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रविवार, 21 जुलाई 2019

मथुरा में भी है IAS और IPS से लेकर न्‍यायिक अधिकारियों तक की बेशुमार बेनामी संपत्ति

सोनभद्र में जिस जमीन को लेकर 10 लोगों की जान चली गई, वह बिहार कैडर के पूर्व IAS अधिकारी प्रभात कुमार मिश्रा की पत्‍नी और बेटी के नाम थी। उन्‍होंने ही यह जमीन मूर्तिया गांव के प्रधान यज्ञदत्त सिंह भूरिया को बेची।
10 आदिवासी किसानों की जान जाने के बाद अब भले ही सत्ता पक्ष और विपक्ष सक्रिय हुआ हो परंतु सच्‍चाई यह है कि सोनभद्र अकेला ऐसा जिला नहीं है जहां पूर्व या वर्तमान अधिकारियों की बेनामी संपत्तियां फैली हुई हैं, विश्‍व प्रसिद्ध धार्मिक जनपद मथुरा भी ऐसे ही जिलों में शुमार है।
योगीराज भगवान कृष्‍ण की पावन जन्‍मभूमि में तैनात रहे कई IAS और IPS अफसरों की बेशकीमती बेनामी संपत्ति से मथुरा, वृंदावन, गोवर्धन और बरसाना भरा पड़ा है।
दरअसल, एक ओर जहां मथुरा जनपद की भौगोलिक स्‍थिति इसकी भूमि को मूल्‍यवान बनाती है वहीं दूसरी ओर इसका धार्मिक स्‍वरूप उसमें चार-चांद लगा देता है।
किसी भी भ्रष्‍ट अधिकारी के लिए चूंकि यह जिला अवैध कमाई के तमाम स्‍त्रोत खोलता है इसलिए यहां थोड़े समय की तैनाती भी उसके सारे सपने पूरा कर देती है।
राजस्‍थान और हरियाणा से सटी मथुरा की सीमाएं हर किस्‍म के अपराध एवं अपराधियों को मुफीद बैठती हैं और नोएडा तथा दिल्‍ली तक इसकी काफी कम समय में आसान पहुंच अधिकारियों को आकर्षित करती है।
बात चाहे मथुरा रिफाइनरी से होने वाले तेल के बड़े खेल की हो अथवा हरियाणा से होने वाली शराब की तस्‍करी की। दिल्‍ली से सीधे जुड़े ड्रग्‍स के धंधेबाजों की हो या फिर भारी मात्रा में टैक्‍स की चोरी करके लाए जाने वाले चांदी-सोने की, हर अवैध काम पर अधिकारियों की नजर है और अवैध काम करने वालों की अधिकारियों पर। दोनों जानते हैं कि वह एक-दूसरे के पूरक हैं। किसी का किसी के बिना काम नहीं चलता।
इसीलिए यह माना जाता है कि अधिकांश अधिकारियों के लिए मथुरा की तैनाती किसी दुधारू गाय से कम नहीं होती और ज्‍यादा हाथ-पैर मारे बगैर भी यह उन्‍हें उनकी सोच से परे लाभ दे देती है।
हां, यदि कोई ईमानदार अधिकारी मथुरा आ जाता है तो वह किसी को बर्दाश्‍त नहीं होता। फिर जल्‍द से जल्‍द उसकी यहां से रुखसती के लिए सब एकजुट हो जाते हैं।
ऐसा नहीं है कि मथुरा से होने वाली बेहिसाब कमाई केवल उच्‍च अधिकारियों तक सीमित हो, उनके अधीनस्‍थ भी उससे भरपूर लाभान्‍वित होते हैं।
इस बात की पुष्‍टि करने के लिए राधा-कृष्‍ण की इस भूमि में कभी तैनात रहे पीपीएस, पीसीएस सहित कोतवाल, थानेदार और यहां तक कि सिपाहियों की भी कुंडली खंगाली जा सकती है।
शहर की गेटबंद पॉश कॉलोनियों में एक-एक करोड़ रुपए की कीमत वाले इनके कई-कई घर यह समझाने के लिए काफी हैं कि मथुरा नगरी कैसे उनके सपनों को पंख लगाती है।
नेता और न्‍यायिक अधिकारी भी पीछे नहीं
मथुरा जैसे धार्मिक स्‍थान पर अपनी काली कमाई को ठिकाने लगाने में नेता और न्‍यायिक अधिकारी भी पीछे नहीं हैं। नेता तो अधिकारियों से कई कदम आगे हैं। इन लोगों ने अपनी ब्‍लैक मनी का सर्वाधिक हिस्‍सा बड़े-बड़े शिक्षण संस्‍थानों, होटलों और रियल एस्‍टेट में निवेश कर रखा है।
इसे यूं भी समझा जा सकता है कि मथुरा के तमाम शिक्षण संस्‍थान, होटल तथा रियल एस्‍टेट प्रोजेक्‍ट तो नेता एवं अधिकारियों के ही पैसे से चल रहे हैं और इन्‍हें जो चला रहे हैं, वह सिर्फ मुखौटे हैं।
इनके अतिरिक्‍त कई प्रमुख धार्मिक संस्‍थाओं की अकूत संपत्‍ति पर भी प्रभावशाली नेताओं का आधिपत्‍य है और धर्मगुरुओं के रुप में उन पर उन्‍हीं के नुमाइंदे काबिज हैं।
ब्रज के प्रमुख मंदिरों में चल रहे विवादों का अंदरूनी सच यदि पता लगाया जाए तो स्‍पष्‍ट हो जाएगा कि उसके भी मूल में हजारों करोड़ रुपए की चल व अचल संपत्ति ही है, न कि उनके संचालन अथवा रखरखाव का तरीका।
यही कारण है कि अदालतों में लंबित ज्‍यादातर वादों को छद्म वादकारी लंबा खींचते रहते हैं ताकि उनसे किसी न किसी रूप में जुड़े लोगों का मकसद पूरा होता रहे।
बिहारी जी और गिर्राज जी तो सिर्फ बहाना हैं 
ज्‍यादातर लोगों को लगता होगा कि बिहारी जी तथा गिर्राज जी आने वाले बड़े-बड़े नामचीन और हाई प्रोफाइल लोग अपनी धार्मिक भावना के तहत यहां खिंचे चले आते होंगे। कुछ लोग यह भी समझते होंगे कि ऐसे लोग कोई मन्‍नत मांगने अथवा मन्‍नत पूरी होने पर ईश्‍वर का अभार प्रकट करने के लिए आते होंगे ताकि उसकी अनुकंपा बनी रहे लेकिन हकीकत यह नहीं है।
हकीकत यह है कि बिहारी जी, गिर्राज जी, राधारानी और कोकिला वन स्‍थित शनिदेव मंदिर पर आना तो मात्र बहाना है। असली मकसद यहां निवेश की हुई उस काली कमाई पर नजर टिकाए रखना है जो कभी भी सावधानी हटी और दुर्घटना घटी की कहावत को चरितार्थ कर सकती है।
इस सबके अलावा ब्रजभूमि में किया हुआ निवेश ‘आम के आम और गुठलियों के दाम’ वाली कहावत भी पूरी करता है।
जिन अधिकारियों ने यहां अपनी काली कमाई खपा रखी है, वह धार्मिक यात्रा की आड़ में कई-कई दिन रहकर सुरा-सुंदरी का भरपूर उपयोग करते हैं। इसकी संपूर्ण व्‍यवस्‍था का जिम्‍मा उनके मुखौटे कारोबारी खुशी-खुशी बखूबी उठाते हैं।
सोनभद्र में यदि 10 लोगों की हत्‍या नहीं हुई होती तो शायद ही कभी किसी को पता लगता कि जिस जमीन पर कब्‍जे को लेकर यह खूनी खेल खेला गया, उसकी जड़ में ऐसे किसी शातिर दिमाग आईएएस का हाथ था जो रिटायर होकर अपनी पत्‍नी व पुत्री के सहारे काली कमाई को ठिकाने लगाने का काम कर रहा था।
सोनभद्र हो या मथुरा, इनकी अपनी कुछ खासियतें हैं। यह खासियतें ही अधिकारियों और नेताओं को प्रभावित करती हैं। सोनभद्र सोनांचल है तो मथुरा ब्रजांचल का केन्‍द्र। एक ऐसा केंद्र जिसके चारों ओर असीमित संभावनाएं हैं। वहां आदिवासी हैं तो यहां ब्रजवासी। अधिकारियों और नेताओं का सानिध्‍य सबको सुहाता है। लोग उनके एक इशारे पर स्‍याह को सफेद करने के लिए तत्‍पर रहते हैं। लोगों की यही तत्‍परता अधिकारियों का काम आसान कर देती है।
मथुरा में बढ़ रही बेहिसाब भीड़ और ईश्‍वर के प्रति दिखाई देने वाली अगाध श्रद्धा का कड़वा सच सोनांचल की तरह ब्रजांचल में सामने आए, इससे पहले बेहतर होगा कि सरकार समय रहते कोई ठोस कदम उठा ले अन्‍यथा लकीर पीटने से यह सिलसिला थमने वाला नहीं है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

शनिवार, 16 सितंबर 2017

मथुरा में मौजूद बेनामी संपत्तियों पर पड़ी अब मोदी और योगी सरकार की नजर, एक मंत्री भी निशाने पर

विश्‍व प्रसिद्ध धार्मिक नगरियों में शुमार कृष्‍ण की पावन जन्‍मस्‍थली मथुरा में जिस प्रकार जगह-जगह विभिन्‍न धर्मध्‍वजाएं फहराती दिखाई देती हैं, उसी प्रकार यहां कदम-कदम पर बेनामी संपत्तियों की भी भरमार है।
नरेन्‍द्र मोदी के नेतृत्‍व वाली एनडीए की सरकार तथा योगी आदित्‍यनाथ के नेतृत्‍व वाली यूपी की भाजपा सरकार से बेनामी संपत्तियों को लेकर मिल रहे कठोर संकेतों पर यदि भरोसा करें और मानें तो निकट भविष्‍य में बेनामी संपत्तियां सरकार की अगली टारगेट बनने जा रही हैं, तो तय जानिए कि उत्तर प्रदेश के अंदर मथुरा निश्‍चित ही पहला स्‍थान प्राप्‍त करेगा।
बताया जाता है कि समय-समय पर राजनीतिक पार्टियां बदलने में माहिर तथा विभिन्‍न मंत्री पदों को सुशोभित करते रहे एक नेताजी भी अरबों रुपए की बेनामी संपत्ति के मालिक हैं। इनकी बेनामी संपत्ति सर्वाधिक उसी व्‍यक्‍ति के नाम है जो कभी फोर्थक्‍लास सरकारी मुलाजिम था और हमेशा उनका खास मुंहलगा बना रहा।
गौरतलब है कि हाल ही में भाजपा के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष अमित शाह ने उत्तर प्रदेश शासन को इस आशय के संकेत दिए है कि पार्टी बहुत जल्‍द कुछ मंत्रियों के साथ आरएसएस के कार्यकर्ताओं को अटैच करने वाली है।
दरअसल, अमित शाह को जानकारी मिली है कि कुछ मंत्रियों ने यूपी में शासन के इस अल्‍पकाल के अंदर ही बड़ी कमाई कर ली है। इसमें जहां कुछ दूसरे दलों से आए आदतन भ्रष्‍ट नेता हैं वहीं कुछ ऐसे भी हैं जो पहली बार मिले मौके का पूरा लाभ ईमानदार सरकार की आड़ लेकर उठा लेना चाहते हैं।
एक दूसरे दल के नेताजी का काफी पैसा मथुरा बेस्‍ड उत्तर भारत की नामचीन रियल एस्‍टेट कंपनी में लगा है और इस पैसे की देखभाल के लिए उन्‍होंने बाकायदा अपने एक खासमखास को कंपनी में डायरेक्‍टर का पद दिलवा रखा है।
केन्‍द्र में कांग्रेस की सरकार रहते एक प्रदेश स्‍तरीय कांग्रेसी नेता ने भी इस धार्मिक नगरी का विकास कराने की आड़ में जमकर अपना और अपने परिवार का विकास किया।
इन नेताजी की बेनामी संपत्तियों को जिस दिन सरकार खंगालने बैठ गई, उस दिन लोगों की आंखें फटी की फटी रह जाएंगी।
पॉश कालोनियों में कई-कई आलीशान मकानों के साथ-साथ इनका पैसा दूसरे धंधों में भी लगा है।
सूत्रों से प्राप्‍त जानकारी के अनुसार धर्म की इस नगरी में ऐसे अधर्मियों की संख्‍या सैकड़ों नहीं, हजारों में है जो कुछ समय पहले तक रोटी-रोटी को मोहताज थे किंतु आज वह करोड़ों की बजाय अरबों में खेल रहे हैं।
ऐसे तत्‍वों में एक ओर जहां रजिस्‍ट्री ऑफिस के मामूली से कर्मचारी शामिल हैं वहीं दूसरी ओर ऐसे लोग भी हैं जो यहीं सरकारी विभाग में बतौर चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी तैनात रह चुके हैं। सरकारी विभाग के ऐसे ही एक कर्मचारी की गिनती तो अब शहर के प्रसिद्ध बिल्‍डर्स एवं ठेकेदारों में की जाती है।
रियल एस्‍टेट के एक ऐसे ही बड़े कारोबारी को कुछ वर्षों पहले तक मथुरा के लोगों ने मामूली मजदूरी करते देखा है। उनके भाई भी कंधे पर टीवी उठाए-उठाए घर-घर पूरी रात फिल्‍मों के वीडियो दिखाने का काम करते थे लेकिन आज यह ”भाई लोग” बेनामी संपत्तियों के बेताज बादशाह हैं।
मथुरा में तैनात रहे पुलिस के उच्‍च अधिकारियों से लेकर उपाधीक्षक तक और दरोगा से लेकर सिपाही तक ऐसे-ऐसे हैं, जिनकी यहां करोड़ों की बेनामी संपत्ति है।
पुलिस के कई अधिकारियों की बेनामी संपत्‍तियों का संरक्षण आज भी उनके नुमाइंदे ही कर रहे हैं क्‍योंकि कागजों में वही उसके मालिक हैं।
एक दशक से अधिक मथुरा में विभिन्‍न थानों के प्रभारी पद पर रहे दरोगा की संपत्ति चौंकाने वाली है। उसके दो मकान उसके गृह जनपद में हैं जबकि करोड़ों रुपए मूल्‍य के दो मकान मथुरा में हैं। गोवर्धन के सर्वाधिक कीमती क्षेत्र में हजार वर्ग गज का प्‍लॉट है और एक प्‍लॉट नोएडा में है।
इसी प्रकार मथुरा में तैनात कई पुलिस के दरोगा और यहां तक कि सिपाहियों को भी 10 से 15 लाख रुपए मूल्‍य वाली लग्‍जरी गाड़ियां इस्‍तेमाल करते कभी भी देखा जा सकता है।
बात चाहे विकास प्राधिकरण के अधिकारी और कर्मचारियों की करें अथवा सार्वजनिक लोक निर्माण विभाग या सहायक संभागीय परिवहन विभाग की, धर्म की इस नगरी में इन विभागों के अधिकारी एवं कर्मचारियों ने जमकर लूट मचाई है। विकास प्राधिकरण में कार्यरत रहे एक कर्मचारी के तो अपने ही विभाग द्वारा विकसित एक ही कॉलोनी में आठ मकान बताए जाते हैं। एक अन्‍य पूर्व कर्मचारी की गिनती आज शहर के बड़े ठेकेदारों में होती है।
बताया जाता है कि विकास प्राधिकरण में यहां तैनात रहे कुछ अधिकारी एवं कर्मचारियों ने तो स्‍थानीय पत्रकारों को ही अपना हमराज बना रखा है। इन पत्रकारों के नाम न सिर्फ उन्‍होंने अपनी संपत्तियों ले रखी हैं बल्‍कि उनके माध्‍यम से रियल एस्‍टेट में अच्‍छा-खासा निवेश भी किया हुआ है। बेनामी संपत्ति बनाने में कई अधिकारियों की मथुरा के कारोबारियों से भी सांठगांठ सामने आई है।
पता लगा है कि अक्‍सर न्‍यायिक, पुलिस एवं प्रशासनिक अधिकारियों के इर्द-गिर्द मंडराते देखे जाने वाले इन कारोबारियों का मुख्‍य उद्देश्‍य ही उनकी भ्रष्‍टाचार से कमाई गई रकम का मुकम्‍मल बंदोबस्‍त करना है। समाजसेवियों का टैग लगाकर घूमने वाले ऐसे कारोबारी ऊपरी तौर पर तो उनके ”फैमिली फ्रेंड” बने रहते हैं किंतु असलियत में वह उनकी ब्‍लैक मनी के राजदार हैं।
बिजली विभाग के अधिकारी तथा कर्मचारियों की भी मथुरा में अकूत बेनामी संपत्‍ति बताई जाती है। मथुरा में लंबे समय तक तैनात रहे बिजली विभाग के एक क्‍लर्क और सब रजिस्‍ट्रार ऑफिस मथुरा के एक क्‍लर्क की अचल संपत्ति का आलम यह है कि शहर का कोई इलाका, कोई पॉश कॉलोनी ऐसी नहीं है जहां इनकी कीमती संपत्तियों न हों।
पिछले दिनों तो इस चक्‍कर में एक बिजली अधिकारी ने अपने यहां हुई करोड़ों रुपए मूल्‍य की चोरी का ब्‍यौरा तक पुलिस को उपलब्‍ध नहीं कराया जबकि पुलिस बार-बार उनसे चोरी गए सामान का ब्‍यौरा मांगती रही।
कहा जाता है कि अधर्म के लिए धर्म से बड़ी कोई आड़ नहीं होती। मथुरा जनपद के विभिन्‍न धार्मिक स्‍थलों में निर्मित आलीशान कॉलोनियों, मठ एवं मंदिरों और यहां तक कि हाल ही में बड़ी तेजी से खड़ी होने वाली मस्‍जिदों का सच खंगाला जाए तो पता लगेगा कि सरकार की सोच से कहीं ज्‍यादा बेनामी संपत्ति वहां मौजूद है। इनके संचालकों की सच्‍चाई पता करने के लिए उनके बही-खाते ही काफी हैं क्‍योंकि आज भी वह बहुत कुछ बोल सकते हैं, बता सकते हैं।
मथुरा जनपद में यहां-वहां फैली संपत्ति के लिए हत्‍या, लूट और डकैती के साथ-साथ लड़ाई झगड़े तक हुए हैं और होते रहते हैं किंतु पूरा सच कभी सामने नहीं आता क्‍योंकि इनमें से अधिकांश संपत्तियां बेनामी हैं।
कुछ महीनों पहले वृंदावन के एक बाबा और वहीं के एक कारोबारी के बीच करोड़ों के लेनदेन का झगड़ा सामने आया था। इस झगड़े में एक प्रदेश स्‍तरीय बाहरी नेता के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज हुई थी किंतु छद्म लेनदेन और बेनामी संपत्ति होने के कारण दोनों पक्ष ने सुलह करके विवाद निपटाना ज्‍यादा उचित समझा अन्‍यथा सच्‍चाई सामने आने पर कई चेहरों के बेनकाब होने का डर था।
बेनामी संपत्तियों के बेताज बादशाहों की फेहरिस्‍त में कुछ स्‍थानीय चिकित्‍सकों का नाम भी काफी ऊपर है। इन चिकित्‍सकों ने मथुरा ही नहीं, मथुरा से बाहर भी अच्‍छी-खासी बेनामी संपत्तियां बना रखी हैं लेकिन आजतक कानून की गिरफ्त में नहीं आए हैं।
सरकारी सूत्र बताते हैं कि केंद्र तथा प्रदेश की सरकारों ने इनका पूरा कच्‍चा चिठ्ठा तैयार कर लिया है और जिस दिन सरकारी एजेंसियों ने मथुरा को खंगालना शुरू किया, उस दिन इन सफेदपोशों को सींखचों के अंदर जाने से कोई रोक नहीं पाएगा।
शासन स्‍तर से प्राप्‍त जानकारियों के मुताबिक सात मोक्षदायिनी नगरियों में स्‍थान प्राप्‍त कृष्‍ण की इस पावन जन्‍मस्‍थली के विकास पर जिस तरह मोदी एवं योगी की सरकारें अपना पूरा ध्‍यान केंद्रित किए हुए हैं और अगले लोकसभा चुनावों तक उन्‍हें अमल में लाना चाहती हैं, उसी प्रकार वह यह भी चाहती हैं कि धर्म की आड़ लेकर अब तक यहां एकत्र की जाती रही बेनामी संपत्ति एवं काली कमाई भी सार्वजनिक हो जिससे भविष्‍य में कोई ऐसी संपत्ति बनाने से पहले एक-दो बार नहीं, कई-कई बार विचार करने पर मजबूर हो जाए।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
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