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बुधवार, 24 नवंबर 2010

प्‍लीज ! ''उल्‍लुओं'' को दोष मत दो


लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष
बर्बाद गुलिस्‍तां करने को, जब एक ही उल्‍लू काफी हो ।
अंजामे गुलिस्‍तां क्‍या होगा, हर शाख पर उल्‍लू बैठा है ।।
मुझे नहीं मालूम कि ये पंक्‍ितयां कब तथा किस परिपेक्ष्‍य में लिखी गयी थीं लेकिन इतना जरूर पता है कि स्‍वतंत्रता मिलने के बाद से इनका इस्‍तेमाल अक्‍सर उन लोगों के लिए किया जाता रहा है जिन्‍हें हम ''नेता'' कहते हैं और जो खुद को देश का कर्णधार एवं भाग्‍य विधाता मानते रहे हैं।
आज में एक ऐसी कहानी आपके लिए लिख रहा हूं जो शायद इस सर्वमान्‍य धारणा को बदल सके और समझा सके कि किसी चमन की बर्बादी के पीछे वास्‍तविक कारण क्‍या होते हैं।
कहानी कुछ इस तरह है कि किसी जंगल में हंस-हंसिनी का एक जोड़ा वर्षों से रहा करता था। जंगल बहुत हरा-भरा होने के कारण उनका जीवन बड़े आनंदपूर्वक व्‍यतीत हो रहा था। एक साल उस जंगल में भयानक सूखा पड़ा। पेड़-पौधों के साथ-साथ पानी के सारे साधन सूख गये। यहां तक कि पशु-पक्षियों के पीने लायक पानी भी नहीं बचा।

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