रियल एस्‍टेट लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
रियल एस्‍टेट लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 23 अक्टूबर 2024

...तो डालमिया बाग मामले में 120B के आरोपी बनाए जाएंगे MVDA के कई अधिकारी और कर्मचारी

 


 वैसे तो समूचे उत्तर प्रदेश के विकास प्राधिकरण अपनी भ्रष्ट कार्यप्रणाली को लेकर अच्छे-खासे बदनाम हैं, लेकिन अगर बात करें मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण (MVDA) की तो यहां तैनात उसके अधिकारी एवं कर्मचारी बाकायदा अपराधियों के किसी संगठित गिरोह की तरह काम करते हैं। इसमें सबकी अपनी भूमिका और उसके अनुसार सबकी हिस्‍सेदारी भी तय है। कोई किसी के काम में दखल नहीं देता, इसलिए सबकुछ बहुत सहजता के साथ चलता रहता है। 

ताजा मामला वृंदावन के डालमिया बाग का है जिस पर एक रियल एस्‍टेट प्रोजेक्ट खड़ा करने के लिए गुरुकृपा तपोवन के नाम से MVDA में नक्शा मूव किया गया और नक्शा पास हुए बिना ही प्‍लॉट बुक करने शुरू कर दिए। यही नहीं, माफिया ने मात्र एक नक्शे की आड़ में अनुमानत: एक हजार करोड़ रुपया एकत्र कर लिया। चूंकि माफिया ने निवेशकों से एक बड़ी रकम हथिया ली थी इसलिए उसे एक ओर जहां डालमिया बाग पर अपना कब्जा दिखाना था वहीं दूसरी ओर ये भी जाहिर करना था कि उसका काम पूरी प्रगति पर है लिहाजा उसने बाग के साढ़े चार सौ से अधिक हरे वृक्षों को रातों-रात कटवा डाला। हरे वृक्षों के इस अवैध कटान ने माफिया की  बदनीयति सामने लाकर रख दी। 
MVDA की भूमिका पहले दिन से संदिग्ध 
मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण ने हालांकि पेड़ कटने के बाद अपना मुंह साफ रखने की कोशिश में प्राधिकरण की रेलिंग काटने का एक केस भी दर्ज कराया किंतु उसका मुंह साफ हो नहीं पा रहा, जिसके कुछ ठोस कारण हैं। 
सबसे पहला और बड़ा कारण तो यह है कि MVDA के जो अधिकारी एवं कर्मचारी अपने क्षेत्र में छोटे से छोटे अवैध निर्माण को सूंघते फिरते हैं और उसके खिलाफ कार्रवाई का भय दिखाकर मनमानी वसूली करने जा धमकते हैं, वो एक ऐसे रियल एस्टेट प्रोजेक्ट की आड़ में की जा रही अवैध बुकिंग पर क्यों मौन साधे रहे जिसका नक्शा उसके यहां विचाराधीन था लेकिन पास नहीं किया गया था। नियमानुसार MVDA को नक्शा पेश किए जाने की सूचना सार्वजनिक करनी चाहिए थी, जो उसने नहीं की। 
ताज्जुब इस बात का भी है कि MVDA आज तक गुरुकृपा तपोवन के नक्शे की असलियत पर चुप्‍पी साधे बैठा है जबकि निवेशक अपनी रकम डूब जाने के भय से माफिया के यहां चक्कर काट रहा है। विकास प्राधिकरण की यही चुप्पी उसकी माफिया से मिलीभगत का दूसरा संकेत है। 
नक्शा पास कराने के लिए पेश सपोर्टिंग पेपर्स की स्थिति तक स्पष्ट नहीं 
यहां गौर करने वाली बात यह है कि किसी भी प्रोजेक्ट, यहां तक कि घर-दुकान या मकान का नक्शा पास कराने के लिए नक्शे के साथ कुछ सपोर्टिंग पेपर्स भी सबमिट करने होते हैं जिनमें सबसे जरूरी होता है मालिकाना हक साबित करना। इसके बाद नंबर आता है विभिन्न विभागों के नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (NOC) लगाने का जो आवश्‍यकता अनुसार लगाने होते हैं। 
ऐसे में एक महत्वपूर्ण सवाल खुद-ब-खुद सामने खड़ा हो जाता है कि गुरुकृपा तपोवन का नक्शा पास कराने के लिए मालिकाना हक साबित करने वाले पेपर्स पेश किए गए हैं या नहीं, और किए गए हैं तो मालिकाना हक किसके पास बताया गया है। 
यह मान भी लिया जाए कि MVDA को न तो डालिमया बाग में सैकड़ों हरे वृक्ष खड़े होने की कोई जानकारी थी और न रजिस्ट्री होने-न होने का कुछ पता था तब भी उसे यह स्‍पष्‍ट करना चाहिए कि गुरुकृपा तपोवन का नक्शा पास कराने किसने भेजा तथा किस आधार पर भेजा। 
डालमिया बाग पर उपजे विवाद को अब एक महीने से ऊपर का समय बीत चुका है। जाहिर है कि अब तक तो MVDA को काफी कुछ पता लग चुका होगा, किंतु आज भी MVDA का कोई अधिकारी या कर्मचारी इस मुद्दे पर अपना मुंह खोलने को तैयार नहीं। आखिर क्यों?  
आज भी 'लीजेण्‍ड न्‍यूज़' ने MVDA के उपाध्‍यक्ष श्‍याम बहादुर सिंह को whatsapp मैसेज भेजकर गुरुकृपा तपोवन के नक्शे पर विभाग की स्‍थिति सामने रखने का अनुरोध किया लेकिन मैसेज भेजे हुए कई घंटे बीत जाने के बावजूद कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली।     
हजार करोड़ की ठगी में किस-किस की हिस्सेदारी 
मात्र एक फर्जी नक्शा पेश करके पब्‍लिक से करीब हजार करोड़ रुपए ठग लिए गए लेकिन विकास प्राधिकरण मुंह सिल कर बैठ जाए तो इसका क्या अर्थ निकालता है, इसे समझना कोई मुश्‍किल काम नहीं। 
गुरुकृपा तपोवन के नाम पर जो आपराधिक कृत्य किया गया वह सीधे-सीधे IPC की धारा 420, 467, 468 और 471 के अलावा 120B का गंभीर अपराध है क्योंकि एक ऐसे प्रोजेक्ट का सब्‍जबाग दिखाकर हजार करोड़ रुपया ठग लिया गया जिसका मालिकाना हक तो दूर नक्शा तक पास नहीं हुआ। जिसे लेकर कोई एग्रीमेंट नहीं हुआ। जो हुआ, वो सिर्फ और सिर्फ एक Memorandum of understanding (MOU) है यानी कोई सौदा करने के लिए दो पक्षों के बीच अंडरस्‍टेंडिंग। 
चूंकि विकास प्राधिकरण इतना सब हो जाने पर भी अपनी स्‍थिति स्‍पष्‍ट करने को तैयार नहीं है इसलिए इससे यही संदेश जाता है कि उसकी माफिया से मिलीभगत है।  ऐसा न होता तो जनहित में ही सही, वह कम से कम सच्‍चाई तो सामने ला ही सकता है ताकि अपने प्‍लॉट बुकिंग की कच्‍ची पर्ची हाथ में लेकर घूम रहे लोगों को तो पता लग सके कि वास्‍तविकता क्या है। 
यदि वह ऐसा नहीं करता तो साफ है कि उसके भी कई अधिकारी एवं कर्मचारी न केवल हजार करोड़ की ठगी करने वाले गिरोह से मिले हुए हैं बल्‍कि वह उसका हिस्‍सा भी हैं जो उनको IPC की धारा 120B का आरोपी बनाने के लिए पर्याप्त है। 
सबकुछ कमिश्नर द्वारा गठित जांच कमेटी की रिपोर्ट पर निर्भर 
अब जबकि मंडलायुक्त ऋतु माहेश्वरी ने शासन के निर्देश पर इस मामले में मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण की भूमिका का पता लगाने को 3 सदस्‍यीय जांच कमेटी का गठन कर दिया है तो सबकुछ उस रिपोर्ट पर निर्भर करता है, लेकिन इतना तय है कि MVDA के अधिकारियों के लिए तमाम प्रश्‍नों के उत्तर देना बहुत मुश्‍किल होगा। 
संभवत: यह पहली बार होगा जब माफिया और अधिकारियों का गठजोड़ बेनकाब होगा और आमजन भी यह जान सकेगा कि कैसे योगी सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद प्रदेश में भ्रष्टाचार एवं भ्रष्‍टाचारी फल-फूल रहे हैं क्योंकि एक ओर कमिश्नर आगरा ऋतु माहेश्‍वरी बहुत सख्त मिजाज अधिकारी हैं तो दूसरी ओर जांच कमेटी में शामिल तीनों उच्‍च अधिकारी भी ईमानदार बताए जाते हैं। बस इंतजार है तो निर्धारित 15 दिन पूरे होने का। 
-Legend News   

मंगलवार, 8 अक्टूबर 2024

ED की सक्रियता से डालमिया बाग के खरीदारों में खलबली, भूमिगत होने या विदेश भाग जाने की आशंका


 मथुरा। वृंदावन के डालमिया बाग मामले में अब ED की सक्रियता बढ़ जाने से खरीदारों में भारी खलबली देखी जा रही है। आशंका है कि उनमें से कुछ लोग या तो भूमिगत हो सकते हैं, या फिर देश छोड़कर भी भाग सकते हैं। हालांकि ED को भी इस बात का अंदाज है लिहाजा उसने ऐसे लोगों की हर गतिविधि पर अपनी पैनी नजर गड़ा रखी है। 

दरअसल, इस खरीद-फरोख्‍त में बढ़ती प्रवर्तन निदेशालय यानी ED की सक्रियता का बड़ा कारण इसके धन शोधन (मनी लॉन्ड्रिंग) अर्थात ब्‍लैक मनी को सफेद बनाने तथा विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (FEMA) के तहत आने की प्रबल संभावना दिखाई देना है। यही वजह है कि ED ने इस पर तेजी से काम करना शुरू कर दिया है। 
ED से जुड़े अत्यंत भरोसेमंद सूत्रों के अनुसार केंद्र सरकार की इस स्‍वतंत्र जांच एजेंसी ने प्राथमिक जानकारी जुटाने के लिए अपने कुछ बिंदु भी तय कर लिए हैं। ये ऐसे बिंदु हैं जिनसे एजेंसी न केवल इस पूरे मामले की तह तक जा सकती है बल्‍कि इसमें शामिल सफेदपोश अपराधियों के चेहरे भी सामने ला सकती है। 
ED क्या-क्या जानना चाहती है 
ED इस मामले में सबसे पहले तो यह जानकारी चाहती है कि वृंदावन की जिस रियल एस्‍टेट फर्म का नाम अब तक इस सौदे में सामने आया है, उसका स्टेटस क्या है? 
वह एक पार्टनरशिप फर्म है या किसी व्यक्ति विशेष के हक वाली प्रोपराइटरशिप में रजिस्‍टर्ड है? 
यदि वह एक पार्टनरशिप फर्म है तो उसके पार्टनर कितने हैं और उनकी हिस्‍सेदारी कितनी-कितनी है? 
डालमिया बाग का सौदा करते वक्त इस फर्म में कितने हिस्‍सेदार थे और क्या सौदा हो जाने के बाद अन्य लोग हिस्‍सेदार बनाए गए? 
अगर सौदा हो जाने के बाद और हिस्‍सेदार बनाए गए तो उनकी संख्‍या तथा उनका हिस्‍सा कितना-कितना रखा गया? 
जैसा अब तक प्रचारित किया गया है कि डालमिया परिवार ने अपने बाग का पूरा सौदा नंबर एक में किया है और खरीदारों से पैसा भी नंबर एक में लिया है तो पूरी पैसा मिल जाने के बावजूद उसने बाग की रजिस्ट्री क्यों नहीं की, रजिस्‍ट्री करने के लिए डालिमया परिवार किस बात का इंतजार कर रहा था? 
इस सबके अलावा ED यह भी जानना चाहती है कि बिना रजिस्‍ट्री किए ही डालमिया परिवार ने खरीदारों को जमीन पर काबिज होने की क्या कोई लिखित अथवा मौखिक सहमति दी थी? 
अगर डालमिया परिवार ने ऐसी कोई सहमति दी थी तो वो किसे दी थी और कब दी थी?
 
कॉलोनी डेवलव करने के लिए नक्शा किसने पेश किया
ED के सामने एक यक्ष प्रश्‍न यह है कि वो कौन से तत्व हैं जिन्होंने बाग की रजिस्‍ट्री कराने से पहले ही मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण में गुरूकृपा तपोवन के नाम से कॉलोनी डेवलव करने के लिए नक्शा पेश कर दिया क्योंकि इस पूरे प्रकरण में अब तक सिर्फ एक नाम सर्वाधिक चर्चित रहा है, और वह नाम है किसी शंकर सेठ का जो गुरूकृपा बिल्डर्स का मालिक बताया जाता है तथा जिसने इस नाम से पहले भी दूसरे प्रोजेक्ट खड़े किए हैं। 
आश्‍चर्यजनक बात यह है गुरूकृपा तपोवन के नाम से विकास प्राधिकरण में नक्शा पेश किए जाने की अब तक न तो किसी ने जिम्मेदारी ली है और न ही खंडन किया है जबकि उसी नक्शे के आधार पर निवेशकों से बड़ी रकम ली गई तथा उसी नक्शे के हिसाब से कॉलोनी की प्‍लॉटिंग की गई।  
बताया जाता है कि शंकर सेठ वृंदावन में ही छटीकरा रोड पर गुरूकृपा के नाम से एक अन्य प्रोजेक्ट बना रहा है और उसका नक्शा उसने विकास प्राधिकरण से पास भी कराया है। ये बात अलग है कि उस नक्शे को पास कराने में भी हेराफेरी किए जाने की शिकायतें अब मिली हैं, जिनकी जांच शुरू हो चुकी है। 
बहरहाल, ED को इस पूरे खेल में किसी बड़ी आपराधिक साजिश की बू आ रही है इसलिए वह यह भी पता लगाने में जुटी है कि गुरूकृपा तपोवन कॉलोनी के नाम पर निवेशकों से एडवांस में मोटी रकम लेने वाले कौन-कौन लोग हैं और उन्होंने किस हैसियत से यह रकम ली थी? 
ED यह मानकर चल रही है कि डालमिया बाग का प्रकरण भले ही सैकड़ों हरे पेड़ काटने के बाद मीडिया की नजर में आया हो किंतु इसके तार ऐसे गहरे आपराधिक षडयंत्र से जुड़ रहे हैं जिसमें मनी लॉन्ड्रिंग से लेकर फेमा तक और आम निवेशकों एवं आम जनता से हजारों करोड़ रुपए ठगने तक का सुनियोजित अपराध बनता है।
 
ED का शक निराधार इसलिए नहीं है कि रातों-रात सैकड़ों पेड़ काट डालने वालों में से एक भी व्यक्ति अब सामने आकर कुछ बोलने को तैयार नहीं है। वो भी तब जबकि निवेशक परेशान हैं अपने पैसों को लेकर, और वृंदावनवासी दुखी हैं उनके दुस्‍साहस तथा जिला प्रशासन की अकर्मण्‍यता एवं भ्रष्‍टाचार को लेकर। 
ED को तो यह भी शक है डालमिया बाग का सौदा करके व उस पर काबिज होकर हजारों करोड़ रुपया जुटाने के लिए पेशेवर आर्थिक अपराधियों की तरह ऐसे-ऐसे हथकंड़े अपनाए गए हैं जो आरोप सिद्ध हो जाने की स्‍थिति में अंतत: वर्षों कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटने के बाद आजन्म कैद जैसी सजा तक ले जाते हैं। 
इन आर्थिक अपराधियों को भी संभवत: इस बात का इल्म हो चुका है इसलिए वो आरोपों का सामना करने के बजाय नित नई कहानी गढ़ने तथा मीडिया को मैनेज करने में लगे हैं ताकि ED के शिकंजे में फंसने से पहले समय रहते या तो भूमिगत हो जाएं या फिर विदेश भाग निकलें, क्योंकि अब न तो डालमिया बाग पर प्रोजेक्ट खड़ा करना आसान होगा और न निवेशकों का भरोसा बहाल हो सकेगा।
 
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

 

शनिवार, 16 सितंबर 2017

सैकड़ों करोड़ की देनदारी मारकर भागने की तैयारी में है ”मथुरा का एक बड़ा बिल्‍डर”

सैकड़ों करोड़ की देनदारी मारकर मथुरा का एक बड़ा बिल्‍डर बाहर भागने की तैयारी कर रहा है।
बिल्‍डर से जुड़े सूत्रों की मानें तो इस पर करीब दो सौ करोड़ की देनदारी है लेकिन यह उसे अब हड़पना चाहता है।
बताया जाता है कि पिछले काफी समय से देनदार इस बिल्‍डर से अपना पैसा निकालने को दबाव बना रहे हैं किंतु वह उन्‍हें अब तक मीठी गोली देकर टहलाता रहा है।
जमीनी कारोबार से जुड़े लोगों का कहना है कि पिछले कुछ महीनों के अंदर इस बिल्‍डर ने अपनी कई संपत्तियों को बेचा है लेकिन देनदारों को फूटी कौड़ी नहीं चुकाई, जिससे उसकी नीयत में खोट का पता लगता है।
देनदारों ने हालांकि कई बार बिल्‍डर के आवास तथा विभिन्‍न कार्यालयों एवं व्‍यावसायिक प्रतिष्‍ठानों पर पहुंचकर भी हंगामा किया है किंतु वह उन्‍हें सिर्फ ब्‍याज देने की बात करता रहा है।
देनदारों का कहना है कि अब उन्‍हें बिल्‍डर पर भरोसा नहीं रहा लिहाजा वह ब्‍याज नहीं, अपना मूलधन निकालना चाहते हैं क्‍योंकि वैसे भी उन्‍होंने उसे बहुत कम ब्‍याज दर पर पैसा दे रखा है।
करोड़ों रुपए इस बिल्‍डर के नीचे फंसाए बैठे एक व्‍यक्‍ति ने बताया कि जब भी वह तथा उसके जैसे दूसरे लेनदार बिल्‍डर से अपना पैसा मांगते हैं तो वह रियल एस्‍टेट कारोबारियों की एसोसिएशन से जुड़े एक पदाधिकारी के साथ बैठकर पंचायत करने की बात करता है जबकि देनदारों का कहना है कि उन्‍होंने एसोसिएशन के पदाधिकारी को नहीं, पैसा उसे दिया है लिहाजा वह किसी दूसरे के बीच बैठकर पंचायत क्‍यों करें।
लेनदारों के मुताबिक इस बिल्‍डर का मुख्‍य उद्देश्‍य औने-पौने दामों पर शहर से दूर खरीदी गई अपनी जमीन तथा उस पर बनाए गए फ्लैट्स को मनमानी कीमत पर देनदारों को जबरन बेचना है जिससे उसके कई हित पूरे होते हैं।
लेनदारों ने स्‍पष्‍ट किया कि मूलधन मांगने पर बिल्‍डर या तो फिलहाल ब्‍याज लेकर काम चलाने की बात कहता है या फिर प्‍लॉट अथवा फ्लैट की रजिस्‍ट्री करा लेने को बाध्‍य करता है।
गौरतलब है कि मोदी सरकार द्वारा की गई नोटबंदी से सर्वाधिक प्रभावित यदि कोई कारोबार हुआ तो वह है रियल एस्‍टेट का कारोबार, क्‍योंकि रियल एस्‍टेट के कारोबार में बड़े पैमाने पर कालेधन का इस्‍तेमाल होता था।
एक ओर नोटबंदी और दूसरी ओर रियल एस्टेट रेगुलेशन एक्ट ”रेरा” बन जाने के कारण रियल एस्‍टेट कारोबारियों की कमर टूट गई। ऐसे में जिनकी नीयत खोटी नहीं थी, वह तमाम दिक्‍कतों के बावजूद अपना कारोबार खड़ा रखने में सफल रहे किंतु खोटी नीयत वालों ने बिना लिखा-पढ़ी के बाजार से लिया हुआ पैसा हड़पने की योजना पर काम करना शुरू कर दिया।
उन्‍होंने एक तीर से कई निशाने साधने की कहावत चरितार्थ करते हुए देनदारों से कहा कि या तो ब्‍याज लेकर काम चलाएं अथवा मुंहमांगी कीमत पर प्‍लॉट और फ्लैट्स लेकर अपने घर बैठें।
कुछ वर्षों पहले तक बहुत मामूली हैसियत वाले इस बिल्‍डर की नीयत में खोट आने का मुख्‍य कारण इसकी आपराधिक पृष्‍ठभूमि बताई जाती है।
बताया जाता है कि कभी छोटे-मोटे काम करके जीविका चलाने और फिर कुछ समय तक ठेकेदारी करने वाले इस बिल्‍डर पर बस लूट जैसे संगीन आरोप भी लगे हैं किंतु पिछले कुछ वर्षों से इसने खुद को शहर के नामचीन बिल्‍डर्स की जमात में शामिल कर लिया था और इसलिए लोग इसके अतीत से अपरिचित होते गए।
इसी बात का लाभ उठाकर इस बिल्‍डर ने कभी अपने किसी स्‍क्रैप व्‍यवसायी मित्र को चूना लगाया तो कभी किसी पूर्व विधायक को। कभी टोंटी के किसी कारोबारी को तो कभी किसी लिखिया को।
बिल्‍डर के नजदीकी सूत्र तो यहां तक बताते हैं कि एक प्रसिद्ध धार्मिक संस्‍था ने भी करोड़ों रुपए का कर्ज बहुत मामूली ब्‍याज दर पर इस बिल्‍डर को दिया हुआ है किंतु इन दिनों वह धार्मिक संस्‍था खुद अवैध कब्‍जों के आरोप झेल रही है इसलिए वह कुछ कहने की स्‍थिति में नहीं है।
इस धार्मिक संस्‍था पर सरकार ने इतना शिकंजा कसा हुआ है कि वह दूसरे झंझटों में फंसने से बच रही है लेकिन निकट भविष्‍य में वह भी बिल्‍डर से अपना पैसा निकालने की कोशिश जरूर करेगी।
प्रदेश सरकार में एक कबीना मंत्री और उनके खास सिपहसालार को अपना संरक्षक बताने वाले इस बिल्‍डर की नीयत में खोट का अंदाज इस बात से भी लगाया जा सकता है कि इसने अपने सगे भाइयों तक को नहीं बख्‍शा और उनका भी मोटा पैसा अपने नीचे हमेशा दबाकर रखा।
बाजार में अपना प्रभाव बनाए रखने के लिए इस बिल्‍डर ने अपनी राजनीतिक महत्‍वाकांक्षा को भी परवान चढ़ाने की भरपूर कोशिश की किंतु उसमें वह सफल नहीं हुआ क्‍योंकि इसके राजनैतिक आका इसकी महत्‍वाकांक्षा कभी पूरी नहीं होने देना चाहते थे। हालांकि उन्‍होंने इस पर अपना वरदहस्‍थ हमेशा बनाए रखा।
बाजार से जुड़े सूत्रों का कहना है कि इस बिल्‍डर पर पड़ोसी जनपद हाथरस व अलीगढ़ के लोगों का तो काफी पैसा है ही किंतु मथुरा के लोगों का भी कम पैसा नहीं है। ये लोग अब हर हाल में अपना पैसा इसके नीचे से निकालने की कोशिश कर रहे हैं।
ऐसी भी खबरें देनदारों को मिल रही हैं कि पूर्व में यह बिल्‍डर कई लोगों का पैसा हड़प चुका है। इनमें से कृष्‍णा नगर शंकर विहार निवासी एक व्‍यक्‍ति को तो शहर छोड़कर जाने पर मजबूर होना पड़ा क्‍योंकि इसके नीचे पैसा फंस जाने के कारण वह खुद बड़ा कर्जदार हो गया था। रातों-रात अपना सबकुछ छोड़कर वह ऐसा गया कि आजतक उसका कोई सुराग नहीं है।
जो भी हो, इधर देनदार अब इस बिल्‍डर पर जितना दबाव बना रहे हैं उधर बिल्‍डर इन देनदारों को चूना लगाकर मथुरा से बाहर भाग जाने की तैयारी में बताया जाता है।
सूत्र बताते हैं कि बीमारी का इलाज कराने के बहाने यहां से निकलने की योजना बना रहा यह बिल्‍डर देश से ही बाहर जाने की तैयारी कर रहा है ताकि फिर किसी के हाथ न आ सके।
यही कारण है कि पिछले कई महीनों से यह अपने स्‍वामित्‍व वाली संपत्तियों को बेचने में लगा है और कई संपत्तियां बेच भी चुका है।
बिल्‍डर जानता है कि यदि देनदारों ने एकजुट होकर पुलिस प्रशासन पर दबाव बनाना शुरू कर दिया और एकबार कानूनी प्रक्रिया शुरू हो गई तो फिर उसका भाग निकलना आसान नहीं होगा।
देनदार भी इस सच्‍चाई को समझ रहे हैं और कुछ देनदारों ने अपने स्‍तर से पुलिस प्रशासन की मदद लेने के लिए हाथपैर मारना शुरू भी किया है लेकिन फिलहाल उन्‍हें सफलता मिली नहीं है।
अब देखना यह है कि बिल्‍डर अपने मकसद में सफल होता है या देनदार समय रहते उस पर कानूनी शिकंजा कसवा पाते हैं।
कहीं ऐसा न हो कि यह मामला कल्‍पतरू ग्रुप के मालिक राणा की तरह उलझ कर रह जाए और देनदार आत्‍महत्‍या करने पर मजबूर हों क्‍योंकि प्रदेश की सत्ताधारी पार्टी के एक मंत्री से राजनीतिक संरक्षण तो इसे भी प्राप्‍त है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...