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गुरुवार, 10 सितंबर 2020

मुकुट मुखारबिंद मंदिर घोटाला: SIT रिपोर्ट दबाने के लिए भाजपा नेता के माध्‍यम से दी गई 50 लाख रुपए की मोटी रिश्‍वत, जानिए… फिर भी सच कैसे आया सामने?

 


नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के आदेश पर की गई यूपी SIT की जांच को मुकुट मुखारबिंद मंदिर के घोटालेबाजों ने 50 लाख रुपए की रिश्‍वत देकर दबाने का प्रयास किया था किंतु फिर भी वो अपने मकसद में सफल नहीं हुए, आखिर क्‍यों ?

इस सवाल का जवाब जानने से पहले ये जान लें कि करीब-करीब 100 करोड़ रुपए के इस घोटाले की नींव कब रखी गई और इसके पीछे कितने शातिर दिमाग काम कर रहे थे।
कैसे हुआ खुलासा
गोवर्धन स्‍थित मुकुट मुखारबिंद मंदिर में करोड़ों रुपए के घोटाले का खुलासा सबसे पहले दसविसा (गोवर्धन) निवासी राधारमन और प्रभुदयाल शर्मा ने किया। उन्‍होंने मंदिर के रिसीवर रमाकांत गोस्‍वामी पर ठेकेदारों की मिलीभगत से करोड़ों रुपए की हेराफेरी करने का आरोप लगाया था।
एनजीओ ने प्रेस कांफ्रेस करके लगाए गंभीर आरोप
इसके बाद 13 मई 2018 को इंपीरियल पब्‍लिक फाउंडेशन नामक NGO ने बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस करके मंदिर की संपत्ति में करोड़ों रुपए का घोटाला मंदिर के रिसीवर रमाकांत गोस्‍वामी द्वारा ही अपने गुर्गों के साथ मिलकर किए जाने की जानकारी दी।
उन्‍होंने बताया कि अपर सिविल जज प्रथम मथुरा के आदेश से मुकुट मुखारबिंद मंदिर के रिसीवर नियुक्‍त किए गए रमाकांत गोस्‍वामी ने अपने अधिकारों का दुरुपयोग कर करोड़ों रुपए की संपत्ति हड़प ली है।
इंपीरियल पब्‍लिक फाउंडेशन द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्‍ति में बताया गया कि वर्ष 2010 में रमाकांत गोस्‍वामी ने न्‍यायालय के समक्ष इस आशय का एक प्रस्‍ताव रखा कि मुकुट मुखारबिंद मंदिर का प्रबंधतंत्र मंदिर के पैसों से एक अस्‍पताल बनवाना चाहता है।
रमाकांत गोस्‍वामी का यह प्रस्‍ताव न्‍यायालय के पीठासीन अधिकारी को “इतना पसंद आया” कि उन्‍होंने न सिर्फ मंदिर के पैसों से अस्‍पताल बनवाने का प्रस्‍ताव स्‍वीकार कर लिया बल्‍कि रिसीवर रमाकांत गोस्‍वामी को ही उसके लिए आवश्‍यक जमीन खरीदने के अधिकार भी सौंप दिए।
रमाकांत गोस्‍वामी भी यही चाहते थे इसलिए उन्‍होंने तत्‍काल एक जमीन का इकरार नामा पहले तो मात्र 40 लाख रुपयों में अपने खास मित्रों के नाम करवाया और फिर 4 महीने बाद ही उसी जमीन को उसके असली मालिक से 2 करोड़ 30 लाख रुपए में मंदिर के नाम खरीद लिया।
कारनामे को अंजाम तक पहुंचाने के लिए रमाकांत गोस्‍वामी ने अपने मित्रों को द्वितीय पक्ष दिखा दिया जबकि जमीन के असली मालिक को प्रथम पक्ष बताया।
इस तरह सिर्फ चार महीने के अंतराल में मंदिर को बड़ी चालाकी के साथ करीब एक करोड़ 90 लाख रुपए का चूना लगा दिया गया।
रमाकांत गोस्‍वामी यहीं नहीं रुके, इसके बाद उन्‍होंने मंदिर को विस्‍तार देने की आड़ में 5 अगस्‍त 2011 को अपने मित्रों से ‘खास महल’ नामक एक संपत्ति 2 करोड़ 70 लाख रुपयों में खरीद ली।
वर्ष 2011 में अपनी साजिश सफल हो जाने पर रिसीवर रमाकांत गोस्‍वामी के हौसले बुलंद हो गए अत: उन्‍होंने वर्ष 2014-15 में फिर मंदिर की ढाई करोड़ रुपयों से अधिक की धनराशि का गबन किया। इसी प्रकार वर्ष 2015-16 में पौने चार करोड़ का, 16-17 में पौने छ: करोड़ रुपयों का घोटाला किया गया।
इतना सब हो जाने पर भी कोई कार्यवाही होते न देख इंपीरियल पब्‍लिक फाउंडेशन ने 05 जून 2018 को तहसील दिवस में एक शिकायती पत्र दिया, जिसके बाद जिलाधिकारी ने समस्‍त प्रकरण की जांच एसडीएम गोवर्धन नागेन्‍द्र कुमार सिंह के हवाले कर दी। इस जांच में एनजीओ द्वारा रमाकांत गोस्‍वामी पर लगाए गए सभी आरोप प्रथम दृष्‍टया सही पाये गए हैं।
गौरतलब है कि इन्‍हीं घोटालों की शिकायत इंपीरियल पब्‍लिक फाउंडेशन ने एनजीटी में भी की थी, जिसके बाद एनजीटी ने एसआईटी का गठन कर जांच कराने के आदेश दिए थे।
चारों ओर से खुद को फंसता देख रिसीवर रमाकांत गोस्‍वामी ने एक ओर जहां बड़े-बड़े विज्ञापन देकर मीडिया को चुप रखने की कोशिश की वहीं दूसरी ओर अपने राजनीतिक रसूखों के बल पर SIT की जांच को प्रभावित करने का प्रयास किया।
दी गई 50 लाख रुपयों की रिश्‍वत
घोटालेबाजों ने लगभग चार महीने पहले इसके लिए मथुरा में भाजपा के एक ऐसे पदाधिकारी से संपर्क किया जिसके गहरे संबंध और यहां तक कि रिश्‍तेदारी भी प्रदेश स्‍तरीय पदाधिकारी से है।
बताया जाता है कि एसआईटी की जांच को प्रभावित करने तथा उसे ठंडे बस्‍ते में डलवाने के लिए 50 लाख रुपए लखनऊ जाकर दिए गए और उसके बाद न सिर्फ यह मान लिया गया कि सब-कुछ समाप्‍त हो गया है बल्‍कि सार्वजनिक तौर पर इसका ढिंढोरा भी पीटा गया।
फिर भी सच कैसे आया सामने
इतना करने के बावजूद घोटालेबाज अपने मकसद में इसलिए कामयाब नहीं हुए और इसलिए अंतत: एसआईटी को अपनी जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करनी पड़ी क्‍योंकि गोवर्धन के ही दसबिसा निवासी हरीबाबू शर्मा पुत्र मोहन लाल शर्मा ने गत दिनों इलाहाबाइ हाईकोर्ट में एक याचिका डालने की पूरी तैयारी कर उसमें प्रिंसिपल सेक्रेट्री (होम) उत्तर प्रदेश तथा डीआईजी (एसआईटी) लखनऊ को भी पार्टी बनाने के मकसद से अपने वकील सत्‍येन्‍द्र नारायाण सिंह के जरिए याचिका की कॉपी भेज दी।
दरअसल, हरीबाबू ऐसा करने के लिए तब मजबूर हुए जब उन्‍हें आरटीआई के माध्‍यम से यह जानकारी मिली कि जांच एजेंसी अपना काम पूरा करके रिपोर्ट शासन को दे चुकी है।
ये पता लगने के बाद हरीबाबू को यकीन हो गया कि घोटालेबाजों द्वारा किया गया दावा सही था कि वह एसआईटी की जांच को ठंडे बस्‍ते में डलवा चुके हैं।
अब जबकि हरीबाबू द्वारा प्रिंसिपल सेक्रेट्री (होम) उत्तर प्रदेश तथा डीआईजी (एसआईटी) को पार्टी बनाने की सूचना मिली तो हड़कंप मचना स्‍वाभाविक था लिहाजा तुरंत शासन स्‍तर से एक ओर जहां एसआईटी की जांच रिपोर्ट को सामने रख दिया गया वहीं दूसरी ओर 11 आरोपियों के खिलाफ एफआईआर कराने के आदेश भी कर दिए गए।
इस संबंध में पूछे जाने पर हरीबाबू शर्मा ने बताया कि एसआईटी की जांच रिपोर्ट के आधार पर एफआईआर दर्ज कर लिए जाने के बाद भी वह न्‍यायालय के माध्‍यम से मुकुट मुखारबिंद और दानघाटी मंदिर में हुए उन घोटालों को सामने लाने की लड़ाई लड़ते रहेंगे जो अभी दबे हुए हैं और जिन्‍हें इस गिरोह ने अंजाम दिया है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

बुधवार, 7 अगस्त 2019

ये हैं रमाकांत गोस्‍वामी…नाम तो सुना ही होगा, अब कारनामे भी सुन लीजिए…

जब न्‍यायिक व्‍यवस्‍था, प्रशासनिक अव्‍यवस्‍था और धार्मिक संस्‍थाओं की कुव्‍यवस्‍थाओं से उपजा कॉकस (Caucus) कोई दुरभि संधि करता है तब रमाकांत गोस्‍वामी जैसे लोग सुर्खियों में आते हैं।
चूंकि इनका उदय ही किसी दुरभि संधि के तहत होता है इसलिए आसानी से इनका बाल बांका नहीं हो पाता।
यही कारण है कि गोवर्धन स्‍थित मुकुट मुखारबिंद मंदिर में करोड़ों रुपए की हेराफेरी करने का आरोप होने बावजूद रिसीवर रमाकांत गोस्‍वामी खुली हवा में सांस ले रहे हैं और यथासंभव सबूतों से भी छेड़छाड़ कर रहे हैं।
रमाकांत गोस्‍वामी के कारनामों की जानकारी देने के लिए 13 मई 2018 को इंपीरियल पब्‍लिक फाउंडेशन नामक एनजीओ ने बाकायदा एक प्रेस कांफ्रेंस करके बताया कि अपर सिविल जज प्रथम मथुरा के आदेश से गोवर्धन स्‍थित मुकुट मुखारबिंद मंदिर के रिसीवर नियुक्‍त किए गए रमाकांत गोस्‍वामी ने अपने अधिकारों का दुरुपयोग कर करोड़ों रुपए की संपत्ति हड़पी है।
एनजीओ के चेयरमैन रजत नारायण के अनुसार रमाकांत गोस्‍वामी का कारनामा ठीक उसी तरह का है जिस तरह का कारनामा करने पर कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा के पति रॉबर्ट वाड्रा आज तमाम जांच एजेंसियों के चक्‍कर काट रहे हैं।
इंपीरियल पब्‍लिक फाउंडेशन द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्‍ति में बताया गया कि वर्ष 2010 में रमाकांत गोस्‍वामी ने न्‍यायालय के समक्ष इस आशय का एक प्रस्‍ताव रखा कि मुकुट मुखारबिंद मंदिर का प्रबंधतंत्र मंदिर के पैसों से एक अस्‍पताल बनवाना चाहता है।
रमाकांत गोस्‍वामी का यह प्रस्‍ताव न्‍यायालय के पीठासीन अधिकारी को इतना पसंद आया कि उन्‍होंने न सिर्फ मंदिर के पैसों से अस्‍पताल बनवाने का प्रस्‍ताव स्‍वीकार कर लिया बल्‍कि रिसीवर रमाकांत गोस्‍वामी को ही उसके लिए आवश्‍यक जमीन खरीदने के अधिकार भी सौंप दिए।
रमाकांत गोस्‍वामी यही तो चाहते थे इसलिए उन्‍होंने तत्‍काल एक जमीन का इकरार नामा पहले तो अपने खास मित्रों के नाम मात्र 40 लाख रुपयों में करवाया और फिर मात्र 4 महीने बाद उसी जमीन को उसके असली मालिक से 2 करोड़ 30 लाख रुपए में मंदिर के नाम खरीद लिया।
कारनामे को अंजाम तक पहुंचाने के लिए रमाकांत गोस्‍वामी ने अपने मित्रों को द्वितीय पक्ष दिखा दिया जबकि जमीन के असली मालिक को प्रथम पक्ष बताया।
इस तरह सिर्फ चार महीने के अंतराल में मंदिर को बड़ी चालाकी के साथ करीब एक करोड़ 90 लाख रुपए का चूना लगा दिया गया।
रमाकांत गोस्‍वामी यहीं नहीं रुके, इसके बाद उन्‍होंने मंदिर को विस्‍तार देने की आड़ में 5 अगस्‍त 2011 को अपने मित्रों से ‘खास महल’ नामक एक संपत्ति 2 करोड़ 70 लाख रुपयों में खरीदी।
वर्ष 2011 में अपनी साजिश सफल हो जाने पर रिसीवर रमाकांत गोस्‍वामी के हौसले बुलंद हो गए अत: उन्‍होंने वर्ष 2014-15 में फिर मंदिर की ढाई करोड़ रुपयों से अधिक की धनराशि का गबन किया।
इसी प्रकार वर्ष 2015-16 में पौने चार करोड़ का, 16-17 में पौने छ: करोड़ रुपयों का घोटाला किया गया।
इतना सब हो जाने पर भी कोई कार्यवाही होते न देख इंपीरियल पब्‍लिक फाउंडेशन ने 05 जून 2018 को तहसील दिवस में एक शिकायती पत्र दिया, जिसके बाद जिलाधिकारी ने समस्‍त प्रकरण की जांच एसडीएम गोवर्धन के हवाले कर दी।
इंपीरियल पब्‍लिक फाउंडेशन के अध्‍यक्ष ने बताया कि उसके बाद से लेकर अब तक वह इस संबंध में डीएम मथुरा को सात पत्र और लिख चुके हैं किंतु फिलहाल कोई नतीजा सामने नहीं आया।
हां, इतना जरूर हुआ कि एनजीओ के अध्‍यक्ष रजत नारायण ने गत दो दिन पूर्व जब डीएम से मुलाकात की तो उन्‍होंने रजत नारायण को अवगत कराया कि एनजीओ द्वारा रमाकांत गोस्‍वामी पर लगाए गए सभी आरोप एसडीएम की जांच में प्रथम दृष्‍टया सही पाये गए हैं।
गौरतलब है कि इन्‍हीं घोटालों की शिकायत इंपीरियल पब्‍लिक फाउंडेशन ने एनजीटी में भी की थी, जिसके बाद एनजीटी ने एसआईटी का गठन कर जांच कराने के आदेश दिए थे।
एसआईटी की टीम अपनी जांच के संदर्भ में इन दिनों मथुरा आई हुई है और उसने रिसीवर रमाकांत गोस्‍वामी से पूछताछ भी की है।
रमाकांत गोस्‍वामी ने भी एसआईटी द्वारा उनसे की गई पूछताछ की पुष्‍टि करते हुए बताया कि जांच कमेटी ने उनसे कुछ दस्‍वावेजों की भी मांग की है जिन्‍हें वह आज उपलब्‍ध कराने वाले हैं।
इससे पहले दसविसा (गोवर्धन) निवासी राधारमन और प्रभुदयाल शर्मा ने मंदिर के रिसीवर रमाकांत गोस्‍वामी पर ठेकेदारों की मिलीभगत से करोड़ों रुपए की हेराफेरी करने का आरोप लगाया था।
इन आरोपों की जांच भी एसडीएम गोवर्धन नागेन्‍द्र कुमार सिंह द्वारा की गई और उन्‍होंने प्रथम दृष्‍ट्या रिसीवर रमाकांत गोस्‍वामी पर लगाए गए आरोपों को सही पाया।
गुरूपूर्णिमा पर दिया गया विज्ञापन भी चर्चा में 
इस बीच गुरूपूर्णिमा पर रमाकांत गोस्‍वामी द्वारा आगरा से प्रकाशित एक प्रमुख अखबार को मुकुट मुखारबिंद मंदिर के रिसीवर की हैसियत से पूरे पन्‍ने का मुखपृष्‍ठ कलर विज्ञापन देना भी चर्चित है।
उस विज्ञापन की चर्चा के पीछे रमाकांत गोस्‍वामी की हैसियत है। लोग पूछ रहे हैं कि आखिर उस विज्ञापन का भुगतान अखबार को किस मद से किया गया।
बताया जाता है कि मंदिर के लिए निर्धारित न्‍यायिक व्‍यवस्‍था के अनुसार रिसीवर को मात्र 10 हजार रुपए खर्च करने का अधिकार है। इससे ऊपर के सभी खर्चों के लिए न्‍यायालय की इजाजत लेना जरूरी है।
इन हालातों में सवाल यह उठ रहे हैं कि रमाकांत गोस्‍वामी ने रिसीवर की हैसियत से लाखों रुपए का विज्ञापन कैसे छपवा दिया, और उसका भुगतान किस तरह किया।
रमाकांत गोस्‍वामी का इस विषय में कहना है कि उन्‍होंने तो अखबार को विज्ञापन के एवज में मात्र 5 हजार रुपए का भुगतान किया है।
ज्‍यादा पूछने पर वह यह भी कहते हैं कि उनका अपना अखबार पर कुछ बकाया चला आ रहा था।
रमाकांत गोस्‍वामी का अखबार पर कैसा बकाया हो सकता है और उसे अखबार के मालिकान विज्ञापन की धनराशि में क्‍यों एडजस्‍ट करेंगे, यह बात रमाकांत गोस्‍वामी के अलावा शायद ही किसी अन्‍य को हजम होगी।
शायद इसीलिए रमाकांत गोस्‍वामी यह कहकर पल्‍ला झाड़ लेते हैं कि अखबार ने कैसे इतना बड़ा विज्ञापन 5 हजार रुपए में छापा, यह अखबार ही बता सकता है। मैंने तो 05 हजार रुपए का ही भुगतान किया है।
जांच और लूट साथ-साथ जारी 
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे रोचक पहलू यह है कि एक ओर जहां इंपीरियल पब्‍लिक फाउंडेशन की शिकायत और एनजीटी के आदेश-निर्देशों पर रमाकांत गोस्‍वामी के खिलाफ जांच चल रही है वहीं रमाकांत गोस्‍वामी रिसीवर की हैसियत से न सिर्फ लगातार अधिकारों का अतिक्रमण कर रहे हैं बल्‍कि मंदिर की धनराशि का मनमाना इस्‍तेमाल भी कर रहे हैं जो एक और किसी बड़े घोटाले की साजिश का हिस्‍सा हो सकता है।
हालांकि इंपीरियल पब्‍लिक फाउंडेशन के अध्‍यक्ष रजत नारायण का कहना है कि वह सारे सबूतों के साथ केंद्रीय सतर्कता आयोग भी गए थे किंतु वहां से बताया गया कि उसके द्वारा केवल केंद्रीय कर्मचारियों से जुड़े मामलों का संज्ञान लिया जा सकता है। निजी संस्‍थाओं का संज्ञान वह नहीं ले सकता। इसके बावजूद रजत नारायण निराश नहीं हैं। वो कहते हैं कि हमारी संस्‍था लगातार इस भ्रष्‍टाचार को सक्षम अधिकारियों के समक्ष उठाती रहेगी जिससे रमाकांत को अविलंब हिरासत में लेकर कठोर कार्यवाही की जा सके और जल्‍द से जल्‍द मुकुट मुखारबिंद मंदिर की संपत्ति को लूटने का सिलसिला बंद हो।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

रविवार, 21 जुलाई 2019

गोवर्धन की जनता का सवाल: जब दानघाटी मंदिर के घोटालेबाज जेल में तो मुकुट मुखारबिंद के रिसीवर बाहर क्‍यों ?

मथुरा। ऐसा लगता है कि गोवर्धन के प्रसिद्ध मंदिरों में खुली लूट की छूट इरादतन दी जा रही है क्‍योंकि दानघाटी मंदिर में हुए करोड़ों रुपए के घपले के बावजूद इसे रोकने का कोई प्रयास नहीं किया जा रहा।
ऐसी आशंका के पीछे मुकुट मुखारबिंद मंदिर के रिसीवर रमाकांत गोस्‍वामी को अब तक लगभग उसी प्रकार के असीमित अधिकार प्राप्‍त होना है जिस प्रकार दानघाटी मंदिर के सहायक प्रबंधक डालचंद चौधरी को उसके जेल जाने से पहले तक प्राप्‍त थे।
दानघाटी मंदिर में हुए करीब 14 करोड़ रुपए के घपले की सुनवाई करते हुए न्‍यायिक अधिकारी अमर सिंह ने अपने पूर्ववर्ती न्‍यायिक अधिकारी पर बड़ी तल्‍ख टिप्‍पणी की है।
पीठासीन अधिकारी अमर सिंह के अनुसार दानघाटी मंदिर गोवर्धन में आज सामने आए करोड़ों रुपए के घोटाले की नींव 2014 में तत्‍कालीन पीठासीन अधिकारी के उस निर्णय से ही रख दी गई थी जिसमें उन्‍होंने डालचंद चौधरी को असीमित अधिकार दे दिए।
वर्तमान अधिकारी अमर सिंह का कहना है कि तत्‍कालीन अधिकारी द्वारा बोया गया अनियमितताओं का बीज ही आज करीब 14 करोड़ रुपए से अधिक की हेराफेरी के रूप में सामने खड़ा है।
दानघाटी मंदिर की ही भांति मुकुट मुखारबिंद मंदिर का मामला भी सिविल जज सीनियर डिवीजन चतुर्थ के न्‍यायालय में लंबित है।
इसके अलावा मुकुट मुखारबिंद मंदिर के रिसीवर रमाकांत गोस्‍वामी पर वित्तीय अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए एक शिकायत गत दिनों समाज के ही लोगों ने की थी।
दसविसा (गोवर्धन) निवासी राधारमन और प्रभुदयाल शर्मा ने मंदिर के रिसीवर रमाकांत गोस्‍वामी पर ठेकेदारों की मिलीभगत से करोड़ों रुपए की हेराफेरी करने का आरोप लगाया।
इन आरोपों की जांच एसडीएम गोवर्धन नागेन्‍द्र कुमार सिंह द्वारा की गई और उन्‍होंने प्रथम दृष्‍ट्या रिसीवर रमाकांत गोस्‍वामी पर लगाए गए आरोपों को सही पाया।
दरअसल, न्‍यायिक व्‍यवस्‍था के अनुसार रिसीवर को प्रत्‍येक दो माह में मंदिर का हिसाब-किताब पूरे स्‍टेटमेंट और बिल-बाउचर सहित न्‍यायालय के समक्ष प्रस्‍तुत करना अनिवार्य है।
इसके अलावा 10 हजार रुपए से ऊपर के सभी खर्चों के लिए भी न्‍यायालय की अनुमति आवश्‍यक है।
एसडीएम गोवर्धन नागेन्‍द्र कुमार सिंह ने अपनी जांच आख्‍या में लिखा है कि मंदिर के रिसीवर द्वारा भूमि क्रय करने, फूल बंगले और पेंशन आदि के संबंध में न्‍यायालय की अनुमति लेने का कोई सबूत पेश नहीं किया गया। जिससे परिलक्षित होता है कि मंदिर के रिसीवर ने अपने कर्तव्‍यों का निर्वहन न करते हुए घोर लापरवाही पूर्वक मंदिर की संपत्ति का दुरुपयोग किया।
इन हालातों में यह सवाल उठना स्‍वाभाविक है कि क्‍या डालचंद चौधरी की तरह रमाकांत गोस्‍वामी को भी किसी स्‍तर से संरक्षण प्राप्‍त है और इसीलिए उन्‍हें मुड़िया पूर्णिमा जैसे पर्व पर भी सभी अधिकारों सहित मंदिर के रिसीवर का दायित्‍व सौंप रखा है।
गौरतलब है कि गोवर्धन का मुड़िया पूर्णिमा मेला देश ही नहीं विदेशों तक में मशहूर है और इस अवसर पर देश-विदेश से लाखों की तादाद में लोग गोवर्धन आते हैं। इसके लिए मंदिरों की भेंट-पूजा का ठेका अलग से उठाया जाता है क्‍योंकि साल में सर्वाधिक आमदनी इन्‍हीं दिनों में होती है।
इस चार दिवसीय मेले की भारी कमाई को देखते हुए ”दानघाटी मंदिर” की व्‍यवस्‍थाएं तो न्‍यायपालिका के स्‍तर से की गई हैं किंतु ”मुकुट मुखारबिंद मंदिर” की व्‍यवस्‍थाएं पहले की ही तरह ”रिसीवर” के हाथों में हैं।
इन हालातों में यदि रिसीवर रमाकांत गोस्‍वामी की मनमानी पर समय रहते अंकुश नहीं लगा तो दानघाटी मंदिर की तरह मुकुट मुखारबिंद मंदिर की संपत्ति का भी बड़ा घपला सामने आने की पूरी संभावना है।
शायद यही कारण है कि शिकायकर्ताओं के अलावा गोवर्धन के धर्म परायण लोग, आम जनता और श्रद्धालु भी यह पूछने लगे हैं कि जब एक ही प्रवृत्ति के दो अपराध सामने हैं और आरोप भी एक जैसे हैं तो मुकुट मुखारबिंद के रिसीवर रमाकांत गोस्‍वामी जेल से बाहर कैसे हैं जबकि दानघाटी मंदिर के सहायक प्रबंधक डालचंद चौधरी सलाखों के पीछे भेजे जा चुके हैं।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
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