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बुधवार, 27 मई 2026

माफिया की मुराद पूरी करने के लिए MVDA की 'हाई कोर्ट' को सीधी चुनौती, 'मन्नत रेजीडेंसी' की सील खोली


 जिस सरकारी जमीन को माफिया के कब्जे से मुक्त कराने के लिए सत्ताधारी दल भाजपा के ही एक पार्षद ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में जनहित याचिका (PIL) दाखिल की हुई है, उससे जुड़े हाउसिंग प्रोजक्‍ट 'मन्नत रेजीडेंसी' की बीती 22 मई को मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण (MVDA) ने न सिर्फ सील खोल दी बल्कि ये कहते हुए क्‍लीन चिट भी दे दी कि अब कोई विवाद शेष नहीं है जबकि इलाहाबाद हाई कोर्ट में यह PIL अब भी लंबित है और इसका स्टेटस हाई कोर्ट की वेबसाइट पर जाकर कोई भी चेक कर सकता है।    

इस संबंध में विकास प्राधिकरण के सचिव आशीष कुमार सिंह से जब जानकारी की गई तो उन्होंने बड़ी 'बेशर्मी' के साथ स्‍वीकार किया कि 'मन्नत रेजीडेंसी' की सील खोल दी गई है क्‍योंकि विभिन्न विभागों से ऐसी जानकारी हमें प्राप्त हुई थी। उनके अनुसार 'मन्नत रेजीडेंसी' को लेकर अब मथुरा-वृंदावन नगर निगम को भी कोई आपत्ति नहीं है। 
देखिए मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के सचिव आशीष कुमार सिंह ने इस बावत क्या-क्या कहा-

 
सचिव विकास प्राधिकरण आशीष कुमार सिंह के कथन से स्‍पष्ट होता है कि उन्हें इस पूरे प्रकरण और इसे लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट में लंबित जनहित याचिका की पूरी जानकारी थी, बावजूद इसके उन्होंने ये दुस्साहस करके हाई कोर्ट को सीधी चुनौती दी है। 
गौरतलब है कि मथुरा के पॉश एरिया मसानी लिंक रोड पर जहां मन्नत रेजीडेंसी खड़ी की जा रही है, वहां बाकायदा कभी मथुरा-वृंदावन नगर निगम के बोर्ड लगे हुए थे और उन पर चेतावनी भी दर्ज थी, किंतु माफिया ने नगर निगम की जमीन कब्‍जाने के लिए इन बोर्डों को 'जमींदोज' कर दिया ताकि आगे कोई उंगली न उठा सके। ये फोटो इसकी गवाही दे सकते हैं। 
सचिव विकास प्राधिकरण ने इतनी बड़ी हिमाकत क्यों और कैसे की होगी, इसका अंदाज हर वो व्‍यक्‍ति लगा सकता है जिसका कभी किसी मामले में इस विभाग से वास्ता पड़ा होगा। यही नहीं, जिनका वास्ता न भी पड़ा हो, वो भी मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण की कारगुजारियों से भलीभांति वाकिफ रहते हैं क्‍योंकि भ्रष्‍टाचार इस विभाग की कार्य संस्‍कृति का अभिन्न अंग जो है। 
देखें सचिव आशीष कुमार सिंह के हस्ताक्षर से 22 मई का जारी किया गया वो आदेश जो उनके गले की फांस बन सकता है- 
दरअसल, सचिव आशीष कुमार सिंह ने ये सारा खेल यूं ही नहीं खेला। वो जानते हैं कि यूपी का मथुरा एक ऐसा जिला है जहां उनके पूर्ववर्ती अधिकारियों ने भी खूब मनमानी की है, लेकिन उनमें से आज तक किसी का कुछ नहीं बिगड़ा। इसके ठीक उलट उनमें से कुछ अधिकारी तो आज उनके बॉस बने बैठे हैं। 
हो सकता है कि आशीष कुमार सिंह ने उन्‍हीं से प्राप्त 'फीडबैक' के आधार पर इतना खुलकर खेलने की हिम्मत जुटा ली हो और इलाहाबाद हाई कोर्ट को सीधी चुनौती दे डाली लेकिन जरूरी नहीं कि यदि पूर्ववर्तियों का दांव सीधा पड़ गया तो अब भी यथास्थिति कायम रहेगी। 
इस बार दांव उल्टा पड़ जाने की पूरी संभावना है, वो इसलिए कि याचिकाकर्ता ब्रजेश खरे ने इस मामले में अदालत की अवमानना का केस फाइल करने की पूरी तैयारी कर ली है।

जहां तक सवाल है उसके लिए जरूरी दस्तावेजों का तो वो खुद सचिव ने अपने हस्ताक्षरित पत्र तथा मीडिया को ऑन कैमरा दिए गए बयान से उसकी पूर्ति कर दी है। 
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी 

 

शुक्रवार, 22 मई 2026

कुछ बड़े अधिकारियों को भारी पड़ सकती है माफिया पर मेहरबानी, 'सनसिटी अनंतम' के मामले में PIL दायर


 राष्‍ट्रीय राजधानी दिल्ली और आगरा के बीच भगवान श्रीकृष्ण की पावन लीला स्थली वृंदावन में नेशनल हाईवे 19 के किनारे छटीकरा पर बन रही 'सनसिटी अनंतम' जल्द ही कुछ अधिकारियों के गले की फांस बनने जा रही है।  

दीपक शर्मा पुत्र लक्ष्मीनारायण शर्मा उर्फ ब्रज बिहारी शर्मा निवासी वृंदावन ने इस मामले में जिला प्रशासन के कुछ अधिकारियों की कॉलोनाइजर के रूप में सक्रिय माफिया पर मेहरबानी को इलाहाबाद हाई कोर्ट के सामने रखा है। 

अपनी जनहित याचिका में दीपक शर्मा ने बताया है कि चार महीने पहले मथुरा-वृंदावन नगर निगम ने ये स्वीकार किया कि नगर निगम की जमीन पर 'सनसिटी अनंतम' के मालिकों ने न सिर्फ कब्जा कर रखा है बल्कि उस पर अवैध निर्माण भी करा लिया है, लेकिन आज तक उस भूमि को कब्जा मुक्त नहीं कराया जिससे माफिया और संबंधित अधिकारियों के बीच सांठगांठ की पुष्टि होती है। 

दरअसल, ये सारा खेल इस बेशकीमती सरकारी जमीन को 'लैंड एक्सचेंज' की आड़ में माफिया को देने से जुड़ा है जिसके लिए कई बार नगर निगम की बोर्ड बैठकों में प्रस्ताव पास कराने का प्रयास किया गया किंतु किसी न किसी कारणवश अधिकारी अपने मकसद में सफल नहीं हो सके। 

चूंकि कुछ खास अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को इस काम के लिए बड़ी रकम 'नजराना' के रुप में दी जा चुकी है और उससे भी कई गुना अधिक रकम बतौर 'शुकराना' मिलना शेष है इसलिए वह मीडिया से लेकर आम जनता तक की आंखों में धूल तो झोंक रहे हैं लेकिन सरकरी जमीन को कब्जा मुक्त नहीं करा रहे। 

अधिकारियों की माफिया पर मेहरबानी का अंदाज उस पत्र से लगाया जा सकता है जो नगर निगम मथुरा-वृंदावन की ओर से मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण को लिखा गया था। 

इस पत्र में नगर निगम ने विकास प्राधिकरण को लिखा है कि सनसिटी अनंतम में सरकारी जमीन पर किए जा रहे अवैध निर्माण को रुकवाकर पूर्व में किए गए अवैध निर्माण को ध्‍वस्त किया जाए, किंतु चार महीने बीत जाने के बाद भी न तो अवैध निर्माण रुका और न ध्वस्त कराया गया। 


हालांकि उस वक्त भी 'लीजेंड न्यूज़' ने इस संबंध में प्रमुखता से खबर प्रकाशित की थी जिसे इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ा जा सकता है- 


https://legendnews.in/single-post?s=suncity-anantam-case-nagar-nigam-mathura-vrindavan-got-caught-in-its-own-trap-and-a-single-letter-exposed-its-corrupt-practices-39089

विकास प्राधिकरण ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि नगर निगम अपनी जमीन को कब्जा मुक्त कराने तथा अवैध निर्माण ध्‍वस्त कराने में स्‍वयं सक्षम है जबकि नगर निगम चिट्ठी-चिट्ठी खेल रहा है, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठा रहा। ये स्थिति तो तब है जबकि सरकारी जमीन को कब्जा मुक्त कराने के लिए 'अंतरिक्ष' से कोई दूसरे अधिकारी नहीं भेजे जाएंगे। जो कुछ करना है, यहां तैनात अधिकारियों को ही करना है परंतु उनकी समस्या यह है कि उन्‍हें 'नजराने' का हक भी अदा करना है और 'शुकराना' भी हासिल करना है लिहाजा वह सनसिटी अनंतम के मालिकों की शान में गुस्ताखी करें तो करें कैसे। 

बहरहाल, याचिकाकर्ता दीपक शर्मा ने इस मामले में जिन्हें पक्षकार बनाया है उनमें प्रिंसिपल सेक्रेटरी उत्तर प्रदेश के अलावा म्युनिसिपल कमिश्नर और एडिशनल म्युनिसिपल कमिश्नर मथुरा-वृंदावन नगर निगम, सचिव मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण, एसएसपी मथुरा तथा डायरेक्‍टर सनसिटी अनंतम शामिल हैं। 

दीपक शर्मा ने जनहित याचिका में उच्च न्यायालय से जो प्रेअर की है, उसके मुख्‍य बिंदु हैं- 

1- नगर निगम मथुरा द्वारा खुली नीलामी (Open Auction) एवं विधिसम्मत प्रक्रिया अपनाए बिना सरकारी भूमि का अवैध रूप से विनिमय (Exchange) किए जाने की प्रक्रिया चलाई जा रही है, जिससे केवल प्रतिवादी संख्या–6 अर्थात सनसिटी अनंतम को अनुचित लाभ पहुँचाया जा रहा है। 

2- यह स्पष्ट नहीं है कि मथुरा-वृंदावन नगर निगम द्वारा अत्यंत मूल्यवान सरकारी भूमि को बिना किसी खुली बोली, पारदर्शी प्रक्रिया एवं वास्तविक बाजार मूल्यांकन के प्रतिवादी संख्या–6 को क्यों दिया जा रहा है, जो कि विधि एवं जनहित दोनों के विरुद्ध है इसलिए उसे निजी लाभ हेतु किसी निजी कंपनी को न सौंपा जाए।

3- प्रस्तावित 'अवैध भूमि विनिमय' पूर्णतः जनहित के विरुद्ध है तथा केवल प्रतिवादी संख्या–6 को लाभ पहुँचाने हेतु किया जा रहा है। नगर निगम द्वारा भूमि का मूल्य मात्र ₹10,000 प्रति वर्गमीटर दर्शाया गया है, जबकि प्रतिवादी संख्या–6 उसी क्षेत्र में लगभग ₹85,000 प्रति वर्ग मीटर की दर से प्लॉट विक्रय कर रहा है। यह तथ्य स्वयं अधिकारियों एवं प्रतिवादी संख्या–6 के मध्य भ्रष्टाचार एवं मिलीभगत को प्रदर्शित करता है।

4- संबंधित प्राधिकरण स्वयं स्वीकार कर चुका है कि प्रतिवादी संख्या–6 द्वारा सरकारी भूमि पर बिना अनुमति अवैध निर्माण किया गया है तथा प्रतिवादी संख्या–3 द्वारा प्रतिवादी संख्या–4 को अवैध निर्माण रोकने एवं ध्वस्तीकरण हेतु रिपोर्ट भी भेजी गई, किन्तु प्रतिवादी संख्या–4 द्वारा कोई कार्रवाई नहीं की गई, जो कि विधि एवं नागरिकों के मौलिक अधिकारों के विरुद्ध है।

5- याचिकाकर्ता द्वारा प्रतिवादी संख्या–2, 3, 4 एवं 5 को अनेक शिकायतें प्रस्तुत की गईं, किन्तु किसी भी सक्षम प्राधिकारी द्वारा कोई वैधानिक कार्रवाई नहीं की गई। जबकि भूमि का वास्तविक बाजार मूल्य लगभग ₹1,00,000 प्रति वर्ग मीटर है, तथापि विनिमय मात्र ₹10,000 प्रति वर्ग मीटर की दर से प्रस्तावित किया गया है, जो कि Uttar Pradesh नगर निगम अधिनियम 1916 एवं संविधान के अनुच्छेद 14 एवं 21 का उल्लंघन है।

6- विवादित भूमि सरकारी भूमि है तथा उसका उपयोग जनता की आवश्यक सुविधाओं जैसे विद्यालय, अस्पताल, पार्क एवं अन्य सार्वजनिक उपयोग हेतु किया जाना चाहिए, जो कि संविधान के अनुच्छेद 14 एवं 21 के अंतर्गत प्रदत्त अधिकारों का अभिन्न हिस्सा है।

7- नगर निगम द्वारा उक्त भूमि को जनहित के स्थान पर निजी लाभ हेतु प्रतिवादी संख्या–6 को दिए जाने का प्रयास किया जा रहा है जबकि संबंधित क्षेत्र में पार्क एवं अस्पताल जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव है, अतः उक्त भूमि का उपयोग जनकल्याण हेतु किया जाना न्यायोचित एवं आवश्यक है।

8- उपर्युक्त तथ्यों एवं परिस्थितियों को दृष्टिगत रखते हुए माननीय न्यायालय से विनम्र प्रार्थना है कि कृपया प्रतिवादी संख्या–4 को दिनांक 22.01.2026 की रिपोर्ट/आदेश, जो प्रतिवादी संख्या–3 द्वारा पारित किया गया था, का अनुपालन सुनिश्चित करने हेतु परमादेश (Mandamus) जारी करने की कृपा करें।

9- प्रतिवादी संख्या–1 को माननीय न्यायालय की निगरानी में एक स्वतंत्र समिति गठित कर उक्त अवैध भूमि विनिमय प्रक्रिया की निष्पक्ष जाँच कराने हेतु निर्देशित करने की कृपा करें।

10- प्रतिवादी संख्या–1, 2, 3 एवं 4 को निर्देशित किया जाए कि विवादित सरकारी भूमि का उपयोग जनहित में विद्यालय, कॉलेज, अस्पताल, पार्क अथवा अन्य सार्वजनिक उपयोग हेतु किया जाए।

11- प्रतिवादी संख्या–5 को याचिकाकर्ता की सुरक्षा सुनिश्चित करने तथा प्राप्त शिकायतों पर विधिसम्मत कार्रवाई करने हेतु निर्देशित करने की कृपा करें।

12- माननीय न्यायालय परिस्थितियों के अनुसार जो अन्य उचित आदेश अथवा निर्देश पारित करना उचित समझे, वह भी पारित करने की कृपा करें। 

यहां यह जान लेना बहुत जरूरी है कि सनसिटी अनंतम के पक्ष में अधिकारियों के खुलकर खेलने का यह काम कोई हाल-फिलहाल शुरू नहीं हुआ। यह पिछले कई वर्षों से खेला जा रहा है। इस बीच कई अधिकारी आए, और चले भी गए किंतु सनसिटी अनंतम के मालिकों को लेकर 'समर्पण का भाव' किसी में कम नहीं हुआ क्योंकि इस प्रोजेक्ट का मालिकाना हक जिनके पास है, उनकी तूती कई राज्यों में बोलती है। 

चूंकि आज भी आमजन की आखिरी उम्मीद न्यायपालिका से ही लगी है इसलिए इस मामले में भी अंतत: न्यायपालिका की ही शरण लेनी पड़ी। अब देखना यह है कि 'नजराना' लेकर बैठे अधिकारी 'शुकराना' हासिल करने में सफल होते हैं या फिर अपनी इस लगातार की जा रही हिमाकत का खामियाजा भुगतते हैं। 

-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी


बुधवार, 11 मार्च 2026

विस्फोटक खुलासा: माफिया ने करोड़ों की सरकारी जमीन का कर दिया सौदा, नगर निगम अब केवल कागजों पर काबिज

 


 माफिया ने करोड़ों की सरकारी जमीन पर केवल कब्जा ही नहीं किया, बल्कि उसका कई हिस्‍सों में सौदा भी कर दिया और नगर निगम मथुरा-वृंदावन अब तक अपनी इस जमीन पर किए गए अवैध निर्माण को ध्वस्त कराने की दिखावटी कोशिश में लगा है ताकि लैंड एक्सचेंज के लिए लाए गए प्रस्ताव की पेशगी का हक अदा किया जा सके। 

वृंदावन के छटीकरा रोड पर स्‍थित सनसिटी अनंतम के लिए नगर निगम मथुरा-वृंदावन की बोर्ड बैठक में बार-बार लैंड एक्सचेंज का लाया गया प्रस्ताव भले ही अभी पास नहीं हुआ हो परंतु बिल्डर के रूप में सक्रिय माफिया ने न सिर्फ सरकारी जमीन पर कब्जा कर लिया बल्‍कि उसका सौदा भी कर दिया। 
बिल्डर के इस दुस्साहस का खुलासा तब हुआ जब सत्ताधारी दल भाजपा के ही कई निगम पार्षदों ने विभिन्न स्तर पर इसकी शिकायत की और सरकारी जमीन को खुर्द-बुर्द करने की जांच कराने के साथ इसके लिए जिम्मेदार पदाधिकारियों पर एक्शन लेने की मांग कर डाली। 
पार्षदों की मानें तो सनसिटी अनंतम के हक में लैंड एक्सचेंज का प्रस्ताव पास कराने पर नगर निगम मथुरा-वृंदावन इस कदर आमादा है कि अब उसके लिए दूसरी फर्मों के नाम का उपयोग किए जाने की तैयारी है जिससे सांप मर जाए और लाठी भी न टूटे। 
किन-किन भाजपा पार्षदों ने की है शिकायत? 
इस संबंध में एक शिकायत तो वार्ड नंबर 37 के भाजपा पार्षद राजीव कुमार सिंह ने 20 जनवरी 2026 को प्रदेश के नगर विकास मंत्री से की है। भाजपा पार्षद ने मंत्री महोदय को लिखा है कि नगर निगम मथुरा-वृंदावन के अंतर्गत सनसिटी अनंतम के लिए लैंड एक्सचेंज का प्रस्‍ताव पास हुए बिना सरकारी जमीनों का विक्रय तथा उन पर विकास कार्य करने एवं अन्य फर्जी कंपनियों का समावेश करने की तत्काल जांच कराकर प्रभावी कार्रवाई की जाए।  
भाजपा पार्षद ने लिखा है कि कृपया कार्यकारिणी की बैठक दिनांक 28.09.2022 के प्रस्ताव संख्‍या 9 एवं बोर्ड बैठक 15.11.2022 के प्रस्ताव संख्‍या 12 का अवलोकन करें जिसमें सनसिटी हाईटेक और उसकी सहायक कंपनी मै. अश्वमेघा कॉलोनाइजर्स का नाम सुनिश्‍चित किया गया था किंतु बोर्ड बैठक दिनांक 09.10.2025 के प्रस्ताव संख्‍या 2 को देखें तो उसमें सनसिटी हाईटेक प्रा. लि. के अलावा अक्षज रियलटर्स प्रा. लि. एवं सनसिटी इन्‍फ्रा रियलटर्स प्रा. लि. व सनसिटी प्रॉजेक्ट्स जैसी नई कंपनियों के नाम जोड़ दिए गए। 
तीन वर्ष पहले के प्रस्ताव में जहां मुख्‍य कंपनी की मात्र एक सहायक कंपनी थी, वहीं 2025 के प्रस्ताव में मुख्‍य कंपनी का बदल जाना और तीन नई कंपनियों का उदय हो जाना जाहिर कराता है कि इस सबके पीछे सरकारी जमीन को हस्तांतरित करने की कोई बड़ी साजिश रची जा रही है। 
भाजपा पार्षद राजीव कुमार सिंह ने अपने शिकायती पत्र में सवाल उठाया है कि अभी जबकि लैंड एक्सचेंज का प्रस्ताव पास ही नहीं हुआ तो सनसिटी अनंतम ने कैसे तो निगम की जमीन पर निर्माण कार्य शुरू कराया और कैसे उस जमीन का सौदा किया? 
राजीव कुमार सिंह के इस शिकायती पत्र पर वार्ड नंबर 16 के पार्षद गुलशन, गऊघाट क्षेत्र की पार्षद नीलम गोयल, वार्ड नंबर 31 के पार्षद मुन्ना मलिक तथा वार्ड नंबर 68 के पार्षद  कुलदीप पाठक ने भी हस्ताक्षर किए हैं। 
इसी संदर्भ में एक अन्य शिकायत वार्ड नंबर 17 के पार्षद ब्रजेश खरे ने मंडलायुक्त (आगरा मंडल) से की है। जिस पर वार्ड नंबर 56 के पार्षद कुंजबिहारी भारद्वाज, वार्ड नंबर 60 के पार्षद नीरज वशिष्‍ठ, वार्ड नंबर 46 के पार्षद चौधरी राजवीर सिंह ने भी अपने हस्ताक्षर किए हैं। 
इस पत्र में पार्षदों ने अवगत कराया है कि नगर निगम मथुरा-वृंदावन की दिनांक 09.10.2025 को संपन्न हुई बोर्ड बैठक प्रस्‍ताव संख्‍या 03 के द्वारा द्वारिकादास जीवराजका मैमोरियल ट्रस्ट एवं हरिनिवास खेतान मैमोरियल ट्रस्ट के हाउसिंग प्रोजेक्ट के लिए तथ्‍यों को छिपाकर नगर निगम की बेशकीमती जमीन को लैंड एक्सचेंज के नाम पर खुर्द-बुर्द किया गया है जिसकी उच्‍च स्‍तरीय जांच कराना अत्यंत आवश्‍यक है। 
इन पार्षदगणों ने स्‍पष्‍ट तौर पर लिखा है कि इस प्रक्रिया के तहत निगम की जमीन और उसके बदले निगम को मिलने वाली जमीन के दामों में 'जमीन-आसमान' का अंतर है जिससे प्रतीत होता है कि सारा खेल किसी खास मकसद से तथा निजी स्‍वार्थों की पूर्ति के लिए खेला जा रहा है। वो भी तब जबकि प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साफ-साफ निर्देश हैं कि निकायों की जमीन संरक्षित की जाए और उन जमीनों पर आय के स्‍त्रोत विकसित कर नगर निगमों को आमनिर्भर बनाए जाए। 
यमुना के प्रदूषण की मुक्ति के नाम पर भी बड़ा घोटाला किए जाने की तैयारी में है नगर निगम मथुरा-वृंदावन 
इस सबके अलावा नगर निगम मथुरा-वृंदावन यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने के नाम पर भी एक और बड़ा घोटाला करने की तैयारी में है। 
न‍िगम के ही सूत्रों से प्राप्‍त जानकारी के अनुसार इसके लिए 'वेल्‍युसेंट फाउंडेशन' (Valucent Foundation) नाम की किसी संस्‍था या फर्म के साथ निगम ने पिछले महीने बाकायदा एक एमओयू भी साइन किया है जिससे सब-कुछ जायज ठहराया जा सके लेकिन निगम की नीयत में खोट का अंदाज इस बात से ही लगाया जा सकता है कि निगम ने न तो अब तक इस एमओयू को सार्वजनिक किया है और न इसके बारे में निगम का कोई अधिकारी या कर्मचारी मुंह खोलने को तैयार है। यहां तक कि पार्षद भी इसकी पूरी जानकारी पाने में अब तक सफल नहीं हुए हैं। 
सूत्रों का कहना है कि इसी महीने होने वाली बोर्ड बैठक में इसका भी प्रस्‍ताव पास कराने की कोशिश की जाएगी क्योंकि सनसिटी अनंतम की तरह निगम इसमें अपनी छीछालेदर नहीं कराना चाहता। 
जो भी हो, इतना तो तय है कि नगर निगम में व्‍याप्त भ्रष्टाचार, मथुरा को लेकर इस लोकोक्‍ति को सार्थक जरूर करता है कि 'मथुरा तीन लोक से न्‍यारी'। 
क्‍योंकि दर्जनों बार मथुरा आ चुके सूबे के ईमानदार सीएम योगी आदित्यनाथ को न तो अब तक यहां के भ्रष्‍टाचार की भनक लगी है और न अपनी ही पार्टी के पार्षदों के शिकायती पत्रों का संज्ञान लिया गया है। 
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

 

शनिवार, 14 फ़रवरी 2026

योगी जी! यहां तो 'सरकार' ही करा रहे हैं 'सरकारी जमीन' पर माफिया का कब्जा, अब आप क्या करेंगे?


 उत्तर प्रदेश फार्मा कॉन्क्लेव 1.0 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का दिया गया एक बयान इन दिनों बहुत वायरल हो रहा है। इस बयान में वह प्रदेश के 'लैंड बैंक' का जिक्र करते हुए बताते हैं कि हमने सत्ता संभालने के बाद 'भूमाफिया टास्क फोर्स' गठित कर भूमाफिया को इस आशय की कड़ी चेतावनी दी कि वह या तो 24 घंटों के अंदर सरकारी जमीन खाली कर दे अन्यथा जमीन तो कब्जा मुक्त करवाई ही जाएगी, साथ ही उससे जो लाभ अर्जित किया गया है उसकी भी वसूली ब्‍याज सहित की जाएगी। 

सीएम योगी का बयान सर-माथे, लेकिन उन्हें ये कौन बताए कि जब स्‍वयं को संपूर्ण सरकार मानकर काम करने वाले जिला स्तरीय अधिकारी ही माफिया से मिलीभगत कर सरकारी जमीन पर कब्जा करा रहे हों, तो उनसे निपटने के लिए कौन सी टास्क फोर्स सामने आएगी और उनके द्वारा अर्जित किए गए लाभ की ब्याज सहित वसूली कैसे होगी। 
मामला योगीराज श्रीकृष्ण की पावन क्रीड़ास्थली वृंदावन से जुड़ा है। जहां भूमाफिया की शक्ल में सक्रिय कॉलोनाइजर को नगर निगम की बेशकीमती जमीन देने की आतुरता में बार-बार बोर्ड बैठक के दौरान प्रस्ताव रखा जाता है और मीडिया द्वारा सारे खेल का खुलासा करने पर जिम्‍मेदार अधिकारी बाकायदा जांच कराकर लिखत-पढ़त में यह स्वीकार करते हैं कि लैंड एक्सचेंज का प्रस्ताव पास होने से पहले ही निगम की जमीन पर माफिया काबिज है और उसने वहां अवैध निर्माण करा लिया है। 
यही नहीं, नगर निगम द्वारा अपनी जमीन पर किए गए अवैध निर्माण को ध्वस्त कराने के लिए 31 जनवरी 2026 के दिन डेवलपमेंट अथॉरिटी के नाम एक चिट्ठी भी लिखी जाती है परंतु न डेवलपमेंट अथॉरिटी के कान पर जूं रेंगती है और न उस सरकारी विभाग के, जिसकी जमीन को माफिया ने कब्जा लिया है। 
मतलब नगर निगम ने मात्र चिट्ठी लिखकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली जबकि डेवलपमेंट अथॉरिटी कहती है कि नगर निगम तो अपनी जमीन स्‍वयं कब्जामुक्त कराने का अधिकार रखता है। 
सच्चाई जो भी हो, फिलहाल तो जहां अधिकारियों का यह खेल जारी है वहीं माफिया इस प्रयास में लगा है कि किसी भी तरह सरकारी पत्राचार को यहीं विराम देकर अपना काम आगे बढ़ाया जाए। 
बहरहाल, 'जिले की सरकार' ये खेल क्यों खेल रही है और माफिया को इतना मौका कैसे मिल रहा है... यह समझना 'रॉकेट सांइस' जितना जटिल नहीं है। 
तब तो कतई नहीं जब मीडिया द्वारा इस बावत प्रश्न पूछने पर अधिकारी, मीडिया को ही देख लेने की धमकी देने लगें और नगर निगम में दोबारा घुसने का साहस करने पर सबक सिखाने की चेतावनी देकर सुरक्षागार्डों से बाहर का रास्ता दिखवा दें। 
जाहिर है कि वृंदावन में डेवलप की जा रही सनसिटी अनंतम के मालिकों से पर्दे के पीछे कोई तो ऐसा 'छद्म एमओयू' साइन हुआ है जिसका मसौदा सामने आने पर हमाम के सारे चेहरे सामने आ सकते हैं। 
यदि ऐसा नहीं हैं तो यह कैसे संभव है कि सीएम योगी के सारे आदेश-निर्देश ताक पर रखकर किसी जिले की सरकार अपनी बेशकीमती सरकारी जमीन का किसी निजी टाउनशिप के लिए विनिमय करने पर 'आमादा' है और ऊपर से नीचे तक के सारे अधिकारी एक-दूसरे के कंधे पर बंदूक रखकर काम पूरा करना चाहते हैं। 
मीडिया के सामने आकर जवाब देने की बजाय क्यों ये अधिकारी चिट्ठी-चिट्ठी खेलते हुए निजी टाउनशिप के लिए भी लैंड एक्सचेंज की पॉलिसी को जायज ठहराने के प्रयास में लगे हैं। 
क्यों वो अपने ही पत्राचार में एक ओर तो स्वीकार करते हैं कि सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा और अवैध निर्माण कर लिया गया है और दूसरी ओर उसी माफिया के पक्ष में लाए गए लैंड एक्सचेंज के प्रस्ताव को नियम-कानून सम्मत ठहराने की कोशिश कर रहे हैं। 
इसमें दो राय नहीं कि सीएम योगी के प्रयास से प्रदेश में सक्रिय माफिया हतोत्साहित हुआ है, लेकिन सच यह भी है जो सामने है और सबको दिखाई दे रहा है। अगर कोई आंखें मूंदे बैठा है तो वो तबका जो हर जिले में अपनी एक समानांतर सरकार चलाता है और जिसके प्रोत्साहन से माफिया 'जीरो टॉलरेंस' को भी 'जीरो' बनाकर छोड़ देता है। 
बेहतर होगा सीएम योगी एकबार मथुरा जनपद के उस लैंड बैंक का भी मौका मुआयना कर लें और जान लें कि कैसे उस बेशकीमती लैंड बैंक में माफिया और अधिकारियों का कॉकस पूरी शिद्दत से सेंध लगा रहा है।  
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी

गुरुवार, 10 अक्टूबर 2024

डालमिया मामले में विस्फोटक खुलासा: वृंदावन के बाग का कोई एग्रीमेंट हुआ ही नहीं, पोंजी स्कीम की तरह माफिया ने किया हजारों करोड़ का फ्रॉड


 मथुरा। वृंदावन के डालमिया बाग का मामला कोई सामान्य सौदा न होकर पूरी साजिश से किया गया हजारों करोड़ रुपए का ऐसा फ्रॉड है जिसे पहले तो माफिया ने पोंजी स्‍कीम की तरह अंजाम तक पहुंचाया और फिर निवेशकों को उसके जाल में फंसाकर मोटी रकम हड़पी गई। 

धर्म की नगरी में अधर्म के सहारे खेले गए इस खेल की कोई सामान्य कारोबारी तो कल्पना तक नहीं कर सकता। 
डालमिया परिवार के साथ वृंदावन के बाग का नहीं हुआ कोई एग्रीमेंट 
किसी को भी यह जानकार घोर आश्चर्य हो सकता है कि डालमिया परिवार ने वृंदावन के अपने बाग का कोई एग्रीमेंट नहीं किया। जिसे एग्रीमेंट बता कर निवेशकों को गुमराह किया गया, वह वास्‍तव में मात्र एक Memorandum of understanding (MOU) है, न कि एग्रीमेंट। सामान्य भाषा में कहें तो एमओयू और एग्रीमेंट के बीच मुख्य अंतर है उनकी कानूनी प्रवर्तनीयता (Enforceability)। एग्रीमेंट कानूनी रूप से बाध्यकारी एक दस्तावेज है जबकि एमओयू नहीं। 
कोलकाता के डालमिया परिवार ने वृंदावन निवासी गिर्राज अग्रवाल तथा मथुरा निवासी आशीष कौशिक की पार्टनरशिप फर्म राधामाधव डेवलेपर्स के साथ वर्ष 2023 में एक एमओयू साइन किया है जिसकी कोई कानूनी अहमियत नहीं है। उसे बाग के सौदे का कोई दस्तावेज नहीं माना जा सकता। यदि बाग के सौदे का कोई एग्रीमेंट हुआ होता तो अनुबंध की शर्तों का उल्लंघन करने वाले को अदालत में घसीटा जा सकता था लेकिन एमओयू साइन करने भर से ऐसा नहीं किया जा सकता। 
इसका सीधा-सीधा अर्थ यह होता है कि डालमिया परिवार द्वारा सौदा कैंसिल किए जाने की चर्चा निराधार नहीं है। वह जब चाहे एमओयू को खारिज कर सकता है। 
कोलकाता में तो एग्रीमेंट कराया ही नहीं जा सकता था 
यहां यह भी समझना बहुत जरूरी हो जाता है कि डालिमया परिवार किसी भी तरह कोलकाता में बैठकर बाग का एग्रीमेंट नहीं कर सकता और यह बात दोनों पक्ष भली प्रकार जानते होंगे। कानूनन किसी जमीन का एग्रीमेंट उसी तहसील क्षेत्र में रजिस्‍टर्ड हो सकता है जहां वह जमीन है, न कि किसी दूसरे शहर में। 
इसके अलावा रजिस्‍टर्ड एग्रीमेंट के लिए यह आवश्यक है कि विक्रेता द्वारा क्रेता से ली जा रही रकम पर निर्धारित स्‍टांप ड्यूटी देय होगी। यदि ऐसा नहीं किया जाता तो यह कृत्य कर की चोरी के दायरे में आता है जिससे बड़ी मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। 
जाहिर है कि ऐसे में डालमिया बाग के सौदे को लेकर अब तक प्रचारित की गईं सभी बातें न सिर्फ भ्रामक हैं बल्‍कि किसी खास उद्देश्‍य की पूर्ति के लिए फैलाया गया सोचा-समझा झूठ है। 
डालमिया परिवार और राधामाधव डेवलेपर्स के दो साझेदारों गिर्राज अग्रवाल तथा आशीष कौशिक द्वारा साइन किए गए एमओयू से पूरी तरह साबित होता है कि सैकड़ों करोड़ के इस सौदे की शुरूआत ही नेकनीयत से नहीं की गई। 
बेशक यह जांच का विषय हो सकता है कि ऐसा करने के पीछे मूल रूप से बदनीयती किसकी है, परंतु इस बात में कोई शक नहीं रह जाता कि निवेशकों को गुमराह किया गया और उनसे एग्रीमेंट को लेकर झूठ बोला गया। 
डालमिया परिवार द्वारा सौदे का इनकम टैक्स जमा कराने वाली बात भी नितांत झूठ 
बाग के सौदे को लेकर लगातार बोले जा रहे झूठ का एक हिस्‍सा वह भी है जिसमें कहा गया कि डालमिया परिवार ने तो ली गई रकम पर बनने वाला इनकम टैक्स भी जमा करा दिया है जबकि मात्र एमओयू साइन करने की स्‍थिति में कोई टैक्स बनता ही नहीं। 
एग्रीमेंट कराया होता तो नंबर एक में लिए गए पेमेंट का पूरा ब्‍यौरा देना पड़ता किंतु एमओयू साइन करने के लिए उसकी दरकार नहीं होती। डालमिया परिवार ने इसीलिए एमओयू में प्राप्त रकम तथा बकाया रकम का जिक्र तो जरूर किया है परंतु इसका उल्लेख कहीं नहीं किया कि वो रकम उसे किस माध्‍यम से प्राप्त हुई।  
मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण भी साजिश में शामिल 
इस पूरे प्रकरण को गौर से देखें तो मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण भी पूरी साजिश का हिस्‍सा मालूम पड़ता है क्योंकि उसके जिम्मेदार अधिकारी अब तक मौन साधे बैठे हैं। 
बिना नक्शा पास कराए मामूली निर्माण की सूचना पाकर किसी के भी यहां जा धमकने वाले और नोटिस पर नोटिस जारी करने वाले विकास प्राधिकरण के अधिकारियों ने डालमिया बाग मामले में कोई संज्ञान नहीं लिया। 
सब जानते हैं कि डालमिया बाग में रियल एस्टेट प्रोजेक्ट डेवलेप करने के लिए गुरूकृपा तपोवन के नाम से एक नक्शा पेश किया गया है। यह नक्शा मीडिया में भी प्रकाशित व प्रचारित हो चुका है। इसी नक्शे को आधार बनाकर निवेशकों को आकर्षित किया गया और उनसे अच्‍छी-खासी रकम ऐंठी गई। 
डालमिया बाग से रातों-रात सैकड़ों हरे पेड़ काटे जाने के बाद जब यह मामला चर्चा में आया और वनविभाग ने डालमिया परिवार के साथ गुरुकृपा तपोवन के मालिक का नाम भी एफआईआर में दर्ज कराया तो गुरुकृपा तपोवन के मालिक ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि उसका इस मामले से कोई लेना-देना नहीं है। 
चूंकि डालमिया परिवार और राधामाधव डेवलेपर्स के बीच साइन हुए एमओयू में भी गुरुकृपा तपोवन के मालिक का नाम नहीं है तो सवाल यह पैदा होता है कि मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण में गुरूकृपा तपोवन के नाम से नक्शा किसने पेश कर दिया? 
इससे भी बड़ी बात यह है कि मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण की ओर से गुरूकृपा तपोवन का नक्शा न तो आज तक खारिज किया है और न फर्जी नक्शा पेश करने वाले के खिलाफ कोई कानूनी कार्यवाही अमल में लाई गई है। 
आश्‍चर्यजनक रूप से गुरुकृपा तपोवन के मालिक ने भी नक्शा पेश करने वाले के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करना जरूरी नहीं समझा जिससे मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण की भूमिका पर संदेह होना स्‍वाभाविक है। 
पोंजी स्कीम की तरह माफिया ने किया हजारों करोड़ का फ्रॉड 
एक अनुमान के अनुसार कथित रियल एस्‍टेट प्रोजेक्ट गुरुकृपा तपोवन के नाम पर अब तक एक हजार करोड़ रुपए से अधिक की रकम बतौर एडवांस ली जा चुकी है जबकि ऐसा कोई प्रोजेक्ट फिलहाल धरातल पर है ही नहीं। डालमिया बाग का एग्रीमेंट होना तो दूर, उसके अंजाम तक पहुंचने की संभावना दिखाई नहीं दे रही। 
जो एमओयू साइन किया गया है, उसकी कोई कानूनी अहमियत नहीं है। बावजूद इसके निवेशकों को लगातार गुमराह किया जा रहा है। कहा जा रहा है कि सब ठीक कर देंगे। पैसे में बड़ी ताकत है। 
अभी और खुलेंगे बहुत से राज 
ऐसे में तय है कि अभी बहुत से राज खुलने बाकी हैं। जैसे कि राधामाधव डेवलेपर्स में गिर्राज अग्रवाल तथा आशीष कौशिक के अतिरिक्त भी क्या और पार्टनर है, यदि हैं तो वो कौन-कौन हैं। उनकी भूमिका अब तक क्या रही है। निवेशकों से पैसा किस-किस ने लिया और किस आधार पर लिया। 
ईडी ने ली इनकम टैक्स विभाग से जानकारी 
सूत्रों से प्राप्‍त जानकारी के अनुसार इस मामले में ईडी ने इनकम टैक्स विभाग से भी जानकारी मांगी है ताकि राधामाधव डेवलेपर्स के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष हिस्‍सेदारों का पता लगाया जा सके, साथ ही इस फर्म का वास्तविक स्‍टेटस जाना जा सके। 
ईडी को पूरा भरोसा है कि कृष्‍ण की पावन जन्मभूमि पर जमीन की आड़ में खेले गए इस सबसे बड़े खेल का पर्दाफाश होगा तो बहुत से चौंकाने वाले चेहरे बेनकाब होंगे। 
बस देखना यह है कि उसके शिकंजे में कौन-कौन फंसता है और कब तक फंसता है क्योंकि सरकारी मशीनरी की कछुआ चाल से फिलहाल तो माफिया के बुलंद हौसले सबको चुनौती देते दिखाई दे रहे हैं। हालांकि यह मानने वालों की भी कमी नहीं जो कहते हैं कि इन्‍होंने सैकड़ों हरे पेड़ों को काटकर जो पाप किया है, वही एक दिन इन्‍हें कहीं का नहीं छोड़ेगा। 
बहरहाल, इस सबसे इतर यह जानकर निश्‍चित ही निवेशकों पर पहाड़ टूट पड़ेगा जब उन्‍हें पता लगेगा कि डालमिया परिवार से बाग का सौदा और एग्रीमेंट किए जाने जैसी बातें पूरी तरह बेबुनियाद हैं, लिहाजा उनका पैसा पूरी तरह खटाई में पड़ चुका है। 
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

मंगलवार, 8 अक्टूबर 2024

डालमिया बाग का एंग्रीमेंट कैंसिल करने की खबर से परेशान माफिया अब मीडिया को मैनेज करने में जुटा


 मथुरा। वृंदावन के डालमिया बाग का एग्रीमेंट कैंसिल करने की खबर से परेशान माफिया अब मीडिया को मैनेज करने में जुट गया है, क्योंकि एग्रीमेंट कैंसिल होने की खबर के बाद निवेशकों ने उस पर पैसा लौटाने के लिए अच्‍छा-खासा दबाव बनाना शुरू कर दिया है। 

सैकड़ों हरे पेड़ों को काटने की जिम्मेदारी लेने से भी भाग रहे माफिया ने आज तक न तो अपने ''कथित नंबर एक'' में हुए सौदे की सच्‍चाई सामने रखी है और न ये बताया है कि आखिर डालमिया परिवार से उसके बगीचे का एग्रीमेंट किस-किसने किया तथा किन शर्तों पर किया। 
ऐसे में अब इस पूरे सौदे पर उठ रहे कुछ ऐसे सवाल ''माफिया'' से लेकर ''मीडिया'' तक को सवालों के घेरे में ले रहे हैं जिनका जवाब देना उनके लिए जरूरी हो जाता है, और यदि वो उसके जवाब नहीं देते तो उनकी नीयत स्‍वत: संदिग्ध साबित हो जाती है। 
कहा जा रहा है कि डालमिया परिवार ने अपने बाग का सौदा आठ समझौता पत्रों (एग्रीमेंट) के जरिए किया तथा हर एग्रीमेंट के साथ एक निर्धारित रकम ली गई और डालिमया परिवार ने एग्रीमेंट में मिली इस रकम का आयकर तक जमा कर दिया। एग्रीमेंट करने वालों ने शंकर सेठ से सौदा बाद में किया।   
बस यहीं से माफिया के साथ-साथ मीडिया की भी नीयत में खोट नजर आने लगता है और ये खोट बहुत महत्वपूर्ण सवाल खड़े करता है। 
सवाल नंबर एक: यदि डालमिया परिवार से आठ समझौता पत्रों के जरिए पूरी नेक नीयत से सौदा किया गया है तो दोनों ही पक्षों को यानी विक्रेता और क्रेता को उसे सार्वजनिक करने में हर्ज क्या है? 
सवाल नंबर दो: किसी भी सौदे का एग्रीमेंट कर लेने भर से वह इनकम टैक्स तो क्या किसी भी टैक्‍स के दायरे में नहीं आ जाता, यह बात छोटे से छोटा व्‍यापारी भी जानता है। तो फिर डालमिया परिवार ने डील फाइनल हुए बिना मात्र एडवांस पर इनकम टैक्स कैसे जमा कर दिया जबकि यह तो ''जीएसटी तथा कैपिटल गेन'' का भी मामला नहीं बनता। इस बात की पुष्‍टि किसी भी चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) से की जा सकती है।   
सवाल नंबर तीन: कहीं ऐसा तो नहीं कि यह सारा खेल मीडिया को मैनेज करके निवेशकों को गुमराह करने के लिए खेला जा रहा हो जिससे किसी भी तरह अपने ऊपर पड़ रहे दबाव को कम किया जा सके। 
सवाल नंबर चार: जब डालमिया परिवार से सौदा बाकायदा एग्रीमेंट करके किया गया है और हर एग्रीमेंट के साथ एक निर्धारित रकम उसे दी गई है तो शंकर सेठ ने भी अपना सौदा स्‍थानीय खरीदारों से किसी न किसी एग्रीमेंट के साथ किया होगा। शंकर सेठ ने भी अपनी रकम सुरक्षित करने के लिए कोई न कोई लिखा-पढ़ी कराई होगी। तो फिर पेड़ कटने के बाद से लेकर अब तक शंकर सेठ क्यों कह रहा है कि उसका इस सौदे से कोई वास्ता नहीं है और पेड़ों को काटने में उसकी किसी भूमिका का प्रश्‍न ही पैदा नहीं होता। जमानत के लिए कोर्ट में भी उसके वकीलों द्वारा यही दलील क्यों दी गई। 
सवाल नंबर पांच: यदि डालमिया परिवार से लेकर एग्रीमेंट कराने वालों तक और उनसे लेकर शंकर सेठ तक सब के सब पाक साफ हैं, सौदा भी पूरी ईमानदारी से नंबर एक में हुआ है तो सब मिलकर क्यों एक प्रेस कॉन्‍फ्रेंस नहीं कर देते। क्यों नहीं बता देते कि एक रियल एस्टेट प्रोजेक्ट खड़ा करने के लिए यह सौदा किया गया है और सौदे में कोई बदनीयत नहीं है। 
इस प्रेस कॉन्फ्रेस में सब अपनी-अपनी भूमिका भी साफ कर सकते हैं। उसके बाद मुद्दा रह जाएगा केवल सैकड़ों हरे वृक्षों को रातों-रात काट डालने का, तो उसकी जांच चलती रहेगी। एनजीटी में दायर याचिकाओं का भी समय पर निपटारा हो ही जाएगा। 
और आखिरी सवाल यह कि शंकर सेठ की रियल एस्टेट फर्म गुरूकृपा तपोवन के नाम से जो नक्शा मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के पास भेजा गया है, वो किसने और किस अधिकार से दाखिल किया है? 
सच तो यह है कि इनमें से किसी भी सवाल का जवाब देना आसान नहीं है इसलिए सारे सफेदपोश अपना मुंह छिपाए घूम रहे हैं और अब तक किसी ने सीना ठोक कर नहीं कहा कि सौदा उसने किया है। 
बेशक जमीन का सौदा करना गुनाह नहीं, लेकिन वह तब गुनाह बन जाता है जब उसके लिए कानून को ताक पर रखकर नियम विरुद्ध ऐसे-ऐसे काम किए जाएं जो एक ओर अपराध की परिधि में आते हों तथा दूसरी ओर उनसे एक बड़े वर्ग की भावनाएं भी आहत होती हों।  
मीडिया को भी अब एक बात और साफ कर देनी चाहिए कि कब तक वह अतार्किक बातें छापता रहेगा और कब तक सफेदपोशों को बचाने के लिए अपने जमीर का सौदा करता रहेगा। 
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

गुरुवार, 26 सितंबर 2024

वृंदावन का डालमिया बगीचा कांड: पहली बार अपने ही बुने जाल में फंसता नजर आ रहा है मथुरा का माफिया


 संभवत: पहली बार भगवान कृष्‍ण की पावन जन्मस्थली और क्रीड़ा स्थली मथुरा-वृंदावन का माफिया डालमिया बगीचे पर जल्द से जल्द काबिज होने के चक्कर में सैकड़ों हरे पेड़ों को काटकर अपने ही बुने जाल में बुरी तरह फंसता दिखाई दे रहा है। 

हालांकि अभी तक माफिया के हौसले पूरी तरह बुलंद हैं, इसलिए वो इस आशय का दावा भी कर रहा है कि जब तक मीडिया शोर मचा रहा है तब तक की परेशानी है। उसके बाद थोड़ा और पैसा फेंककर सारा मामला रफा-दफा करा लिया जाएगा। किंतु इस बार उसका यह जुमला उसी के ऊपर भारी पड़ सकता है, जिसके कुछ ठोस कारण हैं। 
सबसे पहले बात आरोपी शंकर सेठ को मिली अंतरिम जमानत पर 
दरअसल, डालमिया बगीचे के सैकड़ों हरे पेड़ों को रातों-रात काटने पर जब हंगामा खड़ा हुआ तो वन विभाग, विकास प्राधिकरण और बिजली विभाग ने अपने-अपने बचाव या कहें कि पेशबंदी में तीन अलग-अलग FIR बड़ी चालाकी एवं शातिराना तरीके से दर्ज करवा दीं। 
चूंकि सैकड़ों हरे पेड़ों के कत्ल की प्रथम दृष्टया और बड़ी जिम्मदारी वन विभाग की होती है इसलिए मथुरा (जैत रेंज) के क्षेत्रीय वन अधिकारी अतुल तिवारी ने 19 सितंबर की रात करीब साढ़े नौ बजे भारतीय वन अधिनियम 1927 की धारा 29, 33, 41, 42 तथा 51 के तहत एक FIR दर्ज कराई जिसमें 300 पेड़ों को काटे जाने का जिक्र करते हुए मैसर्स डालमिया एंड संस निवासी 10/04 लाला लाजपतराय सरानी कोलकाता, नारायण प्रसाद डालमिया पुत्र रघुनंदन प्रसाद डालिमया निवासी उपरोक्त, श्रीचंद धानुका पुत्र शंकर लाल धानुका निवासी 14 लोडन स्ट्रीट कोलकाता, श्रीमती अरुणा धानुका निवासी उपरोक्त तथा मृगांक धानुका निवासी उपरोक्त का नाम तो दिया लेकिन पेड़ कटवाने वाले किसी स्‍थानीय व्यक्ति का नाम नहीं लिखा। 
क्षेत्रीय वन अधिकारी अतुल तिवारी ने बड़ी चालाकी के साथ मौके पर मौजूद मुख्‍य आरोपियों की जगह पोकलेन एवं जेसीबी के ड्राइवर तथा प्रस्‍तावित गुरूकृपा तपोवन कॉलोनी बनाकर बेचने की कार्यवाही में लिप्त मालिक और बिल्डर का उल्लेख किया है लेकिन किसी का नाम नहीं खोला जबकि FIR के लिए पुलिस को दी गई तहरीर में कर्मचारियों द्वारा नक्शा उपलब्ध कराने की बात लिखी है जो सर्वेश्वर कंस्ट्रक्शन 13 बृजविलास मार्केट बरेली से बनवाया गया बताया है। 
इसी प्रकार न तो मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण ने और न बिजली विभाग ने अपनी-अपनी प्राथमिकी में मौके पर किसी की मौजूदगी दिखाई तथा न गंभीर धाराओं में FIR दर्ज कराई।  
ऐसे में बिना जांच किए शंकर सेठ की गिरफ्तारी का कोई औचित्य बनता ही नहीं था और इसीलिए उसे चंद घंटों के अंदर कोर्ट से अंतरिम जमानत मिल गई। कोर्ट में शंकर सेठ के वकीलों ने यही दलील दी कि उसका कहीं कोई न नाम है, न भूमिका इसलिए उसे दबाव में अरेस्ट किया गया है। 
यूं भी शंकर सेठ को जमानत मिल ही जानी थी क्योंकि प्रस्‍तावित गुरूकृपा तपोवन कॉलोनी के अब तक अदृश्‍य हिस्‍सेदारों में शहर के वो लोग शामिल बताए जाते हैं जो संगीन से संगीन अपराधों में खड़े-खड़े जमानत दिलाने का माद्दा रखते हैं। 
मथुरा जनपद की बात छोड़िए प्रदेश में वो तमाम न्‍यायाधीशों पर अच्‍छी पकड़ रखने तथा न्‍यापालिका में ऊपर तक लाइजनिंग के लिए पहचाने जाते हैं।      
बस यहीं फंसेंगे शंकर सेठ और डालिमया बगीचे के कथित हिस्सेदार 
पूरी सांठगांठ और प्लानिंग के साथ डालमिया बगीचे पर काबिज होने के लिए सैकड़ों पेड़ काटने के इस खेल में शामिल माफिया ये भूल रहे हैं कि वन विभाग की तहरीर एवं प्रस्‍तावित गुरूकृपा तपोवन कॉलोनी का कथित नक्शा अब कई सवाल खड़े कर रहा है। 
जैसे, आज नहीं तो कल या जब कभी वन विभाग द्वारा नामजद कराए गए डालमिया परिवार के सदस्य अपनी जमानत कराने कोर्ट जाएंगे तो उन्‍हें यह बताना होगा कि उन्होंने अपने बगीचे का सौदा किससे किया? 
बगीचे पर काबिज होने की इजाजत किसे दी तथा क्यों दी गई, और गुरूकृपा तपोवन कॉलोनी का नक्शा क्या उनकी सहमति से बनवाया गया। सहमति दी गई तो उसका आधार क्या है? 
अपने बचाव में इन प्रश्‍नों के जवाब डालमिया परिवार ने दे दिए तो तय है कि कई ऐसे सफेदपोश माफिया एक्सपोज हो जाएंगे जिन्होंने अपने चेहरों पर कई-कई मास्क लगा रखे हैं और जो आड़ के लिए दूसरे उद्योग-धंधों एवं कारोबारों में उतर कर अपनी अलग-अलग पहचान बना चुके हैं। नई पीढ़ी तो आज उनकी इसी पहचान की कायल है।    
यहां गौर करने वाली बात यह भी है कि जिस प्रस्‍तावित गुरूकृपा तपोवन कॉलोनी के नक्शे का हवाला वन विभाग ने अपनी तहरीर में दिया है, उसे लेकर प्रमोटर यह प्रचारित करते रहे हैं कि उन्‍होंने उसे पास कराने की प्रक्रिया शुरू कर दी है, नक्शा पास करने का आवेदन किया जा चुका है। लेकिन विकास प्राधिकरण इससे पूरी तरह पल्ला झाड़ रहा है। विकास प्राधिकरण की मानें तो उसे अभी गुरूकृपा तपोवन कॉलोनी के नाम से किसी नक्शे को पास कराने का कोई आवेदन नहीं मिला। ऑनलाइन भी इसके लिए आवेदन नहीं किया गया। 
अगर विकास प्राधिकरण के दावे में दम है तो सबसे महत्वपूर्ण और बड़ा सवाल यही खड़ा होता है कि क्या फिर ये सारी साजिश अपने ही साथियों को ठगने, निवेशकों को गुमराह करके उनसे पैसा ऐंठने तथा अधिक से अधिक रकम डकारने के लिए की गई? 
बताया जाता है कि मथुरा-वृंदावन का माफिया, डालमिया परिवार से जितने पैसे में बगीचे का सौदा करके लाया है उससे तीन गुना रकम उसने अब तक अपने इन्हीं हथकंडों से हथिया भी ली है। 
एनजीटी और सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुका है ये मामला 
दरअसल, इस खेल में शामिल माफिया को इस बात का अंदाज नहीं था कि पेड़ काटने का यह मामला उनके पूरे खेल को बिगाड़ देगा और बात एनजीटी व सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच जाएगी।
देर-सवेर जब इसकी सुनवाई होगी तो पूरी संभावना है कि कोई बड़ा निर्णय आ जाए। जाहिर है कि उस स्‍थिति में पूरा प्रोजेक्‍ट तो खटाई में पड़ेगा ही, साथ ही निवेशकों एवं साइलेंट साझेदारों का पैसे की वापसी के लिए दबाव भी बढ़ेगा। 
हो सकता है कि कुछ समय तक साइलेंट पार्टनर और निवेशक सब काम पैसों के बल से करा लेने के उनके दावे पर भरोसा भी कर लें किंतु समय बीतने के साथ रिश्ते तो बिगडेंगे ही, रंजिश भी पनपेगी। 
भविष्य में इसका अंजाम आशंका से अधिक घातक हो सकता है क्योंकि जिनके लिए पैसा ही माई-बाप हो, उनका किसी भी हद तक चले जाना आश्‍चर्यजनक नहीं होगा। 
एक सवाल इस रिश्‍ते पर भी... 
शंकर सेठ की अचानक गिरफ्तारी हुई तो उसके पुलिस एवं प्रशासनिक अधिकारियों समेत सत्ताधारी दल के नेताओं से रिश्तों की चर्चा होने लगी। चर्चा हो भी क्यों नहीं, जब डालमिया बगीचा कांड के मुख्‍य किरदारों में अब तक एकमात्र शंकर सेठ का ही नाम सामने लाया गया है। ये बात दीगर है कि शंकर सेठ इस पूरे प्रकरण में अपनी भूमिका से साफ इंकार कर रहा है। 
नेता नगरी में जब किसी को लेकर इस तरह के सवाल उछलते हैं तो बड़ी आसानी से कह दिया जाता है कि सार्वजनिक जीवन में कितने ही लोग साथ फोटो खिंचवा लेते हैं। ये बात और है कि यहां शंकर सेठ बाकायदा केंद्रीय राज्य मंत्री बीएल वर्मा को तस्वीर भेंट कर रहे हैं और उनके साथ भाजपा महानगर मथुरा के अध्‍यक्ष घनश्‍याम लोधी एवं भाजपा नेता प्रदीप गोस्वामी भी खड़े हैं। 
स्‍पष्ट है कि ये मामला यूं ही आकर 'किसी के द्वारा' तस्वीर खिंचवा लेने तक सीमित नहीं है। हो सकता है कि केंद्रीय मंत्री इसके पीछे छिपी मंशा से अवगत न हों किंतु स्‍थानीय भाजपा नेता यह नहीं कह सकते।
डीएम, एसएसपी और नगर आयुक्त को भेंट के मायने? 
नेताओं के अलावा शंकर सेठ एक जगह मथुरा के वर्तमान डीएम और वर्तमान एसएसपी को भी तस्‍वीर भेंट कर रहे हैं। एक तस्‍वीर वह मथुरा नगर निगम के आयुक्त शशांक चौधरी को भेंट करते दिख रहे हैं। तस्‍वीर की कीमत पर न भी जाया जाए तो जिले के ये आला प्रशासनिक अधिकारी नेताओं की तरह अपनी जवाबदेही से नहीं बच सकते। 
कौन नहीं जानता कि जिले के इन आला अधिकारियों से एक अदद मुलाकात की आस में हर रोज जाने कितने लोग इनकी चौखट पर दस्तक देते हैं, लेकिन बहुत कम ऐसे भाग्यशाली होते हैं जिनकी इनसे मुलाकात होती है। अनेक लोग तो चक्कर लगा-लगाकर हार जाते हैं। 
ऐसा न होता तो मुख्‍यमंत्री योगी आदित्यनाथ को 'जनता दर्शन' के नाम पर फरियादियों की भीड़ से हर बार सामना क्यों करना पड़ता। 
बहरहाल... जिले के आला अधिकारी विशेष परिस्‍थितियों में सम्मानित होने के हकदार हैं, लेकिन उनके लिए यह देखना जरूरी है कि सम्मानित करने वाले की सामाजिक छवि और मंशा क्या है। 
जो भी हो, लेकिन इतना तय है कि बात निकली है तो दूर तक जाएगी ही। अभी बहुत सी परतें खुलनी बाकी हैं और बहुत से राज सामने आने हैं। 
डालमिया बाग पर कब्जे के लिए काटे गए सैकड़ों हरे वृक्षों का पर्यावरणीय महत्व तो है ही, आध्‍यात्मिक एवं धार्मिक महत्व भी है इसलिए जिन्‍होंने भी यह पाप कर्म किया है और जितने लोगों की इसमें मौन स्‍वीकृति रही है, उन्‍हें इसके दुष्‍परिणाम जरूर भुगतने होंगे। वो चाहे किसी स्‍तर से भुगतने पड़ें। 
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

 
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