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शुक्रवार, 3 जुलाई 2026
जल्द जेल जा सकते हैं MVDA, मथुरा-वृंदावन नगर निगम और तीर्थ विकास परिषद के कुछ बड़े भ्रष्ट अधिकारी
कहते हैं ईश्वर की लीला कोई नहीं जानता। वह कब और किस उद्देश्य की पूर्ति के लिए कौन सी लीला रच दे, पता ही नहीं लगता। शायद इसीलिए वह ईश्वर है। सर्वशक्तिमान है। अब देखिए। कौन जानता था कि मथुरा से करीब 550 किलोमीटर दूर अयोध्या में विराजे रामलला, चढ़ावा चोरी को माध्यम बनाकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भ्रष्टाचारियों की ओर भी ध्यान देने पर बाध्य कर देंगे।
बेशक खुद सीएम योगी की ईमानदारी पर कोई उंगली नहीं उठाई जा सकती और उनकी अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठा एक उदाहरण है। परंतु इसमें भी कोई दो राय नहीं कि भ्रष्टाचार को लेकर उनकी 'जीरो टॉलरेंस' की नीति एक मजाक बनकर रह गई है।
जो हुआ सो हुआ, लेकिन आगे ऐसा नहीं हो सकेगा इसकी उम्मीद काफी बढ़ गई है। यही नहीं, अब तक अपनी काली कमाई में ज्यामितीय विधि से यानि दो के चार, चार के आठ और आठ के सोलह करने वाले अधिकारी बहुत जल्द जेल जा सकते हैं क्योंकि 'बाबा' ने हर जिले की 'काली भेड़ों' का पूरा चिट्ठा मंगवाना शुरू कर दिया है। उनकी हर गतिविधि पर पैनी नजर रखी जा रही है। जाहिर है कि अब तक ऐसा नहीं था।
अगर बात करें भगवान विष्णु के आठवें अवतार श्रीकृष्ण की पावन जन्मस्थली मथुरा की, तो यहां एक लंबे समय से भ्रष्ट अधिकारियों की तूती बोल रही है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह विश्व प्रसिद्ध धार्मिक नगरी, भ्रष्ट अधिकारियों के लिए दुधारू गाय बनी हुई है।
यही कारण है कि कई अधिकारियों ने तो अपनी नौकरी का अधिकांश कार्यकाल यहीं बिता दिया है, उनका पदनाम बदलने के बाद भी वह घूम फिरकर यहीं अपने पोस्टिंग करा लेते हैं। आश्चर्य की बात यह है कि ऐसे अधिकारियों की संख्या अच्छी खासी है।
फिलहाल सबसे अधिक चर्चा जिन विभागों की है, उनमें मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण (MVDA), मथुरा-वृंदावन नगर निगम और ब्रज तीर्थ विकास परिषद का नाम सबसे ऊपर है। हालांकि पुलिस भी इससे अछूती नहीं है।
पहले बात मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण अर्थात MVDA की
शासन से जुड़े सूत्रों के जरिए मिली ठोस जानकारी के अनुसार वृंदावन के डालमिया बाग प्रकरण में MVDA की भूमिका को उस समय बहुत गंभीरता से न लेने वाले सूबे के मुखिया योगी आदित्यनाथ ने अब न सिर्फ उसकी पूरी जानकारी नए सिरे से जुटानी शुरू कर दी है बल्कि वृंदावन की ही सन सिटी अनंतम, मथुरा की मन्नत रेजीडेंसी सहित द्वारिकादास जीवराजका मैमोरियल ट्रस्ट तथा हरिनिवास खेतान मैमोरियल ट्रस्ट आदि का ब्यौरा संकलित कर लिया है।
इनमें से सन सिटी अनंतम तथा मन्नत रेजीडेंसी का मामला तो हाई कोर्ट तथा सुप्रीम कोर्ट, और यहां तक कि एनजीटी में भी विचाराधीन है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट के आदेश से ही डालमिया बाग में प्रस्तावित हाउसिंग प्रोजेक्ट को झटका लग चुका है, अन्यथा MVDA ने तो माफिया के लिए मुकम्मल व्यवस्था कर ही दी थी।
इतना सब हो जाने के बावजूद चूंकि MVDA के किसी अधिकारी से कोई पूछताछ तक नहीं हुई, लिहाजा एक ओर जहां भ्रष्ट अधिकारी हर मामले में मनमानी करते रहे वहीं दूसरी ओर 'लैंड एक्सचेंज' की आड़ में माफिया के लिए बेशकीमती सरकारी जमीन देने का प्रस्ताव बार-बार 'बड़ी बेशर्मी' से लाते रहे। जब मीडिया ने इस खेल का खुलासा किया तो आपस में चिट्ठी-चिट्ठी खेलना शुरू कर दिया जिससे सबकी आंखों में धूल झोंकी जा सके।
MVDA की निर्लज्जता का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि वह RTI का जवाब देना जरूरी नहीं समझता। अधिकारियों का आलम यह है कि वह मीडिया के पूछने पर भी उसके प्रश्नों का जवाब नहीं देते। फोन उठाना अपनी शान के खिलाफ समझते हैं और वाट्सएप पर भेजे गए मैसेज भी 'पी' जाते हैं।
नगर निगम भी पीछे नहीं
सरकारी जमीन को अपनी निजी जागीर समझने वाले मथुरा-वृंदावन नगर निगम के अधिकारी हों या वहां चुने हुए नुमाइंदे, भ्रष्टाचार के मामले में MVDA से ज्यादा न सही... तो कम भी नहीं हैं।
उनके दुस्साहस का एक उदाहरण तो निजी हाउसिंग प्रोजेक्ट 'मन्नत रेसीडेंसी' के प्रमोटरों द्वारा हड़पी गई निगम की जमीन है। जिसके खिलाफ इलाहाबाद हाई कोर्ट में जनहित याचिका लंबित है लेकिन नगर निगम कहता है कि उनका मन्नत रेसीडेंसी के मालिकों से कोई विवाद शेष नहीं है। उधर, नगर निगम के बयान को आधार बनाकर विकास प्राधिकरण मन्नत रेसीडेंसी के निर्माण पर लगी सील खोल देता है।
कागजों में जो खसरा नंबर नगर निगम के नाम दर्ज हैं, उन खसरा नंबरों को अपना बताकर मन्नत रेसीडेंसी के मालिकान विकास प्राधिकरण में नक्शा पास कराने को प्रयासरत हैं, किंतु नगर निगम के अनुसार उनका कोई विवाद ही नहीं है।
नगर निगम मथुरा-वृंदावन में व्याप्त भ्रष्टाचार का दूसरा बड़ा उदाहरण सन सिटी अनंतम से जुड़ा है, जो अब भी भारी चर्चा का विषय बना हुआ है। यह मामला हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट तथा एनजीटी तक में पेंडिंग है। नगर निगम लिखा-पढ़ी में यह स्वीकार कर चुका है उसकी बेशकीमती जमीन सनसिटी अनंतम के प्रमोटरों ने दबा रखी है और उस पर अवैध निर्माण भी कराया जा रहा है, किंतु न तो सरकारी जमीन को कब्जामुक्त कराया जा रहा है और न अवैध निर्माण पर लगाम लगाई जा रही है। कहा तो यहां तक जाता है कि नगर निगम की जमीन का बड़ा हिस्सा कॉलोनाइजर बेच कर खा गया है लेकिन नगर निगम आंखें मूंदे बैठा है।
सनसिटी अनंतम और मन्नत रेजीडेंसी तो नजीर भर हैं। इसके अलावा नगर निगम की दूसरी अन्य जमीनों को कहीं स्कूल-कॉलेज संचालक हड़प कर बैठे हैं और कहीं जमीन के कारोबारी। इन सब पर अवैध कब्जे की अनेक शिकायतें नगर निगम में पेंडिंग हैं लेकिन नगर निगम को तो जैसे सांप सूंघ गया है। इसके पीछे क्या कारण हो सकता है, इसे हर कोई समझता है।
शासन से जुड़े सूत्र बताते हैं कि अब सीएम योगी ने उनके कार्यकाल और उससे पहले के भी सारे ऐसे मामलों का संज्ञान लेने की व्यवस्था करने का मन बना लिया है और अपने स्तर से सबूत जुटाने शुरू कर दिए हैं।
बताया जाता है कि सीएम योगी ने तेजी से इस पर काम करने की हिदायत दी है ताकि 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले ऐसा उदाहरण पेश किया जा सके कि भ्रष्टाचार पर उनकी जीरो टॉलरेंस की नीति केवल जुमला भर नहीं थी।
उत्तर प्रदेश ब्रज तीर्थ विकास परिषद के कारनामों पर भी नजर
उत्तर प्रदेश ब्रज तीर्थ विकास परिषद जिसके अध्यक्ष स्वयं मुख्यमंत्री हैं, उसके भी कारनामे काफी समय से चर्चा का विषय बने हुए हैं, इसलिए योगी जी ने अब उसका भी हिसाब मांगा है। ब्रज तीर्थ विकास परिषद और मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण की स्थिति यह है कि वह एक-दूसरे के नाक-कान हैं। मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण ही मथुरा में ब्रज तीर्थ विकास परिषद की कार्यदायी संस्था है, और उसके अधिकारियों को ब्रज तीर्थ विकास परिषद में अतिरिक्त कार्यभार मिला हुआ है।
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि घोर भ्रष्टाचारी के टैग वाली एक संस्था, घोर ईमानदार अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के 'टैग' वाली संस्था के कार्य कराती है। पता नहीं ईमानदारी सिर्फ टैग है, या भ्रष्टाचारी टैग है।
शासन के सूत्र बताते हैं कि अब योगी बाबा इन 'टैगधारी संस्थाओं' का सत्यापन अपने स्तर से कराने में जुट गए हैं क्योंकि राम मंदिर के चढ़ावे की चोरी करने वालों ने उनकी छवि को डेंट लगाने का जो प्रयास किया है, वह इसके बाद किसी को कोई और मौका नहीं देना चाहते। वह चाहते हैं कि जिस तरह यूपी में सामाजिक अपराधी भयभीत रहते हैं, उसी तरह 'आर्थिक अपराधी' भी भय खाएं और भ्रष्टाचार अपवाद भले ही न बने किंतु भ्रष्टाचारी इतने भयाक्रांत जरूर रहें कि भ्रष्टाचार को लेकर जीरो टॉलरेंस की नीति का उस तरह मजाक न बने जिस तरह आज बनी हुई है।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
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