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सोमवार, 5 दिसंबर 2016

बलात्‍कार के आरोपी से Chief justice का मिलना बन सकता है बड़े विवाद का कारण

इलाहाबाद हाई कोर्ट के Chief justice दिलीप बाबा साहब भोसले की मथुरा यात्रा के दौरान बलात्‍कार के एक आरोपी से मुलाकात बड़े विवाद का कारण बन सकती है। दरअसल, जिस व्‍यक्‍ति के साथ चीफ जस्‍टिस भोसले को हाथ मिलाते हुए फोटो सोशल साइट पर डाले गए हैं, उसी व्‍यक्‍ति के खिलाफ बलात्‍कार जैसे संगीन अपराध का यह मामला चीफ जस्‍टिस भोसले की ही अदालत में लंबित है।
सोशल साइट पर चीफ जस्‍टिस भोसले से अपनी मुलाकात के फोटो बलात्‍कार के इसी आरोपी द्वारा शेयर किए गए हैं जिनसे साफ जाहिर होता है कि उसका चीफ जस्‍टिस से मुलाकात करने का उद्देश्‍य क्‍या था। हालांकि, यह संभव है कि चीफ जस्‍टिस भोसले को इस मुलाकाती की असलियत और अपने यहां उसके खिलाफ लंबित बलात्‍कार के मामले की जानकारी न हो किंतु विधि विशेषज्ञों के अनुसार चीफ जस्‍टिस भोसले का इस तरह मुलाकात करना न सिर्फ प्रोटोकॉल के खिलाफ है बल्‍कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस संबंध में जारी गाइड लाइंस की अवहेलना भी है।
cjbhosle-kkउल्‍लेखनीय है कि इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय के चीफ जस्‍टिस डीबी भोसले गत शनिवार को अपनी पत्‍नी सहित मथुरा आए थे। इस दौरान वह मथुरा में भगवान द्वारिकाधीश तथा वृंदावन में ठाकुर बांके बिहारी के दर्शन करने भी गए।
इसी दौरान चीफ जस्‍टिस से एनयूजेआई के कार्यकारिणी सदस्य, उपजा के प्रदेश उपाध्यक्ष व ब्रज प्रेस क्लब के अध्यक्ष कमलकांत उपमन्यु एडवोकेट ने भी एक कथित प्रतिनिधमंडल के साथ शिष्‍टचार मुलाकात की। एडवोकेट के लिबास काले कोट व कॉलर बैंड में की गई इस मुलाकात के दौरान चीफ जस्‍टिस भोसले, कमलकांत उपमन्‍यु से बड़ी गर्मजोशी के साथ हाथ मिलते हुए दिखाई दिए जबकि बाकी पत्रकारगण हाथ बांधे खड़े नजर आए।
कमलकांत उपमन्‍यु ने उसी दिन शाम को चीफ जस्‍टिस भोसले से अपनी इस मुलाकात के फोटो पूरी न्‍यूज़ सहित अपनी दोनों फेसबुक आईडी पर शेयर भी किए। कमलकांत उपमन्‍यु की एक फेसबुक आईडी कमलकांत उपमन्‍यु के नाम से है जबकि दूसरी कमलकांत उपमन्‍यु II के नाम पर है।
क्‍या है पूरा मामला:
मथुरा में पंजाब केसरी के रिपोर्टर कमलकांत उपमन्‍यु के खिलाफ एक लड़की द्वारा अपने साथ दुराचार तथा यौन उत्‍पीड़न सहित अपने परिचितों को जान से मारने की धमकी देने जैसे संगीन आरोप वर्ष 2014 के दिसंबर माह में लगाये गए। तब मथुरा की एसएसपी मंजिल सैनी हुआ करती थीं। मंजिल सैनी फिलहाल लखनऊ की एसएसपी हैं।
cj-1-kkमंजिल सैनी से अति घनिष्‍ठता के चलते कमलकांत उपमन्‍यु के खिलाफ पहले तो बलात्‍कार का अपराध पंजीकृत ही नहीं किया गया और पीड़िता द्वारा तहरीर दिए जाने के बावजूद उस पर जांच के आदेश कर दिए गए। शहर में इस मामले को लेकर काफी आक्रोश पैदा होने के उपरांत बमुश्‍किल 06 दिसंबर 2014 को थाना हाईवे में आईपीसी की धारा 376 व 506 मुकद्दमा अपराध संख्‍या 944/ 2014 के तहत एफआई आर दर्ज की गई किंतु आरोपी की गिरफ्तारी फिर भी नहीं हुई।
हां, इतना जरूर हुआ कि पब्‍लिक के दबाव में एसएसपी को पीड़िता का मैडिकल कराना पड़ा और उसके बाद 161 तथा 164 के बयान भी दर्ज कराने पड़े। इस आधार पर आरोपी पत्रकार के खिलाफ 82 की कार्यवाही हुई तथा अदालत से वारंट भी जारी किए गए लेकिन इस सब के बावजूद मथुरा पुलिस कमलकांत उपमन्‍यु की गिरफ्तारी सुनिश्‍चित नहीं कर सकी।
मंजिल सैनी ने तो पीड़िता के परिवार को दबाव में लेने के लिए उसके सगे भाई पर ही एक मुकद्दमा दर्ज करा दिया जो बाद में झूठा साबित हुआ।
बताया जाता है कि एसएसपी मंजिल सैनी आरोपी कमलकांत उपमन्‍यु से अपनी निकटता के चलते उन्‍हें अपने बचाव तथा मामले को रफा-दफा करने का पूरा मौका दे रही थीं।
हुआ भी यही। कमलकांत उपमन्‍यु ने मथुरा पुलिस से मिले इस मौके का लाभ उठाकर तत्‍कालीन डीजीपी आनंद लाल बनर्जी से किसी तरह सेटिंग कर ली और अपने सगे भाई त्रिभुवन उपमन्‍यु के प्रार्थना पत्र पर अपने खिलाफ जांच को फिरोजाबाद ट्रांसफर करा लिया। चूंकि सारा मामला सेटिंग से हुआ था इसलिए फिरोजाबाद पुलिस ने इस मामले में फाइनल रिपोर्ट दाखिल कर दी।
इस बीच मथुरा बार एसोसिएशन के तत्‍कालीन अध्‍यक्ष एडवोकेट विजयपाल तोमर ने जांच ट्रांसफर किए जाने के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की जिसकी सुनवाई तत्‍कालीन चीफ जस्‍टिस डी वाई चंद्रचूढ़ के यहां हुई।
चीफ जस्‍टिस डी वाई चंद्रचूढ़ ने प्रथम दृष्‍ट्या इस मामले की गंभीरता के मद्देनजर बहुत सख्‍त आदेश-निर्देश जारी किए।
डी वाई चंद्रचूढ़ का प्रमोशन हो जाने के बाद यह मामला जस्‍टिस अरुण टंडन तथा जस्‍टिस सुनीता अग्रवाल की डिवीजन बैंच में स्‍थानांतरित हो गया। माननीय टंडन तथा सुनीता अग्रवाल ने इस मामले की सुनवाई करते हुए 12 जुलाई 2016 के अपने आदेश में मुख्‍यमंत्री उत्‍तर प्रदेश अखिलेश यादव के स्‍पेशल ऑफीसर इंचार्ज जगजीवन प्रसाद, डीजीपी उत्‍तर प्रदेश तथा एसएसपी मथुरा को 25 जुलाई तक अपने-अपने शपथपत्र दाखिल करने को कहा। कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी पूछा कि जिस तरह से बलात्‍कार पीड़िता के कोर्ट में बयान होने के बावजूद जांच ट्रांसफर कर दी गई, उसे देखते हुए क्‍यों न यह मामला सीबीआई के सुपुर्द कर दिया जाए।
हाईकोर्ट के आदेश का पालन करते हुए तत्‍कालीन डीजीपी आनंद लाल बनर्जी व तत्‍कलीन एसएसपी मथुरा मंजिल सैनी ने तो अपने-अपने जवाब सहित शपथ पत्र दाखिल कर दिए किंतु सीएम के स्‍पेशल ऑफीसर इंचार्ज जगजीवन प्रसाद ने अपना जवाब दाखिल नहीं किया।
शासन के अनुरोध पर हाईकोर्ट ने जगजीवन प्रसाद को जवाब दाखिल करने के लिए कुछ समय और देते हुए अगली तारीख 08 अगस्‍त मुकर्रर कर दी।
इसके बाद चीफ जस्‍टिस के पद पर दिलीप बाबा साहब भोसले की नियुक्‍ति हो जाने के कारण यह मामला स्‍वाभाविक रूप से उनकी अदालत में आ गया, और काफी दिनों तक अनलिस्‍टेड रहा ताकि इसकी सुनवाई प्राथमिकता के आधार पर की जा सके किंतु विभिन्‍न कारणों से इसकी सुनवाई प्राथमिकता के आधार पर नहीं की जा सकी।
प्राप्‍त जानकारी के अनुसार गत माह इसे मार्च 2017 के लिए लिस्‍टेड किया गया है लेकिन पेंडिंग मुकद्दमों की तादाद तथा अदालती प्रक्रिया को देखते हुए इस बात की संभावना काफी कम है कि मार्च 2017 में भी इस मामले की सुनवाई हो पाएगी।
इसी सबके चलते अब आरोपी कमलकांत उपमन्‍यु का मथुरा में चीफ जस्‍टिस से मिलना और चीफ जस्‍टिस का उससे बड़ी गर्मजोशी के साथ हाथ मिलाते हुए फोटो सार्वजनिक होना बड़े विवाद का विषय बन सकता है क्‍योंकि चीफ जस्‍टिस की ऐसी कोई मुलाकात किसी के साथ होना उनके कार्यक्रम का हिस्‍सा नहीं था। आरोपी कमलकांत उपमन्‍यु चूंकि खुद को पत्रकार के साथ-साथ वकील भी मानता है इसलिए वह चीफ जस्‍टिस से मुलाकात के वक्‍त वकालत का चोगा भी धारण किए था किंतु चीफ जस्‍टिस की न तो पत्रकारों से कोई वार्ता पूर्व निर्धारित थी और ना ही वकीलों से। संभवत: इसीलिए मथुरा बार एसोसिएशन का कोई पदाधिकारी अथवा प्रेक्‍टिशनर वकील चीफ जस्‍टिस से मिलने नहीं पहुंचा, अलबत्‍ता नॉन प्रेक्‍टिश्‍नर वकील होते हुए आरोपी पत्रकार कमलकांत उपमन्‍यु वकालत के चोगे में उनसे मिला।
ऐसी स्‍थिति में यह सवाल उठना स्‍वाभाविक है कि कमलकांत उपमन्‍यु की चीफ जस्‍टिस से मुलाकत कराने में किसी न किसी ने मध्‍यस्‍थ की भूमिका जरूर अदा की होगी और निश्‍चित तौर पर वह व्‍यक्‍ति न्‍यायपालिका का ही हिस्‍सा होगा क्‍योंकि हाई कोर्ट के चीफ जस्‍टिस जैसी हस्‍ती से बिना किसी तय कार्यक्रम के इस तरह मुलाकात होना संभव नहीं होता।
प्रोटोकॉल को ताक पर रखकर की गई इस मुलाकात और इसके पीछे छिपे उद्देश्‍य की जांच यूं भी जरूरी है कि इससे कानून का भरोसा जुड़ा हुआ है। चीफ जस्‍टिस भोसले की आदलत में ही आगे कमलकांत उपमन्‍यु के खिलाफ सुनवाई होनी है।
आरोपी कमलकांत उपमन्‍यु ने जिस तरह चीफ जस्‍टिस भोसले से हुई अपनी मुलाकात को एक ओर जहां अपनी फेसबुक प्रोफाइल से प्रचारित व प्रसारित किया है और दूसरी ओर प्रमुख समाचार पत्रों में प्रकाशित कराया है, उससे उसकी मंशा तो साफ जाहिर होती ही है।
इन हालातों में चीफ जस्‍टिस भोसले द्वारा बलात्‍कार के आरोपी पत्रकार कमलकांत उपमन्‍यु से हाथ मिलाते हुए फोटो प्रकाशित होने पर सवाल खड़े होंगे ही।
उधर इलाहाबाद हाई कोर्ट में इस मामले को ले जाने वाले याची अधिवक्‍ता विजयपाल तोमर का कहना है कि वह चीफ जस्‍टिस व आरोपी की मुलाकात का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट तक ले जाएंगे जिससे इसके पीछे छिपे उद्देश्‍य और मुलाकात तय कराने वाले तत्‍वों का पर्दाफाश हो सके।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

शनिवार, 30 जुलाई 2016

बलात्‍कार केस: अब उपमन्‍यु के साथ DGP और SSP भी हाईकोर्ट से खाल बचाने में लगे

– DGP और SSP को भी शपथ पत्र के जरिए जवाब दाखिल करने में छूटे पसीने
– एक-दूसरे के ऊपर थोपा उपमन्‍यु के खिलाफ जांच ट्रांसफर करने का  मामला
मथुरा। बलात्‍कार के केस में पत्रकार कमलकांत उपमन्‍यु को बचाने की कोशिश करने वाले DGP और SSP अब इलाहाबाद हाईकोर्ट से अपनी खाल बचाने का प्रयास करते नजर आ रहे हैं।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गत 12 जुलाई के अपने आदेश में मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव के स्‍पेशल ऑफीसर इंचार्ज जगजीवन प्रसाद सहित यूपी के तत्‍कालीन डीजीपी आनंद लाल बनर्जी तथा तत्‍कालीन एसएसपी मथुरा मंजिल सैनी से 25 जुलाई तक व्‍यक्‍तिगत शपथपत्र के जरिए जवाब तलब किया था।
हाईकोर्ट के आदेश का पालन करते हुए आनंद लाल बनर्जी व मंजिल सैनी ने तो अपने-अपने जवाब सहित शपथ पत्र दाखिल कर दिए हैं किंतु सीएम के स्‍पेशल ऑफीसर इंचार्ज जगजीवन प्रसाद ने अभी अपना जवाब दाखिल नहीं किया है।
शासन के अनुरोध पर हाईकोर्ट ने जगजीवन प्रसाद को जवाब दाखिल करने के लिए कुछ समय और देते हुए अगली तारीख 08 अगस्‍त मुकर्रर कर दी है।
इन दिनों लखनऊ में वरिष्‍ठ पुलिस अधीक्षक के पद पर तैनात मथुरा की तत्‍कालीन एसएसपी मंजिल सैनी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट को भेजे गए अपने जवाब में सिर्फ खुद को बचाने का प्रयास किया है और कमलकांत उपमन्‍यु के खिलाफ बलात्‍कार के केस की जांच स्‍थानांतरित करने का सारा ठीकरा अपने उच्‍चाधिकारियों के सिर फोड़ा है।
मंजिल सैनी ने अपने जवाब में लिखा है कि मैंने बलात्‍कार के आरोपी कमलकांत उपमन्‍यु के खिलाफ जांच को मथुरा से फिरोजाबाद स्‍थानांतरित करने के लिए मुख्‍यमंत्री के ओएसडी की सिफरिश से आए उच्‍चाधिकारियों के आदेश का पालनभर किया था। बतौर एसएसपी मुझे किसी जांच को मथुरा जनपद से बाहर स्‍थानांतरित करने का अधिकार ही नहीं था।
जांच स्‍थानांतरित हो जाने के बाद मथुरा पुलिस ने तत्‍काल इस केस से संबंधित केस डायरी और सभी पेपर्स फिरोजाबाद पुलिस को सौंप दिए।
मंजिल सैनी के जवाब से पहली बार में तो ऐसा लगता है जैसे बलात्‍कार के आरोपी कमलकांत उपमन्‍यु को बचाए रखने में उनकी कोई भूमिका ही न हो किंतु जब किसी जांच को स्‍थानांतरित करने के लिए तय आदेश-निर्देशों पर गौर किया जाए तो पता लगता है कि ऊपर से लेकर नीचे तक बैठे पुलिस अधिकारियों ने किस प्रकार सारे आदेश-निर्देशों की खुली अवहेलना करके कमलकांत उपमन्‍यु को बच निकलने का पूरा मौका उपलब्‍ध कराया।
किसी भी केस की जांच बदलने के लिए उत्‍तर प्रदेश के ही प्रमुख सचिव देवाशीष पण्‍डा द्वारा प्रदेश पुलिस के मुखिया से लेकर हर जिले के पुलिस प्रमुख तथा जिलाधिकारियों तक के लिए 22 अक्‍टूबर 2014 को जो पत्र भेजा गया था, उसके मुताबिक निर्गत किए गए आदेश-निर्देश इस प्रकार हैं:
1- किसी भी केस की जांच को स्‍थानांतरित करने से पहले उस जिले से केस की आख्‍या मंगानी होगी जहां वो केस रजिस्‍टर्ड हुआ हो और उसी आख्‍या के आधार पर जांच ट्रांसफर करने का निर्णय लिया जाएगा।
2- भेजी गई आख्‍या न केवल पूर्णत: स्‍पष्‍ट होनी चाहिए बल्‍कि उस पर जिले के पुलिस प्रमुख की संस्‍तुति उनके अपने हस्‍ताक्षर के साथ की जानी चाहिए। संस्‍तुति करने के लिए भी पुलिस प्रमुख को आख्‍या के साथ संलग्‍न ”चेक लिस्‍ट” के आदेशों पर अमल करना होगा।
3- इस चेक लिस्‍ट में आरोपी के बावत बहुत सी जानकारियों का ब्‍यौरा उपलब्‍ध कराने तथा उस समय के विवेचक का भी जांच ट्रांसफर करने को लेकर अभिमत जानने सहित कुल 15 बिंदु दिए गए हैं जिन्‍हें पूरा करना आवश्‍यक है।
गौरतलब है कि कमलकांत उपमन्‍यु के मामले में न तो तत्‍कालीन डीजीपी आनंद लाल बजर्नी ने ऐसे किसी आदेश-निर्देश का पालन किया और ना ही मथुरा की तत्‍कालीन एसएसपी मंजिल सैनी ने, जबकि प्रमुख सचिव का पत्र इस केस से करीब डेढ़ महीने पहले ही हर जिले के पुलिस प्रमुख तक पहुंच चुका था।
इसके अलावा मंजिल सैनी के पास क्‍या इन प्रश्‍नों का कोई जवाब है कि पीड़िता द्वारा खुद उनसे संपर्क स्‍थापित किए जाने के बावजूद उन्‍होंने जांच के नाम पर कई दिन तक क्‍यों कमलकांत उपमन्‍यु के खिलाफ केस दर्ज नहीं होने दिया ?
क्‍यों इस बीच पीड़िता के भाई और पिता के खिलाफ ही एक केस दर्ज करवा दिया जो बाद में झूठा साबित हुआ ?
06 दिसंबर 2014 को केस दर्ज हो जाने के बाद से जांच स्‍थानांतरित होने के बीच 15 दिनों तक मंजिल सैनी क्‍या करती रहीं। उन्‍होंने आरोपी कमलकांत उपमन्‍यु को गिरफ्तार न करके उसे पीड़िता व उसके परिवार पर दबाव बनाने तथा लखनऊ तक संपर्क साधकर जांच गैर जनपद स्‍थानांतरित कराने का मौका कैसे दिया, वो भी तब जबकि इस बीच पीड़िता का मैडीकल भी हो चुका था और 161 व 164 के तहत बयान भी दर्ज कराए जा चुके थे।
क्‍या मंजिल सैनी को पहले से ज्ञात था कि कमलकांत उपमन्‍यु अपने खिलाफ केस की जांच गैर जनपद ट्रांसफर कराने में सफल होगा।
मंजिल सैनी द्वारा बलात्‍कार के आरोपी कमलकांत उपमन्‍यु को बचाने का यह प्रयास इसलिए और अधिक मायने रखता है क्‍योंकि कमलकांत उपमन्‍यु के साथ मंजिल सैनी की निकटता जगजाहिर थी। वह कमलकांत उपमन्‍यु के घर पर उनके निजी कार्यक्रमों तक में शामिल होती थीं।

समाचार चैनल ”आजतक” के समक्ष इस केस से मुतल्‍लिक अपना पक्ष रखते वक्‍त भी बतौर एसएसपी मंजिल सैनी का आरोपी कमलकांत उपमन्‍यु को ”उपमन्‍यु जी” संबोधित करना और प्रतिष्‍ठित पत्रकार बताना इस बात की पुष्‍टि करता है कि मंजिल सैनी का कमलकांत उपमन्‍यु के प्रति सॉफ्टकॉर्नर बरकरार था।

मंजिल सैनी ने कोर्ट को शपथपत्र के माध्‍यम से दिए गए जवाब में इस बात का कोई उल्‍लेख नहीं किया कि पीड़िता के कोर्ट में बयान हो जाने के बाद वह आरोपी की गिरफ्तारी के लिए आखिर किस बात का इंतजार करती रहीं।
इसी प्रकार तत्‍कालीन डीजीपी आनंद लाल बजर्नी ने अपने बचाव में शपथ पत्र के जरिए जो सफाई पेश की है, वह बहुत ही हास्‍यास्‍पद है। जैसे बनर्जी का एक ओर तो यह कहना कि उन्‍हें CrPC की धारा 36 तथा पुलिस एक्‍ट 1861 की धारा 3 के तहत किसी केस की जांच को ट्रांसफर करने का अधिकार है, और दूसरी ओर यह बताना कि उक्‍त जांच उन्‍होंने मुख्‍यमंत्री के स्‍पेशल ऑफीसर इंचार्ज की संस्‍तुति पर ट्रांसफर की है।
बनर्जी संभवत: यह भूल गए कि वह जवाब हाईकोर्ट को भेज रहे हैं, न कि किसी नेता को।

आश्‍चर्य की बात यह है कि डीजीपी के पद से अवकाश ग्रहण करने के मात्र चंद रोज पहले किए गए इस कारनामे के लिए आनंद लाल बनर्जी ने भी जांच ट्रांसफर करने के लिए प्रमुख सचिव द्वारा दिए गए लिखित आदेश-निर्देशों पर गौर करना जरूरी नहीं समझा। आखिर क्‍यों ?
इतने बड़े पद पर बैठे अधिकारी ने कैसे उन आदेश निर्देशों की खुली अवहेलना की और जांच ट्रांसफर करने का आदेश करने से पहले जिले के एसएसपी से आख्‍या क्‍यों नहीं मांगी।
कोर्ट को दिए गए शपथ पत्र में डीजीपी बनर्जी ने लिखा है कि उन्‍होंने आरोपी के भाई की एप्‍लीकेशन पर मुख्‍यमंत्री के स्‍पेशल ऑफीसर इंचार्ज की संस्‍तुति और पीड़िता द्वारा भी जांच बदलने के लिए मुझे दिए गए प्रार्थना पत्र के मद्देनजर अपने अधिकारों का इस्‍तेमाल करते हुए जांच ट्रांसफर की जबकि सच्‍चाई यह है कि आरोपी कमलकांत उपमन्‍यु के भाई पूर्व सूबेदार त्रिभुवन उपमन्‍यु ने मुख्‍यमंत्री के नाम प्रार्थना पत्र 18 दिसंबर 2014 को दिया था और पीड़िता द्वारा डीजीपी को प्रार्थना पत्र 22 दिसंबर 2014 को दिया गया लेकिन जांच बदलने के आदेश 22 दिसंबर को किए जा चुके थे।
अगर पीड़िता के प्रार्थना पत्र को भी जांच बदलने का आधार बनाया गया तो डीजीपी की इस मामले में तेजी बहुत से संदेह पैदा करती है।
जैसे 22 दिसंबर को मिले प्रार्थना पत्र पर उसी दिन बिना आख्‍या मांगे जांच बदलने का आदेश कर देने के पीछे कहीं डीजीपी का अपना कोई स्‍वार्थ तो पूरा नहीं हो रहा था। डीजीपी को यह भी मालूम था कि वह 8 दिन बाद अपने पद से अवकाश ग्रहण करने वाले हैं, फिर ऐसी कौन सी वजह थी कि डीजीपी ने सेम-डे जांच बदलने का आदेश किया।
इस मामले का एक और सबसे महत्‍वपूर्ण पहलू यह है कि मुख्‍यमंत्री के स्‍पेशल ऑफीसर इंचार्ज का पद न तो कोई संवैधानिक पद है और न डीजीपी जैसा अधिकारी उनके किसी आदेश-निर्देश अथवा संस्‍तुति को मानने के लिए बाध्‍य है, ऐसे में डीजीपी बनर्जी का मुख्‍यमंत्री के स्‍पेशल ऑफीसर इंचार्ज जगजीवन की संस्‍तुति पर अपने अधिकारों का इस्‍तेमाल करते हुए जांच ट्रांसफर करने का हवाला देना कानून-व्‍यवस्‍था के साथ भद्दे मजाक से अधिक कुछ नहीं हो सकता।
डीजीपी बनर्जी ने अपने शपथ पत्र में एक दलील इस आशय की भी दी है कि याचिकाकर्ता एडवोकेट विजय पाल तोमर चूंकि इस केस में कोई पक्ष नहीं हैं इसलिए उन्‍हें जनहित याचिका दायर करने का कोई अधिकार भी नहीं है, एक तरह से उच्‍च न्‍यायालय को चुनौती देने के समान है। उच्‍च न्‍यायालय ने जब याचिका स्‍वीकार करके केस की सुनवाई शुरू कर दी और जवाब तलब भी कर लिया तो ऐसी किसी दलील का क्‍या औचित्‍य रह जाता है। यूं भी जनहित याचिका दायर करने का अधिकार किसे है और किसे नहीं, यह देखना कोर्ट का काम है न कि आनंद लाल बनर्जी का।
इन हालातों में लगता तो यह है इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय आगामी 08 अगस्‍त को इस मामले में कोई बड़ा फैसला सुना सकती है। केस की जांच नए सिरे से सीबीआई को भी सौंप सकती है जैसा कि उसने 12 जुलाई के अपने आदेश में कहा भी है कि क्‍यों न यह मामला सीबीआई के सुपुर्द कर दिया जाए।
यदि ऐसा होता है तो निश्‍चित है कि जांच की आंच सिर्फ पत्रकार कमलकांत उपमन्‍यु, तत्‍कालीन डीजीपी आनंद लाल बनर्जी, तत्‍कालीन एसएसपी मथुरा मंजिल सैनी तथा मुख्‍यमंत्री के स्‍पेशल ऑफीसर इंचार्ज जगजीवन प्रसाद तक सीमित नहीं रह जाएगी।
तब इसकी जांच के दायरे में वह लोग भी होंगे जिन्‍होंने एक मामूली से पत्रकार को इतना अधिक प्रभावशाली बनाने में मदद की कि वह पूरी व्‍यवस्‍था को खुली चुनौती दे सके और मुख्‍यमंत्री के स्‍पेशल ऑफीसर इंचार्ज सहित डीजीपी व महिला एसएसपी अपनी गर्दन फंसाकर भी बलात्‍कार जैसे संगीन अपराध से उसे बच निकलने के लिए पूरा अवसर प्रदान करते रहे।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

बलात्‍कार के केस में पत्रकार उपमन्‍यु को इलाहाबाद High Court से तगड़ा झटका

-कोर्ट ने पूछा, क्‍यों न CBI को सौंप दिया जाए केस 
-मुख्‍यमंत्री के स्‍पेशल ऑफीसर इंचार्ज, डीजीपी यूपी तथा एसएसपी मथुरा से 25 जुलाई तक शपथपत्र दाखिल करने को कहा 
मथुरा। एमबीए पास एक लड़की से बलात्‍कार करने के केस में पत्रकार कमलकांत उपमन्‍यु को इलाहाबाद High Court ने तगड़ा झटका दिया है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के विद्वान न्‍यायाधीश माननीय अरुण टंडन तथा माननीय सुनीता अग्रवाल की डिवीजन बैंच ने गत 12 जुलाई के अपने आदेश में इस मामले पर मुख्‍यमंत्री उत्‍तर प्रदेश अखिलेश यादव के स्‍पेशल ऑफीसर इंचार्ज जगजीवन प्रसाद, डीजीपी उत्‍तर प्रदेश तथा एसएसपी मथुरा को अपने-अपने शपथपत्र दाखिल करने को कहा है।
कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी पूछा है कि जिस तरह से बलात्‍कार पीड़िता के कोर्ट में बयान होने के बावजूद जांच ट्रांसफर कर दी गई, उसे देखते हुए क्‍यों न यह मामला सीबीआई के सुपुर्द कर दिया जाए।
गौरतलब है कि पीड़िता की तहरीर पर दुराचार का यह मामला 06 दिसंबर 2014 को मथुरा के हाईवे थाने में अपराध संख्‍या 944/2014 धारा 376 व 506 आईपीसी के तहत दर्ज हुआ था।
उत्‍तर प्रदेश जर्नलिस्‍ट एसोसिएशन के प्रदेश उपाध्‍यक्ष, ब्रज प्रेस क्‍लब के अध्‍यक्ष तथा मथुरा छावनी बोर्ड के भी उपाध्‍यक्ष पद पर काबिज रहे कमलकांत उपमन्‍यु ने अपने प्रभाव का इस्‍तेमाल करते हुए पहले तो इस गंभीर आपराधिक मामले की जांच को मथुरा से फिरोजाबाद स्‍थानांतरित करा लिया और फिर उसमें फिरोजाबाद पुलिस से फाइनल रिपोर्ट लगवा दी जबकि जांच स्‍थानांतरित होने से पूर्व न केवल पीड़िता का मेडीकल हो चुका था बल्‍कि मथुरा पुलिस के सामने 161 व कोर्ट में 164 के तहत बयान भी दर्ज कराए जा चुके थे। जिस समय यह जांच स्‍थानांतरित की गई उस समय उत्‍तर प्रदेश पुलिस के डीजी आनंद लाल बनर्जी हुआ करते थे और जिन्‍हें बमुश्‍किल एक सप्‍ताह बाद ही अपने पद से मुक्‍त होना था जबकि मथुरा के एसएसपी पद पर मंजिल सैनी काबिज थीं जो फिलहाल लखनऊ के एसएसपी पद पर काबिज हैं। तत्‍कालीन एसएसपी मंजिल सैनी की आरोपी पत्रकार कमलकांत उपमन्‍यु से नजदीकियां जगजाहिर थीं और मंजिल सैनी के उपमन्‍यु के घर पर उसके साथ खींचे गए फोटो भी उसकी पुष्‍टि कर रहे थे लिहाजा मंजिल सैनी ने पहले तो उपमन्‍यु के खिलाफ एफआईआर ही बड़ी मुश्‍किल से दर्ज होने दी और फिर एफआईआर दर्ज होने के बावजूद उसकी गिरफ्तारी न करके उसे अपने प्रभाव का इस्‍तेमाल करने की पूरी छूट भी दी। एसएसपी का संरक्षण ही था कि बलात्‍कार जैसे संगीन आरोप में और पीड़िता के 164 के बयान हो जाने के बावजूद कमलकांत उपमन्‍यु अपने सगे भाई की एप्‍लीकेशन पर जांच मथुरा से फिरोजाबाद स्‍थानांतरित करने में सफल रहा।
फिरोजाबाद में तब तक एसपी के पद पर पीयूष श्रीवास्‍तव आ चुके थे जो पहले मथुरा में एएसपी रहे थे। पीयूष श्रीवास्‍तव से भी कमलकांत उपमन्‍यु की अच्‍छी सेटिंग थी इसलिए उसे फिरोजाबाद के आईओ को प्रभावित करने में कोई परेशानी नहीं हुई।
केस की गंभीरता और आरोपी पत्रकार कमलकांत उपमन्‍यु के प्रभाव को देखते हुए मथुरा बार एसोसिएशन के तत्‍कालीन अध्‍यक्ष एडवोकेट विजयपाल तोमर इसे इलाहाबाद हाईकोर्ट ले गए और 09 फरवरी 2015 को जनहित याचिका दायर की।
एडवोकेट विजयपाल तोमर की याचिका पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्‍य न्‍यायाधीश माननीय डी. वाई. चंद्रचूढ़ तथा माननीय सुजीत कुमार की बैंच ने संज्ञान लेते हुए 11 फरवरी 2015 के अपने आदेश में संबंधित सभी अधिकारियों तथा सीजेएम मथुरा को आवश्‍यक दिशा-निर्देश दिए।
इलाहाबाद हाइकोर्ट में लंबित होते हुए पत्रकार कमलकांत उपमन्‍यु ने इस बीच फिरोजाबाद पुलिस से इस मामले में फाइनल रिपोर्ट लगवा ली।
बताया जाता है कि आरोपी कमलकांत उपमन्‍यु ने पीड़िता को भी अपना प्रभाव दिखाकर मथुरा कोर्ट के अंदर अपने पक्ष में बयान देने पर बाध्‍य कर दिया।
अब जबकि याचिकाकर्ता एडवोकेट विजयपाल तोमर ने 12 जुलाई 2016 को कोर्ट के समक्ष सारा मामला पेश किया और बताया कि किस तरह आरोपी ने अपने प्रभाव का इस्‍तेमाल कर न केवल जांच बदलवाई बल्‍कि उसमें फाइनल रिपोर्ट लगवाकर पीड़िता के बयान भी अपने पक्ष में करा लिए तो कोर्ट ने केस की गंभीरता के मद्देनजर अब 25 जुलाई तक मुख्‍यमंत्री के स्‍पेशल ऑफीसर इंचार्ज जगजीवन प्रसाद, डीजीपी उत्‍तर प्रदेश तथा एसएसपी मथुरा को अपने-अपने शपथपत्र दाखिल करने करने को कहा है। साथ ही कोर्ट ने अपने आदेश में पूछा है कि क्‍यों न यह मामला सीबीआई के सुपुर्द कर दिया जाए। इलाहाबाद हाईकोर्ट में अब इस मामले की सुनवाई 27 जुलाई को होनी है।
-लीजेंड न्‍यूज़

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2015

कमलकांत उपमन्‍यु को हाईकोर्ट से तगड़ा झटका



मथुरा बार एसोसिएशन के अध्यक्ष विजय पाल सिंह तोमर की जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान मुख्‍य न्‍यायाधीश डॉ. डी. वाई. चन्‍द्रचूढ़ तथा जस्टिस सुनीत कुमार की खंडपीठ ने इस मामले में तीखी टिप्‍पणी करते हुए न केवल उत्‍तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक की कार्यप्रणाली पर गहरा सवालिया निशान लगाया है बल्‍कि प्रदेश सरकार से भी जवाब तलब किया है।
न्‍यायालय ने सरकार से पूछा है कि ऐसी कौन सी परिस्‍थितियां पैदा हो गईं कि आरोपी के भाई द्वारा दिये गये प्रार्थना पत्र को आधार बनाकर डीजीपी को विवेचना बदलने के लिए कहना पड़ा।
कोर्ट ने डीजीपी के उस पत्र का भी हवाला अपने आदेश में दिया है जिसके तहत साफ लिखा गया था कि ‘सरकार की मंशा है कि जांच स्थानांतरित की जाए’।
डीजीपी के पत्र से साफ है कि मुख्यमंत्री के ओएसडी (न्यायिक) द्वारा उनको लिखे पत्र के बाद विवेचना मथुरा से फिरोजाबाद स्थानांतरित की गई। इस तरह के आदेश का सीधा तात्‍पर्य है कि डीजीपी ने विवेक का प्रयोग न कर राजनीतिक दबाव में निर्णय लिया।
उच्‍च न्‍यायालय ने इन परिस्‍थितियों में विवेचना स्‍थानांतरित करने को अत्‍यंत गंभीरता से लेते हुए अपने आदेश के तहत लिखा है कि इस तरह तो आम जनता का भरोसा ही आपराधिक न्याय प्रणाली से उठ जाएगा क्‍योंकि आपराधिक मुकद्दमों की विवेचना के लिए निर्धारित गाइड लाइंस तक का सरकार पालन नहीं कर रही है।
सरकार अब इस मामले में पूरी तरह घिरती हुई दिखाई दे रही है। कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 19 फरवरी का दिन नियत किया है, साथ ही अपने इस आदेश की जानकारी पीड़िता और उसके परिवार को देने का जिम्‍मा चीफ जुडीशियल मजिस्‍ट्रेट (सीजेएम) मथुरा को सौंपा है।
उल्‍लेखनीय है कि एक एमबीए की छात्रा द्वारा लगाये गये बलात्‍कार व जान से मारने की धमकी देने जैसे संगीन आरोपों की विवेचना कमलकांत उपमन्‍यु ने अपने राजनीतिक व प्रशासनिक प्रभाव से तब फिरोजाबाद स्‍थानांतरित करा ली थी जबकि पीड़िता का एक ओर जहां 161 के बयान दर्ज कराकर मैडीकल करवाया जा चुका था वहीं दूसरी ओर कोर्ट में 164 के कलमबद्ध बयान भी दर्ज हो चुके थे। पीड़िता ने 164 के अपने बयानों में इस बात का भी उल्‍लेख किया था कि आरोपी मेरे व मेरे परिवार पर समझौते के लिए लगातार दबाव बना रहा है और मेरे परिवारीजनों को धमिकयां दी जा रही हैं। यही नहीं, केस की गंभीरता के मद्देनजर न्‍यायालय से आरोपी कमलकांत उपमन्‍यु के गैर जमानती वारंट जारी हो गये और सीआरपीसी की धारा 82 के तहत कार्यवाही भी कर दी गई थी। मथुरा पुलिस ने कमलकांत उपमन्‍यु के घर पर 82 का नोटिस तक चस्‍पा कर दिया था।
बताया जाता है कि फिरोजाबाद विवेचना स्‍थानांतरित कराने के बाद कमलकांत उपमन्‍यु ने इस मामले में आईओ से फाइनल रिपोर्ट लगवाने का पूरा इंतजाम कर लिया था। आईओ ने गत दिनों संबंधित न्‍यायालय में पीड़िता के 164 के तहत बयान फिर से कराने की इजाजत भी लेनी चाही थी लेकिन न्‍यायालय ने उसे इजाजत नहीं दी।
दरअसल कमलकांत उपमन्‍यु को इतना सब-कुछ करने व कराने का पूरा मौका एसएसपी मथुरा ने दिया। वह पहले तो पीड़िता की एफआईआर ही दर्ज करने के लिए तैयार नहीं थीं। पीड़िता की तहरीर पर तीन दिन बाद जांच के उपरांत जैसे-तैसे मुकद्दमा दर्ज कराया तो आरोपी की गिरफ्तारी का कोई गंभीर प्रयास नहीं किया।
कमलकांत उपमन्‍यु के दबाव में एसएसपी ने पीड़िता के पिता व भाई के खिलाफ ही फर्जी आपराधिक मामले दर्ज करा दिये ताकि वह किसी प्रकार कमलकांत उपमन्‍यु से समझौता कर ले।
विभिन्‍न टीवी चैनल्‍स को दिये अपने बयानों में भी एसएसपी मथुरा मंजिल सैनी, आरोपी पत्रकार का बचाव करती साफ नजर आईं। बलात्‍कार जैसे संगीन व घृणित आरोपों के बावजूद वह कैमरे के सामने कमलकांत उपमन्‍यु के लिए आदर सूचक शब्‍दों का प्रयोग करती देखी गईं।
यही कारण था कि आरोपी पत्रकार, पीड़िता व उसके परिवार पर लगातार दबाव बनाने में सफल रहा और साथ ही अपने बचाव के लिए शासन व प्रशासनिक स्‍तर पर भी सक्रिय रहा।
अब मुख्‍य न्‍यायधीश की अध्‍यक्षता वाली खण्‍डपीठ के इस निर्णय ने कमलकांत उपमन्‍यु के अरमानों पर तो पानी फेर ही दिया है, ऐसे तत्‍वों को सबक सिखाने का इंतजाम भी कर दिया है जो अपने राजनीतिक व प्रशासनिक रसूख के बल पर कानून का खुला मजाक उड़ाते हैं और संगीन आपराधिक वारदातें करके भी साफ बच निकलते हैं।
कोर्ट ने भी अपने इस आदेश के तहत यह जिक्र किया है कि शासन व पुलिस प्रशासन के स्‍तर पर मनमाने तरीके से विवेचना बदले जाने के कारण अपराधियों ने इसे अपने बचाव का कारगर हथियार बना लिया है और पीड़ितों की ओर से बड़ी संख्‍या में इनके खिलाफ याचिकाएं दाखिल हो रही हैं।
पीठ का कहना है कि इस प्रकार के मनमाने स्थानांतरण निश्चित रूप से बंद होने चाहिए।

रविवार, 18 जनवरी 2015

छात्रा रेप केस की जांच ट्रांसफर होने पर भारी रोष 'बार एसोसिएशन ने लिखा UP के DGP को पत्र'







मथुरा। 
बार एसोसिएशन मथुरा ने एमबीए की छात्रा से बलात्‍कार करने के मामले में आरोपी पत्रकार कमलकांत उपमन्‍यु के भाई की एप्‍लीकेशन पर जांच को गैर जनपद स्‍थानांतरित कर दिये जाने के खिलाफ पुलिस महानिदेशक लखनऊ को एक प्रार्थनापत्र भेजा है।
बार के अध्‍यक्ष विजयपाल सिंह तोमर के हस्‍तक्षरयुक्‍त इस पत्र में डीजीपी उत्‍तर प्रदेश से अनुरोध किया गया है कि वह कमलकांत उपमन्‍यु के खिलाफ आईपीसी की धारा 376 और 506 के केस की विवेचना को पुन: मथुरा जनपद स्‍थानांतरित कर आरोपी की गिरफ्तारी सुनिश्‍चित करें।
उल्‍लेखनीय है कि उत्‍तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी आनंद लाल बनर्जी ने सेवा निवृत होने से मात्र एक सप्‍ताह पूर्व आरोपी कमलकांत उपमन्‍यु के भाई त्रिभुवन उपमन्‍यु के प्रार्थना पत्र पर बलात्‍कार जैसे संगीन अपराध की विवेचना मथुरा से फिराजाबाद जनपद स्‍थानांतरित कर दी थी जो न सिर्फ नियम विरुद्ध है बल्‍कि ऐसे मामलों में सर्वोच्‍च न्‍यायालय द्वारा दिये गये आदेश-निर्देशों का खुला उल्‍लंघन है।
इस संबंध में आज जब 'लीजेण्‍ड न्‍यूज़' ने इस मामले के नये विवेचक और फिरोजाबाद की क्राइम ब्रांच में तैनात इंस्‍पेक्‍टर सत्‍यपाल सिंह से उनके सीयूजी नंबर 9412861327 पर बात की तो उन्‍होंने विवेचना खुद को सौंपे जाने की पुष्‍टि करते हुए यह भी स्‍वीकार किया कि बलात्‍कार जैसे संगीन आरोप की जांच सामान्‍यत: इस तरह तब्‍दील नहीं की जाती। उन्‍होंने कहा कि मैं अपनी जिम्‍मेदारी पूरी निष्‍पक्षता के साथ और ईमानदारी पूर्वक निभाऊंगा तथा तथ्‍यों का ध्‍यान रखूंगा।
गौरतलब है कि पत्रकार कमलकांत उपमन्‍यु के खिलाफ दर्ज बलात्‍कार और जान से मारने की धमकी देने के इस मामले की जांच इससे पहले मथुरा में ही तैनात महिला सब इंस्‍पेक्‍टर रीना द्वारा की जा रही थी। उप निरीक्षक रीना ने ही पीड़िता से 161 के बयान लिए थे और उन्‍होंने ही मैडिकल कराने के उपरांत कोर्ट में 164 के बयान कराकर कमलकांत उपमन्‍यु के खिलाफ गैर जमानती वारंट हासिल करके 82 की कार्यवाही कराई थी।
यह मामला पीड़िता द्वारा 3 दिसंबर को प्रार्थना पत्र देने पर एसएसपी मंजिल सैनी ने जांच के उपरांत 6 दिसंबर को थाना हाईवे में दर्ज कराया था, बावजूद इसके आरोपी कमलकांत की गिरफ्तारी नहीं की गई और उसे पीड़िता व उसके परिवार पर समझौते के लिए दबाव बनाने का पूरा मौका दिया गया।
यही नहीं, एसएसपी मंजिल सैनी से पर्याप्‍त सहयोग मिलने के कारण ही बलात्‍कार जैसे संगीन केस की विवेचना को आरोपी कमलकांत गैर जनपद स्‍थानांतरित कराने में सफल रहा।
आश्‍चर्य की बात यह है कि जिस तारीख यानि 22 दिसंबर को इस केस की विवेचना फिरोजाबाद स्‍थानांतरित किये जाने के आदेश तत्‍कालीन डीजीपी उत्‍तर प्रदेश आनंद लाल बनर्जी के हस्‍ताक्षर से हुए हैं, उस तारीख में आनंद लाल बनर्जी गंभीर अस्‍वस्‍थ्‍य बताये गये और उपचार के लिए हॉस्‍पीटल में एडमिट थे। ऐसे में उनके द्वारा विवेचना स्‍थानांतरित करना किसी बड़े षड्यंत्र की ओर इशारा करता है।
जाहिर है कि इस मामले में मथुरा की एसएसपी से लेकर तत्‍कालीन डीजीपी आनंद लाल बनर्जी की भूमिका से सूबे के पुलिस महकमे की छवि काफी धूमिल हुई है और आमजन के बीच इस आशय का संदेश भी गया है कि हाईप्रोफाइल मामलों में पुलिस की भूमिका कुछ और रहती है जबकि जनसमान्‍य के लिए कुछ और। कमलकांत उपमन्‍यु जैसे शासन व प्रशासन के लाइजनर्स, नियम-कानून तथा आदेश-निर्देशों की धज्‍जियां उड़ाकर किस तरह समूची व्‍यवस्‍था का मजाक उड़ाते प्रतीत होते हैं और आम आदमी छोटे से छोटे मामलों में प्रताड़ित किया जाता है।
बार एसोसिएशन ने डीजीपी को लिखे पत्र में इस आशय की चेतावनी भी दी है कि यदि समय रहते इस मामले में आरोपी की गिरफ्तारी नहीं की जाती और विवेचना को निष्‍पक्ष तरीके से निस्‍तारित करने में बाधा उत्‍पन्‍न की जाती है तो शीघ्र ही अधिवक्‍तागण इसे उच्‍च न्‍यायालय तक ले जाने को बाध्‍य होंगे क्‍योंकि इस तरह आरोपी के भाई की एप्‍लीकेशन पर संगीन अपराध की विवेचना गैर जनपद स्‍थानांतरित की जा सकती है तो यह अधिकार सभी मामलों में आरोपी अथवा उसके परिजनों को दिया जाना चाहिए ताकि कानून सबके लिए समान होने की बात केवल सुनाई न दे, बल्‍कि दिखाई भी दे।
-लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष      

शुक्रवार, 12 दिसंबर 2014

उपमन्‍यु केस: पुलिस को कराने पड़े 164 के बयान

मथुरा। 
ऐसा लगता है कि एमबीए की छात्रा का यौन शोषण करने के आरोपी पत्रकार कमलकांत उपमन्‍यु के तथाकथित शुभचिंतक या तो बेहद मूर्ख हैं या फिर इतने अधिक चालाक कि वह उसके शुभचिंतक बनकर ही उसे पूरी तरह बर्बाद कर देना चाहते हैं ताकि फिर वह कभी पनप ही न सके।
उपमन्‍यु के इन शुभचिंतकों ने पहले तो जैसे ही यह भनक लगी कि पीड़ित लड़की पुलिस में जाने की तैयारी कर रही है, उसके परिजनों पर पेशबंदी में एफआईआर दर्ज कराने की सलाह दे डाली। फिर यह एफआईआर उपमन्‍यु के अपने ही चेलों से करवा दी ताकि जवाबदेही भी उसी की रहे।
हद तो तब हो गई जब उन्‍हीं शुभचिंतकों ने यह प्रचार भी कर दिया कि एफआईआर उपमन्‍यु को बचाने के लिए कराई गई है और इसीलिए एफआईआर के लिए दी गई तहरीर में उपमन्‍यु के खिलाफ साजिश रचे जाने का जिक्र भी कर दिया।
इन्‍हीं शुभचिंतकों ने एक अखबार की खबर में उपमन्‍यु के खिलाफ लिखे गये मुकद्दमे को क्रॉस केस घोषित करके रही-सही कसर पूरी कर दी ताकि वह आगे भी किसी से यह तक कह न सके कि पीड़िता के परिजनों पर मुकद्दमा कायम कराने में उसका कोई हाथ नहीं था।
अब खबर आई है कि उपमन्‍यु के पक्ष में उनके शुभचिंतकों ने करीब 3 सैकड़ा शपथपत्र इस आशय के एसएसपी को दिलवाये हैं कि उसे फंसाया गया है और वह तो बहुत इन्‍नोसेंट व्‍यक्‍ति है। इन शपथ पत्रों में एक शपथ पत्र पीड़िता के परिवार से ताल्‍लुक रखने वाली उस महिला का भी है जो पहले वीडियो कैमरे के सामने उपमन्‍यु पर बेहद घृणित आरोप लगा चुकी है। अब उसके शपथ पत्र की कितनी अहमियत होगी, इसका अंदाज उपमन्‍यु के शुभचिंतकों को छोड़कर कोई भी व्‍यक्‍ति लगा सकता है।
शपथपत्र दिलवाने वाले अक्‍ल के इन दुश्‍मनों ने इतना भी नहीं सोचा कि इस तरह तो वह लड़की व उसके परिजनों द्वारा कही जा रही उन बातों को तस्‍दीक ही कर रहे हैं कि कमलकांत उपमन्‍यु बेहद पॉवरफुल व्‍यक्‍ति है और वह कुछ भी करवा सकता है।
घोर आश्‍चर्य की बात है कि उपमन्‍यु के इन शुभचिंतकों में वकील भी हैं और पत्रकार भी, उद्योगपति भी हैं और टेक्‍नीकल एजुकेशन हब के मालिकान भी। वह खुद भी अपने आप को पत्रकार के साथ-साथ वकील लिखने लगा है।
घोर बुद्धिमानों की फौज और उसके मुखिया कमलकांत उपमन्‍यु ने 300 शपथपत्र एसएसपी को दिलवाने से पहले यह तो विचार किया होता कि इसी तरह यदि कोई दुराचार के आरोप से बच सकता तो तथाकथित संत आसाराम बापू भी आज जेल की सलाखों के पीछे नहीं होता।
आसाराम बापू तो अपने पक्ष में तीन लाख शपथपत्र दिलवा सकता था और जरूरत पड़ती तो यह संख्‍या 30 लाख भी हो सकती थी।
अक्‍ल के दुश्‍मन इन शुभचिंतकों को क्‍या यह नहीं मालूम कि इस तरह के चरित्र प्रमाण पत्रों को कोर्ट भी कोई मान्‍यता नहीं देतीं और इनका यही मैसेज जाता है कि आरोपी वाकई बहुत ताकतवर तथा धूर्त है।
एक ऐसे ही दूसरे तथाकथित संत रामपाल को अपनी निजी फौज और अनुयायी खड़े करके कानून से बड़ा साबित करना कितना मंहगा साबित हुआ, क्‍या यह भी उपमन्‍यु के शुभचिंतक भूल गये।
उपमन्‍यु की आस्‍तीन के सांपों को क्‍या वाकई यह नहीं मालूम कि उनका हर ऐसा कदम उपमन्‍यु के लिए नई मुसीबत बन रहा है क्‍योंकि इससे पीड़िता के आरोपों की पुष्‍टि होती जा रही है।
जहां तक सवाल एसएसपी मंजिल सैनी का अब तक उपमन्‍यु के पक्ष में खड़ी दिखाई देने का है तो वह भी उपमन्‍यु तथा स्‍वयं उनके अपने लिए परेशानी का सबब साबित होगा क्‍योंकि कोर्ट में केस जाने के बाद बहुत से प्रश्‍नों का जवाब उन्‍हें भी देना पड़ सकता है।
बताया जाता है कि बलात्‍कार जैसे गंभीर मामले में एसएसपी की उपमन्‍यु के प्रति अतिरिक्‍त सहानुभूति का इल्‍म शासन को भी हो चुका है और इसीलिए वह आज कोर्ट में 164 के तहत पीड़िता के बयान दर्ज कराने पर बाध्‍य हुई हैं अन्‍यथा कल तक तो वह दो-तीन दिन बाद बयान कराने की जिद पर अड़ी हुई थीं।
शासन के सूत्रों से प्राप्‍त जानकारी के अनुसार कल जैसे ही खबरों तथा अन्‍य माध्‍यमों से सेक्रेट्री होम तथा डीजीपी को सारे घटनाक्रम का पता लगा वैसे ही उन्‍होंने जवाब तलब कर जल्‍द से जल्‍द बयान कराने और उसके बाद गिरफ्तारी सुनिश्‍चित करने को कहा जिससे पीड़िता या उसके परिवार पर दबाव बनाने का रास्‍ता बंद हो।
उल्‍लेखनीय है कि कल जब पीड़िता 161 के तहत अपने बयान दर्ज कराने एसएसपी ऑफिस पहुंची थी तो उसने एसएसपी से अपनी जान को खतरा बताते हुए सुरक्षा की मांग की थी, हालांकि एसएसपी ने उसके बाद भी उसे मात्र एक महिला सिपाही के साथ मेडीकल कराने जिला अस्‍पताल भेज दिया और कोर्ट में भी उसकी सुरक्षा का कोई इंतजाम नहीं किया।
बहरहाल, अब देखना यह है कि 161 के बयान, मेडीकल तथा अब 164 के बयान भी पूरे हो जाने के बाद एसएसपी मंजिल सैनी का अगला कदम क्‍या होता है... और क्‍या वह अब भी यही कहती रहेंगी कि जांच पूरी होने दीजिए, अगर उपमन्‍यु के खिलाफ लगाये गये आरोपों की पुष्‍टि होती है तो कार्यवाही जरूर होगी।
-लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष
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