शनिवार, 14 फ़रवरी 2026

योगी जी! यहां तो 'सरकार' ही करा रहे हैं 'सरकारी जमीन' पर माफिया का कब्जा, अब आप क्या करेंगे?


 उत्तर प्रदेश फार्मा कॉन्क्लेव 1.0 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का दिया गया एक बयान इन दिनों बहुत वायरल हो रहा है। इस बयान में वह प्रदेश के 'लैंड बैंक' का जिक्र करते हुए बताते हैं कि हमने सत्ता संभालने के बाद 'भूमाफिया टास्क फोर्स' गठित कर भूमाफिया को इस आशय की कड़ी चेतावनी दी कि वह या तो 24 घंटों के अंदर सरकारी जमीन खाली कर दे अन्यथा जमीन तो कब्जा मुक्त करवाई ही जाएगी, साथ ही उससे जो लाभ अर्जित किया गया है उसकी भी वसूली ब्‍याज सहित की जाएगी। 

सीएम योगी का बयान सर-माथे, लेकिन उन्हें ये कौन बताए कि जब स्‍वयं को संपूर्ण सरकार मानकर काम करने वाले जिला स्तरीय अधिकारी ही माफिया से मिलीभगत कर सरकारी जमीन पर कब्जा करा रहे हों, तो उनसे निपटने के लिए कौन सी टास्क फोर्स सामने आएगी और उनके द्वारा अर्जित किए गए लाभ की ब्याज सहित वसूली कैसे होगी। 
मामला योगीराज श्रीकृष्ण की पावन क्रीड़ास्थली वृंदावन से जुड़ा है। जहां भूमाफिया की शक्ल में सक्रिय कॉलोनाइजर को नगर निगम की बेशकीमती जमीन देने की आतुरता में बार-बार बोर्ड बैठक के दौरान प्रस्ताव रखा जाता है और मीडिया द्वारा सारे खेल का खुलासा करने पर जिम्‍मेदार अधिकारी बाकायदा जांच कराकर लिखत-पढ़त में यह स्वीकार करते हैं कि लैंड एक्सचेंज का प्रस्ताव पास होने से पहले ही निगम की जमीन पर माफिया काबिज है और उसने वहां अवैध निर्माण करा लिया है। 
यही नहीं, नगर निगम द्वारा अपनी जमीन पर किए गए अवैध निर्माण को ध्वस्त कराने के लिए 31 जनवरी 2026 के दिन डेवलपमेंट अथॉरिटी के नाम एक चिट्ठी भी लिखी जाती है परंतु न डेवलपमेंट अथॉरिटी के कान पर जूं रेंगती है और न उस सरकारी विभाग के, जिसकी जमीन को माफिया ने कब्जा लिया है। 
मतलब नगर निगम ने मात्र चिट्ठी लिखकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली जबकि डेवलपमेंट अथॉरिटी कहती है कि नगर निगम तो अपनी जमीन स्‍वयं कब्जामुक्त कराने का अधिकार रखता है। 
सच्चाई जो भी हो, फिलहाल तो जहां अधिकारियों का यह खेल जारी है वहीं माफिया इस प्रयास में लगा है कि किसी भी तरह सरकारी पत्राचार को यहीं विराम देकर अपना काम आगे बढ़ाया जाए। 
बहरहाल, 'जिले की सरकार' ये खेल क्यों खेल रही है और माफिया को इतना मौका कैसे मिल रहा है... यह समझना 'रॉकेट सांइस' जितना जटिल नहीं है। 
तब तो कतई नहीं जब मीडिया द्वारा इस बावत प्रश्न पूछने पर अधिकारी, मीडिया को ही देख लेने की धमकी देने लगें और नगर निगम में दोबारा घुसने का साहस करने पर सबक सिखाने की चेतावनी देकर सुरक्षागार्डों से बाहर का रास्ता दिखवा दें। 
जाहिर है कि वृंदावन में डेवलप की जा रही सनसिटी अनंतम के मालिकों से पर्दे के पीछे कोई तो ऐसा 'छद्म एमओयू' साइन हुआ है जिसका मसौदा सामने आने पर हमाम के सारे चेहरे सामने आ सकते हैं। 
यदि ऐसा नहीं हैं तो यह कैसे संभव है कि सीएम योगी के सारे आदेश-निर्देश ताक पर रखकर किसी जिले की सरकार अपनी बेशकीमती सरकारी जमीन का किसी निजी टाउनशिप के लिए विनिमय करने पर 'आमादा' है और ऊपर से नीचे तक के सारे अधिकारी एक-दूसरे के कंधे पर बंदूक रखकर काम पूरा करना चाहते हैं। 
मीडिया के सामने आकर जवाब देने की बजाय क्यों ये अधिकारी चिट्ठी-चिट्ठी खेलते हुए निजी टाउनशिप के लिए भी लैंड एक्सचेंज की पॉलिसी को जायज ठहराने के प्रयास में लगे हैं। 
क्यों वो अपने ही पत्राचार में एक ओर तो स्वीकार करते हैं कि सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा और अवैध निर्माण कर लिया गया है और दूसरी ओर उसी माफिया के पक्ष में लाए गए लैंड एक्सचेंज के प्रस्ताव को नियम-कानून सम्मत ठहराने की कोशिश कर रहे हैं। 
इसमें दो राय नहीं कि सीएम योगी के प्रयास से प्रदेश में सक्रिय माफिया हतोत्साहित हुआ है, लेकिन सच यह भी है जो सामने है और सबको दिखाई दे रहा है। अगर कोई आंखें मूंदे बैठा है तो वो तबका जो हर जिले में अपनी एक समानांतर सरकार चलाता है और जिसके प्रोत्साहन से माफिया 'जीरो टॉलरेंस' को भी 'जीरो' बनाकर छोड़ देता है। 
बेहतर होगा सीएम योगी एकबार मथुरा जनपद के उस लैंड बैंक का भी मौका मुआयना कर लें और जान लें कि कैसे उस बेशकीमती लैंड बैंक में माफिया और अधिकारियों का कॉकस पूरी शिद्दत से सेंध लगा रहा है।  
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी

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