mathura लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
mathura लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 18 मार्च 2019

लोकसभा चुनाव 2019: पिछले 19 वर्ष में BJP क्‍या मथुरा से एक नेता पैदा नहीं कर सकी?

हो सकता है कि BJP के कुछ लोगों को सांसद हेमा मालिनी का यह दावा सुकून देता हो कि यह लोकसभा चुनाव भी वह मथुरा से ही लड़ेंगी किंतु पार्टी में ऐसे लोगों की संख्‍या अधिक है जो हेमा मालिनी के एकबार फिर यहां से चुनाव मैदान में उतरने को अपने राजनीतिक भविष्‍य से जोड़कर देखते हैं।
ऐसे लोगों में युवा कार्यकर्ताओं का एक बड़ा वर्ग शामिल है। इन लोगों की चिंता न तो नाजायज है और न निरर्थक।
जरा विचार कीजिए कि कोई भी युवा जब किसी राजनीतिक दल से अधिकृत तौर पर जुड़ता है तो किसलिए जुड़ता है ?
इसीलिए न कि उसके भी मन में कुछ अरमान होते हैं, कुछ पाने का सपना होता है। वह भी किसी मुकाम पर पहुंचकर कथित रूप से ही सही, लेकिन समाज की सेवा करना चाहता है। वह चाहता है कि लोग उसे भी पहचानें, उसके गले में मालाएं डालें और उसकी जय-जयकार करें।
शायद ही कोई युवा यह सोचकर किसी राजनीतिक दल को ज्‍वाइन करता हो कि वह अपनी पूरी जवानी अपने नेताओं की आवभगत में गुजार देगा और उनके समर्थकों के लिए फर्श बिछाता रहेगा। जयकारे लगाता रहेगा या माला पहनाता रहेगा।
सोच के धरातल पर यह बात बेमानी होने के बावजूद सही साबित इसलिए हो रही है क्‍योंकि राजनीति के सिरमौर कहलाने वाले श्रीकृष्‍ण की जन्‍मस्‍थली में आज कोई ऐसा BJP नेता दूर-दूर तक दिखाई नहीं दे रहा जो लोकसभा चुनाव लड़ने की बात तो दूर, टिकट पाने का भी प्रबल दावेदार हो।
अब सवाल यह खड़ा होता है कि आखिर ऐसा है क्‍यों, और क्‍या मथुरा जैसे विश्‍व प्रसिद्ध धार्मिक स्‍थल में BJP को एक अदद काबिल नेता देने की क्षमता नहीं है?
कहीं ऐसा तो नहीं कि BJP ही मथुरा में अपने लिए कोई नई पौध तैयार करना नहीं चाहती?
मथुरा के राजनीतिक इतिहास में झांककर देखें तो पता लगेगा कि स्‍वतंत्रता के बाद यहां से पहली बार BJP को 1991 में तब सफलता मिली जब डॉ. सच्‍चिदानंद हरि साक्षी लोकसभा सदस्‍य निर्वाचित हुए।
आश्‍चर्य की बात यह है कि 1991 का लोकसभा चुनाव लड़ने वाले महामंडलेश्‍वर डॉ. सच्‍चिदानंद साक्षी ने इससे मात्र एक साल पहले यानि 1990 में ही अपने राजनीतिक सफर की शुरूआत की थी।
एक साल के राजनीतिक करियर में भाजपा से लोकसभा का टिकट पाने वाले साक्षी महाराज मथुरा के निवासी नहीं थे। लोध समुदाय से ताल्‍लुक रखने वाले साक्षी जी मूल रूप से कासगंज के निवासी हैं लेकिन भाजपा ने उन्‍हें मथुरा से चुनाव लड़वाया।
भाजपा ने मथुरा से पहली और आखिरी बार स्‍थानीय निवासी चौधरी तेजवीर सिंह को 1996 में टिकट दिया। तेजवीर सिंह ने न सिर्फ यह चुनाव जीता बल्‍कि इसके बाद भी भाजपा की टिकट पर ही 12वीं तथा 13वीं लोकसभा के सदस्‍य बने।
2009 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने रालोद के युवराज जयंत चौधरी को समर्थन दे दिया और उसके बाद फिर 2014 में हेमा मालिनी को उतार दिया। हेमा मालिनी आज भले ही यहां से भाजपा की ही सांसद हैं किंतु वह स्‍थानीय नहीं हैं।
कुल मिलाकर देखा जाए तो निष्‍कर्ष यह निकलता है कि मथुरा जनपद में भाजपा को अब तक मात्र चौधरी तेजवीर सिंह ही एक योग्‍य प्रत्‍याशी नजर आए। उसके बाद कोई स्‍थानीय नेता इस लायक नहीं समझा गया कि उसे चुनाव लड़वाया जा सके।
हेमा मालिनी द्वारा दोबारा ताल ठोक देने से साफ जाहिर है कि कृष्‍ण की यह भूमि भाजपा के शीर्ष नेतृत्‍व की नजर में अब भी बंजर ही है। भाजपा नेतृत्व का नजरिया कुछ भी हो किंतु ऐसा है नहीं।
सच तो यह है कि भाजपा में एक दो नहीं, कई नए चेहरे ऐसे हैं जो यहां से सीट निकालने का माद्दा रखते हैं और पार्टी द्वारा बाहरी प्रत्‍याशियों को थोप देने से आहत भी हैं, लेकिन पार्टी उन्‍हें नजरंदाज करती रही है।
पिछले दिनों पड़ोसी जनपद हाथरस में आयोजित हुए आरएसएस के एक बड़े चिंतन शिविर में यह मुद्दा उठा भी था। वहां कहा गया कि यदि इसी प्रकार मथुरा में कभी किसी को समर्थन देकर तो कभी बाहरी प्रत्‍याशी खड़ा करके चुनाव लड़वाए जाते रहे तो मथुरा के युवा कार्यकर्ताओं का भविष्‍य चौपट होना तय है।
पार्टी से जुड़े प्रतिभावान कार्यकर्ताओं का कहना है कि इस समय राष्‍ट्रवाद अपने चरम पर है, जनता को भाजपा व उसके नेतृत्‍व पर भरोसा है, इसलिए यदि मथुरा से मथुरा के ही किसी युवा और नए चेहरे को लोकसभा चुनाव लड़वाया जाए तो एक ओर जहां पार्टी को दूसरी पीढ़ी के लिए नेता प्राप्‍त हो सकता है वहीं दूसरी ओर पार्टी के लिए जान खपा देने वालों में भी अपने भविष्‍य के प्रति उम्‍मीद बंधती है।
आज भारतीय जनता पार्टी स्‍वतंत्र भारत के अपने राजनीतिक सफर में शीर्ष स्‍थान हासिल किए हुए है। यही वह समय है जब वह अपने लिए दूसरी पीढ़ी के नेता और तीसरी पीढ़ी की पौध तैयार कर सकती है।
मथुरा जनपद यूं तो हमेशा से राजनीति का एक बड़ा अखाड़ा रहा है किंतु भाजपा ने इस अखाड़े के लिए अब तक बाहरी प्रत्‍याशियों पर ही अधिक भरोसा किया है जो स्‍थानीय भाजपाइयों के राजनीतिक भविष्‍य पर प्रश्‍नचिन्‍ह लगाता है।
1991 से ही यदि आंकलन किया जाए जब भाजपा का राष्‍ट्रीय राजनीति में उदय हुआ तो 1996 में मथुरा के मूल निवासी चौधरी तेजवीर सिंह पर ही भाजपा ने भरोसा जताया लेकिन उसके बाद तेजवीर सिंह द्वारा लगातार तीन बार जीत हासिल करने के बावजूद पार्टी ने फिर किसी स्‍थानीय नेता को अहमियत नहीं दी।
2004 का चुनाव तेजवीर सिंह क्‍या हारे, भाजपा का मथुरा भाजपा पर से विश्‍वास ही उठ गया। 2009 में तो भाजपा ने अपना प्रत्‍याशी तक चुनाव में उतारना जरूरी नहीं समझा और रालोद को समर्थन दे दिया।
उसके बाद 2014 के चुनाव में पार्टी हेमा मालिनी को ले आई और अब 2019 में भी मथुरा के मूल निवासी किसी नेता के नाम का जिक्र तक नहीं हो रहा। हेमा मालिनी के बाद जिनके नाम की थोड़ी-बहुत चर्चा है भी, तो उनकी जो स्‍थापित नेता हैं और महत्‍वपूर्ण पदों को सुशोभित कर रहे हैं। किसी नए चेहरे पर पार्टी फोकस करती दिखाई नहीं दे रही।
निश्‍चित ही यह स्‍थिति मथुरा भाजपा के लिए अफसोसनाक एवं चिंताजनक है। इस तरह तो मथुरा से शायद ही कभी कोई नेता खड़ा हो सके।
मथुरा की इस स्‍थिति और पार्टी नेतृत्‍व से स्‍थानीय नेताओं की उपेक्षा पर अंदरखाने युवकों में आक्रोश भी पनप रहा है किंतु फिलहाल कोई मुंह खोलने को तैयार नहीं।
वह दबी जुबान से इतना अवश्‍य कहते हैं कि 27 सालों में मात्र एक स्‍थानीय भाजपा नेता तेजवीर का संसद में पहुंचना यह साबित करने के लिए काफी है कि राजनीतिक रूप से मथुरा भाजपा कितनी कंगाल है और पार्टी का नेतृत्‍व उस पर कतई विश्‍वास नहीं करता।
युवाओं के मन में अंदर कहीं न कहीं यह डर भी है कि यदि यही हाल रहा तो कृष्‍ण की नगरी से शायद ही कभी किसी बड़े नेता का उदय हो और मथुरा की जनता उसे लेकर गौरव महसूस कर सके।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

शुक्रवार, 31 अगस्त 2018

2019 चुनाव: यमुना मैया की ”लाश” के सहारे एकबार फिर लोकसभा पहुंचने की तैयारियां शुरू

बेशर्म नेता, भ्रष्‍ट प्रशासन और तमाशबीन जनता के कारण वेंटिलेटर पर है मां यमुना 
2019 के लोकसभा चुनाव की फील्‍ड सजने लगी है। नेताओं के दौरे शुरू हो चुके हैं। बैठकों का सिलसिला जारी है।
यमुना को प्रदूषण मुक्‍त कराने का वचन देकर 2009 के चुनाव में भाजपा के सहयोग से लोकसभा की अपनी पारी शुरू करने वाले राष्‍ट्रीय लोकदल के युवराज जयंत चौधरी 2019 में महागठबंधन के सहारे एकबार फिर अपनी नैया पार लगती देख रहे हैं।
सिटिंग एमपी और अभिनेत्री हेमा मालिनी भी दोबारा चुनाव लड़ने के लिए अपनी ओर से ताल ठोक चुकी हैं। पार्टी ने चाहा तो वह यमुना को प्रदूषण मुक्‍त कराने का संकल्‍प लेने के लिए एकबार फिर चुनावी मैदान में होंगी।
इत्तेफाक देखिए कि जयंत चौधरी तथा हेमा मालिनी दोनों ने कृष्‍ण की पावन जन्‍मस्‍थली से ही चुनावी राजनीति में कदम रखा और ‘कालिंदी’ के कलुष को धोने का संकल्‍प लिया परंतु नतीजा सबके सामने है।
जयंत और हेमा ही क्‍यों, यमुना तो पिछले 20 साल से अपना कलुष धुलने के इंतजार में है। इस बीच कितने नेताओं ने यमुना का जल हाथ में लेकर वचन दिया कि वह पतित पावनी को प्रदूषण मुक्‍त करायेंगे किंतु यमुना से ज्‍यादा प्रदूषित वो खुद हो गए।
जिस तरह अब उन्‍हें यमुना का प्रदूषण दिखाई नहीं देता, उसी तरह अपने चेहरे पर लगी कालिख भी नजर नहीं आती।
10 जुलाई 1998 के दिन एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यमुना को प्रदूषण मुक्‍त रखने के लिए शासन-प्रशासन को तमाम दिशा-निर्देश दिए। इन दिशा-निर्देशों में कृष्‍ण जन्‍मभूमि (मथुरा) से चंद कदम दूरी पर किए जाने वाले पशुवध को नई पशुवधशाला का निर्माण होने तक पूरी तरह बंद कराने, यमुना के जल में सीधे गिरने वाले मथुरा-वृंदावन के दर्जनों नाले-नालियों को टैप करने तथा जनपद भर में मांस की बिक्री बंद करने जैसे आदेश शामिल थे।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के इन आदेश-निर्देशों की किस तरह धज्‍जियां उड़ाई जा रही हैं, यह समझने के लिए कल का वाकया काफी है।
श्रीकृष्‍ण जन्‍माष्‍टमी पर सुरक्षा-व्‍यवस्‍था और दूसरे इंतजामों के लिए कल कलक्‍ट्रेट सभागार में जिला प्रशासन ने एक मीटिंग रखी थी। इस मीटिंग में संबंधित विभागों के अधिकारियों सहित कृष्‍ण जन्‍मस्‍थान की ओर से गोपेश्‍वर नाथ चतुर्वेदी तथा द्वारिकाधीश मंदिर की ओर से श्रीधर चतुर्वेदी भी शामिल हुए। गोपेश्‍वरनाथ चतुर्वेदी ही 20 साल पहले यमुना प्रदूषण के मुद्दे को इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय लेकर गए थे।
इस मीटिंग के दौरान गोपेश्‍वर नाथ चतुर्वेदी ने जब जिलाधिकारी सर्वज्ञराम मिश्रा तथा एसएसपी बबलू कुमार को बताया कि इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय ने 1998 में जिस कट्टीघर को बंद कराने के आदेश दिए थे उसमें आज भी पशुओं का लगातार कटान हो रहा है, तो उन्‍होंने आश्‍चर्य व्‍यक्‍त किया।
डीएम और एसएसपी ने ये आश्‍चर्य पशुओं का कटान जारी रहने पर व्‍यक्‍त किया अथवा इस बात पर कि वह खुद इस जानकारी से कैसे अनभिज्ञ थे, यह तो वही जानें अलबत्ता मथुरा की जनता इस बात पर आश्‍चर्यचकित जरूर है कि ”योगीराज” में भी वही सारे कृत्‍य बदस्‍तूर हो रहे हैं जिन्‍हें सरकार बनते ही बंद कराने का वायदा भाजपा ने किया था।
योगी आदित्‍यनाथ ने मुख्‍यमंत्री पद की शपथ लेने के तत्‍काल बाद जो कदम उठाए, उनमें एक आदेश प्रदेशभर के अवैध कट्टीघरों को बंद कराने का भी था।
ऐसे में सवाल यह उठता है कि यदि हाईकोर्ट के आदेश से बंद हुआ मथुरा का कट्टीघर भी आजतक संचालित है, तो प्रदेश के दूसरे कट्टीघर क्‍या वाकई बंद हो पाए हैं ?
कुछ ऐसा ही हाल यमुना में गिरने वाले उन दर्जनों नालों का है जिन्‍हें टैप करने के आदेश इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिए थे। ये नाले तो कभी टैप नहीं हो पाए, हां इन्‍हें टैप करने के नाम पर करोड़ों का घोटाला जरूर कर लिया गया। भाजपा की चेयरपर्सन मनीषा गुप्‍ता के कार्यकाल में हुए करीब 2 करोड़ रुपयों के एक ऐसे ही घोटाले का वाद न्‍यायालय में लंबित है।
वैसे इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश आने से लेकर अब तक 20 वर्षों के बीच सिर्फ एक टर्म कांग्रेस के श्‍यामसुंदर उपाध्‍याय बिट्टू नगरपालिका के चेयरमैन रहे अन्‍यथा हमेशा भाजपा ही मथुरा नगर पालिका पर काबिज रही, बावजूद इसके यहां अवैध रूप से पशुओं का कटान कभी बंद नहीं हुआ।
अब जबकि मथुरा नगर पालिका, नगर निगम में तब्‍दील हो चुकी है और भाजपा के ही डॉ. मुकेश आर्यबंधु मेयर हैं तब भी न तो अवैध पशुकटान बंद हुआ है और न यमुना में नाले गिरना बंद हो पाया है।
जाहिर है कि ऐसे में वर्तमान विपक्ष यह कहने से नहीं चूकता कि अब तो दिल्‍ली से लेकर लखनऊ तथा मथुरा तक भाजपा की सरकार है, फिर क्‍यों बंद नहीं हो पा रहा अवैध पशु कटान और क्‍यों यमुना में गिर रहा है नालों का पानी।
इस संबंध में बात करने पर याचिकाकर्ता गोपेश्‍वरनाथ चतुर्वेदी अत्‍यंत व्‍यथित हुए। उन्‍होंने कहा कि बेशर्म नेता, भ्रष्‍ट प्रशासन और तमाशबीन जनता के कारण यमुना का प्रदूषण घटने की बजाय बढ़ता जा रहा है। शासन-प्रशासन का कोई भी अंग यमुना की इस दयनीय दशा को लेकर चिंतित नहींं है। यही कारण है कि यमुना को प्रदूषण मुक्‍त कराने के जितने भी और जो भी प्रयास जिस स्‍तर से किए गए, वो सब निष्‍फल साबित हुए हैं। यमुना में उसका अपना जल तो दिखाई ही नहीं देता। बाढ़ का पानी पूरी तरह उतर जाने के बाद यमुना उसी स्‍थिति को प्राप्‍त हो जाएगी जिस स्‍थिति में बाढ़ का पानी आने से पहले थी। मानव ही नहीं, नभचर एवं जलचरों के जीवन को ऑक्‍सीजन देने का काम करने वाली यमुना आज अपने लिए ऑक्‍सीजन के इंतजार में है। वह मृतप्राय हो चुकी है। जिस तरह सरकारी कागजों में यमुना की प्रदूषण मुक्‍ति के लिए दिए गए कोर्ट के समस्‍त आदेश-निर्देश काम कर रहे हैं, उसी तरह यमुना भी कागजों में बह रही है अन्‍यथा वह मृतप्राय है।
हर चुनाव में नेताओं की फौज आती है और यमुना के लिए घड़ियालू आंसू बहाकर अपना मकसद पूरा कर लेती है। कोई दिल्‍ली की गद्दी हथिया लेता है तो कोई यूपी की। स्‍थानीय स्‍तर पर भी ऐसे नेताओं की कमी नहीं जो यमुना के प्रदूषण को राजनीति का हथियार बनाकर मलाई मारते रहे और एक-दो बार नहीं कई-कई बार लोकसभा तथा विधानसभा में जा बैठे, किंतु इन लोगों ने यमुना को धोखे के अलावा कुछ नहीं दिया।
2019 के लोकसभा चुनावों में निश्‍चित ही यमुना को धोखा देने की एक और पटकथा लिखी जानी है।
चूंकि इस बार भाजपा का मुकाबला संभावित महागठबंधन के प्रत्‍याशी से होना है और चुनाव 2014 के मुकाबले कहीं अधिक कठिन होने की उम्‍मीद है इसलिए भ्रमजाल भी उतना ही बड़ा फैलाया जाएगा।
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कुछ दिन पहले अपने एक आदेश में गंगा नदी को ”जीवित मानव” का दर्जा दिया था। उस नजरिए से देखें तो युगों से यमुना को दिया गया मां का दर्जा बेमतलब नहीं है।
और जब यह दर्जा बेमतलब नहीं है तो यह कथन भी बेमतलब नहीं है कि 2019 का चुनाव कम से कम मथुरा में तो यमुना की लाश पर ही राजनीति करके लड़ा जाना है। यमुना की लाश पर तैरकर ही जयंत चौधरी एकबार फिर चुनावी वैतरणी पार करके लोकसभा पहुंचना चाहते हैं और इसी लाश को ट्यूब की तरह इस्‍तेमाल करके हेमा मालिनी दोबारा जीत का परचम लहराना चाहती हैं। दोनों ने अपने-अपने तरीके से इसकी तैयारी भी शुरू कर दी है, हालांकि अभी न तो महागठबंधन मुकम्‍मल हुआ है और न किसी का टिकट, परंतु इरादे मुकम्‍मल दिखाई दे रहे हैं।
वजह साफ है, और वह वजह यह है कि यदि यमुना को मैया कहने वाले ब्रजवासियों में ही अपनी मैया को लेकर वो दर्द नहीं है जो उसकी दुर्दशा पर राजनीति करने वालों को कोई सबक सिखा सकें तो मात्र चुनाव लड़ने के लिए यमुना का सहारा लेने वालों को दर्द क्‍यों होने लगा।
नेताओं को जब इंसानी लाशों पर राजनीति करने से परहेज नहीं है तो एक नदी की लाश से परहेज कैसा।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

एक मिनट में ‘मैगी’ भले ही न बने, लेकिन ‘हेमा जी’ सीएम बन सकती हैं…कोई शक !

मथुरा की सांसद और बॉलिवुड की स्‍वप्‍न सुंदरी हेमा मालिनी जी ने दो दिन पहले राजस्‍थान के बांसवाड़ा में दावा किया कि वह यदि चाहें तो एक मिनट के अंदर ‘मुख्‍यमंत्री’ बन सकती हैं।
सुन रहे हैं न योगी जी।
हालांकि कुछ लोग कहते हैं कि एक मिनट में तो ‘मैगी’ भी नहीं बन सकती जी…फिर हेमा जी ‘सीएम’ कैसे बन सकती हैं।
मेरा मानना है कि ऐसा कहने वाले विरोधी (भाजपा के नहीं, हेमा जी के) रहे होंगे अन्‍यथा हेमा जी तो हेमा जी हैं, क्‍या नहीं कर सकतीं। गनीमत है उन्‍होंने यह नहीं कहा कि मैं चाहूं तो एक मिनट में ‘पीएम’ बन सकती हूं।
हेमा जी यहीं नहीं रुकीं। उन्‍होंने कहा, लेकिन मैं ऐसा चाहती नहीं हूं क्‍योंकि इससे मेरा “फ्री मूवमेंट” रुक जायेगा। मैं “बंध” जाऊंगी।
यू नो…”बंधन” उन्‍हें पसंद नहीं है। उससे ”आजादी” छिन जाती है।
हेमा जी की बात में तो दम है। उन्‍होंने शादी बेशक की, किंतु शादी के ”बंधन” में कभी नहीं बंधी। ”मूवमेंट” उनका शादी के बाद भी उतना ही ‘फ्री’ रहा, जितना कि शोले में ‘बसंती’ बनकर रहा था।
मथुरा की जनता को भी अब यह बात भली-भंति समझ में आ गई होगी कि उन्‍हें ‘बंधन’ नहीं ‘फ्री मूवमेंट’ पसंद है इसीलिए वह मथुरा की जनता के चाहने से नहीं, अपनी मर्जी से अपने संसदीय क्षेत्र में ‘मूव’ करती हैं।
बहरहाल, मुझे तो योगी जी की चिंता हो रही है। सोच रहा हूं कि ‘गोरखनाथ मठ’ के इंतजामात दुरुस्‍त करवा दूं क्‍योंकि पता नहीं कब हेमा जी चाह बैठें और कब योगी जी की ‘मठ’ वापसी तय हो जाए।
पीएम पद 2019 से पहले वेेकेंट नहीं है और मोदी जी का उसे फिलहाल छोड़ने का इरादा भी नजर नहीं आता क्‍योंकि वह मठ से नहीं हठ से आए थे, इसलिए हेमा जी ने यदि चाह लिया तो योगी जी के पास ‘मठ’ लौटने के अलावा कोई विकल्‍प बचेगा नहीं।
मेरी तो योगी जी को यही सलाह है कि प्रदेश को सुधारने का ख्‍वाब देखना छोड़ो और जैसे भी हो लोकसभा चुनावों तक का समय निकाल लो।
चूंकि 2019 का लोकसभा चुनाव हेमा जी मथुरा से ही दोबारा लड़ने का मन बना चुकी हैं इसलिए हो सकता है कि 2019 में उनकी निगाहें पीएम पद पर जा टिकें। भाजपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकार का पहला पीएम ‘बनारस’ से हो सकता है तो दूसरा ‘मथुरा’ से नहीं हो सकता है क्‍या। ऐसा हुआ तो योगी जी बाकी ढाई-तीन साल और यूपी के ‘मठाधीश’ बने रह सकते हैं।
हेमा जी ने बांसवाड़ा में यह भी बताया कि उन्‍होंने सांसद बनने से पहले भी पार्टी यानी भाजपा के लिए बहुत काम किया था।
जब सांसद बनने का मन किया तो एक मिनट में मथुरा की सांसद बन गईं। इसके बाद चार साल से अनवरत मथुरा का विकास करा रही हैं। मथुरा में यमुना तो वर्षों से बह रही थी किंतु ‘गंगा’…(विकास की) उन्‍होंने लाकर बहा दी।
मथुरा के लिए हेमा जी ‘भागीरथ’ बनकर आईं और भाजपा की जटाओं के माध्‍यम से विकास की गंगा उलझा कर मथुरा में बहा दी। दो दिन की बारिश में पूरे जिले ने देखी है वो विकास की गंगा।
यमुना पर याद आया। हेमा जी ने तो यमुना को प्रदूषण मुक्‍त कराने के भी बहुत प्रयास किए। अपने ‘फ्री मूवमेंट’ में से कुछ समय का ‘बंधन’ स्‍वीकार कर यमुना के किनारे अपने नृत्‍य का कार्यक्रम फिक्‍स किया लेकिन ‘यमुना पुत्रों’ ने एनजीटी से मिलकर उसमें रोड़ा अटका दिया।
‘यमुना पुत्र’ शायद तब नहीं जानते थे कि हेमा जी जिस काम की ठान लें, उसे रोक पाना किसी के बस में नहीं। उन्‍होंने मथुरा की वेटरनरी यूूनिवर्सिटी में न सिर्फ नृत्‍य का झक्‍कास कार्यक्रम किया बल्‍कि यह भी बताया कि यमुना को प्रदूषित करने और रखने में ऐसे ही ‘विघ्न संतोषियों’ का बड़ा हाथ है।
अब जबकि हेमा जी ने इस आशय का रहस्‍योद्घाटन किया है कि वह चाहें तो एक मिनट में मुख्‍यमंत्री बन सकती हैं, तब जाकर समझ में आया कि योगी जी क्‍यों उनके नृत्‍य कार्यक्रम में वेटरनरी यूूनिवर्सिटी दौड़े-दौड़े चले आए थे।
हमें भले ही अब जाकर पता लगा हो किंतु योगी जी तो जानते होंगे न कि हेमा जी जिस ‘मिनट’ चाह लेंगी, उस ‘मिनट’ उनकी ‘मठ’ वापसी हो जाएगी इसलिए बेचारे बरसाने से पहले वेटरनरी पहुंचे।
भाई! किसी को शक हो तो हो, मैगी चाहे दो मिनट से पहले न बनती हो, लेकिन मुझे पूरा विश्‍वास है कि हेमा जी चाह लेंगी तो एक मिनट में “सीएम” (अपने यूपी की) बन ही जायेंगी।
पीएम के काम की उन्‍होंने बांसवाड़ा में तारीफ की है जिससे साफ जाहिर है कि वह पीएम के काम से खुश हैं और पीएम की कुर्सी को 2018 में तो कोई खतरा नहीं है।
2019 की राम जानें। वह हेमा जी के मूड पर निर्भर करता है कि ‘सीएम’ बनना चाहती हैं या ‘पीएम’ बनना।
कुछ लोग यह कहते भी पाये गए हैं कि 2019 में यदि हेमा जी की ‘वन मिनट’ इच्‍छा ने जोर मारा तो संभव है ‘मोदी’ जी की जगह ‘योगी’ जी और योगी जी की जगह ‘हेमा’ जी दिखाई दें। सांसदी का क्‍या है, योगी जी ने भी त्‍यागी थी यूपी की खातिर 2017 में । 2019 में हेमा जी त्‍याग देंगी। वन मिनट…मैं अभी आता हूं। मेरी ‘मैगी’ उबल रही है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

सोमवार, 9 जुलाई 2018

पहले भी हुई हैं जेल के अंदर गैंगवार: अखिलेश राज में मथुरा जिला जेल के अंदर शुरू हुई गैंगवार चली थी 2 दिन

मुन्‍ना बजरंगी की हत्‍या में तो अब तक मिली जानकारी के अनुसार सिर्फ एक असलाह का इस्‍तेमाल हुआ किंतु मथुरा जिला जेल में हुई गैंगवार के दौरान दोनों पक्षों ने आधुनिक हथियार चलाए।

उत्तर प्रदेश में जेल के अंदर गैंगवार की यह पहली घटना नहीं है जिसमें कुख्‍यात माफिया डॉन मुन्‍ना बजरंगी को गोलियों से भून डाला गया। इससे पहले भी जेल के अंदर गैंगवार हुई हैं और उसमें बदमाश भी मारे गए हैं।
17 जनवरी 2015 की दोपहर मथुरा जिला जेल में हुई गोलीबारी में एक गैंग से अक्षय सोलंकी को मौत के घाट उतार दिया गया जबकि दूसरे गैंग से राजकुमार शर्मा, दीपक वर्मा और राजेश ऊर्फ टोंटा घायल हुए थे।
मुन्‍ना बजरंगी की हत्‍या में तो अब तक मिली जानकारी के अनुसार सिर्फ एक असलाह का इस्‍तेमाल हुआ किंतु मथुरा जिला जेल में हुई गैंगवार के दौरान दोनों पक्षों ने आधुनिक हथियार चलाए। पुलिस की कहानी के अनुसार इस गैंगवार में इस्‍तेमाल किए गए नाइन एमएम हथियार बंदी रक्षक कैलाश गुप्‍ता ने पहुंचाए थे। इस गैंगवार के बाद मथुरा जिला जेल से बरामद दोनों हथियार नाइन एमएम (प्रतिबंधित बोर) के थे।
इत्‍तेफाक देखिए कि मुन्‍ना बजरंगी की हत्‍या में भी इसी बोर के हथियार को इस्‍तेमाल किए जाने की बात सामने आ रही है।
दरअसल, मथुरा जिला जेल के अंदर गैंगवार का आगाज़ हाथरस में राजेश टोंटा के घर से शुरू हुआ। जेल के अंदर गैंगवार से कुछ दिन पहले राजेश टोंटा ने अपने घर की तीसरी मंजिल पर पश्‍चिमी उत्तर प्रदेश के कुख्‍यात अपराधी ब्रजेश मावी का धोखे से कत्‍ल करके उसकी लाश को ठिकाने लगा दिया था। राजेश टोंटा और ब्रजेश मावी यूं तो गहरे दोस्‍त थे किंतु बताया जाता है कि उनके बीच किसी जमीन को लेकर रंजिश पनपी और उसी रंजिश के चलते टोंटा ने मावी की बेरहमी से हत्‍या कर दी।
इसी हत्‍या के केस के तहत पुलिस ने राजेश टोंटा को हाथरस से गिरफ्तार किया था और सुरक्षा के मद्देनजर मथुरा कारागार में शिफ्ट किया।
बागपत जिला जेल में हुई मुन्‍ना बजरंगी की हत्‍या से कहीं बहुत आगे मथुरा में तो 17 जनवरी 2015 को जेल के अंदर 1 हत्‍या हो जाने और राजेश टोंटा सहित तीन बदमाशों के घायल हो जाने के बाद दूसरे ही दिन 18 जनवरी को टोंटा को तब गोलियों से भून डाला गया जब उसे इलाज के लिए एंबुलेंस में भारी पुलिस फोर्स के साथ मथुरा की एसएसपी मंजिल सैनी आगरा ले जा रही थीं।
मथुरा के फरह थाना क्षेत्र में नेशनल हाईवे नंबर 2 पर मथुरा-आगरा के बीच पचासों पुलिसकर्मियों के रहते एंबुलेंस के अंदर राजेश टोंटा को गोलियों से भून डाला गया और न तो पुलिस एक भी बदमाश को मौके से पकड़ सकी और न टोंटा के साथ एंबुलेंस में मौजूद कोई पुलिसकर्मी घायल हुआ।
अपराध जगत में राजेश टोंटा के नाम से कुख्‍यात रहे हाथरस निवासी राजेश शर्मा की पत्‍नी कनक शर्मा ने अपने पति की हत्‍या का आरोप मथुरा की महिला एसएसपी मंजिल सैनी पर लगाया। कनक शर्मा ने इस मामले में बाकायदा मथुरा के थाना फरह को इस आशय की तहरीर दी। तहरीर के मुताबिक राजेश टोंटा की हत्‍या का सौदा एसएसपी मंजिल सैनी ने 3 करोड़ की मोटी रकम लेकर किया था।
कनक शर्मा द्वारा इस मामले में ब्रजेश मावी के अवकाश प्राप्‍त पुलिस ऑफीसर पिता राजेन्‍द्र सिंह, मावी की पत्‍नी सीमा, विनोद चौधरी एवं प्रमोद चौधरी पुत्रगण पुरुषोत्तम सिंह निवासीगण सी-18 हरीनगर कृष्णानगर मथुरा और एसएसपी मंजिल सैनी शामिल बताए गए।
कुल मिलाकर यदि ये कहा जाए कि उत्तर प्रदेश की जेलें हर दौर में कुख्‍यात अपराधियों के लिए सजा का ठिकाना न होकर संरक्षण के केंद्र रही हैं तो कुछ गलत नहीं होगा। राज चाहे आज योगी का हो अथवा अखिलेश, मुलायम या मायावती का।
भाजपा के सहयोग से सरकार चला रहीं मायावती के शासनकाल में 1995 के दौरान भी मथुरा जिला कारागार के अंदर वाले गेट पर हुई गोलीबारी में किशन पुटरो के साथ जेल के एक सफाईकर्मी की भी हत्‍या गोलियां बरसाकर कर दी गई थी।
कहने का आशय यह है कि उत्तर प्रदेश की कानून-व्‍यवस्‍था एक लंबे समय से बदहाल है। यह बात अलग है कि जिस तरह आज योगी आदित्‍यनाथ पहले से बेहतर कानून-व्‍यवस्‍था होने का दावा करते हैं, उसी तरह मायावती और अखिलेश भी अपने-अपने समय में कानून का राज होने का दावा करते रहे थे किंतु सच्‍चाई यही है जो मुन्‍ना बजरंगी की हत्‍या से सामने आई है या राजेश टोंटा एवं अक्षय सोलंकी की हत्‍या से सामने आई थी।
अखिलेश राज में हुआ जवाहर बाग कांड भी इसी बदहाल कानून-व्‍यवस्‍था का उदाहरण बना था। तब मथुरा के सरकारी जवाहर बाग को राजनीतिक संरक्षणप्राप्‍त माफिया रामवृक्ष यादव से खाली कराने गए एसपी सिटी और एसओ को भारी पुलिसबल की मौजूदगी में मार दिया गया।
सच तो यह है कि सरकारें आती जाती रहती हैं लेकिन कानून-व्‍यवस्‍था जस की तस रहती है। निश्‍चित ही इसके लिए वो व्‍यवस्‍था दोषी है जिसके कारण पुलिस-प्रशासन का पूरी तरह राजनीतिकरण हो चुका है। जाहिर है कि जब तक पुलिस-प्रशासन के इस राजनीतिकरण को खत्‍म नहीं किया जाता तब तक न सड़क पर अपराध कम होंगे और न जेल के अंदर।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

रविवार, 1 अप्रैल 2018

अपनी ही सरकार से पूर्व विधायक की गुहार: अरबों रुपए मूल्‍य की सरकारी जमीन पर काबिज हैं सफेदपोश भूमाफिया, कुछ कीजिए

मथुरा। भाजपा की टिकट पर दो बार विधायक रहे अजय कुमार पोइया अब अपनी ही सरकार से गुहार लगा रहे हैं कि सफेदपोश भूमाफियाओं ने भगवान श्रीकृष्‍ण की नगरी में अरबों रुपए मूल्‍य की सरकारी जमीन पर कब्‍जा कर रखा है, कुछ कीजिए।
भूमाफियाओं ने ग्राम सभा सराय आजमाबाद, तहसील व जिला मथुरा की बेशकीमती जमीन फर्जी पट्टों के जरिए बेच खाई है। सफेदपोश भूमाफियाओं ने वनखण्‍ड और चारागाह तक को नहीं छोड़ा और राजस्‍व विभाग की मिलीभगत से उनके भी बैनामे तथा रजिस्‍ट्री करा दीं।
लगभग 15 साल से एकतरफा कानूनी लड़ाई लड़ रहे पूर्व विधायक अजय कुमार पोइया को वर्ष 2009 में तब उम्‍मीद की किरण दिखाई दी थी जब राजस्‍व परिषद उत्तर प्रदेश के तत्‍कालीन आयुक्‍त व सचिव संजीव दुबे ने तत्‍कालीन प्रमुख सचिव उत्तर प्रदेश शैलेश कृष्‍ण को बाकायदा पत्र लिखकर यह जमीन सफेदपोश भूमाफियाओं के चंगुल से निकालने और अनियमित आवंटन में शामिल दोषी अधिकारियों व कर्मचारियों सहित लाभान्‍वित व्‍यक्‍तियों के खिलाफ वैधानिक कार्यवाही करने की संस्‍तुति की थी, किंतु नजीता कुछ नहीं निकला।
पूर्व विधायक अजय कुमार पोइया द्वारा इसी महीने में 11 मार्च 2018 को मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ के लिए प्रेषित पत्र के अनुसार शासन के निर्देश पर गठित राजस्‍व परिषद के अधिकारियों की एक टीम ने उनकी शिकायत पर मथुरा में अरबों रुपए मूल्‍य की सरकारी जमीन का बंदरबांट करने की जांच की थी।
जांच कमेटी ने अपनी विस्‍तृत आख्‍या में इस बात की पुष्‍टि की कि बहुमूल्‍य सरकारी जमीन को सफेदपोश भूमाफियाओं ने औने-पौने दाम में बेच दिया है अत: सभी दोषी और लाभान्‍वित व्‍यक्‍तियों को चिन्‍हित कराकर उनके विरुद्ध कानूनी कार्यवाही की जानी चाहिए।
पूर्व विधायक अजय कुमार पोइया ने मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ को पत्र लिखकर अवगत कराया है कि करीब 15 वर्ष पूर्व उन्‍होंने नेशनल हाईवे नंबर 2 पर स्‍थित गोकुल रेस्‍टोरेंट से लेकर मसानी क्षेत्र तक की इस सरकारी जमीन को मुक्‍त कराने के लिए संघर्ष शुरू किया था किंतु शासन स्‍तर से गठित जांच कमेटी की संस्‍तुति एवं सरकारी निर्देशों के बावजूद जिला प्रशासन ने आज तक कोई कार्यवाही नहीं की है लिहाजा मजबूरीवश उन्‍होंने एक ओर जहां धारा 133 के तहत कार्यवाही प्रारंभ की है वहीं दूसरी ओर इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय की शरण भी ली है। इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय में जनहित याचिका संख्‍या 11824/2010 के रूप में यह लंबित है।
पूर्व विधायक ने मुख्‍यमंत्री को अवगत कराया है कि आपकी सरकार द्वारा भी राजस्‍व विभाग की इस जमीन को मुक्‍त कराने के लिए सूचीबद्ध किया गया है किंतु सफेदपोश भूमाफियाओं के प्रभाव में जिला प्रशासन चुप्‍पी साधे बैठा है।
भाजपा नेता और पूर्व विधायक पोइया के अनुसार पहले नगर पालिका और अब नगर निगम क्षेत्र की इस अति मूल्‍यवान जमीन के फर्जी पट्टे बनाकर श्‍याम पुत्र बदले निवासी सराय आजमाबाद ने स्‍वयं अपने परिजनों तथा दूसरे लोगों के नाम बैनामे करा दिए तथा वनखण्‍ड, चारागाह एवं वृक्षारोपण की जमीन पर भूमाफियाओं का कब्‍जा करा दिया, जो एक राष्‍ट्रद्रोही कृत्‍य है।
इस पूरे प्रकरण का एक आश्‍चर्यजनक पहलू यह है कि भाजपा नेता और पूर्व विधायक अजय कुमार पोइया ने अरबों रुपए मूल्‍य की सरकारी जमीन को अवैध रूप से खुर्द-बुर्द करने का मास्‍टर माइंड जिस श्‍याम पुत्र बदले को बताया है, वह भी भाजपा नेता और पूर्व विधायक श्‍याम अहेरिया हैं। हालांकि श्‍याम अहेरिया पूर्व में समाजवादी पार्टी ज्‍वाइन करके अपने पुत्र को दर्जा प्राप्‍त मंत्री का सुख दिलवा चुके हैं।
अजय पोइया की शिकायत और राजस्‍व विभाग की जांच कमेटी के अनुसार विभागीय अधिकारियों एवं कर्मचारियों की मिलीभगत से कौड़ियों के दाम बेची गई इस बहुमूल्‍य सरकारी जमीन पर फिलहाल होटल ड्यूक पैलेस, होटल विंग्‍सटन के साथ-साथ डॉ. शीला शर्मा मैमोरियल चैरिटेबल ट्रस्‍ट द्वारा संचालित कैंसर हॉस्‍पीटल खड़ा है।
इनके अलावा एक टाट फैक्‍ट्री, मकान, दुकानें, प्‍लॉट्स, अन्‍य फैक्‍ट्रियां, मैरिज होम्‍स, गैस्‍ट हाउसेज तथा दूसरे कई ऐसे प्रमुख होटल भी इन जमीनों पर बन चुके हैं जिनकी रजिस्‍ट्रियां विभिन्‍न नामों से कराई गई थीं।
भूमाफियाओं ने स्‍थानीय सरकारी कर्मचारियों को अपने कारनामे में शामिल करने के लिए मथुरा कलेक्‍ट्रेट कर्मचारी सहकारी गृह निर्माण समिति बनाकर उसके नाम से भी जमीन आवंटित कर दी जबकि इस नाम की कोई समिति लिखा-पढ़ी में है ही नहीं।
यूं भी इस सरकारी जमीन के कई हिस्‍से तो कई-कई बार बिक चुके हैं और उन पर अब मूल खरीदारों की जगह दूसरे लोग काबिज हैं तथा उनके द्वारा स्‍थापित उद्योग व व्‍यापार चल रहे हैं।
अजय कुमार पोइया ने मुख्‍यमंत्री को प्रेषित पत्र के तहत लिखा है कि ऐसे में जबकि प्रदेश एवं केंद्र सरकार की तमाम योजनाओं के लिए भूमि की अत्‍यधिक आवश्‍यकता है और भूमि उपलब्‍ध न होने के कारण इन योजनाओं का क्रियान्‍वयन नहीं हो पा रहा, तब शासन अपनी जमीन को सफेदपोश भूमाफियाओं के कब्‍जे से मुक्‍त कराकर जनहितकारी योजनाएं प्रारंभ कर सकता है अन्‍यथा की स्‍थिति में न्‍यायालय का निर्णय ही अंतिम विकल्‍प रह जाएगा किंतु तब इसका श्रेय सरकार नहीं ले सकेगी।
गौरतलब है कि गोकुल रेस्‍टोरेंट से मसानी तक की यह जमीन आज शहर के पॉश इलाकों में शुमार है क्‍योंकि इस क्षेत्र में न केवल कई अच्‍छे होटल, गेटबंद कॉलोनियां, उद्योग व व्‍यापारिक प्रतिष्‍ठान, मैरिज होम्‍स, हॉस्‍पीटल्‍स, गेस्‍ट हाउस बन चुके हैं।
आज यहां जमीन का सर्किल रेट भी इतना अधिक है कि जनसामान्‍य तो खरीदने का स्‍वप्‍न भी नहीं देख सकता।
मजे की बात यह है कि ग्राम सभा सराय आजमाबाद की अवैध रूप से आवंटित अरबों रुपए मूल्‍य की जमीन पर दुकानों से लेकर मकान और होटलों व अस्‍पतालों से लेकर फैक्‍ट्रियों एवं मैरिज होम्‍स तथा कॉलोनियों तक के निर्माण का नक्‍शा मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के अधिकारी आंखें बंद करके पास करते रहे जबकि राजस्‍व विभाग की टीम वर्ष 2008 में ही अपनी जांच आख्‍या प्रस्‍तुत कर दोषियों एवं लाभार्थियों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही कर जमीन को अवैध कब्‍जे से मुक्‍त कराने की संस्‍तुति कर चुकी थी।
अब देखना यह है कि भूमाफियाओं के खिलाफ सख्‍त कदम उठाने का ढिंढोरा पीटने वाली योगी आदित्‍यनाथ के नेतृत्‍व वाली भाजपा सरकार अपनी ही पार्टी के नेता व पूर्व विधायक अजय पोइया की शिकायत के आधार पर और शासन द्वारा गठित जांच कमेटी की संस्‍तुति के मद्देनजर अपनी ही पार्टी के आरोपी नेता व पूर्व विधायक श्‍याम अहेरिया द्वारा किए गए कारनामे को लेकर क्‍या कदम उठाती है ?
देखना यह भी होगा कि ताकतवर से ताकतवर माफियाओं पर कानून सम्‍मत कार्यवाही करने की बात करने वाली योगी सरकार क्‍या उन लाभार्थियों के खिलाफ कार्यवाही कर अरबों रुपए मूल्‍य की सरकारी जमीन को मुक्‍त करा पाती है जो किसी न किसी स्‍तर पर हर सरकार की नाक के बाल बने रहते हैं और जिनके खिलाफ कार्यवाही करने की हिमाकत करने वाले अधिकारियों को या तो तबादला झेलना पड़ता है या अपनी जान गंवाकर ”जवाहरबाग कांड” का हिस्‍सा बनना पड़ता है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

शनिवार, 10 मार्च 2018

क्‍या आप मथुरा के नीरव मोदियों और मेहुल चौकसियों को जानते हैं, नहीं जानते तो जान लें…

बैंक ऑफिशियल्स की सांठगांठ से देश तथा देशवासियों को हजारों करोड़ रुपयों का चूना लगाने वाले नीरव मोदी और मेहुल चौकसी जैसे सफेदपोश फ्रॉड सिर्फ महानगरों में ही नहीं है, ऐसे कई फ्रॉड मथुरा जैसी विश्‍व प्रसिद्ध धार्मिक नगरी में भी हैं।
विश्‍वस्‍त सूत्रों और विभिन्न बैंकों से प्राप्‍त जानकारी के अनुसार मथुरा जनपद में करीब एक दर्जन ऐसे फ्रॉड हैं जिन्‍होंने हजारों करोड़ रुपया लेकर अब तक लौटाने का न तो नाम लिया है और ना ही उनकी इस रकम को लौटाने की कोई मंशा है।
सूत्रों के मुताबिक बैंकों को चूना लगाने वाले स्‍थानीय कारोबारियों में एक ओर जहां रीयल एस्‍टेट से जुड़े कुछ लोग हैं वहीं दूसरी ओर शिक्षा व्‍यवसायी भी शामिल हैं।
इसके अलावा टोंटी कारोबारी, एक नामचीन हॉस्‍पीटल तथा ब्रांडेड आभूषणों के व्‍यापारी ने भी बैंक से लिया हुआ कर्ज नहीं लौटाया है। कई होटल व्‍यवसायी भी बैंकों का पैसा हड़पे बैठे हैं और अब तक संबंधित बैंक ऑफिशियल्स को ऑब्‍लाइज करके काम चलाने में सफल रहे हैं।
बताया जाता है कि मथुरा की एक यूनिवर्सिटी पर ही अकेले सैकड़ों करोड़ का बैंक कर्ज है किंतु उसे कर्ज देने वाली बैंकों के अधिकारी फिलहाल मुंह सिलकर बैठे हैं।
गौरतलब है कि फिलहाल मथुरा जनपद और विशेष तौर पर मथुरा की सीमा में आने वाला नेशनल हाईवे नंबर दो, शिक्षा के क्षेत्र का एक हब बना हुआ है।
इसके अलावा भी मथुरा-भरतपुर रोड, मथुरा-हाथरस-अलीगढ़ रोड, मथुरा-गोवर्धन रोड तथा मथुरा-वृंदावन रोड पर तमाम शिक्षण संस्‍थाएं संचालित हैं।
शिक्षा के व्‍यवसाय में भारी प्रतिस्‍पर्धा के देखते हुए इससे जुड़े लोगों ने अपने संस्‍थानों को आधुनिक बनाने के नाम पर बैंकों से भारी-भरकम कर्ज ले रखा है किंतु उसे लौटाने की कोई नीयत नजर नहीं आती।
सूत्रों की मानें तो इन लोगों ने बैंकों की रकम का भारी दुरुपयोग किया है। यानि जिस काम के लिए कर्ज लिया गया था, वहां न लगाकर मोटा मुनाफा कमाने के लिए रीयल एस्‍टेट में निवेश कर दिया गया क्‍योंकि शिक्षा के क्षेत्र में अवैध वसूली करना आसान नहीं रहा।
रही-सही कसर 2016 में हुई नोटबंदी और फिर 2017 में आए जीएसटी ने पूरी कर दी। इन दोनों बड़े सरकारी कदमों ने काफी हद तक नंबर दो के लेन-देन को प्रभावित किया लिहाजा दोनों ही जगह कर्ज की रकम फंस कर रह गई।
इसी प्रकार रीयल एस्‍टेट के कई बड़े कारोबारियों पर न केवल बैंकों का भारी कर्ज फंसा हुआ है बल्‍कि ये लोग तमाम दूसरे लोगों और निवेशकों का भी मोटा पैसा हड़पे बैठे हैं। पूर्व में एक रीयल एस्‍टेट कारोबारी के यहां तो देनदारों ने काफी हंगामा काटा था और तब जैसे-तैसे इसने कुछ समय की मोहलत देकर अपना पीछा छुड़ाया।
रीयल एस्‍टेट का कारोबार हमेशा से नंबर दो की रकम खपाने में सबसे ऊपर रहा है और इसमें पैसा लगाकर कई लोगों ने बुलंदियों को छुआ भी है, किंतु जब से यह कारोबार सरकार की टेढ़ी नज़र का शिकार हुआ है तब से इसके कारोबारियों की असलियत छन-छन कर सामने आने लगी है।
देश के नामचीन रीयल एस्‍टेट कारोबारियों पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा कसा गया शिकंजा यह जानने के लिए पर्याप्‍त है कि किस तरह इन लोगों ने सारी हवा सरकारी पैसों से ही बना रखी थी।
बैंकों से जुड़े सूत्रों के मुताबिक बहुत से #NPA (Non-Performing Asset) मात्र इसलिए खड़े हुए क्‍योंकि कर्ज लेने वालों ने एक बहुत बड़ी रकम कारोबार पर खर्च न करके अपने शौक-मौज पर खर्च की।
यही कारण है कि जिस शहर में कभी कारों की संख्‍या उंगलियों पर गिनी जा सकती थी, आज वहां ऑडी तथा बीएमडब्‍ल्‍यू और मर्सडीज कारों की कोई कमी नहीं है।
बैंकों का पैसा हड़प कर बैठे लोगों की शानो-शौकत का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि ये और इनकी औलादें शॉपिंग के लिए भी अब्रॉड जाती हैं। पारिवारिक काय्रक्रमों में ही नहीं, निजी पार्टियों में भी पानी की तरह पैसा बहाते इन्‍हें आसानी से देखा जा सकता है।
ऋण लेकर घी पीने की मानसिकता वाले ये लोग देश के महानगरों में जाकर तो अय्याशी करते ही हैं, साथ ही अपना उद्देश्‍य पूरा करने के लिए एक-एक लाख रुपए प्रति नाइट वसूलने वाली ‘कॉलगर्ल्‍स’ को भी यहां बुलाते हैं। ये ‘कॉलगर्ल्‍स’ फिर उन लोगों को मुहैया कराई जाती हैं, जिनसे ‘आउट ऑफ द वे’ जाकर काम कराना होता है।
आम आदमी को शायद यह जानकर आश्‍चर्य होगा कि शहर के कुछ सफेदपोश लोग तो सुरा एवं सुंदरी के जरिए मुश्‍किल से मुश्‍किल टास्‍क पूरा करने के विशेषज्ञ बन चुके हैं और ये लोग उस वर्ग की नाक के बाल बने हुए हैं जिसे कथित रूप से शहर की शान माना जाता है। जिनकी तरक्‍की के उदाहरण प्रस्‍तुत किए जाते हैं।
जहां तक सवाल उन बैंकों का है जिनका पैसा ये सफेदपोश फ्रॉड दबाए बैठे हैं तो उनमें स्‍टेट बैंक ऑफ इंडियापंजाब नेशनल बैंकसिंडीकेट बैंक, बैंक ऑफ इंडिया, बैंक ऑफ बड़ोदाइंडियन ओवरसीज बैंकइलाहाबाद बैंकयूनियन बैंकओरियंटल बैंक ऑफ कॉमर्स सहित आईसीआईसीआईएचडीएफसी तथा एक्‍सिस बैंक शामिल हैं।
इन बैंक के अधिकारियों की सफेदपोश बेईमानों से सांठगांठ इस कदर है कि बैंक अधिकारी इनके बारे में कोई जानकारी नहीं देते और न यह बताकर देते हैं कि उनका इस जनपद में कुल NPA आखिर है कितना।
अब देखना यह है कि विजय माल्‍या और ललित मोदी के बाद नीरव मोदी, मेहुल चौकसी तथा कोठारी पिता-पुत्रों की कारगुजारियां सामने आने पर भी बैंकें मथुरा के धोखेबाजों पर कब व कितना शिकंजा कसती हैं। कसती भी हैं या उनके भाग जाने का इंतजार करती हैं।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

गुरुवार, 5 अक्टूबर 2017

कहीं आप भी तो नहीं हैं किसी “वैध” कॉलोनी के “अवैध” मकान मालिक ?

कहीं आप भी तो किसी ”वैध” कॉलोनी के ”अवैध” मकान मालिक नहीं हैं ?

हो सकता है कि यह प्रश्‍न आपको कुछ अजीब लग रहा हो, या आप सोचने लगे हों कि यदि कॉलोनी ”वैध” है तो मकान ”अवैध” कैसे हो सकता है ?

यदि आप यह सोच रहे हैं तो जान लीजिए कि ऐसा हो सकता है। साथ ही यह भी हो सकता है कि बिल्‍डर को लाखों रुपए देकर जिस मकान को आप अपना समझ रहे हैं वह कल किसी कोर्ट के आदेश पर ध्‍वस्‍त कर दिया जाए और आपकी जिंदगी भर की जमा पूंजी सहित वो पैसा भी डूब जाए जिसे आपने इस कथित वैध मकान को खरीदने के लिए बैंक या फिर साहूकार से कर्ज ले रखा हो।
ऐसी स्‍थिति में मकान तो आपका रहेगा नहीं, ऊपर से आप जिंदगीभर उस कर्ज के बोझ तले दबे रहेंगे जिसे लेकर आपने अपने लिए एक अदद आशियाने का सपना संजोया था।
वैसे तो रियल एस्‍टेट कंपनियों ने यह खेल पूरे उत्तर प्रदेश में बड़े पैमाने पर खेला है किंतु बात करें विश्‍व विख्‍यात धार्मिक जिले मथुरा की तो यहां भी ऐसे बिल्‍डर्स की कोई कमी नहीं है जिन्‍होंने अपने प्रोजेक्‍ट के किसी एक हिस्‍से का नक्‍शा पास कराकर उसमें सैकड़ों अवैध मकान, बंगले और फ्लैट बनाकर बेच दिए हैं।
नेशनल हाई-वे नंबर दो पर बने मल्‍टीस्‍टोरी प्रोजेक्‍ट्स में नियम-कानून की किस कदर धज्जियां उड़ाई गई हैं, इन्‍हें मौके पर जाकर ही समझा जा सकता है। यहां न तो नियम के मुताबिक पार्किंग की जगह छोड़ी गई है और न पार्क बनाए हैं। आग लगने की स्‍थिति में फायर ब्रिगेड की एक गाड़ी इनके अंदर मूव नहीं कर सकती जबकि सैकड़ों फ्लैट खड़े कर दिए गए हैं। भूकंप जैसी किसी प्राकृतिक आपदा के लिए यहां सिर छिपाने की कोई व्‍यवस्‍था नहीं है, और न किसी इमारत में भूकंपरोधी कोई इंतजाम किए गए हैं। हजारों जिंदगियां भगवान भरोसे रह रही हैं क्‍योंकि डेवलपमेंट अथॉरिटी चुप्‍पी साधे बैठी है।
रियल एस्‍टेट कंपनियों के इस खेल में तमाम वो सरकारी विभाग भी शामिल हैं जिनमें ऊपर से नीचे तक भ्रष्‍टाचार व्‍याप्‍त है और वो बैंकें भी लिप्‍त हैं जो बिल्‍डर्स से ऑब्‍लाइज होकर उनके एक इशारे पर कुछ भी करने को तत्‍पर रहती हैं।
दरअसल, रियल एस्‍टेट कंपनियों और बिल्‍डर्स का यह खेल वहीं से शुरू हो जाता है जहां से किसी प्रोजेक्‍ट का नक्‍शा पास कराने की प्रक्रिया शुरू होती है। कोई भी रियल एस्‍टेट कंपनी या बिल्‍डर कभी अपने पूरे प्रोजेक्‍ट का नक्‍शा एकसाथ पास नहीं कराता क्‍योंकि पूरे प्रोजेक्‍ट का एकसाथ नक्‍शा पास कराने के लिए उसे प्रोजेक्‍ट का एकमुश्‍त डेवलपमेंट चार्ज भी जमा कराना होता है। प्रोजेक्‍ट के किसी छोटे से हिस्‍से का नक्‍शा पास कराकर वह उसका प्रचार-प्रसार शुरू कर देता है और उसके नाम पर पैसा इकठ्ठा करने लगता है।
इस प्रक्रिया में नगर पालिका, नगर पंचायत, जिला पंचायत तथा अग्‍निशमन विभाग आदि भी रियल एस्‍टेट कंपनियों तथा बिल्‍डर्स को नियम विरुद्ध एनओसी देकर मदद करते हैं।
विकास प्राधिकरण से एकबार नक्‍शा पास हो जाने पर यह मान लिया जाता है कि सबकुछ जायज है लिहाजा रियल एस्‍टेट कंपनियों और बिल्‍डर्स को मनमानी करने की पूरी छूट मिल जाती है।
बताया जाता है कि मथुरा जनपद में नेशनल हाई-वे नंबर दो से लेकर वृंदावन, और गोवर्धन तक ऐसे प्रोजेक्‍ट्स की भरमार है जिनमें विकास प्राधिकरण से एप्रूव्‍ड नक्‍शे के अलावा सैकड़ों मकान फर्जी तरीके से बनाकर खड़े कर दिए गए।
किसी प्रोजेक्‍ट में चार टावर का अप्रूवल लेकर छ: टावर खड़े कर दिए गए तो किसी में अवैध व्‍यापारिक कॉम्‍पलेक्‍स बना दिए गए। किसी प्रोजेक्‍ट में ”प्रस्‍तावित” नक्‍शे के आधार पर ही पूरा निर्माण करा दिया गया तो किसी में मॉरगेज प्‍लॉट पर भी मकान खड़े कर दिए गए।
भ्रष्‍टाचार की नींव पर खड़े किए गए इन मकान और दुकानों का आलम यह है कि कहीं-कहीं तो ग्राम समाज की जमीन इसके लिए इस्‍तेमाल कर ली गई है और कहीं नहर, नाले व बंबों को पाटकर फ्लैट खड़े कर दिए गए हैं।
आश्‍चर्य की बात यह है कि वैध कॉलोनियों में बने ऐसे अवैध मकानों में आज अनेक लोग रह रहे हैं और दुकानों में कारोबार शुरू हो गया है लेकिन इन रहने वालों तथा कारोबार करने वालों को पता तक नहीं कि उनके ऊपर हर पल एक नंगी तलवार लटक रही है।
जहां तक सवाल विकास प्राधिकरण का है तो उसके अधिकारी और कर्मचारी पूरी मलाई मारकर अब तमाशबीन बने हुए हैं क्‍योंकि 01 मई 2017 से ”रियल एस्‍टेट रेगुलेशन एक्‍ट” अर्थात RERA लागू होने के बाद से उनके लिए भी काले को सफेद करना इतना आसान नहीं रह गया।
यह बात अलग है कि विकास प्राधिकरण, बिल्‍डर्स के अधिकांश काले कारनामों की ओर से अब भी आंखें फेरे बैठा है और कार्यवाही के लिए ऐसी अथॉरिटी के आदेश-निर्देश का इंतजार कर रहा है जिसके बाद वह आराम से यह कह सके कि अब हमारे हाथ में कुछ रहा ही नहीं।
रियल एस्‍टेट रेगुलेशन एक्‍ट के अनुसार अब किसी भी रियल एस्‍टेट कंपनी या बिल्‍डर को प्रोजेक्‍ट के गेट पर प्रोजेक्‍ट का पूरा ”ले-आउट” संबंधित अथॉरिटी से पास नक्‍शे सहित लगाना अनिवार्य है, जिससे खरीदार को पता लग सके कि उसके प्रोजेक्‍ट में कितनी तथा कौन-कौन सी इकाइयां पास हैं और उनका निर्माण कितने समय में पूरा हो जाएगा।
चूंकि यह नियम निर्माणाधीन प्रोजेक्‍ट सहित सभी पुराने प्रोजेक्‍ट्स पर भी लागू किया गया है इसलिए पूरे हो चुके प्रोजेक्‍ट भी इस दायरे में आते हैं, लेकिन अब तक किसी ऐसे प्रोजेक्‍ट पर बाहर नक्‍शा चस्‍पा नहीं किया गया और ना ही डेवलपमेंट अथॉरिटी ने किसी प्रोजेक्‍ट पर इसे लेकर कोई कार्यवाही की है।
इसी प्रकार रियल एस्‍टेट के हर कारोबारी, ग्रुप या कंपनी को RERA के तहत अपना रजिस्‍ट्रेशन कराना अनिवार्य है और उस रजिस्‍ट्रेशन की जानकारी के साथ प्रोजेक्‍ट की वेबसाइट पर पैसे का पूरा ब्‍यौरा भी दिया जाना जरूरी है किंतु यहां तो कई नामचीन बिल्‍डर्स ने अब तक न RERA में रजिस्‍ट्रेशन कराया है और ना ही उनकी कोई वेबसाइट है। इन हालातों में उनसे ब्‍यौरा उपलब्‍ध कराने की उम्‍मीद भी कैसे की जा सकती है।
इस पूरे घपले-घोटाले का एक महत्‍वपूर्ण पहलू किसी प्रॉपर्टी की रजिस्‍ट्री कराने में छिपा है क्‍योंकि रजिस्‍ट्री कार्यालय को सिर्फ और सिर्फ मतलब है तो रैवेन्‍यू वसूलने से, बाकी कौन कितना काला-पीला करता है, इससे उसे कोई वास्‍ता नहीं।
उसका सारा फोकस रजिस्‍ट्री के लिए जरूरी स्‍टांप लगवाने तथा उसमें हेर-फेर के लिए सुविधा शुल्‍क वसूलने तक सीमित है, बाकी जिम्‍मेदारी क्रेता तथा विक्रेता की है क्‍योंकि जब भी फंसते हैं तो वही फंसते हैं। रजिस्‍ट्री विभाग अपना पल्‍लू झाड़कर खड़ा हो जाता है।
यही कारण है कि रियल एस्‍टेट के कारोबारी पहले भी खरीदारों को बड़े इत्‍मीनान से लूटते रहे और आज भी लूट रहे हैं क्‍योंकि RERA लागू होने के बावजूद डेवलपमेंट अथॉरिटी ने नए कानून पर अमल करना शुरू नहीं किया है।
अथॉरिटी से शायद ही किसी नामचीन बिल्‍डर को अब तक RERA के तहत रजिस्‍ट्रेशन न कराने, वेबसाइट न बनवाने, नक्‍शा प्रदर्शित न करने तथा खरीदारों से प्राप्‍त रकम का ब्‍यौरा न देने पर नोटिस जारी किया गया हो।
डेवलपमेंट अथॉरिटी की इस ढील का कुछ बिल्‍डर तो भरपूर फायदा उठा रहे हैं और अब भी ऐसी इकाइयों को बेच रहे हैं जिनके नक्‍शे तक पास नहीं कराए गए।
ठीक इसी प्रकार अधिकांश पॉश कॉलोनियों में बिना नक्‍शा पास कराए दो से चार मंजिल तक का निर्माण कार्य अपनी मनमर्जी से करा लिया गया है लेकिन न कोई रोकने वाला है और न टोकने वाला। इस स्‍थिति में सरकार को तो राजस्‍व की बड़ी हानि हो ही रही है, साथ ही कॉलोनियों की वैधता पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।
विकास प्राधिकरण की भ्रष्‍ट तथा लचर कार्यप्रणाली का ही परिणाम है कि रियल एस्‍टेट के बहुत से करोबारी आम जनता का अरबों रुपया अब भी दबाकर बैठे हैं और उनके नीचे फंसे लोग किसी तरह अपनी जान छुड़ाने के प्रयास में हैं।
कोई कोर्ट कचहरी के चक्‍कर लगा रहा है तो कोई पुलिस से उम्‍मीद पाले बैठा है किंतु समस्‍या यह है कि बिना ठोस लिखा-पढ़ी के उनके लिए बिल्‍डर्स से निपटना आसान नहीं है।
हाल ही में नोएडा विकास प्राधिकरण ने कई नामचीन रियल एस्‍टेट कंपनी के सैकड़ों फ्लैट्स को अवैध घोषित कर दिया है। ये वो फ्लैट्स हैं जिनका पूरा पैसा बिल्‍डर्स की जेब में पहुंच चुका है। शासन-प्रशासन तक इन बिल्‍डर्स के सामने असहाय है क्‍योंकि वह अपने हाथ खड़े करने को तैयार बैठे हैं। कोर्ट में भी उन्‍होंने अपनी आर्थिक बदहाली का रोना रोकर राहत पाने की कोशिश की थी, हालांकि कोर्ट ने उनके घड़ियालू आंसुओं पर तवज्‍जो नहीं दी।
नोएडा डेवलेपमेंट अथॉरिटी इन नामचीन बिल्‍डर्स से कैसे निपटेगी और कैसे उन हजारों लोगों को राहत पहुंचाएगी जो इनके नीचे अपनी तमाम पूंजी फंसा बैठे हैं, यह प्रश्‍न तब गौण हो जाता है जब पता लगता है कि यहां सवाल सिर्फ दिल्‍ली से सटे नोएडा का नहीं है, सवाल मथुरा जैसे छोटे किंतु विश्‍व प्रसिद्ध धार्मिक शहरों का भी है जहां न केवल स्‍थानीय लोग ऐसे बिल्‍डर्स का शिकार बन रहे हैं बल्‍कि बाहरी लोग भी इनके शिकंजे में फंसे हुए हैं। उन्‍हें नहीं पता कि जिस प्रोजेक्‍ट को वैध समझकर उन्‍होंने मुंहमांगे दामों पर मकान या फ्लैट खरीदा है, उस प्रोजेक्‍ट के अंदर ही अवैध निर्माण कराकर उन्‍हें लूटा गया है।
इससे भी अधिक आश्‍चर्य तब होता है जब पता लगता है कि स्‍थानीय डेवलपमेंट अथॉरिटी की मिलीभगत तथा उसकी भ्रष्‍ट कार्यप्रणाली के चलते लूट का यह सिलसिला अब भी जारी है और ”रियल एस्‍टेट रेगुलेशन एक्‍ट” अर्थात RERA जैसा सख्‍त कानून भी फिलहाल तो ताक पर रखा हुआ है।
बताया जाता है कि हाल ही मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण की कमान संभालने वाली महिला आईएएस अधिकारी को विभाग की कार्यप्रणाली सुधारने के लिए खासे पापड़ बेलने पड़ रहे हैं किंतु विभागीय कर्मचारी हैं कि सुधरने का नाम नहीं ले रहे क्‍योंकि उन्‍हें पहले से चली आ रही अतिरिक्‍त कमाई पर आंच आना मंजूर नहीं। फिर चाहे बिल्‍डर किसी को लूटें या लुटे हुओं को ठेंगा दिखाकर खुलेआम रियल एस्‍टेट रेगुलेशन एक्‍ट को चुनौती दें।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

शनिवार, 16 सितंबर 2017

स्‍टिंग ऑपरेशन में मथुरा के कृष्‍ण मोहन मेडिकल कॉलेज पर बड़ा खुलासा: डीबार होने के बावजूद रिश्‍वत लेकर एडमीशन देने का काम जारी

मथुरा के पाली डूंगरा में सौंख रोड पर स्‍थित कृष्‍ण मोहन मेडिकल कॉलेज का बड़ा घपला सामने आया है। एक न्‍यूज़ चैनल द्वारा किए गए स्‍टिंग ऑपरेशन से पता चलता है कि वर्ष 2017-18 और वर्ष 2018-19 यानि दो वर्ष के लिए कृष्‍ण मोहन मेडिकल कॉलेज को मिनिस्‍ट्री ऑफ हेल्‍थ एंड फैमिली वेलफेअर से डीबार कर दिए जाने के बावजूद उसका मैनेजमेंट रिश्‍वत लेकर एडमीशन लेने के लिए तैयार था।
यही नहीं, जब न्‍यूज़ चैनल के रिपोर्टर ने स्‍टुडेंट का परिजन बनकर एडमीशन कन्‍फर्म करने का जवाब घर पर बात करने के बाद अगले हफ्ते देने की बात कही तो मैनेजमेंट के नुमाइंदे ने बाकायदा यह कहा कि अगले हफ्ते की स्‍थिति अगले हफ्ते बताएंगे। मैनेजमेंट के नुमाइंदे के कहने का आशय यह था कि आज जिस रेट में एडमीशन संभव है, उस रेट में अगले हफ्ते एडमीशन होगा या नहीं, यह उस समय की स्‍थितियों पर निर्भर होगा।
कृष्‍ण मोहन मेडिकल कॉलेज का यह दुस्‍साहस इसलिए बहुत अहमियत रखता है कि उसके द्वारा मिनिस्‍ट्री ऑफ हेल्‍थ एंड फैमिली वेलफेअर के समक्ष अपना पूरा पक्ष रखने के बाद भी मिनिस्‍ट्री ने उसे न सिर्फ दो साल के लिए डीबार किया बल्‍कि यह आदेश भी दिया कि भविष्‍य में कृष्‍ण मोहन मेडिकल कॉलेज तभी एडमीशन लेने के लिए अधिकृत होगा जब एमसीआई की टीम इंस्‍पेक्‍शन करके क्‍लीनचिट दे देगी। साथ ही एमसीआई, कॉलेज द्वारा दी गई 2 करोड़ रुपए की बैंक गारंटी भी कैश करा लेगी।
यहां यह जानकारी देना जरूरी है कि एमसीआई की टीम इससे पहले दो बार जब कृष्‍ण मोहन मेडिकल कॉलेज का नियमानुसार इंस्‍पेक्‍शन करने पहुंची तो पहली बार उसे कॉलेज के डीन ने यह कहकर टहला दिया कि वह कॉलेज के चेयरमैन की इजाजत के बिना इंस्‍पेक्‍शन की परमीशन नहीं दे सकते। दूसरी बार इस दलील के साथ वापस कर दिया कि उसने मिनिस्‍ट्री ऑफ हेल्‍थ एंड फैमिली वेलफेअर के सामने अभी अपना पक्ष नहीं रखा है इसलिए जब वह निर्धारित तिथि पर अपना पक्ष रख दे तब इंस्‍पैक्‍शन किया जाए।
गौरतलब है कि वर्ष 2016-17 में केंद्र सरकार की मिनिस्‍ट्री ऑफ हैल्‍थ एंड फैमिली वेलफेअर ने कृष्‍ण मोहन मेडिकल कॉलेज को 150 स्‍टुडेंट्स के एडमीशन की सशर्त परमीशन सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित एमसीआई की ओवरसाइट कमेटी से प्राप्‍त रिपोर्ट के आधार पर दी थी।
शर्त के अनुसार अगले सत्र में एडमीशन के लिए कॉलेज को मिनिस्‍ट्री ऑफ हेल्‍थ एंड फैमिली वेलफेअर के सभी नियमों को पूरा करके एमसीआई की टीम का इंस्‍पेक्‍शन कराकर क्‍लीन चिट लेनी थी।
कॉलेज के संचालकों की बदनीयती और शासन को खुली चुनौती देने का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि मिनिस्‍ट्री ऑफ हैल्‍थ एंड फैमिली वेलफेअर के सामने हियरिंग पूरी हो जाने से पहले जब एमसीआई की टीम इंस्‍पेक्‍शन के लिए कॉलेज पहुंची थी तो वहां उसे ओपीडी ब्‍लॉक के रजिस्‍टर्ड काउंटर पर मात्र दो मरीज मिले जबकि कंसलटेशन रूम पूरी तरह खाली पड़ा था। फर्स्‍ट फ्लोर पर स्‍थित आईपीडी, मेडिकल वार्ड, टीबी चेस्‍ट वार्ड में ताला पड़ा था।
एमसीआई ने अपनी फाइनल इंस्‍पेक्‍शन रिपोर्ट में कृष्‍ण मेडिकल कॉलेज की जो दयनीय दशा बताई है, उसके अनुसार कॉलेज की फैकल्‍टी 86.15 प्रतिशत कम पाई गई। इसी प्रकार रेजीडेंट डॉक्‍टर्स 89.13 प्रतिशत कम मिले। किसी भी वार्ड में कोई मरीज कमेटी को नहीं मिला।
एमसीआई की रिपोर्ट के अनुसार कॉलेज में इसी प्रकार की कुल 19 बड़ी कमियां पाई गईं। इन कमियों से साफ पता लग रहा था कि कृष्‍ण मोहन मेडिकल कॉलेज एक ओर जहां मिनिस्‍ट्री ऑफ हेल्‍थ एंड फैमिली वेलफेअर, एमसीआई व सुप्रीम कोर्ट सहित शिकायतकर्ताओं की आंखों में भी धूल झोंक रहा है वहीं दूसरी ओर इन सभी को खुली चुनौती देते हुए लाखों रुपए अतिरिक्‍त वसूल कर एडमीशन देने का काम कर रहा है।
यह हाल तो तब है जबकि प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी सहित यूपी के मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ भ्रष्‍टाचार पर जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाए हुए हैं और देशभर में भ्रष्‍टाचारियों के खिलाफ मुहिम चल रही है।
शिक्षा और विशेषकर मेडिकल शिक्षा के क्षेत्र में हो रहे इस भ्रष्‍टाचार का सर्वाधिक चिंताजनक पहलू यह है कि इस तरह बनने वाले डॉक्‍टर जब सरकारी अथवा निजी क्षेत्र में प्रेक्‍टिस करने उतरेंगे तो लोगों की जेब तथा जिंदगी पर कितने भारी पड़ेंगे।
देखना यह होगा कि कृष्‍ण मोहन मेडिकल कॉलेज के संचालकों द्वारा ”आजतक” न्‍यूज़ चैनल के स्‍टिंग ऑपरेशन में एडमीशन ने लिए खुलेआम रिश्‍वत मांगते हुए दिखाए जाने के बाद भी अब इनके खिलाफ कोई ठोस कार्यवाही हो पाती है अथवा नहीं।
या फिर ये शिक्षा माफिया इसी प्रकार मनमानी करने को स्‍वतंत्र रहते हैं और अच्‍छे तथा पेशेवर कॉलेजों की भी छवि खराब करने को आजाद रहते हैं।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

शनिवार, 27 मई 2017

…और अब चैप्‍टर क्‍लोज

दो हत्‍याएं, करोड़ों की लूट, विधाता के धाम से विधानभवन तक गूंज, फिर उसकी भी अनुगूंज। अनशन, धरना-प्रदर्शन व बंद, सत्ता पक्ष व विपक्ष के दौरे, सवाल…सवाल और सवाल।
सवालों के जवाब में तीन कुख्‍यात भाइयों और उनके तीन हलूकरों की गिरफ्तारी, मात्र 20 लाख रुपए मूल्‍य के माल की कथित बरामदगी…और चैप्‍टर क्‍लोज।
पुलिस-प्रशासन मुर्दाबाद का नारा, चार दिन के अंतराल में पुलिस-प्रशासन जिंदाबाद में ”तरमीम” हो गया। बेडवर्क, गुडवर्क बन गया। चार दिन में पराई होते-होते एक पार्टी फिर से अपनी हो गई। राजनीति की रोटी सेंकने का प्रयास करने वालों के मंसूबे धरे-धरे के धरे रह गए। मरने वालों की चिता ठीक से ठंडी भी नहीं हुई कि पुलिस को प्रशस्‍ति पत्र बांट दिए गए। इनाम-इकराम से नवाजे जाने का ऐलान कर दिया गया। सम्‍मान समारोह की तैयारियां होने लगीं। राम राज्‍य लौट आया। जिंदगी से लेकर व्‍यापार तक सब अपने ढर्रे पर वापस।
कौन कह सकता है कि इसी महीने की 15 तारीख को मयंक चेन पर हुई जघन्‍य वारदात के बाद धर्म की यह छोटी सी दुनिया उबल रही थी। बच्‍चे से लेकर बूढे़ तक की जुबान सिर्फ यही बोल रही थी कि बहुत बुरा हुआ।
20 मई को भोर होते-होते वही जुबान पलटने लगी। सूर्य चढ़ने के साथ शहर का पारा नॉर्मल होने लगा। जो लोग खाकी को खाक में मिला देने को आतुर थे, वही लोग उसकी शान में कसीदे पढ़ने लगे। यही है फितरत और यही असलियत भी।
पुलिस जानती है कि उसकी स्‍क्रिप्‍ट पर उंगली उठाने की हिमाकत प्रथम तो कोई करता नहीं, और यदि कोई करता भी है तो जवाब देने की जरूरत नहीं।
प्रेस कांफ्रेंस होती हैं लेकिन लकीर पीटने के लिए। सवाल उठाने का दौर बीत गया। सवाल किसी को अच्‍छे नहीं लगते। जवाब सुहाते हैं।
मीडिया की आवाज़ नक्‍कारखाने की तूती बनकर रह गई है और मीडियाकर्मी मीडिएटर। वह न तो आवाज़ उठाते हैं और न आवाज़ बनते हैं, वह आवाज़ मिलाते हैं। जिसकी ढपली, उसका राग।
लिखा-पढ़ी में व्‍यापारी बेशक कमजोर हो किंतु पुलिस चुस्‍त-दुरुस्‍त है। उसने हवा का रुख भांपकर घटना के दूसरे दिन ही कर लिया एक तीर से कई निशाने साधने का इंतजाम। सांप मर जाए और लाठी भी जस की तस बनी रहे, इस कला में खाकी का कोई मुकाबला नहीं।
एक मृतक के परिजनों को आश्‍वासन की पोटली थमा दी तो दूसरे के परिजनों को सड़क पर मिली गहनों की पोटली। होगा कोई सर्राफ जिसने रख लिए लाखों के जेवरात।
होंगे कोई कर्मचारी व कारीगर जिनकी बदनीयत ने घायल अवस्‍था में गोलियों का धुंआ साफ होने से पहले ही सर्राफ को थमा दी जेवरात व नकदी की वह पोटली। पुलिस को अब इस सबसे क्‍या मतलब।
किसने की सर्राफों की सुरागरसी, कौन था आस्‍तीन का सांप..सारे प्रश्‍न अपनी जगह। प्रश्‍न शेष हैं तो रहें, उत्तर दिया जा चुका है। देखेंगे, देख रहे हैं और देखते रहेंगे।
किसी को छोड़ेंगे नहीं, लाखों का माल मिल गया अब करोड़ों के लिए भी कोशिश करेंगे लेकिन पहले ब्‍यौरा तो दो।
चार दिन में चार हजार बार पुलिस से उसके काम का हिसाब मांगा गया, पर कारोबार का हिसाब अब तक नहीं मिला। अब क्‍या बदमाश बताएंगे कि कितना माल लूट कर ले गए।
पहले हिसाब दो, फिर हिसाब मांगो। नहीं दे सकते तो हिसाब-किताब बराबर समझो। बहुतों का हिसाब इसी तरह हुआ है बराबर। गोली मारीं, गोली खाईं…इनका भी तो हिसाब देना है, और अकेले देना है। बदमाशों के असलाह से फायर निकले या फुहार, इससे किसी को क्‍या वास्‍ता। बदमाश खाकी को और खाकी बदमाशों को, दोनों एक-दूसरे को बहुत अच्‍छी तरह जानते हैं। दोनों के असलाह भी परस्‍पर पहचानते हैं। कितनी मार करनी है, कैसी करनी है, सब उन्‍हें पता होता है। आखिर चोली-दामन का साथ है। किसी एक घटना से कैसे छूट सकता है यह साथ।
यूं भी यूपी बहुत बड़ा है। कोई योगी आए या भोगी, कर्मयोगियों को फर्क नहीं पड़ता। ज्‍यादा से ज्‍यादा क्‍या? इधर या उधर।
वसीम बरेलवी का एक शेर, और बात खत्‍म।
जहां रहेगा, वहीं रोशनी लुटाएगा।
किसी चराग़ का अपना मकां नहीं होता।।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

सुलझने की बजाय उलझ गया मथुरा का डबल मर्डर और लूट कांड, व्‍यापारियों की नीयत पर भी उठने लगे सवाल

मथुरा की कोयला वाली गली में ”मयंक चेन” नाम ज्‍यूलिरी फर्म पर हुए डबल मर्डर तथा करोड़ों रुपए की लूट का मामला अब सुलझने की बजाय और अधिक उलझ गया है। साथ ही इस जघन्‍य कांड के बाद सक्रिय हुए कुछ व्‍यापारियों की नीयत पर भी पुलिस से मिलीभगत को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
आज विभिन्‍न अखबारों में छपी खबर और पुलिस द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक फर्म के मालिक मयंक सहित तीन लोगों को घायल करके उनके भाई विकास व व्‍यापारी मेघ अग्रवाल की हत्‍या करने वाले लुटेरों की नजर से वहां पड़ा सोने व नकदी से भरा एक बैग छूट गया था। इस बैग को लुटेरों के निकल जाने पर घायल कर्मचारी मोहम्‍मद अली ने एक पड़ोसी सर्राफ के पास यह कहकर रख दिया कि यह मेरा है और इसे मैं हॉस्‍पीटल से लौटने के बाद ले जाऊंगा।
यह भी बताया जा रहा है कि मोहम्‍मद अली को एक नहीं बल्‍कि दो बैग अशोक शाहू नामक मेरठ के कारीगर ने दिए थे जो वारदात के वक्‍त दुकान में मौजूद था और बदमाशों के हमले में वह भी घायल हुआ था। मोहम्‍मद अली को दिए गए दूसरे बैग में क्‍या था और उसका क्‍या हुआ, इसका फिलहाल कुछ पता नहीं है।
बहरहाल, पुलिस का कहना है कि वारदात के अगले ही दिन यह बैग मिल गया था जिसे पांच व्‍यापारियों की कमेटी के सामने इस शर्त पर सीओ सिटी जगदीश सिंह ने मृतक मेघ अग्रवाल के पिता को सौंपा कि इसे ”बरामदगी मानते हुए” जरूरत पड़ने पर प्रस्‍तुत किया जाएगा।
यहां सबसे पहला सवाल तो यह खड़ा होता है कि पुलिस को इस बैग के बारे में सूचना किसने दी और कैसे पुलिस उस सर्राफ तक पहुंची जिसके यहां मोहम्‍मद अली ने बैग रखा था।
पुलिस की मानें तो सीओ सिटी जगदीश सिंह को वारदात की सीसीटीवी फुटेज चैक करते वक्‍त दिखाई दिया कि एक बैग अशोक शाहू के नीचे दबा पड़ा है।
पुलिस की बात सच भी मान ली जाए तो यह प्रश्‍न बाकी रह जाता है कि सीओ सिटी को पड़ोसी सर्राफ के यहां बैग रखे होने की जानकारी किससे मिली।
पुलिस कहती है कि शक के आधार पर उसने हॉस्‍पीटल में एडमिट घायल मोहम्‍मद अली और अशोक शाहू से जब उस बैग के बारे में पूछताछ की तो उन्‍होंने बताया कि एक बैग पड़ोसी सर्राफ के यहां रखा है।
पुलिस यह भी कहती है कि इस बीच मोहम्‍मद अली की पत्‍नी और उसका बेटा उस सर्राफ के यहां बैग लेने पहुंचे थे क्‍योंकि मोहम्‍मद अली व अशोक शाहू की माल को लेकर नीयत खराब हो गई किंतु तब तक चूंकि पुलिस को पता लग चुका था इसलिए उसने सर्राफ को बैग किसी अन्‍य के हवाले न करने की हिदायत दे दी।
दूसरी ओर व्‍यापारी नेताओं का कहना है कि पुलिस ने कोई बैग बरामद नहीं किया लिहाजा वह पुलिस का गुडवर्क नहीं है। पुलिस को तो उन्‍होंने ही सोने से भरा एक बैग छूट जाने तथा पड़ोसी सर्राफ के यहां से मिल जाने की सूचना दी थी। सच्‍चाई जो भी हो, परंतु इतना तय है कि पुलिस के संज्ञान में वारदात के अगले ही दिन सोने से भरा एक बैग मिल जाने की बात आ चुकी थी।
इन दोनों ही स्‍थितियों में बड़ा सवाल यह पैदा होता है कि वारदात के अगले ही दिन एक बैग मिल जाने का पता लग जाने के बावजूद पुलिस ने तीसरे दिन मथुरा आए प्रदेश के डीजीपी सुलखान सिंह और मुख्‍यमंत्री के प्रतिनिधि व प्रदेश के ऊर्जा मंत्री व मथुरा के विधायक श्रीकांत शर्मा को क्‍यों नहीं दी जबकि वह पीड़ित परिवारों के साथ-साथ व्‍यापारियों के जबर्दस्‍त आक्रोश को चुपचाप झेलते रहे।
यदि डीजीपी वहां अपने स्‍तर से इस बात की सूचना देते तो कुछ आक्रोश कम अवश्‍य होता। दूसरे दिन ही एक बैग मिल जाने का पता लगने के बाद क्‍या सीओ सिटी अगले दिन डीजीपी के आने व उनके द्वारा अपने निलंबन की घोषणा किए जाने का इंतजार कर रहे थे।
आश्‍चर्य इस बात पर भी होता है कि डीजीपी सुलखान सिंह तथा ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा को मेघ अग्रवाल के परिवार ने भी बैग मिल जाने की जानकारी देना क्‍यों जरूरी नहीं समझा जबकि यह बात तो व्‍यापारी व सीओ सिटी दोनों स्‍वीकार कर रहे हैं कि बैग अगले दिन यानि 16 मई को ही मिल गया था और डीजीपी व ऊर्जा मंत्री का मथुरा दौरा 17 तारीख की सुबह हुआ है।
पुलिस तथा व्‍यापारी नेताओं की कहानी में एक बड़ा झोल इस बात को लेकर लगता है कि माल से भरे बैग पर यदि मोहम्‍मद अली तथा अशोक शाहू की नीयत खराब हो चुकी थी और मोहम्‍मद अली ने अपनी पत्‍नी व बेटे को सर्राफ के यहां बैग लेने भी भेजा था तो पुलिस ने अब तक उन्‍हें आरोपी क्‍यों नहीं बनाया।
दो हत्‍याएं करके करोड़ों का माल लूट ले जाने वाले और उसी माल में से किसी तरह छूट गए माल पर नीयत खराब करने वालों में क्‍या कोई अंतर है?
नहीं है तो पुलिस और व्‍यापारी नेता दोनों ही मोहम्‍मद अली व अशोक शाहू पर मेहरबान क्‍यों हैं।
इन सबके अतिरिक्‍त एक अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण प्रश्‍न यह भी है कि जिस हिसाब से लुटेरों ने दुकान में घुसने के साथ ही ताबडतोड़ गोलीबारी शुरू कर दी और वारदात को अंजाम देकर भागते वक्‍त भी गली में खड़ी गाय व कुत्‍ते के ऊपर तक फायर झोंके, छतों से झांक रहे लोगों तक पर निशाना साधा, उसके बाद भी वह सर्राफ क्‍या लुटेरों की निगाह से बचे बैग को मोहम्‍मद अली से लेने के लिए बैठा रहा। वो भी तब जबकि गोलीबारी होने के साथ ही कोयला वाली गली ही नहीं, पूरे छत्‍ता बाजार में भगदड़ मच गई थी और दुकानदार अपनी-अपनी दुकानें बंद करके भाग खड़े हुए थे।
इस सबके बावजूद यह मान भी लिया जाए कि किसी तरह वह सर्राफ बैठा रह गया तो भी क्‍या कोई व्‍यक्‍ति इतनी बड़ी व जघन्‍य वारदात के बाद एक कर्मचारी के कहने पर सोने व नकदी से भरा बैग उसके मात्र इतना कहने पर रख लेगा कि यह उसका है और हॉस्‍पीटल से लौटकर वह उसे ले जाएगा। क्‍या कोई व्‍यक्‍ति इस तरह के माहौल में खुद को बिना वजह परेशानी में डालना मुनासिब समझेगा।
अगर बैग रखने वाले सर्राफा व्‍यवसाई को बहुत दिलेर भी मान लिया जाए तो पुलिस ने अपनी तरफ से न तो उसका नाम उजागर किया और न यह बताया कि उसने अच्‍छा काम किया या बुरा।
अच्‍छा काम किया तो उसकी प्रशंसा की जानी चाहिए थी और गलत काम किया है तो उसे भी लूट के बाद हुए घटनाक्रम में षड्यंत्र का आरोपी बनाना चाहिए क्‍योंकि उसने लगभग चौबीस घंटों तक बैग अपने पास छिपाकर रखा ही क्‍यों। हालांकि पब्‍लिक में अब उस सर्राफ का नाम सार्वजनिक हो चुका है।
अमर उजाला में इस बावत एसएसपी विनोद मिश्रा के हवाले से छपी खबर के अनुसार एसएसपी को मृतक मेघ अग्रवाल के पिता ने उनके पास पहुंच कर यह बात बताई कि उनके पुत्र का सोने व नकदी से भरा बैग उन्‍हें मिल गया है।
अगर यह बात सही है तो एसएसपी ने भी इतनी बड़ी बात अपने किसी उच्‍च अधिकारी अथवा मीडिया को बताना क्‍यों जरूरी नहीं समझा, और क्‍यों एसएसपी को भी बैग मिलने की जानकारी सीओ सिटी अथवा किसी अन्‍य अधीनस्‍थ से न मिलकर मेघ अग्रवाल के पिता से मिली। उस बैग के मिलने में ऐसा क्‍या था कि अधीनस्‍थ अधिकारी ने एसएसपी को भी उसके बारे में सूचित करना उचित नहीं समझा।
बताया जाता है कि बैग मिलने का खुलासा दरअसल कल तब हुआ जब मेघ अग्रवाल के परिजन होलीगेट पर भूख हड़ताल एवं धरना प्रदर्शन करने बैठ गए और विकास के परिजनों को इसकी भनक तक नहीं लगी।
विकास के परिजनों ने तब इस बात को आधार बनाकर आक्रोश व्‍यक्‍त किया कि मेघ का कथित माल तो उसके परिवार को दे दिया गया और मेघ व विकास की हत्‍या का खुलासा साथ ही होगा, ऐसे में वह अकेले अब यह सब किसलिए कर रहे हैं।
विकास के परिवार से जुड़े सूत्रों का यह भी कहना है कि बिना किसी जांच के यह कैसे मान लिया गया कि बदमाशों की नजर से छूटा बैग मेघ अग्रवाल का ही था। यह ठीक है कि मेघ अग्रवाल मयंक चेन को माल देता था और उस दिन भी माल देने ही आया था लेकिन बिना जांच के उस माल पर मेघ अग्रवाल के परिजनों का हक कैसे मान लिया गया।
यह भी तो हो सकता है कि मेघ अग्रवाल मयंक चेन के लिए लाए गए माल को उनके हवाले कर चुका हो, एसे में उस माल पर हक मेघ का न होकर मयंक चेन का बनता है।
इस संबंध में व्‍यापारी नेताओं का कहना था कि सोने के हर आभूषण पर उसे बनाने वाली कंपनी का ब्रांड नेम अंकित होता है और उसी आधार पर यह मान लिया गया कि माल मेघ अग्रवाल का है।
इसके जवाब में दूसरे सर्राफा कारोबारी बताते हैं कि ब्रांड किसी का भी हो किंतु उस पर हक तो उसे खरीदने वाली फर्म का होता है। जब मेघ अग्रवाल मयंक चेन के लिए सामान लाया था और वारदात के वक्‍त वहीं बैठा था तो बिना जांच के उस पर मेघ अग्रवाल के परिजनों का हक मान लेना अनुचित है।
वारदात से ठीक पहले के वीडियो फुटेज भी शो करते हैं कि दुकान पर मौजूद सभी लोग इत्‍मीनान के साथ बैठे हैं और सामान्‍य बातचीत में मशगूल हैं। लेनदेन होने जैसी कोई गतिविधि उसमें कहीं दिखाई नहीं देती।
सूत्रों से प्राप्‍त जानकारी के अनुसार इस पूरे घटनाक्रम में कुछ ऐसे तत्‍वों ने भूमिका अदा की है जिनकी पुलिस से अत्‍यंत निकटता है और मयंक चेन की अपेक्षा मेघ अग्रवाल के परिजनों से अधिक सहानुभूति।
इन्‍हीं तत्‍वों ने एक सोची समझी योजना के तहत डीजीपी सुलखान सिंह तथा ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा को घटना स्‍थल पर जाने से रोका और इन्‍हीं तत्‍वों ने सर्राफा कमेटी के स्‍थानीय पदाधिकारियों को भी उनसे मुलाकात तक नहीं करने दी जबकि पहले यह दोनों कार्यक्रम डीजीपी व ऊर्जा मंत्री के दौरे में शामिल थे।
यह भी पता लगा है कि मौका ए वारदात पर सबसे पहले पहुंचने वालों में एक ऐसा सर्राफा व्‍यवसाई था जिसके कर्मचारी को सरेराह गोली मारकर कुछ वर्ष पूर्व नामजद बदमाश भारी मात्रा में सोने के आभूषण तथा नकदी लूट ले गए थे। तब इस सर्राफा व्‍यवसाई ने घटना के बाद लूटे गए माल की कोई जानकारी पुलिस को नहीं दी और सारा जोर आभूषणों के साथ मौजूद कागजों की बरामदगी पर लगाया, परिणाम स्‍वरूप पकड़े जाने के उपरांत भी बदमाश भारी मात्रा में आभूषण व नकदी पचा गए।
पुलिस को शक है कि मयंक चेन पर भी हत्‍या व लूट को अंजाम उन्‍हीं बदमाशों ने दिया है।
यहां इस बात का जिक्र करना इसलिए जरूरी हो जाता है कि मयंक चेन पर हुए डबल मर्डर व लूट के बाद छूटे गए बैग की बरामदगी में उक्‍त सर्राफ की बड़ी भूमिका बताई जाती है जबकि घटना वाले दिन से पूरी तरह पीड़ित परिवारों के पक्ष में खड़े रहने वाले सर्राफा कमेटी के स्‍थानीय पदाधिकारियों को छूटे गए बैग की कोई जानकारी नहीं दी गई। और तो और मेघ अग्रवाल के पिता को जिन पांच व्‍यापारियों की कमेटी बनाकर उनका कथित माल सौंपा गया, उस कमेटी में भी सर्राफा कमेटी का एक भी व्‍यक्‍ति शामिल नहीं किया गया और न यह बताया कि सपुर्दगी कमेटी में शामिल पांच व्‍यापारी कौन-कौन से हैं।
खबरों के मुताबिक पुलिस-प्रशासन ने कल मेघ अग्रवाल के परिजनों को 48 घंटों में घटना के अनावरण का आश्‍वासन देकर भूख हड़ताल व धरने से उठाने पर राजी किया, जिसमें से 24 घंटे से अधिक बीत चुके हैं।
वहीं प्रदेश के डीजीपी ने उनके आश्‍वासन के बाद भी मेघ अग्रवाल के परिजनों द्वारा धरना देने की बात पर अपनी कोई टिप्‍पणी करने से इंकार कर दिया।
दूसरी ओर आज प्रदेश की सर्राफा कमेटी के आह्वान पर प्रदेश भर के सर्राफा कारोबारियों ने बंद रखा है। स्‍थानीय व्‍यापारी और सर्राफा कमेटी के लोगों ने भी आज मथुरा के जिलाधिकारी अरविंद एम बंगारी से मुलाकात कर अपना रोष व्‍यक्‍त किया है।
हो सकता है कि पुलिस प्रशासन मेघ अग्रवाल के परिजनों को दिए गए समय के अंदर ही वारदात का खुलासा कर दे लेकिन वह वारदात के बाद पैदा हुए घटनाक्रम तथा छूटे गए बैग की कहानी के पीछे का सच बता पाएगी, यह कहना मुश्‍किल है।
पुलिस द्वारा अब तक अख्‍तियार किया गया रवैया तो कतई ऐसे कोई संकेत नहीं देता कि वह पूरे माल की बरामदगी करके असली अपराधियों को बेनकाब कर पाएगी। पुलिस को तो फिलहाल खुद ही नहीं पता कि मयंक चेन से बदमाश आखिर कितना माल लूट ले जाने में सफल रहे और छूटे गए बैग को छिपाकर रखने वालों की असली मंशा क्‍या थी।
बदमाशों की कुल संख्‍या को लेकर पुलिस पहले दिन से कनफ्यूज है ही।
अंधेरे में तीर चलाना पुलिस की कार्यप्रणाली का हिस्‍सा बन चुका है और वह इस मामले में भी वही कर रही है।
यही कारण है कि हर वारदात के बाद अगली वारदात कहीं अधिक जघन्‍य व कहीं अधिक दुस्‍साहसिक होती है। तो इंतजार कीजिए और देखिए आगे-आगे होता है क्‍या।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...