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बुधवार, 29 अक्टूबर 2014

कालाधन: खेल की दुनिया से लेकर बॉलीवुड तक के लोग

नई दिल्ली। 
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को काला धन मामले में 627 खाताधारकों की सूची तो सौंप दी है लेकिन जानकारों के मुताबिक़ काला धन वापस लाने की दिशा में यह नाकाफ़ी है.
नाम भर पता लगने से काला धन वापस आ जाएगा, ऐसा नहीं हैं. हाँ, इतना ज़रूर है कि इससे जांच का रास्ता खुलेगा.
काले धन की वापसी पर अब तक क्या रहा है ख़ास और कितना है काला धन. बता रहे हैं प्रोफ़ेसर आर वैद्यनाथन:
1- कालाधन सबसे अधिक सेक्यूलर हैं. इसमें सिर्फ़ राजनीतिक दल ही नहीं बल्कि सारे वर्ग, संप्रदाय और तबक़े के लोग शामिल हैं. खेल की दुनिया से लेकर बॉलीवुड तक के लोग सब इसमें शामिल हैं, यहां तक कि मीडिया के भी.
2- विदेशों में जमा ये काला धन सिर्फ़ कर चोरी से संबंधित नहीं इसके साथ ड्रग, हवाला, अवैध हथियार और चरमपंथ जैसी चीज़ें जुड़ी हुई हैं.
3- ये काला धन शेयर, बाँन्ड्स के अलावा सोना, क़ीमती पत्थर, हीरा, ज़ेवरात जैसे कई रूपों में कई लॉकरों में मौजूद हैं.
4- मेरे अनुमान के मुताबिक़ ये काला धन 500 अरब डॉलर के बराबर होगा.
5- सोशल मीडिया की भी काला धन लाने में महत्वपूर्ण भूमिका होगी. देश के लोगों की इसे वापस लाने में अब दिलचस्पी है.
6- 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा था कि नामों का ख़ुलासा करने से विदेशों के साथ किसी भी संधि का उल्लंघन नहीं होता है. सरकार का तर्क था कि दोहरा कराधान बचाव संधि (डीटीएए) की वजह से विदेशी बैंकों में जमा काला धन खाताधारकों के नाम उजागर नहीं किए जा सकते हैं.
7- किसी भी चुराए हुए डेटा को लेने में किसी भी तरह की संधि का उल्लंघन नहीं होता है. यह सबके लिए उपलब्ध होता है.
8- अभी तो सिर्फ़ नाम दिए जा रहे हैं, कालाधन वापस लाने में पांच से दस साल लग सकते हैं. हमारे सामने फ़िलीपिंस, पेरू और नाइजीरिया जैसे देशों का उदाहरण है जिन्हें काला धन वापस लाने में काफ़ी वक़्त लग गया था.

शुक्रवार, 27 जून 2014

सावधान! क्‍या आप भी देख रहे हैं घर का सपना

(लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष)
यह खबर उन लोगों के लिए है जो अपनी मेहनत की कमाई से अपने एक अदद आशियाने का सपना पूरा करना चाहते हैं।
यह खबर उन लोगों के लिए भी है जो अपने परिवार का सिर ढंकने की खातिर जिंदगीभर के लिए अपने सिर पर बैंक का ऐसा कर्ज लाद लेते हैं, जिसकी भरपाई करना नामुमकिन न सही लेकिन बहुत कठिन अवश्‍य हो जाता है।

उन लोगों के लिए भी है यह खबर जो डेवलेपमेंट अथॉरिटी से अप्रूवल का विज्ञापन भर देखकर बिल्‍डर या प्रमोटर पर आंख बंद करके भरोसा कर लेते हैं और उसके द्वारा दिखाए जाने वाले सब्‍ज़बागों का कहीं किसी स्‍तर से सत्‍यापन नहीं करते।
हाल ही में देश की सर्वोच्‍च अदालत ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानि एनजीटी के फैसले पर अपनी मोहर लगाते हुए रीयल एस्‍टेट का बड़ा नाम जेपी इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर की याचिका को खारिज कर दिया। यह याचिका ओखला पक्षी विहार के आसपास चल रहे निर्माण कार्य पर एनजीटी द्वारा रोक लगाये जाने के खिलाफ थी। कोर्ट के इस फैसले के बाद करीब 20 हजार लोगों का फ्लैट मिलने का सपना अधर में लटक गया है।
एनजीटी ने 28 अक्टूबर, 2013 को अपने फैसले में कहा था कि ओखला पक्षी विहार के दस किलोमीटर का दायरा पर्यावरणीय और पारिस्थितिकीय दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र में आता है। ऐसे में यहां बन रही इमारतों को कम्प्लीशन सर्टिफिकेट नहीं दिया जाएगा।
जेपी की तरफ से कोर्ट में दलील दी गई थी कि इन इलाकों में करीब चार हजार फ्लैट तैयार हो चुके हैं। ऐसे में अगर नोएडा अथॉरिटी फ्लैट्स के कम्पलीशन सर्टिफिकेट जारी नहीं करता है तो खरीददारों को फ्लैट्स पर कब्जा नहीं मिल सकेगा।
कोर्ट के इस फैसले से नोएडा में जेपी इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर के अलावा ओखला पक्षी विहार के दायरे में आने वाले आम्रपाली, एटीएस, लॉजिक्स, गुलशन, सुपरटेक और अजनारा जैसे रीयल एस्‍टेट कंपनियों के प्रोजेक्‍ट प्रभावित होंगे।
इसके अलावा मुंबई की कैंपा कोला सोसायटी का केस भी सामने है जिसमें 25 साल पूर्व बने 96 फ्लैट्स को सुप्रीम कोर्ट ने अवैध मानते हुए उन्‍हें गिराने का आदेश दे दिया। आज वहां रहने वालों की सासें अटकी हुई हैं। उनके पानी, बिजली व गैस के कनैक्‍शन काट दिये गये हैं और वो पूरी तरह शासन व प्रशासन के रहमो-करम पर निर्भर हैं।
भ्रष्‍टाचार से उपजी ऐसी व्‍यवस्‍थागत खामियों के चलते नि:संदेह ये हालात किसी एक शहर या एक प्रदेश के नहीं हैं, पूरे देश के हैं। कोई प्रदेश, कोई जिला और यहां तक कि कोई कस्‍बा इससे अब अछूता नहीं रहा लेकिन खामी लोगों की सोच में भी है।
वह सोच जो ''सब-कुछ चलता है'' के जुमले को आत्‍मसात कर चुकी है और जिसके कारण भ्रष्‍टाचार व बेईमानी का कारोबार दिन दूना व रात चौगुना फल-फूल रहा है। जिसके कारण हर सरकारी मुलाजिम और प्रत्‍येक अफसर रिश्‍वत से अपनी तिजोरी भरने के लिए कानून को ताक पर रखने में कोई गुरेज़ नहीं करता। फिर चाहे उनकी वजह से आम आदमी की जान व माल पर क्‍यों न बन आए।
फिलहाल बात करते हैं विश्‍व के नक्‍शे में एक विशिष्‍ट स्‍थान रखने वाले धार्मिक जनपद मथुरा की।
विकास को परिभाषित करने वाले दूसरे तमाम आयाम भले ही मथुरा में कहीं दिखाई न देते हों परंतु बहुमंजिला इमारतों एवं अप्रूव्‍ड कॉलोनियों के मामले में यह धार्मिक जनपद दिल्‍ली एनसीआर से टक्‍कर लेता प्रतीत होता है।
यहां 9 से लेकर 14 मंजिला तक रिहायशी इमारतें निर्माणाधीन हैं और 3 व 6 मंजिला कई इमारतें बनकर खड़ी हो चुकी हैं।
राष्‍ट्रीय राजधानी दिल्‍ली से मात्र 146 किलोमीटर दूर और राष्‍ट्रीय राजमार्ग नंबर दो के किनारे बसे इस धार्मिक जनपद में तरक्‍की यदि कहीं दिखाई देती है तो इन इमारतों से ही दिखाई देती है।
इनके अलावा भी यहां एक ओर सैंकड़ों एकड़ में फैली गेटबंद कॉलोनियां हैं तो दूसरी ओर व्‍यावसायिक कॉम्‍पलेक्‍स हैं। जाहिर है कि इन सबको डेवलेपमेंट अथॉरिटी से अप्रूव्‍ड बताया जाता है और यही प्रचार भी किया जाता है। सड़क के दोनों ओर, छतों और खेत खलिहानों के बीच लगे बड़े-बड़े होड्रिंग्‍स इसकी पुष्‍टि कर सकते हैं। यह बात अलग है कि इस सबके बावजूद जनपद में ऐसी अवैध रिहायशी एवं व्‍यावसायिक इमारतों की संख्‍या सैंकड़ों में है जिन्‍हें प्रशासन बाकायदा चिन्‍हित कर चुका है।
इन अवैध इमारतों की बात फिलहाल छोड़ दी जाए और सिर्फ उन इमारतों की बात की जाए जिन्‍हें मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण से अप्रूव्‍ड प्रचारित करके रीयल एस्‍टेट के कारोबारी अपनी जेबें भर रहे हैं, तो उन इमारतों की सच्‍चाई किसी के भी पैरों के नीचे से जमीन खिसका देने को काफी है।
दरअसल जिन रेजीडेंशियल व कॉमर्शियल इमारतों को डेवलेपमेंट अथॉर्टी से अप्रूव्‍ड प्रचारित किया जाता है, उनका कोई एक हिस्‍सा ही अप्रूव्‍ड होता है और बाकी सब प्रस्‍तावित रहता है। भ्रष्‍टाचार पर भरोसे के चलते रीयल एस्‍टेट के कारोबारी न केवल पूरे प्रोजेक्‍ट को अप्रूव्‍ड प्रचारित कर देते हैं बल्‍कि भूकंपरोधी जैसी अनेक खूबियों से सुसज्‍जित बताते हैं जबकि किसी भी भवन को भूकंपरोधी बनाने की एक जटिल प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में सॉइल टेस्‍ट (मृदा परीक्षण) से लेकर निर्माण में इस्‍तेमाल की जाने वाली सामग्री की गुणवत्‍ता तक शामिल है और इन सबके अलग-अलग विशेषज्ञ होते हैं जो निर्माण के साथ-साथ उसके लिए सर्टीफिकेट जारी करते हैं।
डेवलेपमेंट अथॉर्टी का काम केवल नक्‍शा पास करने भर का न होकर, वह सब देखना भी है जिसके बारे में बिल्‍डर विज्ञापनों के जरिए प्रचाारित कर रहा है लेकिन आज तक किसी फर्जी विज्ञापन पर अथॉरिटी ने कोई कार्यवाही की हो, ऐसा संज्ञान में नहीं आया जबकि ऐसे ढेरों विज्ञापन सामने हैं।
मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के ही सूत्र बताते हैं कि अप्रूवल की आड़ में निर्माणाधीन कोई प्रोजेक्‍ट ऐसा नहीं है जहां अनियमितताएं न बरती जा रही हों।
कई बड़े प्रोजेक्‍ट तो ऐसे हैं जिनका आधे से अधिक हिस्‍सा अवैध है लेकिन उनके खिलाफ कोई कार्यवाही आज तक अमल में नहीं लाई गई।
राष्‍ट्रीय राजमार्ग के किनारे शहर में बन रहे ऐसे प्रोजेक्‍ट्स पर आश्‍चर्यजनक रूप से बैंके भी फाइनेंस कर रही हैं।
सूत्रों की मानें तो कई प्रोजेक्‍ट मालिकों ने बैंकों को भी धोखे में रखा हुआ है, यहां तक कि संबंधित विभागों की नकली स्‍टांप लगाकर फर्जी नक्‍शा आदि जमा करा दिया गया है और उन्‍हीं के आधार पर बैंकें फाइनेंस कर रही हैं।
चूंकि हाउसिंग फाइनेंस करने वाली अधिकांश बैंकों के लीगल एडवाजर, फील्‍ड ऑफीसर एवं मैनेजर आदि सब बिल्‍डर से सेट होते हैं, साथ ही कर्ज लेने वाले से भी सुविधा शुल्‍क प्राप्‍त करते हैं, इसलिए वह किसी डॉक्‍यूमेंट के असली होने की पुष्‍टि नहीं करते। विशेष रूप से यह तो कतई नहीं देखते कि जिस जमीन पर प्रोजेक्‍ट खड़ा किया जा रहा है, उसकी असलियत क्‍या है।
वह केवल डेवलेपमेंट अथॉरिटी की परमीशन भर देखकर संतुष्‍ट हो जाते हैं।
दूसरी ओर एक अदद घर अपना होने का सपना पाले बैठा व्‍यक्‍ति यह मान लेता है कि जब बैंक को कर्ज देने में आपत्‍ति नहीं है, तो सब-कुछ ठीक ही होगा।
यदि कभी कोई व्‍यक्‍ति बिल्‍डर से जमीन के कागजातों अथवा नक्‍शे आदि की मांग करता है तो उससे कह दिया जाता है कि सबके लिए अलग-अलग कहां तक बांटेंगे लिहाजा बैंक में सारे पेपर जमा हैं, आप अपना फाइनेंस कराइए। कोई परेशानी आए, तब बताइयेगा।
उधर दलालों से हर वक्‍त घिरे रहने वाले विकास प्राधिकरण के अधिकारियों को यह देखने की फुर्सत नहीं मिलती कि अप्रूवल की आड़ के बाद विकास कैसा व कितना हो रहा है।
विकास प्राधिकरण के अधिकारी अपनी जिम्‍मेदारी सुविधा शुल्‍क के साथ केवल डेवलेपमेंट चार्ज वसूलने तक निभाते हैं, उसके बाद बिल्‍डर कितना और क्‍या घालमेल कर रहा है, इससे उन्‍हें कोई लेना-देना नहीं। यही कारण है कि कल तक एक जैसे मकानों से सुसज्‍जित कॉलोनियों में आज लोग मनमाफिक निर्माण बेखौफ  कराते जा रहे हैं लेकिन न कोई देखने वाला है और न सुनने वाला।
और तो और बिल्‍डर्स से भारी भरकम डेवलेपमेंट चार्ज वसूलने वाले विभाग ने आज तक किसी अपनी कॉलोनी में कोई विकास कार्य कराया हो, ऐसी सूचना नहीं मिली है।
प्राधिकरण से अप्रूव्‍ड पॉश कॉलोनियों का सीवर आस-पास के नालों में समा रहा है और इन कॉलोनियों में बिजली, पानी व सड़क तक की व्‍यवस्‍था चरमराने लगी है।
इन सबसे अलग लगभग हर अच्‍छी कॉलोनी का कोई न कोई हिस्‍सा विवादित है और उसका विवाद किसी न किसी स्‍तर पर लंबित है लेकिन अधिकांश लोगों को इसकी जानकारी तक नहीं है। लोगों को बाकायदा एक सुनियोजित तरीके से अंधेरे में रखा जाता है। बाद में यदि किसी हाउस होल्‍डर को सच्‍चाई पता भी लगती है तो उसके पास हाथ मलने के अलावा कुछ नहीं रह जाता।
ठीक उसी तरह जिस तरह आज कैंपा कोला सोसायटी के वाशिंदे अथवा नोएडा में नामचीन बिल्‍डर्स के प्रोजेक्‍ट में पैसा फंसा चुके लोगों के साथ हो रहा है।
आज इन लोगों का साथ देने को न कोई डेवलेपमेंट अथॉरिटी सामने आ रही है और न कोई दूसरी अथॉरिटी। सब अपने-अपने हिस्‍से का माल मारकर तमाशा देख रहे हैं। न्‍यायपालिकाएं भी कोई मदद नहीं कर पातीं क्‍योंकि वह केवल दस्‍तावेजी सबूत देखती हैं। उनका कहना अपनी जगह सही है कि पैसा फंसाने से पहले बिल्‍डर के सभी दावों की सच्‍चाई पता करना, खरीदार का काम है। यदि वह आंखें बंद करके अपनी पूंजी फंसाते हैं तो दोषी वह भी कम नहीं।
यही कारण है कि कैंपा कोला सोसायटी और जेपी ग्रुप के मामले में कोर्ट काफी सख्‍त नजर आईं।
कोर्ट की ऐसी सख्‍ती ताकीद करती है कि अपने एक अदद आशियाने का सपना देखने वालों को आंख बंद करके बिल्‍डर या उसके कथित अप्रूवल एवं प्रचार पर भरोसा करने की बजाय, खुद सारे दस्‍तावेजों का सत्‍यापन कर लेना चाहिए अन्‍यथा एक दिन वह भी सड़क पर खाली हाथ खड़े दिखाई देंगे और तब उनकी मदद करने वाला कोई नहीं होगा।
मथुरा को बेशक समूची दुनिया में एक धर्म नगरी के तौर पर पहचाना जाता है लेकिन याद रहे कि पापकर्मों के लिए धर्म ही सबसे बड़ी आड़ का काम करता है और यह बात न केवल बेईमान कारोबारी भली-भांति जानते हैं बल्‍कि वो अधिकारी भी जानते हैं जो आने के साथ तो कहते हैं कि वह ब्रजभूमि की सेवा करने आएं हैं लेकिन जैसे ही पहले से मुंह लगा खून सामने नजर आता है, ब्रजभूमि व ब्रजवासी, सबको भुला देते हैं।

मंगलवार, 17 दिसंबर 2013

भारत में यूएस डिप्‍लोमेट्स के 'गे' पार्टनर को अरेस्‍ट करें

नई दिल्ली। 
अमेरिका में भारतीय राजनयिक देवयानी के साथ हुई बदसलूकी के विरोध में भारत का रुख कड़ा हो गया है। वहीं मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी भी इस मामले में पूरी तरह से सरकार के साथ है। बीजेपी नेता यशवंत सिन्हा ने कहा कि भारत सरकार को भारत में रह रहे अमेरिकी राजनयिकों के समलैंगिक साथियों को गिरफ्तार कर लेना चाहिए क्योंकि ये डिप्लोमेटिक कोड ऑफ कंडक्ट का साफ उल्लंघन है।
सिन्हा ने कहा कि दुनिया का कोई भी मित्र देश राजनयिकों के साथ इस तरह का सुलूक नहीं करता जैसा अमेरिका ने न्यूयॉर्क में भारत के काउंसलेट जनरल की हेड के साथ किया। अमेरिकी प्रशासन की इस कार्यवाही की निंदा करने के लिए शब्द पर्याप्त नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में धारा 377 को सही ठहराया है जिसके तहत भारत में समलैंगिक यौन संबंध अपराध करार दिए गए हैं। सिन्हा ने कहा कि भारत में रह रहे अमेरिकी राजनयिकों को भी किसी तरह की छूट नहीं दी जानी चाहिए और उन पर भी यहां का कानून लागू होना चाहिए।
सिन्हा ने कहा कि मुझे पता चला है कि भारत में रह रहे कई अमेरिकी राजनयिकों के समलैंगिक पार्टनर हैं, जिन्हें वीजा मिला हुआ है और जो यहीं रह रहे हैं। भारत सरकार को धारा 377 के तहत उनके वीजा रद्द कर देने चाहिए और उनके समलैंगिक साथियों को गिरफ्तार कर जेल में बंद कर देना चाहिए क्योंकि वे भारत के कानून का उल्लंघन कर रह हैं।
-एजेंसी

शनिवार, 20 जुलाई 2013

मेडिकल कॉलेजों पर छापे में मिली करोड़ों की काली कमाई

गाजियाबाद। गाजियाबाद के संतोष मेडिकल और डेंटल कॉलेज में मारे गए आईटी छापे से पता चला है कि दाखिले के नाम पर करोड़ों की काली कमाई का धंधा जारी हैं. सरकारी सख्ती के बावजूद एडमिशन के लिए रकम ऐंठने का धंधा जारी है. इसी सिलसिले में आयकर विभाग के अधिकारियों ने गाजियाबाद, बंगलुरु और गुलबर्गा में कई शिक्षण संस्थानों पर छापे मारे.
गाजियाबाद के संतोष मेडिकल और डेंटल कॉलेज में मारे गए छापे में 100 करोड़ रुपए से भी ज्यादा के कैपिटेशन फीस लेने के सबूत मिले हैं.
कर्नाटक में मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों सहित कई संस्थान चलाने वाले हैदराबाद कर्नाटक एजुकेशन सोसाइटी के दफ्तर में भी छापा पड़ा है.
ये छापे सुप्रीम कोर्ट की ओर से मेडिकल कॉलेजों के लिए एकल प्रवेश परीक्षा पर रोक लगाने के बाद मारे गए हैं.

गुरुवार, 16 मई 2013

राष्ट्रपति से छिन सकता है क्षमा का अधिकार!

नई दिल्‍ली । क्या किसी दोषी की सजा को माफ करने या उसे कम करने के राष्ट्रपति और राज्यपाल के अधिकार को किसी कानून द्वारा समाप्त किया जा सकता है? उच्चतम न्यायालय नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंसिस (एनडीपीएस) कानून की धारा 32ए की वैधता का अध्ययन करते समय इस विषय पर फैसला करेगा. यह कानून कहता है कि इसके तहत दी गयी सजा में किसी तरह का निलंबन, कमी या तब्दीली की अनुमति नहीं है.
इस मुद्दे के महत्व को देखते हुये न्यायमूर्ति बी एस चौहान और न्यायमूर्ति एफ एम इब्राहिम कलीफुल्ली की पीठ ने मामला एक बड़ी पीठ को भेज दिया है.अदालत ने एनडीपीएस कानून के तहत दोषी ठहराये गये कृष्णन नामक शख्स और अन्य लोगों की दाखिल अपील पर सुनवाई करते हुए यह आदेश जारी दिया. इस अपील में पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती दी गयी है जिसमें कहा गया था कि उन्हें कानून की धारा 32ए के प्रावधानों के मद्देनजर सजा में कमी का अधिकार नहीं है.

बुधवार, 8 मई 2013

PM को बचाने के लिए ही बदली गई 'कोलगेट' रिपोर्ट

नई दिल्‍ली। कोयला घोटाले में सीबीआई डायरेक्टर रंजीत सिन्हा के हलफनामे में सरकार की पोल खुलने के बाद सुप्रीम कोर्ट में आज इसकी अहम सुनवाई होगी। अब यह साफ हो चुका है कि कानून मंत्री अश्विनी कुमार, पीएमओ और कोयला मंत्रियों के अधिकारियों ने सीबीआई की जांच रिपोर्ट में बदलाव करवाए थे। जस्टिस आरएम लोढ़ा की अगुआई वाली तीन सदस्यीय बेंच छह मई को दाखिल सीबीआई के दूसरे हलफनामे पर गौर करेगी। इसमें बताया गया है कि जांच रिपोर्ट में क्या बदलाव हुए और किसके कहने पर किए गए।
सीबीआई के हलफनामे से पता चलता है कि जांच रिपोर्ट से कानून मंत्री और अधिकारियों ने 2006 से 2009 के दौरान कोयला ब्लॉक आवंटन में बरती गईं अनियमितता से जुड़े हिस्से हटाए। इसका मकसद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को कठघरे में लाने से बचाना है, क्योंकि उस दौरान कोयला मंत्रालय भी प्रधानमंत्री के पास ही था।
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