहे हैं कि भविष्‍य का विश्‍वयुद्ध किसी और चीज के लिए नहीं, पानी के लिए ही लड़ा जाएगा तो पानी की यह बर्बादी और उसका बेइंतहा दोहन कितना उचित है, इसे बताने की जरूरत नहीं रह जाती।
बेशक पानी के बिना जिंदगी की कल्‍पना तक करना मुश्‍किल है लेकिन इसका यह मतलब तो नहीं कि हम एक लीटर पानी के लिए सैकड़ों लीटर पानी का दोहन सिर्फ इसलिए करें क्‍योंकि ईश्‍वर ने हमें चार पैसे दे दिए हैं।
राधापुरम एस्‍टेट के निवासी भली-भांति जानते हैं कि उनका ही कोई पड़ोसी हर दिन अपनी ‘गाड़ी’ पानी से धुलवाने का आदी है तो कोई सुबह से घर धोने में अकूत पानी बर्बाद कर देता है। किसी के यहां ऊपर रखी पानी की टंकी से घंटों पानी बहता रहता है तो किसी के नल में टोंटी ही नहीं लगी है।
एक ओर पानी का इतना दुरुपयोग और दूसरी ओर चार-पांच लोगों वाले परिवार के लिए मशीन से जमीन का सीना चीरकर लगाए जा रहे सबमर्सिबल। आखिर यह कैसी आत्‍मघाती सोच है, और क्‍यों कोई इसके बारे में चिंतित नहीं है।
किसी को रोकने या टोकने से बेहतर है कि क्‍यों न खुद भी अपने घर के सामने बोरिंग करा ली जाए। एक बोरिंग फेल हुई तो दूसरी, और दूसरी फेल हुई तो तीसरी। यह सिलसिला थमने वाला नहीं है क्‍योंकि सवाल पानी की जरूरत से कहीं अधिक ‘नाक’ का है। नाक नीची कैसे रख सकते हैं।
यह हाल तो तब है कि भूगर्भीय जल का स्‍तर काफी नीचे जा चुका है, पानी के स्‍त्रोत सूख चुके हैं। जल का अक्षय स्‍त्रोत ‘यमुना’ जैसी नदी अपने अस्‍तित्‍व की लड़ाई लड़ रही है। नदी किनारे के कुएं तक पानी को तरस रहे हैं। कुंण्‍ड और तालाबों को बचाने के प्रयास भी काम नहीं आ रहे। बारिश होने का नाम नहीं लेती, जिस कारण समूचा ब्रज क्षेत्र धीरे-धीरे रेगिस्‍तान में तब्‍दील होने लगा है। डार्क जोन लगातार बढ़ रहा है।
आज कराई जा रही डेढ़-दो सौ फीट गहरी बोरिंग भी कितने महीने या साल पानी देगी, इसका पता नहीं लेकिन यह पता है कि उससे हुआ जमीन के सीने का जख्‍म कभी नहीं भरने वाला।
जहां तक सवाल शासन या प्रशासन का है तो वह जब बिना इजाजत तीन-तीन, चार-चार मंजिला इमारत खड़ी करने पर आंखें मूंदे बैठा है तो सबमर्सिबल लगवाने पर क्‍यों कोई कार्यवाही करेगा। 
बहुत दिन नहीं हुए जब सुविधा के लिए शुरू की गई पॉलीथिन आज न सिर्फ पर्यावरण के लिए बल्‍कि जीवन के लिए भी खतरा बन चुकी है। कैंसर जैसी बीमारी तक इसकी देन है। नदी-नाले ही नहीं, समुद्र और पहाड़ तक आज पॉलीथिन से अटे पड़े हैं। किसी की समझ में नहीं आ रहा कि पॉलीथिन रूपी दैत्‍य से पूरी तरह निजात कैसे पाई जाए। सुविधा किसी दिन इतनी बड़ी समस्‍या बनकर सामने खड़ी होगी, शायद ही किसी ने सोचा हो।
इसी तरह सुविधा के लिए धरती का सीना चीरकर अपने ही नींव को खोखला करने की होड़ हमें जिंदगीभर पानी दे पाएगी या नहीं, इसकी तो गारंटी कोई नहीं दे सकता किंतु इस बात की गारंटी जरूर है कि एक दिन यह होड़ जिंदगी पर भारी पड़ने वाली है। यह ऐसा आत्‍मघाती कदम है जिसका खामियाजा भविष्‍य में भुगतना ही पड़ेगा।
बूंद-बूंद से समुद्र बनता है। अब भी समय है कि सख्‍त कदम उठाकर इस अंधानुकरण पर लगाम लगा दी जाए। राधापुरम एस्‍टेट कोई छोटी कॉलोनी नहीं है। सात सौ से अधिक मकान वाली इस कॉलोनी के हर घर में यदि बोरिंग हो गई तो इसे मौत का कुआं बनने से कोई नहीं रोक पाएगा। अपनी और अपने परिवार की अकाल मौत का मुकम्‍मल इंतजाम करने से ज्‍यादा बेहतर होगा पानी का कोई दूसरा किंतु सार्वजनिक इंतजाम कर लेना। कहीं ऐसा न हो कि देर हो जाए और जब तक बात समझ में आ पाए तब तक करने के लिए हाथ में कुछ बचे ही नहीं। कॉलोनी ही नहीं, जिंदगी भी आपकी है। जिंदगी है तो सारे सुख भोग पाओगे अन्‍यथा राम-नाम सत्‍य तो है ही।
-Legend News
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