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शनिवार, 13 अप्रैल 2024

फिर एक बार सामने आई कुशल राजनीतिज्ञ श्रीकृष्‍ण के जन्मस्थान की राजनीतिक दरिद्रता

माना कि आगामी लोकसभा चुनाव पूरी तरह 'मोदी की गारंटी' पर लड़ा जाएगा और मैदान में मुखौटा चाहे कोई हो, पर पीएम मोदी ही हर उम्मीदवार का चेहरा होंगे। बावजूद इसके कुशल राजनीतिज्ञ भगवान श्रीकृष्‍ण के जन्मस्थान से हेमा मालिनी को तीसरी बार टिकट मिलना यहां की राजनीतिक दरिद्रता को पूरी तरह उजागर करता है। 
दरअसल, नटवर नागर कृष्‍ण को अपना इष्‍ट बताने वाली सिने अभिनेत्री हेमा मालिनी ने उनके जन्मस्थान का लोकसभा में प्रतिनिधत्व करते हुए पिछले 10 वर्षों में ऐसा कोई उल्लेखनीय काम यहां नहीं किया जिससे उनकी तीसरी बार चुनाव लड़ने की दावेदारी पुख्‍ता होती, किंतु दुर्भाग्य से नेताओं का इस धर्म नगरी में इतना अधिक अकाल है कि भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को कोई अन्य दिखाई ही नहीं दिया होगा। 
इस बात का थोड़ा अंदाजा तीन बार के सांसद रहे चौधरी तेजवीर सिंह को पार्टी द्वारा राज्यसभा भेजने से भी लगाया जा सकता है, अन्यथा तेजवीर सिंह तो भरी जवानी में कभी उतने सक्रिय नजर नहीं आए जितना भाजपा के किसी सांसद को होना चाहिए था। तेजवीर सिंह का कार्यकाल जिन्होंने देखा है, वह भलीभांति जानते होंगे कि चौधरी साहब किस मिट्टी के बने हैं।    
बहरहाल, इस विश्व विख्यात धार्मिक नगरी की ऐसी राजनीतिक दरिद्रता का एकमात्र कारण यही है कि यहां ऐसा कोई दमदार नेता है ही नहीं, जिसे लेकर पार्टी या जनता आश्वस्‍त हो सके। 
किसी बाहरी उम्मीदवार को तीसरी बार मथुरा से मौका मिलने पर भाजपा का एक बड़ा वर्ग निश्चित रूप से निराश होगा किंतु गौर करेंगे तो ये वर्ग काफी हद तक अपनी इस दशा या कहें कि दुर्दशा के लिए खुद भी जिम्मेदार है। 
RLD का NDA में आना भी एक बड़ा कारण 
इसमें कोई दो राय नहीं कि हेमा मालिनी को तीसरी बार मथुरा से चुनाव लड़ाने का साहस भाजपा शायद इसलिए भी कर सकी क्योंकि वह RLD को NDA का हिस्‍सा बनाने में सफल रही। यदि जयंत चौधरी NDA गठबंधन का हिस्‍सा न होते तो भाजपा को जरूर विचार करना पड़ता, लेकिन अब तो ऐसा लगता है कि जैसे हेमा मालिनी की किस्मत में ही एक तरह से 'निर्विरोध राजयोग' लिखा है। 
दूसरे दलों से भी कोई चुनौती नहीं 
हेमा मालिनी की किस्मत का सितारा किस कदर बुलंद है इसे यूं भी समझा जा सकता है कि उनकी अपनी पार्टी भाजपा के साथ-साथ विपक्षी दल में भी ऐसा कोई नेता नहीं है जो उन्‍हें टक्कर देने का माद्दा रखता हो।
अगर बात करें सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस की तो उसका अब यहां कोई धनी-धोरी ही नहीं रहा। कहने को वह एक राष्‍ट्रीय दल है, लेकिन मथुरा के पिछले चुनाव नतीजे बताते हैं कि अब वह यहां से चुनाव लड़ने की सिर्फ लकीर पीटती है। 
'इंडी' अलायंस के तहत समाजवादी पार्टी से सीटों के बंटवारे में यूं तो मथुरा की सीट कांग्रेस को मिली है परंतु यहां वोट बैंक के नाम पर समाजवादी का सूखा जग जाहिर है। कौन नहीं जानता कि समाजवादी पार्टी के तत्कालीन मुखिया मुलायम सिंह यादव अपने उस दौर तक में यदुवंशी कृष्‍ण की नगरी से कभी किसी एक उम्‍मीदवार को विधानसभा चुनाव नहीं जिता सके, जिस दौर में उनकी प्रदेशभर के अंदर तूती बोलती थी। 
वर्तमान सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ने भी मथुरा की मांट सीट से अपने मित्र और पार्टी के कद्दावर नेता संजय लाठर को दो बार चुनाव मैदान में उतारा किंतु उसे जीत नहीं दिला सके। अखिलेश के हाथ में कमान आज भी है परंतु मथुरा से सपा का सूखा खत्म नहीं हुआ। शायद इसलिए भी उन्‍होंने सीटों के बंटवारे में मथुरा की सीट कांग्रेस के मत्थे मढ़ने में अपनी भलाई समझी। 
शेष रह गई बहिनजी की बहुजन समाज पार्टी, तो उसका ग्राफ जब से नीचे आया है तब से ऊपर आने का नाम नहीं ले रहा। हालांकि पहले भी कभी बसपा का मथुरा से कोई सांसद तो नहीं रहा लेकिन विधायक कई रहे हैं। ये बात अलग है कि आज उसके पास मथुरा में न कोई विधायक है और न चुनाव में टक्कर देने लायक कोई नेता। 
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि हेमा मालिनी के लिए 2024 का लोकसभा चुनाव जितना आसान बन गया है, उतने आसान तो उनके लिए पहले दो चुनाव भी नहीं रहे। सतही तौर पर देखें तो किसी दल या नेता के लिए इससे बेहतर स्‍थिति कोई और नहीं हो सकती परंतु यही स्‍थिति न केवल भाजपा के लिए बल्‍कि मथुरा की जनता के लिए भी चिंता का विषय अवश्‍य कही जा सकती है। 
मथुरा का धार्मिक और राजनीतिक दृष्‍टि से एक विशिष्‍ट स्थान है। यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने से लेकर कृष्ण जन्मस्‍थान के लिए लड़ी जा रही लड़ाई तक में यहां के जनप्रतिधियों की भूमिका रेखांकित होती है, लेकिन हेमा मालिनी उसमें अब तक फिट नहीं बैठीं। इन प्रमुख मुद्दों के अलावा यह धार्मिक नगरी अपनी गरिमा के अनुरूप विकास का लंबे समय से इंतजार कर रही है। ऐसे में यहां के लोगों को पार्ट टाइम नहीं, फुल टाइम राजनेताओं की दरकार है। हेमा मालिनी ने पिछले दस वर्षों में यहां कितना विकास कराया है और कितना समय यहां की जनता को दिया है, इसका जिक्र करने की संभवत: अब जरूरत भी नहीं रह गई। जाहिर है तीसरा कार्यकाल कुछ अलग होने की कोई उम्मीद लगाना व्‍यर्थ होगा। 
अंत में यह कह सकते हैं कि नेताओं के लिए राजनीति, कर्म से कहीं अधिक भाग्य का ऐसा खेल है कि वो जब जोर मारता है तो सारे पांसे खुद-ब-खुद फिट बैठ जाते हैं। हेमा मालिनी के पांसे कुछ यही इशारा कर रहे हैं। 
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

शुक्रवार, 12 अप्रैल 2019

एक ही समस्‍या से जूझ रहे हैं मथुरा के तीनों प्रमुख प्रत्‍याशी, टेढ़ी खीर बना हुआ है समाधान

अलग-अलग पार्टियों और अलग-अलग जातियों से होने के बावजूद मथुरा के तीनों प्रमुख प्रत्‍याशी फिलहाल एक ही समस्‍या से जूझ रहे हैं। जो प्रत्‍याशी जितनी जल्‍दी इस समस्‍या का समाधान निकाल लेगा, मुख्‍य मुकाबले में उसी के शामिल होने की संभावना उतनी बढ़ जाएगी।
कृष्‍ण की नगरी से भाजपा ने जहां एकबार फिर निवर्तमान सांसद हेमा मालिनी पर दांव लगाया है वहीं सपा-बसपा और रालोद के गठबंधन ने कुंवर नरेन्‍द्र सिंह को बतौर रालोद प्रत्‍याशी मैदान में उतारा गया है। कांग्रेस ने पूर्व में लोकसभा का एक चुनाव लड़ चुके महेश पाठक को टिकट दिया है। इन तीन में से दो प्रत्‍याशियों हेमा मालिनी और कुंवर नरेन्‍द्र सिंह कल ही अपना नामांकन दाखिल कर चुके थे जबकि महेश पाठक ने आज नामांकन दाखिल किया है।
कहने को ये पांच दलों के तीन प्रत्‍याशी हैं किंतु इत्तेफाकन इन तीनों की समस्‍या एक ही है। जीत के लिए मतदाताओं के बीच जाने से पहले इन्‍हें इस समस्‍या का समाधान करना होगा अन्‍यथा सारा गुणा-भाग जाया हो सकता है।
सबसे पहले बात करते हैं भाजपा प्रत्‍याशी और नामचीन अभिनेत्री हेमा मालिनी की। हेमा मालिनी को जब 2014 के लोकसभा चुनावों में मथुरा से उम्‍मीदवार घोषित किया गया था तब भाजपा सत्ता से बाहर थी और हर भाजपायी की प्राथमिकता एक दशक से केंद्र की सत्ता पर काबिज कांग्रेस के नेतृत्‍व वाली यूपीए सरकार को हटाना था।
ऐसे में मथुरा की भाजपा इकाई ने थोड़ी-बहुत हील-हुज्‍जत के बाद हेमा मालिनी को तहेदिल से स्‍वीकार करते हुए उनके लोकसभा में पहुंचने का मार्ग प्रशस्‍त किया।
समस्‍याएं तब पैदा होने लगीं जब स्‍वप्‍न सुंदरी का खिताब प्राप्‍त रुपहले पर्दे की इस अभिनेत्री के दर्शन आमजनता के साथ-साथ पार्टीजनों के लिए भी दुर्लभ हो गए, और वह चंद लोगों की पहुंच तक सिमट गईं। ये खास लोग ही हेमा के आम और खास दोनों बन बैठे लिहाजा वह उन कार्यकताओं से दूर होती चली गईं जिन्‍होंने अपना खून-पसीना एक करके उन्‍हें संसद भिजवाया था।
इसके बाद खबर आई कि हेमा जी ने मथुरा के विकास हेतु ”ब्रजभूमि विकास ट्रस्‍ट” के नाम से स्‍थानीय रजिस्‍ट्रार कार्यालय में एक एनजीओ का रजिस्‍ट्रेशन कराया है। इस एनजीओ में हेमा मालिनी के अलावा उनके दिल्‍ली निवासी समधी, उनके सगे भाई, मथुरा के एक सीए तथा एक मुकुट वाला सहित आधा दर्जन लोगों के नाम जोड़े गए।
हेमा मालिनी के इस ”ब्रजभूमि विकास ट्रस्‍ट” ने मथुरा के विकास में कितनी और कैसी भूमिका अदा की इसका पता आजतक जनता को तो क्‍या, पार्टीजनों को भी शायद ही लगा हो।
यदि फोटोग्राफ्स पर भरोसा करें तो हेमा मालिनी की उपस्‍थिति मथुरा जनपद के खेत व खलिहानों से लेकर पगडंडियों तक पर और बाजार व गलियों से लेकर मंदिरों तक में खूब दिखाई देगी किंतु हकीकत यह है कि अपने पूरे पांच साल के कार्यकाल में उन्‍होंने यहां न तो कभी कोई जनता दरबार लगाया और न जनसमस्‍याओं की सुनवाई की। वो हमेशा अपना डेकोरम मेंटेन करके रहीं और विशिष्‍ट लोगों से मिलती रहीं।
यही कारण रहा कि इस बार फिर जब पार्टी ने उनका नाम लोकसभा प्रत्‍याशी के तौर पर घोषित किया तो मथुरा की जनता सहित भाजपा कार्यकर्ताओं में भी कोई उत्‍साह नजर नहीं आया।
ऐसा नहीं है कि हेमा मालिनी को इस बात का इल्‍म नहीं था। उन्‍हें अच्‍छी तरह भान था कि स्‍वप्‍नसुंदरी से मेल खाती उनकी बॉलीवुडिया कार्यशैली ब्रजवासियों को रास नहीं आई है इसलिए उन्‍होंने पिछले चुनाव की तुलना में नरम रुख अपनाते हुए यह कहना शुरू किया कि वह एक चांस लेकर अपने अधूरे काम पूरे करना चाहती हैं।
इस सबके बावजूद पार्टी के अंदर ही हेमा जी की खिलाफत का आलम यह था कि टिकट घोषित होने के बाद बुलाई गई पार्टी की पहली मीटिंग में एक पूर्व जिलाध्‍यक्ष और वर्तमान जिलाध्‍यक्ष के बीच तीखी तकरार हुई।
बताया जाता है कि इस अंदरूनी कलह को समाप्‍त कराने के लिए ही हेमा मालिनी के नामांकन वाले दिन प्रदेश के मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ को मथुरा भेजा गया। योगी आदित्‍यनाथ इस मकसद में कितने सफल हुए, इसकी पूरी जानकारी तो चुनाव के नतीजे ही देंगे किंतु यह अंदाज जरूर लग चुका है कि हेमा मालिनी के लिए जीत की डगर इस बार पहले जितनी आसान नहीं रहेगी।
हेमा मालिनी के बाद नंबर आता है गठबंधन के प्रत्‍याशी ठाकुर कुंवर नरेन्‍द्र सिंह का। कुंवर नरेन्‍द्र सिंह राजनीति में कभी अपनी वैसी छवि नहीं बना पाए जैसी उनके भाई पूर्व सांसद कुंवर मानवेन्‍द्र सिंह ने बनाई।
संभवत: इसी कारण कुंवर मानवेन्‍द्र सिंह को मथुरा की जनता ने तीन बार लोकसभा भेजा लेकिन कुंवर नरेन्‍द्र सिंह तीनों बार विधानसभा का मुंह भी नहीं देख पाए। आज भी लोग यह कहते सुने जा सकते हैं कि काश यह टिकट कुंवर मानवेन्‍द्र सिंह को मिला होता।
बहरहाल, व्‍यक्‍तिगत छवि की बात न भी करें तो कुंवर नरेन्‍द्र सिंह को टिकट देकर रालोद ने मथुरा के उन सभी जाट नेताओं को नाराज कर दिया है जो वर्षों से पार्टी को पुनर्जीवित करने की कोशिश में लगे थे। अनिल चौधरी तो इसलिए पार्टी ही छोड़कर चले गए।
बताया जाता है कि जिन जाट मतदाताओं के बल पर आजतक चौधरी अजीत सिंह और उनकी पार्टी का वजूद कायम रहा है, वही जाट इस मर्तबा चौधरी साहब को सबक सिखाने का मन बना चुके हैं। किसी भी कद्दावर जाट नेता का कुंवर नरेन्‍द्र सिंह के साथ खड़े दिखाई न देना इस बात की पुष्‍टि करता है।
कुंवर नरेन्‍द्र सिंह के लिए ठाकुर वोट पाना भी टेढ़ी खीर होगा क्‍योंकि रालोद ने ठाकुर तेजपाल की नाराजगी मोल लेकर कुंवर नरेन्‍द्र सिंह को टिकट दिया है। कुंवर नरेन्‍द्र सिंह और ठाकुर तेजपाल सिंह के बीच पहले से ही छत्तीस का आंकड़ा चल रहा था, इस टिकट ने वह खाई और चौड़ी कर दी।
छाता क्षेत्र में अच्‍छा जनाधार रखने वाले ठाकुर तेजपाल का वोट कुंवर नरेन्‍द्र सिंह को मिल पाएगा, यह कहना बहुत मुश्‍किल है।
रही-सही कसर कल तब पूरी हो गई जब कुंवर नरेन्‍द्र सिंह के अपने सगे भाई पूर्व सांसद कुंवर मानवेन्‍द्र सिंह ने चुनावों के बीच भाजपा ज्‍वाइन कर ली। ऐसे में अब उनका भी कुंवर नरेन्‍द्र सिंह के लिए वोट मांगने आना असंभव हो चुका है।
कुंवर नरेन्‍द्र सिंह की दिक्‍कतें यहीं खत्‍म नहीं होतीं। जिन सपा और बसपा के गठबंधन से उन्‍हें सहारा है, वह भी उनके लिए खुलकर सामने आने को तैयार नहीं है।
बसपा के मथुरा में सर्वाधिक कद्दावर नेता मांट क्षेत्र के विधायक श्‍यामसुंदर शर्मा माने जाते हैं। श्‍यामसुंदर शर्मा और रालोद मुखिया चौधरी अजीत सिंह की वैमनस्‍यता जगजाहिर है। मुलायम सिंह के नेतृत्‍व वाली सरकार में जिस वक्‍त रालोद उत्तर प्रदेश की सरकार का हिस्‍सा हुआ करता था उस वक्‍त चौधरी अजीत सिंह ने श्‍यामसुंदर शर्मा को बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
अजीत सिंह ने अपने एक मुंह लगे रैंकर आईपीएस और एसएसपी मथुरा सत्‍येन्‍द्र वीर सिंह से न केवल श्‍यामसुंदर शर्मा बल्‍कि उनके लघुभ्राता कृष्‍णकुमार शर्मा ‘मुन्‍ना’ सहित पूरे परिवार का जिस कदर उत्‍पीड़न कराया था, उसे श्‍याम शायद ही भूले हों।
पूरे ढाई साल अजीत सिंह के उस खास पुलिस अफसर ने श्‍यामसुंदर शर्मा व उनके परिजनों का जो उत्‍पीड़न किया, उसका दूसरा उदाहरण मिलना मुश्‍किल है।
बेशक आज श्‍यामसुंदर शर्मा के दल का दिल चौधरी अजीत सिंह से मिल चुका है परंतु मथुरा में तो मतदाता वही करेगा जो श्‍यामसुंदर शर्मा दिल से करने को कहेंगे। श्‍यामसुंदर शर्मा मांट क्षेत्र की जनता के दिल पर तो राज करते ही हैं, साथ ही ब्राह्मणों के भी बड़े नेता माने जाते हैं।
अजीत और श्‍याम के संबंधों का आंकलन करने वालों को शक है कि मथुरा में बसपा का वोट रालोद के प्रत्‍याशी कुंवर नरेन्‍द्र सिंह के लिए ट्रांसफर हो पाएगा।
कहने को बसपा के एक और ब्राह्मण नेता योगेश द्विवेदी भी हैं। योगेश द्विवेदी 2014 के लोकसभा चुनाव में बसपा के मथुरा से प्रत्‍याशी थे और अच्‍छे-खासे वोट भी लेकर आए थे। सपा-बसपा-रालोद के अप्रत्‍याशित गठबंधन से पहले योगेश द्विवेदी को इस बार भी बसपा का स्‍वभाविक प्रत्‍याशी माना जा रहा था लेकिन गठबंधन ने उनकी उम्‍मीदों पर पानी फेर दिया। जाहिर है कि अब पार्टी यदि उनसे कोई उम्‍मीद रखती है तो वह बेमानी होगी।
बसपा के मथुरा में तीसरे अहम नेता भी ब्राह्मण समुदाय से ताल्‍लुक रखते हैं। ये नेता हैं पूर्व विधायक राजकुमार रावत। राजकुमार रावत की गोवर्धन और गोकुल व बल्‍देव क्षेत्र के बाह्मण वोटों पर अच्‍छी पकड़ है किंतु उनका वोट बैंक रालोद को ट्रांसफर हो पाएगा, इस पर कोई आसानी से भरोसा करने के लिए तैयार नहीं है।
अब यदि बात करें गठबंधन के तीसरे दल समाजवादी पार्टी की, तो वह आज तक मथुरा में अपना कोई जनाधार खड़ा ही नहीं कर पाया। मथुरा से कभी किसी चुनाव में समाजवादी पार्टी को सफलता नहीं मिली। तब भी नहीं जब अखिलेश ने यूपी की गद्दी संभाली ही थी और मांट क्षेत्र के उपचुनाव में अपने मित्र और निकट सहयोगी संजय लाठर को चुनाव लड़वाया था। सारी सरकारी मशीनरी झोंक देने के बावजूद संजय लाठर ये विधानसभा का उपचुनाव हार गए।
मथुरा से तीसरे प्रमुख प्रत्‍याशी महेश पाठक 1998 में कांग्रेस की ही टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ चुके हैं। तब महेश पाठक के लिए किशोरीरमण डिग्री कॉंलेज के मैदान में सोनिया गांधी ने सभा की थी। सोनिया की सभा में तब भीड़ तो खूब उमड़ी किंतु वह वोटों में तब्‍दील नहीं हुई नतीजतन महेश पाठक बुरी तरह चुनाव हार गए।
दो दशक बाद एकबार फिर कांग्रेस ने महेश पाठक को चुनाव मैदान में उतारा है। महेश पाठक का अपना कोई जनाधार कभी रहा नहीं और पार्टी में भी वो सर्वमान्‍य नहीं हैं।
महेश पाठक को चुनाव मैदान में उतारने से कांग्रेस की गुटबाजी पूरी तरह सामने आ चुकी है।
मथुरा के चतुर्वेदी समुदाय से ताल्‍लुक रखने वाले महेश पाठक यूं तो माथुर चतुर्वेद परिषद के संरक्षक तथा अखिल भारतीय तीर्थ पुरोहित महासभा के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष जैसे पदों को सुशोभित करते हैं परंतु कांग्रेस पार्टी की ही तरह समूचा चतुर्वेदी समुदाय भी उन्‍हें लेकर एकमत नहीं है।
एक असफल उद्योगपति के रूप में पहचान रखने वाले महेश पाठक कांग्रेसी नेता से अधिक दबंग व्‍यक्‍ति के तौर पर मशहूर हैं, और इसके लिए उनका अतीत जिम्‍मेदार है।
महेश पाठक से ऐसी कोई उम्‍मीद नहीं की जा सकती कि वह चुनाव के लिए कांग्रेस में व्‍याप्‍त गुटबाजी को समाप्‍त करा पाएंगे लिहाजा जिस समस्‍या से भाजपा की हेमा मालिनी तथा गठबंधन के कुंवर नरेन्‍द्र सिंह रुबरू हैं, वही महेश पाठक के सामने मुंहबाये खड़ी है।
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि तीन लोक से न्‍यारी नगरी की उपमा प्राप्‍त कृष्‍ण की पावन जन्‍मस्‍थली मथुरा से चुनाव मैदान में उतरे इन तीनों प्रमुख प्रत्‍याशियों का भाग्‍य भितरघातियों की चाल पर निर्भर है। प्रत्‍याशी भले ही तीन हैं लेकिन समस्‍या इन सभी की एक है।
मतदाता भले ही निर्णायक भूमिका अदा करता हो परंतु भितरघातियों की भूमिका भी जीत या हार में कम मायने नहीं रखती।
यकीन न हो तो देश के किसी भी क्षेत्र का चुनावी इतिहास उठाकर देख लो, आंकड़े खुद-ब-खुद बता देंगे कि भितरघाती क्‍या अहमियत रखते हैं। मथुरा लोकसभा का चुनाव इससे अलग नहीं हो सकता।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

उत्तर प्रदेश की इन 15 सीटों पर दिखाई देगा दिलचस्‍प सियासी संग्राम…

बीजेपी उम्मीदवारों की घोषणा के साथ ही उत्तर प्रदेश में कई हाई प्रोफाइल सीटों पर चुनावी घमासान का मंच सज चुका है।
यहां 15 सीटों पर बीजेपी और एसपी-बीएसपी-आरएलडी गठबंधन तथा कांग्रेस के बीच दिलचस्प सियासी संग्राम देखने को मिल सकता है।
बीजेपी ने लोकसभा चुनाव के लिए अपने प्रत्याशियों की पहली सूची जारी कर दी है। इस लिस्ट में उत्तर प्रदेश से 35 नाम हैं। इस लिस्ट में वाराणसी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बागपत से सत्यपाल सिंह व मथुरा से हेमा मालिनी सहित कई दिग्‍गजों के नाम शामिल हैं। 8 सीटों पर पहले चरण में 11 अप्रैल को मतदान होना है।
उत्तर प्रदेश की जिन सीटों पर कांटे का मुकाबला होने की संभावना नजर आ रही है उनमें ये सीटें प्रमुख हैं-
1- सहारनपुर 
राघव लखनपाल (बीजेपी)
इमरान मसूद (कांग्रेस)
मतदान- 11 अप्रैल
वेस्ट यूपी की इस सीट पर बीजेपी ने एक बार फिर राघव लखनपाल पर भरोसा जताया है। वहीं, कांग्रेस ने भी पिछली बार दूसरे नंबर पर रहे इमरान मसूद को टिकट दिया है। इमरान मसूद पिछले चुनाव में पीएम मोदी के खिलाफ विवादित बयान देकर सुर्खियों में रहे थे। यहां एसपी-बीएसपी-आरएलडी गठबंधन ने अभी अपने उम्मीदवार का ऐलान नहीं किया है। 2017 में सहारनपुर जातीय संघर्ष को लेकर चर्चा में रहा। इसके साथ ही यहां भीम आर्मी और उसके नेता चंद्रशेखर का उभार भी चुनाव में असर डाल सकता है।
2- मुजफ्फरनगर 
संजीव बालियान (बीजेपी)
चौधरी अजित सिंह (आरएलडी)
मतदान- 11 अप्रैल
सांप्रदायिक हिंसा की पृष्ठभूमि में हुए 2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान मुजफ्फरनगर में ध्रुवीकरण के हालात देखने को मिले थे। बीजेपी ने जहां एक बार फिर सिटिंग एमपी और केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान को उम्मीदवार बनाया है, वहीं एसपी-बीएसपी-आरएलडी गठबंधन के तहत इस सीट से चौधरी अजित सिंह लड़ रहे हैं। आरएलडी सुप्रीमो को पिछले चुनाव में बागपत सीट पर शिकस्त झेलनी पड़ी थी। यहां तक कि वह तीसरे नंबर पर जा पहुंचे थे लेकिन इस बार गठबंधन की वजह से मुजफ्फरनगर में दिलचस्प जंग देखने को मिलेगी।
3- बागपत 
सत्यपाल सिंह (बीजेपी)
जयंत चौधरी (आरएलडी)
मतदान- 11 अप्रैल
पहले चौधरी चरण सिंह और फिर उनके बेटे अजित सिंह की वजह से चर्चित सीट पर इस बार परिवार की राजनीतिक विरासत को जयंत चौधरी आगे बढ़ा रहे हैं। गठबंधन के तहत यह सीट आरएलडी के हिस्से में आई है।
बीजेपी ने पिछली बार जयंत के पिता को मात देने वाले सत्यपाल सिंह पर दोबारा दांव खेला है। मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर और वर्तमान में केंद्रीय मंत्री सत्यपाल सिंह पिछले चुनाव के दौरान काफी चर्चित रहे थे। अब देखना दिलचस्प होगा कि जयंत पिता की हार का बदला ले पाते हैं या जाट लैंड में सत्यपाल फिर विजयी होते हैं।
4- गाजियाबाद 
वी के सिंह (बीजेपी)
सुरेंद्र कुमार उर्फ मुन्नी शर्मा (एसपी)
डॉली शर्मा (कांग्रेस)
मतदान- 11 अप्रैल
गाजियाबाद यूपी की वह सीट है, जहां पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान बीजेपी ने राज्य में सबसे ज्यादा मतों के अंतर से जीत हासिल की थी। पूर्व सेनाध्यक्ष वी के सिंह को बीजेपी ने यहां से अपना उम्मीदवार बनाया है। गाजियाबाद सीट राजपूत बहुल है और साठा-चौरासी इलाके के तहत आने वाले 144 गांवों में इस समुदाय का बड़ा वोट बैंक है। बीजेपी ने राजपूत समुदाय से ही आने वाले रिटायर्ड जनरल वी के सिंह को मैदान में उतारा है। गठबंधन की तरफ से सुरेंद्र कुमार उर्फ मुन्नी शर्मा और कांग्रेस की ओर से डॉली शर्मा कैंडिडेट हैं।
5- गौतमबुद्धनगर 
महेश शर्मा (बीजेपी)
अरविंद सिंह चौहान (कांग्रेस)
मतदान- 11 अप्रैल
गौतमबुद्धनगर यानि नोएडा सीट पर अब तक बीजेपी का वर्चस्व रहा है। पार्टी ने यहां से केंद्रीय मंत्री डॉ. महेश शर्मा को फिर से टिकट दिया है। वहीं, कांग्रेस ने अरविंद सिंह चौहान को उतारा है। 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को उस वक्त बड़ा झटका लगा था, जब मतदान से एक हफ्ते पहले पार्टी कैंडिडेट रमेश चंद्र तोमर बीजेपी में शामिल हो गए थे। दूसरी ओर अलवर (राजस्थान) के मूल निवासी डॉ. महेश शर्मा लंबे समय से एनसीआर में सक्रिय हैं।
6- मुरादाबाद 
कुंवर सर्वेश कुमार सिंह (बीजेपी)
राज बब्बर (कांग्रेस)
मतदान- 23 अप्रैल
सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील मुरादाबाद में बीजेपी ने वर्तमान सांसद कुंवर सर्वेश कुमार सिंह पर भरोसा जताया है। इस बार यहां से कांग्रेस ने राज बब्बर को उतारकर मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है। यूपी कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष राज बब्बर ने पिछला चुनाव गाजियाबाद से लड़ा था। पीतल नगरी में अभी गठबंधन ने अपने कैंडिडेट का ऐलान नहीं किया है।
7- अलीगढ़ 
सतीश कुमार गौतम (बीजेपी)
चौधरी बृजेंदर सिंह (कांग्रेस)
मतदान- 18 अप्रैल
अलीगढ़ लोकसभा सीट पर बीजेपी ने वर्तमान सांसद सतीश कुमार गौतम को कैंडिडेट बनाया है। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) में जिन्ना की तस्वीर लगाने पर उन्होंने सवाल उठाए थे। इस मामले को लेकर देश की सियासत गरमा गई थी। एएमयू कैंपस में भी कई दिन तनाव देखने को मिला था। कांग्रेस ने यहां से चौधरी बृजेंदर सिंह को टिकट दिया है। 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने इस क्षेत्र के तहत आने वाली सभी पांचों विधानसभा सीटों पर जीत दर्ज की थी।
8- अमेठी 
स्मृति इरानी (बीजेपी)
राहुल गांधी (कांग्रेस)
मतदान- 6 मई
अमेठी लोकसभा सीट पर एक बार फिर देश की नजरें टिकी रहेंगी। जहां एक ओर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी लगातार चौथी बार इस सीट से सांसद की पारी खेलने की तैयारी में हैं, वहीं बीजेपी ने उनके खिलाफ स्मृति इरानी को फिर उतारा है। 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान हार के बावजूद स्मृति लंबे समय से इलाके में सक्रिय हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी लोकसभा चुनाव के ऐलान से पहले यहां बड़ी रैली की थी। पिछले चुनाव में राहुल ने स्मृति को 1.07 लाख वोटों से हराया था। राहुल की यह जीत 2009 के मुकाबले बेहद छोटी थी। 2009 में राहुल 3.70 लाख वोटों के अंतर से जीते थे।
9- संभल 
परमेश्वर लाल सैनी (बीजेपी)
शफीकुर्रहमान बर्क (एसपी)
मतदान- 23 अप्रैल
संभल सीट पर एसपी-बीएसपी-आरएलडी गठबंधन की ओर से शफीकुर्रहमान बर्क को टिकट मिला है। वहीं, बीजेपी ने यहां से परमेश्वर लाल सैनी को उतारा है। मुस्लिम बहुल इस सीट पर 23 अप्रैल को मतदान होना है। अभी कांग्रेस ने यहां से अपना कैंडिडेट घोषित नहीं किया है। लेकिन इस बार गठबंधन कैंडिडेट बर्क की स्थिति मजबूत मानी जा रही है। वह तीन बार मुरादाबाद और एक बार संभल से सांसद रह चुके हैं। संभल लोकसभा सीट से 2009 में उन्होंने बीएसपी टिकट से लोकसभा का चुनाव जीता था। 2013 में सांसद रहते उन्होंने कहा था, ‘मैं वंदे मातरम् का बहिष्कार करने के लिए सोमवार को संसद से अनुपस्थित रहूंगा।’ बर्क ने 1997 में संसद के 50 साल पूरे होने पर आयोजित स्वर्ण जयंती कार्यक्रम में भी वंदे मातरम् का बहिष्कार किया था।
10- बदायूं 
संघमित्र मौर्य (बीजेपी)
धर्मेंद्र यादव (एसपी)
सलीम इकबाल शेरवानी (कांग्रेस)
मतदान-23 अप्रैल
बदायूं सीट पर एसपी संरक्षक मुलायम सिंह यादव के भतीजे धर्मेंद्र यादव इस बार चक्रव्यूह में घिरे हैं। वर्तमान सांसद धर्मेंद्र के खिलाफ बीजेपी ने संघमित्र मौर्य को टिकट दिया है। चाचा शिवपाल यादव ने प्रगतिशील समाजवादी पार्टी लोहिया बनाकर उन्हें पहले से मुश्किल में डाल रखा है। वहीं, कांग्रेस ने इलाके के कद्दावर नेता सलीम इकबाल शेरवानी को उतारकर धर्मेंद्र के लिए मुसीबत खड़ी कर दी है।
11- उन्नाव 
साक्षी महाराज (बीजेपी)
अनु टंडन (कांग्रेस)
मतदान- 29 अप्रैल
टिकट बंटवारे से पहले चिट्ठी लिखने वाले साक्षी महाराज को बीजेपी ने आखिरकार टिकट दे दिया है। लेकिन इस बार साक्षी की राह आसान नहीं मानी जा रही है। कांग्रेस ने यहां से अनु टंडन को उतारा है। 2009 में कांग्रेस से सांसद रह चुकीं अनु इस क्षेत्र में काफी सक्रिय हैं। इसके साथ ही साक्षी महाराज को बाहरी होने का नुकसान उठाना पड़ सकता है। अभी यहां से गठबंधन कैंडिडेट का ऐलान नहीं हुआ है।
12- मथुरा 
हेमा मालिनी (बीजेपी)
नरेंद्र सिंह (आरएलडी)
मतदान- 18 अप्रैल
‘ड्रीम गर्ल’ हेमा मालिनी मथुरा से एकबार फिर चुनाव मैदान में हैं। बीजेपी ने वर्तमान सांसद हेमा मालिनी को ही प्रत्याशी बनाया है। उधर एसपी-बीएसपी-आरएलडी गठबंधन ने कुंवर नरेन्‍द्र सिंह को खड़ा किया है। हेमा पर क्षेत्र को कम समय देने का आरोप लगता रहा है। पिछले बार के चुनाव में हेमा ने आरएलडी के जयंत चौधरी को शिकस्त दी थी। जयंत इस बार वह बागपत से चुनाव लड़ रहे हैं। गठबंधन के तहत यह सीट आरएलडी के खाते में आई है। एसपी ने आरएलडी के लिए अपनी दावेदारी छोड़ दी थी।
13- लखीमपुर खीरी 
पूर्वी वर्मा (एसपी)
अजय कुमार मिश्रा (बीजेपी)
जफर अली नकवी (कांग्रेस)
मतदान-29 अप्रैल
लखीमपुर खीरी सीट पर बीजेपी ने जहां अजय कुमार मिश्रा को टिकट दिया है वहीं कांग्रेस ने यहां से पूर्व सांसद और मंत्री रह चुके जफर अली नकवी को उतारा है। गठबंधन कोटे के तहत यह सीट एसपी के हिस्से में आई है। पार्टी ने यहां से पूर्वी वर्मा को मैदान में उतारा है। 2009 के लोकसभा चुनाव में जीत दर्ज की थी। 1980 से 1991 तक वह इस सीट से विधानसभा सदस्य भी रहे। राजीव गांधी के करीबी रह चुके नकवी का इलाके में अच्छा जनाधार माना जाता है।
14- हरदोई 
ऊषा वर्मा (एसपी)
जय प्रकाश वर्मा (बीजेपी)
मतदान- 29 अप्रैल
हरदोई सीट पर नरेश अग्रवाल का अच्छा प्रभाव माना जाता है। कई पार्टियों की सवारी कर चुके नरेश इस समय बीजेपी के सदस्य हैं। हरदोई में बीजेपी ने जय प्रकाश वर्मा को टिकट दिया है जबकि गठबंधन के तहत एसपी ने ऊषा वर्मा को सियासी समर में उतारा है। कांग्रेस कैंडिडेट की अभी यहां से घोषणा नहीं हुई है लेकिन नरेश अग्रवाल फैक्टर का बीजेपी को लाभ मिल सकता है।
15- मिर्जापुर 
अनुप्रिया पटेल (अपना दल)
राजेंद्र एस बिंद (एसपी)
ललितेश पति त्रिपाठी (कांग्रेस)
मतदान- 19 मई
मिर्जापुर सीट बीजेपी ने एनडीए के सहयोगी अपना दल के लिए छोड़ दी है। यहां से केंद्रीय मंत्री और वर्तमान सांसद अनुप्रिया पटेल मैदान में हैं। वहीं, गठबंधन के तहत एसपी ने राजेंद्र एस बिंद को टिकट दिया है। कांग्रेस ने यहां से ललितेश पति त्रिपाठी को अपना उम्मीदवार बनाया है। इस बार अनुप्रिया पटेल की राह आसान नहीं मानी जा रही है।
-Legend News

शनिवार, 24 फ़रवरी 2018

ब्रज होली रसोत्‍सव: वाह माननीय वाह…यमुना प्रदूषण का ठीकरा ब्रजवासियों के सिर, और नाच-गाने कराकर कथित विकास का श्रेय खुद को



मथुरा। घोषणा के साथ ही विवादों में घिरे अपने कार्यक्रम ‘ब्रज होली रसोत्‍सव’ पर सफाई देने के लिए मीडिया के सामने आईं मथुरा की सांसद और सिने अभिनेत्री हेमा मालिनी ने यमुना के प्रदूषण मुक्‍त न हो पाने का ठीकरा भी मथुरा के ही लोगों के सिर फोड़ने की कोशिश तो की परंतु कार्यक्रम को लेकर उठ रहे सवालों का कोई जवाब अंत तक नहीं दिया।
प्रेस कांफ्रेंस की शुरूआत ही हेमा मालिनी ने यह कहते हुए की कि मैं जब से मथुरा की सांसद बनी हूं तब से मैंने बहुत सारे काम तो किए ही हैं, उसके साथ-साथ कल्‍चरल प्रोग्राम को भी बढ़ावा दिया है क्‍योंकि मैं बेसिकली एक आर्टिस्‍ट हूं।
एक कलाकार होने के नाते जब मैं मुंबई जाती हूं तो हमारे कलाकार मित्र हमेशा मुझसे कहते हैं कि आप मथुरा की सांसद हैं, आप हमें भी वहां लेकर चलिए। हम वहां गाना चाहते हैं, नृत्‍य करना चाहते हैं। उनकी हमेशा मांग रही है, और इसीलिए हमने दो साल पहले ‘मथुरा महोत्‍सव’ किया था जो बहुत ही सफल रहा। हमने सारे बॉलीवुड आर्टिस्‍ट को बुलाकर यह कार्यक्रम किया था। ऐसे कार्यक्रमों से मथुरा की शान बढ़ती है क्‍योंकि मैं मथुरा की सांसद हूं। एक साल पहले इसी प्रकार का एक कार्यक्रम मैंने ‘रसोत्‍सव’ के नाम से किया था। उसमें मैंने अपनी विश्‍व विख्‍यात नृत्य नाटिका ‘यशोदा-कृष्‍ण, राधाकृष्‍ण’ पेश किया था।
अब मेरा मन था कि मैं कुछ ऐसा बहुत अच्‍छा करूं जिससे पर्यटन को बढ़ावा मिले और मथुरा की शान भी बढ़े। हम इस कार्यक्रम के तहत यमुना की आरती करते और यमुना में लाखों दीपक प्रवाहित करते लेकिन अचानक किसी को लगा कि हम यमुना को प्रदूषित करने जा रहे हैं जो कि हम नहीं कर रहे थे।
इसके बाद हेमा मालिनी ने कहा कि हम तो चाहते थे कि यमुना को शुद्ध करो, मथुरा के लोगों ने जो नहीं किया उनसे मैं रिक्‍वेस्‍ट करती हूं कि आप लोग यमुना को शुद्ध करो। प्रदूषित है इतना, गंदगी डालकर खराब हो गया है इतना। ये मथुरा वालों की भी जिम्‍मेदारी है कि उन्‍हें यमुना को साफ-सुथरा रखना चाहिए। अचानक उनके मन में आया कि मैं उसको खराब करने वाली हूं, तो वो एनजीटी मैं पहुंच गए और मेरे कार्यक्रम पर रोक लगवा दी। मैं एनजीटी से परमीशन लेकर यमुना किनारे कार्यक्रम कर सकती हूं किंतु उसमें समय लगेगा। हालांकि मैंने दृढ़ संकल्‍प लिया है कि यमुना किनारे जहां अभी कार्यक्रम नहीं हो सका, वहां पर बहुत जल्‍द कार्यक्रम होगा और जिन लोगों ने विरोध किया है उन्‍हें मानना पड़ेगा कि हमारे कल्‍चरल कार्यक्रमों से पर्यटन को कितना बढ़ावा मिलता है।
हेमा मालिनी ने कहा कि समय की कमी को देखते हुए मैंने इस कार्यक्रम को शिफ्ट किया और अब यह कार्यक्रम उसी तरह वेटरिनरी यूनिवर्सिटी के प्रांगण में होगा। मथुरा के मुक्‍ताकाशीय रंगमंच को भी जल्‍द से जल्‍द तैयार कराने का मैंने प्रयास किया ताकि मथुरा में सांस्कृतिक कार्यक्रम चलते रहें।
हेमा मालिनी के अनुसार सांसद का काम केवल रोड बनवाना, बिजली दिलवाना और उद्धाटन करते रहना ही नहीं है। कल्‍चरल प्रोग्राम भी होने चाहिए जिससे ब्रज की कलाओं को बढ़ावा मिले।
अपनी उपलब्‍धियों गिनाने, यमुना प्रदूषण के लिए मथुरा के ही लोगों को जिम्‍मेदार ठहराने और उन्‍हें यमुना किनारे ही अपना कार्यक्रम शीघ्र करने की चुनौती देकर हेमा मालिनी उन सभी सवालों का जवाब दिए बिना उठकर चलती बनीं जिनके कारण उनके कार्यक्रम तथा बतौर सांसद उनकी मंशा पर भी सवाल उठ रहे हैं।
हां, इस दौरान वह यह बताना नही भूलीं कि अगर मथुरा की जनता चाहेगी तो वह अवश्य यहां से दोबारा सांसद बनना चाहेंगी।
हेमा मालिनी को दूसरी मर्तबा मथुरा से संसद पहुंचने का सपना संजाेने से पहले यह भी सोच लेना चाहिए था कि एकबार तो उनके पति अभिनेता धर्मेन्‍द्र भी राजस्‍थान के बीकानेर से लोकसभा चुनाव जीतने में सफल रहे थे। मथुरा से जीत के बाद हेमा मालिनी की कार्यप्रणाली अपने पति धर्मेन्‍द्र से कोई बहुत अलग नहीं रही है।
गौरतलब है कि आज यानि 23 फरवरी को हेमा मालिनी के इसी कार्यक्रम को लेकर एनजीटी में सुनवाई होनी है। पिछली तारीख 15 फरवरी को सुनवाई के बाद एनजीटी ने न सिर्फ कायर्क्रम को यमुना किनारे करने पर रोक लगा दी थी बल्‍कि ‘नमामि गंगे’ तथा ‘प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड’ से जवाब तलब भी किया था।
बताया जाता है कि इन दोनों सरकारी संस्‍थाओं ने यमुना किनारे अब कार्यक्रम न करके वेटरिनरी यूनिवर्सिटी में किए जाने संबंधी साक्ष्‍यों के साथ अपना जवाब एनजीटी के समक्ष पेश कर दिया है लिहाजा आगे कोई आदेश आने की संभावना कम है।
रहा सवाल हेमा मालिनी द्वारा यमुना किनारे ही जल्‍द इसी तरह का कार्यक्रम करने की चुनौती देने का, तो उसकी भी उम्‍मीद काफी कम है क्‍योंकि प्रथम तो एनजीटी यमुना प्रदूषण के मुद्दे पर बेहद गंभीर है और दूसरे दिल्‍ली में यमुना किनारे आध्‍यात्‍मिक गुरू श्री-श्री रविशंकर की संस्‍था ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ द्वारा कराए गए कल्‍चरल प्रोग्राम की नजीर उसके सामने है।
उस कार्यक्रम में प्रधानमंत्री द्वारा शिरकत किए जाने के बावजूद एनजीटी ने यह माना कि आर्ट ऑफ लिविंग द्वारा कराए गए कार्यक्रम से यमुना और उसके किनारे के पर्यावरण को काफी नुकसान हुआ। एनजीटी ने आर्ट ऑफ लिविंग के कार्यक्रम से हुए नुकसान की भरपाई के लिए संस्‍था पर 5 करोड़ रुपए का बड़ा जुर्माना भी ठोका।
जहां तक प्रश्‍न हेमा मालिनी द्वारा यमुना के प्रदूषण का ठीकरा मथुरावासियों के ही सिर फोड़ने की कोशिश का है तो हेमा मालिनी को जान लेना चाहिए कि मथुरावासी तो 32 साल से मथुरा को प्रदूषण मुक्‍त कराने की लड़ाई विभिन्‍न स्‍तर पर लड़ रहे हैं।
सबसे पहले यमुना के लिए 16 मार्च 1985 को तत्‍कालीन जिलाधिकारी राजेन्‍द्र सिंह यादव के समक्ष उनके आवास पर गोपेश्‍वर चतुर्वेदी के नेतृत्‍व में आवाज़ बुलंद की गई थी। इस मामले में तब गोपेश्‍वर चतुर्वेदी सहित कई प्रमुख लोगों के खिलाफ संगीन धाराओं में केस भी दर्ज किया गया था।
उसके बाद जनवरी 1998 में प्रमुख पर्यावरणविद् और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्‍ठ अधिवक्‍ता एम. सी. मेहता और गोपाल पीठाधीश्‍वर विठ्ठलेशजी महाराज के नेतृत्‍व में बड़ा धरना प्रदर्शन किया गया।
तब गंगा प्रदूषण की कोर्ट में लड़ाई लड़ रहे एम. सी. मेहता ने जब यहां यमुना की दुर्दशा अपनी आंखों से देखी तो उन्‍होंने यमुना प्रदूषण के मुद्दे को भी कोर्ट में ले जाना ज्‍यादा मुनासिब समझा। उसके बाद गोपेश्‍वर चतुर्वेदी के नाम से इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय में एक जनहित याचिका 1644/98 डाली गई जिसे जनवरी 1998 में ही कोर्ट से स्‍वीकार करते हुए यमुना कार्य योजना के तहत मथुरा-वृंदावन का मामला शामिल किया और तमाम आदेश-निर्दश जारी दिए।
गोपेश्‍वर चतुर्वेदी बनाम स्‍टेट ऑफ यूपी एंड अदर्स के नाम से दाखिल इस याचिका की सुनवाई के बाद दिए गए आदेश-निर्देशों के अनुपालन हेतु कोर्ट ने ही एडीएम स्‍तर के एक अधिकारी को बहुत से अतिरिक्‍त अधिकारों सहित यमुना कार्य योजना का स्‍थानीय नोडल अधिकारी भी बनाया।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश-निर्देशों से यमुना में गिरने वाले मथुरा के सभी 19 नाले और वृंदावन के 18 नाले पहली बार टेप किए गए और यमुना जल को शुद्ध बनाए रखने के दूसरे अनेक प्रयास शुरू हुए।
यह बात अलग है कि प्रशासनिक शिथिलता के कारण सन् 2000 के बाद इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय के आदेश-निर्देशों की जो धज्‍जियां उड़नी शुरू हुईं, वह अब तक उड़ाई जा रही हैं।
दरअसल, सन् 2000 के बाद जितने भी नोडल अधिकारी यहां रहे, उनमें से किसी ने न तो अपने अधिकार जानना जरूरी समझा और न कभी यमुना के प्रति अपना कर्तव्‍य निभाया। यह सिलसिला अब भी जारी है। नतीजतन यमुना दिन-प्रतिदिन पहले से कई गुना अधिक प्रदूषित हो रही है।
गोपेश्‍वर चतुर्वेदी आज भी यमुना को प्रदूषण मुक्‍त कराने की दोहरी लड़ाई लड़ रहे हैं। एक ओर इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय में तो दूसरी ओर नेशनल ग्रीन ट्रेब्‍यूनल (एनजीटी) में।
गोपेश्‍वर चतुर्वेदी के अलावा मथुरा के ही कांतानाथ चतुर्वेदी और महेन्‍द्र नाथ चतुर्वेदी भी न्‍यायालय के माध्‍यम से यमुना को प्रदूषण मुक्‍त कराने की लड़ाई लड़ रहे हैं।
इनके अलावा वृंदावन के प्रमुख पत्रकार रहे और इस समय समाज सेवा से जुड़े मधुमंगल शुक्‍ला ने यमुना प्रदूषण के मुद्दे पर वर्ष 2010 में याचिका दाखिल की थी और वर्ष 2015 में एनजीटी का गठन होने के बाद वहां भी मूव किया।
मधुमंगल शुक्‍ला के प्रयासों का ही नतीजा है कि आज यमुना की खादरों में किया गया बेहिसाब अवैध निर्माण गिराया जाने लगा है और यमुना रिवर फ्रंट के कार्य पर एनजीटी ने पूरी नजर बना रखी है।
यमुना को प्रदूषण मुक्‍त कराने की एक लड़ाई अपने स्‍तर से बरसाना (मथुरा) स्‍थित मान मंदिर के महंत रमेश बाबा भी लड़ रहे हैं। रमेश बाबा के सानिध्‍य में उनके शिष्‍य रहे बाबा जयकृष्‍ण दास ने यमुना रक्षक दल के बैनर तले करीब 50 हजार लोगों के साथ मार्च 2013 में मथुरा से दिल्‍ली के लिए कूच किया था।
जयकृष्‍ण दास के काफिले को देखकर घबराई तत्‍कालीन यूपीए सरकार के केंद्रीय जल संसाधन मंत्री हरीश रावत ने बाबा से मुलाकात कर यमुना को प्रदूषण मुक्‍त करने की एक रूपरेखा उनके सामने प्रस्‍तुत की, जिसके बाद जयकृष्‍ण दास फरीदाबाद से वापस लौट आए। बाद में हरीश रावत के सरकारी आश्‍वासन का भी वही हश्र हुआ जैसा सभी सरकारों के आश्‍वासन का होता आया है।
यमुना प्रदूषण के मुद्दे पर बाबा जयकृष्‍ण दास का साथ स्‍थानीय अन्‍य लोगों ने भी दलगत राजनीति से ऊपर उठकर दिया। इनमें भारतीय किसान यूनियन (भानु गुट), कांग्रेसी नेता राकेश यादव व अब्‍दुल जब्‍बार, समाजवादी पार्टी के तत्‍कालीन महानगर अध्‍यक्ष डॉ. अशोक अग्रवाल, वृंदावन के जुझारु नेता उदयन शर्मा आदि प्रमुख रूप से शामिल रहे। पंकज बाबा ने भी यमुना को प्रदूषण मुक्‍त कराने के इस आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्‍सा लिया। ये सभी लोग आज भी अपने-अपने स्‍तर से यमुना को बचाने की जद्दोजहद में लगे हैं। रमेश बाबा ने तो एकबार फिर मार्च में दिल्‍ली कूच करने का एलान कर रखा है।
आश्‍चर्य की बात यह है कि कल की अपनी प्रेस कांफ्रेंस में यमुना प्रदूषण का ठीकरा ब्रजवासियों के सिर ही फोड़ने की हेमा मालिनी की कोशिश का जिक्र तक स्‍थानीय मीडिया ने अपने समाचारों में नहीं किया और सिर्फ उनके कार्यक्रम का ब्‍यौरा देकर अपने कर्तव्‍य की इतिश्री कर ली जबकि हेमा मालिनी का यह प्रयास मथुरावासियों के प्रति पूर्वाग्रह तथा आत्मप्रशंसा से भरा था।
होली रसोत्‍सव संबंधी विज्ञापनों के बोझ तले दबे और कार्यक्रम के पास पाने की अभिलाषा में हेमा मालिनी से स्‍थानीय पत्रकारों ने यह पूछना भी जरूरी नहीं समझा कि दो साल पहले उनके द्वारा किए गए ‘मथुरा महोत्‍सव’ तथा एक साल पहले किए गए ‘रसोत्‍सव’ से मथुरा के पर्यटन में कितनी वृद्धि हुई। उन्‍होंने अपने कार्यक्रमों में यहां की संस्‍कृति और उससे जुड़े यहां के लोगों को कितना बढ़ावा दिया और मुक्‍ताकाशीय रंगमंच का निर्माण कराने में वह क्‍यों सफल नहीं हुईं।
यमुना के लिए मथुरावासियों को उनका कर्तव्‍य याद दिलाने वाली हेमा मालिनी से किसी ने यह भी पूछना मुनासिब नहीं समझा कि उन्‍होंने अपने करीब चार साल के संसदीय कार्यकाल में यमुना को प्रदूषण मुक्‍त कराने का क्‍या प्रयास किया।
हेमा मालिनी से यह प्रश्‍न भी नहीं किया गया कि अब उनके द्वारा कराए जा रहे इस कार्यक्रम में कितने स्‍थानीय कलाकारों को तरजीह दी गई है क्‍योंकि जिन सुनामधन्‍य कलाकारों का जिक्र हेमा मालिनी ने किया वह किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं। पंडित जसराज और हरिप्रसाद चौरसिया अपने-अपने फन के वो माहिर उस्‍ताद हैं कि हेमा मालिनी उनके सामने कहीं नहीं टिकतीं।
बेशक ये दिग्‍गज कलाकार देश की शान और पहचान हैं किंतु मथुरा में इनके कार्यक्रम मथुरा की कला व संस्‍कृति को कैसे समृद्ध करेंगे, यह बात समझ से परे है।
यूं भी देखा जाए तो महाभारत नायक योगीराज श्रीकृष्‍ण की जन्‍मस्‍थली को नामचीन कलाकारों के कार्यक्रमों से अधिक नेकनीयत रखने वाले नेताओं की दरकार है क्‍योंकि बाहरी नेताओं से मथुरावासी पहले भी धोखा खाते रहे हैं।
हरियाणा से आए मनीराम बागड़ी से लेकर स्‍वामी सच्‍चिदानंद साक्षी तक और जयंत चौधरी से लेकर हेमा मालिनी तक, जितने भी नेताओं ने मथुरा से अपनी संसदीय पारी शुरू की, उन सभी ने मथुरा की जनता को निराश किया।
एकबार और मथुरा से संसद पहुंचने का ख्‍वाब देखने वालीं सिने तारिका कम से कम स्‍थानीय जनता की नब्‍ज टटोल लें, साथ ही पार्टी स्‍तर पर भी पता कर लें कि वह उन्‍हें फिर चुनाव में उतारने का जोखिम उठाने को तैयार है भी या नहीं, तो उनके लिए बेहतर होगा।
आत्ममुग्‍ध सांसद हेमा मालिनी ने प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि केवल सड़क बनवाना और बिजली मुहैया कराना ही उनका काम नहीं है। कल्‍चरल प्रोग्राम भी करते रहना चाहिए जिससे ब्रज की कलाओं को बढ़ावा मिले।
अच्‍छा होता यदि सांसद यह भी बता देतीं कि उन्‍होंने मथुरा जनपद में अपने प्रयासों से कितनी सड़क बनवाई हैं और बिजली की सुचारु आपूर्ति के लिए कितने प्रयास किए हैं।
हां, उद्घाटन करने वह समय-समय पर जरूर आती रही हैं किंतु उनका ब्‍यौरा जनता ने रखना जरूरी नहीं समझा होगा।
कौन नहीं जानता कि 2017 में उत्तर प्रदेश की सत्ता पर योगी आदित्‍यनाथ के नेतृत्‍व वाली सरकार के काबिज होने तथा मथुरा-वृंदावन क्षेत्र के विधायक श्रीकांत शर्मा को ऊर्जा मंत्रालय मिलने के बाद ही मथुरा जनपद की विद्युत समस्‍या का समाधान हुआ है अन्‍यथा इससे पहले शहर को भी बमुश्‍किल 12-14 घंटे ही बिजली मिल पाती थी परंतु सांसद ने कभी कोई प्रयास नहीं किए।
अपनी प्रेस कांफ्रेंस में कथित उपलब्‍धियों और आगामी सांस्कृतिक कार्यक्रमों का ऐलानी खाका खींचने वाली हेमा मालिनी ने अंत तक यह नहीं बताया कि यह ब्रजभूमि विकास ट्रस्‍ट क्‍या है और इसके पदाधिकारी कौन-कौन हैं।
हेमा मालिनी समय-समय पर यह तो कहती रही हैं कि वह ब्रज के विकास के लिए एक ट्रस्‍ट का गठन करके देश-विदेश से पैसा इकठ्ठा करेंगी परंतु वह ट्रस्‍ट कौन सा है, इसकी जानकारी कभी नहीं दी।
गौरतलब है कि होली रसोत्‍सव के नाम से बड़ी रकम एकत्र किए जाने की खासी चर्चा है और माथुर चतुर्वेद परिषद ने भी अपनी प्रेस कांफ्रेंस में इसका उल्लेख यह कहते हुए किया था कि फिल्‍म तो दिखानी ही पड़ेगी क्‍योंकि टिकट जो बिक चुकी हैं
माथुर चतुर्वेद परिषद ने यह बात उस समय कही जब उन्‍हें बताया गया कि हेमा मालिनी का कार्यक्रम तो अब भी होने जा रहा है। फर्क केवल इतना है कि अब वह यमुना पार न होकर वेटरिनरी के प्रांगण में होगा।
हेमा मालिनी ने अपनी प्रेस कांफ्रेंस में माथुर चतुर्वेद परिषद के एनजीटी पहुंच जाने तथा एनजीटी से यमुना किनारे प्रस्‍तावित कार्यक्रम पर रोक लगा देने की बात तो बताई परंतु परिषद के इस आरोप का कोई उत्तर नहीं दिया कि जब टिकट बिक गए तो फिल्‍म दिखानी पड़ेगी।
इसी प्रकार होली रसोत्‍सव के सहआयोजकों में ब्रजभूमि विकास ट्रस्‍ट का उल्‍लेख अवश्‍य किया गया है किंतु उसका कोई पदाधिकारी, कार्यक्रम की किसी प्रेस कांफ्रेंस का हिस्‍सा नहीं बना जबकि पहली प्रेस कांफ्रेंस समन्‍वयक बताए गए अनूप शर्मा ने तथा दूसरी खुद हेमा मालिनी ने की।
दोनों ही प्रेस कांफ्रेंस के वक्‍त उत्तर प्रदेश के पर्यटन विभाग और तीर्थ विकास ट्रस्‍ट की ओर से भी किसी की नुमाइंदगी न होना शंका तो प्रकट करता है क्‍योंकि इन्‍हें मात्र विज्ञापन का हिस्‍सा बनाकर छोड़ दिया गया।
ऐसा नहीं है कि होली रसोत्‍सव करने के तौर-तरीकों से माथुर चतुर्वेद परिषद को ही शिकायत हुई हो, भाजपा का एक बड़ा वर्ग भी आयोजन के मकसद को न तो समझ पा रहा है और न पचा पा रहा है क्‍योंकि इसका औचित्‍य उनकी समझ से परे है।
यही कारण है कि कार्यक्रम की घोषणा से लेकर आज तक हेमा मालिनी के इर्द-गिर्द सिर्फ ऐसे लोगों का जमावड़ा रहा है जिनकी पार्टी में भी कोई पूछ नहीं रह गई और जो हर वक्‍त किसी न किसी की आड़ में अपना चेहरा चमकाने का प्रयास करते रहते हैं।
जाहिर है कि इतने सारे प्रश्‍नों और आरोपों के बीच आज से शुरू होने जा रहे होली रासोत्‍सव का कल समापन तो हो जाएगा लेकिन जो प्रश्‍न इसके आयोजकों पर उठे हैं, वह 2019 के लोकसभा चुनावों तक भाजपा और हेमा मालिनी का पीछा नहीं छोड़ने वाले।
ऐसे में हेमा मालिनी खुद सोच लें कि पार्टी द्वारा उतारे जाने के बाद भी क्‍या 2019 का लोकसभा चुनाव जीतना उनके लिए आसान होगा, और क्‍या वह तब भी इसी प्रकार किसी प्रश्‍न का जवाब दिए बिना सिर्फ अपनी बात कहकर प्रेस कांफ्रेंस से उठ पाएंगी।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

हेमा जी! होली रसोत्‍सव तो ठीक…लेकिन ये ‘ब्रजभूमि विकास ट्रस्‍ट’ क्‍या है ?

मथुरा की माननीय सांसद और प्रसिद्ध सिने अभिनेत्री हेमा मालिनी द्वारा स्‍थानीय वेटरिनरी यूनीवर्सिटी के प्रांगण में कराया जाने वाला दो दिवसीय ‘होली रसोत्‍सव’ कार्यक्रम खासा विवादित हो चुका है जबकि कार्यक्रम का आयोजन 23 और 24 फरवरी को होना है।
हेमा मालिनी द्वारा कराए जा रहे इस कार्यक्रम का सर्वप्रथम तो विरोध इसलिए हुआ क्‍योंकि वह सैकड़ों साल की परंपरा के विपरीत दूसरे स्‍थान से यमुना आरती कराना चाहती थीं।
जैसे-तैसे यमुना आरती विश्राम घाट पर ही कराने को लेकर सहमति बनी तो माथुर चतुर्वेद परिषद्, सांस्कृतिक कार्यक्रमों की वजह से होने वाले संभावित यमुना प्रदूषण का मुद्दा लेकर एनजीटी जा पहुंची। एनजीटी ने 15 फरवरी को इस मामले की सुनवाई करते हुए कार्यक्रम पर रोक लगा दी।
विश्राम घाट के किनारे यमुना पार कार्यक्रम किए जाने का विरोध बढ़ता देख पहले तो हेमा मालिनी ने कार्यक्रम को ही निरस्‍त करने की घोषणा कर दी किंतु बाद में स्‍थान बदलने की सूचना दी गई।
अब यह कार्यक्रम स्‍थानीय वेटरिनरी यूनिवर्सिटी के उस गार्डन में किया जाना है जिसमें गत दिनों मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ पंडित दीनदयाल उपाध्‍याय की प्रतिमा का अनावरण करके गए हैं।
हेमा मालिनी सहित ‘होली रसोत्‍सव’ के आयोजक मंडल में शामिल लोगों ने कार्यक्रम स्‍थल भले ही बदल दिया लेकिन कार्यक्रम पर उठ रहे सवाल अब भी पीछा नहीं छोड़ रहे।
सबसे पहला सवाल तो माथुर चतुर्वेद परिषद् ने ही बाकायदा अपनी प्रेस कांफ्रेंस में यह कहकर खड़ा कर दिया कि ‘ टिकट बेच दिए हैं इसलिए सिनेमा तो दिखाना ही होगा’।
माथुर चतुर्वेद परिषद् के इस सवाल का जवाब आयोजकों में से किसी ने अब तक नहीं दिया।
दूसरा सवाल कल तब खड़ा हुआ जब बीते कल यानि 19 फरवरी को उत्तर प्रदेश के पर्यटन विभाग ने ब्रज की प्रमुख होलियों के कार्यक्रम का बड़ा सा विज्ञापन प्रकाशित कराया।
इस विज्ञापन में 19 फरवरी से लेकर 04 मार्च तक ब्रज में होने वाले सभी परंपरागत होली कार्यक्रमों का विवरण तो दिया गया है किंतु हेमा मालिनी के ‘होली रसोत्‍सव’ का कोई उल्‍लेख नहीं है जबकि होली रसोत्‍सव के आयोजकों में प्रदेश के पर्यटन विभाग का नाम शामिल है।
लोग यह जानना चाहते हैं कि यदि पर्यटन विभाग आयोजक है तो उसके अपने विज्ञापन में हेमा जी के होली कार्यक्रम को जगह क्‍यों नहीं दी गई।
आयोजकों ने अपनी प्रेस कांफ्रेंस में भी बताया था कि पर्यटन विभाग और उत्तर प्रदेश ब्रज तीर्थ विकास परिषद् के सहयोग से आयोजित हो रहे कार्यक्रम की थीम होली होगी।
तीसरा सवाल इस कार्यक्रम को लेकर आयोजकों की ओर से प्रकाशित कराए जा रहे विज्ञापन के बाद खड़ा हुआ है।
दरअसल, आयोजकों द्वारा प्रकाशित कराए गए विज्ञापनों में उत्तर प्रदेश के पर्यटन विभाग की ओर से प्रमुख सचिव पर्यटन अवनीश अवस्‍थी का नाम छपा है और उत्तर प्रदेश ब्रज तीर्थ विकास परिषद् की ओर से परिषद् के उपाध्‍यक्ष शैलजाकांत मिश्र का नाम लिखा है।
बतौर सांसद और नृत्‍यांगना के रूप में हेमा मालिनी का नाम भी इसमें शामिल है किंतु उस ‘ब्रजभूमि विकास ट्रस्‍ट’ के किसी पदाधिकारी का उल्‍लेख नहीं है जो कार्यक्रम का सह आयोजक बताया गया है।
‘ब्रजभूमि विकास ट्रस्‍ट’ के साथ-साथ लोग यह भी जानना चाहते हैं कि ‘होली रसोत्‍सव’ के संबंध में 15 फरवरी को प्रेस कांफ्रेंस करने वाले अनूप शर्मा का क्‍या ‘ब्रजभूमि विकास ट्रस्‍ट’ से भी कोई ताल्‍लुक है।
वैसे अनूप शर्मा को कार्यक्रम का समन्‍वयक बताया गया है किंतु यह नहीं बताया गया कि उन्‍हें समन्‍वयक किसने बनाया। मतलब पर्यटन विभाग ने, उत्तर प्रदेश विकास परिषद् ने, ब्रजभूमि विकास ट्रस्‍ट ने, या फिर हेमा मालिनी ने।
इसके अलावा इस बात की भी खासी चर्चा है कि ‘ब्रजभूमि विकास ट्रस्‍ट’ में कौन-कौन शामिल हैं और उनकी होली रसोत्‍सव कार्यक्रम कराने में इतनी रुचि क्‍यों है।
प्रेस कांफ्रेंस में मौजूद रहे कुछ अन्‍य नामों को लेकर भी उत्‍सुकता है। ये नाम हैं विपिन मुकुटवाला, मितुल पाठक, अनिल मालवीय, पुरूषोत्‍तम सिंह, संजीव गर्ग व भीमराज शर्मा आदि।
यहां भी सबसे बड़ा सवाल यह पैदा होता है कि सांसद हेमा मालिनी की ओर से उनके निजी सचिव जनार्दन शर्मा थे किंतु इतने बड़े कार्यक्रम के आयोजकों जैसे पर्यटन विभाग, ब्रज तीर्थ विकास परिषद् और ब्रजभूमि विकास ट्रस्‍ट का कोई प्रतिनिधि क्‍यों प्रेस कांफ्रेंस का हिस्‍सा नहीं बना।
क्‍या ब्रजभूमि विकास ट्रस्‍ट कोई ऐसी ‘छद्म संस्‍था’ है जिसके पदाधिकारियों का नाम सार्वजनिक नहीं किया जा सकता।
यदि नहीं, तो आयोजकों को यह भी बताना चाहिए कि हेमा मालिनी क्‍या स्‍थानीय सांसद होने के कारण ही इस कार्यक्रम को कराने में सबसे आगे खड़ी हैं अथवा ‘ब्रजभूमि विकास ट्रस्‍ट’ से उनका भी कोई नाता है।
यह सारे सवाल इसलिए खड़े हुए हैं क्‍योंकि हेमा मालिनी के कार्यकाल को अगले कुछ दिनों में चार साल पूरे होने वाले हैं। उन्‍होंने ‘होली रसोत्‍सव’ से पहले भी यहां सांस्कृतिक कार्यक्रम किए हैं, किंतु ब्रज अपने विकास को आज भी तरस रहा है।
हेमा मालिनी के पिछले कार्यक्रमों से यदि ब्रज का कोई विकास नहीं हुआ तो चार साल पूरे होने के आसपास किए जा रहे होली रसोत्‍सव से ब्रज का विकास कैसे होने लगेगा।
लोगों को संदेह है कि बार-बार सारा ध्‍यान सांस्‍कृतिक कार्यक्रमों पर ही केंद्रित किए जाने का मकसद कुछ खास लोगों का विकास करना तो नहीं है।
होली रसोत्‍सव में कहीं ऐसे तत्‍वों का विकास तो निहित नहीं है जो किसी न किसी आड़ में मलाई मारने के लिए कुख्‍यात हैं और जिन्‍होंने ब्रज के विकास में कभी कोई भूमिका बेशक न निभाई हो परंतु विनाश करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
सवाल उठ रहे हैं तो जवाब भी देने ही होंगे, अन्‍यथा समय पर ये सवाल अपने जवाब खुद तलाश लेंगे। ‘ब्रजभूमि विकास ट्रस्‍ट’ के बारे में भी और उनके पदाधिकारियों के बारे में भी। होली रसोत्‍सव के बारे में भी और उसे कराने के पीछे छिपे मकसद के बारे में भी क्‍योंकि 2019 के लोकसभा चुनावों को बहुत समय शेष नहीं है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
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