छाता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
छाता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 24 जनवरी 2022

यमुना मैया कहे पुकार, हर प्रत्याशी धोखेबाज़

 


 पतित पावनी यमुना, जीवन दायिनी यमुना, कलकल करती यमुना और अब दिन-प्रतिदिन कलुषित होती यमुना। कालिंदी और कृष्ण ही हैं समूचे विश्व में मथुरा की पहचान। कभी कालिया रूपी नाग के कलुष से कालिंदी को मुक्‍त कराने वाले कृष्ण भी आज कलियुग के कालियाओं से जैसे हार मान बैठे हैं। बावजूद इसके यमुना का धार्मिक महत्व कम होता दिखाई नहीं देता। तभी तो लोकतंत्र के हर पर्व पर विभिन्न राजनीतिक दल व उनके प्रत्याशी यमुना के धार्मिक महत्व और उससे जुड़ी जनभावनाओं को भुनाने में पीछे नहीं रहते।

जन्म-जन्मातरों के पापों से मुक्ति दिलाने वाली करोड़ों जनमानस की आराध्य यमुना अब चुनावी नैया पार कराने का जरिया बन चुकी है। ये बात अलग है कि चुनावी मौसम में अंजुलि भरकर यमुना को प्रदूषण मुक्‍त कराने का संकल्प लेने वाले नेता चुनाव बीत जाने के बाद उसकी ओर पलटकर देखना तक गवारा नहीं करते।
एकबार फिर लोकतंत्र का पर्व विधानसभा चुनावों के रूप में सामने है। एकबार फिर यमुना पूजन करके पर्चा दाखिल करने वाले विभिन्‍न राजनीतिक दलों के उम्‍मीदवार चुनावी वैतरिणी पार करने को सक्रिय हैं, किंतु इस बार एक फर्क है। फर्क यह है कि अब किसी भी दल के प्रत्यााशी पर आम जनता का भरोसा नहीं रहा। पिछले विधानसभा चुनावों तक जो थोड़ा-बहुत भरोसा कायम था, वह भी अब पूरी तरह उठ चुका है। हालांकि पिछली बार किसी प्रत्यााशी को यमुना पूजन कराने के लिए कोई पुरोहित खड़ा नहीं हुआ। हुआ तो इतना कि जिस दिन विधायक प्रदीप माथुर यमुना पूजन करने जा रहे थे, उस दिन उनके खिलाफ यमुना किनारे पोस्टकर चस्पा किए गए, बाद में पुलिस द्वारा वो पोस्टर बलपूर्वक हटवा दिए गए।
प्रदीप माथुर के खिलाफ पोस्टर चस्पा किए जाने की वजह शायद यह रही कि यमुना को प्रदूषण मुक्‍त कराने में लगे लोगों को सर्वाधिक उम्मीद उन्हीं से थी, लेकिन कई बार विधायक बनने के बाद भी उन्होंने यमुना के लिए कुछ नहीं किया।
करीब आठ साल पहले की बात है, जब केंद्र में प्रदीप माथुर की पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार काबिज हुआ करती थी। तब यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने के लिए बाबा जयकृष्ण दास ने हजारों लोगों के साथ मथुरा से दिल्ली कूच किया था। बाबा जयकृष्ण दास के नेतृत्व में यमुना भक्तों की इस फौज को आगे बढ़ते देख एकबार तो केंद्र सरकार के भी हाथ-पैर फूल गए थे लेकिन फिर उसने इस फौज को पीछे धकेलने के लिए अपनी बिसात बिछानी शुरू की, और उसके लिए मोहरा बनाया गया उस समय के कांग्रेसी विधायक प्रदीप माथुर को।
प्रदीप माथुर ने बाबा जयकृष्ण दास के सामने तत्‍कालीन केंद्रीय जल संसाधन मंत्री हरीश रावत से वार्तालाप कर यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने का कथित ठोस प्रस्ताव पेश किया, जिसे बाबा ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। बाबा जयकृष्ण दास को जाल में फंसता देखते ही प्रदीप माथुर और केंद्र सरकार के दूसरे नुमाइंदों ने बाबा को इस बात पर राजी कर लिया कि वह अपने साथ चल रहे लोगों को आश्वस्त कर लौटने को कहेंगे। हुआ भी यही, लिहाजा फरीदाबाद पहुंचते-पहुंचते यमुना भक्तों का कारवां बिखर चुका था। केंद्र सरकार और उनके कांग्रेसी नुमाइंदों की चाल कामयाब हो चुकी थी, जबकि बाबा जयकृष्णद दास किसी भी चाल से पूरी तरह अनभिज्ञ थे।
दिखावे के लिए बाबा सहित कुछ चुनिंदा लोगों की केंद्रीय जल संसाधन मंत्री हरीश रावत से मीटिंग कराई गई और इस मीटिंग में यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने का पूरा खाका भी खड़ा किया गया।
दरअसल, यह खाका ही यमुना एवं यमुना के लिए आंदोलनरत लोगों के खिलाफ एक ऐसा षड्यंत्र था जिसके कारण यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने का पूरा आंदोलन न सिर्फ ठप्प पड़ गया बल्कि वह पहले दोफाड़ हुआ और फिर कई फाड़ होकर लक्ष्य से ही भटक गया।
उधर, वर्ष 2009 के लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी के सहयोग से राष्ट्रीय लोकदल के युवराज जयंत चौधरी अपना पहला चुनाव मथुरा से लड़ने उतरे। जयंत चौधरी ने विश्राम घाट पर हजारों लोगों की मौजूदगी में यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने का संकल्प लिया, वह लाखों मत के अंतर से चुनाव जीते भी, परंतु यमुना के लिए कुछ नहीं कर पाए। चुनावों के दौरान मथुरा की जनता से यहीं घर बसाकर रहने का वायदा करने वाले जयंत चौधरी ने चुनाव जीतने के बाद न जनता की सुध ली और न यमुना की। उनके अपने लोग भी उनसे एक मुलाकात को पूरे पांच साल तरसते रहे। भाजपा के सहयोग से चुनाव जीतने वाले जयंत चौधरी के पिता व उनकी पार्टी रालोद के मुखिया चौधरी अजीत सिंह ने इस बीच कांग्रेस से पैक्ट करके अपने लिए जरूर केंद्र में मलाईदार मंत्रीपद हासिल कर लिया और सत्तासुख भोगते रहे।
यही कारण रहा कि 2014 और फिर 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा की प्रत्याशी तथा बॉलीवुड में स्वप्न सुंदरी का खिताब प्राप्त अभिनेत्री हेमा मालिनी भारी मतों से विजयी रहीं।
मथुरा की जनता ने नरेन्द्र मोदी के चेहरे पर अभिनेत्री हेमा मालिनी को दो मर्तबा बड़ी जीत दिलाई, बावजूद इसके हेमा मालिनी भी दूसरे नेताओं की तरह यमुना के साथ छलावा करने से नहीं चूकीं।
2014 में हेमा मालिनी को जिताने की अपील करने मथुरा आए खुद नरेन्द्र मोदी ने चुनावी रैली में यमुना प्रदूषण का मुद्दा उठाया और ब्रजवासियों को भरोसा दिया कि यदि सत्ता उनके पास आती है तो वह प्राथमिकता के आधार पर यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने का काम करेंगे। उनकी अपील पर हेमा मथुरा से दो बार सांसद चुनी गईं और खुद मोदी भी तब से लगातार प्रधानमंत्री के पद पर काबिज हैं लेकिन यमुना के साथ छल किए जाने का सिलसिला अब भी नहीं टूटा।
मथुरा की सांसद हेमा मालिनी, पांच में से चार विधायक भाजपा के, इनमें से दो विधायक मंत्री, मथुरा नगर निगम के मेयर मुकेश आर्यबंधु भाजपा से और जिला पंचायत भी भाजपा का कब्‍जा, परंतु केंद्र एवं प्रदेश में सत्ताधारी दल के नेताओं की इतनी बड़ी फौज भी नाले-नालियों का गंदा पानी आज तक सीधा यमुना के अंदर गिरने से नहीं रोक सकी।
अब इन चुनावों में मथुरा-वृंदावन विधानसभा सीट पर फिर से भाजपा ने ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा को चुनाव मैदान में उतारा है जबकि उनके सामने हैं कांग्रेस के रटे-रटाए चेहरे प्रदीप माथुर, भाजपा से बगावत करके उतरे बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी एसके शर्मा।
पिछले पूरे कार्यकाल में कबीना मंत्री श्रीकांत शर्मा यूं तो एक रस्म अदायगी की तरह यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने की बात कहीं-कहीं करते सुनाई पड़ते रहे लेकिन उनकी बात में किसी स्तर पर दम नजर नहीं आया
रहा सवाल बसपा के प्रत्याशी एसके शर्मा का, तो वह जरूर यमुना को प्रदूषण मुक्‍त कराने का वायदा कर रहे हैं किंतु कौन नहीं जानता कि वर्तमान परिस्‍थितियों में बसपा प्रत्‍याशी की हैसियत से उनका वादा किसी मजाक से कम नहीं है। वैसे उनकी पार्टी ने पहले भी कभी यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने के किसी प्रयास में कोई रुचि नहीं दिखाई।
शहरी सीट के इतर अन्य चार सीटों गोवर्धन, मांट, छाता तथा बल्देव में अपना भाग्य आजमा रहे प्रत्याशी तो यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने के वायदे से भी खुद को पूरी तरह अलग रखते हैं। उनको लगता है कि यमुना के बारे में बात करना सिर्फ और सिर्फ मथुरा-वृंदावन क्षेत्र के विधायक की जिम्मेदारी है अन्यथा मांट क्षेत्र से 8 बार विधायक रहे श्याम सुंदर शर्मा का चुनावी क्षेत्र मांट भी यमुना किनारे बसा हुआ है छाता क्षेत्र की विधायकी से कबीना मंत्री तक की कुर्सी हासिल करने वाले चौधरी लक्ष्मीानाराण का चुनाव क्षेत्र भी यमुना की खादरों का हिस्सा है।
बल्देव (सुरक्षित) से पिछली बार भाजपा की टिकट पर लड़कर चुनाव जीतने वाले पूरन प्रकाश इस बार भी भाजपा के उम्मीमदवार हैं। बल्देव क्षेत्र भी यमुना से अछूता नहीं है और इसके मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा यमुना किनारे बसता है किंतु पूरन प्रकाश ने यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने की दिशा में कभी कोई प्रयास नहीं किया।
ऐसे में गोवर्धन सीट पर चुनाव लड़ने जा रहे प्रत्‍याशियों से कोई उम्मीद कैसे की जा सकती है क्योंकि उनके अपने चुनाव क्षेत्र का यमुना से कोई सीधा संबंध नहीं है। उनके लिए यमुना प्रदूषण मुक्ति के काम से पल्ला झाड़ना बहुत आसान है।
सच तो यह है कि नेता चाहे कोई पुराना हो अथवा नया, वो जानता है कि यमुना के नाम पर जनभावनाओं का दोहन करना तथा उसकी आड़ लेकर जितने संभव हों उतने वोट बटोरना काफी आसान है इसलिए वह यमुना की बात करता है। वह खूब समझता है कि चुनाव बीत जाने के बाद यमुना प्रदूषण का मुद्दा अगले चुनाव तक के लिए ठंडे बस्ते में चला जाना है। रह-रह कर इसके लिए कोई आवाज़ यदि उठती भी है तो उसे उसी प्रकार अनसुना किया जा सकता है जिस प्रकार अब तक किया जाता रहा है।

-सुरेन्द्र चतुर्वेदी 

बुधवार, 12 जनवरी 2022

गोवर्धन के लिए 5 करोड़ की पेशगी और छाता के लिए मुंह मांगी रकम, निष्ठाएं बदलने को भी तैयार मथुरा के माननीय


 उत्तर प्रदेश में चुनाव आयोग ने विधानसभा चुनावों का बिगुल फूंके जाने के साथ ही निष्‍ठाओं से किनारा कर लेने तथा टिकटों की खरीद-फरोख्‍त का अघोषित मुहूर्त भी निकाल दिया है।

अब जैसे-जैसे राजनीतिक पार्टियां अपने उम्‍मीदवारों की सूची जारी करेंगी, वैसे-वैसे चुनावी मैदान में ताल ठोकने को आतुर नेता एक ओर पाला बदलते दिखाई देंगे तो दूसरी ओर उम्‍मीदवारी के लिए बोरे भर भरकर पैसा फेंकते भी नजर आएंगे।
ये स्‍थिति वैसे तो किसी एक जिला या एक विधानसभा की न होकर पूरे प्रदेश में दृष्टिगोचर होगी लेकिन यदि बात करें मथुरा की तो यहां इस मर्तबा ये खेल बड़े स्‍तर पर खेले जाने की संभावना है, और इसके लिए बिसात बिछनी शुरू हो चुकी है।
योगीराज भगवान श्रीकृष्‍ण की पावन जन्‍मस्‍थली मथुरा कहने के लिए हमेशा से ही राजनीतिक दृष्‍टि से महत्‍वपूर्ण रही है परंतु 2022 के विधानसभा चुनावों से पहले जिस तरह इसे सियासत का केंद्र बनाने की कोशिश की गई है और अयोध्‍या व काशी की तर्ज पर कृष्‍ण जन्‍मभूमि को भव्‍य-दिव्‍य बनाने का ऐलान किया गया है, तब से इस धार्मिक स्‍थान की चर्चा कुछ ज्‍यादा हो रही है।
जाहिर है कि ऐसे में यहां का चुनाव ही नहीं, उम्‍मीदवारों का चयन भी खासा अहम हो जाता है।
यही कारण है कि यहां से संभावित उम्‍मीदवारों के दिल की धड़कनें कुछ ज्‍यादा तेज चल रही हैं क्‍योंकि सवाल लगभग जीवन-मरण जैसा है।
पांच विधानसभा सीटों वाले मथुरा जनपद से फिलहाल भाजपा के चार विधायक हैं, और मांट सीट बसपा के पास है। भाजपा के चार विधायकों में से दो योगी सरकार में कबीना मंत्री हैं।
बताया जाता है कि विगत माह वृंदावन में हुई बैठक के बाद ”संघ” ने यहां 2017 के पांच प्रत्‍याशियों में से तीन को बदलने की संस्‍तुति पार्टी आलाकमान से की थी। इसके अलावा भाजपा के सूत्र भी बताते हैं कि पार्टी अबकी बार उम्‍मीदवारों के चयन को लेकर काफी सतर्क है।
ऐसे में एक ओर जहां ये आशंका है कि कुछ सिटिंग विधायकों पर भी गाज गिर सकती है, वहीं दूसरी ओर तमाम लोगों को उम्‍मीद बंधी है कि उनका नंबर आ सकता है।
टिकट के लिए 5 करोड़ का ऑफर
पार्टी सूत्रों से प्राप्‍त जानकारी के अनुसार कल तक भाजपा से गोवर्धन के लिए आवेदन करने वाले एक महानुभाव कथित ‘राष्‍ट्रीय दल’ के मुखिया को 5 करोड़ पेशगी दे आए हैं जबकि उनसे पहले तीन करोड़ पहुंचा चुके संभावित प्रत्‍याशी ने अपना प्रचार तक शुरू कर दिया है।
कभी स्‍टांप वेंडर रहे ये महानुभाव इस बार हर कीमत पर चुनाव लड़ना चाहते हैं क्‍योंकि अतीत में रहे इनके ‘कारनामे’ इन्‍हें राजनीतिक संरक्षण को मजबूर कर रहे हैं।
ये माननीय कर सकते हैं घर वापसी
जनपद की बल्‍देव (सुरक्षित) सीट का भी हाल करीब-करीब ऐसा ही है। चर्चा है कि टिकट कटने की स्‍थिति में यहां एक माननीय घर वापसी कर सकते हैं और इसके लिए उन्‍होंने अपने जोते बांधना शुरू कर दिया है ताकि ऐन वक्‍त पर हाथ मलने की नौबत न आ जाए।
मंत्री महोदय की सांसें भी अटकीं
मथुरा-वृंदावन विधानसभा सीट पर चूंकि योगी आदित्‍यनाथ के लड़ने की अटकलें हैं लिहाजा मंत्री महोदय की भी सांसें अटकी हुई हैं। मंत्री महोदय की सांसें अटकने का एक कारण उनके प्रति पार्टी कार्यकर्ताओं का आक्रोश भी है। हालांकि उनके समर्थक किसी आक्रोश से इंकार करते हैं।
ये बात अलग है कि विपक्षी दल उनको चुनाव लड़ाना चाहते हैं जिससे उनके प्रति उपजी कथित नाराजगी का लाभ ले सकें। एक पूर्व विधायक को खुलेआम यह कहते सुना जा सकता है कि मंत्री महोदय यदि फिर चुनाव मैदान में उतरे तो मेरी जीत तय है।
हालात और समीकरणों का लाभ अन्‍य दूसरे दलों से जुड़े लोग भी उठाना चाहते हैं इसलिए सुगबुगाहट विपक्षी खेमे में भी कम नहीं हैं।
ऐसा माना जा रहा है कि मथुरा-वृंदावन तथा मांट सीट पर ‘गठबंधन’ के प्रत्‍याशियों को अलग-अलग चुनाव चिन्‍हों पर चुनाव लड़ाया जाएगा। एक जगह बड़े दल के चिन्‍ह पर जबकि दूसरी जगह छोटे दल के चिन्‍ह पर गठबंधन के प्रत्‍याशी मैदान में होंगे। हालांकि मांट सीट की उम्‍मीदवारी के लिए अच्‍छी बोली लगाई जा रही है लेकिन यहां अंतिम निर्णय ‘बड़े दल के नेताजी’ करेंगे।
एक चाल यह भी चली जा सकती है कि मांट से गठबंधन का उम्‍मीदवार खड़ा ही न किया जाए जिससे भाजपा को खाता खोलने का अवसर तक न मिल सके और मुकाबला त्रिकोणीय न होकर आमने-सामने का रहे।
शेष रही दूसरे मंत्री के चुनाव क्षेत्र छाता की बात, तो यहां भी स्‍वास्‍थ्‍य और उम्र की वजह से मंत्री जी खुद को बहुत सुखद महसूस नहीं कर रहे। पार्टी भी इस स्‍थिति पर गौर कर रही है किंतु मंत्री जी चाहते हैं कि उनके ही परिवार को प्राथमिकता दी जाए।
उन्‍होंने अपनी एक पुत्री का नाम आगे बढ़ाया भी है जिससे पार्टी संज्ञान ले सके लेकिन छाता क्षेत्र की राहें इस बार पहले जितनी आसान नहीं हैं।
गठबंधन के अलावा बसपा भी यहां से ठाकुर प्रत्‍याशी उतारकर बड़ा दांव खेलने के प्रयास में है लेकिन इस सबके बीच सर्वाधिक चर्चा है तो इसी बात की है कि कौन कितने में टिकट लेकर आता है और कौन निष्‍ठाएं बदलकर भाग्य आजमाने उतरता है।
जो भी हो, लेकिन एक बात तय है कि करोड़ों में टिकट खरीदने, और फिर करोड़ों चुनाव पर खर्च करने वाले ये नेता किसी भी रूप में जनता के भाग्य विधाता नहीं हो सकते।
हो सकते हैं तो केवल ऐसे सूदखोर जो हर वक्‍त किसी न किसी तरह मूल से कई गुना अधिक वसूलने की फिराक में लगा रहता है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

मंगलवार, 14 मई 2019

शुरू होने के साथ ही छाता का “Delhi Public School” विवादों में, पेरेंट्स ने की 3 पन्‍नों की शिकायत

मथुरा को राष्‍ट्रीय राजधानी से जोड़ने वाले नेशनल हाईवे नंबर 2 पर छाता क्षेत्र में अपना पहला शिक्षा सत्र शुरू करने वाला Delhi Public School संभवत: पहला ऐसा हाई प्रोफाइल स्‍कूल होगा, जिसकी शिकायतें इतनी जल्‍दी आने लगीं।
समस्‍या है कहां
दरअसल, शिक्षा व्‍यवसाइयों से पेरेंट्स को होने वाली ऐसी समस्‍याएं न तो नई हैं और न अकेले Delhi Public School से जुड़ी हैं।
सच तो यह है कि ये सभी समस्‍याएं उस व्‍यवस्‍थागत खामियों का हिस्‍सा हैं जिनका भरपूर लाभ शिक्षा व्‍यवसाई उठाते हैं और पेरेंट्स को अपनी उंगलियों पर नचाते हैं।
वो भी तब जबकि अधिकांश स्‍कूल उन जरूरतों को भी पूरा नहीं करते जो किसी स्‍कूल को चलाने के लिए अत्यंत आवश्‍यक होती हैं।
‘सेटेलाइट’ और ‘कोर’ स्‍कूल 
अगर बात करें DPS Society के अधीन चलने वाले Delhi Public School’s की तो उसके दो स्‍तर हैं।
पहला स्‍तर ‘सेटेलाइट’ स्‍कूल्स का होता है जिसकी कमान DPS Society खुद अपने हाथ में रखती है और उनके लिए शिक्षा के सभी अपने मानक लागू करती है। इस स्‍तर का मथुरा में ‘मथुरा रिफाइनरी’ द्वारा संचलित DPS है।
दूसरे स्‍तर में वो स्‍कूल आते हैं जिन्‍हें DPS Society कुछ शर्तों के साथ स्‍कूल चलाने का अधिकार देती है। ये DPS के ‘कोर’ स्‍कूल कहलाते हैं। अकबरपुर (छाता) में शुरू किया गया DPS ऐसे ही ‘कोर’ स्‍कूलों में से एक है। इन स्‍कूलों का नियंत्रण उसकी प्रबंध कमेटी के हाथ में होता है।
छाता क्षेत्र के अकबरपुर में शुरू किया गया Delhi Public School शायद ऐसा भी पहला ही स्‍कूल होगा जिसका उद्घाटन स्‍कूल कैंपस में न कराकर मथुरा की सांसद और प्रसिद्ध सिने अभिनेत्री हेमा मालिनी से एक होटल में करा लिया गया।
अन्‍यथा इस स्‍कूल के संचालकों को ऐसी क्‍या जल्‍दी थी कि उन्‍होंने न सिर्फ आनन-फानन में उद्घाटन कराकर स्‍कूल का पहला सत्र शुरू कर दिया बल्‍कि सत्र शुरू करने से पहले उन सुविधाओं तक का इंतजाम नहीं किया जिनका जोर-शोर से प्रचार कराया गया था और जिनका बच्‍चों के पेरेंट्स को कमिटमेंट भी किया।
सामान्‍य तौर पर चूंकि लोग ‘सेटेलाइट’ और ‘कोर’ स्‍कूल के अंतर को नहीं जानते इसलिए मात्र “Delhi Public School” लिखा होने के कारण झांसे में आकर जाने-अनजाने बच्‍चों के भविष्‍य से खिलवाड़ करने लगते हैं।
आश्‍चर्य की बात यह है कि इन सुविधाओं में कोई अनोखी सुविधा शामिल नहीं थी। ये सभी वो सुविधाएं थीं जो इस स्‍तर के किसी भी स्‍कूल में आजकल सामान्‍यत: पाई जाती हैं। बावजूद इसके चंद दिनों के अंदर ही इस Delhi Public School की शिकायतों का अंबार लगने लगा है।
केडी मेडिकल कॉलेज के डॉक्‍टर्स ने की तीन पन्‍नों की लिखित शिकायत
सबसे ताजा मामला स्‍कूल के अत्‍यंत निकट स्‍थित केडी मेडिकल कॉलेज के उन डॉक्‍टर्स का है जिन्‍होंने नजदीक होने के कारण और स्‍कूल की मैनेजमेंट कमेटी पर भरोसा करके अपने बच्‍चों का यहां एडमिशन करा दिया।
कॉलेज के ऐसे डॉक्‍टर्स ने एक लिखित जनरल कंपलेंट करते हुए स्‍कूल की मैनेजमेंट कमेटी पर बच्‍चों को सुविधाएं मुहैया न कराने और पेरेंट्स से किए गए कमिटमेंट को पूरा न करने का आरोप लगाया है।
मेडिकल जैसे पेशे से जुड़े स्‍कूली बच्‍चों के इन पेरेंट्स का आरोप है कि Delhi Public School के मैनेजमेंट ने उनसे एडमिशन कराने से पूर्व जो वायदे किए थे, अब उनमें से किसी को पूरा नहीं किया जा रहा।
जैसे स्‍कूल प्रबंधन ने DPS के स्‍तर वाली सभी ट्रांसपोर्ट संबंधी सुविधाएं बच्‍चों को उपलब्‍ध कराने का वादा किया था लेकिन पहले दिन से लेकर आज तक कभी मेडिकल कॉलेज कैंपस में स्‍कूल बस टाइम से नहीं पहुंची। बस अक्‍सर एक से डेढ़ घंटे देर करती है, जिसके कारण बच्‍चों की शुरू की क्‍लासेस छूट जाती हैं।
शिकायत के अनुसार बच्‍चों के लिए स्‍कूल में एक फीमेल केयरटेकर उपलब्‍ध कराने का कमिटमेंट किया गया था, लेकिन वो भी पूरा नहीं किया जा रहा।
इसके अलावा स्‍कूल बस के अंदर क्षमता से अधिक बच्‍चे भरकर ले जाए जाते हैं जिस कारण भीषण गर्मी के इस दौर में बच्‍चों की तबियत खराब होने का खतरा बना रहता है। साथ ही सुरक्षा के लिहाज से भी बस सुरक्षित नहीं रहती।
पेरेंट्स का कहना है कि इस बारे में शिकायत करने पर स्‍कूल के मैनेजमेंट ने जल्‍द ही समस्‍याएं दूर करने का आश्‍वासन दिया लिहाजा वो निजी वाहनों से बच्‍चों को स्‍कूल छोड़ने जाने लगे किंतु समस्‍याओं का समाधान अब तक नहीं किया गया। इसके विपरीत बच्‍चों को स्‍कूल छोड़ने जाने वाले पेरेंट्स को गेट पर ही रोक दिया जाता है जबकि मेन गेट से स्‍कूल की बिल्‍डिंग काफी दूर है।
पेरेंट्स की एक शिकायत यह भी है कि एडमिशन से पहले उन्‍हें कहा गया था कि केडी मेडिकल कॉलेज से Delhi Public School की दूरी अधिकतम दो किलोमीटर होने के कारण वह इस कैंपस से आने वालों बच्‍चों की स्‍कूल बस फीस सामान्‍य फीस से आधी लेंगे किंतु अब पूअर बस सुविधा के बावजूद पूरी 1500 रुपए फीस वसूली जा रही है जो पूरी तरह नाजायज है।
पेरेंट्स की इन सभी शिकायतों के बारे में Delhi Public School को फोन करके मैनेजमेंट  का पक्ष जानना चाहा तो उधर से कुछ देर बाद जवाब देने की बात कही गई किंतु समाचार लिखे जाने तक कोई जवाब नहीं आया।
क्‍यों नहीं आया जवाब ? 
स्‍कूल प्रबंधन से जवाब न आने की सबसे बड़ी वजह स्‍कूल के संचालन में बेहिसाब खामियां होना तो है ही, साथ ही वो नियम व शर्तें भी अब तक पूरी न किया जाना है जो किसी भी स्‍कूल की मान्‍यता के लिए जरूरी होती हैं।
बताया जाता है कि मात्र कक्षा 7 तक के लिए शुरू किए गए इस Delhi Public School ने जिला स्‍तर पर बेसिक शिक्षा अधिकारी के यहां से जरूरी नियम व शर्तें भी फिलहाल पूरी नहीं की हैं जबकि उन नियम व शर्तों को पूरा किए बिना न तो मान्‍यता मिलना संभव है और न स्‍कूल के संचालन का अधिकार प्राप्‍त होता है।
ऐसे में यह माना जा सकता है कि शत-प्रतिशत सफलता की गारंटी वाले शिक्षा व्‍यवसाय को लोगों ने पेरेंट्स से सिर्फ और सिर्फ पैसा वसूलने का ज़रिया तो बना लिया है किंतु सुविधा और नियम-कानून ताक पर रख दिए हैं।
यदि ऐसा नहीं होता तो कैसे किसी नामचीन संस्‍था से जुड़ा स्‍कूल अपने पहले ही शिक्षा सत्र में पेरेंट्स को शिकायत करने का अवसर देता और कैसे शिकायत सुनने के बाद भी अपना पक्ष रखने की बजाय चुप्‍पी साध लेता।
-Legend News
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...