रविवार, 12 जुलाई 2026

देश के सबसे बड़े 'ठग' का नाम है मुकेश अंबानी, Jio Fiber के जरिए हर दिन करते हैं करोड़ों की ठगी


 सामान्यत: किसी को भी यह जानकर झटका लग सकता है कि एशिया ही नहीं,  दुनियाभर के प्रमुख उद्योगपतियों में शुमार रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (RIL) के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक मुकेश अंबानी देश के सबसे बड़े 'ठग' भी हैं क्योंकि वो Jio Fiber के जरिए हर दिन अपने उपभोक्ताओं से करोड़ों रुपए की 'ठगी' करते हैं। 

यूं तो किसी भी आम व्यक्ति के साथ ठगी का ये खेल उसी दिन शुरू हो जाता है जिस दिन वह Jio Fiber का कनेक्शन लेने की प्रक्रिया शुरू करता है, किंतु उसे असली ठगी का अहसास तब होता है जब वो कुछ महीने अथवा कुछ सालों तक Jio Fiber का इस्तेमाल करता है। 
सबसे पहले 5G की स्‍पीड के नाम पर ठगी 
आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि आम आदमी को Jio Fiber उसी दिन से ठगना प्रारंभ कर देता है जब वो कनेक्शन प्रोवाइड कराने की प्रक्रिया के तहत यह बताता है उसके इंटरनेट की स्‍पीड 5G है और वो अधिकतम 1 Gbps (1000 Mbps) तक की तथा न्यूनतम 30 Mbps (मेगाबाइट प्रति सेकंड) की स्पीड प्रदान करता है जबकि यह सबसे बड़ा झूठ है। न तो वह किसी भी उपभोक्ता को अपनी अधिकतम स्पीड उपलब्ध करा पाता है और न न्यूनतम। 
कनेक्शन लेने के बाद जब Jio से इसकी शिकायत की जाती है तो वह अनेक ऐसी तकनीकी खामियां गिना देता है जो शायद ही कोई उपभोक्ता कभी पूरी कर सके, हालांकि कनेक्शन लगाने तक पूरी स्पीड देने का 'दावा' किया जाता है। 
उदाहरण के लिए स्‍पीड कम आने की शिकायत पर Jio के 'कर्मचारी या एजेंट' आपको बताएंगे कि दीवारों, उपकरणों और दूरी अधिक होने के कारण स्पीड थोड़ी कम हो सकती है। नेटवर्क जाम है, राउटर गलत जगह रखा है, अथवा आपके बहुत सारे डिवाइस एक ही राउटर से कनेक्ट हैं। ये सब बातें उपभोक्ता को कनेक्शन लेते समय नहीं बताई जातीं। यहां तक कि ये भी नहीं बताया जाता कि तकनीकी तौर पर आप सर्वाधिक बेहतर स्‍पीड किस तरह पा सकते हैं, या राउटर इंस्टॉल करने की सबसे उपयुक्त जगह कौन सी होगी। 
एक और बहाना: आपके डिवाइस 5G को सपोर्ट नहीं कर रहे 
कनेक्शन लेने के बाद जब उपभोक्ता स्‍पीड पूरी न मिलने की शिकायत करता है तब उसे बताया जाता है कि आपके डिवाइस 5G को सपोर्ट नहीं कर रहे। ऐसी स्‍थिति में आप या तो लाखों रुपए खर्च करके 5G को सपोर्ट करने वाले सभी डिवाइस खरीदें या फिर  50 और 100 Mbps की स्‍पीड वाले प्लान पर पैसा खर्च करने के बावजूद 'मिनीमम स्‍पीड' 30 Mbps पाकर खुश रहें। 
स्‍पीड के इस खेल से बचने वाला सारा पैसा रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड की जेब में जाता है, जिसका आपको कोई मुआवजा नहीं मिलने वाला। यदि आप इस सबसे आजिज आकर अपना प्लान बदलवाना चाहते हैं तो जो पैसा आप पहले दे चुके हैं, उसका हिसाब नहीं होगा। आप कोशिश कर-करके थक जाएंगे लेकिन रिलायंस उसका हिसाब अपने हिसाब से करेगा। 
स्‍पीड कम मिलने से एक ओर जहां आप उस गति से काम नहीं कर पाएंगे जिस गति से से काम की अपेक्षा में आपने हाई स्‍पीड नेट कनेक्शन लिया है, तो दूसरी ओर आपको अपना काम पूरा करने में समय भी अधिक जाया करना होगा जिससे रिलांयस को कोई मतलब नहीं। 
जियो एक्सटेंडर या जियो वाई-फाई मेश एक्सटेंडर लगवाने की सलाह 
स्‍पीड कम मिलने की शिकायत करने पर जियो के एजेंट आपको जियो एक्सटेंडर  या जियो वाई-फाई मेश एक्सटेंडर लगवाने की सलाह देते हैं जो अलग-अलग मॉडल और तकनीक के अनुसार ढाई हजार रुपए से लेकर 25 हजार रुपए तक आते हैं। 
यहां यह जान लेना भी जरूरी है कि सामान्य मध्‍यम वर्गीय व्‍यक्ति ऐसा कर पाने में सक्षम नहीं होता, लिहाजा इस पूरे तमाशे से बचने वाला डेटा भी रिलांयस कंपनी के खाते में जाता है और इस तरह कंपनी प्रति कनेक्शन, प्रति दिन एक बड़ी रकम हजम कर जाती है। 
Jio Fiber के देशभर में कुल कितने वाई-फाई कनेक्शन हैं? 
Reliance Jio Annual Report में दी गई जानकारी के मुताबिक देश में Jio Fiber के फिक्स्ड ब्रॉडबैंड (जियो फाइबर और जियो एयर फाइबर) के कुल 2.71 करोड़ उपभोक्ता हैं। इस तरह यदि रिलायंस कम स्‍पीड, आफ्टर सेल सर्विस तथा कस्‍टम केयर में धोखाधड़ी करके एक उपभोक्ता से हर महीने 100 रुपए भी ठगता है तो यह रकम प्रति माह 270 करोड़ रुपये से अधिक जाकर बैठती है। 
विचार कीजिए कि करोड़ों उपभोक्‍ताओं की मजबूरी का लाभ उठाकर मुकेश अंबानी की रिलायंस हर महीने 270 करोड़ रुपए तो सिर्फ ठगी करके कमा रही है। ये वो रकम है जिसमें कारोबार से होने वाला लाभ नहीं जुड़ा है। 
कस्टमर केयर और टोल फ्री नंबरों पर शिकायत का 'स्‍याह सच' 
जहां तक सवाल मामूली से मामूली शिकायत करने का है तो उसके लिए प्रक्रिया इतनी जटिल बना रखी है कि उपभोक्ता अपना माथा पीटने लगता है। जिला स्तर पर सुनवाई का कोई प्रावधान नहीं है। जो कुछ है वो एप के माध्यम से या फिर टोल फ्री नंबरों के  जरिए संभव है। इन दोनों माध्यमों से शिकायत करने वाला ही जान सकता है कि इस सब में अच्‍छा-खासा समय खर्च हो जाने तथा निरर्थक सवाल पूछे जाने के बावजूद नतीजा कुछ नहीं निकलता। थक-हारकर उपभोक्ता के पास सिर्फ एक चारा बचता है कि वह कंपनी के कर्मचारी का इंतजार करे। यह इंतजार 24 घंटों से लेकर एक सप्ताह तक भी हो सकता है क्योंकि आपने रिलायंस के Jio का कनेक्शन लेने की भारी भूल कर दी है। और हां, इस दौरान जो डेटा आप इस्तेमाल नहीं कर सके हैं, वो भी रिलायंस की संपत्ति में इजाफा करने के काम आएगा। 
बिलिंग साइकिल में हेराफेरी 
बिलिंग साइकिल में हेराफेरी करके भी रिलायंस की Jio Fiber करोड़ों रुपए हर महीने उपभोक्ताओं की जेब से निकाल लेती है। जैसे यदि आपका बिल प्लान हर महीने की 28 तारीख तक का है, तो अगले महीने इसे 27 या 26 कर दिया जाएगा। इस तरह सालभर में एक-एक, दो-दो दिन कम करते हुए करीब पूरा एक महीने का बिल अधिक वसूल कर लिया जाएगा, जिसका आपको अहसास तक नहीं होगा क्‍योंकि अधिकांश लोग बिल की आखिरी तारीख देखकर रीचार्ज करा लेते हैं। वह यह देखते ही नहीं कि पिछले महीने यही बिल जमा कराने की अंतिम तिथि एक दिन पहले थी। 
सालभर में किसी एक उपभोक्ता की जेब से पूरे एक महीने का पैसा ठग लेने का मतलब पूरे साल में करीब पौने तीन करोड़ उपभोक्ताओं की जेब काट कर कितना पैसा हड़प जाना होता है, इसका हिसाब आप अलग से लगाते रहिए। 
हां, अब आप बड़ी आसानी से यह अनुमान लगा सकते हैं वैश्विक रईसों की सूची में कैसे हर बार रिलायंस और उसके मालिक 'मुकेश धीरूभाई अंबानी' का नाम ऊपर चढ़ता जाता है और कैसे वह अपने बेटे की शादी का जश्न लगातार कई महीनों चलाते हुए उस पर अरबों रुपए खर्च कर देते हैं। 
Jio Fiber के कारनामे यहीं समाप्त नहीं हो जाते। सोशल मीडिया, डिजिटल मीडिया और शिकायती प्लेटफार्म उसकी 'ठगी' के किस्सों से भरे पड़े हैं परंतु फिलहाल स्‍थिति यह है कि न कोई सुनने वाला और न बताने वाला कि ठगी के इस नायाब तरीके से निपटा कैसे जाए। 
दरअसल, बड़ा सवाल यह भी है कि आज जबकि इंटरनेट 'मूलभूत आवश्यकता' बन चुका है और उसे पूरा करने वाले बाजार में बहुत कम हैं तो उपभोक्ता करे क्या? 
वह अर्थशास्‍त्र के उस सिद्धांत से बंधा है जो मांग और पूर्ति पर चलता है। मुकेश अंबानी जान चुके हैं कि जब तक बाजार में मांग अधिक है और उसकी पूर्ति करने वाले कम हैं, तब तक वह खुले हाथों से कितनी ही लूट करते रहें... लोग शिकायत भले ही कर लें... बिगाड़ कुछ नहीं सकते। 
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी   

बुधवार, 8 जुलाई 2026

MVDA के अफसर का दुस्साहस: भाजपा पार्षद के सील गेस्ट हाउस में कमरा लेने के लिए बनाया दबाव, पार्षद ने की शिकायत


 मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण (MVDA) के अफसरों का दुस्‍साहस किस कदर बढ़ चुका है, इसका एक उदाहरण आज तब फिर देखने को मिला जब नगर निगम मथुरा-वृंदावन के भाजपा पार्षद राधाकृष्‍ण पाठक को इसे लेकर बाकायदा उपाध्यक्ष विकास प्राधिकरण को लिखित शिकायत देनी पड़ी। 

गौरतलब है कि गत दिनों लखनऊ में हुए भीषण अग्निकांड के बाद प्रदेशभर में एक अभियान चलाकर ऐसे होटल, गेस्ट हाउस आदि को सील करने की कार्रवाई की गई जो संचालन के लिए जरूरी नियमों पर खरे नहीं उतरते थे। 
वृंदावन में भी ऐसे कई होटल तथा गेस्ट हाउस सील किए गए जिनमें से एक वृंदावन के रुक्मणि विहार सेक्‍टर-2 स्‍थित वृंदावन बालाजी सेवा सदन भी शामिल था। यह गेस्ट हाउस वार्ड 67 से निगम के पार्षद राधाकृष्‍ण पाठक का है। 
पार्षद और गेस्ट हाउस के मालिक राधाकृष्ण पाठक द्वारा की गई शिकायत के अनुसार उनके उक्त सील गेस्ट हाउस पर 28 जून की सुबह 7 बजे MVDA के सहायक अभियंता सुमित मौर्य अपनी सरकारी गाड़ी तथा चालक के साथ जा धमके और वहां मौजूद प्रबंधक अमर सिंह को जगाकर कमरा देने के लिए कहा। 
प्रबंधक द्वारा यह कहे जाने पर कि गेस्‍ट हाउस तो प्राधिकरण ने ही सील कर रखा है तो फिर में कमरा कैसे खोल सकता हूं, सहायक अभियंता सुमित मौर्य बोले कि मैं तुम्हें 2 हजार रुपए दूंगा। कमरा तुम दे दो। रही बात सील लगने की तो वह सब मैं देख लूंगा, उसकी चिंता तुम मत करो। 
पार्षद राधाकृष्‍ण पाठक ने अपने शिकायती पत्र के साथ गेस्‍ट हाउस के सीसीटीवी फुटेज भी पेश किए हैं जिसमें सहायक अभियंता अपने चालक के साथ मौजूद दिखाई दे रहे हैं। 
इस संबंध में विकास प्राधिकरण के सचिव आशीष कुमार सिंह से जानकारी मांगी गई तो उन्होंने भाजपा पार्षद द्वारा दिए गए शिकायती पत्र की पुष्‍टि की, किंतु कार्रवाई के बारे में पूछे जाने पर कहा कि जांच उपरांत कार्रवाई की जाएगी। 
दूसरी ओर सहायक अभियंता सुमित मौर्य ने भी भाजपा पार्षद के गेस्ट हाउस पर जाना तो स्वीकार किया किंतु कहा कि हम जांच-पड़ताल के लिए गए थे। 
ऐसे में एक सामान्य सा सवाल यह खड़ा होता है कि मौर्य साहब सुबह 7 बजे किस तरह की जांच-पड़ताल को गए थे, और यदि गए थे तो फिर उसकी कोई जानकारी अपने उच्च अधिकारियों को क्यों नहीं दी। 
बहरहाल, बताया जाता है कि मामला एक सत्ताधारी दल के पार्षद से जुड़ा होने के कारण उन्हें खुश करने के लिए प्राधिकरण ने ये किया कि तत्काल प्रभाव से उनके गेस्ट हाउस की सील खोल दी जिससे पार्षद राधाकृष्‍ण इस मामले को ज्यादा तूल न दें। 
सील खोले जाने की भी पुष्टि विकास प्राघिकरण के सचिव आशीष कुमार सिंह ने की है परंतु उनके अनुसार सील इसलिए खोली गई कि उन्‍होंने इस संबंध में दाखिल जवाब से प्राधिकरण को संतुष्ट कर दिया था। प्राधिकरण ने सील किए गए सभी होटल और गेस्ट हाउस मालिकों को इसके लिए 15 दिन का समय दिया था। 
सचिव विकास प्राधिकरण जो भी कहें किंतु इतना तो सिद्ध होता ही है कि सहायक अभियंता सुबह 7 बजे किसी नेक नीयत से नहीं गए थे। बल्कि उनका मकसद चिर-परिचित हथकंडों को अपना कर वही सब कार्य करना रहा होगा जिसके लिए समूचा मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण बदनाम है और जिसकी गूंज इन दिनों सीएम कार्यालय के साथ-साथ उच्च न्यायालय तक में सुनाई दे रही है। 
-Legend News 

शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

जल्द जेल जा सकते हैं MVDA, मथुरा-वृंदावन नगर निगम और तीर्थ विकास परिषद के कुछ बड़े भ्रष्ट अधिकारी


 कहते हैं ईश्वर की लीला कोई नहीं जानता। वह कब और किस उद्देश्य की पूर्ति के लिए कौन सी लीला रच दे, पता ही नहीं लगता। शायद इसीलिए वह ईश्वर है। सर्वशक्तिमान है। 

अब देखिए। कौन जानता था कि मथुरा से करीब 550 किलोमीटर दूर अयोध्‍या में विराजे रामलला, चढ़ावा चोरी को माध्यम बनाकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भ्रष्टाचारियों की ओर भी ध्यान देने पर बाध्य कर देंगे। 
बेशक खुद सीएम योगी की ईमानदारी पर कोई उंगली नहीं उठाई जा सकती और उनकी अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठा एक उदाहरण है। परंतु इसमें भी कोई दो राय नहीं कि भ्रष्टाचार को लेकर उनकी 'जीरो टॉलरेंस' की नीति एक मजाक बनकर रह गई है। 
जो हुआ सो हुआ, लेकिन आगे ऐसा नहीं हो सकेगा इसकी उम्मीद काफी बढ़ गई है। यही नहीं, अब तक अपनी काली कमाई में ज्यामितीय विधि से यानि दो के चार, चार के आठ और आठ के सोलह करने वाले अधिकारी बहुत जल्द जेल जा सकते हैं क्योंकि 'बाबा' ने हर जिले की 'काली भेड़ों' का पूरा चिट्ठा मंगवाना शुरू कर दिया है। उनकी हर गतिविधि पर पैनी नजर रखी जा रही है। जाहिर है कि अब तक ऐसा नहीं था। 
अगर बात करें भगवान विष्‍णु के आठवें अवतार श्रीकृष्‍ण की पावन जन्मस्थली मथुरा की, तो यहां एक लंबे समय से भ्रष्ट अधिकारियों की तूती बोल रही है। दूसरे शब्‍दों में कहें तो यह विश्व प्रसिद्ध धार्मिक नगरी, भ्रष्ट अधिकारियों के लिए दुधारू गाय बनी हुई है। 
यही कारण है कि कई अधिकारियों ने तो अपनी नौकरी का अधिकांश कार्यकाल यहीं बिता दिया है, उनका पदनाम बदलने के बाद भी वह घूम फिरकर यहीं अपने पोस्टिंग करा लेते हैं। आश्चर्य की बात यह है कि ऐसे अधिकारियों की संख्‍या अच्छी खासी है। 
फिलहाल सबसे अधिक चर्चा जिन विभागों की है, उनमें मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण (MVDA), मथुरा-वृंदावन नगर निगम और ब्रज तीर्थ विकास परिषद का नाम सबसे ऊपर है। हालांकि पुलिस भी इससे अछूती नहीं है। 
पहले बात मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण अर्थात MVDA की 
शासन से जुड़े सूत्रों के जरिए मिली ठोस जानकारी के अनुसार वृंदावन के डालमिया बाग प्रकरण में MVDA की भूमिका को उस समय बहुत गंभीरता से न लेने वाले सूबे के मुखिया योगी आदित्यनाथ ने अब न सिर्फ उसकी पूरी जानकारी नए सिरे से जुटानी शुरू कर दी है बल्कि वृंदावन की ही सन सिटी अनंतम, मथुरा की मन्नत रेजीडेंसी सहित द्वारिकादास जीवराजका मैमोरियल ट्रस्ट तथा हरिनिवास खेतान मैमोरियल ट्रस्ट आदि का ब्यौरा संकलित कर लिया है। 
इनमें से सन सिटी अनंतम तथा मन्नत रेजीडेंसी का मामला तो हाई कोर्ट तथा सुप्रीम कोर्ट, और यहां तक कि एनजीटी में भी विचाराधीन है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट के आदेश से ही डालमिया बाग में प्रस्तावित हाउसिंग प्रोजेक्ट को झटका लग चुका है, अन्यथा MVDA ने तो माफिया के लिए मुकम्मल व्यवस्था कर ही दी थी। 
इतना सब हो जाने के बावजूद चूंकि MVDA के किसी अधिकारी से कोई पूछताछ तक नहीं हुई, लिहाजा एक ओर जहां भ्रष्ट अधिकारी हर मामले में मनमानी करते रहे वहीं दूसरी ओर 'लैंड एक्सचेंज' की आड़ में माफिया के लिए बेशकीमती सरकारी जमीन देने का प्रस्ताव बार-बार 'बड़ी बेशर्मी' से लाते रहे। जब मीडिया ने इस खेल का खुलासा किया तो आपस में चिट्ठी-चिट्ठी खेलना शुरू कर दिया जिससे सबकी आंखों में धूल झोंकी जा सके। 
MVDA की निर्लज्जता का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि वह RTI का जवाब देना जरूरी नहीं समझता। अधिकारियों का आलम यह है कि वह मीडिया के पूछने पर भी उसके प्रश्नों का जवाब नहीं देते। फोन उठाना अपनी शान के खिलाफ समझते हैं और वाट्सएप पर भेजे गए मैसेज भी 'पी' जाते हैं। 
नगर निगम भी पीछे नहीं 
सरकारी जमीन को अपनी निजी जागीर समझने वाले मथुरा-वृंदावन नगर निगम के अधिकारी हों या वहां चुने हुए नुमाइंदे, भ्रष्टाचार के मामले में MVDA से ज्यादा न सही... तो कम भी नहीं हैं। 
उनके दुस्साहस का एक उदाहरण तो निजी हाउसिंग प्रोजेक्ट 'मन्नत रेसीडेंसी' के प्रमोटरों द्वारा हड़पी गई निगम की जमीन है। जिसके खिलाफ इलाहाबाद हाई कोर्ट में जनहित याचिका लंबित है लेकिन नगर निगम कहता है कि उनका मन्नत रेसीडेंसी के मालिकों से कोई विवाद शेष नहीं है। उधर, नगर निगम के बयान को आधार बनाकर विकास प्राधिकरण मन्नत रेसीडेंसी के निर्माण पर लगी सील खोल देता है। 
कागजों में जो खसरा नंबर नगर निगम के नाम दर्ज हैं, उन खसरा नंबरों को अपना बताकर मन्नत रेसीडेंसी के मालिकान विकास प्राधिकरण में नक्शा पास कराने को प्रयासरत हैं, किंतु नगर निगम के अनुसार उनका कोई विवाद ही नहीं है। 
नगर निगम मथुरा-वृंदावन में व्याप्त भ्रष्टाचार का दूसरा बड़ा उदाहरण सन सिटी अनंतम से जुड़ा है, जो अब भी भारी चर्चा का विषय बना हुआ है। यह मामला हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट तथा एनजीटी तक में पेंडिंग है। नगर निगम लिखा-पढ़ी में यह स्वीकार कर चुका है उसकी बेशकीमती जमीन सनसिटी अनंतम के प्रमोटरों ने दबा रखी है और उस पर अवैध निर्माण भी कराया जा रहा है, किंतु न तो सरकारी जमीन को कब्जामुक्‍त कराया जा रहा है और न अवैध निर्माण पर लगाम लगाई जा रही है। कहा तो यहां तक जाता है कि नगर निगम की जमीन का बड़ा हिस्सा कॉलोनाइजर बेच कर खा गया है लेकिन नगर निगम आंखें मूंदे बैठा है। 
सनसिटी अनंतम और मन्नत रेजीडेंसी तो नजीर भर हैं। इसके अलावा नगर निगम की दूसरी अन्य जमीनों को कहीं स्कूल-कॉलेज संचालक हड़प कर बैठे हैं और कहीं जमीन के कारोबारी। इन सब पर अवैध कब्जे की अनेक शिकायतें नगर निगम में पेंडिंग हैं लेकिन नगर निगम को तो जैसे सांप सूंघ गया है। इसके पीछे क्या कारण हो सकता है, इसे हर कोई समझता है। 
शासन से जुड़े सूत्र बताते हैं कि अब सीएम योगी ने उनके कार्यकाल और उससे पहले के भी सारे ऐसे मामलों का संज्ञान लेने की व्यवस्था करने का मन बना लिया है और अपने स्तर से सबूत जुटाने शुरू कर दिए हैं। 
बताया जाता है कि सीएम योगी ने तेजी से इस पर काम करने की हिदायत दी है ताकि 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले ऐसा उदाहरण पेश किया जा सके कि भ्रष्टाचार पर उनकी जीरो टॉलरेंस की नीति केवल जुमला भर नहीं थी। 
उत्तर प्रदेश ब्रज तीर्थ विकास परिषद के कारनामों पर भी नजर 
उत्तर प्रदेश ब्रज तीर्थ विकास परिषद जिसके अध्यक्ष स्‍वयं मुख्यमंत्री हैं, उसके भी कारनामे काफी समय से चर्चा का विषय बने हुए हैं, इसलिए योगी जी ने अब उसका भी हिसाब मांगा है। ब्रज तीर्थ विकास परिषद और मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण की स्‍थिति यह है कि वह एक-दूसरे के नाक-कान हैं। मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण ही मथुरा में ब्रज तीर्थ विकास परिषद की कार्यदायी संस्‍था है, और उसके अधिकारियों को ब्रज तीर्थ विकास परिषद में अतिरिक्त कार्यभार मिला हुआ है। 
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि घोर भ्रष्टाचारी के टैग वाली एक संस्था, घोर ईमानदार अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के 'टैग' वाली संस्था के कार्य कराती है। पता नहीं ईमानदारी सिर्फ टैग है, या भ्रष्‍टाचारी टैग है। 
शासन के सूत्र बताते हैं कि अब योगी बाबा इन 'टैगधारी संस्थाओं' का सत्यापन अपने स्तर से कराने में जुट गए हैं क्योंकि राम मंदिर के चढ़ावे की चोरी करने वालों ने उनकी छवि को डेंट लगाने का जो प्रयास किया है, वह इसके बाद किसी को कोई और मौका नहीं देना चाहते। वह चाहते हैं कि जिस तरह यूपी में सामाजिक अपराधी भयभीत रहते हैं, उसी तरह 'आर्थिक अपराधी' भी भय खाएं और भ्रष्टाचार अपवाद भले ही न बने किंतु भ्रष्टाचारी इतने भयाक्रांत जरूर रहें कि भ्रष्‍टाचार को लेकर जीरो टॉलरेंस की नीति का उस तरह मजाक न बने जिस तरह आज बनी हुई है। 
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
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