बुधवार, 16 अप्रैल 2014

फर्जी ब्रेथ टेस्ट रिपोर्ट बनवाकर उड़ान

डायरेक्टर जनरल ऑफ सिविल एविएशन ने गांधी परिवार के सदस्यों को लेकर उड़ान भरने वाली कंपनी को पायलटों की फर्जी ब्रेथ टेस्ट रिपोर्ट बनाने पर कारण बताओ नोटिस जारी किया है। डीजीसीए ने पाया कि उड़ान भरने से पहले होने वाले पायलट्स के ब्रेथ ऐनलाइजर (BA) टेस्ट की रिपोर्ट फर्जी भरी जा रही थी। जिन लोगों को SPG सुरक्षा मिली होती है, उन्हें लेकर उड़ान भरने से पहले हर बार यह टेस्ट कराना जरूरी होता है। इस टेस्ट के जरिए पता चलता है कि कहीं पायलट ने शराब तो नहीं पी है। इस तरह से देखा जाए तो गांधी परिवार के सदस्यों की जान खतरे में हो सकती थी।
ताजा वाकया सोमवार 14 अप्रैल का है, जब राहुल गांधी ने जीएमआर के लग्जरी फैल्कन 2000-Lx में दिल्ली से भुवनेश्वर के लिए उड़ान भरी थी। लापरवाही बरतने पर रेग्युलेटर ने 3 महीने के लिए जीएमआर एविएशन के 11 पायलट्स के फ्लाइंग लाइसेंस सस्पेंड कर दिए हैं और 6 कैबिन क्रू मेंबर्स को बर्खास्त कर दिया है। जिन पायलट्स ने अक्सर सोनिया और राहुल गांधी को लेकर उड़ान भरी थी, उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए पूछा गया है कि उनके लाइसेंस क्यों न 5 साल के लिए सस्पेंड कर दिए जाएं।
डीजीसीए ने कंपनी के डॉक्टर के खिलाफ भी एफआईआर करवाई है। डॉक्टर पर आरोप है कि उन्होंने BA टेस्ट्स के फर्जी रेकॉर्ड बनाए जबकि टेस्ट की मशीन ही खराब थी। एक सीनियर डीजीसीए ऑफिसर ने बताया, 'हम दिल्ली मेडिकल काउंसिल को उनका लाइसेंस रद्द करने के लिए लिख रहे हैं।' कर्मशल फ्लाइट्स के लिए कभी-कभार उड़ान से पहले BA टेस्ट कराया जाता है लेकिन जिन लोगों को SPG सुरक्षा मिली होती है, उन्हें लेकर उड़ने से पहले पायलट्स को हर बार टेस्ट करवाना पड़ता है।
अधिकारी ने बताया, 'हमने जीएमआर एविएशन के मार्च 12 से अप्रैल 14 तक के फ्लाइंग रेकॉर्ड्स की जांच की तो पाया कि उड़ान भरने से पहले किए गए मेडिकल जांच में BA टेस्ट फर्जी थे। इस दौरान BA टेस्ट करने वाले मशीन खराब थी।'
डीजीसीए ने यह भी पाया कि कांग्रेस नेता कमल नाथ की कंपनी स्पैन एविएशन और पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के परिवार की कंपनी ऑरबिट एविएशन भी लगातार प्री-फ्लाइट BA टेस्ट नहीं करवा रही है। उनके डॉक्टर भी 3 महीनों के लिए सस्पेंड कर दिए गए हैं।
-एजेंसी

शनिवार, 12 अप्रैल 2014

जीजाजी से अदानी के रिश्‍ते जाहिर, बैकफुट पर आई कांग्रेस

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा एक बार फिरचर्चा में हैं। ऐसी तस्वीरें सामने आई हैं, जिनमें कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा अडाणी ग्रुप के चेयरमैन गौतम अडाणी के साथ नजर आ रहे हैं। ये तस्वीरें तब की हैं, जब रॉबर्ट वाड्रा अडाणी ग्रुप के एयरक्राफ्ट पर सवार होकर अडानी के प्रॉजेक्ट देखने गुजरात के कच्छ गए थे। गौरतलब है कि पिछले दिनों कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने बीजेपी के पीएम कैंडिडेट नरेंद्र मोदी को अडाणी ग्रुप से रिश्तों को लेकर निशाने पर लिया था।
इस तस्वीर के सामने आने के बाद कांग्रेस बैकफुट पर आती दिख रही है। रॉबर्ट वाड्रा और गौतम अडाणी की यह तस्वीर साल 2009 की है। उस वक्त वाड्रा तब गुजरात के मूंदड़ा में अडाणी पोर्ट और अडाणी पावर प्लांट को देखने आए थे। वाड्रा और गौतम अडाणी एकसाथ अडाणी के प्राइवेट एयरक्राफ्ट में ही वहां पहुंचे थे। इससे पहले कांग्रेस भी कई मौकों पर नरेंद्र मोदी पर आरोप लगा चुकी है कि वह अडाणी ग्रुप के प्लेन से यात्रा करते हैं।
पिछले दिनों उदयपुर में हुई रैली में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी नरेंद्र मोदी को घेरते हुए कहा था, 'बीजेपी में आडवाणी बाहर और अदाणी अंदर।' राहुल गांधी ने मोदी और अडाणी ग्रुप की करीबियों का जिक्र करते हुए कहा था कि एक शख्स को गुजरात सरकार ने करोड़ों एकड़ जमीन मुफ्त में दे दी। अब जो तस्वीरें सामने आई है, उसमें रॉबर्ड वाड्रा और गौतम अडाणी एक साथ दिख रहे हैं। एक तस्वीर में दोनों बैठकर कुछ बात कर रहे हैं और दूसरी तस्वीर में वॉक करते दिख रहे हैं।
सबसे पहले अरविंद केजरीवाल ने साल 2012 में नरेंद्र मोदी और अडाणी ग्रुप के रिश्ते पर सवाल उठाए थे। उसके बाद से मोदी को घेरने के लिए वह लगातार इस मुद्दे को उठाते रहे हैं लेकिन पिछले दिनों कांग्रेस ने भी इस बात को लेकर मोदी पर निशाना साधना शुरू किया था मगर इस तस्वीर के सामने आने के बाद वह बैकफुट पर आती नजर आ रही है।
-एजेंसी

मंगलवार, 8 अप्रैल 2014

चुनावी सीजन में नेताओं का 'कुत्‍ता प्रेम'!

खुदा कसम, चुनावों के इस सीजन में कुत्‍ते भी नेताओं से बहुत परेशान हैं। कुत्‍तों की परेशानी मुझे भी कुछ वाजिब सी लगती है। बेशक वह मजबूर हैं लेकिन नेताओं को कोई हक नहीं बनता कि वह जब चाहें और जहां चाहें, उनकी तुलना अपने सहोदरों से करने लगें। आम इंसानों से की होती तो बात कुछ हजम भी होती क्‍योंकि लोकतंत्र में आम इंसान की दुर्गत गली के कुत्‍ते समान ही है परंतु यहां तो तुलना नेताओं से की जा रही है, और वो भी एक नेता दूसरे नेता की तुलना में कुत्‍तों का दुरुपयोग कर रहा है। कहीं किसी संदर्भ में एक नेता ने कह दिया कि कार के पहिए से कुचलकर अगर कोई पिल्‍ला भी मर जाए तो दुख होता है, फिर इंसान की मौत का दुख तो बनता है ना।
नेता का यह संदर्भ दूसरी पार्टी के नेता को इतना नागवार गुजरा कि उसने संदर्भ देने वाले नेताजी को ही गुस्‍से में कुत्‍ते के पिल्‍ले का बड़ा भाई कह डाला। इतना भी नहीं सोचा कि उन्‍हें यह पदवी देने से पहले वह खुद को पिल्‍ला मानकर चल रहे हैं।
संदर्भ देने वाले नेताजी ने जिस संदर्भ में भी पिल्‍ले का इस्‍तेमाल किया हो परंतु गुस्‍से में मतिभ्रष्‍ट दूसरी पार्टी के नेता ने तो पूरी कौम को खुद ही पिल्‍ला घोषित कर दिया।
बहरहाल, कूकुर के इस दुरुपयोग पर कुत्‍तों ने एक सभा का आयोजन किया और सर्वसम्‍मति से नेताओं द्वारा अपनी तुलना कुत्‍तों से किए जाने के खिलाफ घोर आपत्‍ति जाहिर की।
कुत्‍तों का कहना था कि हर जाति व नस्‍ल का कुत्‍ता अंतत: पूरी तरह कुत्‍तत्‍व को प्राप्‍त होता है जबकि नेता का अंत तक पता नहीं होता कि वह किस करवट बैठेगा। मसलन, हर किस्‍म के कुत्‍ते में स्‍वामिभक्‍ति, वफादारी तथा चाक चौबंद चौकीदारी जैसे गुण पाये जाते हैं। कुत्‍ता चाहे गली का आवारा हो या कीमती पट्टे से सुसज्‍जित किसी मेम के मुंह को चाटने वाला पालतू हो, दोनों के गुण-धर्म समान होते हैं लेकिन पूर्ण कुत्‍तत्‍व को प्राप्‍त एक भी नेता किसी पार्टी में नहीं पाया जाता। वह आज किसी एक की भक्‍ति में लीन होता है तो कल किसी दूसरे की भक्‍ति में। वह तो अपने भगवान हर चुनाव में बदल डालता है लिहाजा बेवफा नेताओं की तुलना किसी भी दृष्‍टि में वफादारी की मिसाल कुत्‍तों से किया जाना उचित नहीं है।
एक सीनियर सिटीजन कुत्‍ते ने अफसोस ज़ाहिर करते हुए कहा कि नेता तो उन आम इंसानों का भी सगा नहीं होता जो उसे दौलत, शौहरत और इज्‍ज़त हासिल कराते हैं। उसे इस लायक बनाते हैं कि वह अपनी सात पीढ़ियों के लिए ऐश-मौज का इंतजाम कर सके।
वह बोला, आप और हम देख रहे हैं कि आज चुनाव है तो नेता लोग आम आदमी के आगे-पीछे घूम रहे हैं, दर-दर की खाक छान रहे हैं लेकिन जैसे ही चुनाव खत्‍म होगा, यह उसे 'मेंगो पीपल' घोषित कर देते हैं।
आखिर में यह सीनियर सिटीजन कुत्‍ता कहने लगा कि हम तो आखिर कुत्‍ते हैं, नेताओं का कुछ भी बिगाड़ पाना हमारे बस में नहीं क्‍योंकि हमें कौन सा मताधिकार हासिल है। ये हमारी तुलना जैसे चाहें, वैसे करें परंतु दुख व अफसोस तो इंसानों के लिए होता है। तरस आता है उनके बुद्धि और विवेक पर। कुत्‍ता पालतू हो या गली का आवारा, यदि वो अपने को रोटी का टुकड़ा डालने वाले पर गलती से भी भोंक दे तो उस पर इंसान डंडा लेकर पिल पड़ता है। उसे खदेड़ देता है कहीं दूर और कहता है कि यह साला कैसा कुत्‍ता है जो अपने पालने-पोसने वाले पर ही भोंकता  है लेकिन उन नेताओं का कोई इंतजाम नहीं करता जिसे अपना वोट देकर आम से खास बनाता है। विशिष्‍ट बनवाता है, वीवीआईपी का तमगा दिलवाता है, लाल बत्‍ती की गाड़ी में बैठने लायक हैसियत दिलवाता है।
हम तो मजबूर हैं लेकिन आम इंसान के पास वोट की ताकत है। फिर वह बेवफा व खुदगर्ज नेताओं को कुत्‍तों की तरह क्‍यों नहीं खदेड़ देता, क्‍यों नहीं इन्‍हें समझाता कि कुत्‍तों से अपनी तुलना करने वालो, सच तो यह है कि तुम कुत्‍ते कहलाने लायक भी नहीं हो। कुत्‍तों से अपनी तुलना करके एक्‍चुअली तुम संपूर्ण कुत्‍तों और उनके कुत्‍तत्‍व की बेइज्‍ज़ती कर रहे हो। कुत्‍ता तो अनेक गुणों से विभूषित जीव है और इसीलिए उसे भगवान दत्‍तात्रेय ने अपने गुरूओं में शुमार किया था।
महाभारत काल से लेकर आज तक कुत्‍ता हर युग में वफादार था और आगे भी वफादार रहेगा। वह चाहे जिस नस्‍ल का हो, हर नस्‍ल में पूर्ण कुत्‍तत्‍व को ही प्राप्‍त होता है। किसी नस्‍ल में उसकी स्‍वामिभक्‍ति या वफादारी जैसे गुण प्रभावित नहीं होते लेकिन नेता तो पार्टी के साथ सब कुछ बदल लेता है। उसकी निष्‍ठा, भक्‍ति, वफादारी आदि सब-कुछ पार्टी के साथ तब्‍दील होती रहती है। शर्म करो....कुछ तो शर्म करो...शर्म करो...के नारे लगाकर आखिर उस सीनियर सिटीजन कुत्‍ते ने अपना वक्‍तव्‍य पूरा किया कि अब इससे अधिक बोला तो पता नहीं मेरे ही भाई-बंधु कहीं मुझे नेता की पदवी न दे दें और ऐसी अपमान जनक पदवी मुझे अपनों से प्राप्‍त हो, यह गवारा नहीं।
ऐसा होने पर मुझे आत्‍मग्‍लानि के कारण आत्‍महत्‍या करने को विवश होना पड़ सकता है।
अंत में ईश्‍वर से केवल इतनी ही प्रार्थना करुंगा कि हे ईश्‍वर! यदि पुनर्जन्‍म होता है तो प्‍लीज.....किसी भी योनि में जन्‍म दे देना लेकिन नेता मत बनाना। नेता बना दिया तो हमारी आत्‍मा जीते जी मर जायेगी। आमीन...आमीन...आमीन!
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

गुरुवार, 3 अप्रैल 2014

गे केस: खुली कोर्ट में सुनवाई को SC तैयार

उच्चतम न्यायालय समलैंगिकता को आपराधिक कृत्य करार देने वाले अपने फैसले के खिलाफ समलैंगिक अधिकार कार्यकर्ताओं की ओर से दायर सुधारात्मक याचिकाओं पर खुली अदालत में सुनवाई के लिए राजी हो गया है। प्रधान न्यायाधीश पी सदाशिवम की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि वे दस्तावेजों का निरीक्षण करेंगे और याचिका पर गौर करेंगे। इस पीठ के समक्ष यह मामला विभिन्न पक्षों की ओर से वरिष्ठ वकीलों ने उठाया था।
सुधारात्मक याचिका अदालत में किसी मामले से जुड़ी चिंताओं पर दोबारा विचार का अंतिम न्यायिक रास्ता है और सामान्यत: इस पर न्यायाधीश बिना किसी पक्ष को बहस की अनुमति दिए अपने कक्ष में सुनवाई करते हैं। याचिकाकर्ताओं में नाज़ फाउंडेशन नामक गैर सरकारी संगठन भी शामिल है, जो लेस्बियन, गे, बाइसेक्सुअल और ट्रांसजेंडर (एलजीबीटी) समुदाय की ओर से कानूनी लड़ाई लड़ रहा है।
याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि पिछले साल 11 दिसंबर को दिए गए फैसले में गलती है और वह पुराने कानून पर आधारित है। वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक देसाई ने पीठ को बताया, ‘‘फैसले को 27 मार्च 2012 को सुरक्षित रख लिया गया था लेकिन फैसला लगभग 21 महीने बाद सुनाया गया।
इस दौरान कानून में संशोधन समेत बहुत से बदलाव हुए और फैसला देते समय पीठ ने इनपर ध्यान नहीं दिया।’’ हरीश साल्वे, मुकुल रोहतगी, आनंद ग्रोवर जैसे वरिष्ठ अधिवक्ताओं के साथ अन्य वकीलों ने भी देसाई का समर्थन किया और एक खुली अदालत में सुनवाई की अपील की।
-एजेंसी

ये क्‍या...आठ सीटों पर भाजपा के दो-दो प्रत्‍याशी!


यूं तो राजनेता किसी संभावित प्रश्‍न का जवाब देना उचित नहीं समझते लेकिन संभावनाएं उनसे उत्‍तर की दरकार रखती हैं लिहाजा यदि वो संतुष्‍ट नहीं करते तो खुद-ब-खुद उत्‍तर तलाश लेती हैं।
राजनीति के इस संक्रमण काल में चूंकि राजनीतिक दलों की बाजीगरी के लिए असीमित संभावनाएं भरी पड़ी हैं और संविधान उनकी इन संभावित बाजीगरी के आगे लगभग नतमस्‍तक है लिहाजा आमजन इस बाजीगरी का आंकलन अपने स्‍तर से करने लगता है।
16 वीं लोकसभा के लिए 10 अप्रैल से शुरू हो रहे चुनावों में किसके सिर जीत का सेहरा बंधने वाला है और किसके हाथों की लकीरें उसे सत्‍ता के शीर्ष पर काबिज कराती हैं, यह तो 16 मई के बाद ही पता लग पायेगा अलबत्‍ता एक बात जो पता लग चुकी है, वह यह है कि सत्‍ता की चाहत के इस खेल में यदि जादुई अंकों की जरूरत पड़ी तो राष्‍ट्रीय लोकदल जैसे छोटे दलों की लॉटरी निकल पड़ेगी।
कहने को राष्‍ट्रीय लोकदल आज की तारीख तक यूपीए का हिस्‍सा है और कांग्रेस के सहयोग से उसके युवराज जयंत चौधरी कृष्‍ण की नगरी में दोबारा चुनाव लड़ रहे हैं परंतु नतीजे आने पर वह यूपीए का भाग रहेंगे या नहीं, इसकी गारंटी वह स्‍वयं नहीं दे सकते।
सब जानते हैं कि जिस तरह आज वह कांग्रेस की वैसाखी के सहारे चुनाव मैदान में हैं, उसी तरह पिछला चुनाव उन्‍होंने भाजपा के कांधों का सहारा लेकर लड़ा था। रालोद के युवराज तो अपना पहला लोकसभा चुनाव जीत गए परंतु भाजपा के नेतृत्‍व वाला एनडीए संख्‍याबल से हार गया।
जाहिर है कि एनडीए की सत्‍ता बनती न देख रालोद ने तुरंत कांग्रेस के नेतृत्‍व वाले यूपीए में घुसपैठ की जुगत भिड़ानी शुरू कर दी किंतु उस समय यूपीए ने सत्‍ता पर काबिज होने लायक सीटों की जुगाड़ कर ली थी।
समय के साथ केन्‍द्र के कांग्रेस नेतृत्‍व पर भ्रष्‍टाचार तथा महंगाई न रोक पाने के आरोप जब लगने लगे और यूपीए के घटक दल कांग्रेस को आंखें दिखाने लगे तो कांग्रेस ने खतरे को भांपकर समय रहते अपना गणित फिट करना जरूरी समझा। कांग्रेस के इस गणित को फिट करने में रालोद से बेहतर और कौन हो सकता था नतीजतन उसके मुखिया चौधरी अजीत सिंह को केन्‍द्र में मंत्रीपद से नवाज़ कर दोनों ने अपनी-अपनी जरूरतें पूरी कर लीं।
अब मथुरा की जनता के जेहन में यह सवाल पैदा होना लाजिमी है कि इस बार अगर जयंत चौधरी फिर जीत जाते हैं लेकिन केन्‍द्र में यूपीए की सरकार बनने के आसार दिखाई नहीं देते तो भी क्‍या रालोद यूपीए का हिस्‍सा बना रहेगा?
यही वो संभावित प्रश्‍न है जिसका उत्‍तर देने को कोई तैयार नहीं, लेकिन उत्‍तर तो चाहिए क्‍योंकि उत्‍तर न मिलने पर तमाम प्रतिप्रश्‍न खड़े हो जाते हैं।
ज़रा सोचिए कि यदि केन्‍द्र में यूपीए की सरकार बनने की संभावना नहीं रहती और भाजपा के नेतृत्‍व वाली एनडीए को भी स्‍पष्‍ट बहुमत नहीं मिलता (जिसकी कि संभावनाएं काफी हैं) तो भी क्‍या रालोद, यूपीए का हिस्‍सा बना रहेगा?
रालोद के मुखिया चौधरी अजीत सिंह का ट्रैक रिकॉर्ड देखें तो साफ पता लगता है कि वह ऐसी स्‍थिति में एनडीए का हिस्‍सा बनते कतई देर नहीं लगायेंगे। इसके लिए सौदेबाजी में नफा-नुकसान का बेहतर आंकलन करना उन्‍हें आता है और निश्‍चित ही वह अपने लिए फायदे का सौदा करेंगे।
तो क्‍या यह मान लिया जाए कि मथुरा ही क्‍यों, पश्‍चिमी उत्‍तर प्रदेश की जिन आठ सीटों पर रालोद, कांग्रेस के सहयोग से चुनाव लड़ रही है... वहां परोक्ष तौर पर भाजपा के ही दो-दो प्रत्‍याशी चुनाव मैदान में हैं।  एक उसके अपने सिंबल पर और दूसरा रालोद के रूप में। क्‍योंकि फिर चाहे भाजपा का प्रत्‍याशी जीते या रालोद का, अंतत: जरूरत पड़ने पर वह गिरेगा तो भाजपा की ही झोली में।
रालोद के लिए ऐसा करना इसलिए और आसान हो जाता है क्‍योंकि उसका दायरा बहुत छोटा है तथा जब चाहे व जहां चाहे पलटी मारने में उसके सामने कोई समस्‍या खड़ी नहीं होती।
अगर ऐसी परिस्‍थितयां बनती हैं तो बेशक भाजपा भी इसके लिए कम जिम्‍मेदार नहीं होगी परंतु उसकी चिंता करता कौन है। सत्‍ता पर काबिज होने को लालयित जो भाजपा आज सब कुछ ग्राह्य बना चुकी है, उसे जरूरत के समय रालोद से परहेज क्‍यों होने लगा। फिर पिछले ही चुनावों में रालोद उसका साथी भी रहा है। दोनों दल एक-दूसरे की फितरतों से भली प्रकार वाकिफ हैं।
रहा सवाल उस जनता का जो आज एक को रालोद-कांग्रेस का संयुक्‍त उम्‍मीदवार मानकर मतदान करेगी और उन पार्टी कार्यकर्ताओं का जो अपने आलाकमान के आदेश-निर्देशों का सिर झुकाकर पालन करेंगे, तो उनकी फ़िक्र है किसे।
यहां तो फ़िक्र सिर्फ कुर्सी की है, वह चाहे जिन हथकंडों से मिलती हो।
तो दोस्‍तो! तैयार रहिए नतीजों के बाद राजनीतिक दलों की असली और बड़ी बाजीगरी देखने के लिए। आप मतदान चाहे जिसके पक्ष में करें लेकिन आपका जनप्रतिनिधि उसी दल का होगा, जिसकी सरकार बनेगी।
मथुरा सहित रालोद के हिस्‍से वाली  पश्‍चिमी उत्‍तर प्रदेश की आठ सीटों के बावत आप यूं भी समझ सकते हैं कि यहां हर सीट पर भाजपा के दो-दो प्रत्‍याशी चुनाव मैदान में हैं।
तय समझिए कि सरकार बनने के बाद आपके पास दोहराने को केवल यही रह जायेगा कि 'कोऊ नृप होए, हमें का हानि'।

सोमवार, 31 मार्च 2014

फिक्‍सिंग ही नहीं IT की भी जांच के घेरे में हैं माही-साक्षी

नई दिल्ली। 
टीम इंडिया के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी एक और विवाद में घिरते दिख रहे हैं। इनकम टैक्स डिपार्टमेंट रीयल्टी कंपनी आम्रपाली ग्रुप के चेयरमैन अनिल शर्मा की ओर से धोनी को मिले 75 करोड़ रुपये के चार पोस्ट डेटेड चेकों की जांच कर रहा है। डिपार्टमेंट की रांची यूनिट इस बात की जांच कर रही है कि ये चेक टैक्स के दायरे में आते हैं या नहीं।
आईपीएल में स्पॉट फिक्सिंग मामले की सुनवाई के दौरान अदालत में उनका नाम घसीटे जाने की वजह से धोनी पहले से ही परेशान हैं। मीडिया में यह रिपोर्ट आई थी कि इससे खिन्न होकर उन्होंने चेन्नै सुपरकिंग्स की कप्तानी छोड़ने की पेशकश कर डाली है, हालांकि बाद में उनके प्रवक्ता ने इसका खंडन किया था। ऐसे में चेक का मामला उनकी परेशानी बढ़ा सकता है।
जानकारी के मुताबिक, अनिल शर्मा की ओर से धोनी को चारों चेक वित्त वर्ष 2011-12 में जारी किए गए थे और इन्‍हें 2014 में कैश कराया जाना था। धोनी आम्रपाली ग्रुप के ब्रैंड ऐम्बैस्डर भी हैं जबकि उनकी पत्नी साक्षी सिंह रावत आम्रपाली माही डिवेलपर्स में 25% की हिस्सेदार हैं। आम्रपाली माही डिवेलपर्स, आम्रपाली ग्रुप और धोनी का जाइंट वेंचर है।
आम्रपाली के सूत्रों ने बताया कि मीडिया रिपोर्ट्स और पिछले साल अगस्त में कंपनी के दिल्ली और उत्तर प्रदेश स्थित ऑफिसों पर छापे के बाद इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने चेकों को लेकर ब्योरा मांगा है। नाम न जाहिर करने की शर्त पर कंपनी के एक अधिकारी ने बताया कि अधिकारियों को बुलाकर पूछताछ की गई है और जांच डिपार्टमेंट की रांची यूनिट को सौंप दी गई है। इस मामले में विभाग जल्द ही धोनी का पक्ष भी जानेगा।
चेकों को लेकर धोनी और आम्रपाली ग्रुप की अलग-अलग बात कही है। धोनी के प्रवक्ता ने कहा कि आम्रपाली माही डिवेलपर्स में धोनी ने जो निवेश किया है, ये चेक बतौर उसकी सिक्‍यॉरिटी दिए गए। आम्रपाली ग्रुप ने कहा कि आम्रपाली माही डिवेलपर्स को रांची में एक क्रिकेट अकादमी बनानी थी और ये चेक उसी काम की गारंटी के लिए दिए गए थे लेकिन काम शुरू न हो पाने की वजह कप्तान ने इन्हें लौटा दिया। हालांकि, जब आम्रपाली के प्रवक्‍ता से पूछा गया कि चेक आम्रपाली माही डेवलपर्स के बजाय धोनी के नाम पर क्‍यों जारी किया गया तो वह जवाब नहीं दे सके।
धोनी के प्रवक्ता अरुण पांडे ने बताया, 'मुझे धोनी के वित्तीय मामलों की जानकारी नहीं है लेकिन जहां तक मुझे ध्यान है ये चेक धोनी को आम्रपाली में किए गए निवेश की सिक्यॉरिटी के तौर पर दिए गए थे।
-एजेंसी

रविवार, 30 मार्च 2014

60 सालों का सबसे बड़ा करप्‍शन स्‍कैंडल

बीजिंग। 
चीनी अधिकारियों ने चीन के पूर्व मुख्य सुरक्षा अधिकारी झोऊ योंगकांग के रिश्तेदारों से 14.5 बिलियन डॉलर (तकरीबन 800 अरब रुपए) की संपत्ति जब्त की है। इसे पिछले छह दशकों में अब तक का सबसे बड़ा करप्शन स्कैंडल बताया जा रहा है। झोऊ के 300 से ज्यादा रिश्तेदारों, राजनैतिक सहयोगियों और स्टाफ सदस्यों को पिछले चार हफ्तों की पूछताछ के बाद हिरासत में लिया गया है। स्कैंडल की जांच में शामिल अधिकारियों से प्राप्त जानकारी के आधार पर सूत्रों ने समाचार एजेंसी को यह बताया।
पिछले साल जांच शुरू किए जाने के बाद 71 वर्षीय झोऊ को उनके घर में नजरबंद किया गया था। साल 1949 में कम्युनिस्ट पार्टी के सत्ता में आने के बाद पहली बार भ्रष्टाचार के इतने बड़े मामले में कोई वरिष्ठ राजनेता फंसा है।
नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर चीनी राजनीति के एक सक्रिया नेता ने बताया, "इस घटना ने चीन की छवि को धूमिल किया है। यह देश पर लगा बदनुमा दाग है।"
चीन की सरकार ने अभी तक झोऊ के बारे में कोई भी आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है। यह भी मालूम नहीं चला है कि झोऊ के रिश्तेदारों में से किसी ने कोई वकील किया है या नहीं।
साल 2007 में पोलित ब्यूरो स्टैंडिंग कमेटी ज्वाइन करने से पहले झोऊ, पब्लिक सिक्युरिटी विभाग में सिक्युरिटी चीफ के पद पर थे। साल 2012 में वह 18वीं पार्टी कांग्रेस से रिटायर हुए और उन्हें आखिरी बार चाइना यूनिवर्सिटी ऑफ पेट्रोलियम के एलुमनी प्रोग्राम में देखा गया।
सूत्रों के मुताबिक, सरकार के एंटी करप्शन निगरानी दल ने कई बैंक अकाउंट्स को सीज किया है, जिनमें 37 बिलियन युआन जमा थे। इसके अलावा बीजिंग, शंघाई सहित पांच प्रांतों में स्थित घरों में मारे गए छापे में 51 बिलियन युआन वैल्यू के डोमेस्टिक और ओवरसीज बॉंड्स जब्त किए गए।
जांचकर्ताओं को 1.7 बिलियन युआन वैल्यू के 300 अपार्टमेंट्स और बंगलों की जानकारी भी मिली है। 1 बिलियन युआन कीमत की प्राचीन वस्तुएं और 60 से ज्यादा गाड़ियां जब्त की गई हैं। महंगी शराब, सोना, चांदी और विदेशी करंसी भी जब्त की गई।
जब्त की गई संपत्ति की कुल वैल्यू 90 बिलियन युआन है। माना जा रहा है कि जब्त की गई संपत्ति की कीमत को जनता के सामने कम करके बताया जा रहा है, ताकि सरकार को कम शर्मिंदगी झेलनी पड़े।
-एजेंसी
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