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गुरुवार, 20 अक्टूबर 2022
खेल वाइफ स्वैपिंग का: दिल्ली का "कचरा" यमुना को और "कल्चर" मथुरा को कर रहा है प्रदूषित
हाल ही में मध्यप्रदेश की एक 21 वर्षीय विवाहिता युवती ने अपने पति पर आरोप लगाए हैं कि वह उसे "वाइफ स्वैपिंग" (पत्नी की अदला-बदली) वाली पार्टी में शामिल होने के लिए मजबूर करता है। पीड़िता का पति चाहता है कि वह पार्टी में शामिल होकर गैर मर्दों के साथ शरीरिक संबंध बनाए। मप्र की राजधानी भोपाल के कोहेफिजा इलाके की रहने वाली इस 21 वर्षीय युवती का निकाह मोहम्मद अम्मार के साथ हुआ था। मोहम्मद अम्मार बीकानेर के एक पांच सितारा होटल में मैनेजर है। निकाह के बाद से वह बीकानेर में अपने पति के साथ रह रही थी।
पीड़िता का आरोप है कि निकाह के कुछ दिन बाद से ही उसका पति उस पर वाइफ स्वैपिंग पार्टी में शामिल होने और उसका हिस्सा बनने के लिए दबाव डालने लगा। बीमारी का बहाना बनाकर वह बमुश्किल अपने मायके भोपाल पहुंच सकी।
पुलिस ने धारा 377, 498 A, 323, 506, 34, 3/4 के तहत उसके पति पर FIR दर्ज कर उसकी गिरफ्तारी के प्रयास शुरू कर दिए हैं।
मध्यप्रदेश न तो अकेला ऐसा राज्य है और न बीकानेर एकमात्र ऐसी जगह जहां वाइफ स्वैपिंग का यह घिनौना खेल खेला जा रहा है। सच तो यह है कि मेट्रो सिटीज दिल्ली, मुंबई, कलकत्ता, चेन्नई सहित देश के तमाम दूसरे महानगरों सहित अनेक छोटे शहर भी अब इस खेल की गिरफ्त में आ चुके हैं।
यूं तो अन्य शहरों के मुकाबले तरक्की की दौड़ में विश्व का नामचीन धार्मिक शहर मथुरा भी बेशक काफी पिछड़ा हुआ प्रतीत होता हो, बेशक यहां अभी तरक्की को परिभाषित करने वाली अनेक सुविधाओं का अभाव हो, बेशक देश-दुनिया के साथ तरक्की के लिए कदम ताल मिलाने में इसे लंबा समय लगे, लेकिन वाइफ स्वैपिंग के मामले में कृष्ण की यह नगरी अन्य दूसरे महानगरों एवं नगरों से किसी तरह पीछे नहीं है। सच तो यह है कि वह बहुत से नगरों एवं महानगरों से इस क्षेत्र में काफी आगे है।
जी हां! चाहे आपको आसानी से यकीन आये या ना आए, चाहे आपका मुंह आश्चर्य से एकबार को खुले का खुला रह जाए लेकिन सच्चाई यही है कि विश्व की धार्मिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक एवं साहित्यिक विरासत को दरकिनार कर यह शहर उस दिशा में करवट ले चुका है जिसके बारे में सोचना तक आम आदमी के लिए किसी महापाप से कम नहीं है।
"वाइफ स्वैपिंग" या "कपल स्वैपिंग" कहलाने वाले इस खेल में अधिकांशत: पैसे वाले परिवारों से संबंध रखने वाले लोग कम से कम छ: कपल का एक ग्रुप बनाते हैं और यह ग्रुप फिर वाइफ स्वैपिंग करता है। वाइफ स्वैपिंग के तहत न्यूड एवं सेमी न्यूड ग्रुप डांस से लेकर ग्रुप सेक्स तक सब-कुछ शामिल होता है।
इसके लिए सबकी सहमति से शहर के किसी बाहरी हिस्से में अच्छे होटल का हॉल तथा कमरे बुक कराये जाते हैं, जहां ग्रुप के सदस्य कपल पूर्व निर्धारित दिन व समय पर अपनी-अपनी गाड़ियों से पहुंचते हैं। इस खेल में शामिल होने के लिए जितना जरूरी है एक अदद कपल का होना, उतना ही जरूरी है एक गाड़ी का होना। खेल की शुरूआत ड्रिंक या ड्रग्स से होती है, और उसके बाद जैसे-जैसे सुरूर चढ़ता जाता है, खेल शुरू होने लगता है।
खेल की शुरूआत के लिए ग्रुप के सभी सदस्य हॉल की बत्तियां बुझाकर एक टेबिल पर अपनी-अपनी गाड़ियों की चाभियां रख देते हैं और फिर अंधेरे में ही ग्रुप के पुरुष सदस्य किसी एक गाड़ी की चाभी उठाते हैं। जिसके हाथ में जिसकी गाड़ी की चाभी आ जाती है, वह उस सदस्य की बीबी के साथ खेल खेलने को अधिकृत हो जाता है। ठीक इसी प्रकार उसकी बीबी के साथ वह सदस्य खेल खेलने का अधिकारी हो जाता है जिसकी चाभी उसके हाथ लगी है।
चाभियों की अदला-बदली के साथ यह सदस्य अपने पार्टनर को होटल में ही पहले से बुक्ड कमरों में ले जाते हैं और फिर वहां स्वछंद सेक्स का यह खेल शुरू हो जाता है।
इससे भी आगे इस खेल में कुछ लोग हॉल के अंदर ही एक-दूसरे की पत्नियों को लेकर सब-कुछ करने को स्वतंत्र होते हैं जबकि कुछ लोग दो-दो और तीन-तीन की संख्या में ग्रुप सेक्स करते हैं।
जाहिर है कि इस सारे खेल का राजदार और हिस्सेदार वह होटल मालिक भी होता है जिसके यहां खेल खेला जाता है। उसे इसके लिए अच्छी-खासी रकम मिलती है, वो अलग।
बताया जाता है कि मथुरा के नवधनाढ्यों को इस खेल की लत उस क्लब कल्चर से लगी है जो कथित तौर पर समाज सेवा के कार्य करते हैं अथवा समाज सेवा करने का दावा करते हैं।
इनके अलावा कुछ लोगों ने पर्सनल क्लब या ग्रुप भी बना लिए हैं और उनकी आड़ में विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन करते रहते हैं। जिनका असल मकसद उनके बीच से छांटकर ‘वाइफ स्वैपिंग’ अथवा ‘कपल स्वैपिंग' के लिए एक अलग ग्रुप बनाना होता है।
विश्वस्त सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार पिछले कुछ समय के अंदर इस धार्मिक शहर के विशेष वर्ग में हुईं आकस्मिक युवा संदिग्ध मौंतों के पीछे यही खेल रहा है क्योंकि इसके आफ्टर इफेक्ट अंतत: ऐसे ही परिणाम निकालते हैं।
सूत्रों की मानें तो एक प्रसिद्ध होटल मालिक की शादी-शुदा बहिन इसी खेल में अपनी जान दे चुकी है। उसकी मौत को इसलिए आत्महत्या प्रचारित किया गया क्योंकि उसने अपने मायके में जान दी थी, परंतु बताया जाता है कि इसके पीछे का असली कारण वाइफ स्वैपिंग का खेल ही था।
इसके अलावा कुछ समय पहले एक बिल्डर के युवा पुत्र की संदिग्ध मौत हो या एक अन्य बड़े व्यवसाई के अधेड़ उम्र पुत्र की होटल के कमरे में हुई मौत का मामला हो, सबके पीछे यही खेल बताया जाता है।
जिन परिवारों में यह मौतें हुई हैं, वह दबी जुबान से इतना तो स्वीकार करते हैं कि अवैध संबंध इन मौतों का कारण बने हैं लेकिन सीधे-सीधे वाइफ स्वैपिंग के खेल में संलिप्तता स्वीकार नहीं करते।
चूंकि इस खेल के परिणाम स्वरूप एचआईवी एड्स तथा आज के दौर की दूसरी संक्रामक बीमारियां भी तोहफे में मिलने की पूरी संभावना रहती है इसलिए इसके परिणाम तो किसी न किसी स्तर पर जाकर घातक होने ही होते हैं। ऐसी स्थिति में पति-पत्नी एक-दूसरे को दोषी ठहराने का प्रयास करते हैं और इसके फलस्वरूप गृहक्लेश बढ़ जाता है। रोज-रोज के गृहक्लेश का नतीजा फिर किसी अनहोनी के रूप में सामने आता है।
इस खेल से जुड़े लोगों से प्राप्त जानकारी के अनुसार धार्मिक शहर मथुरा में यूं तो इस खेल की शुरूआत हुए कई साल हो चुके हैं, लेकिन पिछले करीब पांच सालों से इसमें काफी तेजी आई है। पांच सालों में मथुरा के अंदर इस खेल के कई ग्रुप बने हैं और इसी कारण सो-कॉल्ड सभ्रांत परिवारों में कई जवान संदिग्ध मौतें भी हुई हैं।
आज तक ऐसी किसी मौत का मामला पुलिस के पास न पहुंचने की वजह से पुलिस ने उसमें कोई रुचि नहीं ली क्योंकि यूं भी मामला पैसे वालों से जुड़ा होता है।
यही कारण है वाइफ स्वैपिंग का यह खेल धर्म की इस नगरी में न केवल बदस्तूर जारी है बल्कि दिन-प्रतिदिन परवान चढ़ रहा है।
एक-दो नहीं, अनेक अपराधों का रास्ता बनाने वाला यह खेल यदि इसी प्रकार फलता-फूलता रहा और पुलिस व प्रशासन के बड़े अधिकारियों ने इस ओर अपनी निगाहें केंद्रित न कीं तो आने वाले समय में कृष्ण की नगरी के लिए यह ऐसा कलंक साबित होगा जिससे पीछा छुड़ाना मुश्किल हो जायेगा।
मुश्किल इसलिए कि मथुरा से दिल्ली बहुत दूर नहीं है। दिल्ली का कचरा अगर यमुना में बहकर आ रहा है तो दिल्ली का कल्चर भी सड़क के रास्ते मथुरा को प्रदूषित कर ही रहा है।आप अगर इस गलतफहमी में है कि 'बिहारी जी' सहित मथुरा के अन्य धार्मिक स्थानों पर धर्म के नाम पर तेजी के साथ बढ़ रही अनियंत्रित भीड़ का कारण अचानक उपजा भक्तिभाव है तो इस गलतफहमी को दूर कर लीजिए।
-लीजेण्ड न्यूज़
सोमवार, 24 जनवरी 2022
यमुना मैया कहे पुकार, हर प्रत्याशी धोखेबाज़
पतित पावनी यमुना, जीवन दायिनी यमुना, कलकल करती यमुना और अब दिन-प्रतिदिन कलुषित होती यमुना। कालिंदी और कृष्ण ही हैं समूचे विश्व में मथुरा की पहचान। कभी कालिया रूपी नाग के कलुष से कालिंदी को मुक्त कराने वाले कृष्ण भी आज कलियुग के कालियाओं से जैसे हार मान बैठे हैं। बावजूद इसके यमुना का धार्मिक महत्व कम होता दिखाई नहीं देता। तभी तो लोकतंत्र के हर पर्व पर विभिन्न राजनीतिक दल व उनके प्रत्याशी यमुना के धार्मिक महत्व और उससे जुड़ी जनभावनाओं को भुनाने में पीछे नहीं रहते।
जन्म-जन्मातरों के पापों से मुक्ति दिलाने वाली करोड़ों जनमानस की आराध्य यमुना अब चुनावी नैया पार कराने का जरिया बन चुकी है। ये बात अलग है कि चुनावी मौसम में अंजुलि भरकर यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने का संकल्प लेने वाले नेता चुनाव बीत जाने के बाद उसकी ओर पलटकर देखना तक गवारा नहीं करते।
एकबार फिर लोकतंत्र का पर्व विधानसभा चुनावों के रूप में सामने है। एकबार फिर यमुना पूजन करके पर्चा दाखिल करने वाले विभिन्न राजनीतिक दलों के उम्मीदवार चुनावी वैतरिणी पार करने को सक्रिय हैं, किंतु इस बार एक फर्क है। फर्क यह है कि अब किसी भी दल के प्रत्यााशी पर आम जनता का भरोसा नहीं रहा। पिछले विधानसभा चुनावों तक जो थोड़ा-बहुत भरोसा कायम था, वह भी अब पूरी तरह उठ चुका है। हालांकि पिछली बार किसी प्रत्यााशी को यमुना पूजन कराने के लिए कोई पुरोहित खड़ा नहीं हुआ। हुआ तो इतना कि जिस दिन विधायक प्रदीप माथुर यमुना पूजन करने जा रहे थे, उस दिन उनके खिलाफ यमुना किनारे पोस्टकर चस्पा किए गए, बाद में पुलिस द्वारा वो पोस्टर बलपूर्वक हटवा दिए गए।
प्रदीप माथुर के खिलाफ पोस्टर चस्पा किए जाने की वजह शायद यह रही कि यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने में लगे लोगों को सर्वाधिक उम्मीद उन्हीं से थी, लेकिन कई बार विधायक बनने के बाद भी उन्होंने यमुना के लिए कुछ नहीं किया।
करीब आठ साल पहले की बात है, जब केंद्र में प्रदीप माथुर की पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार काबिज हुआ करती थी। तब यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने के लिए बाबा जयकृष्ण दास ने हजारों लोगों के साथ मथुरा से दिल्ली कूच किया था। बाबा जयकृष्ण दास के नेतृत्व में यमुना भक्तों की इस फौज को आगे बढ़ते देख एकबार तो केंद्र सरकार के भी हाथ-पैर फूल गए थे लेकिन फिर उसने इस फौज को पीछे धकेलने के लिए अपनी बिसात बिछानी शुरू की, और उसके लिए मोहरा बनाया गया उस समय के कांग्रेसी विधायक प्रदीप माथुर को।
प्रदीप माथुर ने बाबा जयकृष्ण दास के सामने तत्कालीन केंद्रीय जल संसाधन मंत्री हरीश रावत से वार्तालाप कर यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने का कथित ठोस प्रस्ताव पेश किया, जिसे बाबा ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। बाबा जयकृष्ण दास को जाल में फंसता देखते ही प्रदीप माथुर और केंद्र सरकार के दूसरे नुमाइंदों ने बाबा को इस बात पर राजी कर लिया कि वह अपने साथ चल रहे लोगों को आश्वस्त कर लौटने को कहेंगे। हुआ भी यही, लिहाजा फरीदाबाद पहुंचते-पहुंचते यमुना भक्तों का कारवां बिखर चुका था। केंद्र सरकार और उनके कांग्रेसी नुमाइंदों की चाल कामयाब हो चुकी थी, जबकि बाबा जयकृष्णद दास किसी भी चाल से पूरी तरह अनभिज्ञ थे।
दिखावे के लिए बाबा सहित कुछ चुनिंदा लोगों की केंद्रीय जल संसाधन मंत्री हरीश रावत से मीटिंग कराई गई और इस मीटिंग में यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने का पूरा खाका भी खड़ा किया गया।
दरअसल, यह खाका ही यमुना एवं यमुना के लिए आंदोलनरत लोगों के खिलाफ एक ऐसा षड्यंत्र था जिसके कारण यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने का पूरा आंदोलन न सिर्फ ठप्प पड़ गया बल्कि वह पहले दोफाड़ हुआ और फिर कई फाड़ होकर लक्ष्य से ही भटक गया।
उधर, वर्ष 2009 के लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी के सहयोग से राष्ट्रीय लोकदल के युवराज जयंत चौधरी अपना पहला चुनाव मथुरा से लड़ने उतरे। जयंत चौधरी ने विश्राम घाट पर हजारों लोगों की मौजूदगी में यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने का संकल्प लिया, वह लाखों मत के अंतर से चुनाव जीते भी, परंतु यमुना के लिए कुछ नहीं कर पाए। चुनावों के दौरान मथुरा की जनता से यहीं घर बसाकर रहने का वायदा करने वाले जयंत चौधरी ने चुनाव जीतने के बाद न जनता की सुध ली और न यमुना की। उनके अपने लोग भी उनसे एक मुलाकात को पूरे पांच साल तरसते रहे। भाजपा के सहयोग से चुनाव जीतने वाले जयंत चौधरी के पिता व उनकी पार्टी रालोद के मुखिया चौधरी अजीत सिंह ने इस बीच कांग्रेस से पैक्ट करके अपने लिए जरूर केंद्र में मलाईदार मंत्रीपद हासिल कर लिया और सत्तासुख भोगते रहे।
यही कारण रहा कि 2014 और फिर 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा की प्रत्याशी तथा बॉलीवुड में स्वप्न सुंदरी का खिताब प्राप्त अभिनेत्री हेमा मालिनी भारी मतों से विजयी रहीं।
मथुरा की जनता ने नरेन्द्र मोदी के चेहरे पर अभिनेत्री हेमा मालिनी को दो मर्तबा बड़ी जीत दिलाई, बावजूद इसके हेमा मालिनी भी दूसरे नेताओं की तरह यमुना के साथ छलावा करने से नहीं चूकीं।
2014 में हेमा मालिनी को जिताने की अपील करने मथुरा आए खुद नरेन्द्र मोदी ने चुनावी रैली में यमुना प्रदूषण का मुद्दा उठाया और ब्रजवासियों को भरोसा दिया कि यदि सत्ता उनके पास आती है तो वह प्राथमिकता के आधार पर यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने का काम करेंगे। उनकी अपील पर हेमा मथुरा से दो बार सांसद चुनी गईं और खुद मोदी भी तब से लगातार प्रधानमंत्री के पद पर काबिज हैं लेकिन यमुना के साथ छल किए जाने का सिलसिला अब भी नहीं टूटा।
मथुरा की सांसद हेमा मालिनी, पांच में से चार विधायक भाजपा के, इनमें से दो विधायक मंत्री, मथुरा नगर निगम के मेयर मुकेश आर्यबंधु भाजपा से और जिला पंचायत भी भाजपा का कब्जा, परंतु केंद्र एवं प्रदेश में सत्ताधारी दल के नेताओं की इतनी बड़ी फौज भी नाले-नालियों का गंदा पानी आज तक सीधा यमुना के अंदर गिरने से नहीं रोक सकी।
अब इन चुनावों में मथुरा-वृंदावन विधानसभा सीट पर फिर से भाजपा ने ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा को चुनाव मैदान में उतारा है जबकि उनके सामने हैं कांग्रेस के रटे-रटाए चेहरे प्रदीप माथुर, भाजपा से बगावत करके उतरे बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी एसके शर्मा।
पिछले पूरे कार्यकाल में कबीना मंत्री श्रीकांत शर्मा यूं तो एक रस्म अदायगी की तरह यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने की बात कहीं-कहीं करते सुनाई पड़ते रहे लेकिन उनकी बात में किसी स्तर पर दम नजर नहीं आया
रहा सवाल बसपा के प्रत्याशी एसके शर्मा का, तो वह जरूर यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने का वायदा कर रहे हैं किंतु कौन नहीं जानता कि वर्तमान परिस्थितियों में बसपा प्रत्याशी की हैसियत से उनका वादा किसी मजाक से कम नहीं है। वैसे उनकी पार्टी ने पहले भी कभी यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने के किसी प्रयास में कोई रुचि नहीं दिखाई।
शहरी सीट के इतर अन्य चार सीटों गोवर्धन, मांट, छाता तथा बल्देव में अपना भाग्य आजमा रहे प्रत्याशी तो यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने के वायदे से भी खुद को पूरी तरह अलग रखते हैं। उनको लगता है कि यमुना के बारे में बात करना सिर्फ और सिर्फ मथुरा-वृंदावन क्षेत्र के विधायक की जिम्मेदारी है अन्यथा मांट क्षेत्र से 8 बार विधायक रहे श्याम सुंदर शर्मा का चुनावी क्षेत्र मांट भी यमुना किनारे बसा हुआ है छाता क्षेत्र की विधायकी से कबीना मंत्री तक की कुर्सी हासिल करने वाले चौधरी लक्ष्मीानाराण का चुनाव क्षेत्र भी यमुना की खादरों का हिस्सा है।
बल्देव (सुरक्षित) से पिछली बार भाजपा की टिकट पर लड़कर चुनाव जीतने वाले पूरन प्रकाश इस बार भी भाजपा के उम्मीमदवार हैं। बल्देव क्षेत्र भी यमुना से अछूता नहीं है और इसके मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा यमुना किनारे बसता है किंतु पूरन प्रकाश ने यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने की दिशा में कभी कोई प्रयास नहीं किया।
ऐसे में गोवर्धन सीट पर चुनाव लड़ने जा रहे प्रत्याशियों से कोई उम्मीद कैसे की जा सकती है क्योंकि उनके अपने चुनाव क्षेत्र का यमुना से कोई सीधा संबंध नहीं है। उनके लिए यमुना प्रदूषण मुक्ति के काम से पल्ला झाड़ना बहुत आसान है।
सच तो यह है कि नेता चाहे कोई पुराना हो अथवा नया, वो जानता है कि यमुना के नाम पर जनभावनाओं का दोहन करना तथा उसकी आड़ लेकर जितने संभव हों उतने वोट बटोरना काफी आसान है इसलिए वह यमुना की बात करता है। वह खूब समझता है कि चुनाव बीत जाने के बाद यमुना प्रदूषण का मुद्दा अगले चुनाव तक के लिए ठंडे बस्ते में चला जाना है। रह-रह कर इसके लिए कोई आवाज़ यदि उठती भी है तो उसे उसी प्रकार अनसुना किया जा सकता है जिस प्रकार अब तक किया जाता रहा है।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
मंगलवार, 22 अक्टूबर 2019
अपने इन हत्यारों को तू कभी क्षमा मत करना मां!
ये वो दिन है, जब नैनीताल हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। अपने इस फैसले में हाई कोर्ट ने जनमानस से मां का दर्जा प्राप्त गंगा और यमुना नदी को वैधानिक व्यक्ति का दर्जा देते हुए लिखा था- इन दोनों नदियों को क्षति पहुंचाना अब किसी इंसान को नुकसान पहुंचाने जैसा माना जाएगा।
ऐसे में आईपीसी के तहत आपराधिक केस चलेगा और आरोपी को उसी तरह सजा सुनाई जाएगी जिस तरह किसी व्यक्ति को क्षति पहुंचाने पर सुनाई जाती है।
अपने फैसले में हाई कोर्ट ने गंगा-यमुना के साथ-साथ इनकी सहायक नदियों, उपनदियों, समस्त जल धाराओं और यहां तक कि पानी के उनसे जुड़े समस्त प्राकृतिक स्रोतों को भी वैधानिक व्यक्ति का दर्जा देने को कहा।
न्यायमूर्ति राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति आलोक सिंह की खंडपीठ ने यूपी और उत्तराखंड की परिसंपत्तियों के बंटवारे से संबंधित एक जनहित याचिका का निस्तारण करते हुए यह आदेश दिया। यह याचिका देहरादून निवासी मोहम्मद सलीम ने दायर की थी।
हाई कोर्ट के आदेश में यह भी निहित था कि गंगा-यमुना को दिए गए अधिकार का उपयोग 3 सदस्यीय एक समिति करेगी। यानी यह समिति इन नदियों को क्षति पहुंचाए जाने से संबंधित सभी मुकदमों की पैरवी करेगी।
इस समिति में उत्तराखंड के मुख्य सचिव, नैनीताल हाई कोर्ट के महाधिवक्ता और नमामि गंगे प्राधिकरण के महानिदेशक शामिल किए गए।
अदालत ने 20 मार्च के अपने इस आदेश में स्पष्ट किया था कि ये तीनों अधिकारी आगे से गंगा के प्रति जवाबदेह भी होंगे।
तारीख 28, महीना अप्रैल, दिन शुक्रवार, सन् 2017
नैनीताल हाई कोर्ट से ‘मानव’ दर्जा मिलने के बाद इस दिन पहली बार गंगा नदी को नोटिस जारी किया। हाई कोर्ट ने ऋषिकेश में प्रस्तावित कूड़ा निस्तारण ग्राउंड (ट्रेंचिंग ग्राउंड) को लेकर गंगा का पक्ष जानना चाहा।
हालांकि इस आदेश को उत्तराखंड सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जिसके बाद जुलाई 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने गंगा-यमुना को जीवित इंसान का दर्जा देने संबंधी फैसला रद्द कर दिया जबकि नैनीताल हाई कोर्ट ने आदेश किसी जल्दबाजी या भावावेश में नहीं सुनाया था।
न्यूजीलैंड की नदी बनी नजीर
याचिकाकर्ता मोहम्मद सलीम की ओर से वरिष्ठ वकील एम सी पंत ने गंगा-यमुना की खराब दशा बताते हुए कोर्ट के समक्ष न्यूजीलैंड में नदी को जीवित प्राणी का दर्जा देने का उदाहरण पेश किया था। उनकी दलील पर कोर्ट ने गंगा-यमुना को भी जीवित प्राणी का दर्जा देने के निर्देश दिए।
पंत का कहना था कि कोर्ट के पास किसी को भी वैधानिक व्यक्ति का दर्जा देने के अधिकार हैं और इसी आधार पर गंगा-यमुना को यह दर्जा दिया गया।
दरअसल, इस आदेश से पहले नैनीताल हाई कोर्ट प्रदूषण एवं पर्यावरण से जुड़े कई मामलों में एक के बाद एक कई फैसले दे चुका था किन्तु उत्तराखंड सरकार ने उन्हें गंभीरता से नहीं लिया।
न्यायालय ने देखा कि नदियों और जंगलों के संरक्षण की जो योजनाएं चल रही हैं, वो सब कागजी हैं, सरकारें उन पर कोई अमल नहीं करतीं वरना देश की प्रमुख नदियां कब की साफ हो चुकी होतीं।
अमेरिका में भी कुछ नदियों को कानूनी अधिकार, रिवर एक्ट भी मौजूद
अमेरिका में भी कुछ नदियों को कानूनी अधिकार प्राप्त हैं और इसके लिए बाकायदा वाइल्ड रिवर एक्ट नाम का एक क़ानून भी बनाया गया है। इस कानून के मुताबिक नदियों को निर्बाध बहने का अधिकार है लिहाजा उन्हें अपने निरंतर बहाव को बचाए रखने का भी अधिकार है।
भारत की बात
अगर बात भारत की करें तो इस देश के लिए गंगा और यमुना महज नदी नहीं हैं। ये यहां की संस्कृति का पर्याय हैं। एक विशाल आबादी के लिए जीवनदायिनी हैं और आस्था का केंद्र भी हैं, इसलिए आवश्यक केवल यह नहीं है कि नदियों के अविरल प्रवाह की चिंता की जाए, बल्कि इन्हें सहेजने के पर्याप्त इंतजाम भी हों क्योंकि ऐसा किए बिना नदियों के ही नहीं, इस देश के भी धार्मिक, सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक महत्व को बचाए रखना मुश्किल होगा।
यमुना की दुर्दशा
उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिला अंतर्गत यमुनोत्री में समुद्र तल से 10804 फीट ऊंची बंदरपूंछ नामक चोटी यमुना नदी का उद्गम स्थल है। 1,376 कि. मी. लंबी यमुना नदी के प्रमुख तीर्थ स्थलों में उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में स्थित विश्राम घाट का बड़ा धार्मिक महत्व है।
सूर्यपुत्री यमुना का विश्राम घाट पर अपने भाई और मृत्यु के देवता यमराज के साथ देशभर में एकमात्र मंदिर है।
ऐसी मान्यता है कि यमद्वितिया (भाईदूज) के दिन विश्राम घाट पर यमुना में स्नान और उसके बाद यमुना व धर्मराज (यम-यमुना) मंदिर के दर्शन करने वालों को यमफांस (बार-बार जन्म और मृत्यु का बंधन) से मुक्ति प्राप्त होती है।
इसी मान्यता के तहत यमद्वितिया के दिन देशभर से विश्राम घाट पर यमुना में डुबकी लगाने हजारों श्रद्धालु प्रतिवर्ष आते हैं।
ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि पतित पावनी की संज्ञा प्राप्त कृष्ण की पटरानी कहलाने वाली कालिंदी (यमुना) क्या अपने धार्मिक महत्व को पूरा कर पा रही है ?
यमुना की दुर्दशा को लेकर सन् 1998 में इलाहाबाद हाई कोर्ट के अंदर एक याचिका डाली गई। हाई कोर्ट ने इस याचिका की गंभीरता के मद्देनजर इसी वर्ष तमाम आदेश-निर्देश जारी किए।
इन आदेश-निर्देशों के तहत जो दो सबसे महत्वपूर्ण थे, उनमें पहला था- श्रीकृष्ण जन्मभूमि से बमुश्किल 500 मीटर की दूरी पर संचालित हो रही उस पशु वधशाला को पूरी तरह बंद करना जिसका रक्त नाले-नालियों के माध्यम से सीधा यमुना में जाकर गिरता था, और दूसरा शहर से दूर एक अत्याधुनिक पशु वधशाला का निर्माण कराना।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने आदेश-निर्देशों का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए मथुरा के एडीएम (प्रशासन) को जहां नोडल अधिकारी नियुक्त कर उसे न्यायिक अधिकार प्रदान किए जिससे वो यमुना प्रदूषण से जुड़े उच्च अधिकारियों से भी जवाब तलब कर आवश्यक कार्यवाही कर सकें वहीं एक 5 सदस्यीय मॉनीटरिंग कमेटी का गठन भी किया। इस कमेटी के अध्यक्ष ए. डी. गिरी बनाए गए। सचिव का पद इलाहाबाद उच्च न्यायालय के ही सीनियर एडवोकेट दिलीप गुप्ता को दिया गया। कमेटी के पदेन सदस्यों में यमुना एक्शन प्लान के प्रोजेक्ट मैनेजर और मथुरा के डीएम व एसएसपी को रखा गया।
वर्ष 2005 में ए. डी. गिरि की मृत्यु के बाद इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने यमुना की सुधि लेना ही लगभग बंद कर दिया। उच्च न्यायालय की इस मामले में उदासीनता का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि ए. डी. गिरी की मृत्यु से रिक्त हुए मॉनीटरिंग कमेटी के अध्यक्ष का पद अब तक नहीं भरा गया जबकि इस बावत प्रार्थना पत्र वर्ष 2007 से न्यायालय में लंबित है।
इसी प्रकार नोडल अधिकारी के रूप में अधिकार प्राप्त एडीएम (प्रशासन) मथुरा के पद पर जो भी अधिकारी आया, उसने कभी न तो अपने अधिकारों को जानना जरूरी समझा और न कर्तव्य को नतीजतन यमुना की प्रदूषण मुक्ति के लिए दिए गए उच्च न्यायालय के आदेश-निर्देश आज 21 साल बाद भी धूल फांक रहे हैं।
जिस पशु वधशाला में कभी प्रतिदिन गिनती के पशु काटे जाते थे आज उसके आसपास अनगिनत पशुओं का अवैध कटान बेराकटोक जारी है क्योंकि अब उस क्षेत्र के अधिकांश घर भी पशु वधशाला में तब्दील हो चुके हैं। जिला प्रशासन एक दिन के लिए भी न तो पशुओं के अवैध कटान पर लगाम लगा पाया और न शहर से दूर अत्याधुनिक Cattle slaughterhouse बनवा पाया। बनवाना तो दूर जिला प्रशासन 21 वर्षों में उसके लिए स्थान तक चिन्हित नहीं कर सका। एक मर्तबा नेशनल हाईवे के निकट कस्बा फरह अंतर्गत चुरमुरा में जमीन चिन्हित की भी गई थी परंतु क्षेत्रीय नागरिकों के भारी विरोध ने प्रशासन को अपने कदम खींचने पर मजबूर कर दिया।
यूं कहने के लिए यमुना की प्रदूषण मुक्ति को आए दिन सभी सरकारी विभागों की बैठकें होती हैं, इन बैठकों में कागजी घोड़े दौड़ाए जाते हैं, जवाब-तलब करने की औपचारिकता भी निभाई जाती है परंतु ठोस कार्यवाही कभी नहीं की जाती।
इस बाबत श्रीकृष्ण जन्मभूमि के OSD और यमुना प्रदूषण के मुद्दे पर लंबे समय से बारीक नजर रखने वाले विजय बहादुर सिंह का कहना है कि लगभग हर दिन वह पुलिस व प्रशासन के आला अधिकारियों को दरेसी रोड क्षेत्र में हो रहे अवैध पशु कटान की लिखित व मौखिक जानकारी देते हैं लेकिन किसी अधिकारी के कान पर जूं नहीं रेंगती।
विजय बहादुर सिंह ने बताया कि कल यानि 20 अक्टूबर की सुबह ही क्षेत्र में अवैध पशु कटान होने की जानकारी उन्होंने अधिकारियों को दी थी। जिसके बाद पहले तो इलाका पुलिस ने अवैध पशु कटान करने वालों को ही शिकायत किए जाने की सूचना दे दी, और फिर यह कह कर पल्ला झाड़ लिया कि शिकायत झूठी पायी गई।
कुछ देर बाद जब पुन: खुलेआम पड़े पशुओं के अवशेष तथा घरों में लटके हुए मीट की फोटो अधिकारियों को उपलब्ध कराई गईं तब करीब आठ घंटे बाद कार्यवाही अमल में लाई जा सकी।
इतने विलंब से उठाए गए कदम का परिणाम यह निकला कि जहां से सैकड़ों किलो मीट बरामद किया जा सकता था, वहां से मात्र दस किलो मीट बरामद हुआ।
दुख की बात यह है कि अवैध पशु कटान करने वालों के दरवाजे तोड़कर मीट बरामद करने वाली पुलिस को एक भी आरोपी मौके पर नहीं मिला।
विजय बहादुर सिंह का कहना है कि आज सुबह फिर उन्होंने उसी क्षेत्र के एक होटल में तीन बोरा मीट सप्लाई किए जाने की जानकारी फूड इंस्पेक्टर को दी लेकिन फूड इंस्पेक्टर ने यह कहते हुए दो टूक जवाब दे दिया कि वह अपने उच्च अधिकारियों के कहने पर ही कानूनी कार्यवाही करेंगे।
श्रीकृष्ण की पावन जन्मस्थली में प्रशासन का यह रुख तो तब है जबकि केंद्र से लेकर प्रदेश तक और राज्य से लेकर जिले तक में भगवाध्वज फहरा रहा है।
विश्व प्रसिद्ध धार्मिक स्थल मथुरा की कुल पांच विधानसभा सीटों में से चार पर भाजपा के विधायक काबिज हैं। इन चार विधायकों में से भी दो योगी सरकार के कद्दावर मंत्री बने बैठे हैं। ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा तो प्रदेश सरकार के प्रवक्ता भी हैं।
2014 से लगातार यहां की जनता ने प्रसिद्ध सिने अभिनेत्री और भाजपा नेत्री हेमा मालिनी को संसद में बैठने का अवसर दिया है।
जिला पंचायत के अध्यक्ष पद को कबीना मंत्री और छाता क्षेत्र के विधायक चौधरी लक्ष्मीनारायण की पत्नी ममता चौधरी सुशोभित कर रही हैं।
पहली बार अस्तित्व में आए मथुरा-वृंदावन नगर निगम के महापौर भी भाजपा के डॉ. मुकेश आर्यबंधु हैं।
आश्चर्य की बात यह है कि इतना सबकुछ होने के बावजूद यहां न तो पशुओं का अवैध कटान रुक पा रहा है और न यमुना की दुर्दशा सुधारने के कोई प्रयास हो रहे हैं।
एक रिपोर्ट के अनुसार यमुना में 80 फीसदी प्रदूषण दिल्ली के 22 किलोमीटर के दायरे में होता है। इसका अर्थ यह हुआ कि दिल्ली से आगे जो कुछ दिखाई दे रहा है, वह सिर्फ और सिर्फ नाले-नालियों तथा सीवर लाइनों की गंदगी है। यमुना जल का उससे दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं रहा।
दिल्ली से मथुरा की दूरी 150 किलोमीटर है और इस 150 किलोमीटर क्षेत्र में दिखाई देने वाली यमुना पूरी तरह मर चुकी है। जाहिर है कि इससे आगे 50 किलोमीटर दूर आगरा में भी यमुना के नाम पर गंदगी ही बहती दिखाई देती है।
मथुरा के 19 और वृंदावन के सभी 18 नालों का गंदा पानी सीधे यमुना में गिर रहा है। ये बात अलग है कि कागजों में उसी प्रकार ये सभी 37 नाले-नालियां टैप किए जा चुके हैं जिस प्रकार दरेसी रोड की पशु वधशाला सील की हुई है।
इन हालातों में पूछा जा सकता है कि क्या एक नदी की बेरहम हत्या करने वालों को कहीं से कोई सजा मिलेगी या देश की अदालतें, सरकार तथा जनमानस सब तमाशबीन बने रहेंगे और यमुना मात्र एक अतीत, इतिहास अथवा किंवदंती बनकर रह जायेगी?
अफसोस कि इनमें से किसी प्रश्न का उत्तर देने वाला आज कोई सामने नहीं।
सामने है तो वही यमुना जिसे मां का दर्जा प्राप्त है और जो मृतप्राय होकर भी जीवन-मरण के बंधन से मुक्ति का मार्ग दिखाती है।
ऐसी पतित पावनी यमुना से अब सिर्फ यही प्रार्थना की जा सकती है कि हे मां! तू कुछ भी करना परंतु अपने इन हत्यारों को कभी क्षमा मत करना, क्योंकि ये क्षमा के लायक नहीं हैं। ये तेरी दया के पात्र भी नहीं हैं।
नैनीताल हाई कोर्ट के आदेश भले ही सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिए हों परंतु देश की बड़ी आबादी के लिए तू आज भी मां है, तेरी बूंद-बूंद में जीवन है, तू जीवन दायिनी है, जीवित है इसलिए तेरी दुर्दशा करने वाला हर व्यक्ति सजा का हकदार है। उसे सजा मिलनी ही चाहिए। फिर चाहे वह न्यायपालिका से जुड़ा हो या कार्यपालिका से, विधायिका से जुड़ा हो अथवा जनसामान्य ही क्यों न हो। तेरे गुनहगार बचने तो नहीं चाहिए।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
शनिवार, 24 फ़रवरी 2018
ब्रज होली रसोत्सव: वाह माननीय वाह…यमुना प्रदूषण का ठीकरा ब्रजवासियों के सिर, और नाच-गाने कराकर कथित विकास का श्रेय खुद को
मथुरा। घोषणा के साथ ही विवादों में घिरे अपने कार्यक्रम ‘ब्रज होली रसोत्सव’ पर सफाई देने के लिए मीडिया के सामने आईं मथुरा की सांसद और सिने अभिनेत्री हेमा मालिनी ने यमुना के प्रदूषण मुक्त न हो पाने का ठीकरा भी मथुरा के ही लोगों के सिर फोड़ने की कोशिश तो की परंतु कार्यक्रम को लेकर उठ रहे सवालों का कोई जवाब अंत तक नहीं दिया।
एक कलाकार होने के नाते जब मैं मुंबई जाती हूं तो हमारे कलाकार मित्र हमेशा मुझसे कहते हैं कि आप मथुरा की सांसद हैं, आप हमें भी वहां लेकर चलिए। हम वहां गाना चाहते हैं, नृत्य करना चाहते हैं। उनकी हमेशा मांग रही है, और इसीलिए हमने दो साल पहले ‘मथुरा महोत्सव’ किया था जो बहुत ही सफल रहा। हमने सारे बॉलीवुड आर्टिस्ट को बुलाकर यह कार्यक्रम किया था। ऐसे कार्यक्रमों से मथुरा की शान बढ़ती है क्योंकि मैं मथुरा की सांसद हूं। एक साल पहले इसी प्रकार का एक कार्यक्रम मैंने ‘रसोत्सव’ के नाम से किया था। उसमें मैंने अपनी विश्व विख्यात नृत्य नाटिका ‘यशोदा-कृष्ण, राधाकृष्ण’ पेश किया था।
इसके बाद हेमा मालिनी ने कहा कि हम तो चाहते थे कि यमुना को शुद्ध करो, मथुरा के लोगों ने जो नहीं किया उनसे मैं रिक्वेस्ट करती हूं कि आप लोग यमुना को शुद्ध करो। प्रदूषित है इतना, गंदगी डालकर खराब हो गया है इतना। ये मथुरा वालों की भी जिम्मेदारी है कि उन्हें यमुना को साफ-सुथरा रखना चाहिए। अचानक उनके मन में आया कि मैं उसको खराब करने वाली हूं, तो वो एनजीटी मैं पहुंच गए और मेरे कार्यक्रम पर रोक लगवा दी। मैं एनजीटी से परमीशन लेकर यमुना किनारे कार्यक्रम कर सकती हूं किंतु उसमें समय लगेगा। हालांकि मैंने दृढ़ संकल्प लिया है कि यमुना किनारे जहां अभी कार्यक्रम नहीं हो सका, वहां पर बहुत जल्द कार्यक्रम होगा और जिन लोगों ने विरोध किया है उन्हें मानना पड़ेगा कि हमारे कल्चरल कार्यक्रमों से पर्यटन को कितना बढ़ावा मिलता है।
हेमा मालिनी ने कहा कि समय की कमी को देखते हुए मैंने इस कार्यक्रम को शिफ्ट किया और अब यह कार्यक्रम उसी तरह वेटरिनरी यूनिवर्सिटी के प्रांगण में होगा। मथुरा के मुक्ताकाशीय रंगमंच को भी जल्द से जल्द तैयार कराने का मैंने प्रयास किया ताकि मथुरा में सांस्कृतिक कार्यक्रम चलते रहें।
हेमा मालिनी के अनुसार सांसद का काम केवल रोड बनवाना, बिजली दिलवाना और उद्धाटन करते रहना ही नहीं है। कल्चरल प्रोग्राम भी होने चाहिए जिससे ब्रज की कलाओं को बढ़ावा मिले।
अपनी उपलब्धियों गिनाने, यमुना प्रदूषण के लिए मथुरा के ही लोगों को जिम्मेदार ठहराने और उन्हें यमुना किनारे ही अपना कार्यक्रम शीघ्र करने की चुनौती देकर हेमा मालिनी उन सभी सवालों का जवाब दिए बिना उठकर चलती बनीं जिनके कारण उनके कार्यक्रम तथा बतौर सांसद उनकी मंशा पर भी सवाल उठ रहे हैं।
हां, इस दौरान वह यह बताना नही भूलीं कि अगर मथुरा की जनता चाहेगी तो वह अवश्य यहां से दोबारा सांसद बनना चाहेंगी।
हेमा मालिनी को दूसरी मर्तबा मथुरा से संसद पहुंचने का सपना संजाेने से पहले यह भी सोच लेना चाहिए था कि एकबार तो उनके पति अभिनेता धर्मेन्द्र भी राजस्थान के बीकानेर से लोकसभा चुनाव जीतने में सफल रहे थे। मथुरा से जीत के बाद हेमा मालिनी की कार्यप्रणाली अपने पति धर्मेन्द्र से कोई बहुत अलग नहीं रही है।
गौरतलब है कि आज यानि 23 फरवरी को हेमा मालिनी के इसी कार्यक्रम को लेकर एनजीटी में सुनवाई होनी है। पिछली तारीख 15 फरवरी को सुनवाई के बाद एनजीटी ने न सिर्फ कायर्क्रम को यमुना किनारे करने पर रोक लगा दी थी बल्कि ‘नमामि गंगे’ तथा ‘प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड’ से जवाब तलब भी किया था।
बताया जाता है कि इन दोनों सरकारी संस्थाओं ने यमुना किनारे अब कार्यक्रम न करके वेटरिनरी यूनिवर्सिटी में किए जाने संबंधी साक्ष्यों के साथ अपना जवाब एनजीटी के समक्ष पेश कर दिया है लिहाजा आगे कोई आदेश आने की संभावना कम है।
रहा सवाल हेमा मालिनी द्वारा यमुना किनारे ही जल्द इसी तरह का कार्यक्रम करने की चुनौती देने का, तो उसकी भी उम्मीद काफी कम है क्योंकि प्रथम तो एनजीटी यमुना प्रदूषण के मुद्दे पर बेहद गंभीर है और दूसरे दिल्ली में यमुना किनारे आध्यात्मिक गुरू श्री-श्री रविशंकर की संस्था ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ द्वारा कराए गए कल्चरल प्रोग्राम की नजीर उसके सामने है।
उस कार्यक्रम में प्रधानमंत्री द्वारा शिरकत किए जाने के बावजूद एनजीटी ने यह माना कि आर्ट ऑफ लिविंग द्वारा कराए गए कार्यक्रम से यमुना और उसके किनारे के पर्यावरण को काफी नुकसान हुआ। एनजीटी ने आर्ट ऑफ लिविंग के कार्यक्रम से हुए नुकसान की भरपाई के लिए संस्था पर 5 करोड़ रुपए का बड़ा जुर्माना भी ठोका।
जहां तक प्रश्न हेमा मालिनी द्वारा यमुना के प्रदूषण का ठीकरा मथुरावासियों के ही सिर फोड़ने की कोशिश का है तो हेमा मालिनी को जान लेना चाहिए कि मथुरावासी तो 32 साल से मथुरा को प्रदूषण मुक्त कराने की लड़ाई विभिन्न स्तर पर लड़ रहे हैं।
सबसे पहले यमुना के लिए 16 मार्च 1985 को तत्कालीन जिलाधिकारी राजेन्द्र सिंह यादव के समक्ष उनके आवास पर गोपेश्वर चतुर्वेदी के नेतृत्व में आवाज़ बुलंद की गई थी। इस मामले में तब गोपेश्वर चतुर्वेदी सहित कई प्रमुख लोगों के खिलाफ संगीन धाराओं में केस भी दर्ज किया गया था।
उसके बाद जनवरी 1998 में प्रमुख पर्यावरणविद् और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता एम. सी. मेहता और गोपाल पीठाधीश्वर विठ्ठलेशजी महाराज के नेतृत्व में बड़ा धरना प्रदर्शन किया गया।
तब गंगा प्रदूषण की कोर्ट में लड़ाई लड़ रहे एम. सी. मेहता ने जब यहां यमुना की दुर्दशा अपनी आंखों से देखी तो उन्होंने यमुना प्रदूषण के मुद्दे को भी कोर्ट में ले जाना ज्यादा मुनासिब समझा। उसके बाद गोपेश्वर चतुर्वेदी के नाम से इलाहाबाद उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका 1644/98 डाली गई जिसे जनवरी 1998 में ही कोर्ट से स्वीकार करते हुए यमुना कार्य योजना के तहत मथुरा-वृंदावन का मामला शामिल किया और तमाम आदेश-निर्दश जारी दिए।
गोपेश्वर चतुर्वेदी बनाम स्टेट ऑफ यूपी एंड अदर्स के नाम से दाखिल इस याचिका की सुनवाई के बाद दिए गए आदेश-निर्देशों के अनुपालन हेतु कोर्ट ने ही एडीएम स्तर के एक अधिकारी को बहुत से अतिरिक्त अधिकारों सहित यमुना कार्य योजना का स्थानीय नोडल अधिकारी भी बनाया।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश-निर्देशों से यमुना में गिरने वाले मथुरा के सभी 19 नाले और वृंदावन के 18 नाले पहली बार टेप किए गए और यमुना जल को शुद्ध बनाए रखने के दूसरे अनेक प्रयास शुरू हुए।
यह बात अलग है कि प्रशासनिक शिथिलता के कारण सन् 2000 के बाद इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश-निर्देशों की जो धज्जियां उड़नी शुरू हुईं, वह अब तक उड़ाई जा रही हैं।
दरअसल, सन् 2000 के बाद जितने भी नोडल अधिकारी यहां रहे, उनमें से किसी ने न तो अपने अधिकार जानना जरूरी समझा और न कभी यमुना के प्रति अपना कर्तव्य निभाया। यह सिलसिला अब भी जारी है। नतीजतन यमुना दिन-प्रतिदिन पहले से कई गुना अधिक प्रदूषित हो रही है।
गोपेश्वर चतुर्वेदी आज भी यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने की दोहरी लड़ाई लड़ रहे हैं। एक ओर इलाहाबाद उच्च न्यायालय में तो दूसरी ओर नेशनल ग्रीन ट्रेब्यूनल (एनजीटी) में।
गोपेश्वर चतुर्वेदी के अलावा मथुरा के ही कांतानाथ चतुर्वेदी और महेन्द्र नाथ चतुर्वेदी भी न्यायालय के माध्यम से यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने की लड़ाई लड़ रहे हैं।
इनके अलावा वृंदावन के प्रमुख पत्रकार रहे और इस समय समाज सेवा से जुड़े मधुमंगल शुक्ला ने यमुना प्रदूषण के मुद्दे पर वर्ष 2010 में याचिका दाखिल की थी और वर्ष 2015 में एनजीटी का गठन होने के बाद वहां भी मूव किया।
मधुमंगल शुक्ला के प्रयासों का ही नतीजा है कि आज यमुना की खादरों में किया गया बेहिसाब अवैध निर्माण गिराया जाने लगा है और यमुना रिवर फ्रंट के कार्य पर एनजीटी ने पूरी नजर बना रखी है।
यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने की एक लड़ाई अपने स्तर से बरसाना (मथुरा) स्थित मान मंदिर के महंत रमेश बाबा भी लड़ रहे हैं। रमेश बाबा के सानिध्य में उनके शिष्य रहे बाबा जयकृष्ण दास ने यमुना रक्षक दल के बैनर तले करीब 50 हजार लोगों के साथ मार्च 2013 में मथुरा से दिल्ली के लिए कूच किया था।
जयकृष्ण दास के काफिले को देखकर घबराई तत्कालीन यूपीए सरकार के केंद्रीय जल संसाधन मंत्री हरीश रावत ने बाबा से मुलाकात कर यमुना को प्रदूषण मुक्त करने की एक रूपरेखा उनके सामने प्रस्तुत की, जिसके बाद जयकृष्ण दास फरीदाबाद से वापस लौट आए। बाद में हरीश रावत के सरकारी आश्वासन का भी वही हश्र हुआ जैसा सभी सरकारों के आश्वासन का होता आया है।
यमुना प्रदूषण के मुद्दे पर बाबा जयकृष्ण दास का साथ स्थानीय अन्य लोगों ने भी दलगत राजनीति से ऊपर उठकर दिया। इनमें भारतीय किसान यूनियन (भानु गुट), कांग्रेसी नेता राकेश यादव व अब्दुल जब्बार, समाजवादी पार्टी के तत्कालीन महानगर अध्यक्ष डॉ. अशोक अग्रवाल, वृंदावन के जुझारु नेता उदयन शर्मा आदि प्रमुख रूप से शामिल रहे। पंकज बाबा ने भी यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने के इस आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। ये सभी लोग आज भी अपने-अपने स्तर से यमुना को बचाने की जद्दोजहद में लगे हैं। रमेश बाबा ने तो एकबार फिर मार्च में दिल्ली कूच करने का एलान कर रखा है।
आश्चर्य की बात यह है कि कल की अपनी प्रेस कांफ्रेंस में यमुना प्रदूषण का ठीकरा ब्रजवासियों के सिर ही फोड़ने की हेमा मालिनी की कोशिश का जिक्र तक स्थानीय मीडिया ने अपने समाचारों में नहीं किया और सिर्फ उनके कार्यक्रम का ब्यौरा देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली जबकि हेमा मालिनी का यह प्रयास मथुरावासियों के प्रति पूर्वाग्रह तथा आत्मप्रशंसा से भरा था।
होली रसोत्सव संबंधी विज्ञापनों के बोझ तले दबे और कार्यक्रम के पास पाने की अभिलाषा में हेमा मालिनी से स्थानीय पत्रकारों ने यह पूछना भी जरूरी नहीं समझा कि दो साल पहले उनके द्वारा किए गए ‘मथुरा महोत्सव’ तथा एक साल पहले किए गए ‘रसोत्सव’ से मथुरा के पर्यटन में कितनी वृद्धि हुई। उन्होंने अपने कार्यक्रमों में यहां की संस्कृति और उससे जुड़े यहां के लोगों को कितना बढ़ावा दिया और मुक्ताकाशीय रंगमंच का निर्माण कराने में वह क्यों सफल नहीं हुईं।
यमुना के लिए मथुरावासियों को उनका कर्तव्य याद दिलाने वाली हेमा मालिनी से किसी ने यह भी पूछना मुनासिब नहीं समझा कि उन्होंने अपने करीब चार साल के संसदीय कार्यकाल में यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने का क्या प्रयास किया।
हेमा मालिनी से यह प्रश्न भी नहीं किया गया कि अब उनके द्वारा कराए जा रहे इस कार्यक्रम में कितने स्थानीय कलाकारों को तरजीह दी गई है क्योंकि जिन सुनामधन्य कलाकारों का जिक्र हेमा मालिनी ने किया वह किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं। पंडित जसराज और हरिप्रसाद चौरसिया अपने-अपने फन के वो माहिर उस्ताद हैं कि हेमा मालिनी उनके सामने कहीं नहीं टिकतीं।
बेशक ये दिग्गज कलाकार देश की शान और पहचान हैं किंतु मथुरा में इनके कार्यक्रम मथुरा की कला व संस्कृति को कैसे समृद्ध करेंगे, यह बात समझ से परे है।
यूं भी देखा जाए तो महाभारत नायक योगीराज श्रीकृष्ण की जन्मस्थली को नामचीन कलाकारों के कार्यक्रमों से अधिक नेकनीयत रखने वाले नेताओं की दरकार है क्योंकि बाहरी नेताओं से मथुरावासी पहले भी धोखा खाते रहे हैं।
हरियाणा से आए मनीराम बागड़ी से लेकर स्वामी सच्चिदानंद साक्षी तक और जयंत चौधरी से लेकर हेमा मालिनी तक, जितने भी नेताओं ने मथुरा से अपनी संसदीय पारी शुरू की, उन सभी ने मथुरा की जनता को निराश किया।
एकबार और मथुरा से संसद पहुंचने का ख्वाब देखने वालीं सिने तारिका कम से कम स्थानीय जनता की नब्ज टटोल लें, साथ ही पार्टी स्तर पर भी पता कर लें कि वह उन्हें फिर चुनाव में उतारने का जोखिम उठाने को तैयार है भी या नहीं, तो उनके लिए बेहतर होगा।
आत्ममुग्ध सांसद हेमा मालिनी ने प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि केवल सड़क बनवाना और बिजली मुहैया कराना ही उनका काम नहीं है। कल्चरल प्रोग्राम भी करते रहना चाहिए जिससे ब्रज की कलाओं को बढ़ावा मिले।
अच्छा होता यदि सांसद यह भी बता देतीं कि उन्होंने मथुरा जनपद में अपने प्रयासों से कितनी सड़क बनवाई हैं और बिजली की सुचारु आपूर्ति के लिए कितने प्रयास किए हैं।
हां, उद्घाटन करने वह समय-समय पर जरूर आती रही हैं किंतु उनका ब्यौरा जनता ने रखना जरूरी नहीं समझा होगा।
कौन नहीं जानता कि 2017 में उत्तर प्रदेश की सत्ता पर योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली सरकार के काबिज होने तथा मथुरा-वृंदावन क्षेत्र के विधायक श्रीकांत शर्मा को ऊर्जा मंत्रालय मिलने के बाद ही मथुरा जनपद की विद्युत समस्या का समाधान हुआ है अन्यथा इससे पहले शहर को भी बमुश्किल 12-14 घंटे ही बिजली मिल पाती थी परंतु सांसद ने कभी कोई प्रयास नहीं किए।
अपनी प्रेस कांफ्रेंस में कथित उपलब्धियों और आगामी सांस्कृतिक कार्यक्रमों का ऐलानी खाका खींचने वाली हेमा मालिनी ने अंत तक यह नहीं बताया कि यह ब्रजभूमि विकास ट्रस्ट क्या है और इसके पदाधिकारी कौन-कौन हैं।
हेमा मालिनी समय-समय पर यह तो कहती रही हैं कि वह ब्रज के विकास के लिए एक ट्रस्ट का गठन करके देश-विदेश से पैसा इकठ्ठा करेंगी परंतु वह ट्रस्ट कौन सा है, इसकी जानकारी कभी नहीं दी।
गौरतलब है कि होली रसोत्सव के नाम से बड़ी रकम एकत्र किए जाने की खासी चर्चा है और माथुर चतुर्वेद परिषद ने भी अपनी प्रेस कांफ्रेंस में इसका उल्लेख यह कहते हुए किया था कि फिल्म तो दिखानी ही पड़ेगी क्योंकि टिकट जो बिक चुकी हैं।
माथुर चतुर्वेद परिषद ने यह बात उस समय कही जब उन्हें बताया गया कि हेमा मालिनी का कार्यक्रम तो अब भी होने जा रहा है। फर्क केवल इतना है कि अब वह यमुना पार न होकर वेटरिनरी के प्रांगण में होगा।
हेमा मालिनी ने अपनी प्रेस कांफ्रेंस में माथुर चतुर्वेद परिषद के एनजीटी पहुंच जाने तथा एनजीटी से यमुना किनारे प्रस्तावित कार्यक्रम पर रोक लगा देने की बात तो बताई परंतु परिषद के इस आरोप का कोई उत्तर नहीं दिया कि जब टिकट बिक गए तो फिल्म दिखानी पड़ेगी।
इसी प्रकार होली रसोत्सव के सहआयोजकों में ब्रजभूमि विकास ट्रस्ट का उल्लेख अवश्य किया गया है किंतु उसका कोई पदाधिकारी, कार्यक्रम की किसी प्रेस कांफ्रेंस का हिस्सा नहीं बना जबकि पहली प्रेस कांफ्रेंस समन्वयक बताए गए अनूप शर्मा ने तथा दूसरी खुद हेमा मालिनी ने की।
दोनों ही प्रेस कांफ्रेंस के वक्त उत्तर प्रदेश के पर्यटन विभाग और तीर्थ विकास ट्रस्ट की ओर से भी किसी की नुमाइंदगी न होना शंका तो प्रकट करता है क्योंकि इन्हें मात्र विज्ञापन का हिस्सा बनाकर छोड़ दिया गया।
ऐसा नहीं है कि होली रसोत्सव करने के तौर-तरीकों से माथुर चतुर्वेद परिषद को ही शिकायत हुई हो, भाजपा का एक बड़ा वर्ग भी आयोजन के मकसद को न तो समझ पा रहा है और न पचा पा रहा है क्योंकि इसका औचित्य उनकी समझ से परे है।
यही कारण है कि कार्यक्रम की घोषणा से लेकर आज तक हेमा मालिनी के इर्द-गिर्द सिर्फ ऐसे लोगों का जमावड़ा रहा है जिनकी पार्टी में भी कोई पूछ नहीं रह गई और जो हर वक्त किसी न किसी की आड़ में अपना चेहरा चमकाने का प्रयास करते रहते हैं।
जाहिर है कि इतने सारे प्रश्नों और आरोपों के बीच आज से शुरू होने जा रहे होली रासोत्सव का कल समापन तो हो जाएगा लेकिन जो प्रश्न इसके आयोजकों पर उठे हैं, वह 2019 के लोकसभा चुनावों तक भाजपा और हेमा मालिनी का पीछा नहीं छोड़ने वाले।
ऐसे में हेमा मालिनी खुद सोच लें कि पार्टी द्वारा उतारे जाने के बाद भी क्या 2019 का लोकसभा चुनाव जीतना उनके लिए आसान होगा, और क्या वह तब भी इसी प्रकार किसी प्रश्न का जवाब दिए बिना सिर्फ अपनी बात कहकर प्रेस कांफ्रेंस से उठ पाएंगी।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी




