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शुक्रवार, 31 अगस्त 2018

MY Lord, जनसामान्‍य के लिए भी बनवा दीजिए कोई ‘लेन’, उसकी भी सुन लीजिए हुजूर

बीते बुधवार को मद्रास हाई कोर्ट ने NHAI (नेशनल हाइवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया) को सख्‍त आदेश देते हुए कहा कि वह अपने सभी टोल प्लाजा पर वीआईपी और मौजूदा जजों के लिए एक अलग से एक्सक्लूसिव लेन बनाए या Contempt of court की कार्यवाही के लिए तैयार रहे।
जस्टिस हुलुवाडी जी रमेश और जस्टिस एमवी मुरलीधरन की डिवीजन बेंच ने कहा, ये वीआईपी और जजों के लिए बहुत शर्म की बात है कि वे टोल प्लाजा पर इंतजार करें और अपने आइडेंटिटी कार्ड दिखाएं। बेंच ने केंद्र सरकार और एनएचएआई से कहा कि वे इस मामले में प्रत्‍येक टोल प्‍लाजा के लिए सर्कुलर जारी करें।
कोर्ट ने यह भी कहा: टोल कलेक्टर की जिम्मेदारी होगी कि वह उस लेन से वीआईपी और जज के अलावा किसी और को गुजरने न दे, और जो भी इस नियम का उल्लंघन करे, टोल कलेक्टर उसके खिलाफ सख्त कार्यवाही करे।
कोर्ट ने कहा, ‘अलग लेन न होने से हर टोल प्लाजा पर सिटिंग जज और वीआईपी लोगों को ‘अनावश्यक शर्मिंदगी’ का सामना करना पड़ता है। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। टोल प्लाजा पर सिटिंग जज को 10 से 15 मिनट तक इंतजार करना पड़ता है।
MY Lord, आपका आदेश तो सिर माथे, लेकिन उन लोगों का क्‍या जो पूरा पैसा देकर भी हर टोल पर इंतजार करने को मजबूर हैं। हुजूर, क्‍या उनका समय कोई मायने नहीं रखता।
लगे हाथ उनके लिए भी कोई आदेश-निर्देश NHAI को दे दिया होता। वो तो कई बार घंटों-घंटों फंसे रहते हैं।
वहां से जैसे-तैसे निकल भी आएं तो आपकी अदालतें रहम नहीं करतीं क्‍योंकि आम आदमी के लिए वहां भी कोई लेन नहीं है।
कोई वादी अथवा प्रतिवादी, और यहां तक कि वकील साहिब भी यदि टोल प्‍लाजा पर अटक जाने के कारण अदालत में समय से उपस्‍थित नहीं होते तो उन्‍हें ‘अदम मौजूदगी’ या ‘अदम पैरवी’ का कितना बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ जाता है, इसे कौन नहीं जानता जबकि आपकी देरी पर कहां कौन सवाल खड़ा कर सकता है।
आप अदालत में बैठें या न बैठें, मालिक का मालिक कौन।
Your Honor, आपने अपने इस आदेश में अपने साथ-साथ ‘वीआईपी’ का जिक्र क्‍यों किया यह तो आप जानें, अलबत्ता आम आदमी यह जरूर जानता है कि वीआईपी किसी टोल पर कहां रुकते हैं। वो तो यूं भी लाल-नीली बत्तियों वाली गाड़ियों के बीच बिना टोल दिए ‘हूटर’ बजाते तेजी के साथ निकल लेते हैं। उनके काफिले को किसी टोल पर कोई रोकने या टोकने की हिमाकत कर बैठे तो वहीं के वहीं फैसला करके जाते हैं वो। न तहरीर, न तारीख…सीधे फैसला।
क्‍या आप इस कड़वे सच से वाकई परिचित नहीं हैं MY Lord, अथवा आपने सहारे के लिए वीआईपी को जोड़ दिया अपने आदेश में।
एक विधायिका है MY Lord जो अपने वेतन-भत्ते खुद तय कर लेती है और उसमें कहीं कोई पक्ष-विपक्ष आड़े नहीं आता क्‍योंकि तब सवाल समूची नेता बिरादरी के ‘लाभ’ का होता है। दूसरी न्‍यायपालिका है जो आज तक तो अपनी नियुक्‍ति ही खुद करती रही है लेकिन अब वह अपने लिए ‘टोल नाकों’ पर अलग से लेन बनाने का आदेश भी दे रही है।
लोकतंत्र के तीन प्रमुख स्‍तंभों में से शेष रह जाती है कार्यपालिका, तो उसे टोल नाकों पर किसी के आदेश-निर्देशों की दरकार नहीं है। टोल वालों का उनसे और उनका टोल वालों से रोज वास्‍ता पड़ता है। वो उनकी अहमियत बिना आदेश-निर्देश के समझते हैं इसलिए दूर से ही उनके लिए बैरियर खड़ा कर देते हैं। एक सिपाही भी टोल कर्मियों के लिए कितना विशिष्‍ट है, इसे किसी भी टोल पर देखा जा सकता है।
वैसे लोकतंत्र का एक ‘तथाकथित’ चौथा स्‍तंभ भी है जिसे इस दौर में ‘मीडिया’ कहा जाने लगा है, लेकिन उसकी यहां चर्चा करने का कोई अर्थ नहीं क्‍योंकि उसकी अब कोई अहमियत नहीं रह गई।
टोल प्‍लाजा पर तो मीडियाकर्मियों को कोई दो कौड़ी का नहीं पूछता क्‍योंकि उसे अपने लिए आदेश-निर्देश देने का हक प्राप्‍त नहीं है।
और हां हुजूर, वीआईपी से याद आया कि वीआईपी तो हर जगह वीआईपी ही होते हैं। उनके लिए देश की सर्वोच्‍च अदालत भी आधी रात को खुल जाती है और सुबह होते-होते फैसला सुना देती है किंतु आम आदमी अपनी जिंदगी का आधा हिस्‍सा जाया करके भी फैसला सुनने को तरसता रहता है।
जब यमराज सामने खड़े होते हैं तब उसे याद आता है कि उसने अपने हिस्‍से की काफी उम्र तरह-तरह के टोल नाकों पर लाइन में लगकर गुजार दी।
अब देखिए हुजूर, दो दिन पहले की ही बात है। भीमा-कोरेगांव हिंसा मामले में देश के तथाकथित पांच बुद्धिजीवियों को पुलिस ने क्‍या पकड़ा, कोहराम मच गया। सड़क से लेकर संसद तक और मानवाधिकार आयोग से लेकर अदालत तक सब खड़े हो गए।
अगली सुबह तो आदेश हो गया कि जिन्‍हें पकड़ा है, उन्‍हें उनके घर पर नजरबंद रखें। पुलिस कस्‍टडी में उन्‍हें नहीं रखा जा सकता, तकलीफ होती है। बाकी 06 सितंबर को देखेंगे कि करना क्‍या है।
MY Lord, आम आदमी की मंशा आपके आदेश-निर्देश पर सवालिया निशान लगाने की नहीं है। वह तो सिर्फ इतना जानना चाहता है कि जनसामान्‍य के लिए अदालतें इसी प्रकार सक्रिय क्‍यों नहीं होतीं। क्‍यों उनके प्रति कोई संवेदनशील नहीं होता। मानवाधिकार आयोग उनकी गिरफ्तारी पर संज्ञान क्‍यों नहीं लेता। कोई बुद्धिजीवी गैंग उसकी खातिर सड़क पर उतरकर क्‍यों हंगामा नहीं काटता।
वो पुलिस के डंडे खाता है, अधिकारियों के यहां दुत्‍कारा जाता है, न्‍यायालयों में फटकारा जाता है लेकिन तब कोई नहीं कहता कि लोकतंत्र खतरे में है, या यह कैसा लोकतंत्र है।
हां, अगर एक आतंकवादी पूरी प्रक्रिया के बाद फांसी पर चढ़ाया जाता है अथवा किसी राज्‍य सरकार के गठन में गतिरोध उत्‍पन्‍न होता है और यहां तक कि सवा सौ करोड़ की आबादी में से पांच खास लोग गिरफ्तार कर लिए जाते हैं तो लोकतंत्र खतरे में पड़ जाता है। आपातकाल से भी बदतर हालात बताए जाते हैं।
तब तमाम लिस्‍टेड मुकद्दमों को दरकिनार कर उनकी गिरफ्तारी पर सुनवाई होती है और उसी दिन राहत भी दे दी जाती है, ऐसा क्‍यों है हुजूर।
दूसरी ओर जनसामान्‍य के लिए टोल प्‍लाजा का बैरियर और Court का Hammer दोनों बराबर हैं। दोनों उसका रास्‍ता तय करते हैं। दोनों के उठे बिना, उसका निकल पाना मुश्‍किल ही नहीं, नामुमकिन है। लेकिन फिर भी वह लगा है ‘कॉमन लेन’ में, भीड़ के बीच इस उम्‍मीद के साथ कि कभी तो वह भी निकल पाएगा।
हुजूर, नहीं पता कि मॉब लिंचिंग गायों के कारण हो रही है या सांप्रदायिकता के कारण। असहिष्‍णुता इसके पीछे की वजह है अथवा राजनीतिक विद्वेष। लेकिन एक बात पता है, और वह यह कि मॉब लिंचिंग करने वालों में किसी न किसी स्‍तर पर अपने अंदर विशिष्‍टता का भाव अवश्‍य भरा होता है। वह कानून हाथ में लेने की हिमाकत ही तब कर पाते हैं जब वह यह समझने लगते हैं कि पुलिस भी वहीं हैं और अदालत भी वही।
इसलिए हुजूर ये विशिष्‍टता का भाव बहुत खतरनाक है। इसी भाव ने स्‍वतंत्रता के सात दशक बीत जाने के बाद भी ‘लोक’ से ‘तंत्र’ को काट रखा है। अगर यह ‘तंत्र’ ही ‘लोक’ के लिए नहीं है तो कैसा लोकतंत्र। यह तो राजतंत्र हुआ न हुजूर। वही राजे-रजवाड़ों वाला या शासक और शोषित वाला।
बा-अदब…बा-मुलाहिजा…होशियार! महाराज की सवारी पधार रही है।
आखिर में हुजूर याद दिलाना चाहूंगा सर्वोच्‍च न्‍यायालय की ताजा टिप्‍पणी जिसमें कहा गया है कि असहमति जताना लोकतंत्र के लिए ‘सेफ़्टी वॉल्व’ है। अगर आप इस सेफ़्टी वॉल्व को नहीं रहने देंगे तो प्रेशर कुकर फट जाएग।.’
यकीन मानिए MY Lord, आम आदमी भी विशिष्‍ट लोगों द्वारा विशिष्‍ट लोगों के लिए दिए जाने वाले आदेश-निर्देशों से पूरी तरह असहमत है। उसका सेफ़्टी वॉल्व काफी हद तक चोक हो चुका है। यदि वह फट गया तो सच में लोकतंत्र खतरे में पड़ जाएगा। लोकतंत्र को बचा लीजिए हुजूर। ये विशिष्‍टता का भाव त्‍याग दीजिए। आम बने रहिए ताकि जनता आपको खास समझती रहे।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

शनिवार, 13 जनवरी 2018

चौराहे पर न्‍यायपालिका, दोराहे पर लोग

देश के इतिहास में बेशक यह पहली बार हुआ हो…या फिर अंतिम भी हो…किंतु जिन सामान्‍य जनों का वास्‍ता अपने जीवन में कभी भी कोर्ट-कचहरी से पड़ा है वह भली-भांति जानते हैं कि जो कुछ कल सुप्रीम कोर्ट के चार विद्वान न्‍यायाधीशों ने प्रेस कांफ्रेंस करके कहा, उसमें नया कुछ नहीं था।
नया था तो केवल इतना कि सर्वोच्‍च न्‍यायालय के चार सीनियर मोस्‍ट न्‍यायाधीश उन बातों को कहने ”सड़क पर” यानि ”प्रेस के सामने” आ गए जो बातें सामान्‍यत: दबी-ढकी रहती हैं और जिन्‍हें सब जानते-समझते हुए भी सार्वजनिक करने की हिम्‍मत नहीं कर पाते।
न्‍यायाधीशों ने जिन बातों को अपना ”दर्द” बताकर प्रेस के सामने पेश किया, वह एक ऐसी कड़वी सच्‍चाई है जो समूची न्‍यायपालिका में नीचे से लेकर ऊपर तक व्‍याप्‍त है और जिसे हर वो व्‍यक्‍ति प्रतिदिन भोगता है जिसके अंदर कहीं ”ईमानदारी” की लौ लगी हुई है। फिर चाहे वह कोई जज हो, न्‍याय विभाग का कोई कर्मचारी हो अथवा वकील ही क्‍यों न हो। रही बात वादी और प्रतिवादियों की, तो उसकी स्‍थिति ऐसे निरीह व्‍यक्‍ति की तरह होती है जो किसी कोने में जाकर सिसक तो सकता है किंतु उस सिसकी की आवाज़ किसी के कानों तक नहीं पहुंचा सकता क्‍योंकि सवाल देश की न्‍याय व्‍यवस्‍था का है। उस न्‍याय व्‍यवस्‍था का जो लोकतंत्र में आस्‍था रखने वाले हर शख्‍स की आखिरी उम्‍मीद होती है।
आप इसे यूं भी कह सकते हैं कि स्‍वतंत्र भारत में न्‍यायपालिका अपनी बात कहने के लिए भले ही पहली बार ”चौराहे” पर आकर खड़ी हुई हो परंतु लोग तो न्‍याय की आस में कई दशकों से ”दोराहे” पर खड़े हैं। उन्‍हें समझ में नहीं आता कि वह त्‍वरित व उचित न्‍याय के लिए किस दरवाजे पर जाकर खड़े हों। विधायिका के, कार्यपालिका के या न्‍यायपालिका के।
विधायिका अर्थात् ”नेतानगरी” का हाल यहां बताने की जरूरत ही नहीं है और कार्यपालिका में व्‍याप्‍त ”भ्रष्‍टाचार” से त्‍वरित व उचित न्‍याय की उम्‍मीद पालना बेमानी है। बिना पैसे के अधिकांश सरकारी कर्मचारियों के पांव अंगद की तरह एक स्‍थान पर जमे रहते हैं। बिना चाय-पानी के उन्‍हें उठवाना तो दूर, हिला पाना भी संभव नहीं होता।
रही बात न्‍यापालिका की तो उसके बारे में बहुत पहले से कहावत प्रचलित है कि ”कचहरी” की ईंट-ईंट पैसा मांगती है। चार विद्वान न्‍यायाधीश हालांकि सुप्रीम कोर्ट में सब-कुछ ठीक न चलने की शिकायत लेकर 70 साल बाद चौराहे पर आए हों किंतु यह शिकायत न तो मात्र सुप्रीम कोर्ट की है और न सिर्फ उनकी अपनी। ऐसी शिकायतें जिला अदालतों से लेकर उच्‍च न्‍यायालयों तक में कदम-कदम पर बिखरी पड़ी हैं। इतना अवश्‍य है कि इन शिकायतों को न तो कोई एकत्र करता है और न उठाता है क्‍योंकि सवाल न्‍यायपालिका का जो है। वो न्‍यायपालिका जिसकी बात-बात में अवमानना हो जाती है। तब भी जबकि सवाल किसी न्‍यायाधीश के निजी आचरण से जुड़ा हो न कि न्‍याय व्‍यवस्‍था से, क्‍योंकि न्‍यायाधीश के आचरण को भी न्‍यायपालिका से जोड़कर देखा जाने लगा है।
शायद ही किसी अधिवक्‍ता ने कभी इस मुतल्‍लिक कोई याचिका दायर की हो कि न्‍यायपालिका की अवमानना को जनहित में परिभाषित किया जाए और स्‍पष्‍ट किया जाए कि किसी न्‍यायाधीश के निजी आचरण पर टिप्‍पणी करना न्‍यायपालिका की अवमानना कैसे हो सकती है।
आम आदमी जिसके लिए लोकतंत्र का यह स्‍तंभ न्‍याय पाने की आखिरी सीढ़ी होता है, वह इस सीढ़ी से निराश होने के बाद खुद को कितना ठगा महसूस करता है इसका इल्‍म उसे ही होता है किसी न्‍यायाधीश को नहीं।
तारीख पर तारीख…तारीख पर तारीख…किसी जुमले की तरह हिंदी फिल्‍म का हिस्‍सा तो बन गया लेकिन अदालतों से मिलने वाली तारीखों की कोई आखिरी तारीख अब तक मुकर्रर नहीं हो पाई, नतीजतन अनगिनत लोग हर साल न्‍याय की उम्‍मीद पाले लोकतंत्र के ”माई लॉर्ड” से परलोक के ”लॉर्ड” की अदालत में शिफ्ट कर जाते हैं और उसके बाद भी ”माई लॉर्ड” की अदालत से पीड़ित के किसी परिजन को हाजिर होने का फरमान जारी होना बंद नहीं होता।
जस्टिस जे चेलामेश्वरम, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ़ द्वारा लोकतंत्र को खतरे में बताकर उठाई गईं समस्‍याएं हालांकि पहली नजर में व्‍यक्‍तिगत अहम से उपजी समस्‍याएं दिखाई देती हैं और इसलिए बहुत से पूर्व विद्वान न्‍यायाधीश व अधिवक्‍तागण यह कह भी रहे हैं कि उन्‍हें अपने दायरे के अंदर रहकर समस्‍याओं के समाधान का रास्‍ता निकालना चाहिए था परंतु परिस्‍थितियां वैसी नहीं हैं जैसी सतही तौर पर दिखाई देती हैं।
जिला स्‍तरीय अदालतों में भी बहुत से जिला एवं सत्र न्‍यायाधीश अपनी और अपने नजदीकी जजों की ”सुविधा” के हिसाब से केस सुनवाई के लिए भेजते हैं। निचली अदालतों में भी ”पैसा और प्रभाव” अधिकांश जजों के सिर चढ़कर बोलता है। लोअर कोर्ट अपने जजों की कार्यप्रणाली के नियम व कानून विरुद्ध किस्‍से-कहानियों से भरे पड़े रहते हैं। किसी भी जिला अदालत में कार्यरत कुल न्‍यायाधीशों में से ईमानदार न्‍यायाधीशों का पता करने जाएं तो उंगलियों पर गिने जाने लायक न्‍यायाधीश ही उस श्रेणी में आते हैं।
लोअर कोर्ट से लेकर हाई कोर्ट तक और हाई कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक सेटिंग-गेटिंग का खेल बड़े पैमाने पर चलता है, यह किसी से छिपा नहीं है। यह बात अलग है कि खुलकर कहने की हिमाकत हर कोई नहीं कर सकता।
बहुत दिन नहीं हुए जब सुप्रीम कोर्ट के मशहूर वकील और देश के पूर्व कानून मंत्री शांति भूषण ने यह कहकर तहलका मचा दिया था कि स्‍वतंत्र भारत में आजतक जितने भी लोग चीफ जस्‍टिस की कुर्सी पर काबिज रहे हैं, उनमें से अधिकांश ईमानदार नहीं कहे जा सकते। शांति भूषण के कथन पर न्‍यायपालिका को जैसे सांप सूंघ गया। एकबार तो ऐसी बातें उठीं कि शांति भूषण के खिलाफ कोर्ट की अवमानना का केस चलाया जाएगा लेकिन हुआ कुछ नहीं। जाहिर है कि शांति भूषण का कथन अतिशयोक्‍ति नहीं था और इसीलिए उनके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही करने का साहस नहीं हुआ।
शांति भूषण, इन्‍हीं प्रसिद्ध वकील प्रशांत भूषण के पिता हैं जिन्‍होंने कल जजों की प्रेस कांफ्रेंस के संदर्भ में कहा है कि समस्‍या का समाधान उसे दबाने से नहीं, सार्वजनिक करने के बाद ही निकलता है।
प्रशांत भूषण के अनुसार एकसाथ चार वरिष्‍ठ न्‍यायाधीशों को यदि प्रेस कांफ्रेंस करके अपनी बात कहनी पड़ी तो समस्‍या की गंभीरता का अंदाज लगाया जा सकता है।
हो सकता है कि सुप्रीम कोर्ट के सीनियर अधिवक्‍ता प्रशांत भूषण कुछ निजी कारणोंवश प्रेस कांफ्रेंस करने वाले न्‍यायाधीशों को सही ठहरा रहे हों, हो सकता है कि चारों न्‍यायाधीश भी व्‍यक्‍तिगत कारणों से चीफ जस्‍टिस की कार्यप्रणाली पर उंगली उठा रहे हों लेकिन समस्‍याएं हैं और नीचे से ऊपर तक है, इससे कोई इंकार नहीं कर सकता।
बात चाहे कॉलेजियम सिस्टम की हो अथवा उन निर्णयों की जिन पर उंगली उठी हैं, न्‍यायाधीश के साथ-साथ न्‍यायप्रणाली पर भी आम आदमी के भरोसे को कमजोर करती हैं।
पिछले कुछ वर्षों के अंदर उच्‍च और उच्‍चतम न्‍यायालयों से तमाम ऐसे निर्णय हुए हैं जिन पर न सिर्फ उंगलियां उठी हैं बल्‍कि वो मीडिया तथा जनता के बीच चर्चा का विषय भी बने हैं। बहुत से निर्णय ऐसे आए हैं जिन पर खुद सर्वोच्‍च न्‍यायालय को पुनर्विचार करना पड़ा है और कुछ में तो निर्णय बदले भी गए हैं। हाल ही में ट्रांस जैंडर्स को लेकर आया फैसला उनमें से एक है।
लोअर कोर्ट के आदेश को हाई कोर्ट द्वारा पलट देना और हाई कोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट द्वारा पूरी तरह गलत ठहरा देना तो अब जैसे आम बात हो गई है। जन सामान्‍य को विद्वान न्‍यायाधीशों के ऐसे निर्णय यह सोचने पर मजबूर कर देते हैं कि आखिर कौन से न्‍यायाधीश का निर्णय सही माना जाए?
आम आदमी के समझ से परे हैं यह बातें कि जिन सबूतों और गवाहों के आधार पर एक न्‍यायाधीश किसी को सजा सुनाता है या बरी कर देता है, वही सबूत और गवाह दूसरे न्‍यायाधीश के लिए बेमानी कैसे हो जाते हैं?
माना कि लोअर कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक की व्‍यवस्‍था मुकम्‍मल न्‍याय देने के लिए ही की गई है परंतु जब अधिकांश मामलों में रद्दोबदल दिखाई देता है तो सवाल खड़े होना लाजिमी है।
राम जन्‍मभूमि बनाम बाबरी मस्‍जिद से लेकर आरुषी हत्‍याकांड तक और 2जी घोटाले से लेकर आदर्श सोसायटी घोटाले तक के उदाहरण हमारे सामने हैं। इन सभी मामलों में आजतक न्‍याय की दरकार है।
कई-कई दशकों का इंतजार भी इस बात की गारंटी देने में असमर्थ है कि उसके बाद जो न्‍याय मिलेगा, वह निर्विवाद होगा।
यही कारण है कि आज न्‍यायपालिका और न्‍यायाधीश भी बहस का मुद्दा बन गए हैं और उनके प्रति अवमानना का भय समाप्‍त होता जा रहा है।
अब आखिर में यदि बात करें लोकतंत्र के उस चौथे स्‍तंभ की जिसके सामने सर्वोच्‍च न्‍यायालय के चार-चार न्‍यायाधीशों को अपनी बात कहने के लिए आना पड़ा, वह सिर्फ एक ऐसा झुनझुना है जिसे बजाया तो जा सकता है लेकिन नतीजा निकलवाने के काम नहीं लाया जा सकता क्‍योंकि उसे लोकतंत्र के चौथे स्‍तंभ की उपमा मात्र ”जुबानी” प्राप्‍त है। उसे ऐसा कोई संवैधानिक अधिकार हासिल नहीं है जैसा विधायिका, कार्यपालिका और न्‍याय पालिका को प्राप्‍त है।
लोकतंत्र का लोक इस ”दर्जाप्राप्‍त” चौथे स्‍तंभ से उम्‍मीद तो बहुत रखता है लेकिन उसकी उम्‍मीदें पहले तीन संवैधानिक स्‍तंभों की मंशा के बिना पूरी नहीं हो सकतीं।
संभवत: यही कारण है कि प्रेस से मीडिया के रूप में परिवर्तित होने वाला यह चौथा खंभा स्‍वतंत्रता के सात दशक पूरे हो जाने के बावजूद ”भोंपू” से अधिक कुछ बन नहीं पाया। एक ऐसा भोंपू जिसे कोई भी अपनी जरूरत और सुविधा के हिसाब से जब चाहे जब बजा कर तो चला जाता है परंतु उसे सशक्‍त व समर्थ करने की बात तक नहीं करता।
सुप्रीम कोर्ट के चार विद्वान न्‍यायाधीशों ने भी अपनी जरूरत के लिए इस भोंपू का इस्‍तेमाल जरूर किया है लेकिन ये न्‍यायाधीश भली-भांति जानते हैं कि भोंपू रहेगा आखिर भोंपू ही इसीलिए सॉलीसीटर जनरल का बयान गौर करने लायक है।
सॉलीसीटर जनरल के. के. वेणुगोपाल ने कल ही साफ कर दिया था कि बहुत जल्‍द इस समस्‍या का समाधान मिल-बैठकर कर लिया जाएगा। वेणुगोपाल के बयान का निहितार्थ यही निकलता है कि हाल-फिलहाल किसी स्‍तर पर व्‍यवस्‍था में कोई भी परिवर्तन होने नहीं जा रहा। फिर किसी नए ऐसे ऐतिहासिक धमाके तक यथास्‍थिति कायम रहनी है। मीडिया का भोंपू भी मियादी बुखार की तरह ज्‍यादा से ज्‍यादा तीन दिन तक शोर मचाकर चुप हो ही जाएगा।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

सोमवार, 1 अगस्त 2016

SC ने सुनाया मायावती सहित यूपी के 6 पूर्व मुख्‍यमंत्रियों को सरकारी बंगले खाली करने का फरमान

नई दिल्ली। SC (सुप्रीम कोर्ट) ने सरकारी बंगलों पर कब्जा जमाए बैठे मायावती सहित 6 पूर्व-मुख्यमंत्रियों से सरकारी बंगले खाली करने को कहा है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश से इन मुख्‍यमंत्रियों को तगड़ा झटका दिया है।
केंद्र सरकार के नोटिफिकेशन को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आज पूर्व-मुख्यमंत्रियों को दो महीने के भीतर सरकारी बंगले खाली करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने यह भी कहा कि अब से पूर्व-मुख्यमंत्रियों को सरकारी बंगले न दिए जाएं।
गौरतलब है कि पूर्व-मुख्यमंत्रियों द्वारा सरकारी बंगले खाली न करना लंबे समय से विवाद का विषय रहा है।
दरअसल, उत्तर प्रदेश में एक सरकारी आदेश जारी किया गया था जिसमें कहा गया था कि पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी बंगले दिए जायेंगे। इस फैसले के खिलाफ 2004 में लोक प्रहरी नाम के एक एनजीओ ने सुप्रीम कोर्ट में एक पीआईएल दाखिल की थी। याचिका में कहा गया था कि यह आदेश रद्द किये जाएं और अगर इसे जारी रखा गया तो देश के बाकी राज्यों पर भी इसका असर पड़ेगा। जिस पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश जारी किया है।
उत्तर प्रदेश के छह पूर्व-मुख्यमंत्री ऐसे हैं जो अब भी उत्तर प्रदेश स्थित सरकारी बंगलों में रह रहे हैं। इनमें एसपी मुखिया मुलायम सिंह यादव, बीएसपी सुप्रीमो मायावती, बीजेपी नेता कल्याण सिंह, पूर्व कांग्रेसी नेता एनडी तिवारी, केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह और रामनरेश यादव शामिल हैं। इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने जीवन भर बंगला देने की नीति को गलत करार दिया है।
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस सांसद अधीर रंजन चौधरी को मंत्रियों को दिए जाने वाले सरकारी बंगले पर कब्जा करने के मामले में कड़ी फटकार लगाई थी।
सरकारी बंगले के विवाद में जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला भी फंस चुके हैं। उमर अब्दुल्ला की पूर्व पत्नी पायल ने दिल्ली के अकबर रोड़ पर स्थित बंगले को खाली करने से मना कर दिया था जो बंगला उमर अब्दुल्ला को मुख्यमंत्री बनने के दौरान दिया गया था।

रविवार, 28 जून 2015

शांति भूषण का दावा: आडवाणी चाहते थे कायम रहे आपातकाल लगाने की ताकत

नई दिल्‍ली। देश के अंदर आपातकाल लगाने वाली पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ मुकद्दमा लड़ने और जीतने वाले वकील शांति भूषण ने एक टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा है कि बीजेपी के सीनियर लीडर लालकृष्ण आडवाणी चाहते थे कि सरकार के पास आपातकाल लगाने की ताकत मौजूद रहे।
लालकृष्ण आडवाणी ने इसके लिए संविधान के 44वें संशोधन का विरोध किया था।
शांति भूषण का बयान इसलिए भी अहम है क्योंकि आडवाणी इमरजेंसी के खिलाफ खुलकर बोलते रहे हैं। पिछले दिनों आडवाणी ने आशंका जताई थी कि देश में फिर से आपातकाल लग सकता है।
इमरजेंसी और राजनीतिक से जुड़े सवालों को लेकर रू-ब-रू हुए पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील शांति भूषण से। पेश है बातचीत के मुख्य अंशः
सवाल- 40 साल पहले 25 जून 1975 को कांग्रेस की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश पर आपातकाल थोपा था। अब आप जब मुड़कर देखते हैं तो लोकतंत्र को किस मायने में मजबूत और किस मायने में कमजोर पाते हैं?
जवाब- उस समय संविधान में ही प्रावधान था कि सरकार अपनी जरूरत के अनुसार जनाधिकारों को छीन सकती है इसलिए इंदिरा ने इतनी आसानी से मुल्क को तानाशाही के शासन में धकेल दिया। अब ऐसा नहीं है। 1977 में मैं जब कानून मंत्री बना तो 44वां संविधान संशोधन हुआ। संशोधन में दर्ज हुआ कि आपातकाल लगाए जाने के बावजूद भी संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 को खत्म नहीं किया जाएगा जबकि 1975 में इंदिरा ने इन्हीं दोनों अनुच्छेदों को हम से ले लिया। अनुच्छेद 19 में दो बेहद महत्वपूर्ण अधिकार हैं। पहला, अभिव्यक्ति का अधिकार जिसमें प्रेस की स्वतंत्रता भी शामिल है और दूसरा है बिना हथियार शांतिपूर्वक एकत्रित होकर विरोध करने का अधिकार। वहीं अनुच्छेद 21 के तहत प्रावधान है कि अगर किसी को गलत तरीके से गिरफ्तार किया जाए तो वह अदालत में ‘हैबियस कॉरपस याचिका’ दाखिल कर अदालत से रिहाई की अपील कर सकता है। साफ है कि अब कोई सरकार आपातकाल लगाकर जनता के बुनियादी अधिकारों पर ताला नहीं जड़ सकती ।
सवाल- 1975 के बाद क्या कभी ऐसा हुआ जब आपको लगा हो कि अगर 44वां संविधान संशोधन नहीं हुआ होता देश में आपातकाल लग सकता था?
जवाब- साल 2011 में अन्ना आंदोलन से खौफजदा कांग्रेस सरकार दोबारा देश पर आपातकाल लाद सकती थी। एक हफ्ते के भीतर जिस तरह देश में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन फैला उससे सरकार आपातकाल के बाद पहली बार घबराई थी। जनता से लेकर मीडिया तक कोई उनके साथ नहीं था, कांग्रेस पार्टी के नेताओं का आत्मविश्वास लगातार डांवाडोल हो रहा था। वे इतने घबराए कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की ज्वाइंट ड्राफ्टिंग कमेटी की मांग तक को मान गए जिसके बारे में उनका कहना था कि यह गैर संवैधानिक है। पर 44वें संशोधन के बाद अब सरकार के पास ऐसा कोई अधिकार ही नहीं है कि वह अभिव्यक्ति, प्रेस की आजादी और अदालत जाने के अधिकार को छीन सके।
सवाल- तो क्या देश में अब आपातकाल असंभव है?
जवाब- बेशक, देश में आपातकाल असंभव है। यहां तक कि प्रधानमंत्री मोदी भी बहुमत के सरकार के बूते आपातकाल दोहराना चाहें तो वह एक दिवास्वप्न ही साबित होगा। लोगों की लोकतांत्रिक चेतना, मीडिया और संचार माध्यमों की पकड़ देश में विद्रोह करा देगी पर आपातकाल को नहीं सह पाएगी।
सवाल- पर आप लोगों ने संविधान संशोधन के दौरान आपातकाल का प्रावधान ही क्यों नहीं खत्म कर दिया?
जवाब- आपातकाल से सरकार को कुछ अधिकार मिलते हैं। अगर कोई सरकार आपातकाल लगाकर लोकतंत्र को खत्म नहीं कर पाती और वह आपातकाल देश के मुश्किल वक्त की जरूरत है, फिर इसमें मुझे कोई बुराई नहीं जान पड़ती। उस पर ज्यादा हायतौबा नहीं मचाया जाना चाहिए। कई बार आपातकाल देश के लिए जरूरी भी हो सकता है, रेयर ऑफ द रेयरेस्ट मामलों में, खासकर युद्ध की स्थितियों में।
सवाल- फिर आडवाणी की आशंका ‘दुबारा भी लगाया जा सकता है आपातकाल’ का क्या आधार है?
जवाब- नेता दो तरह के होते हैं। एक वो जो सिर्फ अपना और अपनी पार्टी का फायदा देखते हैं, दूसरे वो जिन्हें स्टेट्समैन कहते हैं। अटल बिहारी वाजपेयी स्टेट्समैन थे जबकि लालकृष्ण आडवाणी अपना भला चाहने वालों में हैं। जनता पार्टी की सरकार में जब वो मेरे साथ कैबिनेट मंत्री थे, तब भी उन्होंने 42 वें संशोधन का विरोध किया। वकील राम जेठमलानी और आडवाणी जी का कहना था कि 42वें संशोधन का हू-ब-हू लागू किया जाए अन्यथा उसे पूरे तौर पर खत्म कर दिया जाए। मेरा कहना था जो उसकी अच्छी चीजें हैं उसे लेने में हर्ज क्या है? कैबिनेट ने उनके सुझाव को तवज्जो नहीं दी थी। अब 40 साल बाद उन्हें आपातकाल का डर सता रहा है। मुझे लगता है कि आडवाणी जी ने संविधान का 44वां संशोधन पढ़ा ही नहीं, अन्यथा ऐसा नहीं कहते। मेरा विनम्र सुझाव है कि एक बार वह संशोधन को ध्यान से पढ़ लें, जवाब उन्हें स्वत: मिल जाएगा।
सवाल- कई नेता, राजनीतिक विश्लेषक मान रहे हैं, लिख रहे हैं कि देश में अघोषित आपातकाल जैसी स्थितियां हैं?
जवाब- देखिए,सरकारों के काम करने के दो तरीके हैं। पहला लोकतांत्रिक होकर, सबको शामिल कर और दूसरा है अकेले के फैसले को ही नियम बताकर। लोकतांत्रिक तरीके में विकास की गति थोड़ी धीमी रहती है लेकिन समाज के सभी वर्गों का ख्याल रखा जाता है। वहीं अकेले की शासन प्रणाली में व्यक्ति ही कानून और अध्यादेश हो जाता है, हालांकि विकास की गति तेज होती है। मोदी सरकार भी फिलहाल एकल नेतृत्व की दिशा में आगे बढ़ रही है। अपने ही मंत्रियों-नेताओं के पर कतर रही है, मगर इसे अघोषित आपातकाल कहने की बजाए प्रैक्टिस कह सकते हैं। जैसे-जैसे लोगों का मन पकता जाएगा मोदी के तेवर भी बिखरते जाएंगे।
सवाल- आपको इंदिरा गांधी के खिलाफ पैरवी के लिए खड़े होने का मौका कैसे मिला?
जवाब- 1971 के लोकसभा चुनाव के दौरान मैं उत्तर प्रदेश का एडवोकेट जनरल था। तभी मुझसे राजनारायण मिले। उन्होंने याचिका में मुख्य मुद्दा ‘केमीकली टिंटेड बैलेट पेपर’ का उठाया था। उनका कहना था कि इंदिरा ने बैलेट पर रूस से मंगाए केमीकल का इस्तेमाल किया है। इस संदर्भ में उन्होंने लखनऊ के एक-दो वैज्ञानिकों से मेरी मुलाकात कराई। वैज्ञानिकों ने अल्ट्रा वॉयलेट किरणों के जरिए कुछ दिखाया पर मैंने कहा, इससे कुछ नहीं होना है। फिर मैंने कुछ आधार बनाए। चुनावी सभाओं-प्रचारों में सरकारी धन का दुरुपयोग, एयरफोर्स के हेलीकॉप्टरों से इंदिरा का चुनावी दौरा, अदालत में मुद्दा बना जिसके आधार पर 12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 1971 के चुनाव को अवैध और अमान्य करार दिया।
सवाल- तो क्या इंदिरा गांधी गलत तरीके से जीती थीं?
जवाब- सरकारी धन का इस्तेमाल किया था पर जीत की वजह कुछ और थी। इंदिरा ने कहा, ‘ये लोग कहते हैं इंदिरा हटाओ, मैं कहती हूं गरीबी हटाओ।’ और दूसरा उन्होंने निजी बैंकों का सरकारीकरण कर दिया। ये दोनों आपस में जुड़ गए। इंदिरा के प्रचार तंत्र से गरीबों ने पूछा कैसे हटेगी गरीबी, उनका जवाब था इसलिए तो निजी बैंकों को सरकारी किया है। गरीबों को लगा अब बैंक सरकारी हो गए, जो रुपए पहले एक आदमी के थे वो सबके हो गए। इसकी तुलना आप मोदी सरकार के उस वादे से कर सकते हैं जिसमें उन्होंने कहा था कि स्विस बैंक से कालाधन लाकर हर व्यक्ति के खाते में 15 लाख जमा होंगे।
सवाल- लोग मोदी की तुलना इंदिरा गांधी से करते हैं?
जवाब- मैं भी मानता हूं कि मोदी में बहुत कुछ इंदिरा गांधी जैसा है। संसाधनों पर पकड़, निर्णय पर एकाधिकार, विरोध करने वालों को हाशिए पर डालना, मजबूत नेताओं को कमजोर बनाते जाना और सबके ऊपर छा जाने की फितरत जैसी तमाम चीजें इंदिरा जैसी दिखती हैं पर वह इंदिरा का आपातकाल नहीं लागू कर सकते कि वह 1975 में नहीं बल्कि 2014 में शासन कर रहे हैं।
क्या है संविधान का 44 वां संशोधन?
संविधान में 44वां संविधान संशोधन 1977 में किया गया था। संशोधन में दर्ज किया गया कि देश में आपातकाल लगाए जाने के बावजूद भी संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 को खत्म नहीं किया जाएगा।

मंगलवार, 21 अप्रैल 2015

…न ब्रूयात सत्यम् अप्रियं, बट…बोलना पड़ता है

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्‍टिस और भारतीय प्रेस परिषद के पूर्व अध्‍यक्ष मार्कण्‍डेय काटजू कितना सत्‍य बोलते हैं, इसका तो कोई पैमाना मेरे पास नहीं है किंतु इतना जरूर है कि वो सार्वजनिक रूप से जो कुछ बोलते हैं, वह समाज के एक बड़े तबके को ‘प्रिय’ नहीं लगता। अलबत्‍ता उनके अपने ब्‍लॉग का नाम ‘सत्‍यम् ब्रूयात’ है। और संस्‍कृत के जिस श्‍लोक का यह हिस्‍सा है, उसकी पहली पंक्‍ति के पूरे शब्‍द हैं-  सत्यम् ब्रूयात प्रियं ब्रूयात, न ब्रूयात सत्यम् अप्रियं।
बहरहाल, जस्‍टिस काटजू की अपने देशवासियों को लेकर की गई इस आशय की टिप्‍पणी कि ”अधिकांश भारतीय मूर्ख हैं”, कभी-कभी उचित प्रतीत होती है। हालांकि उनके अतिशयोक्‍ति पूर्ण बयानों से हर वक्‍त सहमत नहीं हुआ जा सकता।
फिलहाल बात करें दो-तीन दिनों से चल रहे उस राजनीतिक घटनाक्रम की जिसके तहत एक ओर सत्‍तापक्ष तथा दूसरी ओर विपक्ष की चकल्‍लस सड़क से लेकर संसद तक जारी है, तो साफ-साफ महसूस होता है कि मुठ्ठीभर लोग किस तरह पूरे देश को मूर्ख बना रहे हैं और देशवासी मूर्ख बन भी रहे हैं। देशवासियों की छोड़िये, वह मीडिया भी उस बहस का हिस्‍सा बना हुआ है जो पूरी तरह निरर्थक साबित हो रहा है और जिसका एकमात्र मकसद वो खेल खेलना है जिसमें न कभी उसकी हार होती है न जीत। जिसमें हारती है तो सिर्फ और सिर्फ जनता क्‍योंकि वह स्‍वतंत्रता प्राप्‍त होने से लेकर आज तक लगातार हारती रहने की आदी हो चुकी है।
हम बात कर रहे हैं उस भूमि अधिग्रहण बिल की जिसे लाई तो थी मनमोहन सिंह के नेतृत्‍व वाली यूपीए सरकार किंतु जिसे कुछ संशोधनों के साथ पास कराना चाहती है नरेंद्र मोदी के नेतृत्‍व वाली एनडीए सरकार।
अब तमाशा देखिये…कांग्रेस कहती है कि बिल में किये गये संशोधन किसान विरोधी और उद्यमियों के हित में हैं जबकि मोदी सरकार कहती है कि किसानों के हित में इससे बेहतर बिल दूसरा कोई हो ही नहीं सकता।
संसद का पहला सत्र इसी बहस की भेंट चढ़ गया और वर्तमान सत्र से ठीक पहले कांग्रेस ने करीब दो महीने की छुट्टियां बिताकर लौटे राहुल गांधी को एक मर्तबा फिर किसान रैली की आड़ लेकर आकर्षक पैक के साथ लांच किया।
अपनी इस री-लांचिंग में राहुल खूब बोले, और जमकर बोले। करीब-करीब उसी अंदाज में जिस अंदाज में वह कांग्रेस के अघोषित नेता माने जाने से लेकर बोलते रहे हैं। मोदी सरकार को निशाने पर रखा तथा यूपीए सरकार का गुणगान किया।
यह बात अलग है कि कुछ मीडिया तत्‍वों को उनमें विपश्‍यना करके लौटने से उपजा तथाकथित बदलाव नजर आया और उनकी बॉडी लैंग्‍वेज पहले के मुकाबले अधिक प्रभावशाली दिखाई दी। सोनिया और मनमोहन ने भी एक अर्से बाद अपने मुंह का अवकाश समाप्‍त किया और मोदी सरकार पर यथासंभव तीर चलाए किंतु किसी ने यह बताकर नहीं दिया कि यूपीए सरकार द्वारा तैयार किये गये भूमि अधिग्रहण बिल में मोदी सरकार ने ऐसे कौन से बदलाव कर दिये कि पूरा बिल किसानों के लिए अचानक अमृत से जहर बन गया।
इधर उनसे भी पहले मोदी जी ने अपने सांसदों की क्‍लास में भूमि अधिग्रहण बिल पर कोई समझौता न करने तथा उसकी खूबियां जनता की बीच जाकर बताने का पाठ पढ़ाया किंतु वह कौन सी खूबियां हैं जिन्‍हें सांसदों को जनता के बीच जाकर बताना है, यह नहीं बताया। अब या तो मोदी जी की कक्षा के छात्र (सांसद) सर्वज्ञ होते हुए मौनव्रत धारण किये हुए हैं अथवा मोदी जी की बात उन्‍हें मनमोहन, सोनिया तथा राहुल की तरह समझ में नहीं आ रही।
मोदी जी स्‍वयं और उनके मंत्री लगातार यह कह जरूर रहे हैं कि वह जनता के बीच जाकर नये भूमि अधिग्रहण बिल की खूबियां बतायेंगे किंतु बता कोई नहीं रहा। पता नहीं इसके लिए वह किस मुहूर्त का इंतजार कर रहे हैं।
कुल मिलाकर सत्‍ता पक्ष और विपक्ष राजनीति की बिसात पर किसान-किसान खेल रहा है किंतु कोई यह बताने को तैयार नहीं कि भूमि अधिग्रहण बिल की खूबियां हैं तो क्‍या हैं…और खामियां हैं तो कौन-कौन सी हैं। इस बिल को लेकर कोई किताब ऐसी बाजार में मिल नहीं रही, जिसे पढ़कर किसान या आम जनता यह समझ सके कि सच कौन बोल रहा है और झूठ कौन।
किसान अगर कर रहा है तो केवल इतना कि या तो तथाकथित रूप से आत्‍महत्‍या कर रहा है या फिर तथाकथित सदमे में मर रहा है। इस सबके अलावा वह कुछ कर रहा है तो कांग्रेस की किसान रैली में जाकर हरियाणा कांग्रेस की गुटबाजी का हिस्‍सा बन रहा है। कुछ किसान गुलाबी पगड़ी बांधकर हरियाणा कांग्रेस के प्रदेश अध्‍यक्ष अशोक तंवर के खिलाफ हूटिंग करने गये थे तो कुछ सतरंगी पगड़ी के साथ हरियाणा के पूर्व मुख्‍यमंत्री भूपेन्‍द्र सिंह हुड्डा की ताकत का अहसास कराने पहुंचे थे। अब इन ”पेड किसानों” का किस तरह भूमि अधिग्रहण बिल के अच्‍छे या बुरे होने से कोई ताल्‍लुक हो सकता है, यह बात शायद ही किसी को समझ में आ पाये।
यूं भी किसी राजनीतिक दल की रैली में शिरकत करने वाले लोग उसी पार्टी के अंधभक्‍त होते हैं, यह अब कोई छिपी हुई बात नहीं रह गई। दूसरे कुछ लोग अगर होते हैं तो वो जो दिहाड़ी डायटिंग तथा फ्री ट्रेवलिंग कराकर लाये ले जाये जाते हैं। ऐसे लोगों को किसान कहना, किसानों की तौहीन है। हां…इन्‍हें राजनीतिक पार्टियों के ”किसान मोहरे” कहा जा सकता है जो ”माउथ प्रचार” के जरिये अपनी पार्टी या अपने नेता का स्‍तुतिगान करते हैं। लगभग उसी अंदाज में जिस अंदाज में कभी ”भांड़” अपने राजा-महाराजाओं की विरुदावली गाया करते थे। ऐसे भांड़ों का 21 वीं सदी वाला संसदीय संस्‍करण आज भी हर राजनीतिक पार्टी के पास मौजूद है और बखूबी अपने काम को अंजाम दे रहा है। फिर चाहे वह कोई राष्‍ट्रीय पार्टी हो या क्षेत्रीय। माया, मुलायम, ममता और जयललिता से लेकर अरविंद केजरीवाल तथा अखिलेश यादव तक के पास अपने-अपने निजी भांड़ हैं।
यूं भी जिस देश में हर कोई किसी न किसी राजनीतिक दल से जुड़ा है और कमोबेश देश की पूरी आबादी दलगत राजनीति की शिकार है, उस देश में निजी सोच रखने वालों को पूछता ही कौन है। उनकी तादाद इतनी अधिक कम है कि उन्‍हें देश की आबादी का हिस्‍सा या देश का नागरिक तक मानने को कोई आसानी से तैयार नहीं होता लिहाजा उनकी आवाज़ नक्‍कारखाने की तूती बन कर रह गई है।
दलगत राजनीति के चंगुल में लोग इस कदर फंस चुके हैं कि उन्‍हें अपने परिवार के सदस्‍यों का जन्‍मदिन याद हो या न हो लेकिन पार्टी के नेता का जन्‍मदिन कभी नहीं भूलते। अपने पिता को कोई गाली देकर चला जाए, कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन नेताजी की शान में किसी ने गुस्‍ताख़ी कर दी तो जान देने और लेने पर आमादा हो जाते हैं।
कांग्रेस को केंद्र की सत्‍ता पर रहते किसानों के लिए कुछ अच्‍छा स्‍थाई काम करने के लिए पूरे दस साल कम पड़ गये थे और मोदी सरकार के लिए दस महीने बहुत ज्‍यादा हो गये। इस बात का जवाब क्‍या किसी के पास है?
यदि यह मान भी लिया जाए कि मोदी सरकार का भूमि अधिग्रहण बिल किसान विरोधी तथा उद्यमियों के हित में है, तो उसे सामने आने दीजिए। ठीक उसी तरह जैसे समय के साथ कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स, टूजी स्‍पेक्‍ट्रम तथा कोलगेट घोटाले का सच सामने आ ही गया जबकि यूपीए सरकार ने इन सब को पूरी तरह झुठलाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी थी।
चुनाव कोई कुंभ के मेले की तरह तो हैं नहीं, अगले पांच साल बाद फिर होने हैं। तब मोदी जी की सरकार का जनता खुद-ब-खुद वही हाल कर देगी जो आज कांग्रेस का कर रखा है। पांच साल के लिए उन्‍हें स्‍पष्‍ट जनादेश मिला है तो उससे पहले आप उन्‍हें सत्‍ता से च्‍युत कर नहीं सकते। फिर इतनी निम्‍न स्‍तरीय राजनीति का मतलब क्‍या है।
मतलब साफ है, कांग्रेस हो या भाजपा…सपा हो या बसपा…राजद हो या बीजद…सबके नेता जानते हैं कि मार्कण्‍डेय काटजू का कथन ही अंतिम सत्‍य है। वह उनके कथन पर राजनीति बेशक कर लें किंतु सच्‍चाई पर उन्‍हें भी तनिक शक नहीं है। वह जानते हैं कि जो जनता आज भी आसाराम बापू, नारायण साईं, स्‍वामी नित्‍यानंद तथा शिवानंद तिवारी जैसे दुराचारियों को संत मान रही है और जो लोग आज भी सहाराश्री की चिटफंड कंपनी में पैसा जमा कर रहे हैं, जिनके लिए देश में हुए खरबों के घोटाले कोई मायने नहीं रखते, जिनकी अंधभक्‍ति किसी तर्क अथवा तथ्‍य को मानने के लिए तैयार नहीं होती, उन्‍हें भेड़ की तरह हांकना कोई मुश्‍किल काम नहीं।
कोई भी राजनीतिक दल, चाहे वह क्षेत्रीय हो या राष्‍ट्रीय…सत्‍ता से बेदखल होते ही इस कवायद में लग जाता है कि अपने अंधभक्‍तों की आंखों पर चढ़े चश्‍मे का रंग हर हाल में बरकरार रखा जाए। चाहे किसी भूमि अधिग्रहण बिल के जरिये और चाहे किसान रैली के जरिए। चाहे संसद के अंदर से, चाहे संसद के बाहर बैठकर…अंधभक्‍तों का अपने पक्ष में ”ब्रेनवॉश” करते रहना जरूरी है क्‍योंकि सत्‍ता की कुंजी वही लोग हैं। इसीलिए तो भाजपा ने सत्‍ता पर काबिज होने के साथ अपने अंधभक्‍तों की संख्‍या का विश्‍व रिकॉर्ड बनाने जैसे महत्‍वपूर्ण कार्य को अंजाम तक पहुंचाया। भाजपा हो या कांग्रेस…या कोई भी अन्‍य पार्टी…सभी के नेता जानते हैं कि उनका वोटर ही उन्‍हें सत्‍ता तक पहुंचाता है, विपक्षी अंधभक्‍तों के मत उन्‍हें कभी नहीं मिलने वाले। शिखर तक पहुंचाने में दिमाग से दिवालिया दलगत राजनीति के शिकार ही निर्णायक साबित होते हैं, विचारवान बुद्धिजीवी नहीं। वह उनकी दृष्‍टि में किसी खेत की मूली नहीं हैं।
यही कारण है कि स्‍वतंत्र भारत में सत्‍ता का स्‍वाद बारी-बारी से चखा जाता रहा है। यह बात अलग है कि किसी को समय ज्‍यादा मिला और किसी को कम। किंतु सत्‍ता हमेशा ऐसे तत्‍वों के हाथ में रही जिन्‍हें फिरंगियों की कार्बन कॉपी कह सकते हैं। इतना कहने में आपत्‍ति हो तो यह जरूर कह सकते हैं कि पिछले 67 सालों में किसी सत्‍ता ने कभी ऐसा कुछ महसूस नहीं कराया जिसके आधार पर यह कहा जा सके कि वाकई यह देश स्‍वतंत्र हो चुका है और लोकतंत्र को सही-सही परिभाषित करने वाली सरकार काम कर रही है। यानि जनता के द्वारा चुनी गई, जनता के लिए, जनता की सरकार।
आज तक जितनी भी सरकारें रहीं हैं, फिर चाहे वह केंद की हों या राज्‍यों की, गठबंधन की रही हों, या स्‍पष्‍ट बहुमत वाली…एक दल की रही हों या अनेक दलों की…सबका आचरण समय के साथ रंग बदलता रहता है। विपक्ष में रहते उनके रंग-ढंग कुछ और रहते हैं तथा सत्‍ता हासिल होते ही कुछ और हो जाते हैं। गिरगिट भी फिर इनके आचरण के सामने कुछ नहीं रह जाता।
जाहिर है कि न तो कांग्रेस कुछ अजूबा कर रही है और न भाजपा या उसके साथ सत्‍ता का स्‍वाद चख रहे उसके सहयोगी दल। सब वही कर रहे हैं जो स्‍वतंत्र भारत की राजनीति अब तक करती रही है।
मार्कण्‍डेय काटजू को हम सनकी कह सकते हैं, आत्‍ममुग्‍ध कह सकते हैं, बड़बोला या अभिमानी बता सकते हैं…यह भी आरोप लगा सकते हैं कि वह मीडिया की सुर्खियों में रहने के लिए ऊट-पटांग बयान देने तथा अनर्गल बोलते रहने के आदी हैं किंतु इन सारी बातों को स्‍वीकार कर लेने के बावजूद कहीं न कहीं उनका यह कथन एकबार सोचने पर बाध्‍य अवश्‍य कर देता है कि क्‍या वाकई देश की अधिकांश जनता मूर्ख है।
खासतौर पर ऐसे समय जरूर उनका कथन विचार करने पर मजबूर कर देता है जब कोई नेता अपनी बेतुकी बातों, कुतर्कों, निरर्थक आरोप एवं प्रत्‍यारोपों, अभद्र भाषा-शैली वाले भाषणों तथा बेहूदी बयानबाजी के बावजूद तालियां बटोर लेता है तथा शत-प्रतिशत निजी स्‍वार्थों की पूर्ति यानि सत्‍ता हथियाने अथवा सत्‍ता बरकरार रखने के लिए चिलचिलाती धूप, तेज बारिश, आंधी-तूफान या कड़कड़ाती ठंड में लाखों लोगों को एकत्र कर पाता है। वो भी मात्र इसलिए कि उसे आपको मूर्ख बनाना है। यह जानते हुए कि वह आपके लिए कुछ नहीं कर सकता।
यह भी जानते हुए कि उसके पास अकूत दौलत है, बेहिसाब ताकत है, दुनिया भर में शौहरत है।
यह जानते व समझते हुए कि सड़क से संसद तक कुत्‍ते-बिल्‍लियों की भांति जन्‍मजात दुश्‍मन दिखाई देने वाले तथा एक दूसरे पर गुर्राते नजर आने वाले कैमरा ऑफ होते ही एक दूसरे की कुशलक्षेम किसी सहोदर की तरह पूछते हैं। ऑन रिकार्ड इनकी सूरत व सीरत कुछ और होती है तथा ऑफ रिकॉर्ड कुछ और।
हो सकता है कि मार्कण्‍डेय काटजू के कथन में मूर्खों की जमात का प्रतिशत आंशिक रूप से कुछ ऊपर-नीचे हो, किंतु बहुत ज्‍यादा नहीं है।
स्‍वतंत्र भारत से लेकर आज तक की राजनीति और राजनेताओं की सफलता का प्रतिशत तो यही बताता है।
यदि कभी इस बिंदु पर विचार न किया हो तो अब करके देखें, हो सकता है कि खुद आपको भी अहसास हो कि आप अब तक उसी जमात का हिस्‍सा बने हुए हैं।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

शुक्रवार, 14 नवंबर 2014

IPL फिक्‍सिंग केस में सुप्रीम कोर्ट ने किया नामों का खुलासा

नई दिल्‍ली। 
सुप्रीम कोर्ट ने आईपीएल में मैच फिक्सिंग को लेकर अहम नामों का खुलासा किया है। सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान चार नामों का खुलासा हुआ है। सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान जिन चार नामों का खुलासा हुआ है वे हैं सुंदर रमन, मय्यपन, श्रीनिवासन और राज कुंद्रा। इसके साथ ही बीसीसीआई के चुनावों के लिए होने वाली सालाना बैठक को भी सुप्रीम कोर्ट ने स्‍थागित करने के लिए कहा है। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल मुदगल कमेटी रिपोर्ट में शामिल खिलाड़ियों के नामों का खुलासा नहीं किया है।
सुप्रीम कोर्ट ने जिन लोगों के नामों का खुलासा किया है। उन लोगों को रिपोर्ट की कॉपी उपलब्‍ध कराई जाएगी। चार हफ्ते के अंदर इन लोगों को अपना जवाब दाखिल करना है।
सुप्रीम कोर्ट आईपीएल में मैच फिक्सिंग को लेकर अब अगली सुनवाई 24 नवंबर को करेगा। अभी इस बात का पता नहीं हो पाया है कि सुप्रीम कोर्ट ने इन नामों का खुलासा किस संदर्भ में किया है।
गौरतलब है कि वर्ष 2011 में वर्ल्ड कप जीतने वाली भारतीय टीम में शामिल एक प्रमुख खिलाड़ी का नाम आईपीएल मैच फिक्सिंग में शामिल है। इस बात का पता जस्टिस मुकुल मुदगल कमेटी की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में आईपीएल मैच फिक्सिंग को लेकर जमा की गई फाइनल रिपोर्ट में है।
जस्टिस मुकुल मुदगल कमेटी की रिपोर्ट से पता चला है कि यह खिलाड़ी टीम ‌इंडिया का नियमित खिलाड़ी नहीं है पर उस खिलाड़ी ने अंतिम आईपीएल में एक प्रमुख टीम की तरफ से मैच खेला था।
जांच रिपोर्ट में यह बात सामने आई थी कि जिस खिलाड़ी का नाम रिपोर्ट में सामने आया है। उसका चेन्नई और जयपुर फ्रेंचाइजी से कुछ भी लेना-देना नहीं है। इस मामले में दो अन्य टीमों के खिलाड़ी जांच के दायरे में हैं।
तीन साल पुराने फोन टेप के जरिए इस खिलाड़ी से पूछताछ की गई है। सुप्रीम कोर्ट की तरफ से नियुक्त किए गए आईपीएस अधिकारी बीबी मिश्रा ने इस खिलाड़ी को समन दिया और उससे पूछताछ की है। बीबी मिश्रा को जस्टिस मुकुल मुदगल कमेटी की मदद करने के लिए नियुक्त किया गया है।
इससे पहले भारतीय टीम के कई वरिष्ठ खिलाड़ियों से इस मामले में पूछताछ हो चुकी है। आईसीसी चेयरमैन एन श्रीनिवासन के दामाद मय्यपन की भूमिका को लेकर चेन्नई सुपर किंग्स के कई खिलाड़ियों से पूछताछ की गई थी।
ऑडियो टेप की फॉरेसिंक रिपोर्ट में मय्यपन की आवाज के नमूने सही पाए गए। इस ऑडियो टेप में मय्यपन की तरफ से आईपीएल मैचों सट्टेबाजी को लेकर बातचीत की गई है।
सुप्रीम कोर्ट की तरफ से बनाई गई कमेटी में सॉलिस्टिर जनरल एल नागेश्चर राव, वरिष्ठ अधिवक्ता निलॉय डूटा, बीबी मिश्रा और पूर्व भारतीय कप्तान सौरव गांगुली शामिल है।
जस्टिस मुदगल कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में किसी का नाम भी लीक न हो इसके लिए जांच रिपोर्ट में खिलाड़ियों को नाम के बजाए नंबर से संबोधित किया गया है।
-एजेंसी

रविवार, 5 अक्टूबर 2014

IAS के उत्‍पीड़न में अखिलेश सरकार पर 5 लाख जुर्माना

लखनऊ। 
सुप्रीम कोर्ट ने अखिलेश सरकार पर एक आईएएस अफसर के उत्पीड़न के मामले में पांच लाख रुपए का जुर्माना लगाया है। साथ ही, अफसर को सभी आरोपों से बरी कर दिया।
मामला 1979 बैच के आईएएस विजय शंकर पांडेय से जुड़ा है। उन्हें मायावती सरकार में 16 अप्रैल 2011 को प्रमुख सचिव सूचना, सचिवालय प्रशासन और खाद्य एंव औषधि नियंत्रण विभाग से हटा दिया गया था। उन्हें सदस्य राजस्व परिषद के पद पर तैनात किया गया था। उन पर यह कार्रवाई सिर्फ इसलिए की गई थी क्योंकि वह एक भ्रष्टाचार विरोधी संगठन के संस्थापक सदस्य थे। पांडेय ने इंडिया रिजुवनेशन इनिशिएटिव नाम के भ्रष्टाचार रोधी संगठन बनाया। बाद में, विदेश से कालाधन वापस लाने और टैक्स चोर हसन अली के खिलाफ जांच की सुस्त रफ्तार पर प्रवर्तन निदेशालय के खिलाफ याचिका दाखिल की थी। मायावती सरकार ने इसे आईएएस सेवा नियमों का उल्लंघन माना। विभागीय जांच बिठाई। वह बेदाग निकले। अखिलेश यादव सरकार ने भी जांच बिठाई। इस पर पांडेय कैट गए, जहां उनकी याचिका खारिज हो गई।
फैसले में क्या कहा सुप्रीम कोर्ट
कोर्ट के फैसले में कहा गया कि इस गलत कार्रवाई के लिए उन अफसरों की तलाश होनी चाहिए, जो इसके लिए जिम्मेदार हैं। साथ ही, उनसे जुर्माना भी वसूला जाना चाहिए। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इसलिए लपेट लिया, क्योंकि केंद्र सरकार ही आईएएस अफसरों का कैडर तय करती है।
कैसे चला संघर्ष
विजय शंकर पांडेय की इस कार्यवाही से उस दौरान मुख्यमंत्री रही मायावती उन पर भड़क उठी थी। उन्होंने इसे आईएएस सर्विस रुल का उल्लंघन माना और  27 फरवरी 2012 को विजयशंकर पर विभागीय जांच बैठा दी। इस जांच की जिम्मेदारी जांच अधिकारी जगन मेथ्यु को सौंपी गईं थी। जगन ने अपनी जांच रिपोर्ट 30 अगस्त को सौंपी। इसमें उन्होंने विजय शंकर पांडेय पर लगाए गए सारे आरोप निराधार पाए।
हालांकि, मायावती की सरकार चले जाने के बावजूद उनका उत्पीड़न बंद नहीं हुआ था। जब जांच में उनके ऊपर आरोप सिद्ध नहीं हुए तो अखिलेश सरकार ने 11 सितंबर को विजय शंकर पांडेय के मामले पर जांच कमिटी बिठा दी। इस कमिटी में तत्कालीन कृषि उत्पादन आयुक्त आलोक रंजन और अनिल कुमार गुप्ता थे।
सरकार के इस फैसले के खिलाफ विजय शंकर ने 26 सितंबर को कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। लेकिन 20 दिसंबर 2013 को कोर्ट ने उनकी अर्जी खारिज कर दी। इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन वहां भी याचिका खारिज हो गई। इसके बाद विजय शंकर पांडेय तीन अप्रैल 2014 को सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए। शुक्रवार को उन्हें न्याय मिला, कोर्ट ने अखिलेश सरकार और केंद्र सरकार पर जुर्माना ठोंकते हुए पांच लाख रुपए का जुर्माना लगाया गया। यह जुर्माना दोनों सरकार को मिलकर विजय शंकर पांडेय को देना है।
क्या कहते हैं जानकार
पूर्व आईएएस अफसर एसएन शुक्ला का कहना हैं कि सुप्रीम कोर्ट का यह ऐतिहासिक फैसला है। इसे सिर्फ विजय शंकर पांडेय के लिए नहीं मानना चाहिए, बल्कि यह फैसला उन सभी अफसरों का हौसला बढ़ाने के लिए है, जो सरकार के गलत कामों पर अपनी आवाज बुलंद करना चाहते हैं। यह फैसला सिर्फ सरकारों के साथ उन अफसरों की भी आंख खोलेगा, जो सरकार के कहने पर ईमानदार अफसरों का उत्पीड़न करते हैं।
क्या कहना हैं सरकार में बैठे अफसरों का
सरकार में बैठे कई आईएएस अफसर सुप्रीमकोर्ट के इस फैसले से उत्साहित हैं। नाम नहीं छपने की शर्त पर वह कहते हैं कि इस फैसले से अफसरों का मोरल बढ़ा है। अब जो अधिकारी दबाव में चुप्पी साधे रहते थे, वह अब गलत काम के खिलाफ अपना मुंह खोल सकेंगे। एक वरिष्ठ सीनियर आईएएस अफसर कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने इस फैसले से सरकार के गलत कामों के खिलाफ बोलने वाले अफसरों को एक सुरक्षा कवच दे दिया है। 
कौन हैं विजय शंकर पांडेय
1979 बैच के आईएएस विजय शंकर पांडेय उप्र सहकारी कताई मिल संघ में एमडी रहते हुए लिए गए निर्णयों को लेकर चर्चित हुए थे। उनके फैसलों को लेकर सतर्कता जांच तक हुई। इसके बाद भ्रष्ट आईएएस अफसरों को चिन्हित करने को लेकर छेड़ी गई अपनी मुहिम के कारण चर्चा में रहे। इससे तमाम वरिष्ठ आईएएस अफसर उनसे नाराज हुए और तत्कालीन प्रमुख सचिव नीरा यादव का उनसे टकराव हुआ। बसपा शासन में कैबिनेट सचिव के साथ उनकी अंदरखाने में होने वाली खटपट को लेकर भी वह खासे चर्चित रहे।
-एजेंसी

बुधवार, 16 अप्रैल 2014

स्पॉट फिक्सिंग रिपोर्ट में 12 क्रिकेटर्स और श्रीनिवासन भी

सुप्रीम कोर्ट ने आज खुलासा किया है कि आईपीएल स्पॉट फिक्सिंग मामले की जांच करने वाली जस्टिस मुद्गल समिति की रिपोर्ट में एन. श्रीनिवासन और 12 प्रतिष्ठित खिलाडियों के नाम हैं। कोर्ट ने कहा कि इन सभी के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए गए हैं। बीसीसीआई आरोपों की सीबीआई या एसआईटी से जांच कराने के लिए तैयार नहीं है। उसका कहना है कि इससे प्रतिष्ठित क्रिकेटर्स की छवि धूमिल हो जाएगी। साथ ही क्रिकेट बोर्ड की स्वायत्ता कमजोर हो जाएगी। श्रीनिवासन और चेन्नई सुपर किंग्स के कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी ने जस्टिस मुद्गल समिति की रिपोर्ट के इन निष्कर्षों को चुनौती दी थी कि दोनों ने गुरूनाथ मयप्पन की चेन्नई सुपर किंग्स में भूमिका को लेकर झूठ बोला था।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि सीलबंद रिपोर्ट में जो आरोप लगाए गए हैं, उनकी गहनता से जांच होनी चाहिए। आरोपों की प्रकृति गंभीर किस्म की है। कोर्ट ने कहा जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती, तब तक श्रीनिवासन को बीसीसीआई से दूर रहना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, आरोपों को जानने के बाद हम अपनी आंखें बंद नहीं कर सकते।" "हम किसी की छवि खराब नहीं करना चाहते, लेकिन हमें क्रिकेट के भविष्‍य की चिंता है।" कोर्ट ने बीसीसीआई और श्रीनिवासन से पूछा कि आरोपों पर जांच किस तरह की जाएगी।
सुप्रीम कोर्ट ने आईपीएल के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर सुदरन रमन को राहत देते हुए पद पर बने रहने की अनुमति दी है। बीसीसीआई के अंतरिम अध्यक्ष सुनील गावस्कर ने सुप्रीम कोर्ट को पत्र लिखकर कहा था कि वह सुंदरन रमन को सीओओ पद से हटाने या बने रहने के संबंध में फैसला नहीं ले सकते।
बीसीसीआई के अध्यक्ष पद से हटाए गए श्रीनिवासन ने सुप्रीम कोर्ट से फैसले पर पुनर्विचार करने को कहा था। श्रीनिवासन ने कोर्ट से अनुरोध किया था कि उन्हें इस साल सितंबर तक अध्यक्ष पद पर काम करते रहने की इजाजत दी जाए। इस मामले में श्रीनिवासन ने दलील दी कि बिहार क्रिकेट एसोसिएशन की ओर से सीनियर वकील ने उनके खिलाफ अनुचित और अप्रमाणित आरोप लगाए हैं।
-एजेंसी

मंगलवार, 17 दिसंबर 2013

नौकरशाहों के खिलाफ अभियोजन में मंजूरी जरूरी नहीं

नई दिल्‍ली। 
सीबीआई को अदालती निगरानी वाले भ्रष्टाचार के बावत वरिष्ठ नौकरशाहों के खिलाफ अभियोजन में केन्द्र सरकार की मंजूरी की कोई जरूरत नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी कि इसने एजेंसी को मजबूत किया है जिससे वह सरकार से पूर्व मंजूरी लिए बिना अधिकारियों के खिलाफ जांच कर सकती है.
न्यायमूर्ति आर. एम. लोधा की अध्यक्षता में तीन न्यायाधीशों की खंडपीठ ने केन्द्र की मंजूरी के इंतजार के बगैर कोलगेट में कथित रूप से संलिप्त नौकरशाहों के खिलाफ अभियोजन के लिए सीबीआई का मार्ग प्रशस्त कर दिया है.
खंडपीठ ने कहा, ‘जब कोई मामला भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत अदालत की निगरानी में हो तो दिल्ली विशेष पुलिस संस्थापन (डीएसपीई) कानून की धारा 6ए के तहत मंजूरी आवश्यक नहीं है.’
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार के सभी मामलों में वरिष्ठ नौकरशाहों के खिलाफ जांच के लिए आवश्यक मंजूरी के केंद्र के रख पर आपत्ति जताते हुए कहा था कि इस प्रकार का वैधानिक प्रावधान कोलगेट जैसे मामलों मे अदालती निगरानी वाली जांच में न्यायिक शक्ति को कम करेगा.
उसने केंद्र के इस दावे को दरकिनार कर दिया था कि डीएसपीई कानून की धारा 6ए के तहत संयुक्त सचिव स्तर के दर्जे या उससे ऊपर के दर्जे के अधिकारियों के खिलाफ जांच करने के लिए सक्षम प्राधिकरण की मंजूरी की आवश्यकता होती है.
-एजेंसी

मंगलवार, 10 दिसंबर 2013

लालबत्ती लगाने का अधिकार किस किस को: सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली। 
उच्चतम न्यायालय  ने वाहनों पर लाल बत्ती और सायरन के दुरुपयोग को रोकने के लिए सख्त रवैया अपनाते हुए आज व्यवस्था दी कि संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के अलावा कोई अन्य लाल बत्ती का इस्तेमाल नहीं कर सकेगा। न्यायमूर्ति जी. एस. सिंघवी की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश के निवासी अभय सिंह की एक जनहित याचिका पर व्यवस्था देते हुए केंद्र और राज्य सरकारों को तीन माह के भीतर ऐसी सूची जारी करने का निर्देश दिया जिसमें लाल बत्ती का इस्तेमाल करने के लिए पात्र लोगों का उल्लेख किया गया हो।
न्यायालय ने साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया कि इस सूची को बेवजह लंबा नहीं किया जा सकेगा। खंडपीठ ने इस आदेश का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कठोर सजा का प्रावधान करने के वास्ते मोटर वाहन अधिनियम में आवश्यक संशोधन करने का सरकार को निर्देश दिया। न्यायालय ने कहा कि वाहनों में प्रेसर हार्न, विभिन्न प्रकार की आवाज वाले हार्न और संगीतमय हार्न नहीं लगाए जाएंगे।
न्यायालय ने पुलिस और आपातकालीन  वाहनों पर घूमने वाली नीली बत्ती लगाने के निर्देश दिये। खंडपीठ ने पुलिस को इस व्यवस्था को निष्पक्ष तरीके और कड़ाई से पालन कराने की हिदायत भी दी। न्यायालय ने गत अगस्त में कहा था कि वाहनों पर अवैध तरीके से लाल बत्ती लगाई जा रही हैं जो समाज के लिए एक समस्या है। इन लाल बत्तियों का दुरुपयोग हो रहा है। याचिकाकर्ता ने लाल बत्ती और सायरन के दुरुपयोग का मामला न्यायालय के समक्ष उठाया था।
अभय सिंह की दलील थी कि लाल बत्ती का व्यापक पैमाने पर दुरुपयोग हो रहा है। अपराधी भी लाल बत्ती लगे वाहन से पुलिस को चकमा देने में सफल रहते हैं। इस बीच केंद्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने न्यायालय के इस आदेश पर कुछ बोलने से यह कहते हुए कन्नी काट ली कि वह संबंधित आदेश का अध्ययन करने के बाद ही अपनी प्रतिक्रिया देंगे।
हालांकि केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम  रमेश और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) नेता तारिक अनवर सहित कई व्यक्तियों ने शीर्ष अदालत की इस व्यवस्था को सही ठहराया है। रमेश और अनवर ने कहा कि शीर्ष अदालत का आदेश बिल्कुल जायज है क्योंकि इससे लाल बत्तियों के दुरुपयोग पर रोक लग सकेगी। जनता दल यू नेता साबिर अली ने न्यायालय के आदेश पर हैरानी जताई है।
-एजेंसी

गुरुवार, 9 मई 2013

CVC ने जांच में हस्तक्षेप पर CBI से तलब की रिपोर्ट

नई दिल्‍ली । केन्द्रीय सतर्कता आयोग ने कोयला ब्लाक आवंटन घोटाले की केन्द्रीय जांच आयोग की जांच में केन्द्र के हस्तक्षेप के बारे में सीबीआई से विस्तृत रिपोर्ट तलब की है।
आधिकारिक सूत्रों ने आज बताया कि सीबीआई से उसकी ताजा स्थिति रिपोर्ट आयोग को सौंपने को कहा गया है।
सीवीसी ने कोयला ब्लाक आवंटन मामले में सीबीआई जांच में हस्तक्षेप संबंधी खबरों पर संज्ञान लिया है।
यह कदम इस बात के प्रकाश में आने के बाद उठाया गया कि उच्चतम न्यायालय को मामले में सौंपी गयी एजेंसी की मसौदा स्थिति रिपोर्ट में कुछ बदलाव किये गये।

मंगलवार, 12 मार्च 2013

कोयला खदान आवंटन में धांधली हुई: CBI

नई दिल्ली। सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को कोयला घोटाले पर अपनी रिपोर्ट पेश करते हुए कहा कि कोयला खदान आवंटन करते समय नियमों की अनदेखी हुई है।
अदालत ने इस मामले में सरकार और सीबीआई को नोटिस जारी करते हुए हलफनामा भी दायर करने को कहा है। उन्होंने सीबीआई से मामले की रिपोर्ट सरकार को न देकर सीधे अदालत देने का आदेश दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने कोल ब्लॉक आवंटन पर सवाल उठाते हुए सवाल किया कि कुछ कंपनियों को क्यों चुना गया।
सीबीआई ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि सरकार के पास कोल ब्लॉक आवंटन का कोई आधार नहीं था।
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