सोमवार, 8 मई 2017

जवाहर बाग कांड का जिन्‍न ”रामवृक्ष” फिर बोतल से बाहर, CBI के सामने चुनौती

मथुरा का जवाहर बाग कांड आज ठीक साढ़े 10 महीने बाद एकबार फिर तब सुर्खियों में आ गया जब पता लगा कि उक्‍त कांड को अंजाम देने वाले तथाकथित सत्‍याग्रहियों के सरगना रामवृक्ष यादव के कथित शव का डीएनए उसके लड़के से मैच नहीं कर रहा।
पुलिस ने रामवृक्ष यादव के कथित शव का डीएनए टेस्‍ट हैदराबाद फोरेंसिक साइंस लेबोरेट्री से कोर्ट के आदेश पर इसलिए करवाया था क्‍योंकि कोर्ट ने उपद्रव के दौरान रामवृक्ष के मारे जाने का पुलिसिया दावा पूरी तरह खारिज कर दिया था।
विभिन्‍न याचिकाओं के आधार पर कोर्ट द्वारा रामवृक्ष के शव को लेकर व्‍यक्‍त की गई शंका आज हैदराबाद फोरेंसिक साइंस लेबोरेट्री की रिपोर्ट के बाद सही साबित हुई।
ऐसे में अब सबसे बड़ा सवाल यह पैदा होता है कि जिस व्‍यक्‍ति के अवशेषों को पुलिस ने रामवृक्ष का शव बताकर कहानी गढ़ी, वह शव रामवृक्ष का नहीं था तो रामवृक्ष गया कहां और जिसके शव को रामवृक्ष का बताया गया, वह शव आखिर किसका था?
इसके अलावा भी कई अन्‍य महत्‍वपूर्ण सवाल खड़े होते हैं। मसलन, पुलिस को किसी का भी शव रामवृक्ष का बताने की जरूरत क्‍या थी?
क्‍या पुलिस जानती थी कि वह रामवृक्ष के शव को लेकर झूठा दावा कर रही है और यदि उसने यह झूठा दावा किया तो किसे बचाने के लिए किया जबकि पुलिस के ही दो जांबाज अफसरों की रामवृक्ष व उसके गुर्गों ने जवाहर बाग के अंदर घेरकर बेरहमी से हत्‍या कर दी थी।
जाहिर है कि इन सभी प्रश्‍नों के उत्तर यदि कोई दे सकता है तो वही तत्‍कालीन पुलिस अफसर दे सकते हैं जिन्‍होंने जवाहर बाग कांड को अंजाम दिलाने में जाने-अनजाने बड़ी भूमिका अदा की।
2 जून 2016 से पहले के दो सालों में जिन-जिन पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों ने मथुरा को सुशोभित किया, उन्‍होंने ही इस कांड की पटकथा अपने-अपने हिसाब से लिखी नतीजतन अदना सा रामवृक्ष एक ऐसा विषवृक्ष बन बैठा जिसे उखाड़ फेंकना बहुत भारी पड़ गया।
फिलहाल, जवाहर बाग कांड की जांच हाईकोर्ट के आदेश पर सीबीआई द्वारा की जा रही है लिहाजा अब सच्‍चाई का पता लगाने की जिम्‍मेदारी सीबीआई पर है। सीबीआई के लिए निश्‍चित ही इस कांड की परतें उघाड़ना किसी चुनौती से कम नहीं होगा क्‍योंकि इसकी जड़ें एक ओर जहां राजनीतिक गलियारों से जुड़ी हैं वहीं दूसरी ओर ब्‍यूरोक्रेट्स से ताल्‍लुक रखती हैं।
बताया जाता है कि रामवृक्ष यादव को गायब करने का मकसद ही यह था कि किसी भी प्रकार उसके राजनीतिक संरक्षणदाताओं का खुलासा न हो पाए और न यह पता लग पाए कि रामवृक्ष की योजना में कौन-कौन पर्दे के पीछे से शामिल था।
सर्वविदित है कि जिस प्रकार रामवृक्ष ने पूरे दो साल तक पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों को उनकी नाक के नीचे रहकर खुली चुनौती दी और अपना पूरा साम्राज्‍य खड़ा किया, वह उसके अकेले के बस की बात नहीं थी। सैकड़ों लोगों की भोजन व्‍यवस्‍था करना भी आसान काम नहीं था। हथियारों से लेकर वाहनों तक का जखीरा उसने यूं ही इकठ्ठा नहीं कर लिया होगा। कोई तो होगा जिसने एक सामान्‍य कद काठी के बुजुर्ग को इतनी पॉवर दे रखी थी कि वह समूचे जिले के सरकारी अमले को अपनी ठोकर पर रखता था और उनकी खुलेआम बेइज्‍जती करता था।
हजारों करोड़ रुपए मूल्‍य की जिस सरकारी जमीन पर वह अवैध रूप से काबिज था, उसकी बाउंड्री के अंदर बिना उसकी इजाजत के घुसने की कोई हिम्‍मत नहीं करता था।
2 जून 2016 की शाम एसपी सिटी मुकुल द्विवेदी तथा एसओ फरह संतोष यादव ने जब रामवृक्ष की मर्जी के खिलाफ जवाहर बाग की बाउंड्री तोड़कर घुसने की हिम्‍मत दिखाई तो उसने दोनों अफसरों की जान ले ली।
ज़रा अंदाज लगाइए कि रामवृक्ष व उसके गुर्गों का रूप कितना वीभत्‍स रहा होगा कि इन दोनों पुलिस अफसरों के हमराह तक उनका साथ छोड़कर भाग खड़े हुए।
बहरहाल, इसमें शायद ही किसी को शक हो कि यदि जवाहर बाग कांड का पूरा सच किसी तरह सामने आ गया तो बहुत से ऐसे चेहरे बेनकाब होंगे जिनका उस समय की सत्ता से सीधा संबंध रहा है। फिर वो चाहे राजनेता हों अथवा नौकरशाह।
रहा सवाल इस बात का कि क्‍या रामवृक्ष जीवित है, तो इसकी संभावना बहुत कम है क्‍योंकि पुलिस इतनी कच्‍ची गोलियां कभी नहीं खेलती।
पुलिस के तत्‍कालीन अफसर भली प्रकार जानते थे कि यदि रामवृक्ष जिंदा बच गया तो वह सबका कच्‍चा चिठ्ठा खोल देगा, और कच्‍चा चिठ्ठा एकबार सामने आ गया तो उसके परिणाम बहुत दूरगामी होंगे।
यह बात अलग है कि जिस व्‍यक्‍ति के अवशेषों को पुलिस ने रामवृक्ष का शव बताकर सारी कहानी का पटाक्षेप करना चाहा, वह रामवृक्ष का नहीं निकला।
सच तो यह है कि पुलिस सबकुछ पहले से जानती थी और उसने रामवृक्ष को लेकर भी जो कहानी गढ़ी, वह पूर्व नियोजित थी।
पुलिस जानती थी कि रामवृक्ष उसके लिए जितना बड़ा सिरदर्द जिंदा रहते बना रहा, उतना ही मरने के बाद उस स्‍थिति में बन जाता जिस स्‍थिति में उसे उसका पोस्‍टमॉर्टम कराना पड़ता।
पुलिस ने इसीलिए रामवृक्ष के जिंदा रहने अथवा मारे जाने को एक रहस्‍य बनाकर छोड़ दिया। पुलिस बहुत अच्‍छी तरह जानती थी कि इस रहस्‍य से पर्दा उठाना किसी के लिए आसान नहीं होगा। सीबीआई के लिए भी नहीं।
-लीजेंड न्‍यूज़

रविवार, 9 अप्रैल 2017

सबसे बड़ी चुनौती: क्‍या पुलिस का DNA बदल पाएगी योगी सरकार ?

गोरखनाथ पीठ के महंत और उत्तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ के सामने अब यदि सबसे बड़ी चुनौती कोई है तो वह है राज्‍य पुलिस की उसके DNA से निर्मित छवि को बदलना। वह छवि जो स्‍वतंत्र भारत में भी ठीक वैसी ही है, जैसी स्‍वतंत्रता से 86 साल पहले उसके गठन के समय थी।
पुलिस की छवि को लेकर कोई ”अपवाद” भी नहीं है। पुलिस का चरित्र देशभर में कमोबेश एक जैसा है। फिर चाहे उत्तर प्रदेश हो या बिहार, राजस्‍थान हो या मध्‍यप्रदेश, उत्तराखंड हो या पश्‍चिम बंगाल, जम्‍मू-कश्‍मीर हो अथवा तमिलनाडु, दिल्‍ली हो या दूसरे केंद्र शासित प्रदेश।
कश्‍मीर से लेकर कन्‍या कुमारी तक पुलिस के समान आचार-व्‍यवहार एवं चाल-चरित्र का कारण जानने से पहले उसका डीएनए जानना जरूरी है।
दरअसल, 1861 में बने पुलिस अधिनियम के मुताबिक ही देश के अधिकांश राज्यों की पुलिस आज भी काम कर रही है। फिरंगियों ने ये अधिनियम आम जनता का दमन करने के लिए ही बनाया था। 1857 के विद्रोह की किसी भी सूरत में पुनरावृत्ति न हो इसलिए खाकी को ऐसे खौफ से सुसज्‍जित किया गया जिसके सामने कोई सिर उठाने की जुर्रत न कर पाए।
1947 में देश स्‍वतंत्र हो गया लेकिन पुलिस अधिनियम जस का तस बना रहा। यानि उसके डीएनए में कोई बदलाव नहीं हुआ। यह डीएनए ही पुलिस को आम पब्‍लिक का दमन करने के लिए प्रेरित करता था इसलिए वह आज तक वही कर रही है।
कुछ राज्यों ने नए अधिनियम बनाकर पुलिस को संचालित करने की कोशिश की लेकिन वह सफल नहीं हुए क्‍योंकि उनके नए अधिनयम, पुराने अधिनियम से बहुत अलग नहीं थे।
करीब 243286 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले और 2011 की जनगणना के मुताबिक लगभग 20 करोड़ से ज्यादा जनसंख्या वाले उत्तर प्रदेश को न केवल देश, बल्कि पूरी दुनिया के लिए सबसे बड़ा एकल पुलिस बल होने का गौरव प्राप्त है।
उत्तर प्रदेश पुलिस के महानिदेशक कहने को तो 75 जिलों में 33 सशस्त्र बटालियनों, खुफिया, जांच, भ्रष्टाचार निरोधी, तकनीकी, प्रशिक्षण, अपराध विज्ञान इत्यादि से संबन्धित विशेषज्ञ प्रकोष्ठ/शाखाओं में फैले करीब 2.5 लाख कर्मियों की कमान संभालते हैं किंतु हकीकत यह है कि अनुशासन के लिए पहचाना जाने वाला पुलिस बल अब अधिकारियों के नियंत्रण से बाहर होता जा रहा है।
जरूरत से ज्‍यादा राजनीतिक दखल, भ्रष्‍टाचार, जातिवाद और अनुशासनहीनता के चलते पुलिस किस कदर निरंकुश हो चुकी है इसका अंदाज वर्तमान डीजीपी जावीद अहमद के कथन से लगाया जा सकता है।
प्रदेश पुलिस के मुखिया ने कल ही यह स्‍वीकारा है कि पुलिस में काफी लोगों की अपराधियों से सांठगांठ है। पश्‍चिमी उत्तर प्रदेश अर्थात मेरठ, मुजफ्फरनगर, गाजियाबाद, नोएडा, मथुरा, आगरा आदि में उन्‍होंने ऐसे पुलिसकर्मियों की भरमार बताई है जो अपराधियों से मिले हुए हैं। योगी सरकार की सख्‍ती को देखते हुए हालांकि उन्‍होंने ऐसे पुलिसजनों की सूची तैयार कर उनके खिलाफ कठोर कार्यवाही करने की बात कही है किंतु यह काम इतना आसान नहीं है।
मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ द्वारा पिछले तीन दिनों से लगातार लगाए जा रहे जनता दरबार में सर्वाधिक शिकायतें पुलिस को लेकर ही आई हैं। ये शिकायतें बता रही हैं कि हत्‍या, अपहरण, लूट, बलात्‍कार, डकैती, ड्रग्‍स की तस्‍करी तथा जमीनों पर कब्‍जे जैसी संगीन आपराधिक वारदातों में पुलिस ने न केवल अपराधियों को संरक्षण दिया बल्‍कि आवश्‍यकता पड़ने पर सक्रिय भूमिका भी निभाई।
स्‍वतंत्रता के 69 सालों बाद पुलिस की छवि सुधरने की बजाय दिन-प्रतिदिन वीभत्‍स होते जाने का एक अन्‍य प्रमुख कारण उसकी वह ”थ्‍योरी” भी है जिसे कांटे से कांटा निकालने का नाम दिया जाता है।
पिछले ढाई दशक में पुलिस ने इस थ्‍योरी को जैसे आत्‍मसात कर लिया है अन्‍यथा इससे पूर्व पुलिस अपराधियों की धर-पकड़ के लिए मुखबिरों का बड़े पैमाने पर इस्‍तेमाल करती थी। मुखबिर भी इसके लिए पुलिस से आर्थिक व सामाजिक संरक्षण प्राप्‍त करते थे।
कांटे से कांटा निकालने की थ्‍योरी के तहत पुलिस ने मुखबिरों की जगह बदमाशों का इस्‍तेमाल करना शुरू कर दिया। एक बदमाश की पीठ पर हाथ रखकर वह या तो खुद उससे दूसरे बदमाश को मरवाने लगी या फिर उसके कंधे पर बंदूक रखकर चलाने लगी। पुलिस की इस थ्‍योरी पर चलने का परिणाम यह हुआ कि उसके कुख्‍यात अपराधियों से संबंध प्रगाढ़ होते गए। रही-सही कसर अपराधियों के राजनीतिककरण ने पूरी कर दी। सत्ता के साथ पुलिस की निष्‍ठा जुड़ गई और फिर यही निष्‍ठा सत्ता पर काबिज होने वाले जाति विशेष के लोगों से जुड़ने लगी। देखते-देखते पुलिस बल जातिगत खांचों में बंट गया। सत्ता बदलने के साथ पुलिसजनों की नेमप्‍लेट पर जाति को प्रमुखता से दर्शाने का जैसे रिवाज चल पड़ा।
सत्ता के गलियारों तक अदना से अदना पुलिसकर्मी की पहुंच ने उसके मन से अधिकारियों का भय दूर कर दिया और अधिकारी भी यह सोचने पर मजबूर हो गए कि पता नहीं कौन कब उनके ऊपर भारी पड़ जाए। उच्‍चाधिकारियों की बात तो दूर थाने तथा चौकियों पर भी तैनाती सीधे ऊपर से होने लगी और अधिकारी सिर्फ कागजी घोड़े बनकर रह गए।
पुलिस के पहले से दोषयुक्‍त डीएनए में अनुशासनहीनता की इस मिलावट ने हालात कुछ ऐसे बना दिए कि वह अपने सूत्र वाक्‍य ‘परित्राणाय साधुनाम विनाशाय च दुष्कृताम’ से पूरी तरह भटक गई।
गीता जैसे धार्मिक ग्रंथ के एक श्‍लोक से लिए गए इस सूत्र वाक्‍य में निहित ”सज्जन व्यक्तियों की रक्षा और दुष्टों का नाश”, पुलिस के लिए सिर्फ थाने-चौकियों की दीवारों पर उकेरने भर के लिए रह गया।
सच तो यह है कि पुलिस का आचरण समय के साथ अपने सूत्र वाक्‍य से ठीक उलट दिखाई देने लगा लिहाजा सज्‍जन व्‍यक्‍ति पुलिस से जबर्दस्‍त खौफ खाने लगे और दुष्‍टजन उनके सहोदर बन बैठे।
पिछले कुछ समय से तो आलम ऐसा हो गया है कि पुलिस किसी सज्‍जन व्‍यक्‍ति को इज्‍ज़त देना जानती ही नहीं, यदि देनी भी पड़े तो पता नहीं रहता कि वह कितनी देर उसकी इज्‍ज़त अफजाई करेगी। किसी को भी अश्‍लील गालियां देना, चाहे जब मारपीट शुरू कर देना और विरोध करने पर बंद कर देने की धमकी देना तो एक तरह से पुलिस के चिर-परिचित हथकंडे बन गए हैं। पुलिस न किसी सीनियर सिटीजन को इज्‍ज़त बख्‍शना जानती है और न महिला व बच्‍चों को। कानून उसके लिए एक ऐसा हथियार बन गया है जिसे वह अपनी सुविधानुसार तोड़-मरोड़ कर इस्‍तेमाल करती है।
भारतीय जनता पार्टी ने अपनी चुनावी रैलियों में कानून का राज स्‍थापित करने की बात पुरजोर कही थी और कानून-व्‍यवस्‍था की बदहाली को ही एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया था।
इसमें कोई दो राय नहीं कि यदि योगी सरकार आमजन के साथ-साथ पुलिस से भी कानून-व्‍यवस्‍था का अनुपालन कराने में सफल हो गई तो आधी से अधिक समस्‍याओं का समाधान बिना किसी हस्‍तक्षेप के हो जाएगा।
अपराधों में पुलिस की संलिप्‍तता, अपराधियों से उसकी मिलीभगत और उससे उपजी अव्‍यवस्‍था यदि काबू में आ गई तो न जमीन से जुड़े अपराध होंगे और न लूट, डकैती, हत्‍या, बलात्‍कार आदि संगीन अपराधों के पीड़ित दर-दर की ठोकरें खाएंगे।
लेकिन सवाल यह पैदा होता है कि क्‍या पुलिस के मूल चरित्र को बदलना इतना आसान है ?
यह सवाल ही वह चुनौती है जो स्‍वतंत्रता के बाद से अब तक हर सरकार के सामने खड़ी है और जिसे पूरा करने की कवायद में तमाम सरकारें चली गईं।
अब पहली बार एक गेरूआ वस्‍त्रधारी और महंत की उपाधि से विभूषित योगी को राजपाठ की कमान मिली है तो आमजन की उम्‍मीदों को भी पंख लगे हैं। वह पुलिस से साधुता की तो नहीं, लेकिन व्‍यावहारिकता की आस अवश्‍य लगा रही है। यदि योगी का राज आमजन की इस उम्‍मीद पर खरा उतरता है तो नि:संदेह उत्तर प्रदेश, उत्तम प्रदेश में तब्‍दील होता नजर आएगा और इसी प्रकार 2022 में भी योगी की जय-जयकार होगी।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

प्रशांत भूषण ने साबित किया, ”बुद्धिजीवी” भी मूर्ख हो सकते हैं

मूर्ख होने के लिए ”श्रमजीवी” होना आवश्‍यक नहीं है, ”बुद्धिजीवी” भी मूर्ख हो सकते हैं। सीधे शब्‍दों में कहें तो सुप्रीम कोर्ट के किसी प्रसिद्ध वकील का भी मूर्ख होना संभव है और जिसे जनसामान्‍य उसकी पेशेगत मजबूरी के मद्देनजर मूर्ख मानते रहे हों, वह किसी मुकाम पर जीनियस साबित हो सकता है। बात सिर्फ अवसर या संदर्भ उपस्‍थित होने की है।
मूर्खता या बुद्धिमत्ता का आंकलन किसी के पेशे अथवा उसकी पेशेगत प्रसिद्धि से नहीं करना चाहिए, यह बात सुप्रीम कोर्ट के मशहूर वकील प्रशांत भूषण ने एकबार फिर साबित कर दी है।
उत्तर प्रदेश की योगी सरकार द्वारा गठित किए गए पुलिस के ”एंटी रोमियो स्‍क्‍वॉयड” पर टिप्पणी करने के चक्‍कर में प्रशांत भूषण ने योगीराज भगवान श्रीकृष्‍ण को ही न सिर्फ ”लेजेंड्री ईव टीजर” बता डाला बल्‍कि योगी सरकार को इस आशय की चुनौती भी दी कि यदि उनमें हिम्‍मत है तो वह इस स्‍क्‍वॉयड का नाम ”एंटी कृष्‍ण स्‍क्‍वॉयड” रख कर देखें।
सुप्रीम कोर्ट के न्‍यायाधीश रहे मार्कन्‍डेय काटजू ने कुछ समय पहले कहा था कि हिंदुस्‍तान की 90 प्रतिशत आबादी मूर्खों से भरी पड़ी है। काटजू की कही बात तब अतिशयोक्‍ति महसूस हुई थी, किंतु अब लगता है कि शायद वह सही कह रहे थे।
कोई अस्‍त्र-शस्‍त्र उठाए बिना महाभारत जैसे भीषण युद्ध के नायक की उपाधि प्राप्‍त करने वाले तथा 16 हजार रानियां रखकर भी योगीराज कहलाने वाले जिन भगवान श्रीकृष्‍ण के चरित्र पर आज उनके जन्‍म से पांच हजार साल बाद तक विश्‍व के तमाम देश रिसर्च कर रहे हों, अर्जुन को दिए गए जिनके उपदेशों का एक-एक श्‍लोक आज भी लोगों का जीवन दर्शन बना हुआ हो, उनके चरित्र की तुलना शेक्‍सपीयर के एक पात्र रोमियो से वही व्‍यक्‍ति कर सकता जिसका बुद्धि से दूर-दूर तक कभी कोई वास्‍ता ही न रहा हो।
ऐसा लगता है कि प्रशांत भूषण के पास जितनी भी बौद्धिक क्षमता थी, वह उन्‍होंने कानून की किताबें पढ़ने और धाराएं रटने में लगा दी। इसके इतर उन्‍होंने कभी कुछ जानने व समझने की कोशिश नहीं की।
प्रशांत भूषण ने यह तो साबित कर दिया कि भगवान श्रीकृष्‍ण को समझने की क्षमता उनमें दूर-दूर तक नहीं है, साथ ही उन्‍होंने यह भी जाहिर करा दिया कि वह व्‍यावहारिक ज्ञान से महरूम हैं।
व्‍यावहारिक ज्ञान का ताल्‍लुक रोजमर्रा में पड़ने वाले उन क्रिया-कलापों एवं आचार-विचारों से होता है जो किसी किताब में नहीं लिखे होते। जिन्‍हें हर व्‍यक्‍ति को वक्‍त और परिस्‍थितियों के हिसाब से समझना पड़ता है। व्‍यावहारिक ज्ञान यह भी बताता है कि कौन सी बात कब कहनी है और किस तरह कहनी है। गलत वक्‍त पर कही गई कथित सही बात भी अनादर अथवा बेइज्‍जती का कारण बन सकती है।
प्रशांत भूषण तो खुद इसके भुक्‍तभोगी भी हैं। कश्‍मीर पर अपने निजी विचार व्‍यक्‍त करके वह इसका अनुभव कर चुके हैं।
प्रशांत भूषण की भगवान श्रीकृष्‍ण पर की गई टिप्‍पणी को लेकर कांग्रेसी नेता जीशान हैदर ने उनके खिलाफ लखनऊ के हजरत गंज थाने में धारा 295/A और 153/A के अंतर्गत मामला दर्ज करा दिया है।
जीशान हैदर ने इस बावत पुलिस को दी गई अपनी तहरीर में लिखा है कि भगवान श्रीकृष्ण पूरे विश्व में न सिर्फ करोड़ों हिंदुओं बल्कि समस्त मानव जाति के प्रेरणास्रोत हैं।
यहां गौर करने लायक है यह बात कि प्रशांत भूषण के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने वाले जीशान हैदर न केवल प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस से ताल्‍लुक रखते हैं बल्‍कि मुस्‍लिम समुदाय से हैं।
जाहिर है कि जिस व्‍यावहारिक ज्ञान की अपेक्षा बुद्धिजीवियों से की जाती है, उससे सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध अधिवक्‍ता प्रशांत भूषण का तो कोई संबंध नजर नहीं आया अलबत्‍ता एक नेता ने यह साबित अवश्‍य कर दिया कि कृष्‍ण का चरित्र जाति व धर्मों से भी परे तथा निर्विवाद रूप से अनुकरणीय है।
वैसे भी इतिहास ऐसे इस्‍लामिक धर्मावलंबियों, फनकारों तथा साहित्‍यकारों से भरा पड़ा है जिन्‍होंने श्रीकृष्‍ण को अपनी साधना का अंग बनाकर रखा। अनेक सूफी-संतों ने कृष्‍ण का अपने-अपने तरीके से गुणगान किया क्‍योंकि कृष्‍ण का चरित्र किसी धर्म अथवा जाति विशेष का प्रतिनिधित्‍व नहीं करता। कृष्‍ण ने तो अपनी हर लीला में, अपने प्रत्‍येक क्रिया-कलाप में मानव मात्र की भलाई का संदेश दिया है।
यही कारण है कि श्रीमद्भागवत गीता में श्रीकृष्‍ण द्वारा अर्जुन को माध्‍यम बनाकर दिए गए उपदेश सिर्फ युद्ध के लिए प्रेरणा न होकर एक ऐसा जीवन दर्शन थे जिनमें मानव मात्र का कल्‍याण निहित था।
संभवत: इसीलिए हजारों साल बाद भी ”गीता” एक सर्वमान्‍य ग्रंथ बनी हुई है और श्रीकृष्‍ण सर्वमान्‍य अवतार।
दुनिया के पता नहीं कितने देश गीता और कृष्‍ण को समझने की अनवरत चेष्‍टा जरूर कर रहे हैं किंतु किसी ने न तो कभी कृष्‍ण के चरित्र पर उंगली उठाई और न कभी उनकी कही हुई गीता पर।
”ओशो” के नाम से प्रसिद्ध विवादास्‍पद धर्मगुरू आचार्य रजनीश ने भी अपनी मशहूर किताब ”कृष्‍ण मेरी दृष्‍टि” में कृष्‍ण को आश्‍चर्यजनक व्‍यक्‍तित्‍व बताया है। एक ऐसा व्‍यक्‍तित्‍व जिसकी व्‍याख्‍या करना संभव नहीं है।
जो एक ही साथ योगी भी है और भोगी भी, नर्तक भी हो और योद्धा भी, ग्‍वाला भी है और राजा भी, उत्‍कट प्रेमी भी है और पूरी तरह निर्मोही भी।
महान इतने कि ”सेस, गनेस, दिनेस, महेस, सुरेसहु जाहि निरंतर ध्‍यावें…और लघु इतने कि ”ताहि अहीर की छोहरियां छछिया भरि छाछ पै नाच नचावें”।
प्रशांत भूषण ने कृष्‍ण के बारे में अपने विचार व्‍यक्‍त करके एक ओर जहां यह बता दिया कि किताबी जानकारी डिग्रियां तो दिला सकती है किंतु ज्ञान का माध्‍यम नहीं बन सकती वहीं दूसरी ओर यह भी जाहिर कर दिया कि अपराधियों के प्रति उनके मन में हमेशा ही सहानुभूति उमड़ती है, फिर चाहे वह फांसी की सजा प्राप्‍त कुख्‍यात आतंकवादी याकूब मेनन हो अथवा सड़क पर लड़कियों एवं महिलाओं के मान-सम्‍मान से खिलवाड़ करने वाले अपराधी तत्‍व।
प्रशांत भूषण की आतंकवादियों और अपराधियों के प्रति ऐसी सहानुभूति ही काफी है यह समझने के लिए कि उनकी मानसिकता और सोच क्‍या है तथा उनकी बुद्धि का किस हद तक दिवाला निकला हुआ है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

आखिर कितनी तर्कसंगत हैं योगी आदित्‍यनाथ को लेकर विपक्ष और मीडिया की आशंकाएं ?

महंत योगी आदित्‍यनाथ द्वारा उत्तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री पद की शपथ लेने के साथ ही न केवल विपक्ष बल्‍कि मीडिया भी तरह-तरह की आशंकाएं व्‍यक्‍त कर रहा है। विपक्ष जहां योगी आदित्‍यनाथ की ताजपोशी को आरएसएस का एजेंडा बता रहा है वहीं मीडिया कुछ ऐसा प्रचार-प्रसार कर रहा है जैसे कोई अनहोनी हो गई हो।
योगी आदित्‍यनाथ पर यूं तो बहुत पहले से मीडिया काफी कठोर रहा है और उनके हर बयान को सिर्फ और सिर्फ सांप्रदायिक चश्‍मे से देखता रहा है, लेकिन अब वह उन्‍हें कतई समय देने के लिए तैयार नहीं है।
योगी आदित्‍यनाथ ने उत्तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री पद की शपथ भले ही कल दोपहर सवा दो बजे ली हो किंतु मीडिया ने उन्‍हें 18 मार्च की शाम तभी से टारगेट करना शुरू कर दिया था जब मुख्‍यमंत्री पद के लिए उनके नाम की घोषणा की गई।
जहां तक सवाल विपक्ष द्वारा योगी को उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्‍य के मुख्‍यमंत्री बतौर न पचा पाने का है, तो यह बात समझ में आती है क्‍योंकि पहले तो भाजपा की अप्रत्‍याशित जीत ने विपक्ष को कहीं का नहीं छोड़ा और फिर योगी की ताजपोशी ने उनके जले पर नमक छिड़कने का काम किया परंतु यदि बात करें मीडिया की तो ऐसा लगता है कि जैसे मीडिया भी एक प्रतिपक्ष बनकर रह गया है। उसने भाजपा और मोदी के अंधे विरोध में अपने सोचने व समझने की शक्‍ति खो दी है।
तभी तो राजनीति के ककहरे की जो छोटी सी सीख योगी आदित्‍यनाथ के क्षेत्र से ताल्‍लुक रखने वाले मुस्‍लिम संप्रदाय के लोगों को है, उसे भी मीडिया समझने को तैयार नहीं है।
योगी आदित्‍यनाथ के इलाके से संबंध रखने वाले मुस्‍लिमों का साफ-साफ कहना है कि योगी अपने बयानों में जो कुछ अब तक कहते रहे हैं, वो वोट बैंक की और चुनावी राजनीति का हिस्‍सा है न कि वह उनके व्‍यक्‍तित्‍व का परिचय देता है।
इन मुस्‍लिमों ने हर मीडिया पर्सन से यही कहा है कि योगी के दरबार में बिना किसी भेदभाव के लोगों की समस्‍याओं का समाधान किया जाता रहा है और उनके पास समस्‍या लेकर जाने वालों में मुस्‍लिम समुदाय के लोगों की बड़ी संख्‍या रहती है।
यही नहीं, योगी के स्‍थाई निवास गोरखनाथ मंदिर प्रांगण में जो दुकानें आवंटित हैं, उनमें से 60 प्रतिशत दुकानें मुस्‍लिमों को दी हुई हैं। गोरखनाथ मंदिर भी मुस्‍लिम बाहुल्‍य क्षेत्र में स्‍थित है किंतु योगी के आचार-व्‍यवहार को लेकर कभी उस क्षेत्र के मुस्‍लिमों को कोई आपत्ति नहीं हुई। योगी का लगातार पांच बार सांसद निर्वाचित होना और हर निर्वाचन में जीत का अंतर बढ़ते जाना इस बात की पुष्‍टि करता है कि योगी को लेकर विपक्ष या मीडिया चाहे जितना भ्रमित हो किंतु उनके अपने क्षेत्र में किसी को कोई भ्रम नहीं है।
गोरखनाथ मंदिर पर हर साल मकर संक्रांति के दौरान आयोजित होने वाले ‘खिचड़ी मेले’ में लाखों लोग आते हैं ओर पूरे एक महीने तक रहते भी हैं.
इस मेले में हर जाति, धर्म और संप्रदाय के लोगों की भारी तादाद में उपस्‍थिति मठ की कट्टर हिंदूवादी छवि को तोड़ती है जबकि मुस्लिम शासन काल में हिन्दुओं और बौद्धों के अन्य सांस्कृतिक केन्द्रों की भांति इस पीठ को भी कई बार भीषण कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
इसकी व्यापक प्रसिद्धि के कारण विक्रमी चौदहवीं सदी में भारत के मुस्लिम सम्राट अलाउद्दीन खिलजी ने अपने शासन काल में इस मठ को नष्ट किया और साधक व योगी बलपूर्वक मठ से निष्कासित कर दिए।
सत्रहवीं और अठारहवीं सदी में अपनी धार्मिक कट्टरता के कारण मुग़ल शासक औरंगजेब ने इसे दो बार नष्ट किया। क़रीब 52 एकड़ के सुविस्तृत क्षेत्र में स्थित इस मंदिर का रूप व आकार-प्रकार परिस्थितियों के अनुसार समय-समय पर बदलता रहा है। वर्तमान में गोरक्षनाथ मंदिर की भव्यता और पवित्र रमणीयता अत्यन्त कीमती आध्यात्मिक सम्पत्ति है। प्रतिदिन मंदिर में स्‍थानीय लोगों के अतिरिक्‍त भारत के सुदूर प्रांतों से भी असंख्य लोगों की भीड़ पर्यटकों व यात्रियों के रूप में आती है।
अब यदि बात करें इन विधानसभा चुनावों में भाजपा द्वारा वोटों की खातिर ध्रुवीकरण की राजनीति पर, तो कौन सा ऐसा राजनीतिक दल है जो ध्रुवीकरण की राजनीति नहीं करता। कांग्रेस ने देश और विभिन्‍न प्रदेशों में इतने लंबे समय तक शासन वोटों का ध्रुवीकरण करके ही किया। क्षेत्रीय पार्टियां भी यही करती रही हैं।
उत्तर प्रदेश की दोनों प्रमुख क्षेत्रीय पार्टियों बसपा व सपा की पूरी राजनीति वोटों के ध्रुवीकरण पर टिकी रही है। बसपा ने तो इन चुनावों में सुप्रीम कोर्ट के आदेश की खुली अवहेलना करके मुस्‍लिमों के ध्रुवीकरण की पूरी कोशिश की और बड़ी मात्रा में मुस्‍लिम प्रत्‍याशियों को खड़ा किया। मायावती ने अपने चुनावी मंचों से बेझिझक मुस्‍लिमों का आह्वान किया और दलितों के एक वर्ग को भी डराया।
उत्तर प्रदेश के अलावा बिहार, पश्‍चिम बंगाल, दिल्‍ली, पंजाब आदि कौन सा ऐसा राज्‍य है जहां के शासक ध्रुवीकरण की राजनीति न करते रहे हों।
इस सब के इतर देखा जाए तो भाजपा पहली ऐसी पार्टी है जिसने तीन तलाक की मुखालफत और नोटबंदी व समान नागरिक संहिता की वकालत करने का दुस्‍साहस दिखाया। ये बात अलग है कि विपक्ष के भारी दुष्‍प्रचार के बाद भी यह सारे मुद्दे भाजपा के लिए मुफीद साबित हुए और अब कहा जा रहा है कि मुस्‍लिम महिलाओं ने भी इन चुनावों में भाजपा के लिए मतदान किया है।
उत्तर प्रदेश एक ऐसा राज्‍य है जिसके इर्द-गिर्द सारे देश की राजनीति घूमती है। ऐसे में भाजपा ने योगी आदित्‍यनाथ को उत्तर प्रदेश की कमान सौंपने से पहले राजनीति के सारे गुणा-भाग जरूर लगाए होंगे क्‍योंकि भाजपा नहीं चाहेगी कि वर्षों बाद समाप्‍त हुआ उसका वनवास, उपहास बनकर रह जाए।
योगी आदित्‍यनाथ जो कल तक मुंह से आग उगलने के लिए पहचाने जाते थे, उन्‍होंने मुख्‍यमंत्री का पद संभालने के साथ सबसे पहले अपनी कैबिनेट को हिदायत दी है कि मीडिया को वह नहीं, इसके लिए अधिकृत मंत्री ब्रीफ करेंगे। योगी ने बाकायदा दो मंत्रियों श्रीकांत शर्मा और सिद्धार्थनाथ सिंह को इसकी जिम्मेदारी सौंप दी है। श्रीकांत शर्मा व सिद्धार्थनाथ सिंह पहले से राष्‍ट्रीय प्रवक्‍ता की जिम्‍मेदारी संभालते चले आ रहे हैं।
योगी का अपनी कैबीनेट को दिया गया यह संदेश स्‍पष्‍ट करता है कि वह पद की गरिमा को बखूबी समझ रहे हैं और उसकी जिम्‍मेदारी का अहसास भी कर रहे हैं।
संभवत: इसीलिए उन्‍होंने मुख्‍यमंत्री पद की शपथ लेने से पूर्व ही प्रदेश पुलिस के मुखिया को इस आशय का आदेश दे दिया था कि जीत के जश्‍न में निरंकुश होने वालों से सख्‍ती के साथ निपटें। कानून-व्‍यवस्‍था से खिलवाड़ करने की इजाजत किसी को नहीं मिलनी चाहिए।
योगी ने यह आदेश कुछ स्‍थानों से आ रहीं उन खबरों के आधार पर दिया था जहां जीत के जश्‍न में वर्ग विशेष के खिलाफ नारेबाजी की बात बताई गई थी।
योगी का इतनी जल्‍दी एक्‍शन में आना यह बताता है कि उन्‍हें अपनी प्रचारित की गई कथित कट्टरवादी छवि का भी अच्‍छी तरह इल्‍म है और वह इसके लिए विपक्ष और मीडिया को कोई मौका नहीं देना चाहते।
सबका साथ, सबका विकास पर चलते हुए भाजपा के संकल्‍प पत्र पर पूरी तरह अमल करने की बात उन्‍होंने अपनी पहली प्रेस कांफ्रेंस में भी कही।
इन सब बातों पर गौर करें तो साफ लगता है कि जिस तरह केंद्र में नरेन्‍द्र मोदी के नेतृत्‍व वाली सरकार का गठन होने के साथ विपक्ष ने मुस्‍लिमों के अंदर भय का वातावरण उत्पन्‍न करने की कोशिश की थी, उसी तरह की कोशिश वह अब योगी की ताजपोशी के बाद कर रहा है क्‍योंकि उसके तो नीचे से लगभग पूरी जमीन ही खिसक चुकी है। प्रमुख विपक्षी पार्टियां जहां से चली थीं, आज फिर वह वहीं आकर खड़ी हो गई हैं। योगी यदि पार्टी की उम्‍मीदों पर खरे साबित हुए और जनभावनाओं के अनुरूप शासन की कमान संभालने में सफल रहे तो सपा व बसपा जैसी पार्टियों का वजूद तक खतरे में पढ़ जाएगा। कांग्रेस की दुर्गति का अंदाज लगाने को तो इतना ही काफी है कि उसे अपना दल से भी कम सीटें मिली हैं, और वो भी तब जबकि उसने बड़े ढोल-नगाड़े पीटकर समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन किया था। यह साथ यूपी की जनता को कितना पसंद आया, इसका अब जिक्र करने की भी जरूरत नहीं रह गई।
बेहतर होगा कि विपक्ष और मीडिया अब योगी-राज को बेवजह शंका की दृष्‍टि से देखने की बजाय उनके काम को देखे और नकारात्‍मक प्रचार-प्रसार व बयानबाजी की प्रवृत्ति से बाहर निकल कर धरातल पर होने वाले कामों की समीक्षा करे ताकि एक स्‍वस्‍थ परंपरा कायम हो सके और उत्तर प्रदेश की जनता भी उस परंपरा का लाभ उठाकर भ्रम की स्‍थिति से बच सके।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

पौने दो करोड़ के भ्रष्‍टाचार का मामला: क्‍या अब अपनी चेयरमैन के खिलाफ कार्यवाही करेगी भाजपा सरकार?

मथुरा। उत्तर प्रदेश में भाजपा को भारी बहुमत मिलने के साथ ही एक ओर जहां मुख्‍यमंत्री के पद को लेकर कयासों का दौर जारी है वहीं दूसरी ओर यह प्रश्‍न भी उठने लगा है कि क्‍या प्रदेश सरकार अब मनीषा गुप्‍ता जैसे अपनी ही पार्टी के उन जनप्रतिनिधियों पर कार्यवाही करेगी जिनके ऊपर भ्रष्‍टाचार के गंभीर आरोप लगे हैं।
गौरतलब है कि मथुरा नगर पालिका पर काबिज भाजपा की चेयरमैन मनीषा गुप्‍ता सहित अधिशासी अधिकारी के. पी. सिंह, अवर अभियंता (जलकल) के. आर. सिंह, सहायक अभियंता उदयराज, लेखाकार विकास गर्ग तथा लिपिक टुकेश शर्मा पर एसटीपी व एसपीएस के संचालन हेतु उठाए गए ठेके में पौने दो करोड़ रुपए का घपला किए जाने का आरोप लगा है।
घपले की जांच करने वाले तीन अधिकारियों तत्‍कालीन अपर जिलाधिकारी कानून-व्‍यवस्‍था/प्रभारी अधिकारी स्‍थानीय निकाय एस. के. शर्मा, तत्‍कालीन जिलाधिकारी राजेश कुमार तथा तत्‍कालीन कमिश्‍नर आगरा मंडल प्रदीप भटनागर द्वारा पालिका अध्‍यक्ष मनीषा गुप्‍ता सहित घोटाले में लिप्‍त पाए गए सभी अधिकारी व कर्मचारियों के खिलाफ शासन से कार्यवाही की संस्‍तुति पहले ही की जा चुकी है।
अब यह मामला नेशनल ग्रीन ट्रिब्‍यूनल में चल रहा है और वर्तमान जिलाधिकारी मनीष बंसल भी सभी आरोपियों के बारे में कार्यवाही के लिए शासन को रिपोर्ट भेज चुके हैं। हालांकि पालिका प्रशासन ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्‍यूनल के अधिकार को चुनौती देते हुए कहा है कि उसे भ्रष्‍टाचार संबंधी मामला सुनने का अधिकार ही नहीं है किंतु उसकी चुनौती इसलिए कोई मायने नहीं रखती क्‍योंकि नेशनल ग्रीन ट्रिब्‍यूनल ने इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय के आदेश पर ही इसकी सुनवाई शुरू की थी।
उल्‍लेखनीय है कि एसटीपी व एसपीएस का संचालन सीधे-सीधे यमुना प्रदूषण से जुड़ा है और यमुना को प्रदूषणमुक्‍त रखने के लिए ही इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वर्ष 1998 में इसकी व्‍यवस्‍था के आदेश दिए थे इसलिए उसके संचालन में हुए भ्रष्‍टाचार की सुनवाई पर एनजीटी को चुनौती कैसे दी जा सकती है।
दरअसल, नगरपालिका प्रशासन सिर्फ और सिर्फ समय बर्बाद करना चाहता है क्‍योंकि इसी वर्ष जुलाई में वर्तमान पालिका प्रशासन का कार्यकाल समाप्‍त हो रहा है। यह भी संभव है यह कार्यकाल पूरा होने से पहले मथुरा नगर पालिका को महानगरपालिका घोषित कर दिया जाए क्‍योंकि अखिलेश सरकार में ही इसके लिए परिसीमन आदि का कार्य पूरा हो चुका है। यदि ऐसा होता है तो समय से पहले ही मनीषा गुप्‍ता को पालिकाध्‍यक्ष की कुर्सी छोड़नी पड़ सकती है।
वैसे तो इस मामले की एनजीटी में सुनवाई इसी महीने होनी है किंतु शासन चाहे तो वर्तमान जिलाधिकारी तथा पूर्व के जांच अधिकारियों द्वारा दी गई रिपोर्ट के आधार पर नगर पालिका अधिनियम 1916 की धारा 48 के तहत पालिकाध्‍यक्ष को सीधे बर्खास्‍त कर सकता है और अन्‍य आरोपियों के खिलाफ कार्यवाही कर सकता है।
नई सरकार द्वारा भ्रष्‍टाचार के इस मामले पर संज्ञान लिया जाना इसलिए आवश्‍यक है कि प्रथम तो भाजपा को इतना जबर्दस्‍त बहुमत भ्रष्‍टाचार व कुशासन के खिलाफ ही मिला है, और दूसरे यमुना प्रदूषण के मामले में हो रहा भ्रष्‍टाचार करोड़ों लोगों की धार्मिक भावनाओं व आस्‍था से जुड़ा है लिहाजा वह उन्‍हें आहत कर रहा है।
2014 के लोकसभा चुनावों में और अब 2017 के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने यमुना को प्रदूषण मुक्‍त करने का संकल्‍प दोहराया था। मथुरा की शहरी सीट पर चुनाव लड़े भाजपा प्रत्‍याशी श्रीकांत शर्मा ने भी यमुना को प्रदूषण मुक्‍त कराने का वचन जनता को दिया था।
चूंकि श्रीकांत शर्मा भाजपा के राष्‍ट्रीय सचिव व प्रवक्‍ता भी हैं इसलिए उनके वचन को मथुरा की जनता ने गंभीरता से लेते हुए उन्‍हें एक लाख से भी अधिक मतों से जितवाकर विधानसभा में प्रतिनिधित्‍व के लिए भेजा है।
यमुना तभी प्रदूषण मुक्‍त होगी जब उसे प्रदूषित करने वाले कारणों को बंद किया जाएगा और उन तत्‍वों के खिलाफ कठोर कार्यवाही की जाएगी जिन्‍होंने यमुना को प्रदूषण मुक्‍त रखने की आड़ में करोड़ों रुपए हड़प लिए।
यमुना के प्रदूषित होने का एक बड़ा कारण मथुरा शहर में कृष्‍ण जन्‍मस्‍थान के निकट दरेसी रोड पर चल रहा वह अवैध कट्टीघर भी है जिसे बंद करने का आदेश इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सन् 1998 में दिया था और जिसमें एक भी पशु का कटान पालिका प्रशासन की सहमति अथवा लापरवाही के बिना नहीं हो सकता।
यदि यह कहा जाए कि यमुना को प्रदूषित कराने में एक बड़ी भूमिका नगर पालिका प्रशासन की ही है, तो कुछ गलत नहीं होगा क्‍योंकि न तो वह पशुओं के अवैध कटान पर पाबंदी लगा पाने में सफल हुआ और न नाले-नालियों से सीधे यमुना में गिर रही गंदगी को साफ करने के लिए एसटीपी व एसपीएस के संचालन में धांधली को रोक पाया। उल्‍टे इसके लिए दिए गए ठेके की अनियमितताओं में संलिप्‍त पाया गया।
आश्‍चर्य की बात इस बीच यह रही कि पूरे लगभग पांच साल के अपने कार्यकाल में पालिकाध्‍यक्ष मनीषा गुप्‍ता ने ऐसी अनियमितताओं पर लगाम तक लगाना जरूरी नहीं समझा नतीजतन आज भी वही ठेकेदार एसटीपी व एसपीएस का संचालन कर रहा है जिसे ठेका देने में करीब पौने दो करोड़ रुपए के घपले का आरोप पालिकाध्‍यक्ष मनीषा गुप्‍ता और पालिका के दो अभियंताओं सहित पांच लोगों पर भ्रष्‍टाचार के गंभीर आरोप लगे हैं। इस पूरे प्रकरण का सबसे अहम पहलू यह है कि मनीषा गुप्‍ता पर भ्रष्‍टाचार के आरोपों की जांच के लिए शासन-प्रशासन से लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट तथा एनजीटी में गुहार लगाने वाले भी भाजपा के ही कर्मठ कार्यकर्ता व पदाधिकारी हैं इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि उनके ऊपर लगाए गए आरोप राजनीति से प्रेरित व पूर्वाग्रह से ग्रसित होंगे।
निश्‍चित ही यह और ऐसे अन्‍य भ्रष्‍टाचार के मामले पर तत्‍काल प्रभावी कार्यवाही करने का नैतिक दायित्‍व भारतीय जनता पार्टी की नई सरकार पर होगा। मथुरा का मामला इसलिए और महत्‍वपूर्ण हो जाता है कि यह मामला उस यमुना प्रदूषण से जुड़ा है जिसके लिए मोदी सरकार ने नमामि गंगे परियोजना शुरू की है और खुद प्रधानमंत्री मोदी ने लोगों को इसके सफलता पूर्वक क्रियान्‍वयन का भरोसा दिलाया है।
अब तक केंद्रीय जल संसाधन मंत्री उमा भारती यह कहती रही हैं कि नमामि गंगे के काम में अपेक्षा के अनुरूप तेजी न आ पाने का प्रमुख कारण अखिलेश यादव के नेतृत्‍व वाली समाजवादी सरकार द्वारा एनओसी न दिया जाना है लेकिन अब इस तरह की दलील सुनना जनता शायद ही पसंद करे।
उमा भारती ने कुछ समय पहले ही मथुरा की अपनी यात्रा के दौरान स्‍थानीय लोगों से कहा था कि शीघ्र ही यमुना की सतह से गंदगी साफ करने वाली ट्रैश स्‍कीमर मशीन स्‍थाई रूप से यहां भेज दी जाएगी। यह मशीन गत फरवरी में यहां आनी थी किंतु आज तक नहीं पहुंची। इसके लिए भी उमा भारती ने अखिलेश सरकार से एनओसी प्राप्‍त न होना ही कारण बताया था लेकिन अब ऐसी किसी समस्‍या के सामने खड़े होने की सभी आशंकाएं समाप्‍त हो चुकी हैं लिहाजा काम में तेजी लानी होगी।
बस देखना यह है कि यमुना प्रदूषण जैसे संवेदनशील एवं गंभीर मुद्दे पर भ्रष्‍टाचार में लिप्‍त पाई गई अपनी ही पार्टी की पालिकाध्‍यक्ष के खिलाफ भजपा सरकार कार्यवाही करती है या नहीं और यमुना को प्रदूषण मुक्‍त रखने का अपना वचन निभा पाती है या नहीं।
यदि इन दोनों बातों पर पूरी निष्‍ठा के साथ अमल नहीं किया गया तो तय जानिए कि जनता जनार्दन की लाठी में भी आवाज नहीं होती।
-लीजेंड न्‍यूज़

शनिवार, 25 फ़रवरी 2017

तेल के खेल में वजीर तो क्‍या, प्‍यादे भी नहीं हैं मथुरा और आगरा के मनोज

मथुरा रिफाइनरी से हो रहे तेल के खेल में जिन हमराहों पर हाथ डालकर मथुरा पुलिस आगरा के मनोज गोयल को वजीर साबित करके उसका गिरेबां नापने की कोशिश कर रही है, वह दरअसल इस खेल का वजीर तो क्‍या, प्‍यादा तक नहीं है।
आगरा के मनोज गोयल का नाम आने से पहले तेल माफिया के रूप में कुख्‍यात मथुरा का मनोज अग्रवाल भी इस खेल के वजीरों का हलूकर भर है।
वजीर तो वाकई वजीर हैं, और उनके गिरेबां तक हाथ डालने की हिमाकत आगरा तथा मथुरा पुलिस का कोई अफसर नहीं कर सकता। ये वजीर हर सत्ता में काबिज रहते हैं, फिर चाहे वो सत्ता सपा की हो अथवा बसपा की और भाजपा की या किसी गठबंधन की।
इन दिनों मथुरा पुलिस थोड़ी-बहुत उछल-कूद करके अपनी जो पीठ थपथपा रही है, उसका एकमात्र कारण है चुनावों के चलते सूबे की सत्‍ता का प्रभावहीन हो जाना और केंद्र की सत्‍ता का उसमें उलझे होना, अन्‍यथा इतनी उछल-कूद के बाद तो हलूकर ही मथुरा तथा आगरा में तैनात पुलिस अफसरों को ताश के पत्तों की तरह फैंट देने का माद्दा रखते हैं।
चुनावों के बीच भी यदि आगरा और मथुरा की पुलिस इन हलूकरों के हाथ में हथकड़ी नहीं डाल सकी तो तय जानिए कि नई सरकार बनने के साथ ऐसे कई अफसर अपने लिए ठिकाने ढूंढते नजर आएंगे जो आज अखबारों के पहले पन्‍ने की सुर्खियां बने हुए हैं।
पहले भी कई जांबाज पुलिस अफसरों ने मथुरा रिफाइनरी से होने वाले तेल के खेल में दखल देने की कोशिश की है लेकिन आज तक न तो कोई पुलिस अफसर किसी वजीर तक पहुंच पाया और न किसी वजीर के प्‍यादे को अपना मोहरा बना पाया। हां, थोड़े-बहुत हाथ-पैर मारने के बाद वह खुद उन वजीरों का मोहरा जरूर बन गया और अंतत: उनके तथा उनके हलूकरों के इशारों पर नाचते देखा गया।
इसी क्रम में नाम कमाने की चाह रखने वाले कुछ पुलिस अफसर दाम भले ही कमा गए परंतु बदनाम होने से नहीं बच सके। आज उनमें से कोई डीआईजी बना बैठा है तो कोई आईजी और एडीजी। एक-दो पुलिस अफसर तो डीजी बनकर सेवामुक्‍त भी हो लिए और आज टीवी चैनल्‍स पर होने वाली डिबेट्स में खाकी पहनने वालों को नैतिकता व ईमानदारी का पाठ पढ़ाते देखे व सुने जा सकते हैं।
कड़वा सच यह है कि मथुरा में रिफाइनरी स्‍थापित होने के बाद से शुरू हुआ तेल का खेल कभी बंद हुआ ही नहीं। एक-दो मौकों पर इसमें शिथिलता अवश्‍य दिखाई दी किंतु वह भी चंद दिनों के लिए।
यही कारण है कि मथुरा तथा आगरा में इस खेल के चलते एक-दो नहीं दर्जनों मनोज गोयल पैदा हुए और दर्जनों मनोज अग्रवाल। तेल के खेल की जन्‍मकुंडली खंगाली जाए तो पता लग जाएगा कि आज उनमें से कोई नामचीन बिल्‍डर बन चुका है तो कोई मशहूर व्‍यवसाई। किसी के नाम से उद्योगपति का टैग चस्‍पा किया जा चुका है तो कोई जनप्रतिनिधि बनकर जनता की सेवा करने का दम भर रहा है।
इतना सब होने के बावजूद हजारों करोड़ रुपए सलाना कमाई वाले तेल के इस खेल का वजीर कोई नहीं बन पाया क्‍योंकि वजारत हमेशा सत्ता के सोपान से चिपके रहने वालों पर रही और वहां तक पहुंचने के माद्दा मथुरा-आगरा के चिरकुटों में था नहीं। ये लोग सत्‍ता के गलियारों तक सिमटकर रह गए और उन्‍हीं झरोखों से झांककर खुदमुख्‍त्‍यारी का दम भरते रहे।
मथुरा रिफाइनरी से होने वाले तेल के खेल में संलिप्‍त हमराह, हलूकर, मोहरे तथा प्‍यादे तक नहीं जानते कि उनकी गर्दन में बंधी डोर का छोर आखिर है किसके हाथ में। वो तो सिर्फ इतना जानते हैं कि उस डोर के इशारे पर ही उन्‍हें नाचना है और उसी के इशारे पर अपने अधीनस्‍थों को नचाना है।
पाइप लाइन में सेंध लगाकर पेट्रोलियम पदार्थों की चोरी करने और पाइप लाइन तक पहुंचने के लिए सुरंग बनाने का मथुरा में यह कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी कई मर्तबा ऐसे कारनामे लोग करते रहे हैं लेकिन कभी ऐसी प्रभावी कार्यवाही किसी स्‍तर से नहीं हुई जिसके बाद यह मान लिया जाए कि आगे वैसा हो पाना संभव नहीं होगा। हर बार सांप निकल जाने के बाद लकीर पीटने का तमाशा किया गया जिसके परिणाम स्‍वरूप कोई उल्‍लेखनीय उपलब्‍धि हासिल नहीं हुई।
तेल शोधक कारखाना कहीं का भी हो, उसकी सुरक्षा एक अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण जिम्‍मेदारी होती है। इस जिम्‍मेदारी को यूं तो केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) निभाती है किंतु कई दूसरे विभागों सहित सिविल पुलिस की भी इसमें अहम भूमिका होती है।
ऐसे में रिफाइनरी के अंदर और बाहर होने वाली किसी भी गैरकानूनी गतिविधि का इतने लंबे समय तक पता न लग सके कि कोई सुरंग बनाकर पाइप लाइन से तेल निकालने में सफल हो जाए, यह हो नहीं सकता। ये तभी संभव है कि अंदर से लेकर बाहर तक और ऊपर से लेकर नीचे तक के लोगों की इसमें संलिप्‍तता हो और वो लोग किसी भी हद तक गिरने के लिए तत्‍पर हों।
रिफाइनरी से ही जुड़े सूत्रों की मानें तो तेल के इस खेल में सबसे बड़ी भूमिका मार्केटिंग डिवीजन से ताल्‍लुक रखने वाले उन कर्मचारियों की रहती है जो सप्‍लाई का काम देखते हैं और जिन्‍हें रिफाइनरी की ओर आने व जाने वाली एक-एक पाइप लाइन की जानकारी है।
बताया जाता है कि इन रिफाइनरी कर्मियों के पास पाइप लाइन के पूरे जाल का नक्‍शा रहता है और वही बता सकते हैं कि कहां-कहां वॉल्‍व लगे हैं तथा कहां-कहां सुरक्षा में सेंध लगाना संभव है।
सूत्रों से प्राप्‍त जानकारी के अनुसार यही वो लोग हैं जिनका प्रत्‍यक्ष में तो तेल के खेल से कोई सरोकार नहीं रहता लेकिन इनकी कमाई लाखों नहीं करोड़ों में होती है।
बताया जाता है कि ड्यूटी पर मौजूद रिफाइनरी कर्मियों के अलावा ऐसे रिफाइनरी कर्मियों की कोई कमी नहीं है जो अवकाश प्राप्‍त करने के बावजूद सिर्फ पाइप लाइन के नक्‍शों की बिना पर घर बैठे लाखों रुपए हासिल कर रहे हैं अन्‍यथा कितने आश्‍चर्य की बात है कि जिस पाइप लाइन की सुरक्षा पर बेहिसाब पैसा खर्च होता हो और जिसके अंदर चलने वाले प्रेशर तक से उसके लीकेज का पता लगाया जा सकता हो, उसमें छेद करके करोड़ों रुपए मूल्‍य का पेट्रोलियम पदार्थ चुरा लिया जाए फिर भी रिफाइनरी प्रशासन को तब भनक लगे जब कोई जनसामान्‍य अपनी जान हथेली पर रखकर अफसरों को बताने पहुंचे कि पाइप लाइन में सेंध लग चुकी है।
रिफाइनरी प्रशासन के दावों पर भरोसा करें तो समूची पाइप लाइन की एक ओर जहां नियमित चैकिंग होती है वहीं दूसरी ओर उसके ऊपर ऐसी प्‍लास्‍टिक कोटिंग भी की जाती है जिसे काटकर वॉल्‍व तक पहुंचना या पाइप लाइन में छेद कर पाना आसान नहीं होता। ऐसा करने की कोशिश के दौरान ही रिफाइनरी के अंदर बैठे अधिकारी व कर्मचारियों को आधुनिक उपकरणों के सहारे पता लग जाता है लेकिन यहां तो जैसे पूरे कुएं में ही भांग घुली हुई है लिहाजा आजतक मौके पर कभी कोई पकड़ा नहीं जा सका।
बहुत समय नहीं बीता जब रिफाइनरी के अंदर से सैकड़ों करोड़ रुपए मूल्‍य वाले पेट्रोलियम पदार्थों से भरे कंटेनर चोरी हो गए थे। तब भी इसी प्रकार शोर-शराबा हुआ और दावा किया गया कि इतनी बड़ी घटना को अंजाम देने वाला कोई अपराधी बच नहीं पाएगा, चाहे वह रिफाइनरी के अंदर बैठा हो अथवा बाहर। समय के साथ यह मामला पहले ढीला पड़ा और अब ठंडे बस्‍ते के हवाले जाता नजर आ रहा है।
जिस समय कृष्‍ण की इस पावन जन्‍मभूमि पर रिफाइनरी की शक्‍ल में एक आधुनिक मंदिर की नींव रखी जा रही थी तब कहा गया था कि मथुरा तथा मथुरा वासियों के लिए यह मंदिर बड़ा वरदान साबित होगा किंतु आज स्‍थिति इसके ठीक उलट है।
मथुरा रिफाइनरी आज की तारीख में तेल का अवैध कारोबार करने वालों, भ्रष्‍ट अफसरों, सफेदपोश नेताओं तथा पुलिस-प्रशासन के लिए भले ही वरदान बनी हुई हो किंतु मथुरा-आगरा के लिए किसी अभिशाप से कम नहीं है।
रिफाइनरी के कारण वायु और जल प्रदूषण तो बढ़ा ही है, साथ ही खतरा भी बहुत बढ़ गया है। आतंकवादियों के लिए यह एक बड़ा टारगेट है और दुश्‍मन देशों की भी इस पर हमेशा पैनी नजर रहती है।
कहने को मथुरा रिफाइनरी अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्‍सा शहर के विकास और उसके बेहतर रख-रखाव के लिए निकालती है लेकिन यह हिस्‍सा कहां जाता है, इसका कभी पता नहीं लगा।
रिफाइनरी स्‍थापित हुए साढ़े तीन दशक होने को आए लेकिन कृष्‍ण की पावन जन्‍मस्‍थली आज तक अपनी गरिमा के अनुरूप विकास को तरस रही है। सड़क, बिजली, पानी, जलभराव जैसे सामान्‍य समस्‍याओं तक के समाधान में मथुरा रिफाइनरी ने कोई उल्‍लेखनीय भूमिका कभी अदा की हो, ऐसा याद नहीं आता। हां, इसके कारण जनसामान्‍य की जिंदगी हर वक्‍त खतरे में जरूर पड़ी रहती है क्‍योंकि पता नहीं कब कौन तेल को चोरी करके पैसे बनाने की जगह उसका दूसरा गलत इस्‍तेमाल करने की ठान ले।
मथुरा का हर जागरूक नागरिक जानता है कि रिफाइनरी की सीमा में पड़ने वाले ”बाद रेलवे स्‍टेशन” से लेकर तेल के भण्‍डारण तक में सेंध लगाकर चोरी करने का सिलसिला कभी थमा नहीं है। रेलवे स्‍टेशन पर जहां वैगनों से बाकयदा पाइप डालकर तेल खींच लिया जाता है वहीं गोदामों से कंटेनर के कंटेनर गायब कर दिए जाते हैं किंतु सब तमाशबीन बने रहते हैं। यही हाल रिफाइनरी के लिए बिछी पाइप लाइनों को क्षतिग्रस्‍त करने के मामले में है। कितनी बार पाइप लाइनों में सूराख करके करोड़ों रुपए की चपत लगाई गई है लेकिन सरकारी माल पर हाथ साफ करना अपना जन्‍मसिद्ध अधिकार मानने वाले अधिकारी और कर्मचारी, अपराधियों को संरक्षण देने से नहीं चूकते। उनके लिए वह दुधारु गाय बने हुए हैं।
मथुरा की ओर आने वाली कोई सड़क हो अथवा यहां से दूसरे जनपदों एवं राज्‍यों को जोड़ने वाली कोई सड़क क्‍यों न हो, हरेक पर अवैध तेल के गोदामों का जाल बिछा मिल जाएगा लेकिन क्‍या मजाल कि कोई इनकी ओर आंख उठाकर देख ले।
देखेगा भी कैसे, आखिर तेल की धार से निकलने वाले पैसों की चमक किसी की भी आंखें चुंधियाने को काफी हैं। तभी तो कहावत है कि तेल देख और तेल की धार देख।
कहते हैं कि मथुरा तीन लोक से न्‍यारी है। कुछ समय के अंदर गधों को घोड़ों की तरह सरपट दौड़ते और फर्श से अर्श तक का सफर काफी कम समय में पूरा करते देखकर तो लगता है कि वाकई मथुरा तीन लोक से न्‍यारी है।
यहां हमराह पकड़े जाते हैं, हलूकर भी पकड़े जा सकते हैं लेकिन वजीरों का बाल भी बांका नहीं होता। सत्ता की खातिर उनकी निष्‍ठाएं बेशक लचीली हो जाती हों लेकिन उनके गोरखधंधों में लचीलापन कभी नहीं आता।
इसलिए तेल का खेल जारी था, जारी है और बदस्‍तूर जारी रहेगा। फॉलोअर पहले भी पकड़े जाते रहे हैं और हमेशा पकड़े जाते रहेंगे जिससे पुलिस इसी तरह अपनी पीठ खुद थपथपाती रहे किंतु वजीरों की वजारत कायम रहेगी। चुनाव का सीजन बीतने दें और फिर तेल भी देखना और तेल व तेलियाओं की धार भी।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

बुधवार, 8 फ़रवरी 2017

''एक्‍सीडेंटल पॉलिटीशियन'' हैं मथुरा-वृंदावन क्षेत्र के प्रमुख प्रत्‍याशी, जानिए इनके राजनीति में प्रवेश की अनछुई कहानी...

मथुरा-वृंदावन विधानसभा क्षेत्र से चुनाव मैदान में मौजूद अधिकांश प्रमुख प्रत्‍याशी एक्‍सीडेंटल पॉलिटीशियन हैं न कि रैगूलर पॉलिटीशियन। यानि ये लोग किसी न किसी दुर्घटनावश या यूं कहें कि हालातों के मद्देनजर अथवा मौका मिलने पर राजनीति में आ गए अन्‍यथा न तो इनके परिवार में कोई राजनीतिज्ञ रहा और न इनकी अपनी राजनीति में कोई रुचि थी।
सबसे पहले बात करते हैं चार बार विधायक रह चुके कांग्रेस व समाजवादी पार्टी के गठबंधन प्रत्‍याशी प्रदीप माथुर की।
1980-81 की बात रही होगी, तब प्रदीप माथुर बीएसए कॉलेज में लॉ (कानून) के विद्यार्थी हुआ करते थे। कृष्‍णा नगर के एक छोटे से किराए के मकान में रहने वाले प्रदीप माथुर के पिता सरकारी विभाग के मुलाजिम थे और इनकी माली हालत बस गुजारा करने भर की इजाजत देती थी।
लॉ के आखिरी सेमिस्‍टर की पढ़ाई के दौरान बीएसए कॉलेज के सामने हुई एक सड़क दुर्घटना में किसी युवक की मौत हो गई। पिता के साए से महरूम इस युवक की बहिन का रिश्‍ता तय हो चुका था और नजदीक ही शादी की तारीख तय थी।
चौबिया पाड़ा क्षेत्र के रहने वाले उक्‍त युवक के परिवार में इस दुर्घटना से कोहराम मचना ही था। मृत युवक के परिवार की दुर्दशा और उसकी बहिन की होने जा रही शादी को देखते हुए बीएसए कॉलेज के कुछ लॉ स्‍टूडेंट आगे आए। इन स्‍टूडेंट्स ने पहले तो कॉलेज के सामने वाली सड़क को अवरुद्ध किया और बाद में युवक के परिवार की मदद करने का बीड़ा उठाया। इन स्‍टूडेंट्स में से एक का नाम था प्रदीप माथुर। अन्‍य युवकों में शामिल थे घाटी बहालराय घीया मंडी निवासी रमेश पचौरी। वकील आनंद मोहन पचौरी के पुत्र रमेश पचौरी अब मथुरा में ही रेवेन्‍यू के वकील हैं। इस ग्रुप में शामिल तीसरे युवक का नाम था अब्‍दुल जब्‍बार। सदर बाजार निवासी अब्‍दुल जब्‍बार आज वृंदावन में एक कुकिंग गैस एजेंसी के संचालक हैं, साथ ही राजनीति में भी रुचि रखते हैं। अब्‍दुल जब्‍बार भी प्रदीप माथुर की तरह कांग्रेसी हैं और प्रदीप माथुर के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चले हैं, बावजूद इसके उन्‍हें राजनीति में कोई उल्‍लेखनीय उपलब्‍धि हासिल नहीं हो पाई।
इनके अलावा इसी ग्रुप में शामिल रहे चौथे छात्र का नाम राकेश यादव है जिन्‍हें लोग राकेश मामा के नाम से जानते हैं। राकेश यादव भी कांग्रेसी हैं और अब तक प्रदीप माथुर का साथ देकर अपनी निष्‍ठा पूरी कर रहे हैं। राकेश यादव एक इंटर कॉलेज के संचालक तो हैं ही, कामधेनु गऊशाला का भी संचालन करते हैं। वह एक बार कांग्रेस की टिकट पर एमएलसी का चुनाव लड़ चुके हैं किंतु उसमें सफलता नहीं मिल सकी।
बहरहाल, इन सभी स्‍टूडेंट्स ने मिलकर सड़क दुर्घटना में मारे गए उस युवक की बहिन का विवाह कराने के लिए चंदा इकठ्ठा किया और तय समय पर उसकी शादी करवा दी।
युवकों के इस नेक काम की गूंज प्रदेश सरकार के कानों तक पहुंची अत: प्रदेश सरकार ने इन युवकों को पुरस्‍कृत करने का ऐलान किया। तत्‍कालीन गवर्नर ने इन्‍हें पुरस्‍कृत किया तो ये युवक अचानक समाज में हीरो बनकर उभरे।
कांग्रेस को उस दौरान चुनाव लड़ाने के लिए साफ-सुथरी छवि वाले उत्‍साही युवकों की तलाश थी। मथुरा में कांग्रेस की यह तलाश प्रदीप माथुर के रूप में पूरी हुई जिसका बड़ा कारण हाईकमान तक प्रदीप माथुर के किन्‍हीं निकटस्‍थ रिश्‍तेदार की पहुंच भी बताई जाती है।
जो भी हो, इस तरह अचानक एक दुर्घटना से उपजे हालातों ने प्रदीप माथुर को पहले चुनावी चेहरा बनवाया और फिर विधायक।
पहला चुनाव जीतने के बाद प्रदीप माथुर अगले चुनाव में जीत दर्ज नहीं करा पाए किंतु राजनीति उन्‍हें रास आ गई। अब वह लगातार तीन बार से विधायक हैं। इस बीच केंद्र में भी कांग्रेस के नेतृत्‍व वाली सरकार काबिज रही किंतु प्रदीप माथुर ने मथुरा-वृंदावन क्षेत्र के लिए ऐसा कोई काम नहीं किया जिसका उल्‍लेख किया जा सके।
वैसे खुद प्रदीप माथुर पहले यमुना नदी पर गोकुल बैराज को बनवाने का श्रेय लेते थे लेकिन जब से यह सिद्ध हुआ कि गोकुल बैराज सरकार के लिए सफेद हाथी तथा यमुना के लिए वरदान की जगह अभिषाप बन गया है तब से प्रदीप माथुर ने गोकुल बैराज के निर्माण का श्रेय लेना बंद कर दिया है।
यही हाल कांग्रेस के नेतृत्‍व वाली सरकार की जवाहर लाल नेहरू नेशनल अरबन रिन्‍यूअल मिशन यानि ''जे नर्म'' योजना का हुआ। जे नर्म में मथुरा को शामिल कराने का श्रेय प्रदीप माथुर ने डंके की चोट पर लिया और इस आशय का प्रचार किया कि इस योजना के धरातल पर उतरने के साथ मथुरा का कायाकल्‍प उसकी गरिमा के अनुसार होगा। इस योजना के तहत मथुरा के लिए 1800 करोड़ से अधिक की रकम निर्धारित की गई किंतु नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा। जे नर्म के तहत हुए चंद कामों ने पूरे शहर का हुलिया बिगाड़ कर रख दिया और मथुरा की सूरत बनने की जगह बिगड़ती चली गई। यह बात अलग है कि इस योजना के तहत प्रथम फेज का काम पूरा कराने को जो करोड़ों रुपया मिला, उसका विभिन्‍न स्‍तर पर बंदरबांट होता रहा और काम समय पर पूरा न हो पाने की वजह से मथुरा को योजना से बाहर कर दिया गया। इस पूरे घपले में कहीं न कहीं विधायक प्रदीप माथुर की भी संलिप्‍तता का जिक्र होता रहा है लेकिन स्‍पष्‍टत: कुछ सामने नहीं आया।
आम जनता द्वारा ''जे नर्म'' में हुए घपले से विधायक प्रदीप माथुर को जोड़ने की एक वजह यह भी रही है कि इस बीच प्रदीप माथुर फर्श से अर्श तक जा पहुंचे जबकि हैसियत उनकी सिर्फ विधायक की ही थी। प्रदीप माथुर की माली हालत की बात करें तो अब वह प्रत्‍यक्ष में एक गैस एजेंसी और सर्वाधिक कीमती इलाके कृष्‍णा नगर में करोड़ों रुपए मूल्‍य की भव्‍य कोठी के मालिक हैं। उनकी संतानें मेडिकल की पढ़ाई पूरी कर चुकी हैं और उनके नाम पर भी पॉश कॉलोनियों में अचल संपत्‍तियां हैं।
बताया जाता है कि प्रदीप माथुर की दूसरे व्‍यापारों में भी साझेदारी है किंतु इसकी पुष्‍टि नहीं हो सकी, अलबत्‍ता लोकपाल से शिकायत जरूर हुई।
एक ऐसे ही व्‍यापारिक मामले में सरकारी कर्ज को लेकर प्रदीप माथुर पर केस चला था और उसमें गैर जमानती वारंट भी जारी हुए थे लेकिन वर्तमान में उसका क्‍या स्‍टेटस है, यह कोई बताने को तैयार नहीं।
जाहिर है कि मथुरा के लिए प्रदीप माथुर ने कुछ किया या नहीं किया, किंतु अपने लिए इतना कुछ कर लिया है कि आगे आने वाली पीढ़ी को भी शायद ही कभी आर्थिक समस्‍या का सामना करना पड़े।
यमुना प्रदूषण मुक्‍ति के लिए शुरू की गई पदयात्रा में बाबा जयकृष्‍ण दास सहित यमुना भक्‍तों के साथ प्रदीप माथुर द्वारा केंद्र के इशारे पर किए गए धोखे से मथुरा की जनता बेहद नाराज है और इसीलिए इस बार जब प्रदीप माथुर नामांकन भरने से पहले यमुना पूजन करने पहुंचे तो उनका खासा विरोध किया गया।
मथुरा की जनता से पूछने पर वह साफ कहती है कि कुल चार बार की विधायकी में प्रदीप माथुर ने अपना घर खूब भरा लेकिन मथुरा का कोई भला नहीं कर पाए। मथुरा के लिए जो भी योजनाएं लाई गईं, उनका मकसद निजी स्‍वार्थ पूरे करना रहा न कि मथुरा को उसके गौरवशाली अतीत से रूबरू कराना।
ऐसे ही दूसरे एक्‍सीडेंटल पॉलिटीशियन हैं राष्‍ट्रीय लोकदल के प्रत्‍याशी डॉ. अशोक अग्रवाल। जहां तक सवाल बाल रोग विशेषज्ञ रहते राजनीति में आने वाले डॉ. अशोक अग्रवाल का है, तो इसका कारण बनी अपहरण की एक आपराधिक घटना वरना डॉ. अशोक, ''अशोक हॉस्‍पीटल'' के नाम से चौकी बाग बहादुर क्षेत्र में अपना अच्‍छा-खासा चिकित्‍सकीय व्‍यवसाय चला रहे थे।
यह आपराधिक घटना घटी सन् 2003 के जुलाई महीने में। इस घटना के तहत शहर के मशहूर डॉक्‍टर उमेश माहेश्‍वरी का मसानी क्षेत्र से तब देर शाम अपहरण कर लिया गया जब वो चौक बाजार स्‍थित अपनी क्‍लीनिक से एनएच टू स्‍थित अपने घर तथा हॉस्‍पीटल लौट रहे थे। माहेश्‍वरी हॉस्‍पीटल नामक इस संस्‍थान को डॉ. उमेश माहेश्‍वरी के पुत्र डॉ. मयंक माहेश्‍वरी व डॉ. शशांक माहेश्‍वरी संचालित करते हैं। हॉस्‍पीटल के ऊपर ही माहेश्‍वरी परिवार ने अपना निवास बना रखा है।
प्रसिद्ध चिकित्‍सक उमेश माहेश्‍वरी के अपहरण से मथुरा ही नहीं नजदीकी शहरों के चिकत्‍सा जगत में भी हंगामा मच गया क्‍योंकि डॉ. उमेश माहेश्‍वरी आम जनता के बीच काफी लोकप्रिय थे।
उस वक्‍त मथुरा के एसएसपी प्रेम प्रकाश हुआ करते थे। जाहिर है कि पुलिस पर डॉ. उमेश माहेश्‍वरी को जल्‍द से जल्‍द अपराधियों के चंगुल से छुड़ाने का खासा दबाव था लिहाजा पुलिस हाथ-पैर तो खूब मार रही थी किंतु नतीजा कुछ नहीं निकल रहा था।
इधर डॉ. उमेश माहेश्‍वरी के दोनों डॉ. पुत्र तथा अन्‍य लोग भी अपने स्‍तर से डॉ. साहब के बारे में जानकारी करने का पूरा प्रयास कर रहे थे।
इस दौरान पुलिस को पता लगा कि डॉ. उमेश माहेश्‍वरी के अपहरणकर्ताओं से कुछ लोग संपर्क साधने में सफल हुए हैं और उनकी अपहरणकर्ताओं से बातचीत चल रही है।
इन लोगों में कृष्‍ण जन्‍मभूमि की सुरक्षा ड्यूटी में तैनात पुलिस के ही एक सीओ त्रिदीप सिंह, अलीगढ़ में तैनात एलआईयू का एक सब इंस्‍पेटर मलिक सहित एक उद्योगपति, एक प्रसिद्ध वकील तथा एक डॉक्‍टर भी शामिल हैं।
पुलिस अभी और कुछ कर पाती कि इससे पहले किसी तरह डॉ. उमेश माहेश्‍वरी बदमाशों के चंगुल से मुक्‍त होने में सफल रहे। बदमाशों के चंगुल से मुक्‍त होकर डॉ. उमेश माहेश्‍वरी ने होटल मधुवन में एक प्रेस कांफ्रेस करके जो जानकारी दी, उसके मुताबिक पुलिस की उन्‍हें मुक्‍त कराने में कोई भूमिका नहीं रही।
डॉ. उमेश माहेश्‍वरी द्वारा दी गई जानकारी मथुरा पुलिस को काफी नागवार गुजरी और उसने अपना मुंह साफ करने के लिए सबसे पहले सीओ त्रिदीप सिंह पर शिकंजा कसा। पुलिस ने सीओ त्रिदीप सिंह के सरकारी घर से 11 लाख रुपए बरामद करते हुए बताया कि यह रकम बदमाशों को फिरौती देकर डॉ. उमेश माहेश्‍वरी को छुड़वाने के एवज में सीओ को मिली है तथा सीओ व अन्‍य कई लोग बदमाशों को फिरौती दिलवाने में शामिल रहे हैं। सीओ त्रिदीप सिंह को आरोपी बनाकर जेल भेजने के बाद पुलिस ने रात में फौजदारी के प्रसिद्ध वकील राम सरीन के डेंपियर नगर स्‍थित आवास पर दविश दी और फिर चौकी बाग बहादुर स्‍थित डॉ. अशोक के निवास को घेर लिया।
पुलिस ने डॉ. अशोक पर बदमाशों के साथ सांठगांठ होने का आरोप लगाया और कहा कि फिरौती की रकम दिलवाने में उनकी भी भूमिका रही है। पुलिस ने डॉ. अशोक और एडवोकेट राम सरीन को गिरफ्तार तो नहीं किया लेकिन उनके यहां पुलिसिया तांडव जमकर किया।
डा. अशोक को पुलिस के इस अप्रत्‍याशित व्‍यवहार ने पूरी तरह हिला दिया अत: उन्‍होंने पुलिसिया हरकत के अगले दिन अपने हॉस्‍पीटल में एक प्रेस कांफ्रेंस बुलाई। प्रेस कांफ्रेस में डॉ. अशोक ने जो जानकारी दी वो चौंकाने वाली थी।
डॉ. अशोक ने बताया कि पुलिस द्वारा उनके यहां दविश देने से पहले मथुरा दैनिक जागरण के ब्‍यूरो चीफ अमी आधार निडर का फोन उनके पास आया था और उन्‍होंने मुझसे एसएसपी के नाम से 5 लाख रुपयों की मांग की।
डॉ. अशोक ने तब प्रेस कांफ्रेंस में बताया कि अमी आधार निडर ने उनसे साफ कहा है कि एसएसपी प्रेम प्रकाश उनके घर पर बैठे हैं और यदि यह मांग पूरी नहीं की गई तो रात में आपको आरोपी बनाकर जेल भेज दिया जाएगा।
डॉ. अशोक ने प्रेस कांफ्रेस में बाकायदा रोते हुए सिलसिलेवार पुलिस और अमी आधार निडर के धमकाने का ब्‍यौरा देकर कहा कि यदि मुझे न्‍याय नहीं मिला तो मैं आत्‍महत्‍या कर लूंगा।
डॉ. अशोक के साथ हुई इस घटना के बाद एसएसपी प्रेम प्रकाश का तबादला पड़ोसी जनपद अलीगढ़ के लिए कर दिया गया और दैनिक जागरण ने अमी आधार निडर को भी हटा दिया।
इसके काफी समय बाद सीओ त्रिदीप सिंह को पहले जमानत मिली और फिर अदालत ने उन्‍हें निर्दोष भी माना। सीओ के यहां से पुलिस द्वारा बरामद दिखाया गया 11 लाख रुपया सीओ को मिल गया किंतु उस घटना ने डॉ. अशोक को राजनीति में कदम रखने के लिए प्रेरित किया।
डॉ. अशोक ने सबसे पहले बहुजन समाज पार्टी की सदस्‍यता ली। बहुजन समाज पार्टी ने उन्‍हें विधानसभा का चुनाव लड़ने को तैयार भी किया किंतु ऐन वक्‍त पर उनका पत्‍ता काटकर देवेन्‍द्र गौतम ''गुड्डू'' को टिकट पकड़ा दिया। इधर गुड्डू गौतम चुनाव हार गए और उधर डॉ. अशोक ने बसपा छोड़कर सपा का दामन थाम लिया।
2012 का विधानसभा चुनाव वह सपा के टिकट पर लड़े भी लेकिन कांग्रेस व रालोद के गठबंधन उम्‍मीदवार प्रदीप माथुर से मात्र 1500 मतों के अंतर से हारकर तीसरे नंबर पर रहे। यही रालोद जिसके टिकट पर डॉ. अशोक अब चुनाव लड़ रहे हैं।
इस बार सपा कांग्रेस के गठबंधन से मथुरा-वृंदावन विधानसभा क्षेत्र की सीट सिटिंग विधायक तथा कांग्रेस विधानमंडल दल के नेता प्रदीप माथुर के खाते में चली गई और सारी तैयारियों के बाद भी डॉ. अशोक मुंह देखते रह गए।
मौका देखकर राष्‍ट्रीय लोकदल ने डॉ. अशोक को लपक लिया और उन्‍हें अपना टिकट थमाकर मथुरा-वृंदावन से चुनाव मैदान में उतार दिया क्‍योंकि रालोद के पास इस सीट के लिए कोई कद्दावर केंडीडेट था ही नहीं।
दुर्घटनावश राजनीति में आए प्रदीप माथुर की गिनती आज घाघ राजनीतिज्ञों में होती है जबकि चार बार विधायक रहकर भी उन्‍होंने मथुरा के लिए कुछ नहीं किया। हां, अपने लिए खूब किया। इतना किया कि राजनीति में आने से पहले जिस प्रदीप माथुर की हैसियत स्‍कूटर पर चलने की नहीं थी आज वह करोड़ों की चल-अचल संपत्‍ति के मालिक हैं।
इसी सीट से बसपा के प्रत्‍याशी योगेश द्विवेदी कुछ वर्षों पहले तक होटल में बैरे का काम करते थे। खुद योगेश द्विवेदी ने अपने इस रूप की फोटो सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक पर डाली हुई हैं जिनमें वह बहिन मायावती व मान्‍यवर कांशीराम की खिदमत करते दिखाई दे रहे हैं। उनसे पहले उनकी मां पुष्‍पा शर्मा भी इसी प्रकार स्‍वास्‍थ्‍य विभाग में एएनएम थीं और बाद में नगर निकाय का चुनाव लड़कर वृंदावन नगर पालिका की अध्‍यक्ष बनीं। पुष्‍पा शर्मा ने एक चुनाव विधायकी का भी लड़ा लेकिन उसमें उन्‍हें असफलता हाथ लगी थी। इसी प्रकार योगेश द्विवेदी ने 2009 का लोकसभा चुनाव भी बसपा की टिकट पर लड़ा था किंतु वह हार गए। योगेश द्विवेदी की मां पुष्‍पा शर्मा अपनी आपराधिक छवि के कारण राजनीति में आईं और उनकी प्रेरणास्‍त्रोत दस्‍यु सुंदरी से सांसद बनीं फूलन देवी रहीं। फूलन देवी से उनकी निकटता हमेशा चर्चा का विषय रही है।
अब शेष रह जाते हैं भाजपा के राष्‍ट्रीय प्रवक्‍ता और प्रत्‍याशी श्रीकांत शर्मा। श्रीकांत शर्मा का राजनीति में प्रवेश किसी घटना-दुर्घटनावश हुआ या नहीं, इसके बारे में तो कहना मुश्‍किल है लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि उनके राजनीतिक कद तथा उम्‍मीदवारी को उनकी ही पार्टी के लोग किसी बड़ी दुर्घटना से कम नहीं मानते।
मथुरा में एक से एक धुरंधर नेता मुंह देखते रह गए और श्रीकांत शर्मा अचानक हवाई मार्ग द्वारा उस धरा पर उतरे, जिस धरा को वह बीस साल पहले ही छोड़ चुके थे। खुद को गोवर्धन विधानसभा क्षेत्र के गांव गंठौली निवासी बताने वाले श्रीकांत शर्मा हिमालय में तपस्‍या करके अमित शाह को प्राप्‍त कर पाए अथवा अमित शाह ने हिमालय जाकर उन्‍हें हासिल किया, इस रहस्‍य को जानने के लिए मथुरा की जनता बेहद उत्‍साहित है। जनता को उनकी जीत-हार से ज्‍यादा इस बात में रुचि है कि बीस साल से अधिक समय तक वह राजनीति के किन गलियारों की शोभा बढ़ा रहे थे और कैसे मोदी सरकार के साथ-साथ राष्‍ट्रीय प्रवक्‍ता व राष्‍ट्रीय सचिव जैसे पदों पर नमूदार हो गए।
श्रीकांत शर्मा की शहरी सीट पर उम्‍मीदवारी मथुरा की जनता के लिए किसी रहस्‍य-रोमांच से कम नहीं है। आम मतदाता और खुद पार्टी के भी एक बड़े तबके के लिए उनकी उम्‍मीदवारी किसी दुर्घटना की तरह है।
अब देखना यह है कि इन चारों एक्‍सीडेंटल पॉलिटीशियन में से किस के सिर जीत का सेहरा बंधता है और कौन-कौन हार से रूबरू होता है परंतु यह निश्‍चित है कि मथुरा का विकास एकबार फिर यक्षप्रश्‍न बनने जा रहा है।
यक्ष प्रश्‍न इसलिए क्‍योंकि इन चुनावों से ठीक पहले भी मथुरा की जनता को कुछ ऐसी ही आस बंधाई गई थी, ऐसे ही वायदे किए गए थे और ऐसी ही तकरीरें सुनाई गईं थीं जो अब दिवास्‍वप्‍न बनकर रह गई हैं।
मथुरा की स्‍वप्‍न सुंदरी सांसद अब कहती हैं कि मथुरा के विकास में अखिलेश सरकार रोड़े अटकाती रही है इसलिए विकास चाहिए तो प्रदेश में भी भाजपा की सरकार बनवाइए।
पता नहीं चुनावों का ऊंट किस करवट बैठेगा लेकिन यह जरूर पता है कि किसी न किसी दुर्घटनावश राजनीति में प्रवेश करने वाले मथुरा-वृंदावन क्षेत्र के ये प्रत्‍याशी क्‍या-क्‍या गुल खिलायेंगे। जीत किसी की हो लेकिन जनता की हार पहले से तय है क्‍योंकि एक्‍सीडेंटल राजनीतिज्ञों से और उम्‍मीद भी क्‍या की जा सकती है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
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